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पिळ्ळै लोकाचार्य

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण वाळि के अंतर्गत श्री वडुक्कुतिरुवीधिपिळ्ळै के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाळि के अंतर्गत अगले आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के बारें मे चर्चा करेंगे ।

piLLai lokAchArya

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास , श्रावण नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

शिष्यगण – कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – ज्योतिष्कुडि ( मधुरै के पास)

ग्रंथरचनासूचि – याद्रिचिक पडि, मुमुक्षुपाडि, श्रियःपति, परंत पडि, तनि प्रणवम्, तनि द्वयम्, तनि चरमम्, अर्थ पंचकम्, तत्वत्रयम्, तत्वशेखरम्, सारसंग्रहम्, अर्चिरादि, प्रमेयशेखरम्, संसारसाम्राज्यम्, प्रपन्नपरित्राणम्, नवरत्तिनमालै, नवविधासंबंधम्, श्रीवचनभूषणम् इत्यादि

श्रीरंग मे पिळ्ळै लोकाचार्य नम्पिळ्ळै के विशेष अनुग्रह से वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को पुत्र के रूप मे प्रकट हुए ( यह हमने पूर्व अनुच्छेद मे बताया ) । जिस प्रकार अयोध्या मे श्री राम पेरुमाळ और [लक्ष्मण] इळय पेरुमाळ, गोकुल मे श्री कृष्ण भगवान और नम्बि मूतपिरान [बलराम] बडे हुए उसी प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य और उनके छोटे भाई अळगिय मणवाळ नायनार श्रीरंग मे बडे हुए । दोनो भाई हमारे सत्सांप्रदाय के कई आचार्य – नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चानपिळ्ळै, वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै इत्यादि के विशेष अनुग्रह के पात्र हुए । उन्होने अपने पिता के चरण कमलों का आश्रय लेकर सत्सांप्रदाय के बारें मे सीखा । इन दोनों भाईयों ने उनके जीवन काल मे नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करने का शपथ लिया और यह उन दोनो आचार्यसिंहों का विशेष गुण था ।

इस भौतिक जगत मे शोषित जिवात्माओं के प्रति अत्यन्त कारुण्य भावना रखते हुए श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने भगवान श्रीमन्नारायण की असीम कृपा से कई सारे ग्रंथों की रचना किये जो केवल हमारे सत्सांप्रदाय के बहुमूल्य अर्थों को सरल संस्कृत-तमिल भाषा मे दर्शाता है और यह केवल एक आचार्य से शिष्य को व्यक्तिगत आधार पर प्राप्त होता था ।

पिळ्ळै लोकाचार्य अन्ततः हमारे सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक हुए और वे अपने शिष्यों को श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय के विषयों पर आधारित ज्ञान का शिक्षण दे रहे थे । एक बार मणप्पाक्कतु नम्बि देवपेरुमाळ के पास जाकर उनसे शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करते है । देवपेरुमाळ यह स्वीकार कर उन्हे शिक्षण देने लगे । परंतु श्री देवपेरुमाळ बींच मे प्रशिक्षण स्थगित कर मणप्पाक्कतु नम्बि को आदेश देते है कि वह श्री रंग जाये जहाँ इनका स्थगित प्रशिक्षण पुनः आरंभ करेंगे । यह जानकर मणप्पाक्कतु नम्बि खुशी खुशी श्री रंग की ओर निकल पडे । श्री रंग मे स्थित काट्टऴ्गिय सिंगर मंदिर पहुँच कर वह श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के कालक्षेप घोष्टि को देखते है । एक स्तंभ के पीछे छुपकर वह प्रवचन को सुनते हुए उन्हे आश्चर्य होता है कि वह अपने स्थगित प्रशिक्षण को पुनः सुन रहे थे । यह जानकर वह उनके समक्ष प्रत्यक्ष हुए और उनसे पूछा –  अवरो नीर ( क्या आप देव पेरुमाळ है ? ) और पिळ्ळै लोकाचार्य ने कहा – अवतु , येतु ( जी हाँ , अब क्या करुँ) .. यह घटना से स्पष्ट है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है और इसे हमारे पूर्वाचायों ने स्वीकार किया है ।

एक और घटना घटी जिसका विवरण यतीन्द्रप्रणवप्रभावम् मे है जो यह साबित करता है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अन्तिम काल के दौरान, ज्योतिष्कुडि मे अपने शिष्य नालुर पिळ्ळै को उपदेश देते है की वह तिरुमलै आऴवार को सत्संप्रदाय के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दे । उसके बाद जब नालुरपिळ्ळै और तिरुमलै आऴवार देव पेरुमाळ के दर्शन हेतु गए तब श्री देव पेरुमाळ ने स्वयम नालुर पिळ्ळै को संबोधित करते हुए कहा – मैने जिस प्रकार ज्योतिष्कुडि मे तुम्हे उपदेश दिया की तुम्हे जरूर तिरुमलै आऴवार को अरुलिच्चेयल् के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दो — अब तक आपने क्यों मेरे आदेशों का पालन नहि किया ?

पिळ्ळै लोकाचार्य ने मुमुक्षुवों (यानि जो जीवात्मा भगवद्-कैंकर्य मोक्ष के प्रति आसक्त है) के उत्थापन हेतु भगवान कि असीम कृपा से कई ग्रंथों की रचना किये । उन मे से अठारह ग्रंथ केवल हमारे सत्-सांप्रदाय के विशेष दृष्टिकोण को दर्शाता है (यानि सांप्रदाय के गुडार्थों) [जैसे – रहस्य त्रयम्, तत्व त्रयम्, अर्थ पंचकम्, इत्यादि] जो नम्माऴ्वार के तिरुवामोऴि पर आधारित है । इन मे से निम्नलिखित श्री वैष्णवों के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण है  –

1) मुम्मुक्षुप्पडि – यह एक रहस्य ग्रंथ है जिसमे श्री पिळ्ळैलोकाचार्य ने रहस्य त्रय – {तिरुमंत्र (अष्टाक्षरी मंत्र), द्वयमहामंत्र, चरमश्लोक} का विवरण बहुत ही उत्कृष्ट और सरल सूत्रों मे दिया है । इसी ग्रंथ पर श्री मनवाळ मामुनि ने टिप्पणि लिखे । यह एक ऐसा मूल ग्रंथ है जिसके बिना प्रत्येक श्रीवैष्णव रहस्य त्रय की महिमा और वैभव कभी नही जान सकता ।

2) तत्व त्रय – यह ग्रंथ कुट्टि भाष्य ( छोटा श्री भाष्य ) के नाम से प्रसिध्द है । यह ग्रंथ श्री भाष्य पर आधारित है जिसमे स्वामि पिळ्ळै लोकाचार्य ने तीन तत्वों (चित, अचित, ईश्वर) का सारांश सरल सूत्रों मे बतलाया है । और फिर श्री मामुनि के व्याख्यान के बिना हम इस ग्रंथ के वैभव और महिमा कदाचित नहि जान पायेंगे ।

3) श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र – यह ग्रंथ की रचना केवल और केवल पूर्वाचार्य और आऴ्वारों के दिव्य कथन पर आधारित है । यह ग्रंथ श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का महान काम है जिसमे हमारे सत्-सांप्रदाय के गूडार्थों का स्पष्टीकरण है । यह ग्रंथ सत्सांप्रदाय के गोपनीय अर्थों को दर्शाता है और श्री मामुनि इस ग्रंथ पर आधारित अपनी टिप्पणि मे इसका स्पष्टीकरण देते है । तिरुनारायणपुरत्तु आयि ने इस ग्रंथ पर टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

अनुवादक टिप्पणि – प्रत्येक श्रीवैष्णव का कर्तव्य है की अपने जीवन काल मे एक बार इन ग्रंथों पर आधारित कालक्षेप ज़रूर सुने ।

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए ।  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए । हलांकि प्रमाणरक्षक के होने के बावज़ूद वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] । कहते है जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे ।

वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परम पद को प्रस्थान हुए ।

मणवाळ मामुनि अपने उपदेशरत्तिनमालै मे श्री पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित करते हुए उनके दिव्य शास्त्रों मे श्री वचनभूषण को और भी अत्यधिक गौरन्वित किये । इस दिव्य ग्रंथ मे मामुनि आळ्वारो के अवतारों , पूर्वाचार्यों के अवतारों , श्री रामानुजाचार्य की कृपा ( जिन्होने इस सत्सांप्रदाय का आरंभ किया और जिसमे सभी लोग आमंत्रित है और जहा योग्य/अयोग्य नहि देखा जाता है ) तिरुवाय्मोळि पर आधारित टिप्पणियों का उल्लेख इत्यादि और श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का असीमित वैभव और अन्ततः श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव और इस ग्रंथ मे लिखित सूत्रों के अर्थों का सार हम सब के लिए प्रस्तुत किये । श्री मामुनि कहते है – प्रत्येक श्री वैष्णव को श्री वचनभूषण मे प्रस्तुत सूत्रार्थों का पालन हमारे जीवन मे अत्यावश्यक है और इस प्रकार पालन करने से हम सभी निश्चित रूप से एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) के कृपा के पात्र होंगे । श्री मामुनि कहते है – अगर हमे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों के ज्ञान और अनुष्ठान (सदुपदेश और सात्विक जीवन) पर विश्वास नहि है और अपने बुद्धि से खुद के अर्थ , ज्ञान , व्याख्या , तर्क इत्यादि की रचना करें तो केवल वह हमारे अज्ञान को दर्शाता है । मामुनि जो कभी भी अपने व्याख्यानों मे या कालक्षेपों मे अपशब्दों का प्रयोग नहि करते परन्तु उन्होने कई बार मूर्ख शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि वे यहाँ उन लोगों का निर्दयता को दर्शाते है जिन्हे पूर्वाचार्यों के श्री सूक्तियों पर विश्वास नहि है और इस विश्वास के बिना वे लोग श्री वैष्णव होने का अभिनय करते है ।  इस प्रकार श्री वचनभूषण पर आधारित तत्वसार को श्री मामुनि ने अपने उपदेश रत्तिनमालै मे प्रस्तुत किया है ।

वेदान्ताचार्य ( श्री निगमान्त महा देशिकन् ) ने एक बहुत हि सुन्दर अनोखे प्रभंध की रचना किये जिसे हम लोकाचार्य पंचाशत के नाम से जानते है जिसमे केवल और केवल पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित किया गया है । हलांकि वेदान्ताचार्य  पिळ्ळै लोकाचार्य के उम्र के तुलना मे पच्चास वर्ष छोटे थे परन्तु पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति उनकी श्रद्धा और प्रशंसा गौरवनीय है और इस ग्रंथ का पाठ तिरुनारायणपुरम के हर रोज़ होता है । अंग्रेज़ी भाषा मे इस ग्रंथ का सरल अनुवाद श्री ऊ.वे टी सी ए वेंकटेशन स्वामि द्वारा प्रस्तुत है – http://acharya.org/books/eBooks/vyakhyanam/LokacharyaPanchasatVyakhyanaSaram-English.pdf.

इस प्रकार हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के असीमित विशेष वैभव और महिमा को समझने मे सक्षम हुए है जिन्होने हमारे सत्साम्प्रदाय के संरक्षण हेतु अपना जीवन समर्पित किया । प्रत्येक व्यक्ति जो अपने आप को श्रीवैष्णव से संभोधित करता है उसे पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति असीमित श्रद्धा और कृतज्ञता [उपाकार स्मृति] होनी चाहिये क्योंकि उनके बिना ना हम नम्पेरुमाळ को देख पायेंगे और ना हि एम्पेरुमानार दर्शन के गूडार्थों को समझ पायेंगे ।

हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के चरण कमलों का आश्रय लेकर प्रार्थना करे की हम सभी को भगवान और अपने आचार्य के प्रती सत्भावना हो  ।

पिळ्ळै लोकाचार्य का तनियन् –

लोकाचार्य गुरवे कृष्ण पादस्य सूनवे । संसार भोगि संतष्ठ जीव जीवातवे नमः ॥

पिळ्ळै लोकाचार्य और उनकी घोष्टि का मंगलाशासन –

वाळि उलगासिरियन् वाळि अवन् मन्नु कुलम् | वाळि मुडुम्बै एन्नु मानगरम् ||

वाळि मनम् चूळ्न्त पेरिन्ब मल्गुमिगु नल्लार् | इनम् चूळ्न्तु इरुक्कुम् इरुप्पु ||

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद (लेख) मे ओराणवाळि के अन्तर्गत श्री नम्पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा की थी । आगे बढते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के बारे मे चर्चा करेंगे ।

vadakkuthiruveedhipillai

तिरुनक्षत्र – ज्येष्ट मास स्वाति नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – नम्पिळ्ळै

शिष्यगण – पिळ्ळैलोकाचार्य, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – तिर्वरुंगम

ग्रन्थ सूची – ईडु 3000 पाडि

श्री कृष्णपादर के रूप मे जन्म लेकर, वे वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के नाम से प्रसिध हुए । वे नम्पिळ्ळै के शिष्यगण मे से उनके प्रधान महत्वपूर्ण  शिष्य हुए ।

हलांकि गृहस्थाश्रम मे होने के बावज़ूद वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै शुरू से ही आचार्य निष्ठा मे सदैव स्तिथ थे और उनहे संतान पैदा करने के विषय मे संबन्धरहित इच्छा व्यक्त किया करते थे । यह जानकर उनकी माँ उनके गुरू श्री नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे अपने सुपुत्र के विरुद्ध शिकायत करती है । श्री नम्पिळ्ळै यह जानकर उनके शिष्य वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी सत्पत्नी को अपने घर आने का आमंत्रण देते है । आमंत्रण पाकर खुशी से आचार्य के घर जाकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी पत्नी आचार्य के कृपा के पात्र बने और फिर आचार्य नम्पिळ्ळै ने वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै को सन्तान पैदा करने के कार्य मे संलग्न होने का उपदेश दिया । आचार्य के सदुपदेश पाकर स्वामि पिळ्ळै उस कार्य को आचार्य प्रीति के लिये संपूर्ण करते है । आचार्य का विशेष अनुग्रह पाकर श्री पिळ्ळै को एक सत्पुत्र की प्रप्ति होति है और स्वमि पिळ्ळै अपने सत्पुत्र का नाम – श्री पिळ्ळै लोकाचर्य रखते है [जो लोकाचार्य {नम्पिळ्ळै} के विशेष अनुग्रह से प्राप्त हुआ] । श्री पिळ्ळै अपने आचार्य को यह बताते है तब उन्हे पता चलता है कि आचार्य नम्पिळ्ळै की सोच कुछ और ही थी । नम्पिळ्ळै नवजात शिशु का नाम अळगिय मनवाळन  रखना चाहते थे । अपने आचार्य का विचार जानकर स्वामि पिळ्ळै को भगवान [अळगिय मणवाळन – नम्पेरुमाळ] और आचार्य की असीम कृपा से फिर से एक नव जात शिशु को जन्म देते है जिनका नाम अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार रखा गया । तो कुछ इस प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दो विशेष रत्नों को जन्म देकर हमारे सत्सांप्रदाय को गौरान्वित और वैभवशालि ख्याति दिये । हमारे पूर्वाचार्यों  वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै की तुलना पेरियाळ्वार से करते है और इसी तुलना मे कुछ विशेष उल्लेख प्रस्तुत है –

पेरियाळ्वार और वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै दोनो ही ज्येष्ठ मास स्वाति नक्षत्र मे अवतरित हुए ।

पेरियाळ्वार ने भगवान की असीम कृपा से तिरुप्पळ्ळाण्डु , पेरियतिरुमोळि नामल दिव्यप्रबंधो की रचना किये । स्वामि वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने ईडु (छत्तीस हज़ार) पाडि नामक टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

जिस प्रकार पेरियाळ्वार ने आण्डाळ को हमारे सत्सांप्रदाय को सौंपा और उनका पालन पोषण कृष्णानुभव मे हुआ उसी प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने अपने दो दिव्यरत्नों जैसे सत्पुत्रों का पालन पोषण भगवद्-विषय मे किया ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै नम्पिळ्ळै के तिरुवाय्मोळि पर आधरित प्रसंगो को हर रोज़ सुनते थे और अपने आचार्य के संबन्ध मे अपना समय व्यतीत करते थे । उसी दौरान वो हर रोज़ रात को इन प्रसंगो को ताम्र पत्रों मे लिखने का कार्य किया करते थे । अतः इस प्रकार श्री नम्पिळ्ळै के प्रसंगो को लिखकर ईडु (छत्तीस हज़ार) नामक ग्रंथ श्री नम्पिळ्ळै के ज्ञान के बिना अवतरित हुआ ।

एक बार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै अपने आचार्य को अपने तिरुमालिगै ( घर ) मे तदियाराधन के लिये आमंत्रित करते है और आमंत्रण स्वीकार कर खुशी से श्री नम्पिळ्ळै उनके तिरुमालिगै जाते है । नम्पिळ्ळै खुद आराध्य पेरुमाळ का तिरुवाराधन शुरू करते है और उसी दौरान उनकी दृष्टि वहाँ पडे ताम्रपत्रों की ओर जाति है । स्वभावतः आकृष्ट स्वामि नम्पिळ्ळै उन ताम्रपत्रों को पढने लगे और फिर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे – पिळ्ळै ये क्या है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने कहा – स्वामि , प्रिय आचार्य – यह आपके प्रसंग है जो तिरुवाय्मोळि पर आधारित है जिनको मैने सुरक्षित यथारूप ताम्रपत्रों पर बिना आपके ज्ञान के लिखा और इसका खेद मुझे है इसीलिये कृपया कर मुझे माफ़ करे । स्वामि नम्पिळ्ळै पेरिवाच्चानपिळ्ळै और ईयुन्निमाधवपेरुमाळ को इस ग्रंथ को पढने का आदेश देते है । वे दोनो यह ग्रंथ पढकर इस ग्रंथ की प्रसंशा अत्यन्त हर्ष से करते है । स्वामि नम्पिळ्ळै यह जानकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे –  क्यो तुमने अपने बलबूते स्वतंत्र निर्णय लेकर यह कार्य किया ? क्या यह पेरियवाच्चानपिळ्ळै के व्याख्यान के बराबरि  मे किया गया कार्य है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै यह सुनकर शर्मिन्दा हो गये और फिर अपनी गलती मानकर अपने आचार्य की शरण लेकर कहा – मैने यह इसी लिये किया ताकि मै भविष्य मे वापस पढकर इसका उपयोग मेरे जीवन मे कर सकूँ ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दृढ़ विश्वस्वनीय कथन को सुनकर अती प्रसन्न नम्पिळ्ळै ने कहा – निश्चित है की तुम एक विशेष अवतार हो जिसने नष्टरहित यह ग्रंथ प्रस्तुत किया और इसीलिये यह ग्रंथ वह श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ को सौपेंगे जो अपने वंश के उत्तराधिकारियों समझायेंगे और कुछ इस तरह यह ग्रंथ अन्ततः श्री मणवाळमुनि को बतलाया गया और मणवाळमुनि ने यह ग्रंथ हम सब लोगों के लिये प्रस्तुत किया । भगवान की असीम कृपा से नम्पिळ्ळै पूर्वानुमान लगा सके की यह ग्रंथ श्री मणवाळमुनि के द्वारा पूरे विष्व मे इस ग्रंथ का खुलासा होगा और यह तभी हो सकेगा जब यह ग्रंथ श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ के वंश के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होकार मणवाळमुनि को अन्ततः प्राप्त होगा ।

नन्जीयार परमपद को प्रस्थान होने पश्चात वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै हमारे सत्सांप्रदाय के अगले दर्शनप्रवर्तकाचार्य हुए । वे अपने पुत्रों [पिळ्ळै लोकाचार्य, अळगियमणवाळनायनारपेरुमाळ] को दिव्य गूडार्थों का सार समझाये । अपने अन्तिम काळ अपने आचार्य के दिव्यमंगल गुणों का विचार करते हुए वे अपना भौतिक शरीर त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए ।

अनुवादक टिप्पणि –

पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्री वचनभूषण दिव्यशास्त्र मे वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दिव्य उपदेशों को दर्शाते है जिसके उदाहरण निम्नलिखित है –

सूत्र 77 – कहा गया है जब अहंकार का ताग पूर्ण तरह होता है , तभी एक जीवात्मा “अडियेन” कहलायेगा । यह दिव्य उपदेश का विवरण वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दिया जो “यतीन्द्रप्रणवम” नामक ग्रंथ मे लिखित है ।

सूत्र 43 – पिळ्ळैलोकाचार्य इस सूत्र मे दर्शाते है की प्रत्येक जीवात्मा अपने स्वातंत्र से इस भौतिक जगत मे अंगिनत असंखेय चिरकाल से बद्ध है और इन जिवात्मावों का उद्धार तभी होगा जब वे एक सदाचार्य श्रीवैष्णव का शरण लेंगे ।

हम सब श्री वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए यह प्रार्थना करें की हम सब भी उनकी तरह श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती प्रेम,आसक्ती,अनुरक्ति भावना जाग्रुक करें।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै तनियन –

श्री कृष्ण पाद पादाब्जे नमामि सिरसा सदा । यत्प्रसाद प्रभावेन सर्व सिद्धिरभून्मम ॥

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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