एम्पेरुमानार

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे श्री पेरियनम्बि के जीवन की चर्चा की थी और उसी को आगे बढ़ाते हुए श्री रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार) के जीवन की चर्चा करेंगे ।

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तिरुनक्षत्र : चैत्र मास , आर्द्रा  नक्षत्र

अवतार स्थल : श्रीपेरुम्पुदुर

आचार्य : पेरियनम्बि

शिष्यगण : कूरत्ताळ्वार , मुदलियान्दान , एम्बार , अरुळळपेरुमाळ एम्पेरुमानार , अनन्ताळ्वान , चौहत्तर सिंहासनाधिपति , हज़ारों शिष्य । कहते है की उनके बाराहज़ार श्रीवैष्णव, चौहत्तर सिंहसनाधिपति , सात सौ संयासि , अनेक कुलों और जातियों के अन्तर्गत कई सारे शिष्य हुए ।

स्थल जहाँ से परपदम की प्राप्ति हुई : तिरुवरंगम (श्रीरंगम)

मुख्य ग्रंथरचना की सूचि : उन्होने नौ ग्रंथो की रचना की थी जिन्हे नौरत्नो के बराबर माना गया है जो कुछ इस प्रकार है 1) श्रीभाष्य ( श्रीवेदव्यास के ब्रह्मसूत्रो पर टिप्पणि ) , 2) श्रीगीताभाष्य ( श्रीमद्भगवद्गीता पर टिप्पणि ) , 3) वेदार्थसंग्रहम , 4) वेदान्तदीपम , 5) वेदान्तसारम , 6) शरणगतिगद्यम , 7) श्रीरंगगद्यम , 8) श्रीवैकुण्ठगद्यम , 9) नित्यग्रंथम

इळयाळ्वार श्री केशवदीक्षितर और श्रीमती कान्तिमति के पुत्र के रूप मे अवतरित हुए जो खुद श्रीअनन्तशेष के अवतार माने गए है और इस प्रकार वह कई नामों से प्रसिध्द है । अब हम उनके कुछ नामों का वर्णन करेंगे को कुछ इस प्रकार है

1) इळयाळ्वार – पेरियतिरुमलनम्बि ने उन्हे यह नाम उनके पूजनीय माता-पिता के हेतु दिया

2) श्रीरामानुज – उनके आचार्य श्रीपेरियनम्बि ने दीक्षा के समय दिया

3) यतिराज – श्री देवपेरुमाळ ने उनके संयासाश्रम के दीक्षा के समय दिया

4) उडयवर – नम्पेरुमाळ ने दिया

5) लक्ष्मण मुनि – तिरुवरंगपेरुमाळरयर ने दिया

6) एम्पेरुमानार – श्री तिरुक्कोष्टियूर नम्बि ने यह नाम दिया जब श्रीरामानुजाचार्य ने उपस्थित लोगों के समक्ष श्रीचरमश्लोक का गोपयीनरहस्य बताया

7) शठगोपनपोन्नडि – तिरुमालैयान्दान

8) कोइल अण्णन – आण्डाळ ने यह नाम दिया जब श्रीरामानुजाचार्य ने सौ दीपों और सौ माखन का भोग तिरुमालिरुंचोलै अळगर (भगवान) को प्रस्तुत किया

9) श्रीभाष्यकार – श्री सरस्वती देवी ने कश्मीर मे यह नाम उनकी टिप्पणि को गौरन्वित करने के लिए दिया

10) भूतपुरीसर – श्रीपेरुम्पुदुर के श्रीआदिकेशवपेरुमाळ ने दिया

11) देशिकेण्द्रर – श्रीतिरुवेण्कटमुदायन

उनके जीवन का संक्षिप्त वर्णन :- 

  • वह श्री तिरुवल्लिक्केणि पार्थसारथि एम्पेरुमान के अंशावतर के रूप मे श्री पेरुपुदुर मे अवतरित हुए ।
  • वह श्री रक्षाम्बाल (तन्जम्माळ) से विवाह करते है ।
  • वह कांचिपुरम मे श्री यादवप्रकाश के शिष्य बनकर सामान्य शाश्त्र और पूर्वपक्ष सीखते है ।
  • जब श्रीयादवप्रकाश शाश्त्रों के वाक्यों का गलत तात्पर्य समझाने की कोशिश करते है तब श्री एम्पेरुमानार उनहे दूसरे उदाहरणों से अपने विचार व्यक्त करते है । इस प्रकार सही तात्पर्य समझाकर श्रीयादवप्रकाश को सही तात्पर्य समझाने को प्रेरित करते है ।
  • एक बार वारणासि की यात्रा के दौरान , श्री यादवप्रकाश के कुछ शिष्यगण श्री इळयाळ्वार को मारने का प्रयास करते है । इस विषय को जानकर श्री गोविन्द (एम्बार – जो इळयाळ्वार के चचेरे भाई थे) के आदेशानुसार इळयाळ्वार ने अपनी जान बचा तो ली परन्तु वह जंगल मे खो गए । इसी दौरान श्री इळयाळ्वार को श्री देवपेरुमाळ और पेरुन्देवितायर उनकी रक्षा करते है और उनहे कांचिपुरम का रास्ता बतलाते हुए अदृश्य हो गए ।
  • उनके वापसी पर उनकी माताश्री की आज्ञा से वह तिरुक्कच्चिनम्बि के नेतृत्व मे देवपेरुमाळ की सेवा मे जुट गए ।
  • इळयाळ्वार अपने आचार्य श्री पेरियनम्बि से मिलकर उनसे दीक्षा लेकर श्री कांचिपुरम की और अपने आचार्य के साथ निकल पडे । वहाँ जाकर श्री यामुनाचार्य के मृत शरीर के सामने श्री रामानुजाचार्य यामुनाचार्य के तीन कामनावों को पूर्ण करने का आश्वासन देते है ।
  • इसी दौरान श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि को आचार्य मानकर उनसे दीक्षा की विनती करते है परन्तु तिरुक्कच्चिनम्बि शाश्त्रों के आधार पर अपने आप को इसके काबिल नही मानकर उनहे समझाते है । श्री इळयाळ्वार की दुविधा देखकर श्री देव पेरुमाळ तिरुकच्चिनम्बि के द्वारा छे उपदेश इळयाळ्वार के लिए प्रस्तुत करते है । इसके बाद श्री इळयाळ्वार अपने आचार्य पेरियनम्बि से मिलने के लिए रवाना होते है और इसी दौरान श्री पेरियनम्बि अपने शिष्य से मिलने के लिये अपने परिवार के साथ रवाना हुए । इसके पश्चात वह दोनो मथुरान्थगम मे मिले और श्री इळयाळ्वार की दीक्षा श्री पेरियनम्बि के हाथों सम्पन्न हुई तब उनका दास्यनाम श्रीरामनुज रखा गया ।
  • उसके पश्चात श्री रामानुज संयासाश्रम श्री देवपेरुमाळ के हाथो स्वीकार करते है ।
  • श्री कूरत्ताळ्वान और आण्डान उनके शिष्य हुए ।
  • यादवप्रकाश भी श्रीरामानुजाचार्य के विख्यात को जानकर उनके शिष्य बन जाते है और उनको श्रीगोविन्दजीयर का दास्यनाम दिया । उन्होने बाद मे ” श्रीयतिधर्मसमुच्चयम् ” नामक ग्रन्थ की रचना की जो आजकल श्रीवैष्णव संयासियों का मार्गदर्शक है ।
  • श्रीपेरियपेरुमाळ की आज्ञा और देवपेरुमाळ की स्वीकृती से श्रीएम्पेरुमानार श्रीरंगम चले गए और श्रीरंगवासि हो गए ।
  • श्रीरामानुजाचार्य अपने चचेरे भई (श्री गोविन्द) को श्रीवैष्णवधर्म मे लाने का कार्य पेरियतिरुमलैनम्बि को सौंपते है ।
  • श्रीरामानुजाचार्य तिरुक्कोष्टियुर मे प्रसिध्द तिरुक्कोष्टियुरनम्बि से चरमश्लोक का गोपनीय रहस्य जानने हेतु तिरुक्कोष्टियुर के लिए रवाना हुए । श्रीरामानुजाचार्य उस क्षेत्र मे उपस्थित सभी बध्द जीवों के उत्थापन हेतु जो चरमश्लोक का गोपनीय रहस्य जानने के इच्छुक थे उन सभी को यह गोपनीय रहस्य बतलाते है और इस प्रकार से अपने आप को प्रथम कृपामात्राऽचार्य बनकर आचार्य तिरुक्कोष्टियुर्नम्बि से एम्पेरुमानार की उपाधि प्राप्त करते है ।
  • एम्पेरुमानार तिरुवाय्मोळि का भावार्थ (उपंयास) श्री तिरुमालयाण्डान से सुनकर सीखते है ।
  • एम्पेरुमानार पंञ्चोपाय (आचार्य) निष्ठा श्री तिरुवरंगपेरुमाळरयर से सीखते है ।
  • एम्पेरुमानार अपने अनुयायियों के समृध्द चिरस्थायि भगवद्-भागवतकैंकर्य हेतु परम कृपा से श्रीरंग (नम्पेरुमाळ्) और श्रीरंगनाचिय्यार के चरणकमलों का आश्रय फालगुन मास के उत्तर फालगुनन क्षत्र के दिन लिया ।
  • एम्पेरुमानार को विषपूरित खाना दिए जाने पर तिरुक्कोष्टियुर्नम्बि किडाम्बिआचान को एम्पेरुमानार के भिक्षा का खयाल रखने का आदेश देते है अर्थात उनके खाने की व्यवस्था का कार्य किडाम्बिआचान को सौंपते है ।
  • एम्पेरुमानार यज्ञमूर्ति को वाद-विवाद मे पराजित कर उन्हे अरुळळपेरुमाळ एम्पेरुमानार का नाम देकर एम्पेरुमानार के तिरुवाराधन पेरुमाळ के कैंकर्य संलग्न करते है ।
  • एम्पेरुमानार अनन्ताळ्वान इत्यादि वैष्णवों को अरुळळपेरुमाळएम्पेरुमानार के शिष्य बनने का उपदेश देते है ।
  • एम्पेरुमानार अनन्ताळ्वान को तिरुमलै जाकर वहाँ तिरुवेण्कटमुदायन के नित्यकैंकर्य मे संलग्न होने का उपदेश देते है ।
  • एम्पेरुमानार तीर्थयात्र हेतु रवाना होकर तिरुमलै पहुँचते है और वहाँ कुदृष्टि व्यक्तियों को पराजित कर तिरुवेण्कटमुदायन को विष्णुस्वरूपमूर्ति घोषित करते है और स्वयम वह भगवान के आचार्य बने ( क्योंकि उनके घोषन के बाद उन्होने भगवान को शंख और चक्र स्वयम प्रदान किए ) । ( आज भी हम तिरुमलै मे देख सखते है की भगवद्रामानुजाचार्य ज्ञान मुद्रा से विराजमान है । )
  • इसके पश्चात श्रीरामानुजाचार्य श्रीमद्रामायण का भावार्थ (उपंयास) श्री पेरियतिरुमलैनम्बि से सुनकर सीखते है ।
  • एम्पेरुमानार गोविन्दभट्टर को संयास देकर उनका नाम एम्बार रखते है और वही एम्बार के नाम से प्रसिध्द हुए ।
  • एम्पेरुमानार बोधायनवृत्तिग्रंथ हेतु श्री कूरत्ताळ्वान के साथ कश्मीर के लिए रवाना हुए और जब वहाँ उन्हे यह ग्रंथ प्राप्त कर वापस श्रीरंगम की ओर जा रहे थे तो कश्मीर के पण्डितों ने अपने अनुचरों के सहायता से यह ग्रंथ पुनः प्राप्त किया और श्री एम्पेरुमानार और श्रीकूरत्ताळ्वान को खाली हाथ आना पडा । एम्पेरुमानर को निराश देखर श्रीकूरत्ताळ्वान आश्वासन देते है की उन्हे बोधायनवृत्ति पूरि तरह से याद ( कण्टस्थ) है और इस प्रकार श्रीकूरत्ताळ्वान की सहायता से श्रीएम्पेरुमानार आळवन्दार को दिए हुए वचन ( श्री बादरायण के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि) पूरा करते है । पूरा होने के पश्चात श्री सरस्वती देवी उनकी टिप्पणि को श्रीभाष्य के नाम से गौरन्वित करती है ।
  • एम्पेरुमानार तिरुक्कुरुन्गुडि दर्शन हेतु जाते है और वहाँ के एम्पेरुमान ( भगवान ) एम्पेरुमानार के शिष्य बनकर श्रीवैष्णनवनम्बि के नाम से प्रसिध्द हुए ।
  • कूरत्ताळ्वान और आण्डाल को नम्पेरुमाळ के दिव्यकृपाप्रसाद से दो पुत्रों की प्राप्ति होती है और एम्पेरुमानार अपने आचार्य के दूसरे वचन को याद रखते हुए उन दोनो बच्चों का नामकरण खुद करते है – एक का नाम पराशर और दूसरे का नाम वेदव्यास रखते है ।
  • एम्बार के भाई सिरियगोविन्दपेरुमाळ को एक पुत्र की प्राप्ति होती है और उसका नाम एम्पेरुमानार परांकुशनम्बि रखकर आळवन्दार के तीसरे वचन को पूरा करते है । कहा जाता है की एम्पेरुमानारने स्वयम तिरुक्कुरुगैपिरान्पिळ्ळै को आदेश दिया की वह तिरुवाय्मोळि की टिप्पणि लिखें और इस प्रकार भी आळवन्दार के तीसरे वचन को पूरा किया ।
  • एम्पेरुमानार तिरुनारायणपुरम् जाकर भगवदाराधनम् को स्थापित कर कईयों को सत्साम्प्रदाय मे दीक्षा देकर भगवद्भागवतकैंकर्य मे सम्लग्न करते है ।
  • एम्पेरुमानार हज़ार जैन पण्डितों को अपने आदिशेषवातार का रूप धारन कर पराजित करते है ।
  • एम्पेरुमानार शेल्वपिळ्ळै उत्सव पेरुमाळ को एक मुस्लिम राजा की बेटी से प्राप्त कर तिरुनारायणपुरम मे उनकी स्थापना करते है और इसके पश्चात श्री शेल्वपिळ्ळै और मुस्लिम राजा की बेटी का विवाह सम्पन्न करवाते है ।
  • एम्पेरुमानार शैव राजा के देहान्त के बाद श्रीरंगम पहुँचते है और कूरत्ताळ्वान को आदेश देते है की देवपेरुमाळ की स्तुति करके अपने नेत्रों की प्राप्ति करें ।
  • एम्पेरुमानार तिरुमालिरुन्चोलै दिव्यदेश जाकर श्री आण्डाळ की इच्छा के अनुसार सौ दिये और सौ थालि माखन भोग अर्पण किया ।
  • एम्पेरुमानार पिळ्ळैउरंगविल्लिदासर के गरिमा का वर्णन एक उत्कृष्ट उदाहरण के तौर पर अनेक श्रीवैष्णवों के समक्ष पेश किया ।
  • एम्पेरुमानार अपने शिष्यगण को कई सारे अन्तिम चरम उपदेश देते है और केहते है की पराशरभट्टर को मेरा प्रतिबिम्ब मानकर उनकी और भागवतों की सेवा करें और नंजीयर को सत्साम्प्रदाय मे लाने का कार्य पराशरभट्टर को सौंपते है ।
  • अंत मे , श्रीएम्पेरुमानार अपने आचार्य श्री आळवन्दार के चरमतिरुमेनि का ध्यान करते हुए अपनी लीला को इस लीलविभूति मे संपूर्ण कर (यानि चरमतिरुमेनि (भौतिक शरीर) त्यागकर) परमपदम को प्रस्थान हुए ।
  • जैसे आळ्वारों का चरमतिरुमेनि आदिनाथन दिव्यदेश के मन्दिर मे संरक्षित है उसी प्रकार एम्पेरुमानार का चरमतिरुमेनि भी श्रीरंगनाथभगवान के मन्दिर मे स्थित और संरक्षित है ( एम्पेरुमानार के संनिधि मे स्थित मूलवर तिरुमेनि के नीचे ) ।
  • अंत मे श्रीरामानुजाचार्य के चरमकैंकर्य सुसज्जित भव्य रूप से किया गया जिस प्रकार भगवान के ब्रह्मोत्सव के दौरान होता है ।

हमारे सत्सांप्रदाय मे एम्पेरुमानार का विशेष स्थान :

  • कहा गया है – हमारे आचार्य रत्न हार के अन्तर्गत श्री एम्पेरुमानार को नायक मणि (मध्य अंश) माना गया है । चरमोपाय निर्णय मे श्री नायनार आचान्पिळ्ळै ( पेरियवाच्चान्पिळ्ळै के सुपुत्र ) श्री एम्पेरुमानार के वैभव और उनकी महिमा को दर्शाया है । इस विशेष भव्य ग्रंथ पर आधारित कुछ निम्नलिखित झलक भागवतों के लिये प्रस्तुत है –
  • पूर्वाचार्यों और भविष्याचार्यों के कथन से यह स्पष्ट है कि एम्पेरुमानार हि हर एक श्रीवैष्णव के चरमोपाय साबित हुए है ।
  • हलांकि हमारे पूर्वाचार्य अपने आचार्य पर पूर्ण तरह आश्रित थे, लेकिन इन्ही आचार्यों ने एम्पेरुमानार पर आश्रित होने का सदुपदेश दिया तो इस प्रकार से एम्पेरुमानार ने उत्ताराकत्व को दर्शाता है ।
  • पेरियवाच्चान पिळ्ळै अपने मानिक्क मालै मे स्पष्ट रूप से प्रकाशित करते है कि आचार्य स्थान के योग्य केवल एम्पेरुमानार हि है और कोई अन्य नहि हो सकता ।
  • एम्पेरुमानार के भूतपूर्वाचार्य केवल अनुवृत्ति प्रसन्नाचार्य हुआ करते थे (जो केवल कामरहित सेवा के इच्छुक थे और संतुष्ट होने के पश्चात शिष्यों को स्वीकार कर और उन्हे सदुपदेश दिया करते थे) । लेकिन एम्पेरुमानार ने इस कलि युग के कठिनाईयों को ध्यान मे रखते हुए निर्धारित किया कि भविष्याचार्यों को केवल प्रसन्नमात्राचार्य नहि बलकि कृपामात्राचार्य होना चाहिये यानि आचार्य अत्यन्त कृपालु हो और शिष्यों का स्वीकार उनके मनोकामना के आधार पर होना चहिये ।
  • जिस प्रकार अच्छे संतान की प्राप्ति से वंश की वृद्धि होती है और पितृ लोक मे पितृओं को खुशी होति है उसी प्रकार से श्री वैष्णव कुल मे एम्पेरुमानार प्रकट होने से हमारे सत्सांप्रदाय की सम्वृद्धि हुई है । उदाहरण के लिये – देवकि / वसुदेव , नन्दगोप / यशोदा , दशरथ / कौशल्या कृष्ण भगवान को जन्म देकर , श्री राम पेरुमाळ को जन्म देकर जिस प्रकार धन्य हुए उसी प्रकार एम्पेरुमानार प्रपन्न कुल मे प्रकट होने से सारे आचार्य धन्य हुए ।
  • नम्माळ्वार अपने पोलिग पोलिग पासुर मे भविष्यदाचार्य श्री रामानुज के प्रकट होने की वार्ता को गौरन्वित करते है और हमारे समक्ष भविष्याचार्य के विग्रह को श्रीमन्नथमुनिको अनुग्रहाकरते है।(नम्माळ्वार की अनुग्रहसे श्रीमधुरकविआळ्वार ने ताम्रपर्णी नदीजलको  गरम करनेसे अन्य भविष्यदाचार्य विग्रह को प्राप्ताकिया)   
  • आळ्वार तिरुनगरि के भविष्यदाचार्यों की सन्निधि मे यह दिव्य मूर्ति को संरक्षित कर उनकी पूजा श्री नाथमुनि से आरंभ होकर उय्यकोन्डार , मणक्काल्नम्बि, आळवन्दार , तिरुक्कोष्टियूर नम्बि पर्यन्त तक आया। (ताम्रपर्णी नदी जल को गरम करने से जो मूर्ति प्राप्त हुआ वो मूर्ति को   तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै  और अन्ततः मनवाळ मामुनि इत्यादियों ने आळ्वारातिरुनगरी मे आराधना किया)
  • पेरिय नम्बि कहते है – जिस प्रकार रघुकुल मे श्री राम के अवतार लेने से रघुकुल विख्यात हुआ उसी प्रकार रामानुजाचार्य के प्रकट होने से प्रपन्न कुल विख्यात हुआ ।
  • पेरिय तिरुमलै नम्बि एम्बार को कहते आये है की – वह केवल “एम्पेरुमानार तिरुवडिगले तंजम” इत्यादि से एम्पेरुमानार का ध्यान करे और उन्हे उनसे भी अधिक मान्य दे ।
  • तिरुक्कोष्टियूर नम्बि अपने अन्तिम काल के दौरान कुछ इस प्रकार कहे – वे निश्चय ही  भाग्यवान है क्योंकि उनको श्री रामानुजाचार्य से संबन्ध प्राप्त हुआ । हलांकि तिरुमालयाण्डान और एम्पेरुमानार के मे बींच कभी कभी  तत्व ज्ञान पर गलतफ़हमी होति उस समय तिरुक्कोष्टियूर नम्बि कहते – श्री रामानुजाचार्य सर्वज्ञ है , वे जो कहते है वही सच्चा तत्व है और जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने गुरु सान्दीपणि से सींखे, भगवान श्री राम अपने गुरु वशिष्ठ से सींखे उसी प्रकार एम्पेरुमानार हमसे सींख रहे है ।
  • अरुळळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्, आळ्wआन, आण्डान, एम्बार, वडुग नम्बि, वन्गि पुरतु नम्बि, भट्टर्, नडातूर् अम्माळ्, नन्जीयर्, नम्पिळ्ळै और अन्य आचार्य केवल अपने जीवन काल मे यहि दर्शाया है की हमे सदैव एम्पेरुमानार का ध्यान एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे तन्जं से करना चाहिये ।
  • हमारे पूर्वाचार्यों ने यह दर्शाया है की हमारे लिये उपाय और उपेय केवल श्री रामानुजाचार्य हि है और यह चरमोपाय और अन्तिमोपाय निष्टा कहलाया गया है ।
  • तिरुवरंगतमुदानार कूरत्ताळ्वान से विशेष कृपा से परिवर्तित होकर श्री रामानुजाचार्य के प्रति असीमित लगाव विकसित किया । उन्होने एम्पेरुमानार के प्रति अपने दिव्य भव्य भावनाओं को एक विशेष ग्रंथ मे सम्मिलित किया और यह इरामानुश नूत्तन्दादि से प्रसिद्ध हुआ । यह ग्रंथ श्री एम्पेरुमानार के प्रति उपयुक्त स्तुति है और इस ग्रंथ कि रचना तब हुई जब श्री एम्पेरुमानार श्री रंग मे निवास कर रहे थे । श्री नम्पेरुमाळ के निर्देशानुसार यह ग्रंथ का पाठ भगवान के पुरप्पाडु के समय हो और इसके पाठ का सम्मेलन संगीत वाद्य के माध्यम से ना हो । एम्पेरुमानार के विशेष वैभव और उनकी योगदान को मान्य रखते हुए इस दिव्य ग्रंथ को चार हज़ार प्रबंधो मे सम्मिलित किया गया ।  
  • मणवाळमामुनि ने अपने उपदेश रत्तिनमालै मे इस सत्सांप्रदाय को एम्पेरुमानार दर्शन से संभोदित किया है और यह श्री नम्पेरुमाळ ने स्वयम कहा है । वे कहते है – एम्पेरुमानार के पूर्वाचार्य केवल अनुवृत्तिप्रसन्नाचार्य हुआ करते थे और वे केवल कुछ ही शिष्यों को स्वीकार करते थे जो उन आचार्यों का सेवा बहुत लम्बे समय तक किया करते । परन्तु एम्पेरुमानार के आविर्भाव से यह विचार धारणा ( प्रवृत्ति  ) बदल गई और कलियुग मे उत्पन्न कठिनाईयों को ध्यान मे रखते हुए वरतामानाचार्य और एम्पेरुमानार के भविष्याचार्य केवल और केवल अत्यन्त कृपा से अपने शिष्यों को स्वीकार करने लगे । प्रत्येक आचार्य का कर्तव्य है की वे ऐसे जिवात्माओं को प्रशिक्षण और उपदेश दे जो केवल इस भौतिक जगत से मुक्त होने के इच्छुक है । यह कार्य केवल एम्पेरुमानार ने स्वयम किया बलकि उन्होने चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों को नियुक्त किया और उसके बाद इन लोगों ने इस सनातन धर्म का प्रचार प्रसार किया और सबको इस प्रपन्न कुल के दिव्य अनुग्रह के योग्य बनाया ।
  • हलांकि हमने यहाँ एम्पेरुमानार के विशेष अवतार का वर्णन बहुत ही संक्षिप्त और सरल भाषा मे प्रस्तुत किया है परन्तु श्री एम्पेरुमानार के अवतार की महिमा और उनके वैभव का वर्णन विशेषतः असीमित है । कहते है – श्री एम्पेरुमानार अपने आदिशेषावतार मे खुद के वैभव और महिमा का वर्णन नहि कर सकते तो हम जैसे बद्ध जीव कैसे कर सकते है । हमे केवल अपने आप को तृप्त होना / करना चाहिये की हमे ऐसा सौभाग्य मिला की हम श्री एम्पेरुमानार के गौरव , वैभव और महिमा का पाठ , स्मरण कर सकते है ।

एम्पेरुमानार तनियन् –

योनित्यमच्युत पदाम्भुज युग्मरुक्म व्यामोहतस्तदितराणि तृणाय मेने ।

अस्मद्गुरोर्भगवतोऽस्य दयैकसिंधोः रामानुजस्य चरणौ शरणम् प्रपद्ये ॥

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन् और अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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