Monthly Archives: March 2014

पिळ्ळै लोकाचार्य

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण वाळि के अंतर्गत श्री वडुक्कुतिरुवीधिपिळ्ळै के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाळि के अंतर्गत अगले आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के बारें मे चर्चा करेंगे ।

piLLai lokAchArya

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास , श्रावण नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

शिष्यगण – कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – ज्योतिष्कुडि ( मधुरै के पास)

ग्रंथरचनासूचि – याद्रिचिक पडि, मुमुक्षुपाडि, श्रियःपति, परंत पडि, तनि प्रणवम्, तनि द्वयम्, तनि चरमम्, अर्थ पंचकम्, तत्वत्रयम्, तत्वशेखरम्, सारसंग्रहम्, अर्चिरादि, प्रमेयशेखरम्, संसारसाम्राज्यम्, प्रपन्नपरित्राणम्, नवरत्तिनमालै, नवविधासंबंधम्, श्रीवचनभूषणम् इत्यादि

श्रीरंग मे पिळ्ळै लोकाचार्य नम्पिळ्ळै के विशेष अनुग्रह से वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को पुत्र के रूप मे प्रकट हुए ( यह हमने पूर्व अनुच्छेद मे बताया ) । जिस प्रकार अयोध्या मे श्री राम पेरुमाळ और [लक्ष्मण] इळय पेरुमाळ, गोकुल मे श्री कृष्ण भगवान और नम्बि मूतपिरान [बलराम] बडे हुए उसी प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य और उनके छोटे भाई अळगिय मणवाळ नायनार श्रीरंग मे बडे हुए । दोनो भाई हमारे सत्सांप्रदाय के कई आचार्य – नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चानपिळ्ळै, वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै इत्यादि के विशेष अनुग्रह के पात्र हुए । उन्होने अपने पिता के चरण कमलों का आश्रय लेकर सत्सांप्रदाय के बारें मे सीखा । इन दोनों भाईयों ने उनके जीवन काल मे नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करने का शपथ लिया और यह उन दोनो आचार्यसिंहों का विशेष गुण था ।

इस भौतिक जगत मे शोषित जिवात्माओं के प्रति अत्यन्त कारुण्य भावना रखते हुए श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने भगवान श्रीमन्नारायण की असीम कृपा से कई सारे ग्रंथों की रचना किये जो केवल हमारे सत्सांप्रदाय के बहुमूल्य अर्थों को सरल संस्कृत-तमिल भाषा मे दर्शाता है और यह केवल एक आचार्य से शिष्य को व्यक्तिगत आधार पर प्राप्त होता था ।

पिळ्ळै लोकाचार्य अन्ततः हमारे सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक हुए और वे अपने शिष्यों को श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय के विषयों पर आधारित ज्ञान का शिक्षण दे रहे थे । एक बार मणप्पाक्कतु नम्बि देवपेरुमाळ के पास जाकर उनसे शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करते है । देवपेरुमाळ यह स्वीकार कर उन्हे शिक्षण देने लगे । परंतु श्री देवपेरुमाळ बींच मे प्रशिक्षण स्थगित कर मणप्पाक्कतु नम्बि को आदेश देते है कि वह श्री रंग जाये जहाँ इनका स्थगित प्रशिक्षण पुनः आरंभ करेंगे । यह जानकर मणप्पाक्कतु नम्बि खुशी खुशी श्री रंग की ओर निकल पडे । श्री रंग मे स्थित काट्टऴ्गिय सिंगर मंदिर पहुँच कर वह श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के कालक्षेप घोष्टि को देखते है । एक स्तंभ के पीछे छुपकर वह प्रवचन को सुनते हुए उन्हे आश्चर्य होता है कि वह अपने स्थगित प्रशिक्षण को पुनः सुन रहे थे । यह जानकर वह उनके समक्ष प्रत्यक्ष हुए और उनसे पूछा –  अवरो नीर ( क्या आप देव पेरुमाळ है ? ) और पिळ्ळै लोकाचार्य ने कहा – अवतु , येतु ( जी हाँ , अब क्या करुँ) .. यह घटना से स्पष्ट है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है और इसे हमारे पूर्वाचायों ने स्वीकार किया है ।

एक और घटना घटी जिसका विवरण यतीन्द्रप्रणवप्रभावम् मे है जो यह साबित करता है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अन्तिम काल के दौरान, ज्योतिष्कुडि मे अपने शिष्य नालुर पिळ्ळै को उपदेश देते है की वह तिरुमलै आऴवार को सत्संप्रदाय के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दे । उसके बाद जब नालुरपिळ्ळै और तिरुमलै आऴवार देव पेरुमाळ के दर्शन हेतु गए तब श्री देव पेरुमाळ ने स्वयम नालुर पिळ्ळै को संबोधित करते हुए कहा – मैने जिस प्रकार ज्योतिष्कुडि मे तुम्हे उपदेश दिया की तुम्हे जरूर तिरुमलै आऴवार को अरुलिच्चेयल् के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दो — अब तक आपने क्यों मेरे आदेशों का पालन नहि किया ?

पिळ्ळै लोकाचार्य ने मुमुक्षुवों (यानि जो जीवात्मा भगवद्-कैंकर्य मोक्ष के प्रति आसक्त है) के उत्थापन हेतु भगवान कि असीम कृपा से कई ग्रंथों की रचना किये । उन मे से अठारह ग्रंथ केवल हमारे सत्-सांप्रदाय के विशेष दृष्टिकोण को दर्शाता है (यानि सांप्रदाय के गुडार्थों) [जैसे – रहस्य त्रयम्, तत्व त्रयम्, अर्थ पंचकम्, इत्यादि] जो नम्माऴ्वार के तिरुवामोऴि पर आधारित है । इन मे से निम्नलिखित श्री वैष्णवों के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण है  –

1) मुम्मुक्षुप्पडि – यह एक रहस्य ग्रंथ है जिसमे श्री पिळ्ळैलोकाचार्य ने रहस्य त्रय – {तिरुमंत्र (अष्टाक्षरी मंत्र), द्वयमहामंत्र, चरमश्लोक} का विवरण बहुत ही उत्कृष्ट और सरल सूत्रों मे दिया है । इसी ग्रंथ पर श्री मनवाळ मामुनि ने टिप्पणि लिखे । यह एक ऐसा मूल ग्रंथ है जिसके बिना प्रत्येक श्रीवैष्णव रहस्य त्रय की महिमा और वैभव कभी नही जान सकता ।

2) तत्व त्रय – यह ग्रंथ कुट्टि भाष्य ( छोटा श्री भाष्य ) के नाम से प्रसिध्द है । यह ग्रंथ श्री भाष्य पर आधारित है जिसमे स्वामि पिळ्ळै लोकाचार्य ने तीन तत्वों (चित, अचित, ईश्वर) का सारांश सरल सूत्रों मे बतलाया है । और फिर श्री मामुनि के व्याख्यान के बिना हम इस ग्रंथ के वैभव और महिमा कदाचित नहि जान पायेंगे ।

3) श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र – यह ग्रंथ की रचना केवल और केवल पूर्वाचार्य और आऴ्वारों के दिव्य कथन पर आधारित है । यह ग्रंथ श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का महान काम है जिसमे हमारे सत्-सांप्रदाय के गूडार्थों का स्पष्टीकरण है । यह ग्रंथ सत्सांप्रदाय के गोपनीय अर्थों को दर्शाता है और श्री मामुनि इस ग्रंथ पर आधारित अपनी टिप्पणि मे इसका स्पष्टीकरण देते है । तिरुनारायणपुरत्तु आयि ने इस ग्रंथ पर टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

अनुवादक टिप्पणि – प्रत्येक श्रीवैष्णव का कर्तव्य है की अपने जीवन काल मे एक बार इन ग्रंथों पर आधारित कालक्षेप ज़रूर सुने ।

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए ।  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए । हलांकि प्रमाणरक्षक के होने के बावज़ूद वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] । कहते है जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे ।

वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परम पद को प्रस्थान हुए ।

मणवाळ मामुनि अपने उपदेशरत्तिनमालै मे श्री पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित करते हुए उनके दिव्य शास्त्रों मे श्री वचनभूषण को और भी अत्यधिक गौरन्वित किये । इस दिव्य ग्रंथ मे मामुनि आळ्वारो के अवतारों , पूर्वाचार्यों के अवतारों , श्री रामानुजाचार्य की कृपा ( जिन्होने इस सत्सांप्रदाय का आरंभ किया और जिसमे सभी लोग आमंत्रित है और जहा योग्य/अयोग्य नहि देखा जाता है ) तिरुवाय्मोळि पर आधारित टिप्पणियों का उल्लेख इत्यादि और श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का असीमित वैभव और अन्ततः श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव और इस ग्रंथ मे लिखित सूत्रों के अर्थों का सार हम सब के लिए प्रस्तुत किये । श्री मामुनि कहते है – प्रत्येक श्री वैष्णव को श्री वचनभूषण मे प्रस्तुत सूत्रार्थों का पालन हमारे जीवन मे अत्यावश्यक है और इस प्रकार पालन करने से हम सभी निश्चित रूप से एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) के कृपा के पात्र होंगे । श्री मामुनि कहते है – अगर हमे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों के ज्ञान और अनुष्ठान (सदुपदेश और सात्विक जीवन) पर विश्वास नहि है और अपने बुद्धि से खुद के अर्थ , ज्ञान , व्याख्या , तर्क इत्यादि की रचना करें तो केवल वह हमारे अज्ञान को दर्शाता है । मामुनि जो कभी भी अपने व्याख्यानों मे या कालक्षेपों मे अपशब्दों का प्रयोग नहि करते परन्तु उन्होने कई बार मूर्ख शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि वे यहाँ उन लोगों का निर्दयता को दर्शाते है जिन्हे पूर्वाचार्यों के श्री सूक्तियों पर विश्वास नहि है और इस विश्वास के बिना वे लोग श्री वैष्णव होने का अभिनय करते है ।  इस प्रकार श्री वचनभूषण पर आधारित तत्वसार को श्री मामुनि ने अपने उपदेश रत्तिनमालै मे प्रस्तुत किया है ।

वेदान्ताचार्य ( श्री निगमान्त महा देशिकन् ) ने एक बहुत हि सुन्दर अनोखे प्रभंध की रचना किये जिसे हम लोकाचार्य पंचाशत के नाम से जानते है जिसमे केवल और केवल पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित किया गया है । हलांकि वेदान्ताचार्य  पिळ्ळै लोकाचार्य के उम्र के तुलना मे पच्चास वर्ष छोटे थे परन्तु पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति उनकी श्रद्धा और प्रशंसा गौरवनीय है और इस ग्रंथ का पाठ तिरुनारायणपुरम के हर रोज़ होता है । अंग्रेज़ी भाषा मे इस ग्रंथ का सरल अनुवाद श्री ऊ.वे टी सी ए वेंकटेशन स्वामि द्वारा प्रस्तुत है – http://acharya.org/books/eBooks/vyakhyanam/LokacharyaPanchasatVyakhyanaSaram-English.pdf.

इस प्रकार हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के असीमित विशेष वैभव और महिमा को समझने मे सक्षम हुए है जिन्होने हमारे सत्साम्प्रदाय के संरक्षण हेतु अपना जीवन समर्पित किया । प्रत्येक व्यक्ति जो अपने आप को श्रीवैष्णव से संभोधित करता है उसे पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति असीमित श्रद्धा और कृतज्ञता [उपाकार स्मृति] होनी चाहिये क्योंकि उनके बिना ना हम नम्पेरुमाळ को देख पायेंगे और ना हि एम्पेरुमानार दर्शन के गूडार्थों को समझ पायेंगे ।

हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के चरण कमलों का आश्रय लेकर प्रार्थना करे की हम सभी को भगवान और अपने आचार्य के प्रती सत्भावना हो  ।

पिळ्ळै लोकाचार्य का तनियन् –

लोकाचार्य गुरवे कृष्ण पादस्य सूनवे । संसार भोगि संतष्ठ जीव जीवातवे नमः ॥

पिळ्ळै लोकाचार्य और उनकी घोष्टि का मंगलाशासन –

वाळि उलगासिरियन् वाळि अवन् मन्नु कुलम् | वाळि मुडुम्बै एन्नु मानगरम् ||

वाळि मनम् चूळ्न्त पेरिन्ब मल्गुमिगु नल्लार् | इनम् चूळ्न्तु इरुक्कुम् इरुप्पु ||

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

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वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद (लेख) मे ओराणवाळि के अन्तर्गत श्री नम्पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा की थी । आगे बढते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के बारे मे चर्चा करेंगे ।

vadakkuthiruveedhipillai

तिरुनक्षत्र – ज्येष्ट मास स्वाति नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – नम्पिळ्ळै

शिष्यगण – पिळ्ळैलोकाचार्य, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – तिर्वरुंगम

ग्रन्थ सूची – ईडु 3000 पाडि

श्री कृष्णपादर के रूप मे जन्म लेकर, वे वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के नाम से प्रसिध हुए । वे नम्पिळ्ळै के शिष्यगण मे से उनके प्रधान महत्वपूर्ण  शिष्य हुए ।

हलांकि गृहस्थाश्रम मे होने के बावज़ूद वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै शुरू से ही आचार्य निष्ठा मे सदैव स्तिथ थे और उनहे संतान पैदा करने के विषय मे संबन्धरहित इच्छा व्यक्त किया करते थे । यह जानकर उनकी माँ उनके गुरू श्री नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे अपने सुपुत्र के विरुद्ध शिकायत करती है । श्री नम्पिळ्ळै यह जानकर उनके शिष्य वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी सत्पत्नी को अपने घर आने का आमंत्रण देते है । आमंत्रण पाकर खुशी से आचार्य के घर जाकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी पत्नी आचार्य के कृपा के पात्र बने और फिर आचार्य नम्पिळ्ळै ने वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै को सन्तान पैदा करने के कार्य मे संलग्न होने का उपदेश दिया । आचार्य के सदुपदेश पाकर स्वामि पिळ्ळै उस कार्य को आचार्य प्रीति के लिये संपूर्ण करते है । आचार्य का विशेष अनुग्रह पाकर श्री पिळ्ळै को एक सत्पुत्र की प्रप्ति होति है और स्वमि पिळ्ळै अपने सत्पुत्र का नाम – श्री पिळ्ळै लोकाचर्य रखते है [जो लोकाचार्य {नम्पिळ्ळै} के विशेष अनुग्रह से प्राप्त हुआ] । श्री पिळ्ळै अपने आचार्य को यह बताते है तब उन्हे पता चलता है कि आचार्य नम्पिळ्ळै की सोच कुछ और ही थी । नम्पिळ्ळै नवजात शिशु का नाम अळगिय मनवाळन  रखना चाहते थे । अपने आचार्य का विचार जानकर स्वामि पिळ्ळै को भगवान [अळगिय मणवाळन – नम्पेरुमाळ] और आचार्य की असीम कृपा से फिर से एक नव जात शिशु को जन्म देते है जिनका नाम अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार रखा गया । तो कुछ इस प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दो विशेष रत्नों को जन्म देकर हमारे सत्सांप्रदाय को गौरान्वित और वैभवशालि ख्याति दिये । हमारे पूर्वाचार्यों  वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै की तुलना पेरियाळ्वार से करते है और इसी तुलना मे कुछ विशेष उल्लेख प्रस्तुत है –

पेरियाळ्वार और वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै दोनो ही ज्येष्ठ मास स्वाति नक्षत्र मे अवतरित हुए ।

पेरियाळ्वार ने भगवान की असीम कृपा से तिरुप्पळ्ळाण्डु , पेरियतिरुमोळि नामल दिव्यप्रबंधो की रचना किये । स्वामि वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने ईडु (छत्तीस हज़ार) पाडि नामक टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

जिस प्रकार पेरियाळ्वार ने आण्डाळ को हमारे सत्सांप्रदाय को सौंपा और उनका पालन पोषण कृष्णानुभव मे हुआ उसी प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने अपने दो दिव्यरत्नों जैसे सत्पुत्रों का पालन पोषण भगवद्-विषय मे किया ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै नम्पिळ्ळै के तिरुवाय्मोळि पर आधरित प्रसंगो को हर रोज़ सुनते थे और अपने आचार्य के संबन्ध मे अपना समय व्यतीत करते थे । उसी दौरान वो हर रोज़ रात को इन प्रसंगो को ताम्र पत्रों मे लिखने का कार्य किया करते थे । अतः इस प्रकार श्री नम्पिळ्ळै के प्रसंगो को लिखकर ईडु (छत्तीस हज़ार) नामक ग्रंथ श्री नम्पिळ्ळै के ज्ञान के बिना अवतरित हुआ ।

एक बार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै अपने आचार्य को अपने तिरुमालिगै ( घर ) मे तदियाराधन के लिये आमंत्रित करते है और आमंत्रण स्वीकार कर खुशी से श्री नम्पिळ्ळै उनके तिरुमालिगै जाते है । नम्पिळ्ळै खुद आराध्य पेरुमाळ का तिरुवाराधन शुरू करते है और उसी दौरान उनकी दृष्टि वहाँ पडे ताम्रपत्रों की ओर जाति है । स्वभावतः आकृष्ट स्वामि नम्पिळ्ळै उन ताम्रपत्रों को पढने लगे और फिर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे – पिळ्ळै ये क्या है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने कहा – स्वामि , प्रिय आचार्य – यह आपके प्रसंग है जो तिरुवाय्मोळि पर आधारित है जिनको मैने सुरक्षित यथारूप ताम्रपत्रों पर बिना आपके ज्ञान के लिखा और इसका खेद मुझे है इसीलिये कृपया कर मुझे माफ़ करे । स्वामि नम्पिळ्ळै पेरिवाच्चानपिळ्ळै और ईयुन्निमाधवपेरुमाळ को इस ग्रंथ को पढने का आदेश देते है । वे दोनो यह ग्रंथ पढकर इस ग्रंथ की प्रसंशा अत्यन्त हर्ष से करते है । स्वामि नम्पिळ्ळै यह जानकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे –  क्यो तुमने अपने बलबूते स्वतंत्र निर्णय लेकर यह कार्य किया ? क्या यह पेरियवाच्चानपिळ्ळै के व्याख्यान के बराबरि  मे किया गया कार्य है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै यह सुनकर शर्मिन्दा हो गये और फिर अपनी गलती मानकर अपने आचार्य की शरण लेकर कहा – मैने यह इसी लिये किया ताकि मै भविष्य मे वापस पढकर इसका उपयोग मेरे जीवन मे कर सकूँ ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दृढ़ विश्वस्वनीय कथन को सुनकर अती प्रसन्न नम्पिळ्ळै ने कहा – निश्चित है की तुम एक विशेष अवतार हो जिसने नष्टरहित यह ग्रंथ प्रस्तुत किया और इसीलिये यह ग्रंथ वह श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ को सौपेंगे जो अपने वंश के उत्तराधिकारियों समझायेंगे और कुछ इस तरह यह ग्रंथ अन्ततः श्री मणवाळमुनि को बतलाया गया और मणवाळमुनि ने यह ग्रंथ हम सब लोगों के लिये प्रस्तुत किया । भगवान की असीम कृपा से नम्पिळ्ळै पूर्वानुमान लगा सके की यह ग्रंथ श्री मणवाळमुनि के द्वारा पूरे विष्व मे इस ग्रंथ का खुलासा होगा और यह तभी हो सकेगा जब यह ग्रंथ श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ के वंश के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होकार मणवाळमुनि को अन्ततः प्राप्त होगा ।

नन्जीयार परमपद को प्रस्थान होने पश्चात वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै हमारे सत्सांप्रदाय के अगले दर्शनप्रवर्तकाचार्य हुए । वे अपने पुत्रों [पिळ्ळै लोकाचार्य, अळगियमणवाळनायनारपेरुमाळ] को दिव्य गूडार्थों का सार समझाये । अपने अन्तिम काळ अपने आचार्य के दिव्यमंगल गुणों का विचार करते हुए वे अपना भौतिक शरीर त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए ।

अनुवादक टिप्पणि –

पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्री वचनभूषण दिव्यशास्त्र मे वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दिव्य उपदेशों को दर्शाते है जिसके उदाहरण निम्नलिखित है –

सूत्र 77 – कहा गया है जब अहंकार का ताग पूर्ण तरह होता है , तभी एक जीवात्मा “अडियेन” कहलायेगा । यह दिव्य उपदेश का विवरण वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दिया जो “यतीन्द्रप्रणवम” नामक ग्रंथ मे लिखित है ।

सूत्र 43 – पिळ्ळैलोकाचार्य इस सूत्र मे दर्शाते है की प्रत्येक जीवात्मा अपने स्वातंत्र से इस भौतिक जगत मे अंगिनत असंखेय चिरकाल से बद्ध है और इन जिवात्मावों का उद्धार तभी होगा जब वे एक सदाचार्य श्रीवैष्णव का शरण लेंगे ।

हम सब श्री वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए यह प्रार्थना करें की हम सब भी उनकी तरह श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती प्रेम,आसक्ती,अनुरक्ति भावना जाग्रुक करें।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै तनियन –

श्री कृष्ण पाद पादाब्जे नमामि सिरसा सदा । यत्प्रसाद प्रभावेन सर्व सिद्धिरभून्मम ॥

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

नम्पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “नन्जीयर” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य ( नम्पिळ्ळै) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवल्ळिकेणि

तिरुनक्षत्र : कार्तिक मास , कृत्तिका नक्षत्र

अवतार स्थाल : नम्बूर

आचार्य : नन्जीयर

शिष्य :वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि

परमपद प्रस्थान: श्री रंगम से

रचना : तिरुवाय्मोळि के ३६००० पडि ईडु व्याख्यान, कण्णिनुन् सिरुताम्बु व्याख्यान, तिरुवन्दादियों के व्याख्यान, तिरुविरुत्तम् व्याख्यान

नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

पेरिय तिरुमोळि ७.१०.१० में बतलाया जाता हैं की – तिरुकण्णमंगै एम्पेरुमान् तिरुमंगै आळवार् के पासुरों का अर्थ स्वयं उन्ही कि बोली में सुनना चाहते थे  – इसी कारण माना जाता हैं कि कलियन नम्पिळ्ळै हुए और एम्पेरुमान् पेरियवाच्चान पिळ्ळै के रूप में पुनरावतार लेकर अरुलिच्चेयल के सकल अर्थ उनसे सुने और सीखें।

नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बनाना चाहा । जब श्री वैष्णव गोष्टि में विचार किया  तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । वरदराजर कावेरी के उस पार स्थित अपने स्वग्राम को जाकर लिखने कि योचना किये ताकि वोह लिखने पे ध्यान देकर जल्दी से समाप्त कर सके । नदि पार करते समय अचानक से बाड़ आ जाती हैं और वरदराजर तैर कर अगले तट पहुँचते हैं । तैरते समय मूल प्रति जो उनकी हाथों में थी छूट जाती हैं और वे बर्बाद हो जाते हैं । स्वग्राम पहुँचकर अपने स्वग्राम पहुँचकर आचार्य के दिव्यमंगलस्वरूप और उनके द्वारा बतलाये गए दिव्यार्थों पर ध्यानकेंद्रित कर वापस ९००० पड़ी व्याख्यान लिखना शुरू कर देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ  बताते हैं और नन्जीयर सुनके प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं ।

जिस प्रकार भट्टर और नन्जीयर के बींच का रिश्ता और उनके संवाद ( संबन्ध ) थे , उसी प्रकार नन्जीयर और नम्पिळ्ळै के बींच का रिश्ता और संवाद अती आनन्ददायक और अत्युत्तम ज्ञानार्थों  से भर्पूर थे | इन्के बींच हुए संवाद आप भगवद्बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे प्रस्तुत है  :

  • नन्जीयर से नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि क्यूँ जब उपयान्तर (अनेक उपाय) के लिए बहुत सारे प्रमाण हैं लेकिन शरणागति को कोई प्रमाण नहीं हैं । नन्जीयर पहले बताते हैं कि जब कोई विषय प्रत्यक्ष से जान सकते हैं उसे प्रमाण कि जरूरत नहीं होती हैं – उदाहरण बताते हैं कि  डूबता हुआ मनुष्य किसी साधन लेकर पकड़ कर ठहरता हैं या उसे थाम लेता हैं जो नहीं डूब रहा हैं – ठीक उसी तरह हम संसार में डूब रहे हैं और एम्पेरुमान् वोह हैं जो डूब नहीं रहे हैं और एम्पेरुमान् कि शरण लेना बहुत उचित उपाय हैं । अनन्तर वे शरणागति शास्त्र कि मान्यता बताते हुए शास्त्र से कुछ प्रमाण दिखाते हैं । वे कहते हैं कि एक विषय कि मान्यता उस पर आधारित प्रमाणो कि गिनती से नहीं किया जाता – उदाहरण के लिए इस संसार में संसारि ज्यादा और संन्यासी कम हैं , इसका मतलब यह नहीं हैं कि संसारि होना उचित हैं । यह जवाब सुनकर नम्पिळ्ळै प्रसन्न हो जाते हैं ।
  • नम्पिळ्ळै नन्जीयर से पूछते हैं कि कब एक मानव स्वयं को श्रीवैष्णव मान सकता हैं ?नन्जीयर उत्तर देते हुए बताते हैं कि जब अर्चावतार में परतत्व पेहचान सकेंगे , जब अन्य श्री वैष्णव के संतान और धर्म पत्नी को स्वपरिवार के सभ्य कि तरह मानते हैं (उन का लगाव स्वपरिवार और अन्य श्री वैष्णव के परिवार पर सामान रहेगा ) और जब अन्य श्री वैष्णव बेइज्जात करें उसे खुशी के साथ स्वीकार कर सकते हैं तब हम खुद को श्री वैष्णव कह सकते हैं ।
  • जब नम्पिळ्ळै नन्जीयर के पास श्री भाष्यम् सुन रहे थे तब नन्जीयर उन्हें आदेश देते हैं कि वे उनके एम्पेरुमान् का तिरुवाराधन करें । नम्पिळ्ळै उनसे कहते हैं कि तिरुवाराधन का क्रम उन्हें पता नहीं हैं तब नन्जीयर उनसे कहते हैं कि द्वय महा मंत्र (मध्य में सर्व दिव्य मंगल विग्रहाय “जोड़कर करने से अर्चावातर में एम्पेरुमान् के सौलभ्य गुण प्रकाशित होती हैं जो मूर्ति में उनकी व्यापन सूचित करती हैं । ) जपते हुए करें | इससे हमे यह साबित होता हैं कि अपने पूर्वाचार्य सब विषयों के लिए द्व्य महा मन्त्र पर पूरी तरह से निर्भर थे ।
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि एम्पेरुमान् के अवतारों का प्रयोजन क्या हैं ? नन्जीयर उन्हें बताते हैं कि एम्पेरुमान् ने बड़े-बड़े कार्य अपने कंधे पे ले लिया हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कि जो कोई भी भागवत अपचार करेंगे उन्हें उचित तरह से दण्डित किया जा सके । ( उदाहरण के लिया कण्णन् एम्पेरुमान् (भगवान श्री कृष्ण ) ने खुद बहुत कष्ट सहन करके यह पक्का करते हैं कि दुर्योधन जो उनके भक्त के प्रति अपचार किया हैं उसे अंत में मरन दण्ड प्राप्त हो  )
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि भागवत अपचार का मतलब क्या होता हैं ? नन्जीयर बताते हैं कि अन्य श्री वैष्णव को खुद को समान मानना। वे आळ्वारों के कई पासुरों को उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत करते हुए दर्शाते है की भागवत ( भगवान के प्रपन्न भक्त ) कैसे सर्वश्रेष्ट उत्तम और महान है । इस विषय को ध्यान मे रखते हुए हमे सदैव यह मानना चाहिये की प्रत्येक श्रीवैष्णव (जो कोई भी जाति / वर्ण इत्यादि से हो) हमेशा हमारि तुलना मे उत्तम और सर्वश्रेष्ट है । । वे यह भी कहते हैं कि आळ्वार और पूर्वाचार्यों कि तरह हमें भी सदैव भागवतों कि स्तुति करनी चाहिए ।
  • नन्जीयर नम्पिळ्ळै से कहते हैं कि भगवत अनुभव में निमग्न हुए भक्तों को इतर लोक के विषय अनुभव जैसे ऐश्वर्य , अर्थ ,काम पूरी तरह से त्यजनीय हैं । इस विषय को आळ्वार के कई पासुरों को उदाहरण लेकर समझाते हैं । उदाहरणों के लिये – नन्जीयर तिरुमंगै आळ्वार की वार्ता को दोहराते है । वे कहते है – तिरुमंगै आळ्वार ने भौतिक जगत के प्रति अपने आसक्ति का त्याग कर दिया जब उनको भगवान के दिव्यगुणो और वैभव का एहसास हुआ और तुरन्त अपने दिव्यप्रबंध को शुरू करते हुए उन्होने कहा – ” वाडिनेन वाडि  .. नारायणा एन्नुम् नामम् ”  ( जिसका मतलब हैं कि एम्पेरुमान् ( भगवान ) भगवान का दिव्यनाम ( तिरुनामम् ) मिलने तक मैं संसार के हाथों में दुःख झेल रहा था ) । यह सुनने के बाद नम्पिळ्ळै तुष्ट हो जाते हैं और उसी क्षण से उनका कैंकर्य करते और कालक्षेपं सुनते नन्जीयर के साथ रह जाते हैं ।
  • नन्जीयर तिरुवाय्मोळि कालक्षेप १०० बार करते हैं और नम्पिळ्ळै उनके लिए सदाभिषेक महोत्सव का आयोजन करते हैं । नन्जीयर के इन कालाक्षेपों के द्वारा पूर्वाचार्यों से दिये गए सारे अर्थ विशेषों का लाभ पाते हैं ।

नम्पिळ्ळै कई अनोखे लक्षण के समाहार हैं और उनकी महानता नाप नहीं सकते हैं । नन्जीयर तमिल (द्राविद), संस्कृत भाषा और भाषासंबंधित साहित्य मे असामान्य तौर से निपुण थे । उनके उपदेशों में वे तिरुक्कुरळ , नन्नुळ , कम्ब रामायणम् इत्यादि द्राविड़ ग्रंथों से और वेदान्तम् , विष्णु पुराण , श्री वाल्मीकि रामायण इत्यादि ग्रन्थ से कई उदाहरण बिना कुछ संकोच के साथ बताते थे । नन्जीयर इतने सक्षम और माहिर थे की वे किसी की भी शंखा (जो आळ्वारों और उनके अरुलिच्चेयल् पर आधारित हो) को श्रीमद्वाल्मीकि रामायण (जिसे प्रत्येक वैदिक व्यक्ति सर्वोच्च मानते थे) के मूल सिद्धांतो पर आधारित तर वितर्क से संतोषजनक समाधान से संतुष्ट करते थे । आईये देखें कुछ घटनाये जो उनकी महानता और विनम्रता को दर्शाती हैं ।

  • नम्पिळ्ळै श्री रंगम पेरिय कोविल मूल स्थान में प्रदक्षिण करने कि पूर्व दिशा (पेरिय पेरुमाळ तिरुवडि कि ओर ) में नित्य अपना भाषण देते थे । इसी कारण आज भी हम सन्निधि में दर्शन होने के बाद उस प्रदेश में प्राणाम करते हैं । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी तोडा हैं ।

  • नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे ।
  • नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं , उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे । तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कियी होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं । इस संघटन को मामुनिगळ अपनी उपदेश रत्न माला में बताते हुए नम्पिळ्ळै और तोळप्पर को गौरवान्वित करते हैं । इसी से हम नम्पिळ्ळै कि निश्चलता/पवित्रता जान सकते हैं । हम यह भी जान सकते हैं इस घटना के बाद तोळप्पर भी नम्पिळ्ळै के सहवास से पवित्र होते हैं ।
  • नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावन देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

नम्पिळ्ळै के जीवन में ऐसे कई संघटन हैं जहाँ वे उनके शिष्यगण को अमूल्य पाठ और उपदेश देते है | आप भगवद्-बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे इसका उल्लेख है :

  • एक बार नम्पिळ्ळै अपने शिष्य गण के साथ तिरुवेळ्ळरै से वापस नाव मे आ रहे थे , उसी समय नाविक ( नौका चलाने वाला ) ने अपने दृष्टिकोण से कहा – कावेरी मे बाढ आया है और इस कारण उपस्थित गोष्टि मे किसी एक व्यक्ति को नदी के पानी मे कूदना होगा जिससे नाव संतुलित रहेगा और नम्पिळ्ळै बच जाए । यह सुनते ही एक बूढ़ी औरत बाढ के पानी में कूद पड़ती है और यह देखकर नम्पिळ्ळै दुःखित हो जाते हैं । जब वे तट पहुँचते हैं तब उस बूढ़ी औरत कि आवाज़ नजदीकि द्वीप से सुनायी देती हैं । बूढ़ी औरत बताती हैं कि नम्पिळ्ळै प्रत्यक्ष हो कर उनकी रक्षा किये । इस संघटन मे बूढी औरत यह स्पष्ट रूप से दर्शाति है की किस तरह उन्होने अपने प्राण-त्याग करके अपने आचार्य की सेवा की उसी प्रकार हमे भी करना चाहिये । नम्पिळ्ळै ने यह दर्शाया है की कैसे एक आचार्य विपरीत परिस्थितियों मे अपने निर्भर शिष्यों का संरक्षण कैसे करे ।
  • नम्पिळ्ळै के समीप एक घर मे एक श्री वैष्णव स्त्री रहती थी । एक दिन श्री वैष्णव उस औरत के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि अगर वे उनका घर नम्पिळ्ळै के घर से मिला दें तब उनका घर (तिरुमालिगै) बड़ा हो जायेगा और बहुत सारे श्रीवैष्णवों के लिये आश्रय होगा । पहले उनकी विनती को अस्वीकार कर देती हैं लेकिन बाद में नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि उनके घर के बदले में उन्हें परम पद में स्थान अनुग्रह करें । नम्पिळ्ळै एक पत्र लिख कर उसके हाथ में देते हैं । उस पत्र को लेकर थोड़े दिन के बाद अपना चरम शरीर छोड़कर औरत परमपद प्राप्त कर लेती हैं ।
  • नम्पिळ्ळै की दो पत्निया थी । एक बार उनकी पहली पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । उनकी दूसरी पत्नी से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । वे उत्तर देते हैं कि नम्पिळ्ळै उनके प्रिय पति हैं । नम्पिळ्ळै उनसे पहले पत्नी की सहायता करके श्री वैष्णव का प्रसाद पाने के लिए कहते हैं । वे कहते हैं श्री वैष्णवों का शेष प्रसाद पाने से उनका शुद्धिकरण होगा और उनके लौकिक विचार (पति-पत्नि) आध्यात्मिक (आचार्य-शिष्य) विचारों मे बदलेंगे ।
  • जब महा भाष्य भट्टर उनसे पूछते हैं कि जब अपनी निज स्वरुप (चैतन्य) एहसास होने के बाद श्री वैष्णव की सोच कैसी होनी चाहिए । नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि ऐसे श्री वैष्णव नित्य एम्पेरुमान् ही उपाय और उपेय मानना चाहिए , स्मरणातीत काल से सँसार के इस बिमारी के चिकित्सक आचार्य के प्रति कृतज्ञता से रहना चाहिए, एम्पेरुमानार के श्रीभाष्य द्वारा स्थापित सिद्धान्तों को सत्य मानना चाहिये , श्री रामायण के द्वारा भगवद् गुणानु भव करना चाहिए , अपना सारा समय आळ्वारों के अरुळिचेयल में बिताना चाहिए । अंत में कहते हैं कि यह दृढ़ विशवास होना चाहिये की इस जीवन के अंत में परमपद की प्राप्ति निश्चित हैं ।
  • कुछ श्री वैष्णव पाण्ड्य नाडु से नम्पिळ्ळै के पास आकर पूछते हैं की अपने साम्प्रदाय का मूल तत्व क्या हैं । नम्पिळ्ळै उनसे समुद्र तट के बारे में सोचने के लिए कहते हैं । चकित होक पूछते हैं कि समुद्र तट के बारे में क्या सोचने कि लिए हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि चक्रवर्ति तिरुमघन श्री राम रावण से युद्ध करने के पहले समुद्र तट पर शिविर में विश्रान्त ले रहे थे और वानर सेना उनकी रक्षा के लिए उस इलाके कि चौकीदारी कर रहे थे । ठकान के कारण वानर सेना सो जाती हैं और एम्पेरुमान् उनकी रक्षा करने उस इलाके कि चौकीदारी करने में झुट जाते हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि एम्पेरुमान् हमें सोने के वक्त भी रक्षा करते हैं और इसलिए उन पर अटूट विश्वास होना चाहिए कि वे ज़रूर हमें जागृत अवस्था में भी रक्षा करेंगे । यथा हमें स्व रक्षणे स्वान्वयम् ( खुद अपने आप कि रक्षा करने कि मनो दृष्टी ) को छोड़ देना चाहिए ।
  • अन्य देवि देवताओं के भजन के बारे में नम्पिळ्ळै ने अद्भुत रूप से विवरण दिया हैं । एक बार उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब स्मशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।
  • एक श्री वैष्णव उनसे मिलने आते हैं और बताते हैं कि वे पहले से भी बहुत दुबले हो गए हैं । नम्पिळ्ळै उत्तर देते है कि जब आत्मा उज्जीवन कि दिशा में बढ़ती हैं अपने आप शरीर घट जाता हैं ।
  • दूसरी बार एक श्री वैष्णव उन्हें देखकर कहते हैं कि वे बलवान नहीं लग रहे हैं तब नम्पिळ्ळै कहते हैं उनके पास एम्पेरुमान् कि सेवा करने के लिए शक्ति हैं जो खाफी हैं और बलवान होकर उन्हें कोई युद्ध लड़ने नहीं जाना हैं । इससे यह निरूपण होता हैं कि श्री वैष्णव को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने कि चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।
  • जब नम्पिळ्ळै अस्वस्थ्य हो जाते हैं तब एक श्री वैष्णव बहुत चिन्ति हो जाते हैं । उन्हें देखकर नम्पिळ्ळै बताते हैं कि किसी भी तरह कि कष्ट भुगतनेलायक हैं क्योंकि शास्त्र में बताया गया हैं कि एम्पेरुमान् के कमल चरणों में आत्मा समर्पण किये महान लोग मृत्यु देवता को ख़ुशी – ख़ुशी आमन्त्रित करते हैं ।
  • उस दौर नम्पिळ्ळै के प्रति प्रेम के कारण और उन्हें अस्वस्था से राहत दिलाने के आकाँक्षी कुछ श्री वैष्णव एक रक्षा कि डोर बाँधना चाहे और एङ्गलाळ्वान के आदेश के अनुसार नम्पिळ्ळै रक्षा बँधवाने के लिए ना करते हैं । इस नाकरात्मित्कित को कुछ श्री वैष्णव प्रश्न करते हुए कहते हैं “यह शायद ठीक हैं कि एक श्री वैष्णव अपने शरीर के बारे में चिंताक्रान्त ना हो लेकिन उनसे क्या भूल हुयी हैं जब वे अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था के बारे में चिन्ता करें । नम्पिळ्ळै विवरण देते हुए कहते हैं कि अगर अपने खुद कि अस्वस्था का इलाज़ करने कि कोशिश करें तो उससे यह पता लगता हैं कि हमें स्वस्वरूप ज्ञान जिससे यह प्राप्त होता हैं कि हम केवल एम्पेरुमान पे ही पूरी तरह से निर्भर हैं । अगर हम अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था का इलाज़ के बारे में सोच रहे हैं तब यह साबित होता हैं कि हमें एम्पेरुमान का ज्ञान और शक्ति के बारे में पूरी अवगाहन नहीं हुआ कि भक्तों कि बाधाएँ दूर करने के लिए एम्पेरुमान पे निर्भर होना चाहिए । नम्पिळ्ळै कि निष्ठा इस प्रकार कि थी और वोह अपनी पूरी जिंदगी उस के अनुसार थे । इसी समय हमें यह भी जान लेना चाहिए कि श्री वैष्णव के कष्ट देखकर उसके बारे में चिन्ता करना अपना कर्तव्य हैं जैसे मारिनेरी नम्बि ने आळवन्दार् के दुख को देखकर किया था ।
  • नम्पिळ्ळै के शिष्य कई आचार्य पुरुष के परिवारों से थे और श्री रंगम में सब उनके समय को नल्लड़िकाल्(सबसे अच्छा समय ) करके स्तुति करते हैं । इनके शिष्य नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् (१२५०० पड़ि ) और वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै (ईडु ३६००० पड़ि ) दोनों ने तिरुवाय्मळि का व्याख्यान किया था । लेकिन नम्पिळ्ळै ने पहल ग्रन्थ बहुत ही विस्तरणीय होने के कारण उसे नकार दिया और दूसरा व्याख्यान को स्वीकृत् करके ईयुण्णि माधव पेरुमाळ को दे दिया ताकि भविष्य काल में उसके निगूढ़ अर्थ अळगीय मणवाळ मामुनि के द्वारा सभी जान सकें । उन्होंने पेरियवाच्छान् पिळ्ळै को भी आदेश दिया कि तिरुवाय्मळि का व्याख्यान लिखे और आचार्य के आदेश अनुसार उनकी इच्छा पूर्ति करते हुए उन्होंने २४००० पड़ि व्यख्यान लिखें और नम्पिळ्ळै ने उस ग्रन्थ को बहुत प्रशंसा कि ।
  • नम्पिळ्ळै पेरिय कोविल वळ्ळलार् से “कुलं तरुं ” का अर्थ पूछते हैं तब वळ्ळलार् कहते हैं कि “जब मेरा कुल जन्म कुल से नम्बूर् कुल(नम्पिळ्ळै का कुल) में बदल गया हैं तो उसे कुलं तरुं कहते हैं ” । यह विषय ठीक पेरियाळ्वार् श्री सूक्ति पंडै कुल(जन्म कुल ) से तोंड़ा कुल ( आचार्य सम्बन्ध और कैंकर्य प्राप्त होता हैं ) । नम्पिळ्ळै इतने महान थे ।

आईये अंत में सामाप्त करते हुए देखे कि एळै एळलन पदिग् ओथु वाईमैयुम (पेरिय तिरु मोळि – ५.८. ७ ) में नम्पिळ्ळै के बारे में पेरियवाच्छान्  पिळ्ळै ने क्या बताया हैं । पेरियवाच्छान पिळ्ळै जब “अन्ताणं ओरुवन ” ( अनोखे विद्वान ) का अर्थ समझाने के समय पे मौके का लाभ उठाते हुए अपने आचार्य नम्पिळ्ळै कि कीर्ति के बारे में बताते हैं और अनुगामी शब्द प्रयोग करते हुए व्यक्त करते हैं कि उनके आचार्य सबसे अनोखे विद्वान हैं ” मुर्पड़ ढवायत्तिक् केट्टु , इत्तिहास पुराणांगलियुम अथिगारित्तु , परपक्ष प्रत्क्षेपत्तुक्कुडालग ,न्याय मीमामंसैकलुम अथिगारित्तु,पोतुपोक्कुम अरुलिचेयलीलेयमपडि पिळ्ळैप्पोले अथिगारिप्पिक्क वल्लवनायिरे ओरुवन एंबतु ”
(முற்பட த்வயத்தைக் கேட்டு, இதிஹாஸ புராணங்களையும் அதிகரித்து, பரபக்ஷ ப்ரத்க்ஷேபத்துக்குடலாக ந்யாயமீமாம்ஸைகளும் அதிகரித்து, போதுபோக்கும் அருளிசெயலிலேயாம்படி பிள்ளையைப்போலே அதிகரிப்பிக்க வல்லவனையிரே ஒருவன் என்பது). सुलभ तरह से भाषांतर करने से यह प्राप्त होता हैं कि जो पहले द्वयं सुनता हैं , उसके बाद पुराण और इतिहास सीखता हैं और बाह्य / कुदृष्टि लोगों को हराने के लिए न्याय और मीमांस अभ्यास करता हैं , अपना सारा समय आळ्वार् अरुळिचेयळ और उनके अर्थ विशेष सीखने और सीखाने में व्यतीत करते हैं उन्हें अनोखा विद्वान कहा जा सकता हैं और साक्षात उदाहरण नम्पिळ्ळै हैं । यहाँ पेरियवाच्छान सांदीपनि मुनि को कुछ अंश में नम्पिळ्ळै कि तरह मानते हैं ( वास्तव में नम्पिळ्ळै सांदीपनि मुनि से कई गुना बेहतर हैं क्यूंकि नम्पिळ्ळै पूरी तरह से भगवद् विषय में डूबे थे लेकिन सांदीपनि मुनि यह जानते हुए भी कण्णन एम्पेरुमान मुकुन्दन , मतलब मोक्ष प्रदाता हैं उनसे अपने मरे हुए संतान प्राप्त करने कि कामना करते हैं )

तमिल और संस्कृत के साहित्य पे इनके अपार ज्ञान के कारण व्यख्यान करते समय श्रोतगण को सम्मोहित करते थे । इन्हीं के बल तिरुवाय् मोळि को नई ऊँचाईयाँ प्राप्त हुई हैं और अरुळिचेयळ के अर्थ सभी को समझ आने लगे । तिरुवाय् मोळि के ६००० पडि व्याख्यान के आलावा अन्य ४ व्याख्यान में इनका कोई न कोई रिश्ता था

  • ९००० पड़ि मूल् ग्रन्थ नंजीयर् से रचित था लेकिन नम्पिळ्ळै ने सूक्ष्म दृष्टि और नए अर्थ विशेषों के साथ फिर से लिखा हैं ।
  • २४००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के आदेश और उपदेश अनुसार रचना कियी हैं ।
  • ३६००० पड़ि वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के व्याख्यान को सुनकर रचना कियी हैं ।
  • १२००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै के शिष्य वादि केसरि अळगीय मणवाळ जीयर् ने लिखा हैं और अर्थ विशेष पे गौर करने से कह सकते हैं कि यह ग्रन्थ नम्पिळ्ळै के ३६००० पड़ि को अनुगमन करता हैं ।

यही नहीं नम्पिळ्ळै ने अपनी अपार कारुण्य के साथ सम्प्रदाय के दो कीर्तिमान स्तम्बो की स्थापना की हैं – पिळ्ळै लोकाचार्यर् और अळगीय मणवाळ पेरुमाळ नायनार् जिन्होंने पूर्वाचार्य से प्रसादित ज्ञान से क्रमानुसार श्री वचन भूषण और आचार्य हृदय को प्रदान किया हैं । यह चरित्र अपने अगले अनुच्छेद में देखेंगे (वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै)।

nampillai-pinbhazakiya-perumal-jeer-srirangam

नम्पिळ्ळै – पिण्बळगिय् पेरुमाळ जीयर् – श्री रंगम

नम्पिळ्ळै अपने चरम तिरुमेनि को श्री रंगम में छोड़कर परम पद प्रस्थान हुए । उस अवसर पर नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् अपने पूरे सिर के केश मुण्डन करवाते हैं (शिष्य गण और पुत्र केश मुण्डन करते हैं जब पिता या आचार्य परम पद प्रस्थान होते हैं ) और जब उनके भाई नंपेरुमाळ से शिकायत करते हैं कि कूर कुल में पैदा होने के बावज़ूद उन्होंने ऐसा बर्ताव किया तब नंपेरुमाळ भट्टर् को उनके सामने उपस्थिति का आदेश देते हैं और भट्टर् विवरण से कहते हैं कि उनके कुटुम्ब सम्बन्ध से भी नम्पिळ्ळै से उनके सम्बन्ध को वे अधिक महत्व देते हैं । यह सुनकर नंपेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं ।

आईये नम्पिळ्ळै के चरण कमलो का आश्रय ( शरण ) लेते हुए प्रार्थना करे कि हम भी उन्ही कि तरह एम्पेरुमान और आचार्य के प्रति प्रेम प्राप्त हो ।

नम्पिळ्ळै तनियन्:

वेदान्त वेद्य अमृत वारिरासेर्वेदार्थ सारा अमृत पुरमाग्र्यम् |
आधायवर्षन्तमहं प्रपद्ये कारुण्य पूर्णम् कलिवैरिदासं ||

अपने अगले अनुच्छेद में वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै के बारे में जानेंगे ।

अडियेन् इन्दुमती रामानुज दासि

source

तिरुक्कच्चि नम्बि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirukkachinambi

तिरुनक्षत्र मृगशिर नक्षत्र ,

अवतार स्थल पूविरुन्तवल्लि

आचार्य आळवन्दार

शिष्य / शिष्य गण एम्पेरुमानार ( रामानुजाचार्य ) – अभिमान शिष्य

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए पूविरुन्तवल्लि

ग्रंथ रचना सूची देवराजाष्टकम्

तिरुक्कच्चि नम्बि जो श्री कांचि पूर्ण, गजेन्द्र दास के नाम से प्रसिद्ध हुए पूविरुन्तवल्लि नाम के गाँव मे पैदा हुए । तिरुक्कच्चि नम्बि श्री देव पेरुमाळ को पंखा करने की सेवा से जाने गए है और उसी कारण प्रसिद्ध भी हुए है । इसके अतिरिक्त वे भगवान श्री देव पेरुमाळ और उनकी पत्नि पूविरुन्तवल्लि तायार के बीच मे आम तौर पर होने वाले वार्तालाप से भी प्रसिद्ध हैं।

जब इळयाळ्वार ( श्री रामानुज ) वारणासी यात्रा के बाद कांचिपुरं लौटे तब उनकी माताश्री ने उन्हे उपदेश के रूप मे बताया कि उन्हे शीग्र श्री तिरुक्कच्चि नम्बि का शरण लेना चाहिये जो आळवन्दार के शिष्य थे और श्री देव पेरुमाळ के करीबि हमराज़ है । यह उपदेश जानकर श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि के पास पहुँचे और उनके मार्गदर्शन के लिये निवेदन किया । नम्बि जी इळयाळ्वार को तिरुमंजन तीर्थ कैंकर्य सौंपते हैं ( निकट मे स्थित कुँए से लाया जाने वाला पानी जो भगवान के स्नान के लिये उपयोग किया जाता था ) । इळयाळ्वार खुशी खुशी स्वीकर किये और यह कैंकर्य वह प्रतिदिन करने लगे ।

पेरिय नम्बि श्री इळयाळ्वार को श्रीरंग ले जाकर अपने सत्सांप्रदाय मे आळवन्दार के द्वारा दीक्षित करने और अगले आचार्य के रूप मे स्थापित करने हेतु कांचिपुरं आए । पेरिय नम्बि तिरुक्कच्चि नम्बि के पास पहुँचे और इळयाळ्वार को श्रीरंग ले जाने का निवेदन किया । यह जानकर प्रसन्न तिरुक्कच्चि नम्बि उनको इज़ाज़त दिये । उसके बाद श्री पेरिय नम्बि ने आळ्वन्दार के दिव्य गुणों और महिमा का वर्णन किया और इळयाळ्वार पेरिय नम्बि के साथ आळ्वन्दार के चरण कमलों का आश्रय लेने हेतु श्रीरंग की ओर चले गए । वहाँ जाने के पश्चात उन्हे ज्ञात हुआ की आळ्वान्दार ने अपना शरीर त्याग दिया और यह जानकर दुःखित इळयाळ्वार वापस कांचिपुरं लौटकर अपने सेवा मे संलग्न हुए ।

तिरुक्कच्चि नम्बि के प्रति अत्यधिक आकर्शित होकर श्री इळयाळ्वार उनके चरण कमलों का आश्रय लेते हुए उनसे विनती करते हैं कि वो उन्हे पंञ्चसंस्कार दे और उन्हे शिष्य के रूप मे स्वीकार करे । परन्तु वेदों और शास्त्रों का निरूपण देते हुए कहते हैं कि वह कदाचित भी उन्हे पंञ्चसंस्कार दे नही सकते और उसके वो काबिल नही क्योंकि तिरुक्कच्चि नम्बि अब्राह्मण वर्ण के थे जिसके कारण वे नियमानुसार दीक्षाचार्य नही हो सकते (परन्तु वो श्री इळयाळ्वार को शिक्षा गुरु के तौर से उपदेश देने के सक्षम हैं और यहि कायम रखेंगे) । यह जानकर इळयाळ्वार बहुत निरुत्साहित हुए परन्तु वेदों और शास्त्रों मे दृध विश्वास होने की वजह से तिरुक्कच्चि नम्बि के निश्चित निर्णय को पूर्ण तरह से स्वीकार किये ।

इळयाळ्वर तिरुक्कच्चि नम्बि के उच्छिष्ट (अवशेष) को ग्रहण करने हेतु उन्हे अपने घर (तिरुमालिगै) मे नियुक्त तदीयाराधन के लिये निमंत्रण भेजते हैं। तिरुकच्चि नम्बि स्वीकार करते हैं और यह जानकर इळयाळ्वार अपने घर भागकर जाते हैं और अपनी पत्नी को प्रसन्न्तापूर्वक बताते हैं कि आज के तदीयाराधन मे विशेष भोजन की व्यवस्था करो और अपना नित्यकर्मानुष्ठान सम्पूर्ण कर देव पेरुमाळ का तिरुमंजनतीर्थ सेवा भी सम्पूर्ण कर घर लौटते हैं। इळयाळ्वार मंदिर के दक्षिण भाग से होते हुए तिरुकच्चि नम्बि के घर जाते हैं और उसी दौरान तिरुकच्चि नम्बि मंदिर के उत्तर भाग से होते हुए इळयाळ्वार के घर पहुँचते हैं। पहुँचने के पश्चात इळयाळ्वार की पत्नी से निवेदन करते हैं कि तुरन्त उन्हे भोग प्रसाद परोसें क्योंकि उन्हे कैंकर्य हेतु जल्दि जाना है । तिरुक्कचि नम्बि जल्दि जल्दि प्रसाद ग्रहण करके, इळयाळ्वार के पत्नी से विदा लेकर अपने कैंकर्य हेतु चले गए । तन्जम्माळ ( श्री इळयाळ्वार की पत्नी ) उनके पती के भावनाओं ना समझते हुए तिरुकच्चि नम्बि के वर्ण को दृष्टि मे रखते हुए तुरन्त तिरुकच्चि नम्बि के अवशेष जो केले के पत्तों मे था उसे निकाल दिया और वहाँ गाय के गोबर से साफ़ कर दिया और नहाने चले गए । इळयाळ्वार घर पहुँचकर देखते हैं कि तिरुकच्चि नम्बि आकर चले गए और उनकी पत्नी नहाने गई । उसके बाद इळयाळ्वार पूछते हैं आप नहाने इस वक्त क्यों गए ? उनकी पत्नी जवाब मे कहती है – तिरुकच्चि नम्बि अब्राह्मण वर्ण के हैं (यानि जिनके पास उपवीत नही है ) और उनको जिस केले के पत्ते मे प्रसाद परोसा उसी को अवशेष सहित मैने फेक दिया और गाय के गोबर से उस जगह को साफ़ किया और शुद्धिकरण हेतु नहाने चली गई । इळयाळ्वार अपनी पत्नी के विचार धारणा को जानकर और उनकी यह बर्ताव से अत्यधिक दुःखित हुए क्योंकि उनकी पत्नी उनके विचारों को समझ नही सकी और तिरुकच्चि नम्बि के महिमा को वे नही जान पाए और तुरन्त इळयाळ्वार अपने घर से प्रस्थान हुए ।

नम्बि देव पेरुमाळ से वारतालाप के विषय मे अत्यधिक प्रसिद्ध माने गये हैं। इळयाळ्वार को विलंब करने वाले कुछ संदेहों का समाधान हेतु वे तिरुक्कच्चि नम्बि के पास गए और विनम्रतापूर्वक इन संदेशों का प्रस्ताव किया और पूछे की वे ( तिरुक्कच्चि नम्बि ) इन संदेहों का समाधानों प्राप्त करे और उन्हे बताये । अनुवादक टिप्पणि श्री रामानुजाचार्य जो साक्षात आदि शेष के अवतार हैं, हमारे पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर हमे यह जानना चाहिये कि श्री रामानुजाचार्य केवल नटन यानि अपने पात्र को भलिभांति निभा रहे थे और वह इन संदेहों का समाधान भी जानते थे परन्तु प्रमाणों को भगवान और पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर प्रमाणित करना चाहते थे । उस रात , अपना कैंकर्य समाप्त कर श्री नम्बि भगवान को अती प्रेम से देखने लगे ।

सर्वज्ञ देव पेरुमाळ ने उनसे पूछा नम्बि , क्या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ? नम्बि थोडी देर सोचकर भगवान के समक्ष इळयाळ्वार के मन की मनोवेदना को व्यक्त किये और कहे अब आप ही इन संदेहो का समाधान दीजिए । यह सुनकर भगवान ने कहा जिस प्रकार मैने अपने श्री कृष्णावतार मे सान्दीपणि मुनि से शास्त्र सीखा, इळयाळ्वार ( जो अनन्त शेष के अवतार है , सर्वज्ञ है ) वो मुझसे इन संदेहों का समाधान पूछ रहे हैं। उसके पश्चात , भगवान ने स्वयम छे उपदेशों को नम्बि के सामने प्रस्तुत किया जो मेरे छे ईश्वरीय आदेश के नाम से प्रसिद्ध है वही भगवद्बन्धुवों के लिए प्रस्तुत है

अहमेव परम तत्वम् मै ( देव पेरुमाळ ) ही सर्वोच्छ (महान, श्रेष्ठ) हूँ

दर्शनम् भेदमेव जिवात्मा और अचेतनम् ( अचेत ) मुझसे (मेरे दिव्य शरीर से) विभिन्न है

उपायम् प्रपत्ति – “मुझे ही अन्तिम शरण ( उपाय ) के रूप मे स्वीकर करना यानि केवल भगवान का शरण ही उपाय है और उससे ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है

अन्तिम स्मृति वर्जनं प्रपन्न भक्तों के लिये अन्तिम स्मरण ज़रूरी नही है क्योंकि श्री वराह भगवान ने वराह चरम श्लोक मे कहा है कि भगवान स्वयम प्रप्पन्न भक्तों के अन्तिम काल मे उनका स्मरण करेंगे । आम तौर पर हमारे आचार्यों ने दर्शाया है की हमे अपने अन्तिम काल मे अपने आचार्य पर ध्यानकेन्द्रित करना चाहिये ।

देहवासने मुक्ति भगवान ने कहा है प्रपन्न भक्त उनके अन्त काल के बाद ( भौतिक शरीर का त्याग करना ) निश्चितरूप से परमपद की प्राप्ति होगी और उनको मोक्ष इस प्रकार से मिलेगा और वह भगवद्भागवदकैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

पूर्णाचार्य पदाश्रित पेरियनम्बि (महापूर्ण) को अपना आचार्य मानो और उनका शरण लो

तिरुक्कच्चि नम्बि इळयाळ्वार के पास जाकर स्वयम भगवान के छे आदेशों ( जो इळयाळ्वर के संदेशों के समाधान ) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। इळयाळ्वर यह सुनकर बहुत खुश होते हैं और इस अनुग्रह (सहायता) के लिये उनकी प्रशंसा और अभिवादन करते हैं। यह बताने के बाद नम्बि इळयाळ्वर से पूछते हैं क्या वे भी यही सोच रहे थे .. इसके जवाब मे रामानुजाचार्य कहे जी हा स्वामि , मै भी यही सोच रहा था .. तिरुक्कच्चि नम्बि को तब एहसास हुआ की भगवान और श्री रामानुजाचार्य का तिरुवुळ्ळम् (मनोभावना) एक ही है यह जानकर वे अती प्रसन्न हुए ।

अनन्तर मधुरान्तकम मे इळायाळ्वर पेरियनम्बि को आचार्य के रूप मे स्वीकार करते हैं और फिर चरण कमलों का आश्रय लेते हैं। आश्रय लेने के बाद उन्हे श्री रामानुज दास्य नाम पेरियनम्बि ने दिया ।

हमारे पूर्वाचार्यों के ग्रंथों मे तिरुक्कच्चि नम्बि के जीवन चरित्र के बारें मे बहुत ही कम मात्र मे वर्णन है परन्तु उनके वैभव का वर्णन पूर्वाचार्यों के ग्रंथो के टिप्पणियों मे है जो भगवद्बन्धुवों के लिये प्रस्तुत है

पेरियाळ्वार तिरुमोळि – 3.7.8 – तिरुवाय्मोळिप्पिळ्ळै अपने स्वापदेश व्याख्यान मे तिरुक्कच्चि नम्बि और भगवान के बींच मे हुए वार्तालाप का वर्णन करते हैं। इस वार्तालाप मे तिरुक्कच्चि नम्बि भगवान से अपने लिये एक नाम चुने जो भगवान को बहुत प्रिय है । भगवान देव पेरुमाळ ने उन्हे गजेन्द्र दास का नाम दिया क्योंकि इसी देव पेरुमाळ को गजेन्द्राळ्वान ने प्रार्थना की थी और इसी कारण गजेन्द्राळ्वान भगवान के बहुत प्रिय हुए ।

तिरुविरुत्तम् (8) – नम्पिळ्ळै अपने ईडु व्याख्यान मे एक और वार्ता का वर्णन करते हैं। एक बार एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) सुसज्जित रूप से श्रीवैष्णवों के बीच शोभायमान होकर कुछ भगवद विषय मे चर्चा कर रहे थे । उसी दौरान वे तिरुक्कच्चि नम्बि के बारें मे सोचते हैं और तुरन्त पूछते हैं है कोई ऐसा व्यक्ति (स्वयंसेवि) जो अभी कांचिपुरं जाकर तिरुक्कच्चि नम्बि के कल्याण / खुशहालि का पता करके आ सकता है ? उस श्रीवैष्णव समारोह मे ऐसा कोई स्वयंसेवि व्यक्ति नही था । उसके अगले दिन के सुभह को पेरियनम्बि श्री रामानुजाचार्य से कहे वे अभी इसी वक्त तिरुकच्चि नम्बि से मिलने कांचिपुरं जायेंगे । यह जानकर श्री रामानुजाचार्य कहे आप श्रीमन मेरे आचार्य हैं इसीलिये आपको मुझ पर पूरा हक है और आप भलि भांति मेरी इच्छा को पूर्ण करे । पेरियनम्बि कांचिपुरं पहुँचकर, तिरुक्कच्चि नम्बि से मिले और उनके कुशल मंगल के बारे मे पूछे और उनकी कुशहालि जानकर वह तुरन्त वापस श्री रामानुजाचार्य की और निकल पडे (श्रीरंग) । तिरुक्कच्चि नम्बि उनसे निवेदन करते हैं कि पेरियनम्बि कुछ और दिनो के लिये कांचिपुरं मे रह जाए क्योंकि कुछ ही दिनों मे भगवान के उत्सव होंगे । पेरिय नम्बि इसके उत्तर मे कहे उनका लक्ष्य केवल तिरुक्कच्चि नम्बि ( आपके ) कुशहालि की खबर श्री रामानुजाचार्य तक पहुँचाए और आगे बताए कि कोई श्रीवैष्णव इस कार्य के प्रति स्वयंसेवि नही था इसीलिये मै खुद स्वयंसेवि हुआ और आपसे मिलने आया । इस वार्ता से यह स्पष्ट है कि तिरुक्कच्चि नम्बि की विशेषता और महिमा असीमित थी कि स्वयम श्री पेरियनम्बि केवल उनसे मिलने हेतु कांचिपुरं तक अकेले चले आए ।

आचार्य हृदयम् के 85 चूर्निकै मे तिरुक्कच्चि नम्बि (जो अब्राह्मण वर्ण से थे) के महानता और महिमा को दर्शाते है । त्याग मण्डापत्तिल् आलवट्टमुम् कैयुमान अंतरंगरै वैदिकोत्तमर अनुवर्त्तित क्रमम्” – इस सूत्र मे अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार तिरुक्कच्चि नम्बि के महानता को प्रकाशित करते हुए कहते हैं जिस प्रकार एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) (जो उत्तम वैदिक कुल से थे) ने उनको (तिरुक्कच्चि नम्बि जो भगवान देव पेरुमाळ को पंखे का सेवा त्यागमण्डप मे दे रहे थे) जो गौरव/सम्मान दिया और उनकी सेवा किये उससे स्पष्ट है की तिरुक्कच्चि नम्बि स्वाभावतः उत्कृष्ट वैष्णवों मे से थे।

मामुनि जी अपने देवराज मंगलम् के ग्यारह श्लोक मे तिरुक्कच्चि नम्बि के वैभव और महिमा , और देव पेरुमाळ के माननीय वात्सल्य (अनुरक्ति) को प्रकाशित करते हुए कुछ इस प्रकार से करते हैं 

श्री कांचिपूर्णमिश्रेण प्रीत्या सर्वाभिभाषिने । अतीतार्चाव्यवस्थाय हस्त्यद्रीशाय मंगलं ॥

ऐसे देवराजपेरुमाळ के लिए सब शुभ हो जिन्होने तिरुक्कच्चि नम्बि के प्रति आसक्ति के कारण अर्चविग्रहसमाधि के नियम को तोड दिया और उनसे परस्पर चिरस्मरणीय वार्तालप किये ।

मामुनि इस श्लोक मे देवपेरुमाळ और तिरुक्कच्चि नम्बि के संबन्ध को प्रकाशित करते हैं और यह भी दर्शाते हैं कि हमे कभी भी भगवन के भक्तों द्वारा ही भगवान की प्राप्ति होति है ।

तिरुक्कच्चि नम्बि तनियन्

श्री देवराज दयापात्रम् श्री कांचिपूर्णमोत्तमं । रामानुज मुनेर्मान्यं वन्देऽहं सज्जनाश्रयं ॥

श्री कांचिपूर्ण के अर्चावतार अनुभव को (उनके दिव्य देवराज अष्टकं के द्वारा) जान सकते हैं।

चलिये अब हम श्री तिरुक्कच्चि नम्बि के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों मे उनके जैसि आसक्ति हमारे वर्तमानाऽचार्य, पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) मे हो ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

नन्जीयर

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “पराशर भट्टरर्” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य ( नन्जीयार ) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

तिरुनक्षत्र : फालगुनि मास उत्तर फालगुनि नक्षत्र

अवतार स्थाल : तिरुनारायण पुरम् ( मेलुकोटे )

आचार्य : पराशर भट्टर

शिष्य : नम्पिळ्ळै, श्री सेनाधिपति जीयर इत्यादि

परमपद प्रस्थान : श्रीरंग

रचना : तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान , कन्निनुन् शिरुत्ताम्बु व्याख्यान , तिरुप्पावै व्याख्यान , तिरुवन्दादि व्याख्यान, शरणगति गद्य व्याक्यान , तिरुप्पल्लाण्डु व्याख्यान, रहस्य त्रय विवरण ( नूट्ट्टेट्टु नामक ग्रन्थ ) इत्यादि

नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए और वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

श्रीमाधवर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान थे जिन्का निवास स्थान तिरुनारायणपुरम (मेलुकोटे) था । एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) की इच्छा थी की माधवर का परिवर्तन/सुधार हो और अद्वैततत्वज्ञान का त्याग कर श्रीविशिष्टाद्वैत को स्वीकार कर भगवान श्रीमन्नारायण की सेवा मे संलग्न हो । इसी सदिच्छा से श्री पराशरभट्टर को तिरुनारायणपुरम जाकर माधवर को सुधारने का आदेश देते है । श्रीगुरुपरम्परा के आधार पर यह स्पष्ट है की माधवर अद्वैतिन होने के बावज़ूद भी श्री रामानुजाचार्य को उनके प्रती सम्मान/आदर था ।

माधवर ने भी भट्टर के कई किस्से सुने और भट्टर से मिलने मे बहुत उत्सुक थे । भगवान की असीम कृपा से उन दोनो का सम्मेलन वादविवाद से शुरू हुआ और अन्ततः माधवर पराजित होकर भट्टर के शिष्य बन गए । वादविवाद के पश्चात , माधवर के घर आसपास के अन्य श्रीवैष्णव पहुँचते है और माधवर को परिवर्तित देखर आश्चर्यचकित हो जाते है । उसी दौरान भट्टर से वादविवाद मे पराजित पाकर , भट्टर से विनम्र भावना से माधवर कहते है आप श्रीमान श्रीरंगम से अपने आचार्य के आदेशानुसार, अपने निज वैभव को छोड़कर, सामान्य पोशाक पेहनकर मुझे परिवर्तन करने हेतु मुझसे आप श्रीमान ने वादविवाद किया .. इसी कारण मै आपका शुक्रगुज़ार/आभारि हूँ और आप श्रीमान बताएँ की अब मै क्या करूँ । श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए ।

श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धनसंपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । उनके यात्रा के दौरान, उनकी भेंट श्री अनन्ताळ्वान से हुई । श्री अनन्ताळ्वान ने उनसे संयासाश्रम लेने का कारण जाना और माधवर से कहा वह तिरुमंत्र मे पैदा हो (आत्मस्वरूपज्ञान को समझे), द्वयमंत्र मे फलेफूले (एम्पेरुमानपिराट्टि) की सेवा मे संलग्न हो और भट्टर की सेवा करे तो अवश्य एम्पेरुमान उनको मोक्ष प्रदान करेंगे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्यभक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर नम्जीयरसे सम्भोधित करते है और तबसे नम्जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए ।

भट्टर और नन्जीयर आचार्यशिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । भट्टर अपने शिष्य नन्जीयर को तिरुक्कुरुगै पिरान्पिळ्ळान् के 6000 पाडि व्याख्यान ( जो तिरुवाय्मोळि पर आधारित है ) सिखाए । भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

नन्जीयर का आचार्यभक्ति असीमित थी । उनके जीवन मे संघटित कुछ संघटनों पर विशेष दर्शन प्रस्तुत है ।

एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर से कहे – “जीया, यह व्यवहार तुम्हारे संयासाश्रम के लिए शोभदायक नही है और तुम्हे मुझे इस प्रकार सहारा नही देना चाहिए। यह सुनकर नन्जीयर कहते है अगर मेरा त्रिदण्ड आपकी सेवा मे बाधा है तो मै अभी इसी वक्त इस दण्ड को तोडकर अपने संयास का त्याग कर दूंगा ।

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर से शिकायत किए । नन्जीयर ने कहा यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

नन्जीयर बहुत जल्दि अरुळिच्चेयल् सीखकर अरुळिच्चेयल् मे निपुण हो गए । हर रोज़ भट्टर नन्जीयर से अरुळिच्चेयल् पाशुरों को सुनकर उनका गूढ़ार्थ सुस्पष्ट अप्रत्यक्ष सुन्दर तौर से प्रस्तुत किया करते थे । एक बार नन्जीयर तिरुवाय्मोळि के 7.2.9 पाशुर को एक बार मे ही सुना दिया । यह सुनकर भट्टर मूर्छित हो गए और जब भट्टर मूर्छित अवस्था से उठे, उन्होने कहा की यह वाक्य पूर्ण तरह से पढ़कर सुनाना चाहिए और इसे पढ़ते वक्त इसका विच्छेद कदाचित नही करना चाहिए क्योंकि विच्छेद से वाक्य तात्पर्य

नन्जीयर के अरुळिच्चेयल् निपुणता को भट्टर हमेशा प्रसंशनीय मानते थे क्योंकि नन्जीयर तो संस्कृत के विद्वान थे जिन्की मातृभाषा तमिळ नहीं थी ।

भट्टर और नन्जीयर के बींच मे चित्ताकर्षक दिलचस्प वार्तालाप होते रहते थे । हलांकि संस्कृत विद्वान होने के बावज़ूद नन्जीयर हमेशा निश्चित रूप से अपने संदेहो का स्पष्टीकरण समाधान अपने आचार्य भट्टर से पाते थे । अब वही वार्तालाप का संक्षिप्त वर्णन भगवद्बन्धो के लिए प्रस्तुत है

  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है क्यों सारे आळ्वार भगवान श्रीकृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभीअभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।
  • भट्टर समझाते हुए नन्जीयर से कहते है भगवान श्री कृष्ण गोप कुल ( नन्द कुल ) मे पैदा हुए । भगवान श्री कृष्ण जहा भी गए उनका सामना मामा कंस ने असुरनुचरों से हुआ और कई तो उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कब श्री कृष्ण आए और कब वह उनका संहार करें । हलांकि स्वाभिक रूप से श्री कृष्ण उतने सक्षम नही की वह असुरों का संहार करे (यानि श्री कृष्ण तब शिशोरवस्था/बाल्यवस्था मे थे) परन्तु इसके विपरीत मे देखे तो भगवान के भूतपूर्वअवतार श्री रामावतार मे भगवान श्रीराम अस्त्रशस्त्र विद्या सीखें, उनके पिता राजा दशरथ भी अस्त्रशास्त्र मे निपुण थे और यही निपुणता उन्होने इन्द्र को सहायता देकर साबित किए, भगवान श्री राम के भाई लक्ष्मण, भरत, शऋघ्न भी भलिभाँन्ति अस्त्रशस्त्र विद्या से परिचित और निपुण थे यह सब सोचकर श्री पेरियाळ्वार सदैव श्री कृष्ण भगवान के लिए चिन्ताग्रस्त और व्याकुल रहते थे .. इसी कारण वह भगवान के खुशहालि के लिए प्रार्थना किया करते थे और यह स्पष्ट रूप से उनके तिरुमोळि मे उन्होने दर्शाया है ।
  • कलियन् (तिरुमंगैयाळ्वार) अपने तिरुमोळि के अन्त पाशुरों के इस ओरु नाल् शुट्ट्रम्पाशुर मे कई दिव्यदेशों का मंगलशाशन करते है । नन्जीयर भट्टर से इस पाशुर मे कलियन् द्वारा किए गए मंगलशाशन के विषय पर संदेह प्रकट करते है । भट्टर तब कहते है जैसे एक विवाहित स्त्री अपने सखासखीयों, रिश्तेदारों से मिलकर बिदा लेती है उसी प्रकार कलियन् इस भौतिक जगत मे स्थित दिव्यदेशों के एम्पेरुमानों का दर्शन पाकर उनका मंगलाशाशन करके श्रीधाम की ओर प्रस्थान हुए ।
  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है क्यों भक्त प्रह्लाद जो धनसंपत्ति मे कदाचित भी रुचि नही रखते थे उन्होने अपने पोते महाबलि को यह श्राप दिया – “तुम्हारा सारा धनसंपत्ति का विनाश होगा अगर तुम भगवान का निरादर करोगे। इस पर भट्टर ने कहा जिस प्रकार एक कुत्ते को अगर दंड देना हो तो उसका मैला/गंदा खाना उससे दूर कर दिया जाता है उसी प्रकार का दंड प्रह्लाद ने अपने पोते को दिया ।
  • नन्जीयर भट्टर से वामन चरित्र के संदर्भ मे कुछ इस प्रकार पूछते है क्यों महाबलि पाताल लोक गए ? क्यों शुक्राचार्य की एक आँख चली गई ? भट्टर इसके उत्तर मे कहते है शुक्राचार्य ने महाबलि को उनके धर्म कार्य करने से रोका और अपना आँख गवाए । श्री बलि महाराज ने अपने आचार्य की बात / सदुपदेश नही माने और अतः उन्हे दंड के रूप मे पाताल लोक जाना पडा ।
  • नन्जीयर पूछते है प्रिय भट्टर कृपया बताएँ क्यों श्री रामचन्द्र के पिताजी श्री दशरथ जो भगवान का वियोग सह नही पाऐ और प्राण त्यागने पर उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई ? भट्टर इसके उत्तर मे कहते है श्री दशरथ को केवल सामान्यधर्म (सच बोलने का धर्म) के प्रती लगाव था और पिता होने के बावज़ूद उन्होने उन्के संरक्षण का धर्म त्याग दिया इस कारण उन्हे तो नरक प्राप्त होना चाहिए परन्तु भगवान के पिता का भूमिका निभाने के कारण उन्हे स्वर्ग की प्राप्ति हुई ।
  • नन्जीयर पूछते है भट्टर कृपया कर बताएँ क्यों वानर राजा सुग्रीव, विभीषण को स्वीकार करने मे संकोच कर रहे थे हलांकि विभीषण तो श्री रामचन्द्र के भक्त थे । इसके उत्तर मे भट्टर कहते है जिस प्रकार भगवान श्री राम अपने शरणागत भक्त श्री विभीषण को स्वीकार करने और उनके संरक्षण के इच्छुक थे उसी प्रकार राजा सुग्रीव के शरणागत मे आए हुए भगवान को संरक्षण दे रहे थे और उन्हे चिंता थी की विभीषण कहीं भगवान को हानि न पहुँचाए ।
  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है जब भगवान श्रीकृष्ण अपने दुष्ट मामा कंस का उद्धार करके अपने मातापिता (देवकिवसुदेव) से मिले, तब अत्यन्त वात्सल्य भाव मे मग्न होने से उनकी माता देवकि के स्तन भर गए । भगवान श्रीकृष्ण ने यह कैसे स्वीकार किया ? इस पर श्री भट्टर ने गम्भीरतारहित बताया यह एक माँ और बेटे के बींच का संबन्ध है । इसके विषय मे आगे भट्टर ने कहा जिस प्रकार भगवान ने पूतना ( जो भगवान को विषपूरित स्तन दूध से मारना चाहती थी ) को माँ स्वरूप स्वीकार किया उसी प्रकार भगवान ने माँ देवकि के इस वात्सल्य भाव को स्वीकार किया ।
  • भट्टर ययाति के जीवन चरित्र को अपने उपन्यास के दौरान समझाते है । यह उदाहरण के तौर पर समझाने के पश्चात नन्जीयर भट्टर से पूछते है यह चरित्र का उद्देश्य क्या है स्वामि ? भट्टर यह चरित्र के उदाहरण से भगवान श्रीमन्नारायण (एम्पेरुमान) के विशेष स्थान और महत्ता/श्रेष्ठता को दर्शाते हुए समझाते है कि भगवान अपने प्रपन्न भक्तों को कम से कम साम्याप्ति मोक्ष देने मे सक्षम है और इसके विपरीत मे अन्य देवता अन्य प्राणि (जिसने सौ अश्वमेध यज्ञ पूरा किया हो) को अपने योग्य कदाचित भी स्वीकार नही कर सकते और किसी ना किसी तरह के षडयंत्र से अन्य देवता जीव को स्वर्ग के प्रति असक्षम बनाकर उसे इस भौतिक जगत मे ढकेलते है ।

अनुवादक टिप्पणि ययाति सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पूर्ण करने के पश्चात स्वर्ग मे प्रवेश करने का अधिकार पाकर स्वर्ग के अधिपति इन्द्र के सिंहासन के सहभागी हुए । परन्तु इन्द्र और अन्य देवता यह सहन नही कर पाए और एक षडयंत्र के माध्यम से ययाति को वापस इस भौतिक जगत के प्रति उकसाकर ययाति को भव सागर मे ढकेल दिया ।

कहते है ऐसे कई चिरस्स्मरणीय वार्तालाप है जिन्मे दिव्यप्रबंध (अरुळिच्चेयळ्) और शास्त्रों के गुप्त गूडार्थों का संक्षिप्त निरूपण है । यही वार्तालाप के आधार पर नन्जीयर ने दिव्यप्रबंधो पर अपनी निपुणता से विशेष टिप्पणि प्रस्तुत की और इसी का स्पस्टीकरण उन्होने उनके शिष्यों के लिये प्रस्तुत किया ।

नन्जीयार दिव्यप्रबंधो पर आधारित अपनी टिप्पणि के (जो नौ हज़ार पाडि व्याख्यान से प्रसिद्ध है) प्रतिलिपि को हस्तलिपि (पाण्डुलिपि) के रूप मे प्रस्तुत करना चाहते थे । इस कार्य के योग्य सक्षम व्यक्ति श्री नम्बूर वरदाचार्य हुए और वरदाचार्य ने यह कार्य सम्पूर्ण किया । कार्य संपूर्ण होने के पश्चात नन्जीयर ने उन्हे श्री नम्पिळ्ळै का नाम दिया और यही नम्पिळ्ळै हमारे सत्साम्प्रदाय के अगले दर्शन प्रवर्त हुए । वरदाचार्य की व्याख्यान को नन्जीयार अत्यधिक प्रसंशा करते थे जब वो नन्जीयार से भी अति उत्तम रूप मे गुप्तगुडार्थों को प्रस्तुत किया करते थे । यह नन्जीयर के उदारशीलता को दर्शाता है ।

नन्जीयार कहते थे वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयार को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर अपने अन्त काल के दौरान रोगग्रस्त हुए । उस अवस्था मे उनकी भेंट पेत्त्रि नामक स्वामि हुई । अरयर स्वामि (पेत्त्रि) ने नन्जीयार से पूछा स्वामि मै आप की क्या सेवा कर सकता हूँ ? नन्जीयार ने व्यक्त किया वह श्री तिरुमंगै आळ्वार द्वारा विरचित पेरियतिरुमोळि के तीसरे दशम का छटा पासुर सुनना चाहता हूँ । नन्जियर कहते है कि वह इस पदिगम को सुन्ने की इच्छा व्यक्त करते है जो तिरुमन्गै आळ्वाऱ का एम्पेरुमान के लिये संदेश है (आळ्वाऱ ने उन प्रथम ४ (4) पासुरो द्वारा अपने संदेश  एम्पेरुमान् को व्यक्त किये परन्तु उसके पश्चात  उनके कमज़ोरी के कारण उस संदेश को पूर्ण तरह से व्यक्त नही  कर सके) –  अरयर स्वामी नम्पेरुमाल के सामने इस प्रसंग का ज़िक्र करते है जिसे सुनकर नन्जीयर भावुक हो जाते है । नन्जीयर उनके अन्तकाल मे एम्पेरुमान से निवेदन करते है कि वह उनके स्वयम तिरुमेनि मे प्रकट हो और नम्पेरुमाल उन्की यह इच्छा को सम्पूर्ण करते है। नन्जीयर उस घटना से संतृष्ट होकर अपने शिष्यो को कई अन्तिम उपदेश देते है और अपने चरम तिरुमेनि को त्याग कर परमपदम को प्रस्थान हुए।

पराशर भट्टर्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “एम्बार” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य ( पराशर भट्टरर्) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

तिरुनक्षत्र : वैशाख मास , अनुराध नक्षत्र

अवतार स्थाल : श्री रंगम

आचार्य : एम्बार

शिष्य :नन्जीयर

परमपद प्रस्थान: श्री रंगम से

रचना : अष्ट स्लोकि , श्री रंग राजा स्तव , श्री गुण रत्न कोष , भगवद गुण दर्पण( श्री विष्णु सहस्रा व्याख्यान ), श्री रंग राजा स्तोत्र

पराशर भट्टर् कूरत्ताळ्वान् और आण्डाळ के सुपुत्र हैं । श्री पराशर भट्टर् और श्री वेदव्यास भट्टर् (दोनो भाई) श्री पेरिय पेरुमाळ और श्री पेरिय पिराट्टि की विशेष अनुग्रह से और उनके द्वारा प्रदान किया गया महा प्रसाद से इस भौतिक जगत मे प्रकट हुए।

एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

जब  वेदव्यास भट्टर् और पराशर भट्टर् ११ दिन के थे तब एम्बार् से उन्हें  दिव्य महामंत्र का उपदेश मिलता हैं और एम्पेरुमानार् उन्हें आदेश देते हैं की वे उन बालको का आचार्य स्थान ले । एम्पेरुमानार् के आदेशानुसार आळ्वान् अपने सुपुत्र पराशरभट्टर् को भगवान [श्री पेरियपेरुमाळ और श्री पेरियपिराट्टि] के दत्तत पुत्र के रूप मे सौंपते है | श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनकी  पालन- पोषण करती थी |

जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरियपेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे |

भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे । इनके जीवन के कुछ संघटन इस विषय को प्रमानित करते हैं I

  • एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नामसे जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगम में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं।भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं ।सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |
  • यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।
  • एक दिन जब आळ्वान् उन्हें तिरुवाय्मोळि के नेडुमार्कडिमै पदिग़ पढ़ा रहे थे तब “सिरुमा-मनिसर” पद प्रयोग का सामना करते हैं | उस समय भट्टर् पूछते हैं – क्या यह परस्पर विरोध नहीं हैं कि एक हि मनुष्य बड़े और छोटे हैं। आळ्वान् समझाते हैं कि कुछ श्री वैष्णव जैसे मुदलियाण्डान, अरुलाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार इत्यादि शारीरिक तौर से छोटे हैं लेकिन उनका मन और ज्ञान बहुत ही विशाल हैं । यह जवाब सुनकर भट्टर् प्रसन्न हो जाते हैं ।

बड़े होने के बाद भट्टर् संप्रदाय के दर्शन प्रवर्तक बने। भट्टर विनम्रता और उदारता जैसे विशिष्ट गुणो से परिपूर्ण थे और अरुळिचेयल के अर्थ विशेष के महा रसिक थे । कई व्याख्यानो में नंपिल्लै इत्यादि आचार्य महा पुरुष उद्धरण करते हैं कि भट्टर् का दृष्टिकोण सबसे विशेष हैं ।

आळ्वान् के जैसे ही भट्टर् तिरुवाय्मोळि के अर्थ विशेष में निमग्न होते थे । व्याख्यान में ऐसे कई घटनाये दर्शायि गई हैं । कई बार जब आळवार् परांकुश नायिका के भाव में गाते हैं तब भट्टर् बतलाते हैं कि उस समय आळवार् के मन की भावनाओं को कोई भी समझ नहीं सकते हैं ।

ऐसे कई घटनाये हैं जिससे भट्टर् कि विनम्रता , उदारता , प्रतिभा इत्यादि गुण दर्शायि गयी हैं ।मणवाळ मामुनिजी अपने यतिराज: विंशति में भट्टर कि विनम्रता का प्रशंसा करते हुए आळ्वान और आळवन्दार् से तुलना करते हैं । वास्तव में सब व्याख्यान ग्रन्थ भट्टर् के चरित्र के संघटनो से और उनके अनुदेशों से परिपूर्ण हैं ।

  • श्री रंग राज: स्तवं में ,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में  एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि कोविल को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं ।इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं ।
  • उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।
  • एक बार नंपेरुमाळ के सामने कुछ कैंकर्यपर (कार्यकर्ता ) भट्टर् की उपस्थिति न जानते हुए ईर्ष्या से उन्हें डाँट रहे थे । उनकी बाते सुनकर ,भट्टर् उन्हें अपनी शाल और आभरण से सम्मानित किये । उन्हें धन्यवाद करके बतलाते कि हर एक श्री वैष्णव को दो काम जरूर करनी चाहिए – एम्पेरुमान् के गुणो की कीर्तन करना , खुद के दोषों और अपराधो से चिन्तित होना [पर शोक / विलाप / रञ्ज व्यक्त करना] । मैं एम्पेरुमान् के गुणानुभव में मग्न हो गया था और मेरे दोषों के बारे में बिलकुल भी सोच नहीं रहा था अतः आप लोगों ने मेरा काम करके मुझे आपका आभारी बना दिया । इसी कारण आप को सम्मान करना मेरा धर्मं हैं । ” भट्टर् कि उदारता इतनी उच्च स्थिति कि थी ।
  • कई श्री वैष्णव भट्टर् के कालक्षेप गोष्टी में भाग लेते थे । एक दिन भट्टर् एक श्री वैष्णव की प्रतीक्षा कर रहे थे जिन्हे शास्त्र का ज्ञान बिलकुल भी नहीं था । कालक्षेप गोष्टि के अन्य विद्वान उनसे प्रतीक्षा करने का कारण पूछते है और भट्टर् कहते है – हलाकि यह श्रीवैष्णव को शास्त्रों का ज्ञान नही है परन्तु वह परम सत्यज्ञान से भलि-भांति परिचित है और उन्हे इसका आभास भी है । अपनी बात साबित करने के लिए ,वे एक विद्वान को बुलाकर उनसे पूछते हैं कि उपाय क्या हैं ? विद्वान उत्तर देते हुए कहते हैं कि शास्त्र में कई उपाय जैसे कर्म , ज्ञान, भक्ति योग के बारे में चर्चा की गयी हैं । बाद में पूछते हैं कि उपेय क्या हैं ? विद्वान जवाब देते हैं कि ऐसे कई उपेय हैं जैसे ऐश्वर्य , कैवल्य ,कैंकर्य इत्यादि । विद्वान का उत्तर सुनकर भट्टर कहते हैं कि विद्वान होने के बावजूद आपको स्पष्टता नहीं हैं । श्री वैष्णव के आगमन के पश्चात् भट्टर् उन्हें भी वही सवाल पूछते हैं तब श्री वैष्णव उत्तर देते हैं कि एम्पेरुमान् ही उपाय और उपेय हैं । भट्टर् कहते हैं यही हैं एक श्री वैष्णव का विशिष्ट निष्ठा और इसी कारण इनके लिए प्रतीक्षा की गई है ।
  • श्री सोमाजी आणडान् भट्टर् से तिरुवाराधन करने की विधि पूछते हैं । भट्टर उन्हें विश्लेष रूप से बताते हैं । एक बार वे भट्टर् के पास पहुँचते हैं । उस समय भट्टर् प्रसाद पाने के लिए तैयार हो रहे थे तब उन्हें याद आता हैं कि उन्होंने उस दिन का तिरुवाराधन प्रक्रिया पूर्ति नहीं किया हैं । उनके शिष्य से अपने तिरुवाराधन पेरुमाळ को लाने के लिए कहते हैं । अपने पेरुमाळ को भोग चढ़ाकर , प्रसाद पाना शुरू करते हैं । सोमाजी आणडान् उनसे प्रस्न करते हैं कि उन्हें क्यूँ एक विश्लेष् तिरुवाराधन का क्रम बताई गई हैं जब वे एक छोटी सी तिरुवाराधन प्रक्रिया से पूर्ति करते हैं । भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि उनसे एक छोटी तिरुवाराधन प्रक्रिया भी सहन करने कि क्षमता नहीं हैं क्यूंकि जब वे तिरुवाराधन कर रहे होते हैं तब ख़ुशी से भावुक हो कर मूर्छ हो जाते हैं लेकिन सोमाजी आणडान् को विश्लेष् तिरुवाराधन की प्रक्रिया भी पर्याप्त नहीं हो सकती क्यूंकि उन्हें सोम याग जैसे बड़े बड़े याग करने की आदत हैं |
  • एक समय श्री रंगम में उरियड़ी उत्सव मनाया जा रहा था । उस समय अचानक से वेद पारायण गोष्टी में रहने वाले भट्टर् ग्वालों के गोष्टी में मिल जाते हैं । किसीने इसका कारण पूछा तब वे बताने लगे की उस दिन एम्पेरुमान् का विशेष अनुग्रह ग्वालो पर होगा (क्यूंकि यह पुरपाड़ उन्ही के लिए मनाया जा रहा था )। और यह उचित होगा कि हम वहाँ रहे जहाँ एम्पेरुमान् का अनुग्रह प्रसारित हो रहा हैं ।
  • एक बार अनन्ताळवान् भट्टर् से पूछते हैं कि परमपदनाथन् को दो हाथ होंगे या चार? भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि कुछ भी सम्भव हो सकता हैं । अगर दो हाथ होंगे तो पेरिय पेरुमाळ की तरह और यादि चार हाथ हो तो नंपेरुमाळ की तरह सेवा देंगे ।
  • अम्माणि आळवान् बहुत दूर का रास्ता काटकर उनके दर्शन पाने के लिए आते हैं । उनसे विनती करते हैं कि कुछ अच्छे विषय उन्हें अनुग्रह कर । भट्टर् तिरुवायमोळि के नेडुमार्केडिमै पडिघम(१० पाशुर का समूह ) उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि भगवान को जानना थोडा सा प्रसाद पाने की बराबर हैं और भगवान के भक्त भागवतों को जानना भर पूर पेट भर प्रसाद पाने की बराबर हैं ।
  • एक राजा भट्टर् की ख्याति जानकर उनके पास आते हैं और उनसे कहते हैं कि आर्धिक रूप से सहायता के लिए उन्हें मिले। भट्टर् कहते हैं चाहे नंपेरुमाळ का अभय हस्त दूसरी ओर मुड़ क्यूँ न जाए तब भी वे किसी के पास सहायता के लिए नहीं जायेंगे ।
  • अमुदनार स्वयं को भट्टर् से भी महान मान रहे थे । (क्यूंकि उन्हें कूरताळवान से गुरु -शिष्य का सम्बंध हैं बल्कि भट्टर् को कूरताळवान से पिता -पुत्र का सम्बंध हैं ) । भट्टर् उनसे कहते हैं वास्तव में यह सच हैं लेकिन वे खुद इस विषय को सूचित करना उचित नहीं हैं ।
  • एक समय किसी ने भट्टर् से प्रश्न किया कि दूसरे देवी और देवताओं के प्रति एक श्री वैष्णव को कैसे पेश आना चाहिए । इसे सुनकर भट्टर् कहते हैं कि प्रश्न ही गलत हैं । यह पूछो की श्री वैष्णव के प्रति देवी और देवताओं को कैसे पेश आना चाहिए । देवी और देवता रजो और तमो गुण से भरे हुए रहते हैं और श्री वैष्णव सत्व गुण से रहते हैं और इसी कारण यह सहज सिद्ध हैं कि वे श्री वैष्णव के अनु सेवी हैं । (यह दृष्टान्त कूरताळवान् के जीवित चरित्र में भी बताया जाता हैं )
  • भट्टर् सीमा रहित यश के प्राप्त थे । उनकी माताजी जो स्वयं महान विद्वान थी पुत्र का श्री पाद तीर्थ सेवन करती थी । इस के बारे में प्रश्न किया गया तो वे बताते थे कि एक मूर्तिकार मूर्ति बनाता हैं और जब उस मूर्ती एम्पेरुमान् की तिरुमेनी बन जाती हैं तब वो मूर्ति मूर्तिकार से भी आराधनीय हो जाती हैं । इसी तरह भट्टर् उनके गोद से जन्म क्यूँ न लिए हो वे एक महान आत्मा हैं और पूजनिय हैं ।
  • एक समय दूसरे देवी और देवताओ के भक्त की धोती आकस्मिक तौर से भट्टर् को छू जाती हैं । एक बड़े विद्वान होने के बावजूद दूसरे देवताओ के भक्त की एक छोटी सी स्पर्श उन्हें बेचैन कर गयी । वे दौड़ कर उनकी माता के पास पहुंचकर उनसे तक्षण कर्तव्य के बारे में पूछा । उनकी माताजी ने बताया की केवल एक अब्राह्मण श्री वैष्णव की श्री पाद का तीर्थ लेने से ही इसका प्रायश्चित किया जा सकता हैं । ऐसे एक श्री वैष्णव की पताकर कर उनसे श्री पाद तीर्थ विनती करते हैं । भट्टर् की स्थाई जानकार वे निराकार कर देते हैं । भट्टर् उनपे ज़ोर डालकर तीर्थ सम्पादित कर लेते हैं ।
  • एक बार कावेरी नदि के किनारे मंडप में तिरुआळवट्ट( फाँका ) कैंकर्य कर रहे थे । सूर्यास्त के समय आने पर शिष्य गण उन्हें याद दिलाते हैं कि संध्या वंदन करने का समय आ गया हैं । तब भट्टर् समझाते हैं कि वे नंपेरुमाळ के आंतरंगिक कैंकर्य( गुप्त सेवा ) में रहने के कारण चित्र गुप्त(यम राज के सहायक )इस छूटे हुए संध्या वंदन को गिनती में नहीं लेंगे । अळगीय पेरुमाळ नायनार इसी सिद्धांत को अपने आचार्य ह्रदय में समझाते हैं कि ” अत्तानि चेवगत्तिल पोतुवानतु नळुवुम “। इसे उदहारण बताते हुए नित्य कर्मा के आचरण न करते दूरदर्शन एवं अन्य विषय में समय वेतित नहीं करना चाहिए ।
  • अध्ययन उत्सव के समय में आण्डाळ अपने पुत्र भट्टर् को द्वादशि के दिन पारना करने की याद दिलाती हैं । भट्टर् कहते हैं कि पेरिया उत्सव के समय हमे आखिर कैसे याद आएगा कि यह एकादशि हैं या द्वादशि ? इसका मतलब यह हुआ कि भगवद अनुभव करते समय भोजन के बारे में आलोचन नहीं करना चाहिए । कई लोग इसका अर्थ गलत तरीके से समझते हैं और कहते हैं कि एकादशी के दिन उपवास रखना जरूरी नहीं हैं लेकिन वास्तव में एकादशी उपवास अपना कर्तव्य हैं ।
  • एक दिन भट्टर् अपने शिष्य गण को उपदेश देते हैं कि हमें अपने शरीर पे अलगाव और शारीरिक अलंकरण पे अनिष्ट बढ़ाना चाहिए । लेकिन दुसरे हि दिन वे रेशम का कपडा पहनकर सज़-धज लेते हैं । उनकी शिक्षा और आचरण का अंतर का कारण शिष्य पूछते हैं तब भट्टर् बतलाते हैं कि वे अपने शरीर को एम्पेरुमान् का वास स्थल – कोविल आळ्वार मानते हैं । जिस तरह मंडप – जिस में एम्पेरुमान् केवल थोड़ी ही देर आसीन होते हैं को अलंकरण किया जाता हैं , उसी तरह उन्होंने अपने शरीर को अलंकरण किया हैं । उनकी तरह अगर हम भी ऐसा दृढ़ विश्वास / निष्टा बना ले तब हम भी अपने शरीर को अनेक रूप में अलंकरण कर सकते हैं ।
  • वीर सुन्दर ब्रह्म रायन जो उस प्रांत के राजा और आळवान् के शिष्य थे एक दीवार बनाना चाही तब पिळ्ळै पिळ्ळै आळवान् की तिरुमालिगै (घर ) को नष्ट / आकुल करना चाहा क्यूंकि उनका घर दीवार निर्माण करने में बाधा डाल रही थी । भट्टर् राजा को आदेश करते हैं कि आळवान् के घर को कुछ भी न किया जाए लेकिन राजा उनकी आदेशों का निरादर कर देते हैं । भट्टर् श्री रंगम छोड़कर तिरुकोष्टियूर् जा पहुँचते हैं और कुछ समय बिताते हैं । श्री रंगनाथन से जुदाई उन्हें सहन नहीं हो रही थी और दुःख सागर में डूब गए थे । राजा के चल पड़ने पर भट्टर् श्री रंगम लौट गए और लौटने के रास्ते में श्री रंगा राजा स्तव की रचना की ।
  • तर्क-वितर्क में भट्टर् थोड़े विद्वानो को हरा देते हैं । विद्वान भट्टर् के खिलाफ चाल चलना चाहा । शर्प को एक घड़े में रखकर उनसे पूछ घड़े में क्या हो सकता हैं । भट्टर् समझ जाते हैं और कहते हैं की घड़े में एक छत्री हैं । उनकी जवाब सुनकर विद्वान आस्चर्य हो जाते हैं । भट्टर् समझाते हैं कि पाईगै आळ्वार ने कहा हैं कि “चेनड्राल कुडयाम… ” शर्प (आदि सेशन) एम्पेरुमान् की छत्री हैं ।

उनके जीवित चरित्र में ऐसे कई मनोरंजनीय चिरस्मरणीय घटनाये हैं जिन्हे याद करने से हर पल आनंदमय हो जाता हैं ।

भट्टर् को अपनी माता श्री रंगा नाचियार से बहुत लगाव था । पेरिया पेरुमाळ से भी अधिक प्रेम उन पर था । एक बार श्री रंगनाथजी ने नाचियार के जैसे श्रृंगार हो कर भट्टर से पूछने लगे यदि वोह नाचियार की तरह लग रहे हैं । भट्टर् उन्हें गौर से देखकर कहने लगे सब कुछ ठीक हैं लेकिन नाचियार के आँखों में जो दय दिखती हैं वोह उनकी आँखों में नहीं हैं ।यह घटना हमें रामायण में हनुमानजी ने श्री रामजी और सीता मय्या के आँखों की तुलना करने की याद दिलाती हैं । वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि सीता मय्या के आँखा श्री रामा एम्पेरुमान् से भी सुन्दर हैं और उन्हें असितेक्षणा (सुन्दर आँख) कहके सम्बोध करते हैं । न्

अर्थ समझने के लिए मुश्किल पशुरों को भट्टर ने अद्भुत रूप से विवरण दिया हैं । जिनमे से कुछ हम इधर देखेंगे
१. पेरिया तिरूमोळि ७. १. १. करवा मदणगु पशुर में पिळ्ळै अमुदनार विवरण देते हैं कि एम्पेरुमान् एक बछडे की तरह और आळ्वार् गाय की तरह हैं । जिस तरह माता पशु अपने संतान के लिए तरसति हैं उसी तरह एम्पेरुमान् के लिए आळ्वार् तरस रहे हैं । भट्टर इसका अर्थ अलग दृष्टिकोण में बताते हैं जो पूर्वाचार्या ने बहुत सराय हैं । भट्टर् कहते हैं कि “करवा मादा नागु तान कन्ड्रु ” मिलकर पढ़ना चाहिए जिससे यह अर्थ प्राप्त होती हैं कि जैसे एक बछड़ा अपनी माता के लिए तरसता हैं उसी तरह आळ्वार् एम्पेरुमान् के लिए तरस रहे हैं ।
२ पेरिया तिरूमोळि ४.४.६ व्याख्यान में बताया जाता हैं कि अप्पन तिरुवळुंतूर अरयर और अन्य श्री वैष्णव भट्टर् से प्रार्थना करते हैं कि इस पाशुर् का अर्थ उन्हें समझाए । भट्टर् उन्हें पाशुर् पढने के लिए कहते हैं और फौरन बताते हैं कि यह पाशुर् आळ्वार् ने रावण के रूप में गाया हैं । यहाँ भट्टर् बताते हैं कि रावण (अपने अहंकार से ) कह रहा हैं कि “मैं तीनो लोकों का सम्राट हुँ और एक सामान्य राजा समझ रहा हैं कि वह एक महान योद्धा हैं और मुझे युद्ध में हरा देगा “- लेकिन आखिर में श्री राम एम्पेरुमान् के हाथो में हार जाता हैं ।

तिरुनारायणपुरम जा कर नंजीयर् को तर्क-वितर्क में हराना भट्टर् के जीवित चरित्र में एक मुख्य विषय मानी जाती हैं ।यह एम्पेरुमानार् की दिव्या आज्ञा थी कि वे नंजीयर् को सुधार कर उन्हें अपने संप्रदाय में स्वीकार करे । माधवाचार्यर् (नंजीयर का असली नाम ) से सिद्धान्त पे वाद करने के लिए भट्टर् अपने पालकी में बैठकर बहुत सारी श्री वैष्णव गोष्टी लेकर तिरुनारायणपुरम पहुँचते हैं । लेकिन उन्हें सलाह दिया किया के वे उस तरह शानदारी तौर से जाने पे माधवाचार्यर् के शिष्य उन्हें टोकेंगे और माधवाचार्यर् से उनकी मुलाकात विलम्ब करेंगे या हमेश के लिए नहीं मिलने देंगे और वोह लाभदायक नहीं होगा । सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर् रहस्य ग्रन्थ को कागज़ाद करने में पहले व्यक्ति हैं । इनसे रचित अष्टस्लोकी सर्वोत्कृष्ट रचना हैं जिसमे तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक केवल आठ स्लोकों में विशेष रूप से समझाई गई हैं । इनके श्री रंग राजा स्तव में अति क्लिष्ट शास्त्रार्थ अति सुलभ रीति से छोटे छोटे स्लोकों से समझाई गई हैं । श्री विष्णु सहस्रा नाम के व्याख्यान में बताते हैं कि हर एक तिरु नाम श्री महा विष्णु के प्रत्येक गुण को दर्शाता हैं । इसका विवरण अत्यंत सुन्दर रीति से कीया हैं । श्री गुण रत्न कोश श्री रांग नाचियार को अंकित हैं और इसके मुकाबले किसी भी ग्रन्थ सामान नहीं हैं ।

कई पूर्वाचार्य सौ से भी अधिक साल इस समसार में जीवन बिताये लेकिन  भट्टर् अति यौवन अवस्था में इस समसार को छोड़ दिए । कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । अपने माताजी के पास जाकर इस विषय के बारे में बताते हैं । पुत्र की मोक्ष प्राप्ति के बारे में सुनकर बहुत खुश हो जाती हैं ।(सच में अपने पूर्वाचार्यों की ऐसी निष्टा थी – वे जीवन के निज उद्देश को  पूरी तरह से जान चुके थे ) कुछ श्रीवैष्णव भट्टर् से पूछने लगे अगर पेरिया पेरुमाळ ने आपको ख़ुशी से मोक्ष प्रदान करना चाहा आपने क्यूँ नहीं इंकार किया?हम यहाँ क्या कर सकते हैं ? संसार में और कई जीवात्मों को सुधारन हैं। कौन उन्हें सुधारेंगे ?भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि मैं इस संसार में बस नहीं पाउँगा जिस तरह उत्तम गुणवत्ता का घी एक कुत्ते के पेट में हज़म नहीं हो सकती हैं उसी तरह इस समसार में रहने के लिए मैं ठीक नहीं हैं ।

भट्टर् अपने तिरुमालिगै को कई श्री वैष्णव को आमंत्रण करके शानदार सा तदियाराधन आयोजन करते हैं । पद्मासन में बैठकर तिरनेडुंदांडकम् को गाते एक बड़ी सी मुस्कान तिरुमुख में बनायीं रखे अपने चरम शरीर को छोड़कर परमपद प्रस्थान करते हैं । सभी लोग अश्रु मय हो जाते हैं और उनके चरम कैंकर्य करना शुरू कर देते हैं । आण्डाळ अम्मंगार अपनी पुत्र के चरम तिरुमेनी को ख़ुशी से गले लगाकर उन्हें विदा कर देती हैं । भट्टर् के जीवित चरित्र को पत्थर को भी पिगला देने की शक्ति हैं ।
हमें भी एम्पेरुमान् और आचार्यं के प्रति इन्ही की तरह लगाव प्राप्त करने के लिए भट्टर के श्री पाद पद्मों से प्रार्थना करे ।

तनियन :
श्री पराशर भट्टरया श्री रंगेस पुरोहिथ: ।
श्री वत्साण्क सुत: श्री मान श्रेयसे मेस्तु भूयसे ॥

अगले अनुच्छेद में नंजीयर के बारे में जानने की कोशिश करेंगे ।

अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

source

एम्बार्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “एम्पेरुमानार्” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य (एम्बार्) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

एम्बार् – मधुर मंगलम

तिरुनक्षत्र : पुष्य मास पुनर्वसु

अवतार स्थल : मधुर मंगलम

आचार्य : पेरिय तिरुमलै नम्बि

शिष्य : पराशर भट्टर , वेदव्यास भट्टर

स्थान जहाँ से परमपदम प्रस्थान हुए : श्री रंगम

रचना : विज्ञान स्तुति , एम्पेरुमानार वडि वळगु पासुर (पंक्ति )

गोविन्द पेरुमाळ कमल नयन भट्टर् और श्री देवी अम्माळ को मधुरमंगलम में पैदा हुए । ये गोविन्द भट्टर, गोविन्द दासर और रामानुज पदछायर के नामों से भी जाने जाते हैं । कालान्तर में ये एम्बार् के नाम से प्रसिध्द हुए । ये एम्पेरुमानार के चचेरे भाई थे । जब यादव प्रकाश एम्पेरुमानार को हत्या करने की कोशिश की तब ये साधक बनकर  उन्हें मरने से बचाया ।

एम्पेरुमानार की रक्षा करने के बाद अपनी यात्रा जारी रखते हैं और कालहस्ती पहुँचकर शिव भक्त बन जाते हैं । उन्हें सही मार्ग दर्शन करने के लिए एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि को उनके पास भेज देते हैं । जब गोविन्द पेरुमाळ अपने पूजा के निमित्त फूल तोड़ने के लिए नन्दनवन पहुँचते हैं तब पेरिय तिरुमलै नम्बि तिरुवाय्मोळि पाशुर् “देवन् एम्पेरुमानुक्कल्लाळ् पूवुम् पुसनैयुम् तगुम्” सुनाते हैं । जिसका मतलब हैं की केवल एम्पेरुमान् श्रीमन् नारायण ही फूलों से पूजा करने के अधिकारी हैं और अन्य कोई भी देवता इस के लायक नहीं हैं । इसे सुनकर गोविन्द पेरुमाळ को तुरंत अपनी गलती का एहसास होता हैं और शिव के प्रति भक्ति छोड़कर पेरिय तिरुमलै नम्बि के आश्रित हो जाते हैं । पेरिय तिरुमलै नम्बि उन्हें पंच संस्कार करके सम्प्रदाय के अर्थ विशेष प्रदान करते हैं। उसके पश्चात अपने आचार्य पेरिय तिरुमलै नम्बि की सेवा में कैंकर्य करते हुए रह जाते हैं ।

एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि से तिरुपति में मिलते हैं और उनसे श्री रामायण की शिक्षा प्राप्त करते हैं । उस समय की कुछ घटनाओ से हमें एम्बार् की महानता मालुम पड़ती हैं । आईये संक्षिप्त में उन संघटनाओं को देखे :

१.गोविन्द पेरुमाळ अपने आचार्य पेरिय तिरुमलै नम्बि की शय्यासन तयार करने के पश्चात वे आचार्य से पहले खुद उसके ऊपर लेट जाते हैं । एम्पेरुमानार् इस विषय को तिरुमलै नम्बि को बताते हैं । जब गोविन्द पेरुमाळ को इसके बारे में पूछते हैं तब वे जवाब देते हैं की ऐसे कार्य करने से उन्हें नरक प्राप्त होना निश्चय हैं परन्तु उसके बारे में उन्हें चिंता नहीं हैं । उनके आचार्य की तिरुमेनि (शारीर) की रक्षा करने में वे चिंतामग्न हैं । इसी का वर्णन मामुनिगळ श्री सूक्ति में करते हैं ( तेसारुम् सिच्चन् अवन् सीर् वडिवै आसैयुडन नोक्कुमवन् )

२.एक बार गोविन्दपेरुमाळ सांप के मुह मे हाथ दालकर कुछ निकालने की कोशिश कर रहे थे और उसके पश्चात वह भाह्यशरीर शुद्धिकरण (नहाने) हेतु चले गए । एम्पेरुमानार यह दृश्य दूर से देखकर अचंभित रह गए । जब एम्पेरुमानार उनसे इसके बारे में पूछते है तब वे बताते हैं की सांप के मुँह में काटा था और इसी लिए वह काटे को निलाने की कोशिश कर रहे थे और अन्त मे निकाल दिया । उनकी जीव कारुण्यता को देखकर अभिभूत हो गए ।

३.एम्पेरुमानार जब तिरुमलै नम्बि से आज्ञा माँगते हैं तब उन्हें कुछ भेंट समर्पण करने की इच्छा व्यक्त करते हैं । एम्पेरुमानार उन्हें गोविन्द पेरुमाळ प्रसाद करने को कहते हैं । तिरुमलै नम्बि आनंद से गोविन्द पेरुमाळ को सोंप देते हैं और उन्हें समझाते हैं की एम्पेरुमानार को उन्ही की तरह सम्मान करें और गौरव से व्यवहार करें । कांचिपुरम पहुँचने के पहले ही गोविन्द पेरुमाळ अपने आचार्य से जुदाई सहन नहीं कर पाते हैं और वापस आचार्य के पास पहुँच जाते हैं । लेकिन तिरुमलै नम्बि उन्हें घर के अन्दर आने की इझाजत नहीं देते हैं और कहते हैं की उन्हें एम्पेरुमानार को दे दिया हैं और उन्हें उन्ही के साथ रहना हैं । आचार्य की मन की बात जानकर एम्पेरुमानार के वापस चले जाते हैं ।

श्री रंगम पहुँचने के बाद गोविन्द पेरुमाळ के माता की प्रार्थन के अनुसार उनके शादि की व्यवस्था करते हैं । गोविन्द पेरुमाळ अनिच्छा पूर्वक शादि के लिए राज़ी होते हैं । लेकिन उनके पत्नी के साथ दाम्पत्य जीवन में भाग नहीं लेते हैं । एम्पेरुमानार विशेष रूप से गोविन्दपेरुमाळ को उनकी पत्नी के साथ एकान्त मे समय व्यतीत करने का उपदेश देते है परन्तु गोविन्दपेरुमाळ उनके पास निराशा से लौटकर कहते है की उन्होने ऐसा कोई  एकान्त जगह या स्थल नही देखा या मिला क्योंकि उन्हे सर्वत्र एम्पेरुमान दिखाई दे रहे है ।

तुरन्त एम्पेरुमानार उनकी मानसिक परिस्थिति जानकर उन्हें सन्याश्रम प्रादान करते हैं और एम्बार् का दास्यनाम देकर उनके साथ सदैव रहने के लिए कहते हैं ।

एक बार कुछ श्रीवैष्णव एम्बार् की स्तुति कर रहे थे और श्रीएम्बार् उस स्तुति का आनन्द लेते हुए श्रीएम्पेरुमानार की नज़र मे आए । श्रीएम्पेरुमानार ने गौर करते हुए श्रीएम्बार् को बताया की प्रत्येक श्रीवैष्णवों को स्वयम को एक घास के तिनके के समान तुच्छ मानना चाहिए और कदाचित प्रशंशा स्वीकार नही करनी चाहिए । प्रत्येक श्रीवैष्णव तभी प्रशंशा के योग्य होंगे जब उनमे विनम्रता का आभास उनके व्यवहार मे प्रतिबिम्बित हो ।

उत्तर देते हुए वे कहते हैं की अगर किसी ने उनकी स्तुति की तो वोह स्तुति उन्हें नहीं बल्कि एम्पेरुमानार को जाती हैं क्योंकि एम्पेरुमानार ही वह एक मात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने बहुत ही निचे स्तिथि में रहते उन्हें संस्कार किया हैं । एम्पेरुमानार उनके वचन स्वीकार करते हैं और उनकी आचार्य भक्ति की प्रशंसा करते हैं ।

एम्पेरुमान् के आपर कारुन्य और उनके दिए गए प्रसाद से आण्डाळ् को( कूरताल्वान् की पत्नी) दो शिशु पैदा हुए । एम्पेरुमानार् एम्बार् के साथ उनके नामकरण उत्सव को जाते हैं । एम्बार् से शिशुओ को लेकर आने का आदेश करते हैं । लेकर आते समय शिशुओ को रक्षा करने के लिए द्व्य महा मंत्र उन्हें सुनाते हैं । जब एम्पेरुमानार् उन्हें देखते हैं तब उन्हें तुरन्त एहसास होता हैं की एम्बार् ने उन शिशुओं को द्व्य महा मंत्र का उपदेश किया हैं ।एम्बार् को उनके आचार्य स्थान लेने का आदेश करते हैं । इस तरह वेद व्यास भट्टर् और पराशर भट्टर् एम्बार् के शिष्य बने ।

एम्बार् लौकिक विषय में इच्छा रहित थे । निरंतर केवल भगवद् विषय में जुटे रहते थे ।वे भगवद् विषय में महा रसिक ( आनंद / मनोरंजन चाहने वाले ) थे । कई व्याख्यान में एम्बार् के भगवद् विषय अनुभव के बारे में चर्चा की गयी हैं ।
कुछ इस प्रकार :

१. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि के अंतिम पाशुर में “छायै पोला पाडवल्लार् तामुम् अनुकर्गळे ” का अर्थ श्री वैष्णव एम्बार् से पूछते हैं तब वे व्यक्त करते हैं की उस पाशुर का अर्थ उन्होंने एम्पेरुमानार् से शिक्षा प्राप्त नहीं किया हैं । उस समय वे एम्पेरुमानार् के श्री पाद अपने सिर पे धारण करके उनका ध्यान करते हैं । उसी समय एम्पेरुमानार् “पाडवल्लार् – छायै पोला – तामुम् अनुकर्गळे ” करके उस पाशुर का अर्थ प्रकाशित करते हैं जिसका मतलब हैं की जो कोई भी यह पाशुर पठन करेंगे वे एम्पेरुमान् के करीब उनकी छाया जैसे रहेंगे।

२. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि २.१ का अभिनय उय्न्था पिल्लै अरयर् कर रहे थे तब वे बताते हैं कण्णन् एम्पेरुमान् अपने आँख डरावनी करके गोप बालकों को डराते थे । पीछे से एम्बार् अभिनय पूर्वक बताते हैं की कण्णन् एम्पेरुमान् अपने शँख और चक्र से गोप बालकों को डराते हैं । इसे अरयर् ध्यान में रखकर अगली बार एम्बार् के बताये हुए क्रम में अभिनय करते हैं । इसे देखकर एम्पेरुमानार् पूछते हैं ” गोविन्द पेरुमाळे इरुन्थिरो “(आप गोष्टि के सदस्य थे क्या ) क्यूंकि केवल एम्बार् को ही ऐसे सुन्दर अर्थ गोचर हो सकता हैं ।

३. तिरुवाय्मोळि(मिन्निडै मडवार् पदिगम् – ६.२ ) में आळ्वार् के हृदय में कण्णन् एम्पेरुमान् से विश्लेश का दुःख सन्यासी होते बाकी उन्हें ही अच्छी तरह समझ आगई । और वे उस विशेष पदिगम् ( १० पाशुर ) का अर्थ अद्भुत रूप से बता रहे थे उन्हें सुनकर श्री वैष्णव आश्चर्य चकित हो गए । इससे यह स्पष्ट होता हैं की एम्पेरुमान् का किसी भी विषय आनंददायिक हैं और अन्य किसी भी तरह के विषय त्याग करने के लायक हैं ।
इसी विषय को “परमात्मनि रक्तः अपरात्मानी विरक्तः ” कहा जाता हैं ।

४. तिरुवाय्मोळि (१० -२ ) के व्याख्यान में एक दिलचस्प विषय बताई जाती हैं । एम्पेरुमानार् अपने मट में तिरुवाय्मोळि के अर्थ विशेष को स्मरण करते हुए टहल रहे थे और पीछे मुड़कर देखे तो उन्हें एम्बार् दिखाई दिए । एम्बार् उन्हें दरवाज़े के पीछे रहकर देख रहे थे और एम्पेरुमानार् से पूछते हैं की क्या वे मद्दित्हें पाशुर के बारे में ध्यान कर रहे थे और उस विषय को एम्पेरुमानार् मान लेते हैं इससे पता चल रहा हैं की एक छोटी सी काम करने से ही उन्हें एम्पेरुमानार् की सोच के बारे में जानकारी हो जाती हैं ।

अंतिम समय पर पराशर् भट्टर् को आदेश देते की श्री वैष्णव सम्प्रदाय का प्रशासन श्री रंगम से कियी जाय । और ये भी सूचित करते हैं की वे निरंतर “एम्पेरुमानार् तिरुवडिगळे तन्जम्” (एम्पेरुमानार् के श्री पाद ही सोने के बराबर हैं ) कहके आलोचना करे ।एम्पेरुमानार् पे ध्यान करते हुए अपनी चरम तिरुमेनि (शरीर ) छोड़कर एम्पेरुमानार् के साथ नित्य विभूति में रहने के लिए परम पदम् प्रस्थान करते हैं ।

आईये हम भी उन्ही की तरह एम्पेरुमानार् और आचार्य के प्रति प्रेम पाने के लिए उनके श्री चरणों पे प्रार्थन करें ।

तनियन :
रामानुज पद छाया गोविन्दह्वा अनपायिन्ल
तद यत्त स्वरुप सा जियान मद विश्रामस्थले

अगले भगा में पराशर् भट्टर् की वैभवता जानने की कोशिश करेंगे ।

source

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि