Monthly Archives: May 2014

कुरुगै कावलप्पन्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः 

तिरुनक्षत्र – विशाखा नक्षत्र 

अवतार स्थल – आलवार तिरुनगरी (आऴ्वार तिरुनगरि)

आचार्य – नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि). 

कुरुगैकावलप्पन नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि) के प्रिय शिष्य थे | नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि), काटुमन्नार कोइल को लौटने के बाद, पेरिय पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) का ध्यान करते हुए कुछ समय बिताये ।  अनन्तर, उन्होंने कुरुगैकावलप्पन् को योग रहस्य सिखाकर उसको यही सिखाने का आदेश दिया । कुरुगैकावलप्पन्  ने आचार्य के आदेशानुसार योग रहस्य को सीख कर निरंतर अष्टांग योग के माध्यम से भगवान का ध्यान करने लगे । जब नाथमुनिगल् को परमपद प्राप्त हुआ, कुरुगैकावलप्पन् ने उसी जगह में रह कर, उस पवित्र जगह का ख्याल रखते हुए, भगवान का ध्यान करने लगे ।

मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र)  ने उनके शिष्य  आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) को  कुरुगैकावलप्पन्  से योग रहस्य सीखने का आदेश दिया था । आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) शिष्यों के साथ कुरुगैकावलप्पन् के पास गये । उस वक्त कुरुगैकावलप्पन्  भगवान के ध्यान में मग्न थे | कुरुगैकावलप्पन् के ध्यान को विघ्न देना नहीं चाहते हुए आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) शिष्यों के साथ कुरुगैकावलप्पन्  के पीठ पीछे दीवार के पीछे चुपचाप खड़े हुए । एकाएक कुरुगैकावलप्पन ध्यान से उत्तेजित होकर पूछे कि कोई “चोट्ट कुल” (महान परिवार) में पैदा  हुआ आदमी मेरे पीछे है ?  तब आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) बाहर आकर प्रकट करते कि वह नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि) के पौत्र हैं और पूछते कि -” हम सब दीवार के पीछे थे । आप बिना देखे कैसे पहचाना कि कोई “चोट्ट कुल” (महान परिवार) का आदमी आया हैं ?” कुरुगैकावलप्पन् ने बताया की -“जब वह भगवान के ध्यान में मग्न होते, तो कभी भी पेरिय पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) ने, पेरिय पिराट्टि (श्री रंगनाच्चियार्) के बुलाये जाने पर भी मेरे से नज़र नहीं हटाते थे । लेकिन जब आप मेरे पीठ के पीछे खड़े हुए, पेरिय पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) मेरे कन्धों को नीचे दबाकार बार-बार मेरे पीठ के पीछे देखने लगे । इससे मैने पहचाना कि भगवान का अत्यंत प्रिय नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि) के परिवार में से कोई व्यक्ति मेरे पीठ के पीछे है “।  कुरुगैकावलप्पन् के ध्यानानुभव और नाथमुनिगल् (श्री नाथमुनि) के प्रति भगवान के प्रेम और प्रीति को जानकर आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) अत्यन्त संतुष्ट हुए |

फिर आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) ने कुरुगैकावलप्पन् के चरण-कमल में आश्रित होकर योग रहस्य सिखाने की प्रार्थना किये । कुरुगैकावलप्पन् ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) को वचन दिया कि वे इस संसार को छोड़कर जाते वक्त आळवन्दार को वह योग रहस्य सिखा देंगे । योग रहस्य में विशेष विद्वान् होने के कारण कुरुगैकावलप्पन् इस संसार को छोड़ने का दिन ठीक से जानते थे। कुरुगैकावलप्पन् ने उस दिन का,यानि दिनांक और समय सहित विवरण को आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) के समक्ष प्रकट किये और पूर्वोक्त दिन, योग रहस्य सीखने के लिए वापस आने को कहा । आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) ने कुरुगैकावलप्पन् की बात मान कर श्रीरंगम् वापस होकर पेरिय पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) की सेवा करने लगे ।

तदनंदर,  श्रीरंगम् में अध्ययन उत्सव के समय पर, पेरिय पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ पेरुमाळ) के समक्ष तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरयर् नम्माऴ्वार का तिरुवाय्मोऴि के गान का निवेदन प्रस्तुत करते हुए, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) की ओर देखते है और तिरूवनन्तपुरम् का पासुर (गाना) “नाडुमिनो नमार्गलुल्लिर नामुमक्कू अरियच्चोंनोम “(भक्त लोग  एक बार  तिरूवनन्तपुरम् को आना) गाते है | इसको भगवान का आदेश मानकर आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) तिरूवनन्तपुरम् चले गए। तिरूवनन्तपुरम् में भगवान की पूजा करते वक्त आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) को एहसास होता है कि यह वही दिन है जिस दिन कुरुगैकावलप्पन् उन्हें योग रहस्य सिखाना चाहते थे । तुरंत उधर पहुँचने के लिए पुष्पक विमान् नहीं सोच कर आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य) को बहुत शोक हुआ ।

कुरुगैकावलप्पन् ध्यान में भगवान का स्मरण करते उनको आचार्य का श्री चरण प्राप्त हुआ |

इस प्रकार, भगवान और आचार्य भक्ति बढ़ने के लिए कुरुगैकावलप्पन् के श्री चरण में प्रार्थना करे ।

कुरुगैकावलप्पन् ध्यान श्लोक्: 

नाथमौनी पदासक्तं ज्ञानयोगादि सम्पदम्।

कुरुगाधिप योगींद्रं नमामि सिरसा सदा॥

Source

अडियेन श्रीनिवासराघव रामानुज दास

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तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानचल महामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वालि के अन्तर्गत पिळ्ळै लोकाचार्य के जीवन के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वालि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के बारें मे चर्चा करेंगे ।

thiruvAymozhi piLLai

तिरुनक्षत्र – वैशाख मास , विशाखा नक्षत्र

अवतार स्थल – कुन्तिनगरम् ( कोन्तगै )

आचार्य – पिळ्ळै लोकाचार्य

शिष्य गण – अऴगिय मणवाळ मामुनि , शठगोप जीयर ( भविष्यदाचार्य सन्निधि ) , तत्वेष जीयार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि स्वापदेशम्

वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए ।

तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये । कूरकुलोत्त्मदास ने यूँही उनके पीठ पर थपकी मारते हुए कहे की वे उन्हे यह नही सिखायेंगे । तिरुमलै आऴ्वार सात्विक होने के कारण उन्होने अपने अनुचरों को इशारा करते हुए कहा की कूरकुलोत्त्मदास के प्रतिक्रिया को भूल जाए और इस तरह तिरुमलै आऴ्वार उस स्थान से प्रस्थान हुए । तिरुमलै आऴ्वार ने अपने पालक माता श्री से इस घटना का वर्णन किया तो उन्होने उनको पिळ्ळैलोकाचार्य से उनके सम्बंध को याद करया और उसके पश्चात यह सोचने लगे की उन्होने क्या खोया और यही सोचते रह गए । कई दिनो बाद फिर से तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है जब वे एक हाथी पर बैठकर भ्रमण कर रहे थे ।  इस समय तिरुमलै आऴ्वार तुरन्त उतरकर उनके समक्ष दण्डवत प्रनाम करते हुए उनसे विनम्रतापूर्वक सीखने की इच्छा व्यक्त किये । यह देखकर कूरकुलोत्तमदास ने उनको स्वीकार किया और सिखाने का कार्य स्वीकृत किया । तिरुमलैयाऴ्वार अपने आचार्य कूरकुलोत्तम दास के लिये एक अग्रहार (यानि ऐसा विशेष भूमि जिसे एक उपयुक्त और सक्षम ब्राह्मण को दिया जाता था ) का व्यवस्था कर उनसे प्रतिदिन सीखने लगे और यहाँ श्री कूरकुलोत्तम दासजी अपना नित्यकैंकर्य करने लगे जैसे तिरुवाराधन इत्यादि । तिरुमलैयाऴ्वार प्रशानिककार्यों मे व्यस्त होने की वजह से उन्होने श्री कूरकुलोत्तम दासजी को विनम्र होकर निवेदन किये की जब वे जिस समय तिरुमान्काप्पु (तिलक) को लगाते है उस समय उनसे मिलने हर रोज़ आए । श्री दासजी ने यह स्वीकार किया और उनसे मिलने हर रोज़ आने लगे । पहले दिन उन्होने देखा की –  श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के तनियन् का पाठ करते हुए तिरुमलैयाऴ्वार तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रभंधो का सारांश ज्ञान देने लगे । इसि दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशानिककार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपन शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशानिककार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरणकमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये ।

अनुवादक टिप्पणि – नम्पिळ्ळै ने ईडुव्याख्यान ईयुण्णिमाधवपेरुमाळ को सौंपा उसके बाद जिन्होने अपने सुपुत्र ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ को यह ग्रंथ सिखाया । नलूरपिळ्ळै श्री ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ के प्रत्यक्ष शिष्य थे जिन्होने पूर्णरूप से इस दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सीखा और बाद मे जिन्होने अपने पुत्र श्री नालूराच्चानपिळ्ळै को सिखाया ।  इसी दौरान श्री देवपेरुमाळ नालुरपिळ्ळै को ज्ञात कराते है की वे श्री तिरुमलैयाऴ्वार को शेष तिरुवाय्मोऴि शब्दार्थ सहित सिखाये । श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने कहा – कोई अन्य क्यों अपने सुपुत्र को हम यह कार्य सौंपते है क्योंकि अगर वह सिखाये तो वह आपके सिखाने के बराबर होगा और फिर भगवान अन्तर्धान होए गये । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को स्वीकार किये और उन्होने श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे ।

नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मुल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै ।

तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है । वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया ) । इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरि लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरि के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरित चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुत कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए ।

इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै तिरुवन्तपुरम् जाकर श्री विळान्चोलैपिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखने हेतु रवाना हुए । विळान्चोलैपिळ्ळै श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के प्रसिद्ध और करीबी शिष्य माने गये है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै का आगमन जानकर अपने आचार्य पर एक चित्त और एकाग्र होकर और श्री पिळ्ळैलोकाचार्य पर ध्यान करते हुए श्री विळान्चोलैपिळ्ळै ने पूर्णरूप से तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को रहस्य ग्रंथ सिखाये और अपने कृपा के पात्र बनाकर उन्हे वरदान दिये । इसके बाद श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै फिर आऴ्वार तिरुनगरि को लौट जाते है । कुछ समय बाद श्री विळान्चोलैपिळ्ळै अपन देह त्यागने की इच्छा व्यक्त करते है और तुरन्त ही परमपद को प्रस्थान होकर अपने आचार्य के दिव्यचरणकमलों की सेवा मे संलग्न होते है । श्री विळान्चोलैपिळ्ळै के चरमकैंकर्य श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै स्वयम दिव्यभव्य रूप से करते है ।

कुछ समय बाद श्री पेरियपेरुमाळ ( भगवान श्रीमन्नारायण ) अपने नित्यसुरी सेवक श्री आदिशेष को आज्ञा देते है की वे फिर से इस भौतिक जगत मे अवतार ले और उनका कर्तव्य यह है की वे बहुत सारे बद्ध जीवात्माओं को परमपद लाये । श्रीमन्नारायण के वचन सुनकर श्री तिरुवनन्ताऴ्वान ने यह सेवा स्वीकृत किया और इस भौतिक जगत मे तिगऴकिडन्तान् तिरुनाविरुडयपिरान और श्रीरंगनाच्चियार के पुत्र (श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार) के रूप मे इप्पासि तिरुनक्षत्र मे प्रकट हुए जो चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों मे से गोमदाऴ्वान के वंशज थे । उनका पालन पोशन उनकी माताश्री ने स्वयम सिक्किल्किदारम् मे किया था जहाँ उन्होने सामान्य शास्त्र और वेदाध्ययन अपने पिताश्री से सीखा था । तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि  के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्णप्रेमभक्तिभाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है ।

अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य ने पेरियनम्बि (परांकुश दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया उसी प्रकार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै (शठगोप दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया । श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ के विशेष अनुग्रह और दिव्यकैंकर्य कोशिशें से वर्तमान आऴ्वारतिरुनगरि प्रचलित रूप मे है । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अपना जीवन केवल नम्माऴ्वार और तिरुवाय्मोऴि का प्रचार प्रसार करने के लिये समर्पित किया जो केवल श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के दिव्यवचनों पर आधारित है और इस प्रकार से प्राप्त शिष्यों को श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ को सौंपकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के दिव्यकैंकर्य की बदौलत ईडु व्याख्यान हमारे लिये उपलब्ध है जिसका प्रसार प्रचार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने सर्वोच्च शिखर पर किया ।

चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

तनियन

नमः श्रीशैलनाथाय कुन्ती नगर जन्मने । प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैंकर्यशालिने ॥

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य अऴगियमणवाळपेरुमाळ के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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