Monthly Archives: August 2013

दिव्य दम्पति – श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि

:श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

सत सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा (गुरुपरम्परा) की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए , दास अब सम्प्रदाय के प्रथमाचार्य से अपने लेखनी शुरू कर रहा है। इन लेखो में सम्प्रदाय में समाश्रित सभी अनुयायियों की जानकारी के लिए सभी आचार्यो का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहा है।

ओराण्वळि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत सर्वप्रथम श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि ही आते है, दास का सामर्थ्य नहीं की इनके बारे में लिखे , फिर भी सम्प्रदायस्थ अनुयायियों के हितार्थ जो भी थोड़ी जानकारी है सो प्रेषित कर रहा हूँ।

हमारे आचार्यों ने दिव्यज्ञान का सार रहस्यत्रय के द्वारा बताया है । इसी दिव्यज्ञान के  अधिकारि हमारे पूर्वाचार्य ने बहुत विचार्पूर्वक , विवेकपूर्ण तरीके से इसका सार सम्प्रदाय के अनुयायियों के हितार्थ हमे दिया है ।

  • श्री पेरिय पेरुमाळ्

periya-perumaal

  • तिरुनक्षत्र – आवणि रोहिणि

ग्रन्थ सूचि – श्रीमद्-भगवद्-गीता, तनियन् (श्रीशैलेश दयापात्रम् ..)

हमारी ओरण गुरुपरम्परा  श्री पेरिय पेरुमाळ् से शुरू होति है । अकारण करुणावरुणालय भगवान् अपने निर्हेकुत कृपा से सर्वप्रथमाचार्य का पद स्वीकार करते है और रहस्यत्रय का सदुपदेश अपनी संगिनी , जिन्हे पेरुमाळ ने अपने वक्षस्थल पर बिराजे रखा है , पेरिय पिराट्टि को श्री वैकुण्ठ मे देते है ।एम्पेरुमान् यानि भगवान् सबके स्वामि है । वे पूरी तरह से स्वतन्त्र है । सारे जीव भगवान् पे निर्भर है और उन्के सेवक है । वे प्रथमाचार्य का स्वरूप अपनी  मर्ज़ि से स्वीकारते  है । वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्याप्त है । अपने कारुण्य स्वभाव से, वे मोक्ष की इच्छा रखने  वाले जीवों को मोक्ष प्रदान करते है ।

पेरिय पेरुमाळ् (भगवान रंगनाथ, जो स्वयं श्रीमन्नारायण ही है) अपने स्वधाम (श्री-वैकुण्ठ) से अपने श्रीरंगविमान् में ब्रह्मा जी के लोक मे पधारे जहाँ उन्की पूजा ब्रह्मा जी ने सत्यलोक मे की थी। ब्रह्माजी के आग्रह पर भगवान मूर्त रूप वहां रहकर ब्रह्माजी से सेवा स्वीकरते रहे,  उसके पश्चात वे इक्ष्वाकु वंश के राजा ने ब्रह्माजी से भगवान पेरिया पेरुमाळ के विग्रह को मांग कर अपनी नगरी अयोध्या लेकर आ गये , और भगवान पेरिया पेरुमाळ , रघुकुल के नृपों (यानि राजाओं) के कुल देवता के रूप में पूजे जाने लगे। लंका विजय के पश्चात , राज्याभिषेक के बाद , विभीषणजी ने इस विग्रह को राजा रामजी से मांगकर अपने राज्य लंका ले जाने लगे । पर पेरुमाळ की मंशा ही, कुछ और थी। श्री विभीषणजी लंका जाते वक्त माँ कावेरी में स्थित इस छोटे टापू पर रुके, और पेरुमाळ श्रीरंगम की मनोहर छटा देख , nवही पर दक्षिणाभिमुखी बिराज गए, इसी लिए कहते है – ” वंदिनम् उरलुम् चोलै, मयिलिनम् आळुम् चोलै, कोन्डल् मीदणवुम् चोलै, कुयिलिनम् कूवुम् चोलै “.

श्री पेरिय पेरुमाळ् तनियन् –

श्रीस्थानभरणं तेजः श्रीरंगेशमाश्रये ।
चिंतामणि मिवोत्वान्तं उत्संगे अनन्तभोगिनः ॥


 

श्री पेरिय पिराट्टि

periya-piraatti

तिरुनक्षत्र – पंगुनि , उत्रम्

एम्पेरुमान् द्व्यमहामन्त्र का उपदेश पेरिय पिराट्टि को वैकुण्ठ लोक  मे करते है । आचार्य के सद्गुणों का रूपावतार श्री पेरिय पिराट्टि है क्योंकि उन्में एक आचार्य के सद्लक्षणों का समावेश है । कहते है कि आचार्य में यह तीन गुण होने चाहिए १. जीवों के प्रति कृपा , करुणा होनि चाहिये, २. पारतन्त्रयम् (यानि भगवान पे पूर्ण निर्भर होना चाहिये),  और ३. अनन्यार्हत्वम् (भगवान के अधिकार मे रेहना चाहिये) । क्योंकि पेरिय पिराट्टि इन तीन गुणों कि अधिकारि है,  अतः हमारी ओरान्वाळि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत दूसरी आचार्य हुई । इसी का उदाहरण पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने अपने श्रीवचनभूषण मे पूरि तरह बताया है कि वे (यानि पेरिय पिराट्टि – सीता पिराट्टि के रूप मे) ये तीन गुण अपने तीन वियोग के द्वारा प्रकट करती है ।

पहला उदहारण – जब रावण सीता पिराट्टि को जबरदस्ती अपनी लंका ले गया , माता सीता पिराट्टी अपनी परमकृपा से इस कृत्य को होने देति है, कारण यहाँ आचार्य का यह कहना है श्री सीता पिराट्टि इस अखिल जगत कि माँ है तो इस प्रकार वे रावण कि भी माँ है , अगर माता इस कृत्य को नहीं होने देती तो देवस्त्रीयों (यानि देवताओं कि पत्नियाँ) का बचाव (उद्धार) नहि होता । अतः वे चुपचाप रावण के अपचारों को एक माँ होने के नाते सहती  रही।दूसरा उदहारण – श्री सीता पिराट्टी के लंका में रहने के कारण , श्री रामजी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था , तब मर्यादा पुरषोत्तम श्री रामजी ने श्री सीतापिराट्टि को गर्भावस्था में वनवास का आदेश देते है,  और श्री सीता पिराट्टी ने इस आदेश को स्वीकार भी किया , क्योंकि भगवान् श्री रामजी पर , इतनी निर्भर थी (पारतंत्र्य) , उनकी भावना थी , भगवान जो कुछ भी कहेंगे वे अपना मस्तिष्क् नमन करते हुएँ स्वीकार करती है ।

तीसरा उदहारण – वनवास और और राजा राम जी  परित्याग के बाद, जब श्री सीता पिराट्टी अपने स्वधाम पधारती है. यही साबित करता है कि वे भगवान कि ही है। (अनन्यार्हत्वम्)

तो इस प्रकार से पेरिय पिराट्टि में ये तीनो लक्षण पूर्णतया परिलक्षित  है , जो एक आचार्य से अपेक्षित है ।

पेरिय पिराट्टि तनियन –

नमः श्रिरंग नायक्यै यत् ब्रो विभ्रम भेततः ।
ईशेसितव्य वैशम्य निम्नोन्नतम् इथम् जगत् ॥

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श्री-गुरुपरम्परा-उपक्रमणि – 2

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

आपने पूर्व अनुच्छेद में, “श्री संप्रदाय” के प्रवर्तन सम्प्रदाय की गुरुपरम्परा का वर्णन परिमित मात्रा अर्थात सीमित मात्रा में किया था । उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए इस पर विस्तृत प्रकाश यहाँ पर प्रस्तुत कर रहे है ।

असंख्य कल्याण गुणों से परिपूर्ण एम्पेरुमान (श्रीमन्नारायण – श्रिय:पति अर्थात श्रीमहा-लक्ष्मीजी के पति) , श्री वैकुण्ठ में अपनी देवियो (पत्नियों श्रीदेवी, भूदेवी, नीळादेवी) के साथ सदैव बिराजमान हैं , जहाँ सदैव नित्य-सूरी (गरुडाळ्वार, विष्वक्सेनार, अनन्तशेष) इत्यादि भगवान की नित्य कैंकर्य में सलंग्न है। यद्यपि वैकुण्ठ में भगवान आनन्दित है, परंतु भगवान का हृदय जीवात्मा (बद्ध जीव जो भौतिक जगत के भव सागर मे डूबा हुआ है) का उध्दार कैसे हो,  इसी से विचलित रहता है। यहाँ तीन प्रकार के जीवों का वर्णन भगवद रामानुज स्वामीजी ने अपने श्री भाष्य में किया है – (1) नित्य सुरी (नित्यन्) – जो अनादिकाल से परमपद में भगवद्कैंकर्य में लीन है (अर्थात जो कभी भी इस भौतिक जगत में अपने कर्मानुसार नहीं आते) (2) मुक्तात्मा (मुक्तन्) – जो पहले इस भौतिक जगत में आये, भगवान श्रीमन्नारायण की शरणागति कर मुक्त जीव का पद पाकर ( ८४ लक्ष योनियों का आवागमन छोड़ ), भगवान श्रीमन्नारायण के कैंकर्य में परमपद में रहते है (3) बद्धात्मा (बद्धन्) – जो अनादिकाल से इस भौतिक जगत में है। ये सारे जीव भगवान के सेवक (यानि दासभूत) है और भगवान से पिता-पुत्र / शेष-शेषि भाव का सम्बन्ध रखते है। और इसी सम्बन्ध के नाते भगवान इस भौतिक जगत में फंसे जीवात्मों की सहायता करके उन्हें अपने नित्य धाम के प्रति आकर्षित करते है, जिससे वे परमपद पहुँचकर भगवद कैंकर्य में समील्लित हो सके ।

हमारे पूर्वाचार्यों ने बतलाया है कि सही ज्ञान से मोक्ष कि प्राप्ति होती है और यही ज्ञान हमारे पूर्वचार्यों ने रहस्यत्रय द्वारा समझाया है। और इस ज्ञान को प्रदान करनेवाले ही आचार्य कहलाये गये है। क्योंकि यह आचार्य स्थान इतना श्रेष्ठ है, स्वयं भगवान ने प्रथामाचार्य बनना स्वीकार किया। सम्प्रदाय का १. मूल मंत्र २. द्वय मन्त्र और ३. चरम मंत्र स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ने ही आचार्य स्वरुप में प्रदत्त किये है। इसी विषय में हमारे पुर्वाचार्य कहते है-

  • भगवान ने अपने नारायणऋषि अवतार में अपने शिष्य नारऋषि को अष्टाक्षरमहामंत्र का उपदेश दिया।
  • भगवान ने द्वयमहामंत्र का उपदेश अपनी सपत्नी पेरिय पिराट्टि को दिया।
  • भगवान ने चरमश्लोक का उपदेश अपने कृष्णावतार में अपने शिष्य अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया।

पेरिय पेरुमाळ और पेरिय पिराट्टि जो साक्षात् भू वैकुण्ठ तिरुवरंगम् (श्रीरंगम) में विराजे है, वे साक्षात भगवान श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी है। पेरिय पेरुमाळ से प्रारंभ, हमारे सत्सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा को ओराण्वळि गुरुपरम्परा कहते है ।

सबसे पहले हम “ओराण्वळि” का अर्थ समझेंगे । ओराण्वळि – दो शब्दों (ओराण् और वळि) के संयोग से बना है । ओराण्वळि याने यह एक द्रविड़ शब्द है, जिसका अर्थ है, एक ही मार्ग , एक ही ध्येय, एक ही पथ और ओराण्वळि गुरुपरम्परा का अर्थ है निरंतर चली आ रही आचार्य परम्परा में शुरू से  एक ही ध्येय,  एक ही मार्ग और एक ही पथ का प्रचार प्रसार करने वाली  आचार्य परम्परा.  इस दिव्यज्ञान का प्रचार प्रसार करने वाले आचार्य । जगन्माता पराम्बा माँ लक्ष्मीजी के बाद इस परम्परा के आचार्य पद को सुशोभित करने वाले आचार्य ही इस आचार्य परम्परा की गिनती में आते है जो अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) तक ही है

हमारी ओराण्वळि गुरुपरम्परा का क्रम कुछ इस प्रकार है –

  1. पेरिय पेरुमाळ (श्री रंगनाथ पेरुमाळ)
  2. पेरिय पिराट्टि (श्री रंगनाच्चियार्)
  3. सेनै मुदलिआर् (श्री विष्वक्सेनजी)
  4. नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामिजी)
  5. नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)
  6. उय्यक्कोन्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी)
  7. मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)
  8. आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)
  9. पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण  स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)
  10. एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी)
  11. एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)
  12. श्री पराशर भट्टर्
  13. नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)
  14. नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी)
  15. वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी)
  16. पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी)
  17. तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)
  18. अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी)

आळ्वार और कई सारे श्री वैष्णवाचार्य भी इस गुरुपरम्परा के अन्तर्गत आते है। आळ्वारों की विषय सूची कुछ इस प्रकार है

  1. पोइगै आळ्वार (श्री सरोयोगी स्वामीजी)
  2. भूदताळ्वा (श्रीभूतयोगी स्वामीजी)
  3. पेयाळ्वार (श्री महद्योगी स्वामीजी)
  4. तिरुमळिसै आळ्वार (श्री भक्तिसार स्वामीजी)
  5. मधुरकवि आळ्वार (श्री मधुरकवि स्वामीजी)
  6. नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामीजी)
  7. कुलशेखराळ्वार (श्री कुलशेखर स्वामीजी)
  8. पेरियाळ्वा(श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)
  9. आण्डाळ् (गोदाम्बजी)
  10. तोन्डरडिप्पोडि आळ्वा (श्री भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी)
  11. तिरुप्पाणाळ्वा (श्री योगिवाहन स्वामीजी)
  12. तिरुमंगै-आळ्वा (श्री परकाल स्वामीजी)

हमारे सम्प्रदाय के आचार्य, जो ओराण्वळि गुरु परम्परा के अन्तर्गत् नहीं है, उनके नामो की सूचि कुछ इस प्रकार से है (ध्यान देने की बात है यह सूचि मात्र यहाँ तक ही सिमित नहीं है) –

  1. शेल्व नम्बि
  2. कुरुगै कावलप्पन् (श्री कुरुकानाथ स्वामीजी)
  3. तिरुक्कण्णमन्गै आण्डान्
  4. तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी)
  5. तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी)
  6. पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्री शैलपूर्ण स्वामीजी)
  7. तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी)
  8. तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी)
  9. माऱनेरि नम्बि
  10. कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी)
  11. मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी)
  12. अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति)
  13. कोयिल् कोमाण्डूर् इळैयविल्लि आच्चान् (श्रीबालधन्वी गुरु)
  14. किडाम्बि आच्चान् (श्री प्रणतार्तिहर स्वामीजी)
  15. वडुग नम्बि (श्री आंध्रपूर्ण स्वामीजी)
  16. वन्गि पुरत्तु नम्बि
  17. सोमासियाण्डान् (श्री सोमयाजि स्वामीजी)
  18. पिळ्ळै उऱन्गाविल्लिदासर् (श्री धनुर्दास स्वामीजी)
  19. तिरुक्कुरुगैप्पिरान् पिळ्ळान्
  20. कूर नारायण जीयर्
  21. एन्गळाळ्वान् (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)
  22. अनन्ताळ्वान् (श्री अनन्ताचार्य स्वामीजी)
  23. तिरुवरन्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी)
  24. नडातुर् अम्माळ्
  25. वेद व्यास भट्टर्
  26. श्रुत प्रकाशिका भट्टर् (श्री सुदर्शनसूरि स्वामीजी)
  27. पेरियवाच्चान् पिळ्ळै
  28. ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् (श्री माधवाचार्य स्वामीजी) (यहाँ श्री कलिवैरीदास स्वामीजी के महा व्याख्यान ईदू का इतिहास भी सम्मिलित है)
  29. ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् (श्री पद्मनाभाचार्य स्वामीजी)
  30. नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी)
  31. नालूराच्चान् पिळ्ळै (श्री देवराजाचार्य स्वामीजी)
  32. नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर्
  33. पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्
  34. अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार्
  35. नायनाराच्चान्पिळ्ळै
  36. वादिकेसरी अऴगिय मणवाळ जीयर
  37. कूर कुलोत्तम दासर्
  38. विळान् चोलै पिल्लै
  39. श्री वेदान्ताचार्य स्वामीजी
  40. तिरुनारायणपुरत्तु आय् जनन्याचार्यर्

मणवाळ मामुनि (के समय / उनके बाद) जो महा श्रीवैष्णवाचार्य हुए है, जिनकी सूची कुछ इस प्रकार है-

  1. पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि)
  2. कोयिल् कन्दाडै अण्णन्
  3. प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्
  4. पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर्
  5. एऱुम्बि अप्पा
  6. अप्पिळ्ळै
  7. अप्पिळ्ळार्
  8. कोयिल् कन्दाडै अप्पन्
  9. श्री भूतपुरि आदि यतिराज जीयर्
  10. अप्पाच्चियारण्णा
  11. पिळ्ळै लोकम् जीयर्
  12. तिरुमळिसै अण्णावप्पन्गार्
  13. अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर्

अपने सत्-सम्प्रदाय के सदाचार्यों के जीवन के विषय में हम आगे के अनुच्छेदों मे चर्चा करेंगे|

– अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुजदासन्
– अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुजदासि

आधार: http://guruparamparai.wordpress.com/2012/08/17/introduction-contd/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्री-गुरुपरम्परा-उपक्रमणि – 1

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लक्ष्मीनाथ समारंभाम् नाथयामुन मध्यमाम् |
अस्मदाचार्य पर्यंताम् वन्दे गुरुपरंपराम् ||

भगवान श्रीमन्नारायण (श्रिय:पति) से प्रवर्तित (प्रारंभ) दिव्य परंपरा, जिसके मध्य में श्रीनाथमुनि स्वामीजी और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी है, से लेकर मेरे आचार्य पर्यंत, इस वैभवशाली गौरवशाली श्रीगुरुपरंपरा का मैं वंदन करता हूँ।” यह दिव्य श्लोक श्रीकूरत्ताळ्वान/ श्रीकुरेश स्वामीजी ने हमारी गुरुपरम्परा को गौरवान्वित करते हुये, संप्रदाय की महिमा मंडित करते हुए रचित किया है।

कुरेश स्वामीजी के अनुसार, “अस्मदाचार्य” का तात्पर्य भगवद् श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी से है, क्योंकि श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी, श्रीकुरेश स्वामीजी के आचार्य थे। किंतु साधारणतः पठन में पाठक के निज आचार्य का बोध होता है ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी/ मणवाळ मामुनि” अपनी “उपदेश-रत्नमाला”  रचना में बताते है कि नम्पेरुमाळ/ श्री रंगनाथ भगवान ने हमारे सत्-सम्प्रदाय को “एम्पेरुमानार् दर्शिनम्” के रूप में दर्शाया है। वह श्रीरामानुज स्वामीजी ही है, जिन्होंने अपने जीवन काल में इस सनातन-धर्म  के इस सत्-सम्प्रदाय को पुनः प्रतिष्ठित किये । उन्होंने अपने पूर्वाचार्यों और आळ्वार संतो (जैसे – श्रीनाथमुनि स्वामीजी, श्री यामुनाचार्य स्वामीजी/आळवन्दार, आळ्वारों) द्वारा प्रदत्त श्री-सूक्तियों का संदेश हम सभी के हितार्थ अत्यंत सरल रूप, सरल भाव  में प्रस्तुत किये है।

गुरु और आचार्य समानार्थक (पर्याय) शब्द है। गुरु अर्थात जो हमारे ज्ञान के अन्धकार को दूर करे। आचार्य अर्थात जिन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया है, और जो स्वयं अपने जीवन में उन शास्त्रों का अनुसरण करते है और दूसरों को (अपने शिष्यों को) अपने उत्कृष्ठ आचरण  से प्रेरित करते है। गुरुपरम्परा अर्थात अखन्डित आचार्य वंशावली। श्री-सम्प्रदाय की गुरू परम्परा, भगवान् श्रीमन्नारायण से प्रारंभ होती है जैसा की गुरु परम्परा के श्लोक में प्रस्तुत है। भगवान् श्रीमन्नारायण अपनी अकारण (निर्हेतुक) कृपा से, इस भौतिक जगत से बध्द जीवात्मा (अर्थात जीवों) का उद्धार करते है, जीवात्मा को शुध्द बुध्दि, और चिरस्थायि सुखदायक आनन्दमय जीवन (यानि परमपद में भगवद्-कैंकर्य) प्रदान करने की ज़िम्मेदारी स्वयं लेते है।

अतः भगवान श्रीमन्नारायण हमारे सत्सम्प्रदाय “श्री संप्रदाय” के प्रवर्तक आचार्य हुये , और शास्त्रों का अनमोल अर्थ बतलाया। शास्त्र कहते है – “तत्व ज्ञानंमोक्ष लाभः” अर्थात सही ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो भी सच्चा/ शुद्ध ज्ञान आज हमारे पास उपलब्ध है, वह हमें इसी अखन्डित आचार्य परम्परा द्वारा प्राप्त हुआ है। अतः निश्चित ही हम को अपने आचार्यों के बारे में जानने,  उनके जीवन की चर्या की चर्चा करें, उनके सदुपदेशों का अनुसरण कर अपने जीवन में उनका अनुसरण करें।

अतः हमारी दिव्य आचार्य परम्परा, जो 6000 पदी गुरुपरम्पराप्रभावम् (पिन्बाळ्गिय पेरुमाळ जीयर

द्वारा रचित), यतीन्द्रप्रणवप्रभावं और अन्य कई सारे ग्रन्थों में वर्णित है, वह दास द्वारा  अभिमान रहित प्रयासों से आप सभी भगवद्बन्धुओं के सम्मुख प्रस्तुत है।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुजदासन्
अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुजदासि

आधार – https://guruparamparai.wordpress.com/2012/08/16/introduction/

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