तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

1.untitled

तिरुनक्षत्र: श्रावण मास, रोहिणी

अवतार स्थलमधुरमंगलम

आचार्य: कोइल कन्दाडै रंगाचार्य स्वामी (चण्दमारुतं डोडाचार्य तिरुवंश)

शिष्य: अनेक शिष्य

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: भूतपुरी

तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर का जन्म गौरवशाली  श्रीवत्स वंश में, मधुरमंगलम क्षेत्र में 1805 क्रिस्चन इरा, आंग्ल  वर्ष में हुआ था।  में, भगवान श्रीकृष्ण और पेरीयावाच्चन पिल्लै के नक्षत्र में जन्म जन्मे , इस बालक का नाम , इनके पिता-माता राघवाचार्य और जानकी अम्मा ने कृष्णन रखा।

बालक कृष्णन को बाल्यकाल में ही माता पिता ने,  वैदिक संस्कारो  से अभिसिंचित किये । यद्यपि बहुत ही अल्प आयु में बालक कृष्णन को, भगवान के प्रति अत्यंत प्रगाढ़ प्रेम था। बचपन से ही वे सदा भगवान के दिव्य विग्रहों के साथ खेला करते थे और भगवत विषय के प्रति इनमे जिज्ञासा और तल्लीनता थी । कृष्णन उर्फ़ कृष्णमाचार्य  के विवाह योग्य उम्र पा लेने के बाद , पिताश्री राघवाचार्य , कृष्णमाचार्य के लिए योग्य कन्या की तलाश प्रारंभ करते हैं।

इसी दरम्यान एक बार पिताश्री राघवाचार्य, कृष्णमाचार्य को लेकर , एक यात्रा पर निकलते हैं । मार्ग में कृष्णमाचार्य  एक दंपत्ति को अपनी संतान के साथ यात्रा करते हुए दीखते हैं। कृष्णमाचार्य का ध्यान इस दम्पति की तरफ जाता है , और अनुभव करते है की , पति बहुत सारा  सामान,  और अपनी संतान को संभाले हुए चल रहा है,  साथ ही कभी कभी अपनी पत्नी के साथ ऊँची आवाज़ में झगड भी रहा है, कृष्णमाचार्य यह भी महसूस करते है की , वह व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक प्रेम और लगाव की वजह से , झगडे के बावजूद भी उसके प्रति समर्पित भाव से उसके साथ चल रहा है ।

कृष्णमाचार्य वैवाहिक जीवन की इस  कटुता को महसूस कर स्तब्ध हो,  उसी क्षण निर्णय लेते है की वह कभी विवाह नहीं करेंगे और अपना यह निर्णय अपने पिता से भी कह देते हैं ।

कुछ समय बाद , कृष्णमाचार्य अपने आचार्य कोयिल कन्दाडै रंगाचार्य, को अपने पैतृक स्थान (कप्पियामुर) पधारने पर उनसे  आचार्य संबंध स्थापित कर , समाश्रयण लेते है। कोयिल कन्दाडै रंगाचार्य , कृष्णमाचार्य को पञ्च संस्कार संस्कार दीक्षा प्रदान कर , सत संप्रदाय के सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतो का ज्ञान प्रदान करते हैं।

कृष्णमाचार्य अपने आचार्य के साथ कई  यात्राओं  में उनके साथ उनकी सेवा में सलंग्न रहते है ।

एक समय की बात है जब कृष्णमाचार्य  तिरुवेंकटाचल में थे, एम्बार ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर मधुरमंगलं दिव्यदेश आने के लिए आमंत्रित करते है, साथ ही निर्देश देते है की आते समय , गर्म रजाई साथ लेकर आये, कहा की मधुरमंगलं में उन्हें बहुत शीतलता का आभास हो रहा है। कृष्णमाचार्य, भगवान वेंकटेश्वर के समक्ष पहुंचकर , उनसे मधुरमंगलं प्रस्थान करने की अनुमति लेते हैं,   भगवान श्री वेंकटेश उन्हें अपनी रजाई प्रदान करते हुए मधुरमंगलम यात्रा की विनती स्वीकार लेते है . कृष्णमाचार्य मधुरमंगलं पहुंचकर वेंकटचलपति द्वारा प्रदत्त रजाई एम्बार को समर्पित करते हैं। एम्बार की कृपा से, कृष्णमाचार्य में संन्यास आश्रम अंगीकार करने की प्रबल इच्छा जाग्रत होती है  । कृष्णमाचार्य वेंकटाचल लौटकर , वकुलाभरण जीयर (पेरिय जीयर) से,  सन्यास  दीक्षा प्रदान करने का आग्रह करते हैं।

वकुलाभरण जीयर सोचते हैं कि कृष्णमाचार्य अभी युवा हैं और उन्हें कुछ और समय प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस पर कृष्णमाचार्य पेरिया जीयर से कहते हैं कि एम्बार की कृपा से उन्हें पुर्णतः विरक्ती की प्राप्ति हो गयी है और अब सन्यास  दीक्षा स्वीकार किये बिना उनका रहना संभव नहीं है। वकुलाभरण जीयर कहते हैं कि,  यदि पेरुमाल (वेंकटचलपति) इसकी स्वीकृति देते हैं तो वे उन्हें सन्यास  दीक्षा प्रदान करेंगे।

इसके पश्चात जीयर तिरुमाला के लिए प्रस्थान करते हैं , यात्रा करते समय जीयर को राह में एक त्रिदंड पर नज़र पड़ती हैं,  त्रिदण्ड अत्यंत कुशलता से बनाया हुआ था, जीयर उसे अपने साथ ले लेते हैं। राह में जब जीयर आराम के लिए रुकते हैं, तब  भगवान श्री वेंकटेशजी उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर आदेश देते हैं कि,  कृष्णमाचार्य को सन्यास दीक्षा से दीक्षित कर उन्हें यह त्रिदण्ड प्रदान करे।

भगवान का आदेश पाकर पेरिय जीयर प्रसन्नता पूर्वक कृष्णमचार्य को आमंत्रित कर , सन्यास दीक्षा  प्रदान करते हैं।।

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तिरुमलै जीयर का चित्रपट, साथ में एम्बार जीयर –तिरुमाला जीयर मठ में देखी गयी

 वकुलाभरण जीयर, कृष्णमाचार्यजी का भगवान श्री वेंकटेश्वरजी के प्रति अतीव प्रेम और समर्पण भाव को जानते थे। इसलिए जीयर उन्हें तिरुवेंकट रामानुज जीयर नाम प्रदान करते है , तद्पश्चात  कृष्णमाचार्यजी  मधुरमंगलं प्रस्थान कर , वहां कुछ समय एम्बार के कैंकर्य में संलग्न होकर , मधुरमंगलं एम्बार जीयर नाम से गौरव प्राप्त करते है ।

तिरुवेंकट रामानुज जीयर, ने अनेक दिव्य देशों की यात्रा की  , अंत में भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के उद्देश्य से , उनके अवतार स्थल श्री भूतपुरी पधारे। तिरुवेंकट रामानुज जीयर के शिष्यों ने मंदिर के दक्षिण दिशा में, तिरुवेंकट रामानुज जीयर के लिए एक मठ का निर्माण किये , तिरुवेंकट रामानुज जीयर इसी मठ में रहकर भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी का कैंकर्य करने लगे।

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आदि केशव पेरुमालभाष्यकार मंदिर, भूतपुरी

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एम्बार जीयर मठ, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कोइल स्ट्रीट, भूतपुरी

भूतपुरी में उनके समय में अनेक श्रीवैष्णवों ने उनके सानिध्य में हमारे सत संप्रदाय के विशेष सिद्धांतों का अध्ययन किया। हमारे पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों में वर्णित सिद्धांतों को उन्होंने अत्यंत कुशलता से समझाया और उस समय के बहुत से विद्वानों के ज्ञान को पोषित किया।

वे इस लीला विभूति में अल्प समय (77 वर्ष) के लिए रहे और विष्णु वर्ष के पौष्य मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि के दिन परमपद प्रस्थान किया।

उनकी सभी रचनाओं में से मुख्य है श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण पर रचित व्याख्यान के लिए अरुमपदम। उन्होंने न केवल हमारे संप्रदाय के उत्कृष्ट ग्रंथ (श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र) पर व्याख्यान की रचना की अपितु श्रीवचन भूषण में दर्शाए गए भगवत/ भागवत कैंकर्य को सम्पूर्ण निष्ठा के साथ अपने जीवन में अनुसरण किया। हमारे सत संप्रदाय के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए उन्होंने अन्य कई ग्रंथों की रचना की।

विष्णु पुराण, तत्व त्रय, यतीन्द्रं मत दीपिका आदि ग्रंथों के आधार पर उन्होंने अत्यंत सूक्ष्मता से ब्रह्माण्ड की संरचना का वर्णन किया। इस संरचना को चित्रों द्वारा दर्शाया गया है और कुछ समय पहले ही श्री रवि नामक श्रीवैष्णव के प्रयत्नों से उसका पुनः मुद्रण किया गया है।

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तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जियर स्वामी का चित्रपट

6.brahmandam

ब्रह्मांड– ब्रह्मा के ब्रह्माण की कल्पना

रचनाएँ: उनकी रचनाओं की सूचि इस प्रकार है:

  1. श्रीवचन भूषण के लिए अरुमपदम
  2. सिद्धोपाय सुदरिसनम
  3. सददरिसन सुदरिसनम
  4. दुदरिसन करिसनम
  5. विप्रतीपत्ति निरसनम
  6. श्री शठकोप स्वामीजी की श्रीसुक्ति “चेत्तत्तिन”…..पर व्याख्यान
  7. शरणागतिक्कु अधिकारी विशेषणत्व समर्थतनम्
  8. ज्योतिष पुरानंगलुक्कु ऐक कंत्य समर्थतनम्
  9. दुरुपदेसाधिक्कारम
  10. शरण शब्दार्थ विचारं
  11. श्रुतप्रकाशिका विवरणं
  12. मुक्तिपदशक्ति वादं
  13. ब्रह्मपदशक्ति वादं
  14. भूकोळ निर्णयं
  15. त्यागशब्दार्थ टिपण्णी
  16. गीतार्थ टिपण्णी
  17. कैवल्य सतदूषणी
  18. श्रीरामानुज अष्टपति
  19. सिद्धांत तूलिकै
  20. सिद्धोपाय मंगल दीपिका
  21. धर्मग्या प्रामाण्य प्रकाचिका
  22. सिद्धांत परिभाषा
  23. श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य विग्रह के ध्यान से श्रृंगारित – तिरुमंजन कट्टियम् आदि

इस तरह हमने अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे एक महान विद्वान् थे और उन्होंने हमारे सत संप्रदाय के हितार्थ बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों का भी भगवत विषय में उनके अंश मात्र ज्ञान/भक्ति की प्राप्ति हो।

अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर की तनियन:

श्रीवादुल रमाप्रवाल रुचिर सरकसैन्य नाथाम्चज
श्रीकुरविन्द्रम महार्य लभ्ध निजसत सत्तम चरुथा भिष्ठं
श्रीरामानुज मुख्य देसिकलसत कैंकर्य समस्तापकम
श्रीमतवेंकटलक्ष्मणार्य यमिनाम तमसतगुणम भावये

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

आधार : https://guruparamparai.wordpress.com/2013/08/28/sriperumbuthur-first-embar-jiyar/

स्त्रोत्र : तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर प्रभावं नामक एक प्राचीन ग्रंथ- इस पूर्ण ग्रंथ को यहाँ देखा जा सकता है – https://drive.google.com/?tab=go&authuser=0#folders/0ByVemcKfGLucZnZBMjlIa1JHdFk

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अप्पाच्चियारण्णा

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अप्पाच्चियारण्णा – श्रीदाशरथी स्वामीजी तिरुमंगलै, सिंगप्पेरुमाल कोयिलअप्पाच्चियारण्णा – श्रीदाशरथी स्वामीजी तिरुमाळिगै, सिंगप्पेरुमाल कोयिल

तिरुनक्षत्र: श्रवण, हस्त नक्षत्र

अवतार स्थल:  श्रीरंगम

आचार्य: पोन्नडिक्काल् जीयर

शिष्य: अण्णाविलप्पन (उनके पुत्र), आदि

श्रीरंगम में जन्मे, उनके पिता श्री सिररण्णर द्वारा उनका नाम वरदराजन रखा गया था। उनका जन्म श्री श्रीदाशरथी स्वामीजी के प्रसिद्ध वादुल वंश में हुआ और वे आण्डान वंश के नव वंशज हुए। वे आय्चियार के पुत्र थे, जो तिरुमंजन अप्पा की पुत्री थी। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी , जो उन्हें अपना प्रिय मानते थे, के द्वारा उनको अप्पाच्चियारण्णा नाम प्रधान हुआ और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें बड़े प्यार से  “नम् अप्पाच्चियारण्णावो” (क्या यह हमारे अप्पाच्चियारण्णा है?) ऐसा कहकर उनका अभिवादन करते हैं। वे पोन्नडिक्काल् जीयर के भी प्रिय शिष्य थे और वे पोन्नडिक्काल् जीयर के चरण कमल के रूप में जाने जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे पोन्नडिक्काल् जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों के रूप में जाने जाते हैं)।

तिरुमंजन अप्पा, श्रीरंगम पेरिय कोयिल में एक स्वार्थहीन कैंकर्यपारर थे और उनकी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति अत्यंत प्रीति थी। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव को जानकर, वे नित्य प्रतिदिन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का अनुसरण करते थे| जब भी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्नान के लिए जाया करते थे, वे वहां स्नान किया करते थे जहाँ से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्नान करने का जल बह कर आता था और वह पवित्र जल जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा स्नान के लिए प्रयोग किया था उसके पवित्र संबंध से शुद्ध ज्ञान को प्राप्त किया। उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का पूर्ण आश्रय लिया और पुर्णतः श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का कैंकर्य प्रारंभ किया।

एक बार जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्नान के लिए जा रहे थे तभी बरसात प्रारंभ हो गयी। तो उन्होंने एक श्रीवैष्णव के घर के बरामदे में कुछ देर विश्राम किया। उस घर में रहने वाली एक महिला जीयर को देखते ही घर से बाहर आई और उनके बैठने के लिए आसन की व्यवस्था की। उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की भीगे हुई पादुकायें ली जिनमें से पानी झर रहा था और उन्हें अपने मस्तक पर धारण की। उन्होंने फिर उसे पोंछकर, अत्यंत श्रद्धा से उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया। उन पादुकाओं के संबंध मात्र से उन पर कृपा हुई और उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करने का निश्चय किया। जब जीयर ने उनसे उनका परिचय पूछा तब उन्होंने बताया कि उनका नाम आच्चि है और वे तिरुमंजन अप्पा की पुत्री है, तिरुमंजन अप्पा से उनके संबंध को सुनकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बहुत प्रसन्न हुए। वे बताती है कि उनक विवाह कन्दाडै सिर्रण्णार (श्रीदाशरथि स्वामीजी के वंशज) से हुआ है। जब बरसात बंद हुई, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने कावेरी के लिए प्रस्थान किया।

कुछ समय पश्चाद, उन्होंने अपनी अभिलाषा अपने पिताश्री को बताई और उनके पिता श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा उनके पञ्च संस्कार विधि की व्यवस्था एक गोपनीय विधान में करते हैं (क्यूंकि वे एक आचार्य पुरुष परिवार से संबंधित थी, इसीलिए सार्वजनिक रूप से ऐसा करने से भयभीत थी)। हालाँकि उनके वर्त्तमान संबंध को देखते हुए प्रथमतः श्रीवरवरमुनि स्वामीजी संकोच करते हैं, परंतु उनके अत्यधिक श्रद्धा को देखते हुए, वे उनकी पञ्च संस्कार विधि पूर्ण करते हैं।

अंततः, कन्दाडै परिवार के बहुत से आचार्यों ने भगवान की दिव्य अनुकम्पा के माध्यम से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण ली। कोयिल कन्दाडै अण्णन्, जो प्रमुख आचार्य हैं, वह एक दिव्य स्वपन के माध्यम से, पोन्नडिक्काल् जीयर के मार्गदर्शन से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेते हैं। वे कन्दाडै तिरुवंश के संभवतः सभी आचार्य पुरुषों को भी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण कराते हैं।

कोयिल अण्णन् और अन्य को पञ्च संस्कार प्रदान करने के पश्चाद, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् जीयर के प्रति अपनी सर्वाधिक प्रीति को प्रदर्शित करते हैं। वे सब से कहते हैं “पोन्नडिक्काल् जीयर मेरे जीवन श्वांस के समान है और मेरे हितैषी है। जो भी मेरा वैभव है, उन्हें भी वही प्राप्त होना चाहिए”। जिसप्रकार श्रीदाशरथि स्वामीजी के वंशजों के साथ मेरा संबंध (आचार्य के समान) है, उसी प्रकार पोन्नडिक्काल् जीयर के सानिध्य में भी उनके परिवार से सम्बंधित कुछ शिष्य होना चाहिए” अण्णन, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के ह्रदय को समझकर कहते हैं “तब आप मुझे पोन्नडिक्काल् जीयर के शिष्य होने का आदेश प्रदान किए होते !” और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी यह कहते हुए अण्णन के प्रति अपना विशेष अनुराग दर्शाते हैं “जो मेरे निमित्त है, उनका त्याग मैं कैसे कर सकता हूँ (स्वयं पेरिय पेरुमाल के दिव्य आदेश के अनुसार)?” तब कोयिल अण्णन् अपने सभी संबंधियों की ओर देखते हैं और तभी अप्पाच्चियारण्णा खड़े होकर विनम्रता से कहते हैं “हे हमारे स्वामी वानमामलै रामानुज जीयर, कृपया मुझे अपनी शरण में लीजिये”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनसे बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें “नम अप्पाचियारण्णावो?” (क्या यह हमारे अप्पाचियारण्णा है), ऐसा कहकर उनका अभिवादन करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी फिर पोन्नडिक्काल् जीयर को अपने सिन्हासन पर बैठाते हैं और उनके हाथों में शंख और चक्र प्रदान करते हुए उनसे अप्पाचियारण्णा की पञ्च संस्कार विधि संपन्न करने के लिए कहते हैं। पोन्नडिक्काल् जीयर पहले विनम्रता से मना करते हैं, परंतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आग्रह करने पर कि ऐसा करने से उन्हें प्रसन्नता होगी, पोन्नडिक्काल् जीयर उसे स्वीकार करते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (श्रीरंगम) - पोन्नडिक्काल जीयर (वानमामलै)- अप्पाच्चियारण्णा

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (श्रीरंगम)   – पोन्नडिक्काल जीयर (वानमामलै)   – अप्पाच्चियारण्णा

इसके पश्चाद अप्पाच्चियारण्णा श्रीरंगम में निरंतर पोन्नडिक्काल् जीयर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा में संलग्न हुए।

एक समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वेंकटाचल की यात्रा पर सभी शिष्य के साथ प्रस्थान करते हैं। वे प्रथमतय कांचीपुरम पहुँचते हैं और वहां देव पेरुमाल भगवान का मंगलाशासन करते हैं। उस समय जीयर और उनके सहयोगी वैशाख महोत्सव पर देव पेरुमाल की आराधना करते हैं और गरुड़ वाहन में विराजे भगवान का मंगलाशासन करते हैं।

गरुड़ वाहन पर देव पेरुमाल- श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

गरुड़ वाहन पर देव पेरुमाल- श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

कांचीपुरम के श्रीवैष्णव श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुंचकर उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें श्रीवैष्णव आचरण और सिद्धांतों के महत्त्व का वर्णन करते हैं और उन्हें दिव्य प्रबंधन आदि विषयों में दक्षता प्राप्त करने के लिए कहते हैं। वे उनके निर्देशों को प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे किसी की नियुक्ति करे जो सदा वहां निवास करते हुए उनका मार्गदर्शन करे । श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् जीयर से अप्पाच्चियारण्णा को उनके समक्ष लाने के लिए कहते हैं और वे उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। तद्पश्चाद वे सभी श्रीवैष्णवों से कहते हैं “अप्पाच्चियारण्णा को मेरे समान ही माने” और अप्पाच्चियारण्णा को निर्देश देते हैं कि “क्यूंकि आप श्रीदाशरथि स्वामीजी के कुल से सम्बंधित हैं, आप मेरे नियुक्त अधिकारी बनकर यहाँ सभी का मार्गदर्शन करते हुए आण्डान, कन्दाडै थोलप्पर आदि पूर्वजों को प्रसन्न करें और प्रतिदिन देव पेरुमाल का मंगलाशासन करें। हस्तगिरी नाथ सदा आपका मंगल करेंगे”। अप्पाच्चियारण्णा, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के निर्देशों को स्वीकार करते हैं परंतु जीयर की तिरुमाला यात्रा में उनका अनुसरण करते हैं। बहुत से दिव्य देशों की यात्रा के पश्चाद, वे अंततः श्रीरंगम लौटते हैं।

उस समय, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अप्पाच्चियारण्णा को आमंत्रित करते हैं और उन्हें अपने कांचीपुरम लौटने के कर्तव्य के विषय में स्मरण कराते हैं। अप्पाच्चियारण्णा, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरणकमल अनुरागी श्रीवैष्णव भागवत गोष्ठी का साथ छूटने पर अपना दुःख प्रकट करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अप्पाच्चियारण्णा के मनोभाव को समझकर, उन्हें पेरुमाल की सन्निधि में ले जाते हैं। उनके पास एक सोम्बू (छोटा पात्र) था, जिसे वे श्री रामानुज के नाम से संबोधित करते थे, परंतु उसे उन्होंने पोन्नडिक्काल् जीयर को प्रदान किया जो उन्हें अपनी पूजा पेटी में विराजमान कर प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा से आचार्य प्रसाद समझकर उसकी आराधना करते थे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् जीयर को वह सोम्बू लाने का आदेश देते हैं, और उसे लेकर अप्पाच्चियारण्णा को प्रदान करते हुए कहते हैं कि “क्यूंकि इसमें अंकित तिरुमण, शंख, चक्र और श्रीरामानुज नाम सभी लुप्त हो गए हैं, कृपया इस धातु से आप मेरे दो विग्रह बनाये और एक अपने आचार्य (पोन्नडिक्काल् जीयर) को समर्पित करके, द्वितीय विग्रह को अपने तिरुवाराधन में विराजे”। वे अपने तिरुवाराधन में भी “एन्नै तीमनम केडुत्तार” (जिन्होंने मेरे मन को शुद्ध किया-यह दिव्य नाम श्रीशठकोप स्वामीजी की तिरुवाय्मौली 2.8 पधिगम से लिया गया है) नामक दिव्य विग्रह अप्पाच्चियारण्णा को प्रदान किये।

एन्नैथ तिमनम केदुत्तार-श्रीदाशरथी स्वामीजी तिरुमंगलै, सिंगप्पेरुमाल कोयिल

एन्नै तीमनम केडुत्तार -श्रीदाशरथी स्वामीजी तिरुमंगलै, सिंगप्पेरुमाल कोयिल

इन भगवान की आराधना आत्कोण्डविल्ली जीयर (श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य) और कन्दाडै आण्डान, श्रीदाशरथि स्वामीजी के पुत्र, जो आत्कोण्डविल्ली जीयर के प्रिय थे, के द्वारा की गयी है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं “क्यूंकि आप भी कन्दाडै आण्डान के वंशज हैं और आप इन भगवान की आराधना करने के अधिकारी हैं, आप इन्हें अपने तिरुवाराधन में विराजमान कर प्रतिदिन इनकी सेवा करे”। अप्पाच्चियारण्णा के प्रति अपने अत्यधिक प्रीति को दर्शाते हुए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि अप्पाच्चियारण्णा स्वयं देव पेरुमाल के अंश स्वरुप हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के निर्देशों को स्वीकार करते हुए, अप्पाच्चियारण्णा कांचीपुरम में निवास करते हुए वहां सभी श्रीवैष्णवों का मार्गदर्शन करते हैं।

इस प्रकार, हमने अप्पाच्चियारण्णा के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अपने आचार्य पोन्नडिक्काल् जीयर के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी अपने आचार्य के प्रति अंश मात्र अभिमान की प्राप्ति हो।

अप्पाच्चियारण्णा की तनियन:

श्रीमत वानमहाशैल रामानुज मुनिपिर्यम
वादुल वरदाचार्यं वन्दे वात्सल्य सागरं

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्

श्रीः
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श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी का कालक्षेप गोष्टी- बाई ओर से दूसरे (पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्)

nampillai-pinbhazakiya-perumal-jeer-srirangam

श्री नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दिव्य चरणों मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्, श्रीरङ्गम्

तिरुनक्शत्र – तुला, शतभिषक्
अवतार स्थल् – तिरुपुट्कुळि
आचार्यनम्पिळ्ळै
परमपद् प्राप्ती स्थल् – श्रीरन्गम्
लिखित् ग्रन्थ् – 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव| इनको वार्ता माला के ग्रन्थकार भी कह्ते थे, पर इस सूचना में स्पष्टता नही है|

ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है| ये अपने 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव मे हमारे आळ्वारों और आचार्यो के ऐतिहासिक जीवन का वर्णन करते हैं|जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की|

एक बार जब पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् अस्वस्थ्य हुए, तब वे अन्य श्रीवैष्णवों को भगवान से उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने के लिये कहे- ये श्रीवैष्णव शिष्टाचार के विरुद्ध है|भगवान से किसी भी वस्तु की प्रार्थना नही करना चाहिये – अच्छे स्वास्थ्य के लिये भी नही|इस कारण नम्पिळ्ळै के शिष्य, उनको यह घटना बताते हैं, और पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के इस आचरण का आशय पूछते हैं|नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को यह विषय पूर्णता से समझाने के लिये कुछ स्वामियों के पास भेजते हैं| उनमें से प्रथम थे, एङ्गळाळ्वान् जो शास्त्रो में निपुण थे| एङ्गळाळ्वान् स्वामीजी की राय थी कि “शायद वे श्रीरङ्गम् से अनुरक्त हैं और यहाँ से निकलने के लिये तैयार नही हैं| इसके पश्चात्, नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् के पास भेजते हैं| तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् कहते हैं कि, “शायद पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी का कोई अधूरा काम रह गया हो जिसको पूर्ण करने के लिये वे अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं|” नम्पिळ्ळै इसके बाद शिष्यों को अम्मङ्गि अम्माळ् का अभिप्राय सुनने के लिये भेजते हैं| वे बताते हैं “नम्पिळ्ळै स्वामी के कालक्षेप गोष्ठी छोडने की इच्छा किसको होगी, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शायद इसी कारण अपने जीवन बढाने की इच्छा रखते हैं| “आखिर में नम्प्पिळ्ळै के कह्ने पर उनके शिष्य, पेरिय मुदलियार् से भी यह शंका पूछे| पेरिय मुदलियार् स्वामीजी का विचार था, ” नम्पेरुमाळ् के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामी का अत्यंत प्रेम ही उनमें यहाँ ज़्यादा दिन ठहरने की अभिलाषा जागृत कर रहा है|”अन्त में नम्पिळ्ळै, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से ही प्रश्न करते हैं कि इन में से कोई भी विचार उनके मन के विचार से मिलते है या नहीं? इस प्रश्न का उत्थर देते हुए पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् कह्ते हैं “आपकी कृपा के कारण ही आप यह उत्थर मेरी जिव्हा से सुनना चाह्ते हैं, जब की आप मेरे मन की बात से अनभिज्ञ नहीं हैं| प्रति दिन आपके स्नान के समय आपके दिव्य स्वरूप का दर्शन प्राप्त होता है तथा आपको पंखा करने का कैंकर्य प्राप्त होता है|यह कैंकर्य त्याग कर अभी परमपद कैसे जाऊँ? इस तरह पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् एक शिष्य के सबसे महत्त्वपूर्ण विधी को प्रकट करते हैं, अथार्थ अस्मदाचार्य के दिव्य रूप से आसक्त रह्ना|यह सुनकर अन्य शिष्य, नम्पिळ्ळै के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के भक्ति को समझ कर स्तम्भित हुये |

नडुविल् तिरुवीधि पिल्लै भट्टर को नम्पिळ्ळै के शिष्य बनाने मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् ही उपकारी थे | यह घटना पूर्ण तरह से यहाँ दोहराया गया है | https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/08/21/naduvil-thiruvidhi-pillai-bhattar/.

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से संबंधित यह घटना व्याख्यानों में प्रस्तुत है :

वार्तामाला पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के जीवन की कुछ घट्नायें निम्न प्रस्तुत है|

  • 2- पिन्भळगिय जीयर्, नम्पिळ्ळै से एक बार स्वरूपम (जीवात्मा की प्रकृति), उपाय (साधन), उपेय (लक्ष्य) के विषयों में प्रश्न करते हैं| नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि, जीवात्मा कि चाहना स्वरूप है, भगवान कि दया उपाय और् माधुर्य उपेय है| जीयर् कह्ते हैं कि उनके विचार अलग है तब नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि आपका सिद्धांत क्या कहता है| जीयर् ने कहा, ” आपके द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर में ऐसा विचार करता हूँ; श्री वैष्णवों के शरण में प्रपत्ती करना ही मेरा स्वरूप है, हमारे प्रती उनका प्रेम ही उपाय है और् उनका आनन्द ही मेरा उपेय है”| यह् सुनकर नम्पिळ्ळै बहुत आनन्दित हुये| इस प्रकार जीयर अपने आचार्य के सामने “भागवत् शेषत्व” को प्रमाणित किया|
  • 69- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर नम्पिळ्ळै से द्वय महामन्त्र के दिव्य अर्थों के विषय में पूछते हैं|नम्पिळ्ळै प्रतिपादन् करते हैं कि द्वयम् के प्रथम पद् में जीवात्मा स्वीकार् करती है कि श्रीमन्नारायण भगवान ही एकमात्र पुर्णतः उसके आश्रय् है और् दूसरे पद में जीवात्मा पिराट्टी (श्रीलक्ष्मीजी) के सन्ग् परमात्मा के कैंकर्य, सेवा करने की चाहत प्रकट् करती है और् प्रभु से विनती करती है कि यह् कैंकर्य केवल् भगवान् के भोग्य मात्र है, इसमें हमारा कण मात्र भी स्वार्थ नहीं है|जिन आचार्य के कारण शिष्यों में ऐसा गहरा विश्वास जागृत हुआ है, उन श्रीआचार्य के प्रति सदा कृतज्ञ रह्ना चाहिये| आगे जीयर् पूछते हैं कि, अगर् पिराट्टि निरन्तर् एम्पेरुमान् के ध्यान में ही लीन है, तो वे जीवात्माओं की सहायता कैसे करेंगी? नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि जैसे भगवान, निरंतर पिराट्टी के सौन्दर्य का आनंद लेते हैं, परंतु तब भी वे सृष्टि आदि का कार्य संभालते हैं, वैसे ही पिराट्टी भी भगवान के रूप में निरन्तर मग्न होते हुये भी पुरुषकारत्व-भूता होने के कारण सदा जीवात्माओं के पक्ष में एम्बेरुमान् से अनुग्रह करती रहती है|
  • 174 –नम्पिळ्ळै के सेवा खोने के भय से जीयर अपने स्वास्थ्य के हितार्थ प्रार्थना किये| इस घटन का उल्लेख इस लेख में देखा गया है|
  • 216- नडुविल् तिरुवीदिप्पिल्लै भट्टर्, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् और् नम्पिळ्ळै के बीच के एक सुन्दर वार्तालाप का उल्लेख करते हैं| जीयर् का एक प्रश्न था कि, “प्रत्येक मुमुक्षु को आळ्वार की तरह होनी चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और उन्हीं का ध्यान सदा करने वाली)|पर हमें अभी भी सामान्य लौकिक अभिलाषाएं हैं|हमें कैसे वह प्रतिफल (परमपद में कैंकर्य प्राप्ती) मिलेगा?” नम्पिळ्ळै उत्थर देते हैं कि , “इस शरीर में आळ्वारो के तरह उन्नती न हो, फिर भी हमारी आचार्य के प्रति परिशुद्धता के कारण हमारी मृत्यु और् परमपद पहुँचने के अन्तर के समय में भगवान हमें भी वही अभिलाषाएं(आळ्वारो के जैसे) प्रदान करते हैं|परमपद पहुँचते समय हम परिशुद्ध हो चुके होंगे और केवल भगवान के निरन्तर कैंकर्य ही हमारी एकमात्र रूचि रहेगी.”
  • 332- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् पूछते हैं, “जब किसी को कोई कष्ट होता है, तब एक् श्री वैष्णव से प्रार्थना करने पर  उसे उस कष्ट का निवारण मिलता है, तो क्या यह उस श्री वैष्णव की शक्ती से होता है या भगवान के शक्ती से है?” नम्पिळ्ळै उत्तर् देते हैं कि,” यह केवल भगवान की शक्ति से ही है”| आगे जीयर प्रश्न करते हैं, “तो क्या हमारे कष्टों के निवारण के लिए, हम स्वयं भगवान से प्रार्थना नहीं कर सकते?” नम्पिळ्ळै कह्ते हैं, “नहीं| भगवान से आग्रह, सदा एक श्रीवैष्णव के द्वारा ही करना चाहिये”| जीयर फिर प्रश्न करते हैं, “क्या ऐसा कोई द्रष्टांत है, जहाँ एक श्रीवैष्णव की इच्छा को भगवान ने पूरा किया हो?” इस प्रश्न के उत्थर में नम्पिळ्ळै महाभारत से एक चरित्र सुनाते हैं,” जब् अर्जुन ने सूर्यास्त के पह्ले, जयद्रत का वध करने की प्रतिज्ञा ली, सर्वेश्वर ने युद्ध में शस्त्र  ना उठाने की अपनी प्रतिज्ञा का त्याग किया और् सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर सूर्य को छुपा दिया| यह देखकर जयद्रत बाहर आया, तब तुरन्त् भगवान सुदर्शन चक्र को अपने पास लौटाकर स्पष्ट किये कि सूर्य अस्तमन नहीं हुआ है, और अर्जुन जयद्रत् का वध कर सका| इस चरित्र से हम समझ सकते हैं कि भगवान एक श्री वैष्णव के शब्द को निभाते हैं और इस कारण हमें भगवान का एक श्री वैष्णव के द्वारा ही आग्रह करना चाहिये”|

इस प्रकार पिन्भळगिय पेरुमाळ जीयर के यशश्वी जीवन के कुछ झलक हमें प्राप्त हुई| वे उत्तम विद्वान और् नम्पिळ्ळै के अति प्रिय शिष्य थे| उनके चरण कमलों में हम प्रार्थना करे कि हमें भी उनकी अंश मात्र  भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो|

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के तनियन् :

ज्ञान वैराग्य सम्पूर्णम् पश्चात् सुन्दर देशिकम् |
द्राविडोपनिषद् भाष्यतयिनम् मत् गुरुम् भजे ||

-अदियेन् प्रीति रामानुजदासी

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तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirumazhisaiazhwar

श्री भक्तिसार

तिरुनक्ष्त्र: ज्येष्ठ, धनिष्ठा

अवतार स्थल:  तिरुमलिसै

आचार्य: नरसिम्हाचार्य (उनके पिताश्री)

तिरुमलिसै (महिसार क्षेत्रं) में जन्मे, उनके पिता नरसिम्हाचार्य द्वारा उनका नाम वीरराघवन रखा गया। उनका जन्म श्री दाशरथि स्वामीजी के प्रसिद्ध वादुल वंश में हुआ था। उन्होंने भक्तिसारोदयं नामक अपने स्तोत्र ग्रंथ में स्वयं अपने पितामह श्रीरघुवाराचार्यजी के विषय में बताया है। उन्हें वादुल वीरराघवाचार्य नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म वर्ष 1766 ए.डी में हुआ था।

वे बहुत विद्वान् थे और 15 वर्ष की आयु तक उन्होंने स्वयं की यजुर्वेद शाकै के साथ तर्कं, व्याकरणं, मीमांसा, सांख्यं, पतंजलि योगं आदि की शिक्षा पूर्ण की और ज्योतिष, संगीत , भारत नाट्यम आदि में पारंगत हुए। 20 वर्ष की आयु तक, वे सभी शास्त्रों में पारंगत और अधिकृत हो गए थे। उन्होंने रहस्य ग्रंथ आदि की शिक्षा अपने पिताश्री से प्राप्त की और हमारे सत संप्रदाय के महत्वपूर्ण सिद्धातों की स्थापना के लिए व्याख्यान देना प्रारंभ किया। उन्होंने वादुल वरदाचार्य और श्रीरंगाचार्य (जिन्होंने विभिन्न दिव्यदेशों की यात्रा की और वहां चर्चा में बहुत से छद्म विद्वानों को पराजित किया) के सानिध्य में भी शिक्षा प्राप्त की।

वे 51 वर्षों के अल्प समय के लिए लीलाविभुती में रहे और फिर ईश्वर वर्ष, अश्विन मास, शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को परमपद के लिए प्रस्थान किया।

पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण के श्री वरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यान ले लिए अरुमपदम (विस्तृत व्याख्यान) उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। उनका अन्य ग्रंथ, भक्तिसारोदयं, तिरुमलिसै आलवार के जीवन का बहुत सुंदरता से वर्णन करता है।

रचनायें:

अपने अल्प जीवन में, उन्होंने बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। उनकी रचानों की सूचि निम्न है:

  1. श्री भक्तिसारोदयं
  2. वेदवल्ली शतकम्
  3. हेमलताष्टकम्
  4. अभीष्ट दंडकम्
  5. सुक संदेशं
  6. कमला कल्याण नाटकं
  7. मलयजपरिणय नाटिका
  8. नृसिम्हाष्टकम्
  9. श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के श्रीवचन भूषण व्याख्यान के लिए अरुमपदम् विवरण
  10. तिरुच्चंत विरुत्त प्रतिपदम्
  11. श्रीरंगराज स्तव व्याख्यान
  12. महावीरचरित व्याख्या
  13. उत्तररामचरित व्याख्या
  14. सतश्लोकी व्याख्या
  15. रामानुजाष्टकम् व्याख्या
  16. नक्षत्रमालिका व्याख्या
  17. देवराजगुरू विरचित वरवरमुनिशतक व्याख्या
  18. दुशकरश्लोक टिपण्णी
  19. दिनचर्या
  20. शणमत दर्शिनी
  21. लक्ष्म्या: उपायत्व निरास:
  22. लक्ष्मीविभुत्व निरास:
  23. सूक्तिसाधुत्वमाला
  24. तत्वसुधा
  25. तत्वसार व्याख्या- रत्नसारिणी
  26. सच्चरित्र परित्राणं
  27. पलनदै विलक्कम
  28. त्रिमसतप्रश्नोत्तरं
  29. लक्ष्मीमंगलदीपिका
  30. रामानुज अतिमानुष वैभव स्तोत्रं
  31. अनुप्रवेश श्रुति विवरणं
  32. “सैलोग्निश्च” श्लोक व्याख्या
  33. महीसारविषय चूर्णिका
  34. ‘स्वान्ते मे मदनस्थितिम परिहार’ इत्यादि श्लोक व्याख्यान
  35. सच्चर्याक्ष्कम्
  36. प्राप्यप्रपंचन पञ्चविंशति:
  37. न्यायमंत्रम्
  38. तात्पर्य सच्च्रिकरम
  39. वचस्सुतामीमांसा
  40. वचस्सुतापूर्वपक्षोत्तारम
  41. ब्रह्मवतवतंगम
  42. लक्ष्मीस्तोत्रं
  43. वर्णापञ्चविंशति:

इस तरह हमने तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे एक महान विद्वान् थे और उन्होंने हमारे सत संप्रदाय के हितार्थ बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी भगवत विषय में उनके अंश मात्र ज्ञान की प्राप्ति हो।

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार की तनियन:

श्रीमद् वादुल नरसिम्ह गुरोस्थनुजम्,
श्रीमत् तदीय पदपंकज भृंगराजम् ।
श्रीरंगराज वरदार्य कृपात्त भाष्यं,
सेवे सदा रघुवरार्यं उदारचर्यं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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पिल्लै लोकम् जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

pillailokam-jeeyarपिल्लै लोकम् जीयर, तिरुवल्लिक्केणी

तिरुनक्षत्र:: चैत्र, श्रवण नक्षत्र

अवतार स्थल: कांचीपुरम

आचार्य: शठकोपाचार्य

रचनाएँ: तनियन व्याख्यान, रामानुज दिव्य चरित, यतीन्द्र प्रवण प्रभावं, रामानुज नूट्र्रांताति व्याख्यान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की प्रायः सभी सूक्तियों पर व्याख्यान, कुछ रहस्य ग्रंथों के लिए व्याख्यान, चेय्य तामरै तालिनै (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वालि तिरुनाम) के लिए व्याख्यान, श्रीवैष्णव समयाचार निष्कर्षम्

कांचीपुरम में जन्मे, वे परवस्तु पट्टरपिरान जीयर (जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक थे) के पड-पौत्र थे और उनका जन्म नाम वरदाचार्य था । वे पिल्लै लोकम जीयर और पिल्लै लोकाचार्य जीयर नाम से भी प्रसिद्ध थे।

उन्होंने तिरुक्कदलमल्लै (महाबलीपुरम-मामल्लपुरम) के स्थलशयन भगवान के मंदिर का जीर्णोद्धार किया और मंदिर में पूजा की उचित विधि स्थापित की। उनके योगदान के लिये राजा ने उनका सम्मान किया और आज भी मंदिर में उनके वंशजों को विशेष सम्मान प्रदान किया जाता है।

वे महान विद्वान् और एक महान इतिहासकार भी थे। उनके जीवन के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। परंतु उनकी रचनाएँ हमारे संप्रदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुछ शिलालेख पाए गए हैं, जिनमें दिव्यदेशों में उनके योगदान का उल्लेख मिलता है।

  • वर्ष 1614 ए.डी. से सम्बंधित एक ताम्बे का छापा, जो तिरुक्कदलमल्लै दिव्यदेश में प्राप्त हुआ, यह दर्शाता है कि जीयर अर्थात यतीन्द्र प्रवणं प्रभावं के रचयिता पिल्लै लोकम जीयर (जो यह दर्शाता है की उस समय तक वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की जीवनी लिखने के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गये थे)।
  • वर्ष 1614 ए.डी. का एक पत्थर का शिलालेख, जो श्रीरंगम के दूसरे प्राकारं में प्राप्त किया गया, से हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि पिल्लै लोकम जीयर के एक शिष्य ने श्रीरामानुज स्वामीजी की तिरुनक्षत्र दिवस पर क्षीरान का भोग लगाने के लिए 120 स्वर्ण सिक्कों का योगदान दिया था।

उन्होंने अधिकांश दिव्य प्रबन्धों के प्रारंभिक पद अर्थात तनियन पर व्याख्यान की रचना की। इन व्याख्यानों में उन्होंने उस विशिष्ट दिव्य प्रबंध के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाया है और उस दिव्य प्रबंध के रचयिता के ह्रदय/मनोभाव का चित्रण किया है।

ramanujar-sriperumbudhur

उन्होंने रामानुज दिव्य चरित्र, श्री रामानुज स्वामीजी के जीवन का बहुत सुंदर वर्णन की है। श्रीरामानुज स्वामीजी की विभिन्न यात्रियों, उनके जीवन और उनके अन्य शिष्यों के जीवन की घटनाओं का इस ग्रंथ में मधुरता से चित्रण किया गया है।

नम्पेरुमाल , श्री वरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशैलेश तनियन प्रस्तुत करते हुए

नम्पेरुमाल , श्री वरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशैलेश तनियन प्रस्तुत करते हुए

उनका यतीन्द्र प्रवण प्रभावं ग्रंथ पेरियावाच्चान पिल्लै, वडूक्कू तिरुविधि पिल्लै, पिल्लै लोकाचार्य, अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार्, तिरुवाय्मौली पिल्लै और मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और कई अन्य आचार्यों के वैभवशाली जीवन परिचय का चित्रण करता है। इस ग्रंथ में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन का विस्तार से वर्णन किया गया है और उनके बहुमूल्य निर्देशों को अत्यंत सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है।

रामानुजार्य दिव्य चरितं और यतीन्द्र प्रवण प्रभावं दोनों ही बहुत से तमिल पसूरों से युक्त हैं जो उनके तमिल भाषा के गहरे ज्ञान को दर्शाता है।

उन्होंने कुछ रहस्य ग्रंथों के व्याख्यान की भी रचना की है।

उन्होंने विलान्चोलै पिल्लै द्वारा रचित सप्त गाथा के लिए भी बहुत सुंदर व्याख्यान की रचना की है। सप्त गाथा, पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र के सार – आचार्य निष्ठा के विषय में वर्णन करता है।

उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की श्री सूक्तियां, उपदेश रत्न माला, तिरुवाय्मौली नुरन्तादी और आरती प्रबंध पर वृहद व्याख्यानों की रचना की है।

उन्होंने श्रीवैष्णव समयाचार निष्कर्षम् नामक एक अत्यंत सुंदर काव्य ग्रंथ की रचना की, जो रामानुज दर्शन (हमारे सत-संप्रदाय) के महत्वपूर्ण सिद्धांतों की अधिकृत रूप से स्थापना करती है। इस ग्रंथ में बहुत से प्रमाणों का उल्लेख किया गया है जो पिल्लै लोकम जीयर के शास्त्रों के गहरे ज्ञान को दर्शाता है।

इस तरह हमने पिल्लै लोकम जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों पर विस्तृत व्याख्यान की रचना करके अथवा श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के महान जीवन परिचय को लिपिबद्ध करके हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय पर बहुत उपकार किया है। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी श्री रामानुज स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति उनके समान ही अनुराग विकसित हो।

पिल्लै लोकम जीयर की तनियन (यतीन्द्र प्रवणं प्रभाव से ली गयी):

श्रीसठारी गुरोर्दिव्य श्रीपादाब्ज मधुव्रतम।
श्रीमतयतीन्द्रप्रवणं श्री लोकार्य मुनिं भजे।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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श्री भूतपुरि आदि यतिराज जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: अश्विन मास पुष्य नक्षत्र

अवतार स्थल:  ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: श्रीपेरुम्बुदुर

यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर (श्रीरामानुज स्वामीजी का अवतार स्थल) आदि (प्रथम) यतिराज जीयर ने स्थापित किया था।

श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर

श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर

यह यतिराज जीयर मठ बहुत अनोखा है, क्यूंकि यह उन कुछ मठों में से एक है जो आलवार / आचार्य अवतार स्थल पर मंदिर के कैंकर्य के लिए और मंदिर में होने वाले उन कैंकर्य की देखभाल करने के लिए स्थापित किया गया है। भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी वर्षभर इस मठ में पधारते हैं।

यतिराज जीयर – श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ

यतिराज जीयर – श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ

उनकी तनियन से हम समझ सकते हैं कि उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अन्य आचार्यों जैसे वानमामलै जीयर, कोयिल कन्दाडै अण्णन् और दोडाचार्य के साथ एक अद्भुत संबंध था। यतिराज जीयर ने इन महान आचार्यों के चरण कमलों में शिक्षा प्राप्त की।

उनके वालि तिरुनाम से हम समझ सकते हैं कि उनकी श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल में बहुत प्रीति थी। उनका वालि तिरुनाम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वालि तिरुनाम से बहुत मिलता-जुलता है।

यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में, यह कहा गया है कि परमस्वामी (तिरुमालिरुन्चोलै कल्ललगर) के निर्देशानुसार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने यतिराज जीयर नामक अपने एक गोपनीय कैंकर्यपारर को तिरुमालिरुन्चोलै मंदिर के संशोधन और व्यवस्था के लिए भेजा। कुछ लोग, इन यतिराज जीयर को श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर मानते हैं, वहीं कुछ अन्य बताते हैं कि वे कोई और जीयर हैं जो बाद में तिरुमालिरुन्चोलै जीयर मठ के प्रथम जीयर हुए। इस बारे में अधिक जानने के लिए, विज्ञ विद्वानों से अनुसंधान कर सकते हैं।

इस तरह हमने श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी भगवत/भागवत/आचार्य कैंकर्य की प्राप्ति हो।

श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर की तनियन:

श्रीमत् रामानुजांघ्री प्रवण वरमुने: पादुकं जातब्रुंगम,
श्रीमत् वानान्द्री रामानुज गणगुरु सतवैभव स्तोत्र दीक्षम् ।
वादूल श्रीनिवासार्य चरणशरणम् तत् कृपा लब्ध भाष्यं,
वन्दे प्राज्ञं यतिन्द्रम् वरवरडगुरो: प्राप्त भक्तामृतार्तम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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कोयिल कन्दाडै अप्पन्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

untitled1कोयिल कन्दाडै अप्पन् – कांचीपुरम अप्पन स्वामी तिरुमाळिगै

तिरुनक्षत्र: भाद्रपद, मघा

तीर्थम्: कार्तिक शुक्ल पंचमी

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी

रचनाएँ: वरवरमुनि वैभव विजयं

मुदलियाण्डान्/दाशरथि स्वामीजी (जिन्हें यतिराज पादुका- श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणकमलों की पादुका के नाम से भी जाना जाता है) के प्रसिद्ध वंश में जन्मे, देवराज थोज्हप्पर के पुत्र और कोयिल कन्दाडै अण्णन् के अनुज, का जन्म नाम श्रीनिवास था। वे आगे चलकर मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रिय शिष्यों में से एक हुए।

जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आलवार तिरुनागरी से श्रीरंगम पधारे, श्रीरंगनाथ उन्हें श्रीरंगम में ही निवास करने और सत संप्रदाय का पालन पोषण करने का आदेश देते हैं। तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी पूर्वाचार्यों के ग्रंथ एकत्रित करना प्रारंभ करते हैं, उन्हें पुर्णतः संकलित करते हैं और नियमित रूप से ग्रंथ कालक्षेप प्रदान करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य वैभव से प्रभावित होकर, बहुत से लोगों ने (आचार्य पुरुषों सहित) उनके चरण कमलों में आश्रय प्राप्त किया।

भगवान की दिव्य इच्छा के अनुसार, कोयिल कन्दाडै अण्णन् (दाशरथि स्वामीजी के वंश में उत्पन्न होने वाले एक प्रधान आचार्य) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए और अष्ट दिग्गजों (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा नियुक्त सत-संप्रदाय का प्रचार करनेवाले आठ अनुयायियों) में से एक हुए। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों का आश्रय प्राप्त करने के लिए आये, वे अपने बहुत से संबंधियों को भी साथ लाये और वे सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्ही में एक उनके भ्राता कोयिल कन्दाडै अप्पन् थे जिन पर उस समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने कृपा की थी। उनकी तनियन से हम समझ सकते हैं कि वे पुर्णतः चरम पर्व निष्ठा (भागवतों और आचार्य की सेवा) में स्थित थे।

एरुम्बी अप्पा (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के अन्य शिष्य) अपने पूर्व दिनचर्या (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों की व्याख्या करते हुए एक दिव्य ग्रंथ) के श्लोक 4 में एक सुंदर द्रष्टांत बताते हैं।

पार्शवत: पाणीपद्माभ्याम परिगृह्य भवतप्रियऊ।
विनयस्यन्तं सनैर अंगरी मृदुलौ मेदिनितले।।

शब्दार्थ: एरुम्बी अप्पा, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से कहते हैं – “स्वामी के दोनों ओर, उनके दो प्रिय शिष्य (कोइल अण्णन और कोइल अप्पन) हैं और आप अपने कमल के समान कोमल हाथों से उन्हें द्रढ़ता से पकडे हुए, अपने कोमल चरणारविन्दों से धरती पर चल रहे हैं”।

-श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के दोनों और अण्णन और अप्पन (अप्पन स्वामी के निवास से प्राप्त चित्र, कांचीपुरम)श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के दोनों ओर अण्णन और अप्पन (अप्पन स्वामी के निवास से प्राप्त चित्र, कांचीपुरम)

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार, दिनचर्या स्त्रोत्र के अपने व्याख्यान में, दर्शाते हैं कि यहाँ दो प्रिय शिष्यों से अभिप्राय है “कोइल अण्णन और कोइल अप्पन”। यहाँ एक प्रश्न उठता है– क्या श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को त्रिदंड धारण नहीं करना चाहिए, जैसा कि पांचरात्र तत्वसार संहिता में कहा गया है कि ‘एक सन्यासी को सदा त्रिदंड धारण करना चाहिए’? अण्णावप्पंगार इसे भली प्रकार से समझाते हैं:

  • ऐसे सन्यासी के लिए जो सर्व सिद्ध है– उनके त्रिदंड धारण न करने में कोई दोष नहीं है।
  • एक सन्यासी जो निरंतर भगवान के ध्यान में रहता है, जिसका व्यवहार कुशल है और जिन्होंने अपने आचार्य से शास्त्रों का अर्थ भली प्रकार से गृहण किया है, जिसको भगवत विषय में जानकारी है और जिनका अपनी इन्द्रियों और सम्पूर्ण विश्व पर नियंत्रण है– ऐसे सन्यासी के लिए उनके त्रिदंड की आवश्यकता नहीं है।
  • भगवान को साष्टांग प्रणाम करते हुए, त्रिदंड साष्टांग में व्यवधान हो सकता है, इसलिए वे उस समय त्रिदंड साथ नहीं ले जाते।

इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अप्पन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

कोयिल कन्दाडै अप्पन् की तनियन:

वरद्गुरु चरणं वरवरमुनिवर्य गणकृपा पात्रं ।
प्रवरगुणा रत्न जलदिम् प्रणमामि श्रीनिवास गुरुवर्यम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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