Monthly Archives: September 2013

श्री पोन्नडिक्काल जीयर

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमते वरवरमुनये नमः

श्रीमते वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे श्री अळगिय मणवाळ मामुनि के जीवन चरित्र की चर्चा की थी । आज हम आगे बढ़ते हुए श्री पोन्नडिक्काल जीयर के जीवन की चर्चा करेंगे जो अपने आचार्य मनवाल मामुनिगल के  प्राण सुकृत थे।

पोन्नडिक्काल जीयर – वानमामलै

पोन्नडिक्काल जीयर – तिरुवल्लिक्केनी

 

अवतार स्थल वानमामलै

आचार्य अळगिय मणवाळ मामुनि

शिष्य गण चोलसिंहपुरम्  महार्यर (दोड्डाचार्य), समरभुंगवाचार्य, शुद्द सत्त्वमण्णा, ज्ञानक्कण्णात्थान, रामानुजंपिळ्ळै, पळ्ळक्काल् सिध्दर, गोष्ठी पुरत्तैयर, अप्पाचियाराण्णा इत्यादि

स्थल जहाँ से वह परमपदम को प्रस्थान हुए वानमामलै

ग्रंथरचनासूची तिरुप्पावै स्वाभदेश व्याख्यान इत्यादि

पोन्नडिक्काल जीयर वानमामलै मे पैदा हुए और बचपन मे उनके मातापिता ने उनका नाम अळगिय वरदर रखा । वे बाद मे पोन्नडिक्काल जीयर के नाम से विख्यात / प्रसिध्द हुए । वह कई नामों से जाने गए थे जो कुछ इस प्रकार हैं वानमामलै जीयर्, वानाद्रि योगी, रामानुज जीयर्, रामानुज मुनि इत्यादि । वह श्री मणवाळ मामुनि के पेहले और महत्त्वपूर्ण शिष्य हुए ।

जब श्री मणवाळ मामुनि गृहस्थाश्रम मे भगवद्भागवतकैण्कर्य कर रहे थे तब पोन्नडिक्काल जीयर ने उनकी शरण ली और उनके शिष्य बने। उसी समय उन्होंने संयासाश्रम स्वीकार किये और श्री मणवालमामुनि के शेषकाल तक उनकी सेवा मे निमग्न हुए । पोन्नडिक्काल  का मतलब है वो जिसने ममुनिगल के शिष्य सम्पत की स्थापना की हो| उन्होंने पूरे भारत देश मे तोताद्रि मठों की स्थपना की और सत्साम्प्रदाय का प्रचार किया।

एक बार जब श्री मणवालमामुनि तिरुमलै यात्रा के लिये पहले बार जा रहे थे, उस समय पेरियप्पन्जीयर अपने स्वप्न में देखते हैं कि एक गृहस्थ व्यक्ति शय्यासन अवस्था मे हैं (यानि सो रहे हैं ) और उनके चरणकमलों के पास एक सन्यासी स्वामी उनकी सेवा कर रहे हैं। उसके पश्चात पेरियप्पन्जीयर आसपास के लोगों से पूछते हैं कि ये दोनो कौंन हैं और लोग कहते हैं कि एक व्यक्ति -“ईत्तु पेरुक्कर अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार” हैं और दूसरें पोन्नडिक्काळ जीयर हैं (जिनको स्वयम नायनार ने यह नाम दिया)

कहते हैं कि पोन्नडिक्काल जीयर के उत्कृष्ठ स्वभाव से सारे आचार्य उन्हें मणवाळमामुनि का उपागम (पुरुषाकार) समझते हैं और उन्ही के उपागम्यता से वे सारे, मणवाळमामुनि को पहुँच पाते थे । यतीन्द्रप्रभावम मे कहा गया है कि पोन्नडिक्काल जीयर की बदौलत बहुत सारे श्रीवैष्णव बने और उन सबको मामुनि का सम्भन्ध देकर उन सभी को भगवद्भागवतकैंकर्य मे संलग्न किये ।

जब कन्दादै और उनके रिश्तेदार मणवाळमामुनि के शिष्य बने तब श्री मणवाळमामुनि ने कहा कि पोन्नडिक्काल जीयर उनके प्राणों के सुहृत हैं और उन्हें वह सारा यश/कीर्ती इत्यादि प्राप्त होना चाहिए जो उनको स्वयम (श्रीमणवाळमामुनि) प्राप्त हुई । एक बार जब अप्पाचियाराण्णा, मामुनि को आचार्य के रूप मे स्वीकार कर उनके पास उनके शिष्य बनने की इच्छा से जाते हैं तब श्रीमामुनि, पोन्नडिक्काल जीयर को अपने आसन मे विराजमान करते हैं और उनके हाथ मे उनका शंख और चक्र सौंपकर उन्हें आदेश देते हैं कि अप्पाचियाराण्णा और कई सारे भक्तों का समाश्रयनम वह करें । हालांकि वे संकोच करते हैं कि वे इस कार्य को स्वीकार करें या ना करें परंतु उनके आचार्य (श्रीमणवाळमामुनि) के दृढ निश्चय को देखकर सभी भक्तों को अपने शिष्य के रूप मे स्वीकर करते हैं।

इसके पश्चात श्री मणवाळमामुनि आठ दिग्गज पोन्नडिक्काळजीयर के लिये नियुक्त करते हैं जो इस प्रकार हैं– – चोलसिंहपुरम्महार्यर (दोड्डाचार्य), समरभुंगवाचार्य, शुद्द सत्त्वमण्णा, ज्ञानक्कण्णात्थान, रामानुजंपिळ्ळै, पळ्ळक्काल् सिध्दर, गोष्ठी पुरत्तैयर, अप्पाचियाराण्णा |

जब अप्पाचियारण्णा को श्रीमणवाळमामुनि श्रीरंगम छोडकर कांचिपुरम जाने का आदेश देते हैं तब वे निराश हो जाते हैं। उस समय उनकी दुर्दशा देखकर श्रीमणवाळमामुनि कहते हैं कि उनका (श्रीमणवाळमामुनि का) रामनुजम् (तीर्थ सोम्बु लोटा) ले जाए (जिसकी पूजा पोन्नडिक्काल जीयर करते थे) और उसके धातु से श्रीमणवाळमामुनि की दो मूर्तियां बनाये एक अपने पास रखें और दूसरा अपने आचार्य (पोन्नडिक्काल जीयर) को दे । तो इस प्रकार अप्पाचियारण्णा श्रीमणवाळमामुनि की मूर्ती लेकर कांचिपुरम चले गए ।

उसके पश्चात दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) श्री मणवाळमामुनि को श्री सेनैमुदलियार के द्वारा एक संदेश भेजते हैं जिसमे कहते हैं कि वानामामलै दिव्यदेश मे पोन्नडिक्काल जीयर की सेवा ज़रूरत है । उसके अनन्तर मणवाळमामुनि उन्हें आदेश देते हैं कि वे तुरन्त वानमामलै जाए और वहाँ अपना कैंकर्य करें । इसी दौरान श्री मणवाळमामुनि अपने शिष्यों को आदेश देते हैं कि वे सारे चार हज़ार पासुरों का पाठ सौ पासुरों के क्रम मे हर रोज़ करें । पेरियतिरुमोळि के सात्तुमुरै के दौरान जब अणियार् पोळिल् सूळ् अरन्गनगरप्पाका पाठ हुआ तब भगवान बहुत खुश हुए और उन्होनें एक अरन्गनगरप्पा (लक्ष्मी नारायण) की मूर्ती अपने संनिधि से पोन्नडिक्कालजीयर को प्रसाद के रूप मे दिया और कहे कि वह इसे वानामामलै ले जाए । कुछ इस प्रकार खुशि खुशि पेरियपेरुमाळ भगवान पोन्नडिक्कालजीयर को विशेष प्रसाद और शठकोप देकर उनकी बिदाई बहुत धूम धाम से करते हैं। इसके बाद मामुनि पोन्नडिक्कालजीयर को अपने मठ ले जाकर उनका तदियाराधन धूम धाम से करते हैं और उनकी बिदाई करते हैं ।

फिर पोन्नडिक्कालजीयर वानमामलै मे रेहकर बहुत सारे कैंकर्यों मे संलग्न होते हैं । उसी दौरान वह आस पास के दिव्यदेशों (जैसे नवतिरुपति , तिरुक्कुरुन्गुडि) इत्यादि और बद्रीकाश्रम जैसे यात्रा दिव्यदेशों मे अपनी सेवा बर्करार रखते हैं । उसी दौरान उनके अनेक शिष्य हुए और उन सबको प्रवचन देकर वह आदेश देते हैं कि वह सारे अपनी अपनी सेवा उन दिव्यदेशों मे करते रहें ।

पोन्नडिक्काल जीयर एक लम्बी उत्तर दिशा की यात्रा के लिये निकल पडे । उसी दौरान श्री मणवाळमामुनि अपनी लीला इस भौतिक जगत मे समाप्त कर परमपदम को प्रस्थान हुए । जब पोन्नडिक्काल जीयर अपनी यात्रा समाप्त करके तिरुमलै पहुँचते हैं तभी उन्हें पता चलता है कि उनके आचार्य परमपदम को प्रस्थान हुए और यह सुनकर बहुत दुःखित हो जाते हैं और उसी दुःखद अवस्था मे कुछ और दिनों के लिये रुख गए ।

पोन्नडिक्काल जीयर अपने इकट्ठित धन राशि (यात्रा के दौरन हासिल) श्रीरंगम को आते हैं और अपने आचार्य के पोते (जीयर्नायनार) और कई सारे श्रीवैष्णवों से मिलकर अपने आचर्य को खोने का दुःख बाँटते हैं । उस समय श्रीमणवालमामुनि के निर्देशानुसार , श्रीमणवालमामुनि का उपडण्दम् (डण्दा), अंगूठी (तिरुवाळिमोदिरम्), पादुकाएं श्रीपोन्नडिक्कालजीयर को सौंपते हैं। कहा जाता है कि आज भी उपडण्द वानमामलैजीयरों के डण्दों के साथ बांधा जाता है और विशेष दिनों मे श्रीमणवालमामुनि की अंगूठी पहनते हैं । अतः कुछ इस प्रकार वह वानमामलै वापस आकर अपना कैंकर्य निभाते हैं।

उस समय वानमामलै मे श्रीवरमंगैनाचियार का उत्सव विग्रह नही था और उसी से परेशान थे पोन्नडिक्काल जीयर । एक बार भगवान (दैवनायकन) उनके स्वप्न मे आकर कहते हैं कि वे तिरुमलै से नाचियार का उत्सव विग्रह लाना चाहिए। भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु वे तिरुमलै जाते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें स्वप्न मे श्री नाचियार कहती है कि उन्हें वानमामलै तुरन्त ले जाए और उन्की शादी दैवपेरुमाळ से करवाई जाए । इसी दौरान तिरुमलै के जीयर्स्वामि के स्वप्न मे श्री नाचियार आती है और उन्हें भी यही उपदेश देती है । यह जानकर दोनों जीयर उनके आदेश को स्वीकर करते हैं और धूम धाम से नाचियार की बिदाई करवाते हैं । पोन्नडिक्काल जीयर श्री नाचियार को वानमामलै लाकर उनकी दैवनायकन पेरुमाळ भगवान से शादी धूम धाम अत्यन्त वैभव से करवाते हैं। पोन्नडिक्काल जीयर नाचियार के पिता स्वरूप बनकर उन्का कन्यादान दैवनायकन पेरुमाळ भगवान को करते हैं। दैवनायनक पेरुमाल कहते हैं कि जैसे भगवान् पेरियपेरुमाळ के ससुरजी पेरिआळ्वार हुए वैसे ही पोन्नडिक्काल जीयर उनके ससुरजी हुए और आज भी यह रीती रिवाज़ बहुत गर्व और सम्मान से किया जाता है और यही वानमामलै दिव्यदेश मे अनुसरण होता है ।

शिष्यों को कई सालों तक अपने महत्वपूर्ण निर्देशों की सूचना व्यक्त करने के पश्चात वह अपने आचार्य का ध्यान करते हुए अपने शरीर (चरम तिरुमेणि) का त्याग करते हैं और इस प्रकार उनको परमपदम की प्राप्ति होती है । वह अपने अगले उत्तराधिकारि (अगले जीयर वानमामलै मठ) को नियुक्त करते हैं और यह आचार्य परंपरा आज भी ज़ारी है ।

चलिये अब हम श्री पोन्नडिक्कालजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों में उनके जैसा आसक्ति, हमारे वर्तमानाऽचार्य पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) में हो ।

पोन्नडिक्कालजीयर का तनियन् (दोड्दाचार्य विरचित) –
रम्यजामात्रुयोगीन्द्रपादरेखामयम्सदा । तथा यत्तात्मसत्तादिम् रामानुजमुनिम् भजे ॥

दोड्दाचार्य ने पोन्नडिक्कालजीयर के महत्व/ श्रेष्ठता को संस्कृत श्लोकों से विरचित निम्नलिखित स्तोत्रों मे किया है जिसका भावार्थ अब हम सरल हिंदी में जानेंगे|

वानमामलै जीयर मंगलाशाशन

  1. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीय़र के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो श्री मणवाळमामुनि के कृपायुक्त हैं, जो स्वयम करुनासागर हैं, जो दिव्यहृदयी हैं, जिन्मे जन्म से ही दिव्यमंगल लक्षण है और जो स्वयमरूप से अळगीय वरदर हैं। 
  2. मेरी आराधना सिर्फ़ और सिर्फ़ श्री रामानुजजीयर के लिये है क्योंकि वह जीयर स्वामियों के और हमारे सांप्रदाय के अभिनेता हैं , और श्रीमणवाळमामुनि के कृपा से सारे सद्गुणों का समावेश हैं । 
  3. मैं ऐसे श्री ऱामानुज जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो स्वयम श्री मामुनि के चरणकमलों में मधुमक्खि के तरह हैं और जो पूर्ण चन्द्रमा की तरह मेरे मन को हर्षित करते हैं । 
  4. मैं ऐसे श्री रामानुज जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो वात्सल्य, शील / चरित्र और ज्ञान जैसे सद्गुणो के सागर हैं और जिनको श्री मणवाळमामुनि जीवन देने वाले सांस की तरह मानते हैं। 
  5. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होने ब्रह्मचर्य से सीधे संयास लिये और गृहस्थाश्रं और वानप्रस्थाश्रं को शर्मिन्दगि का एहसास दिलाये ।
  6. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो प्रथम हैं जिन्हे श्री मामुनिगल् के कृपा और आशीर्वाद की सम्प्राप्ति हुई और जो अपने कृपा से काम अथवा क्रोध जैसे कई दोशो से हमे विमुक्ति दिलाते हैं।
  7. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो स्वयम अनन्त सद्गुणो के धारक हैं और जो भौतिक संसार के इच्छावों और अनिच्छवों से विमुक्त हैं और जो स्वयम अरविन्द दलयताक्ष हैं।
  8. मैं ऐसे रामानुज जीयर को देखकर बहुत आनंद महसूस करता हूँ क्योंकि वैराग्य की लता जो हनुमान में सबसे पहले विकसित हुआ , वही भीष्म पितामह में और भी विकसित होकर बढ़ा और पूर्ण तरह श्री रामानुज जीयर मे विकसित होकर प्रफुल्लित हुआ । 
  9. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके उभयवेदान्त उपंयास से बड़े अच्छे विदवानों आकर्शित होते हैं, जिनका स्वभाव और अनुशीलन सर्वोत्कृष्ट है और वही अनुशीलन संयासि करते हैं, जो दोष रहित हैं, जो संपूर्ण ज्ञान और सद्गुणो से भरपूर हैं और जिन्होने श्रीमणवालमामुनि के चरणकमलों का आश्रय लिया है । 
  10. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके उपंयास मे पशुपक्षि घोषणा करते हैं कि श्रीमन्नारायण प्रधान (सर्वोच्च) है और अन्य देवता उनकी शेषी है । 
  11. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके नयन कटाक्ष से अर्थपञ्च के ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिन्होने कई सारे कैंकर्य (सेवा) वानमामलै दिव्यदेश मे किया और जो शिष्यों के लिये एक कल्पवृक्ष थे । 
  12. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होने अपने शुध्द दिव्य कृपा से मुझे भगवद्भागवत कैंकर्य मे संलग्न किया (यानि परिवर्तन/सुधार किया जो इस भौतिक जगत के आनंद मे संलग्न था और जिसे श्रीवैष्णवों के प्रति कदाचित रूची नही थी) । 
  13. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो ज्ञान के भण्डार हैं , जिनकी वजह से वैराग्य शान्ति पूर्वक विश्राम ले रहा है , जो एक कीमती खज़ाना के पेटी की तरह हैं और जो सत्साम्प्रदाय के अगले उत्ताराधिकारि (जिसे श्री एम्पेरुमानार ने खुद स्थापित किया) के काबिल और सक्षम हैं । 
  14. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनमे श्रीमामुनि की कृपा का समावेश है , जो सद्गुणों के भण्डार हैं और दैवनायकन एम्पेरुमान के प्रति जिन्हे असीमित लगाव है। 

वानमामलै जीयर प्रपत्ति

1) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो एक खिले हुए फूल की तरह सुंदर हैं , जिन्हें देखर नयनानंद की प्रप्ति होती है , जो हमे इस भवसागर के जाल से बचा सकते हैं।

2) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें यश और कीर्ती श्री मणवाळमामुनि के दिव्यानुग्रह से प्राप्त की , जो हमारे कमियों को नष्ट करने मे सक्षम हैं, जो शिष्यों के लिये एक कल्पवृक्ष हैं और जो सद्गुणों के सागर हैं।

3) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें श्री मणवाळमामुनि के चरणकमलों का आश्रय लिया है और वह किसी भी कारण गृहस्थाश्रम मे नहीं पड़े क्योंकि गृहस्थाश्रम इस भौतिक जगत के भवसागर मे उन्हें बाँन्ध देगा ।

4) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनमे विरक्तिभावलता (जो हनूमान से शुरू हुई थी) परिपूर्ण होकर उन्में परिव्याप्त हुई ।

5) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें अपने आचार्य की सेवा मे बहुत सारे मण्डपों का निर्माण और उनका अभिनेतृत्व वानमामलै मे किया जैसे आदिशेष भगवान के लिये करते हैं।

6) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें नम्माळ्वार के दिव्य पासुरों का गहरावेदान्तार्थ बहुत ही सरल भाषा मे प्रस्तुत किया ।

7) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका नाम इस भौतिक जगत के भवसागर सर्प को विनाश कर सकता है और बध्दजीवात्मावों को भगवान के समान उत्थापन होता है ।

8) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो हमे हमारे अंगिनत जन्मों मे किये गये पापों/दुष्कर्मो से विमुक्त करने मे सक्षम हैं, और जिन चरणों को साधुजन सदैव पूजा करते हैं।

9) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका श्री पादतीर्थ (चरणामृत) किसी को भी शुध्द कर सकती है और तापत्रय की ज्वाला को पूर्ण तरह से नष्ट करती है ।

10) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो शुध्द और सद्गुणों के सागर हैं और जिनका आश्रय श्री अप्पाचियाराण्णा ने लिया था |

11) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो शुध्द और सद्गुणों की चोटी हैंऔर जिनका आश्रय समरभुन्गवाचार्यर ने लिया था और उनके चरण साधुजन सदैव पूजा करते हैं।

12 ) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका वैराग्य हनुमान , भीष्म पितामह इत्यादि से सर्वाधिक है , उनकी भक्ति ओराण्वळिआचार्यों के बराबर है , उनका ज्ञान श्रीनाथमुनि, यामुनमुनि के बराबर है और ऐसी तुलना मे कौन वानमामलै जीयर से सर्वोत्तम हो सकता है ।

13) उन्होनें श्रीदैवनायकन एम्पेरुमान की सेवा आदिशेष की तरह किया । उन्होनें भगवान के भक्तों का गुणगान कुळशेखराळ्वार की तरह किया । उन्होनें अपने आचार्य श्री मणवाळमामुनि कि पूजा किया जैसे श्री मधुरकविआळ्वार ने श्री नम्माळ्वार कि पूजा किया था। वे पूर्वाचार्यों के पदचाप के राह मे चले और सद्गुणों के धारक हुए |

14) बहुत पहले श्री एम्पेरुमान ने नरनारायण का अवतार लिया था अब वही एम्पेरुमान श्री मणवाळमामुनि और वानमामलै जीयर के रूप मे प्रकट हुए । कुछ इस प्रकार श्री वानमामलै जीयर का कीर्ती / यश था ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन् और अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुज दासि

अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

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पेरियनम्बि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत नवें आचार्य श्री आळवन्दार (यामुनाचार्य) के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत दसवें आचार्य (पेरियनम्बि) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

तिरुनक्षत्र : मार्गशीश मास (corrected – मार्गसीर्ष् ), ज्येष्ठ नक्षत्र

अवतार स्थल : श्रीरंगम

शिष्य गण : श्रीरामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार) , मलैकुनियनिन्रार , आरियुरिल् श्री शठगोप दासर , अणियैरंगतमनुदानार पिळ्ळै , तिरुवैक्कुलमुदैयार भट्टर इत्यादि

स्थल जहाँ से परपदम को प्रस्थान हुएँ  : चोल देश के पशियतु (पशुपति) देवालय मे

श्री पेरियनम्बि श्रीरंगम मे पैदा हुएँ और वह महापूर्ण , परांकुश दास , पूर्णाचार्य के नामों से जाने गए है । वह आळवन्दार के मुख्य शिष्यों मे से एक है और श्री रामानुजाचार्य को श्रीरंगम लाने का उपकार उन्ही को है । आळवन्दार के समय के बाद , सारे श्रीरंगम के श्रीवैष्णव पेरियनम्बि से विनती करते है की वह श्रीरामानुजाचार्य को श्रीरंगम मे लाये । अतः वह श्रीरंगम (added से ) अपने सपरिवार के साथ कांचीपुरम की ओर चले । इसी दौरान श्रीरामानुजाचार्य भी श्रीरंगम की ओर निकल पडे । आश्चर्य की बात यह थी की वे दोनो मधुरांतकम मे मिलते है और तभी पेरियनम्बि श्रीरामानुजाचार्य का पंञ्चसंस्कार करते है और कांचीपुरम पहुँचकर श्रीरामानुजचार्य को सांप्रदाय के अर्थ बतलाते है । इसी बींच रामानुजाचार्य की धर्मपत्नी पेरियनम्बि (जिनका कुल नीचा था) के प्रती असद्भावना होने की वजह से पेरियनम्बि दुखित होकर अपने परिवार के साथ श्रीरंगम वापस चले गए । इस विषय को हम श्रीरामानुजाचार्य के अद्भुत चरित्र मे जानेंगे ।

हमारे पूर्वाचार्यों ने पेरियनम्बि के जीवन की ऐसे वार्दात अपने श्रीसूक्तियों मे दर्ज किया है वह अब आपके लिये प्रस्तुत है

कहते है की पेरियनम्बि सद्गुणों के भण्डार है और रामानुजाचार्य के प्रती असीमित लगाव था । जब उन्की बेटी को अलौकिक सहायता की जरूरत थी तब इसके हल के लिये अपनी बेटी को रामानुजाचार्य के पास जाने का उपदेश देते है।

एक बार श्रीरामानुजाचार्य अपने शिष्यगण के साथ चल रहे थे तब अचानक पेरियनम्बि उनको दण्दवत[corrected-दण्डवत] प्रणाम करते है । तब श्रीरामानुजाचार्य इस क्रिया का स्वीकार / समर्थन नही करते क्योंकि किसी भी शिष्य को अपने आचार्य का प्रणाम स्वीकार नही करना चाहिये । इस क्रिया से सभी शिष्य आश्चर्यचकित होते देखर   श्रीरामानुजाचार्य अपने आचार्य से पूछते है उन्होने ऐसा क्यों किया तब श्रीपेरियनम्बि केहते है की रामानुजाचार्य मे वह अपने आचार्य श्री यामुनाचार्य को देखते है इसीलिये उन्होने दण्दवत प्रणाम किया | वार्ता माला में एक विशेष वचन सूचित करती हैं की आचार्य को अपने शिष्य के प्रति बहुत सम्मान होना चाहिए और पेरियनम्बि उस वचन के अनुसार रहे हैं ।

पेरियनम्बि मारनेरीनम्बि (जो शूद्र होने के बावजूद यामुनाचार्य के शिष्य हुए और फिर एक महान श्रीवैष्णव बने) का अन्तिमसंस्कार करते है जब वह परपदम को प्रस्थान हुए । इस क्रिया का समर्थन अधिक्तर श्रीवैष्णव नही करते और वे श्रीरामानुजाचार्य को इस घटना के बारें मे बताते है । यह जानकर जब श्रीरामानुजाचार्य पेरियनम्बि से पूछते है तब पेरियनम्बि कहते है की उन्होने सीधा आळ्वार के श्रीसूक्तियों ( तिरुवाय्मोळि – पयिलुम् चुडरोळि (3.7) और नेडुमार्क्कडिमै (8.10) ) का पालन किया और यही वार्दात श्री अळगिय मनवाळ पेरुमाळ्नायणार अपने आचार्य हृदय मे कहते है और यह हमारे गुरुपरंपराप्रभावम् मे भी है ।

एक बार पेरियपेरुमाळ को कुछ कुकर्मियों से खतरा था यह जनकारी प्राप्त कर श्रीवैष्णव निश्चय करते है की पेरियनम्बि ही सही व्यक्ति है जो देवालय की प्रदक्षिणा कर सकते है । तब वह श्री कूरत्ताळ्वार को अपने साथ प्रदक्षिणा करने को बुलाते है क्योंकि कूरत्ताळ्वार ऐसे एक मात्र भक्त थे जिन्होने परतन्त्रता का दिव्यस्वरूपज्ञान मालूम था [यही विषय नम्पिळ्ळै अपने तिरुवाय्मोलि (७ .१० .५ ) ईडु व्याख्यान में बताते हैं ।

इसके पश्चात , एक बार शैव राजा ने श्रीरामानुजाचार्य को अपने दर्बार मे आमंत्रित किया जिससे समाधान मे श्री कूरत्ताळ्वार (श्रीरामानुजाचार्य के भेष मे) और बूढे श्री पेरियनम्बि उनके साथ गए । यह शैव राजा को श्रीरामानुजाचार्य के प्रती सद्भावना नही होने के कारण अपने अनुचरों को आज्ञा देते है की श्रीरामानुजाचार्य के आँखें नोच लें तब श्री पेरियनम्बि राज़ी होकर अपने आपको समर्पित करते है और उनकी आँखें नोच ली जाती है । अपने वृध्द अवस्था मे होने के कारण श्री पेरियनम्बि परमपदम को प्रस्थान करते है । कहते है की उनके अन्तिम काल के इस वार्दात से एक सीख मिलती है ।
श्री कूरत्ताळ्वान और पेरियनम्बि कि बेटी (अतुळाय) कहते है की जैसे भी हो आप अपने प्राणों को ना त्यागें क्योंकि श्रीरंगम ज्यादा दूर नही है यानि वह अपने प्राण तभी त्यागें जब वह श्रीरंगम पहुँचे । यह सुनकर श्री पेरियनम्बि तुरन्त रुकने को कहते है और फिर कहते है अगर इस वार्दात को लोग कुछ इस प्रकार समझेंगे की अपने प्राणों का त्याग श्रीरंगम मे करना जरूरी है तब वह एक श्रीवैष्णव के वैभव को सीमित करने के बराबर है और यह कदाचित भी नही होना चाहिये । अतः वह वही अपने प्राणों को त्यागते है ।

आळ्वार कहते है – “वैकुण्थमागुम् तम् ऊरेल्लाम्” – यानि जहाँ श्रीवैष्णव रेहते है वही वैकुण्थ हो जाता है । अतः हमारे लिये यह जरूरी है की हम जहाँ भी हो भगवान पर पूर्णनिर्भर रहे क्योंकि ऐसे कुछ लोग जो दिव्यदेशों  मे रेहने के बावज़ूद नही समझते की उनपे भगवान की असीम कृपा और प्रशंशनीय आशीर्वाद है और इसके व्यतिरेक मे ऐसे श्रीवैष्णव है जो सदैव भगवद्चिंतन मे रहते है (जैसे – चाण्डिलि और गरुड की घटना) ।

अतः हम देख सकते है की श्री पेरियनम्बि कितने उत्कृष्ट श्रीवैष्णव थे और वह भगवान पर पूरि तरह निर्भर थे । तिरुवाय्मोळि और नम्माळ्वार के प्रती असीमित लगाव के कारण उन्हे परांकुश दास के नाम से जाना जाता है । उनके तनियन से हमे यह पता चलता है की वह भगवान श्रियपती के कल्याणगुणों मे इतने निमग्न थे की वह इस दिव्यानुभव से सुखी और संतुष्ठ थे ।

पेरियनम्बि का तनियन

कमलापति कल्याण गुणामृत निषेवया
पूर्ण कामाय सततम् पूर्णाय महते नमः ॥

अगले अनुच्छेद मे हम श्री रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार) के वैभव की चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्
अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुज दासि

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आळवन्दार

:श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

ओराण्वळि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत सातवे आचार्य श्री मणक्काल्नम्बि  के संक्षिप्त जानकारी के बाद अब हम , अपनी गुरु परम्परा में आगे बढ़ते हुए, ओराण्वळि गुरु परम्परा के अन्तर्गत आठवे आचार्य श्री आळवन्दार स्वामीजी के बारें जानते है |

तिरुनक्षत्र :  दक्षिणात्य आषाढ मास का उत्तराषाढा नक्षत्र

अवतार स्थल : काट्टुमन्नार् कोविल,

आचार्य : मणक्काल नम्बि

शिष्यगण : पेरिय नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) , पेरिय तिरुमलैनम्बि  (श्री शैलपूर्ण स्वामीजी),  तिरुकोष्टियूर् नम्बि  (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी)  , तिरुमालै आण्डान्  (मालाधार स्वामीजी),  दैववारि आण्डान् , वानमामलै आण्डान्, ईश्वर् आण्डान्, जीयर् आण्डान्, आळवन्दार आळ्वान् , तिरुमोगूर् अप्पन्, तिरुमोगूर् निन्रार्,  देवापेरुमाळ्, मारानेरीनम्बि, तिरुकच्चिनम्बि (कांचीपूर्ण स्वामीजी) , तिरुवरंग पेरुमाळ् अरयर्,  (मणक्काल नम्बि के शिष्य और आळवन्दार् के पुत्र) , तिरुकुरुगूर दासर्, वकुलाभरण सोमयाजियार्, अम्मंगि , आळ्कोण्दि , गोविन्द दासर्  (जिनका जन्म मदुराई में हुआ), नाथमुनि दासर् (राजा के पुरोहित), तिरुवरंगतम्मान् (महारानी)

ग्रन्थ :  चतुश्लोकी , स्तोत्र रत्न , सिद्धि त्रयं,  आगम प्रमान्यम और गीतार्थ संग्रह

इनका परमपद तिरुवरंगम में हुआ।

यमुनैतुरैवर् (यामुनाचार्य) का जन्म नाथमुनि के पुत्र ईश्वरमुनी के यहाँ दक्षिणात्य आषाढ़ माह के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में काट्टुमन्नार् कोविल, वीर नरायणपुराम , वर्तमान मन्नारगुडी गांव में हुआ । इन्हें पेरिय मुदलियार्, परमाचार्य, सिम्हेन्द्रर् इत्यादि नामों से  भी जाना जाता हैं लेकिन अन्ततः आळवन्दार् के नाम से प्रसिद्धि हुये ।

श्री आळवन्दार ने अपना विद्याध्यन, अपनी प्रारंभिक शिक्षा श्रीमहाभाष्यभट्टर से प्राप्त किये थे ।

यामुनाचार्यजी के जीवन की कुछ प्रसिद्द घटनाये इस तरह है ,

उस समय के राजा ( कुछ जगह चोलवंश का उल्लेख है तो कुछ जगह पंड्या राजवंश को, पर इतिहास उस समय चोल राजवंश की चर्चा करता है) . उस समय काल में राजदरबार के विद्वान पंडित, राज पुरोहित अक्किआळ्वान थे। उनका स्वाभाव थे उनसे शास्त्रार्थ में जो हार जाता था उसे से मनमाना लगान वसूल करते थे. अपने इसी स्वाभाव वश वह राज्य के सारे पंडितों को लगान  देने का आदेश दे देते है. इसे सुनकर महाभाष्य भट्टर् चिन्तित हो जाते हैं। उनकी चिंता देख यमुनैतुरैवर् उन्हें आश्वासन देते हैं कि वह किसी भी तरह से उन परिस्थितियों का सामना करेंगे। यामुनाचार्यजी की अवस्था उस समय लगभग १२ वर्ष थी, इस राजादेष के प्रति उत्तर (समाधान)  में उन्हें एक श्लोक भेजते  हैं,  जिसमे वह स्पष्ट रूप से कहते है, वह उन सब कवियों का जो अपना स्वप्रचार कर अन्य विद्वानों पर अत्याचार करते है , उनका नाश करेंगे । राजा यमुनैतुरैवर को राजदरबार में हाज़िर होने का आदेश अपने सिपाहियों के हाथ भिजवाते है | यमुनैतुरैवर् उन्हें (सिपाहियों को) तिरस्कार कर कहते हैं, उन्हें बुलाने के लिए उचित सम्मान और गौरव से बुलावा भेजेंगे तो दरबार में उपस्थित होंगे। यह सुनकर राजा यमुनैतुरैवर् को ससम्मान पालकी भेजकर दरबार में बुलवाते है। यमुनैतुरैवर् उसमे आसित हुए राजा के दरबार पहुँचते हैं।

राजदरबार में यमुनैतुरैवर्  के तेज और ओज को देख, महारानी राजा से कहती है की, उसे विश्वास है  की , यह ओजस्वी बालक ही शास्त्रार्थ में विजयी होगा, और शर्त लगाती है की अगर बालक हार गया तो वह महल में दासी की तरह रहेगी, इस पर राजा महारानी को वचन देता है की, अक्किआळ्वान हार जायेगा तो बालक को आधा राज्य दे देंगे.

अक्किआळ्वान अपने शास्त्रार्थ मे निपुणता और हुनर के आधार पर गर्वित होकर यमुनैतुरैवर से कहते है की वह इस शास्त्रार्थ में उनके प्रश्नो को सकारात्मक समाधान करेंगे, यह सुन यमुनैतुरैवर । यह सुन यमुनैतुरैवर तीन प्रश्न पूछते है. जो इस प्रकार है –

पहला – आप ( अक्की आलवान ) के माताजी बंध्या (बाँझ ) स्त्री नहीं है।

दूसरा – हमारे राजा धार्मिक पुण्यवान है, हमारे राजा समर्थ (काबिल/योग्य/सक्षम) है।

तीसरा – राजा की पत्नी (महारानी) पतिव्रता स्त्री है।

यह प्रश्न कर यमुनैतुरैवर ने कहा अब इन तीनो का खण्डन अपने शास्त्रार्थ के नैपुण्य से करिये ।

यह तीन प्रश्न सुनकर अक्किआळ्वान दंग रह गए । वह एक भी प्रश्न का खण्डन नही कर पाए क्योंकि, इन प्रश्नो का खंडन स्वयं की माता को बाँझ बताना , राजा को अधर्मी बतलाना और महारनी के पतिव्रत्य पर आक्षेप लगाना होता. वह ऐसे असमंजस मे पड गए की अगर वह जवाब दे तो राजा बुरा मान जायेंगे और अगर इसका समाधान नही (खण्डन) करें तो भी राजा बुरा मानेंगे क्योंकि वह एक बालक से हार गए । इसी विपरीत चिंतित अवस्था मे वह यमुनैतुरैवर से अपनी पराजय स्वीकार कर लेते है। यमुनैतुरैवर को ही इन प्रश्नो का खंडन कर समाधान करने की बात कहते है । इसके उत्तर मे यमुनैतुरैवर कुछ इस प्रकार कहते है।

पहला – शाश्त्रों के अनुसार , वह माँ बाँझ (निस्संतान) होती है जिसका एक ही पुत्र/पुत्री हो (आप अपनी माँ की एकलौती संतान हो,  अतः आपकी माँ एक बाँझ  (निस्संतान) स्त्री है ) ।

दूसरा – शास्त्रों में बतलाया है की , प्रजा के पाप पुण्य में राजा का भी भाग होता है, ऐसे में प्रजा के पाप का भागी होने से पुण्यवान नहीं कहलाता ।  हमारे राजा बिलकुल भी काबिल/समर्थ नही है क्योंकि वह केवल अपने राज्य का ही शासन करते है पूरे साम्राज्य के अधिपति नही है।

तीसरा – शास्त्रों के अनुसार राजा में अन्य देव भी विद्यमान रहते है , विवाह के समय कन्या को , पहले वेद मंत्रों से देवतावों को अर्पित करते है। इस कारण रानी को पवित्र नही मानते है।

अक्किआळ्वान यमुनैतुरैवर के सक्षम और आधिपत्य को स्वीकार करते हुए अपने आप को यमनैतुरैवर से पराजित मानकर उनके शिष्य बन जाते है । यहाँ यमुनैतुरैवर् शाश्त्रों के आधार पर दिव्य स्पष्टीकरण से विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की स्थापना करते है । महारानी उन्हें आळवन्दार नाम से सम्बोधित करती हैं (जिसका मतलब हैं की वह जो उनकी रक्षा करने , सब पर विजय पाने के लिए आये हैं) और उनकी शिष्या बन जाती हैं । राजा महारानी को दिए वचन अनुसार यामुनाचार्यजी को अपना आधा राज्य दे देता है |

मणक्काल् नम्बी के परिचय में हमने जाना की कैसे , मणक्काल नम्बि  कैसे यामुनाचार्यजी को आध्यातिम्क जीवन में प्रवेश करवाते हैं,  और उन्हें अपने संप्रदाय का  दर्शन प्रवर्तक बनाने के लिए श्री रंगम ले आते हैं |

श्रीरंगम पहुँचने के पश्चात, सन्यास दीक्षा ग्रहण करते है , और संप्रदाय के प्रचार में जुट जाते हैं , इस दरमियान यामुनाचार्यजी के अनेक वैष्णव शिष्य बनते हैं |

मणक्काल् नम्बी यामुनाचार्यजी को बतलाते है की वे कुरुगै कावलप्पण् स्वामी से अष्टान्ग योग का रहस्य सीखे । जब यामुनाचार्यजी,  कुरुगै कावलप्पण् स्वामी से मिलने पहुँचते हैं,  तब कुरुगै कावलप्पण् स्वामी योग में भगवद् अनुभव में मग्न रहते हैं । पर उन्हें यामुनाचार्यजी के आगमन का आभास हो जाता है, कुरुगै कावलप्पण् , यामुनाचार्यजी से कहते हैं की उन्हें आभास हुआ की एम्पेरुमान् उनके कंधो के ऊपर से आळवन्दार को देखने की कोशिश कर रहे है,  जिससे उन्हें पता चल गया की श्री नाथमुनि के वंशज कोई आये हैं। (क्योंकि नाथमुनि का वंश एम्पेरुमान् को अत्यंत प्रिय हैं इसी लिये उत्सुकतावश उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे )

वे उन्हें अष्टान्ग योग रहस्य सिखने के लिए अपने परमपद प्रस्थान के कुछ समय पहले एक उपाय बतलाते है । पर यमुनाचार्यजी उस उपाय को भूलकर तिरुअनतपुरम यात्रा पर चले जाते है। बाद में इस बात का उन्हे एहसास होता है की कुरुगै कावलप्पण् से योगरहस्य सीखने मे देरी हो गई |

जब यमुनाचार्यजी तिरुअनन्तपुर दर्शन की यात्रा पर गए तब उनके एक शिष्य दैवावारी आण्डान् , आचार्य से वियोग सहन नहीं कर पाने के कारण , वे तिरुअनन्तपुर की ओर प्रस्थान करते हैं और उसी समय आळवन्दार् तिरुअनन्तपुर  से श्री रंगम के लिए प्रस्थान कर रहे थे । उन दोनों की मुलाकात तिरुअनन्तपुर के मुख्य द्वार पर हो जाती है । दैवावारी आण्डान् अपने आचार्य को देखकर बहुत खुश होते हैं और उनके साथ ही श्री रंगम लौटने का फैसला करते हैं । आळवन्दार् उनसे अनंतशयन एम्पेरुमान् के दर्शन कर आने के लिए कहते है, तब जवाब देते हैं की मेरे लिए एम्पेरुमान् से भी अधिक आळवन्दार् हैं । ऐसे विशेष आचार्य निष्ठ थे ।

श्री रंगम वापस लौट आने पर , उन्हें श्री वैष्णव संप्रदाय के अगले उत्तराधिकारी की नियुक्त करने की चिन्ता घेर लेती हैं । इसी दौरान, यामुनाचार्यजी को इळयाळ्वार् (श्री रामानुज स्वामी) के बारे में जानकारी मिलती हैं जो कान्चिपूर् में यादव प्रकाशर् के पास शिक्षा अभ्यास कर रहे  थे । वे कान्चिपूर् पहुँच जाते हैं और देवापेरूमाळ् कोविल में करुमाणिक्क पेरूमाळ् सन्निधि के सामने अपना दिव्य अनुग्रह इळयाळ्वार् पर बरसाते हैं, जो उस समय सन्निधि के सामने से गुजर रहे थे । आळवन्दार् देवापेरूमाळ् सन्निधि पहुँचते हैं और एम्पेरुमान को प्रार्थना करते है की रामानुज को शरणागति प्रदान करे , इळयाळ्वार् को संप्रदाय के अगला उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाये । इस प्रकार आळवन्दार् ने एम्पेरुमानार् दर्शन के बीज़ बोये जो एक महा वृक्ष के रूप में परिवर्तित होने वाले थे । वे तिरुकच्चिनम्बी से विनती करते हैं की इळयाळ्वार् की आध्यात्मिक् प्रगति में उन्हें सहायता करे |

काल के अंतराल में आळवन्दार् बहुत रुग्ण हो जाते हैं और अपने सभी शिष्यों को तिरुवरंग पेरुमाळ् अरयर् पर निर्भर रहने की बात बतलाते है । अपने अन्तिम समय में वैष्णवों के लिए कुछ उपदेश देते है , उनमे कुछ इस प्रकार है.

१. श्रीवैष्णवों के लिए दिव्यदेश (दिव्यस्थल)  ही प्राण है इस दृढ़ विश्वास के साथ सदैव इन दिव्य क्षेत्रों मे भगवद्-भागवत कैंकर्य करते रहे
२. श्रीवैष्णवों के लिए तिरुप्पाणाळ्वार के बतलाये अनुसार , भगवान तिरुवरंग सदैव पूजनीय है और उनकी पूजा/सेवा, दर्शन   उनके तिरुवेडी (चरणारविन्द) से शुरू कर तिरुमुडि (शीश) तक करनी चाहिये क्योंकि तिरुप्पाणाळ्वार भगवान के चरणकमलों मे सदैव रहते है (जिन्होंने भगवान के श्री चरणकमलों का आश्रय लिया है) । श्री आळवन्दार कहते है की उनके विचार मे तिरुप्पाणाळ्वार (जिन्होंने पेरियपेरुमाळ का गुणगान किया है) , कुरुम्बरुतनम्बि (जिन्होंने मिट्टि के फूल पेरियपेरुमाळ को समर्पित किया) , तिरुकच्चिनम्बि (जिन्होंने भगवान देवपेरुमाळ की पंखा झलने की सेवा की) सदैव समान है और उनकी तुलना कदाचित नही कर सकते क्योंकि हर एक अपने भगवद्कैंकर्य मे उत्कृष्ट थे ।
३. श्री आळवन्दार कहते है की एक प्रपन्न को कदाचित भी अपनी आत्मयात्रा या देहयात्रा का चिंतन नही करना चाहिये क्योंकि आत्मा भगवान के आधीन है अतः भगवान खुद इसकी देखभाल करेंगे और देह जो पूर्वकर्मानुसार प्राप्त है वह (देह) हमारे पाप / पुण्य के अनुसार चालित है । अतः हमे किसी के बारें मे चिंतित होने की आवश्यकता नही है ।
४. भागवतों मे कदाचित तुलना नही करना चाहिये क्योंकि हर एक श्रीवैष्णव भगवान के तुल्य है |
५. जैसे एम्पेरुमान् के श्री चरणकमलों का अमृत (चरणामृत) स्वीकार करते हैं, उसी गौरव और प्रेम से आचार्य का श्री पाद तीर्थ लेना चाहिये ।
६. जब हम (आचार्य) श्री पाद तीर्थ को दूसरों को दे रहे हो, तब हमें गुरुपरम्परा की ओर वाक्य गुरुपरम्परा / द्व्य महा मंत्र का अनुसंधान करते हुए देनी चाहिये ।

अंत में वे उनके सारे शिष्यों को उनके सामने उपस्थित होने के लिए कहते हैं । उनसे क्षमा प्रार्थना माँगते हैं, उनसे श्री पाद तीर्थ ग्रहण करते है , उनको तादियाराधन करवाते है. और चरम तिरुमेनी (शरीर) छोड़कर परमपद को प्रस्थान करते हैं ।

सभी शिष्यगण दुःख के सागर में डूब जाते हैं और उनकी अंतिम यात्रा उत्सव मनाने की  तैयारी आरम्भ करते हैं । जब एक श्री वैष्णव अपनी भौतिक काया को छोड़कर परमपद चले जाते हैं, तब उनका परमपद में अत्यंत गौरव और सम्मान के साथ स्वागत किया जाता हैं , इसे ध्यान में रखते हुए यह कार्य अत्यंत समारोह पूर्वक से मनाया जाता हैं । सभी चरम कैकर्य जैसे तिरुमंजनम्, श्री चूर्ण धारणा ,अलंकरण ,ब्रह्म रथ विस्तार से आळवन्दार् चरित्र में और अन्य आचार्या के चरित्र में भी समझाया गया हैं ।

अपने अंतिम समय के पहले , आलवन्दार स्वामी अपने प्रिय शिष्य पेरिया नम्बि ( महापूर्ण स्वामीजी) को इळयाळ्वार (रामानुज स्वामीजी) को लाने कांचीपुरम भेजते है । इळयाळ्वार् देवपेरुमाळ् की तिरुवाराधान में जल कैंकर्य के लिए सालै किनर (कुँए) पहुँचते हैं । उन्हें देखकर पेरिय नम्बी आळवन्दार् स्वामी द्वारा रचित स्तोत्र रत्न का पठन ऊँचे स्वर में करते हैं ताकि इळयाळ्वार को सुनाई दे । श्लोक सुनकर , श्लोक को अर्थ पूरित ग्रहण करके इळयाळ्वार् महापूर्ण स्वामीजी को , उनके लेखक के बारे में पूछते हैं । तब पेरिय नम्बि उन्हें आळवन्दार् की विशिष्टता/उत्कर्षता बता कर उन्हें श्री रंगम आमंत्रित करते हैं । उनका आमंत्रण स्वीकार करके इळयाळ्वार् देवापेरुमाळ् और तिरुकच्चिनम्बी की अनुमति लेकर श्री रंगम पहुँचते है ।  श्री रंगम पहुँचने पर , रास्ते में आळवन्दार् स्वामी की तिरुमेनि का अंतिम यात्रा का देखकर , पेरिय नम्बि दुखित हो रोते हुए, निचे गिर जाते हैं और इळयाळ्वार् भी यह सब देख दुखी हो जाते हैं। वहां उपस्थित लोगों से घटित घटना की जानकारी प्राप्त करते हैं ।

समाधी स्थल पर ,आळवन्दार् स्वामी के अंतिम कैंकर्य को आरम्भ किया जा रहा था,  तब सब लोग ने उनके एक हाथ की ३ उंगलिया मुड़ी हुयी (बंद) देख अचंभित होते हैं। इळयाळ्वार् भी यह देख उपस्थित शिष्य और वैष्णव समूह से चर्चा कर इसका कारण जानने का प्रयास करते है , सबकी सुन इस निर्णय पर पहुँचते है की आलवन्दार स्वामी की ३ इच्छाएँ अपूर्ण रह गयी , वे इच्छाएँ इस प्रकार थी, :
१. व्यास और पराशर ॠशियों के प्रति सम्मान व्यक्त करना ।
२. नम्माल्वार् के प्रति अपना प्रेम बढ़ाना ।
३. विशिष्टा द्वैत सिद्धान्त के अनुसार व्यास के ब्रह्म सूत्र पर श्रीभाष्य की रचना करना (विश्लेष से विचार/चर्चा करना ) लिखना ।

तब इळयाळ्वार् प्रण लेते है की, आलवन्दार स्वामी के यह ३ इच्छाएँ वह पूर्ण करेंगे, इळयाळ्वार् के प्रण लेते ही आळवन्दार् स्वामी की तीनो उंगलिया सीधी हो जाती हैं । यह देखकर वहां एकत्रित सभी वैष्णव, और आलवन्दार स्वामी के शिष्य अचंभित  हो खुश हो जाते हैं और इळयाळ्वार् की प्रशंसा करते हैं। आळवन्दार् स्वामी की  परिपूर्ण दया, कृपा कटाक्ष और शक्ति उन पर प्रवाहित होती हैं। उन्हें श्री वैष्णव संप्रदाय दर्शन के उत्तराधिकारी पद पर प्रवर्तक/ निरवाहक चुन लिये जाते  हैं । इळयाळ्वार् को आळवन्दार् स्वामी का दर्शन का सौभाग्य प्राप्त न होने का बहुत क्षोभ हुआ, वे दुखित मन से सब कैंकर्य पूर्ण करके , बिना पेरिय पेरुमाळ् के दर्शन किये कान्चिपूर् लौट जाते हैं । आळवन्दार् स्वामी के रचित ग्रन्थ उनके उभय वेदान्त के महा ज्ञानी होने का आभास करवाते है ।

१. चतुश्लोकि में केवल ४ श्लोकों में पेरिया पिराट्टि वैभव का मूल तत्व समझाते हैं ।
२. वास्तव मे स्तोत्ररत्न एक अनमोल रत्न है और इसी रत्न मे श्री आळवन्दार शरणागति की अवधारणा पूर्ण रूप से सरल श्लोकों मे प्रस्तुत करते है |
३. गीतार्थसंग्रह मे श्री आळवन्दार श्री भगवद्गीता का सारांश समझाते है|
४. आगम प्रमान्यम पहला ग्रन्थ हैं जिसमे श्री पाँच रात्र आगमं का  महत्व और वैधता पर प्रकाश डाला गया हैं ।

आळवन्दार का तनियन्

यत् पदाम्भोरुहध्यान विध्वस्ताशेश कल्मषः
वस्तुतामुपयातोऽहम् यामुनेयम् नमामितम्

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अगले अनुच्छेद मे पेरियनम्बि के वैभव की चर्चा करेंगे ।

अडियेन् इन्दुमति रामानुज दासी

मणक्काल्नम्बि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

जय श्रीमन्नारायण ।

आळ्वार एम्पेरुमन्नार जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वळि गुरु परम्परा के अन्तर्गत सातवें आचार्य “उय्यकोण्डार्” स्वामीजी की जीवनी का संक्षिप्त परिचय दिया था  । इस कड़ी में हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आठवें आचार्य (मणक्काल्नम्बि) के जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालेंगे ।

मणक्काल्नम्बि

तिरुनक्षत्र माघ मास , माघ नक्षत्र

अवतार स्थल  : मणक्काल

(श्रीरंगम के पास कावेरी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गाँव मणक्काल)

आचार्य  : उय्यकोण्डार

शिष्यगण : आळवन्दार, तिरुवरंगपेरुमाळ् अरयर् (आळवन्दार के पुत्र), दैवतुक्करसु नम्बि, पिळ्ळै अरसु नम्बि, सिरु पुळ्ळूरुडैयार् पिळ्ळै, तिरुमालिरुन्चोलै दासर, वंगिपुरत्तु आय्चि

मणक्काल्नम्बि , श्रीराममिश्र नाम से भी जाने जाते है इनका जन्म मणक्काल नामक एक छोटे गाँव में हुआ । इनकी ख्याति (प्रसिद्धि) संप्रदाय में, मणक्काल्नम्बि के नाम से हुई । मणक्काल्नम्बि अपने आचार्य (उय्यकोण्डार) की सेवा में बारह वर्ष रहे । इन बारह वर्षो के मध्य उनके आचार्य की पत्नी का परमपद की और प्रस्थान हुआ । उसके पश्चात मणक्काल नम्बि ने स्वयं अपने आचार्य के घर (तिरुमाळिगै) और परिवार के देख रेख की ज़िम्मेदारि सम्भाली ।

अपनी आचार्य निष्ठा और घर परिवार की जिम्मेदारी सँभालने का परिचय देते हुए , एक घटना बहुत चर्चित है. एक बार आचार्य उय्यकोण्डार की पुत्रियाँ कावेरी नदी के तट से वापस आ रहीं थी, तब रास्ते में कीचड़ के कारण वह आगे नहीं बढ़पाती, और वहीँ रुकजाति है. यह देख  मणक्काल्नम्बि  छाती के बल कीचड़ पर लेट जाते है और अपने आचार्य की पुत्रियों को अपनी पीठ पर चलते हुए कीचड़ पार करने को कहते है । उनके आचार्य उय्यकोण्डार को जब इस घटना का वृतांत मिला , तब वह मणक्काल्नम्बि की आचार्य चरणों में भक्ति और जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता को देख अत्यंत ही प्रसन्न हुए और मणक्काल्नम्बि से पूछा – हे मणक्काल्नम्बि ! क्या इच्छा है तुम्हारी – यह पूछने पर मणक्काल्नम्बि कहते है – निरन्तर मै आप की सेवा मे तत्पर रहूँ बस यही मेरी इच्छा है ।

उय्यकोण्डार अती प्रसन्न होकर मणक्काल्नम्बि को द्वयमहामन्त्र का उपदेश फिर से करते है  । (संप्रदाय में ऐसी मान्यता है की जब श्रीवैष्णवाचार्य प्रसन्न होते है तब वे अपने शिष्य को द्वयमहामन्त्र का उपदेश करते है) ।

उय्यकोण्डार अपने अन्तकाल मे मणक्काल्नम्बि को अपना  उत्तराधिकारी नियुक्त करते है और मणक्कालनम्बि को अपने अंतिम उपदेश मे नाथमुनि स्वामीजी को दिए वचन अनुसार उनके पौत्र , ईश्वरमुनि के पुत्र  यामुनाचार्य को सदधर्ममार्ग मे प्रशिक्षण देकर, हमारे सत्सांप्रदाय का उत्तराधिकारि नियुक्त करने को कहते है ।

ईश्वरमुनि के यहाँ यमुनैतुरैवर् का जन्म होता है, मणक्कालनम्बि, यमुनैतुरैवर् की सम्प्रदायानुसार पंञ्च संस्कार दीक्षा संपन्न करवाते है (संप्रदाय रिवाजानुसार शंख चक्र प्रदान करना) यानि पंञ्च संस्कार, शिशु के नामकरण संस्कार (जो ग्यारहवें दिन पर होता है) के समय पर भी किया जाता था । उस काल में बाल्य काल में ही शिशु को तिरुमन्त्र का उपदेश देकर , उसका गोपनीय अर्थ समझने की मनन करने की बात समझाते थे, जब बालक यौवन अवस्था को प्राप्त करता था, तब उसे भगवान की मूर्ति / शालग्राम की आराधना सिखाई जाती थी (तिरुवाराधनम्) ।

यमुनैत्तुरैवर बचपन से ही अती कुशाग्र बुद्धि के धनि थे प्रतिभाशालि और बुद्धिमान भी थे, इसी कारण वह आळवन्दार (माने जो रक्षा करने की लिए आये हो – इसकी जानकारी आळवन्दार के चरित्र में पायी जा सकती हैं) से जाने गए है, अपनी इसी प्रतिभा के बल पर कोलाहल पंडित को शास्त्रार्थ में पराजित कर , तत्कालीन राजा से आधा राज्य पारितोषक स्वरुप में प्राप्त कर , आलवन्दार नाम भी प्राप्त किया | तत्पश्चात यमुनैत्तुरैवर , राज्य के परिपालन मे व्यवस्त हो गए अतः कुछ इस प्रकार वह इस भौतिक जगत के भवसागर में व्यवस्त हो गए, वह अपने इस धरा पर अवतरण का कारण ही भूल गए । मणक्काल्नम्बि यह सब देखकर अत्यंत दुखित हुए और अपने आचार्य के वचन को याद कर, उन्हें (आळवन्दार)  भगवद्भक्ति के सद्मार्ग का दर्शन करवाने की मन में ठान ली ।

इसी सद्भावना से मणक्काल्नम्बि जब आळवन्दार से मिलने गए तो मुख्यद्वारपालक ने उन्हे रोक दिया । मणक्काल्नम्बि की सद्भावना आळवन्दार के प्रती (जो उनके प्रिय शिष्य थे) और मज़बूत हुई और इसी भावना से उन्होने छुपके से राजप्रासाद के प्रधान रसोइये से मित्रता कर ,कहा की हर रोज़ अपने राजा (आळवन्दार) को हरी सब्ज़ी खिलाना और वह मैं हर रोज़ लेकर आऊंगा ताकि इससे तुम्हारे राजा का स्वास्थ्य सही बना रहे ।  इसके पश्चात आळवन्दार को हर रोज़ हरी सब्जी भोजन में मिलती रही, जिससे उनकी आसक्ति हरीसब्ज़ी में और भी अधिक हो गयी. उनमे और उनके विचारों में धीरे धीरे परिवर्तन होने लगा । तभी अचानक एक दिन हरी सब्ज़ी भोजन में न मिलने पर आळवन्दार अपने रसोईयों से पूछते है “आज हरी सब्ज़ी क्यों नही बनायीं ” तो प्रमुख रसोइया कहता है,  एक श्रीवैष्णव आया करते थे, उनके आग्रह पर हम उनकी हरी सब्ज़ी आपको हर रोज़ परोसा करते थे, पर वह आज नही आये, अतः हरी सब्जी आज भोजन में नहीं आयी । यह जानकर आळवन्दार अपने द्वारपालक को आज्ञा देते है की वह श्रीवैष्णव को उनके दरबार मे आमन्त्रित करें । इस प्रकार आमंत्रन पाकर अती प्रसन्न मणक्काल्नम्बि आळवन्दार से मिलने राजदरबार में जाते है। वहाँ आळ्वन्दार मणक्काल्नम्बि से पूछते है क्या उनको धन की ज़रूरत है तब मणक्काल्नम्बि कहते है मेरे पास श्रीनाथमुनि के द्वारा प्रसादित अकूत धन है जो मै तुम्हे (आळवन्दार) देना चाहता हूँ । यह सुनकर अती प्रसन्न आळवन्दार अपने अनुचरों को आज्ञा देते है की कभी भी मणक्काल्नम्बि आए तो उन्हे तुरन्त अन्दर भेज दे ।

इस प्रकार आळवन्दार के विषेश अनुग्रह से मणक्काल्नम्बि, उन्हे भगवद्गीता का सदुपदेश देते है जिसे सुनकर आळवन्दार मे परिवर्तन होने लगता है ।  मणक्काल्नम्बि के अनुग्रह से प्राप्त विषेश ज्ञान से परिवर्तित आळवन्दार उनसे पूछते है – “भगवद्गीता का सारांश जिससे भगवान का साक्षात्कार हो” तब मणक्काल्नम्बि उन्हें चरमश्लोक का गोपनीय रहस्य बतलाते है । इसके पश्चात मणक्काल्नम्बि आळवन्दार को तिरुवरंगम ले जाते है और भगवान के दिव्य मंगल (अर्चमूर्ति) स्वरूप का दर्शन करवाते है। तिरुवरंगम भगवान श्री रंगनाथजी के दिव्य स्वरुप को देखकर आळवन्दार भौतिक जगत से जुडी हुई डोरी को परिपूर्ण त्यागते है ।मणक्काल्नम्बि अपने वैकुण्ठ गमन से पेहले आळवन्दार को

1) श्री नाथमुनि के बारें मे सदैव सोचने का उपदेश देते है।
2) उन्हें अपने बाद सम्प्रदाय का उत्तरदयित्व सोंपते है।
3) भविष्य मे उनके जैसा एक परिवर्तकाचार्य को सम्प्रदाय के उत्तरदायित्व को सौपने की घोषणा करने को कहते है।

अपने आचार्य मणक्काल्नम्बि के आदेश और उनको दिए वचनानुसार आळवन्दार ने श्री रामानुजाचार्य को भविष्य परिवर्ताकाचार्य के रूप मे घोषित किये । अतः हमारे सत्साम्प्रदाय के पथप्रवर्तक श्रीरामानुजाचार्य हुए ।

तो इस प्रकार अपने आचार्य को दिया गया वचन पूर कर मणक्कालनम्बि परमपदम को प्रस्थान हुए ।

मणक्काल्नम्बि का तनियन

अयत्नतो यौमुनम् आत्म दासम् अलर्क्क पत्रार्प्पण निष्क्रयेण
यः क्रीत्वानास्तित यौवराज्यम् नमामितम् राममेय सत्वम् ॥

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन् और अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुज दासि

 

अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

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उय्यक्कोण्डार्

श्री:
श्री मते रामानुजाय नमः
श्री मद् वर वर मुनये नमः
श्री वानाचल महा मुनये नमः

 श्री नाथमुनि  स्वामीजी के बाद   सम्प्रदाय औराणवाली परम्परा में अगले आचार्य उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी के जीवन पर प्रकाश डालेंगे ।

उय्यक्कोण्डार् – आल्वार् तिरुनगरी

तिरुनक्ष्त्र :  चैत्र मास कृतिका नक्षत्र

अवताऱ् स्थल:  तिरुवेळ्ळरै

आचार्य : श्रीमन् नाथमुनि

शिष्यगण : मणक्काल् नम्बि , तिरुवल्लिकेणि  पाण् पेरूमाळ् अरैयर् , सेट्टलूर् सेन्डलन्गार् दासर् , श्री पुण्डरिक दासर् , गोमठम् तिरुविण्णकरप्पन् , पेरूमाळ् नन्गै

उय्यकोंडार स्वामीजी , पुण्डरिकाक्षर्  का जन्म तिरुवेळ्रळरै (श्वेत गिरि) में हुआ । इनके माता पिता द्वारा इनका नामकरण तिरुवेळ्रळरै एम्पेरुमान् के नाम पर ही किया गया । इन्हें पद्माक्षर स्वामी के नाम से भी पहचानते हैं, पर ज्यादा इन्हे उय्यक्कोण्डार् के नाम ही प्रसिद्ध मिली ।

नाथमुनि स्वामीजी के शिष्यों में , कुरुगै कावलप्पण् के साथ साथ इन्हें भी प्रमुख माना जाता हैं । नाथमुनि जी नम्माल्वार आळ्वार के अनुग्रह से दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के बाद काट्टूमन्नार् कोविल् लोटते हैं और अपने साम्प्रदाय का प्रचार करते हैं । अपने शिष्य कुरुगै कावलप्पण् को अष्टांग योग ( बिना किसी भी तरह के शारीरिक क्रियाकलाप के , निरंतर् भगवद अनुभव् में रहने की सीख) का उपदेश करते हैं । जब नाथमुनि उय्यक्कोण्डार् से अष्टांग योग सीखने में उनकी रूचि के बारे में पूछते हैं तब वे उन्हें जवाब देते हैं की “पिण्णम् किडक्क मण्णाम् पुण्णरळामो ” माने जहाँ संसारी अज्ञान के कारण भौतिक जगत् में दुखि हैं वहाँ वे कैसे आनंद से भगवद् गुणानुभव कर सकते हैं । यह सुनकर नाथमुनि बहुत ही खुश होते हैं और उनकी उदारता की प्रशंसा करते हैं । नाथमुनि इन्हें और कुरुगै कावलप्पण् को आदेश देते हैं की ईश्वर मुनि के पुत्र (अपने पोते) जो अति अल्प काल में प्रकट होने वाले हैं उन्हें अरुळिचेयळ् (दिव्यप्रबंध) और अष्टांग योग सिखाये में निपुण बनाएंगे ।

नाथमुनि के बाद,उय्यक्कोण्डार् दर्शन शास्त्र के प्रवार्ताकार बनते हैं (श्रीवैष्णवसांप्रदाय के प्रचार प्रसार का उत्तरदायित्व स्वयं संभालकर सत्सांप्रदाय़ की रक्षा करते है) और अपने शिष्यबृंद को इस दिव्यज्ञान की शिक्षा देते हैं ।परमपद को प्रस्थान के पहले श्री उय्यक्कोण्डार स्वामीजी मनक्कालनम्बि ( राममिश्र स्वामीजी ) को उपदेश देते है की उनके बाद , नाथमुनि स्वामीजी को दिए वचन को उन्हें निभाना है इस वचन, यामुनाचार्य स्वामीजी नाथमुनि स्वामीजी की इच्छानुसार पूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उत्तरदायित्व को राममिश्र स्वामीजी को सौंप वैकुण्ठ गमन करते है ,

उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी की तनियन्

नमः पंकज नेत्राय नाथः श्री पाद पंकजे ।
न्यस्तसर्वभराय अस्मद्कुल नाथाय धीमते ॥

परम्परा के अगले आचार्य श्री स्वामी मणक्काल् नम्बि के बारे संक्षिप्त विवरण अगली कड़ी में प्रेषित होगी ।

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अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

श्रीमन्नाथ मुनि

:श्री:

श्रीमते रामानुजाय नम:

श्रीमद वर वर मुनये नम:

श्री वानचल महा मुनये नम:

श्री नम्माल्वार् आळ्वार के बाद ओराण्वळि आचार्य परम्परा में अगले आचार्य श्रीनाथमुनि आते है ।

नाथमुनि – काट्टूमन्नार् कोविल् (वीरनारायणपुरम)

नाथमुनि – काट्टूमन्नार् कोविल् (वीरनारायणपुरम)

तिरुनक्षत्र  : आषाढ मास, अनुराधा नक्षत्र

अवतार स्थल : काट्टूमन्नार् कोविल् ( वीर नारायण पुरम )

आचार्य : नम्माल्वार्

शिष्यगण : उय्यकोण्डार् , कुरुगै कावलप्पन् , पिळ्ळै करुणाकर दासर् ,नम्बि करुणाकर दासर्, ऎरु तिरुवुडैयार् , तिरुकण्णमंगै आण्डान् , वानामामलै दैव नायक आण्डान् , उरुप्पत्तूर अचानपिळ्ळै , शोगतूराल्वान् , कीळैयगताळ्वान्, मेलैयागताळ्वान्

ग्रन्थ : न्यायतत्वं , योग रहस्यम , पुरुष निर्णयम

श्रीमन् नाथमुनि वीरनारायणपुरं मे ईश्वरभट्टाळ्वार् के घर जन्म लिए । श्रीमन् नाथमुनि को श्रीरन्गनाथमुनि और नाथब्रह्म नामों से भी जाना जाता है, दोनों ही नामो में नाथ होने की वजह से शायद छोटे नाम से नाथमुनि नाम से ज्यादा गौरवान्वित हुए |

श्रीमन् नाथमुनि अष्टांग योग और संगीत के विद्वान थे । इन्होंने श्रीरंगम में भगवान अरंगनाथार (रंगनाथजी) की अरयर सेवा ( अरयर सेवा याने , दिव्य प्रबंधों को संगीतमय ताल में नृत्य के साथ प्रस्तुत करना) की शुरुआत की थी,  जो आज भी तिरुवरन्गम, आल्वार् तिरुनगरि , और श्री विल्लिपुत्तूर् मे उत्सव और अन्य दिनों में आज भी आयोजित होती है ।

नाथमुनि उत्तर भारत के दिव्य देशो, अभिमान देशो की यात्रा के लिए अपने पिता, पुत्र और अन्य कुटुम्ब सदस्यों के साथ मथुरा, वृन्दावन्, गोवर्धन धाम, द्वारका, बद्रीनाथ, नैमिषारण्य इत्यादि दिव्य धामों के लिये वीरनारायणपुराम से प्रस्थान हुए । यमुना नदी के तट पर स्थित गोवर्धनपुर् गाँव,  नाथमुनि को बहुत ही प्रभावित किया , यही पर एक गुफा में रहकर एम्पेरुमान् को यमुनैत्तुरैवर् के रुप मे सेवा कर रहे थे। एक दिन सपने में एम्पेरुमान् उन्हें काट्टूमन्नार् कोविल् (वर्तमान मन्नारगुडी भगवान राजगोपाल स्वामी का अभिमान देश) को लौट आने का आदेश देते है । यह सन्देश प्राप्त कर वह काट्टूमन्नार् कोविल् के लिए निकल पड़ते है । वापसी में वे वारणसि, पूरी, सिंहाचल, घटिकाचल्, कांचीपुरम (आस पास के दिव्य स्थल), तिरुवहिन्द्रापुरम, तिरुकोवलूर्, तिरुवरन्गम् और तिरुकुडन्दै दिव्य स्थानों के मंगलाशासन करते हुए काट्टूमन्नार् कोविल् पहुँचते है।

काट्टूमन्नार् कोविल् में, एक दिन मेल्नाडु से , श्रीवैष्णवों का समूह काट्टूमन्नार् कोविल् पहुँचता है, भगवान के दर्शन के समय नम्माळ्वार आळ्वार द्वारा रचित तिरुवोईमोजहि की एक पत्  याने १० या ११ पाशुर जो “अरुवामुदन”/ “अर्वामुतन” यह एक द्रविड़ शब्द है, जिसका अर्थ है “रूचि के साथ” / “तन्मयता के साथ” भगवान को गाकर सुनाते हैं ।  नाथमुनि उन वैष्णवों के मुख से पाशुरो को सुनने के बाद, वैष्णवों से और सुनाने को कहते है,  इसपर वैष्णव बतलाते है उन्हें इतने ही आते है, तब नाथमुनि उन पाशुरों कहाँ से प्राप्त कर सकते है , श्रीवैष्णव विचार व्यक्त करते हैं कि उन्हें केवल ११ पाशुरो की जानकारी है और उन्हें सूचित करते है आल्वार् तिरुनगरि मे इन्हें शेष पाशुरो की जानकारी प्राप्त हो सकती हैं ।

उनके विचार से सहमत, नाथमुनि आल्वार् तिरुपगरि पहुँचते है । वहाँ उनकी मुलाकात मधुरकवि आल्वार् के शिष्य परांकुश दासर् से होती है। परांकुश दासर् उन्हें बतलाते है की , वह मधुरकवि आल्वार् द्वारा नम्माळ्वार आळ्वार के गौरव ,  रचित “कण्णिनुण् सिरुताम्बू ” के ११ पाशुर का तिरुपुलियामाराम ( इमली का वह पेड़ जिसको खोह नम्माळ्वार आळ्वार ध्यान मग्न बैठे थे) के सामने १२००० बार बिना किसी अवरोध के जप करे ।  परांकुश दासर् के बताये हुए क्रम के अनुसार नाथमुनि स्वामीजी (जो अष्टांग योग के अधिकारी हैं) जप आरम्भ करते हैं । नाथमुनि के इस जप से प्रसन्न होकर नम्माळ्वार आळ्वार उनके सामने प्रकट होते हैं | उन्हे अष्टांग योग का परिपूर्ण ज्ञान और आळ्वार संतो द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबंध पाशुर (अरूलिचेयल्) अर्थ सहित प्रदान करते हैं | जिस तरह एम्पेरुमन्नार ने नम्माळ्वार आळ्वार पर विशेष अनुग्रह किये थे, ऐसे ही नम्माळ्वार आळ्वार ने नाथमुनि स्वामीजी पर विशेष अनुग्रह कर इन द्रविड़ वेदो को प्रदान किये | नम्माळ्वार आळ्वार की इस विशेष कृपा को मणवालमामुनि अपनी उपदेश रत्नमाला मे “अरुल पेट्रा नाथमुनि ” (अनुग्रह पात्र नाथमुनि) कह वर्णित करते है|

नाथमुनि काटटुमन्नार् कोविल पहुँच , मन्नार् को ४००० पाशुरो सुनाते हैं | प्रसन्न होकर मन्नार् ४००० पाशुरों को विभजित करके प्रचार – प्रसार करने का आदेश देते हैं | मन्नार् के आदेश अनुसार ४००० पाशुरो को नाथमुनि स्वामीजी , लय , सुर और ताल के सम्मिश्रण कर ४ भाग कर,  अपने दोनों भांजे कीळैयगताळ्वान् और मेलैयागताळ्वान् पर अनुग्रह कर दिव्यप्रबन्ध का ज्ञान देकर इनके द्वारा इन दिव्य प्रबंधों का प्रचार – प्रसार करते हैं |

नाथमुनि दिव्यसंगीत के भी महा विद्वान थे | एक समय,  उस गाँव के राजा एक साधारण और विशेष (दिव्य) गायक के बीच कोई अंतर नही कर पा रहे थे | नाथमुनि ने अति सरलता से अंतर पहचान इस समस्या को सुलझा दिया | राजा ने यह देख नाथमुनि स्वामीजी की संगीत की प्रवीणता की परीक्षा लेनी चाही,  तब नाथमुनि स्वामीजी जवाब देते है की , वह ४००० झांझो की सम्मिलित ध्वनि सुनकर , एक एक झांझ की ध्वनि और उसके वजन का अनुमान कर सकते हैं | यह सुन राजा को नाथमुनि स्वामीजी की संगीत में प्रवीणता समझ आती हैं, राजा नाथमुनि स्वामीजी को ढेर सारा धन देकर गौरवान्वित करते हैं | पर भौतिक सुखो को तुच्छ समझने वाले नाथमुनि स्वामीजी , इस धन संपत्त्ति के लिए कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते |

अपने दिव्य ज्ञान , अपने अष्टांगयोग की साधना से भविष्य को देखते हुये, अपने पौत्र का आगमन देखते है,  अपने पुत्र ईश्वर मुनि से कहते है की, उनके पुत्र को यमुनै तुरैवर् (कृष्ण प्रेम के कारण – जो यमुना नदि से सम्बंधित हो) उन्हीके ऊपर नामकरण करने का आदेश देते है, और अपने शिष्य बृंद से वचन मांगते हैं की वे यमुनै तुरैवर् (आल्वन्दार) को सभी शास्त्रों का ज्ञान प्रदान कर शास्त्र ज्ञान में निपुण बनाएंगे ।

अपना अंतिम समय निकट जान कर नाथमुनि स्वामीजी, आस पास की परिस्थिथो से विस्मरित हो एम्पेरुमान के ध्यान में निमग्न रहते थे । एक दिन उनसे मिलने राजा और रानी आते है । ध्यानमग्न स्वामीजी को देख , राजा और रानी लोट जाते है । प्रभु प्रेम , लगन और भक्ति में मग्न,  नाथमुनि स्वामीजी को ऐसा आभास होता है की भगवान श्री कृष्ण गोपियों के साथ आए और उनको ध्यानमग्न अवस्था में देखकर वापस लोट गये है, अपने इस आभास से दुखी हो श्रीनाथमुनि राजा और रानि की ओर दौड़ते है |

अगली बार शिकार से लोटते हुए राजा, रानी, एक शिकारी, एक वानर के साथ उनसे मिलने के लिए आते हैं । इस बार भी नाथमुनि स्वामीजी को ध्यान मग्न देख , राजा फिर से लोट जाते हैं । नाथमुनि जी को इस बार यह लगता हैं की श्री राम चन्द्र, माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी उन्हें दर्शन देने पधारे हैं , पर उन्हें ध्यान मग्न देख लौट गये और इसी आभास में , नाथमुनि उनके दर्शन पाने उनके पीछे दौड़ते हैं । जब वह छवि उनकी आँखों से ओझल हो जाती हैं,  भगवान से वियोग सहन न कर पाने के कारण नाथमुनि मूर्छित हो प्राणों को छोड़ देते हैं और परमपद प्राप्त कर लेते है । यह समाचार सुनकर तुरन्त ईश्वर मुनि , शिष्य बृंद के साथ वहाँ पहुँचते हैं और उनके अन्तिम चरम कैंकर्य करते है ।

नाथमुनि स्वामीजी के प्रयास से प्राप्त इन दिव्य प्रबंधों, के कारण ही आज श्री वैष्णव साम्प्रदाय का ऐश्वर्य हमें प्राप्त हुआ हैं । इनके बिना यह प्राप्त होना दुर्लभ था । आल्वन्दार स्वामीजी , नाथमुनि स्वामीजी के पौत्र अपने स्तोत्र रत्न में नाथमुनि की प्रशंसा शुरुआत के तीन श्लोकों मे करते है ।

पहले श्लोक में बताते हैं की ” मैं उन नाथमुनि को प्राणाम करता हुँ जो अतुलनीय हैं, विलक्षण हैं और एम्पेरुमानार् के अनुग्रह से अपरिमित ज्ञान भक्ति और वैराग्य के पात्र हैं ।

दूसरे श्लोक में कहते हैं की ” मैं उन नाथमुनि जी के चरण कमलों का,  इस भौतिक जगत और अलौकिक जगत में आश्रय लेता हूँ जिन्हें मधु राक्षस को वध करने वाले (भगवान श्री कृष्ण) के श्री पाद कमलों पर परिपूर्ण आस्था , भक्ति और शरणागति ज्ञान हैं” ।

तीसरी श्लोक में कहते हैं की ” मैं उन नाथमुनिजी की सेवा करता हूँ जिन्हें अच्युत के लिए असीमित प्रेम हो निजज्ञान के प्रतीक हैं , जो अमृत के सागर हैं , जो बद्ध जीवात्माओ के उज्जीवन के लिए प्रकट हुए हैं, जो भक्ति में निमग्न रहते हैं और जो योगियों के महा राजा हैं ।

उनके अन्तिम और चौथे श्लोक में एम्पेरुमान् से विनति करते हैं की, उनकी उपलब्धियों को न देखकर , बल्कि उनके दादा की उपलब्धिया और शरणागति देखकर मुझे अपनी तिरुवेडी का दास स्वीकार किया जाय ।

इन चारो श्लोक से हमें नाथमुनि जी के महान वैभव की जानकारी होती हैं ।

आईये उनकी वैभवता जान, उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करे की हमे भी उन्हि की तरह अच्युत और अल्वार आचार्यो के श्रीचरणों में अटूट् विश्वास और प्रेम प्राप्त हो |

नाथमुनि तनियन

नमःचिन्त्यादभुताक्लिष्ट ज्ञान वैराग्य राशये ।
नाथायमुनयेगाध भगवद्भक्ति सिन्धवे ॥

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अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

नम्मालवार

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हम ने अपने पूर्व भाग में श्री सेनै मुदलियार (श्री विष्वक्सेन) के बारे में ज्ञान प्राप्त किया । आज हम ओराण वाली गूरु परम्परा में अगले आचार्य श्री नम्मालवार के बाऱे में जानने की कोशिश करेंगे।

तिरुनक्षत्र: वृषभ मास ,विशाखा नक्षत्र
आवतार स्थल : आल्वार तिरुनगरि
आचार्यं: मुदलियार: श्री विष्वक्सेन
शिष्य: मधुरकवि आल्वार

श्री नम्माल्वार को मारन, शठगोपन ,परान्कुश, वकूलाभरण, वकुलाभिरामन, मघिल्मारान, शटज़ित,कुरुगूर नम्बी इत्यादि नामों से भी जाना जाता हैं।

कलियुग के शुरुवात में नम्माळ्वार कारि और उदयनन्गै के पुत्र के रूप मे आल्वार तिरुनगरि (तिरुक्कुरुहूर) मे अवतरित हुए । श्री भगवद गीता में श्री कृष्ण निश्चयपूर्वक घोषित करते है की “वासुदेव सर्वं इति स महात्मा सुदुर्लभः ” जिसका मतलब है की ऐसे महापुरुष (यानि महात्मा) जो जानते है की भगवान वासुदेव सर्वत्र है वे दुर्लभ है । नम्मालवार के श्री ग्रंथों से यह निश्चित कर सकते हैं की वे उन महापुरुषों मैं एक हैं । वे एम्पेरुमान के कितने प्रिय हैं यह जानकारी उनके दिव्य प्रबंधों से जान सकते हैं । श्री नम्माळ्वार इस भौतिक जगत मे एक इमली के पेड(तिरुपुलिअल्वार) के नीचे अपने बत्तीस वर्ष भगवद्भक्ति (भगवान के ध्यान) मे बिताये। इनके लिखें गये ग्रंथों में तिरुवाय्मोळि(सहस्रगीति) सबसे प्रसिध्द हैं । इसे सामवेद के समान माना जाता हैं। हमारे पूर्वाचार्यों के व्याकरण मे यह बताया गया हैं की कुरुगूर (सामान्यतः सहस्रगीति के पाशुरों मैं ,हर दशक के अन्तिम पाशुर मैं श्री नम्मळ्वार का नाम होता हैं जिसके पहले कुरुगूर नाम लगा होता हैं जो आळ्वार का अवतार स्थल हैं )सुनते ही हमें दक्षिण दिशा की ओर(जहाँ आळ्वार तिरुनगरि/कुरुगूर हैं) अंजलि करना चाहिए ।

श्री नम्मालवार को प्रपन्न जन कूटस्थर माना जाता हैं यानी प्रपन्नों की गोष्टि मे आपका सबसे प्रथम स्थान हैं । श्री आलवन्दार इन्हें वैष्णव कुल पति करके सम्भोधित करते हैं। श्री आलवन्दार अपने स्तोत्र रत्न के पाँचवे श्लोक मे घोषित करते है की वे श्री वकुलाभिरामन(श्री नम्माळ्वार) के चरण कमलों मैं प्रणाम करते हैं जो उनके और उनके (वर्तमान / भविष्य) अनुचरों के लिये सब कुछ/ सर्वस्व (पिता, माता, पुत्र, संपत्ति इत्यादि) है।

azhvar-emperumanar

आळ्वार शयन करते हुए और उनके श्री कमल चरणों मैं श्री रामानुज स्वामीजी-आळ्वार तिरुनगरि

श्री रामानुज स्वामीजी (जो खुद शेषजी के अवतार हैं)  को “मारन अडि पाणिन्दु उय्न्दवन” कह कर सम्भोधित किया जाता हैं ,जिसका अर्थ हैं वे जिन्होने ने श्री नम्माळ्वार के पादकमलों का आश्रय लेकर समृध्द हुए ।

नम्पिल्लै ,पूर्व आचार्यों के ग्रंथो , अपने ईडू और तिरुविरुतम व्याख्यान के आधार पर यह स्थापित करते हैं की नम्माळ्वार को स्वयं भगवान(एम्पेरुमान) ने अपने वैभव को गाने के लिए और बद्ध जिवात्मो को श्री वैष्णव संप्रदाय में लाने के लिए लीला विभूति से चुना हैं। यह विषय वे स्वयं नम्मालवार के शब्दों से लेकर प्रामाणित करते हैं । एम्पेरुमान अपनी इच्छा से इन्हे परिपूर्ण ज्ञान का अनुग्रह करते हैं जिससे वे भूत, वर्त्तमान और भविष्य काल अपनी आखों के सामने देख सकते हैं । वे अपने दिव्य प्रभंध में कई जगह बताते हैं की स्मरानातीत काल से संसर के दुःख भुगत रहे हैं और यह दुःख इन्से और सहन नहीं होता । वे यह भी कहते हैं की संसर में जीना एक तपते हुए गरम ज़मीन पर बिना पाद रक्षक के खड़े होने के बराबर है । तिरुवाय्मोळि के प्रथम पाशुर में ही नम्मालवार बताते हे की एम्पेरुमान के दिव्य अनुग्रह से ही इनको विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ हैं । यह सब सूचित करते है की एकानक समय में नम्मालवर भी एक बद्ध जीवात्मा थे । यही तर्क अन्य आलवार के विषय में उपयोग कर सकते है क्योंकि :

  • श्री नम्मालवर को अवयवी (सम्पुर्ण) और अन्य आलवारो(आंडाल के आलावा)को अवयव(भाग) माना जाता हैं।
  • अन्य आलवार भी इन्हि की तरह अपने संसारिक दुःख और एम्पेरुमान के विशेष अनुग्रह के बारे में बताते हैं।

नाम्मलवार ने चार प्रभंधो की रचना की हैं । वे इस प्रकार है

  • तिरुविरुत्तम(ऋग वेद सामान )
  • तिरुवासिरियम (यजुर वेद सामान )
  • पेरिय तिरुवन्दादी (अथर्व वेद सामान )
  • तिरुवाय्मोळि (सामा वेद सामान)

इनके चार दिव्य प्रभंध चार वेदों के समान माने जाते हैं । इसी कारण इन्हे “वेदम तमिल सेय्द मारन” नाम से भी सम्बोधित किया जाता हैं । इसका अर्थ हैं की संस्कृत वेदों का सारार्थ तमिल प्रभंधा में अनुग्रह करने वाले मारन । अन्य आल्वारों के प्रभंध वेदों के अंग (जैसे शिक्ष, व्याकरण इत्यादि ) माने जाते हैं और तिरुवाय्मोळि को 4000 दिव्य पशुरो का सार संग्रह माना जाता हैं। अपने पूर्व आचार्यो के सभी ग्रंथ (व्याख्यान और रहस्य ग्रन्थ ) इसी पर आधारित हैं । तिरुवाय्मोळि के पांच व्याखायन है और इसका पूर्ण विषेश विश्लेषण (विस्तृत टिप्पणी) अरुम्पदम मे किया गया है , इसीसे हमे इसके प्रामुख्यता का पता चलता हैं |

अपने पूर्व आचार्य स्थापित करते हे की नम्माळ्वार एक परिपूर्ण गुणों के भण्डार हैं जिनमे श्री देवी , भू देवी ,नीला देवी ,गोपिकाऍ , लक्ष्मण, भरत, ,शत्रुघ्न, दसरथ,कौसल्या, प्रह्लाद, विभीषण ,हनुमान ,अर्जुन इत्यादियों के विशिष्ट गुण समाये हुए हैं लेकिन इन सब में नम्माळ्वार के केवल थोड़े ही गुणों की परिपूर्ति हैं ।

तिरुवाय्मोळि -पलरड़ियार् मुन्बरुळिय(७.१०.५ )  मे नम्पिळ्ळै अति सुन्दरता से नम्माळ्वार की मन की बात बताते हैं । नम्माळ्वार  बताते हैं की एम्पेरुमान् ने बजाय महा ऋषि जैसे श्री वेदव्यास , श्री वाल्मीकि , श्री परासर और तमिल विद्वान मुदल आळ्वार के ,उन्हें तिरुवाय्मोळि गाने के लिए अनुग्रहित किया हैं ।

इस वैभव को ध्यान में रखते हुए ,आईये उनके विशेष चरित्र का ज्ञान प्राप्त करें

नम्माळ्वार जिन्हे अवयवी यानि सम्पूर्ण और शेषाल्वारों को अवयव माना गया है वह (नम्माळ्वार) तिरुक्कुहूर यानि आळ्वार तिरुनगरी जो ताम्रपरणि के तट पर स्थित है वहाँ प्रकट हुए है । केहते है की ताम्रपरणि गंगा यमुना सरस्वती इत्यादि नदियों से भी श्रेष्ठ है क्योंकि वहाँ उस नदी के तट पर नम्माळ्वार प्रकट हुए है ।वह (नम्माळ्वार) प्रप्पन्नकुल वंश के (जो कई पीढियों से है) सदस्य, कारि, नामक व्यक्ति के पुत्र के रूप मे प्रकट होते है । तिरुमळिशै आळ्वार का केहना है की “जो इस प्रपन्नकुल मे जन्म लेते है वे सब भगवान श्रीमन्नारायण को ही पूजते है और किसि अन्य देवता का आश्रय कदाचित भी नहि लेते है” – “मरन्तुम् पुरम् तोळा मान्तर्” (यानि अगर भगवान श्रीमन्नारायण को कदाचित भी भूल जाए लेकिन अन्य देवता का शरण कदाचित नहि लेंगे) । एक तिरुवळुथि वळ नादर थे | उनके सुपुत्र अरन्तान्गियार ,उनके सुपुत्र चक्रपानियार ,उनके सुपुत्र अच्युतर ,उनके सुपुत्र सेन्तमरै कण्णन , उनके सुपुत्र पोर्कारियार , उनके सुपुत्र कारियर और उनके सुपुत्र नम्माळ्वार हैं ।

पोर्कारियार अपने सुपुत्र कारी से गृहस्थ आश्रम स्वीकार कराने का फैसला करते हैं और विलक्ष्ण श्री वैष्णव वधू की तलाश करना आरम्भ करते हैं जिससे पूरी दुनिया को सुधार कर उत्थान करने वाले श्री वैष्णव का जन्म हो । पोर्कारियार तिरुवंपरिसारम पहुँचते हैं और उनकी मुलाकात तिरुवाळ्मार्भर से होती है । जो स्वयं अपने सुपुत्री उदयनंगै के लिए एक श्री वैष्णव वर की खोज में थे । पोर्कोरियार तिरुवाळ्मार्भर से यह विनती करते है कि उनकी बेटी का विवाह उनके बेटे के साथ हो अर्थात उडयनंगै और कारियर का विवाह हो ।

उनकी विनती स्वीकार कर तिरुवाळ्मार्भर, कारी और उदयनंगै का बहुत ही भव्य कल्याण महोत्सव मनाते हैं । कारियर और उदयनंगै तिरुवंपरिसारम के एम्पेरुमान तिरुवाळ्मार्भन का दर्शन पाकर तिरुकुरुगूर लौटते हैं । तिरुकुरुगूर में एक उत्सव का माहोल बना हुआ था ।अयोध्या को जब श्री राम और सीता तिरुकल्याण के अनंतर मिथिला से लोटते है तब अयोध्या वासियों ने अत्यंत भक्ति और आनंद से उनका स्वागत किये ठीक इसी प्रकार तिरुकुरुगूर के वासियों ने भी प्रेम और आनंद के साथ कारियर और उदयनंगै का स्वागत किये ।

कुछ समय के बाद कारियर और उदयनंगै तिरुवंपरिसारम में एम्पेरुमान का दर्शन करके वापसी में तिरुकुरुन्गुड़ी के नम्बी एम्पेरुमान का दर्शन पाकर उनसे एक सुपुत्र की प्रार्थना करते हैं । नम्बी एम्पेरुमान उनकी प्रार्थन स्वीकार करते है और उन्हें वचन देते हैं की वे स्वयं उनके सुपुत्र बनकर आयेंगे । यह सुनकर ख़ुशी ख़ुशी वे तिरुकुरुगूर लौटते हैं । थोड़े दिनों के पश्चात उदयनंगै गर्भ धारण कर लेती हैं । कलियुग के तैंतालीस(43) दिन बाद ,नम्माळ्वार जो स्वयं “तिरुमालाल अरूला पट्ट शठगोपन “(एम्पेरुमान के विशेष अनुग्रह से अवतरित शठगोपन ) एमेरुमान की आज्ञा से , विष्वक्सेनजी केअंश से , बहु धान्य वर्ष, बसंत ऋतु, वैखासी मॉस ,शुक्ल पक्ष, पौर्णमि तिथि ,श्री विशाखा नक्षत्र में प्रकट हुए । जिस प्रकार अळगिय मनवाळ पेरूमाल नायनार अपने आचर्य ह्रदय में बताते हैं , उसी प्रकार इधर कहा जाता हैं की “आदित्य राम दिवाकर अच्युत बनुक्काल्लुक्कू निङ्गात उल्लिरुल नींगी शोषीयाद पिरवीकडल शोषिततु विकसियाद पोदिल कमलं मलारुम्पडी वकुलभुशकण भास्कर उदयं उन्डा इत्तु उदयनंगैइर पूर्व सन्ध्ययिले” – जिसका अर्थ हैं संसारियो का जो अज्ञान और अन्धकार , सूर्य (आदित्य), श्री राम (राम दिवाकर- प्रज्वलित सूर्य के रूप मे इनकी महिमा बताई गयी हैं), श्री कृष्ण (अच्युत भानु-प्रकाशित सूर्य करके संबोधन करते हैं) प्रकट होने पर दूर नहीं हुआ ,वह अज्ञान नम्माळ्वार के प्रकट होने से मिट गया और ज्ञान विकसित हुआ , ऐसे नम्माळ्वार उदयनंगै को जन्म हुए ।
आदिसेशनजी नम्माळ्वार की रक्षा करने के लिए स्वयं इमली के पेड़ के रूप मैं प्रकट हुए ( यह जानकार की नम्माळ्वार तिरुकुरुगूर आदिनाथ एपेरुमान के मंदिर को अपना आश्रय बनायेंगे)

इस के बाद की गतिविधियों को मधुरकवि आल्वार के चरीत्र में पढेंगे।

नम्मालवार की तनियन:
माता पीता युवतय स्थनया विभुथिः
सर्वं य देव नियमेन मद्न्वयानाम
आध्यस्य न कुल पथे: वकुलाभिरामं
श्रीमद तदंग्री युगलं प्रणमामि मुर्धना!!

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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