Monthly Archives: June 2014

मारनेरि नम्बि

 

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

alavandhar-deivavariandan-maranerinambi

आळवन्दार्(बीच में) दैववारी आण्डान् और मारनेरि नम्बि के साथ – श्री रंगम् श्री रामानुजर् सन्निधि में मूर्ति

तिरुनक्षत्र – ज्येष्ठ मास , आश्ळेषा नक्षत्र

अवतार स्थल – पुरांतकम् (पाण्ड्य नाडु में एक गाँव )

आचार्य – आळवन्दार्

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंगम्

मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे ।

इन्हें मारनेर् नम्बि कहके भी सम्भोदित करते हैं – जो मारन (नम्माळ्वार्) की तरह गुणों से सम्पन्न हैं ।

यह आळवन्दार् के कालक्षेप सुनने में और पेरिय पेरुमाळ के गुणानुभव में पूरी तरह से जुट जाने के लिए मशूर थे । राग – अनुराग के अतीत, भव-बन्धनों से विमुक्त होकर श्री रंगम् मंदिर के प्रकाराम में ही अपना जीवन बिता रहे थे ।

अन्तिम दशा में पेरिय नम्बि (जो अपने प्रिय सखा ) से विनती करते हैं कि उनके अन्तिम सँस्कार का भार खुद स्वीकार करें और उनके देह सम्बन्धि रिश्तेदारों को उनकी तिरुमेनि (दिव्य रूप) को न सौंपें क्यूँकि वह श्री वैष्णव नहीं हैं । उनके शरीर की तुलना हविस (यज्ञ में समर्पण किया जाने वाला) से करते हुए बताते हैं कि वह वस्तु केवल भगवान को समर्पण करने लायक है और कोई अन्य लोग उसे छूना भी नहीं चाहिए । पेरिय नम्बि उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और मारनेरि नम्बि के परम पदम् प्रस्थान होने के बाद उनका चरम कैंकर्य विधिपूर्वक करते हैं । उनके वर्ण के कारण स्थानिक वैष्णव पेरिय नम्बि के इस कार्य को अस्वीकार करते हैं और उनसे चुनौती करते हैं । उनके इस कार्य के बारे में एम्पेरुमानार् से शिकायत करते हैं । एम्पेरुमानार् पेरिय नम्बि के ज़रिये मारनेरि नम्बि की महानता की स्थापना करना चाहते थे और इसी कारण से पेरिय नम्बि के पास जाकर उनसे प्रश्न करते हैं । एम्पेरुमानार् उनसे पूछते हैं कि “मैं एक तरफ सभी जनों के दिमाग़ में शास्त्र के प्रति भक्ति और विश्वास बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ और आप दूसरी तरफ ऊपरी तौर से शास्त्रों के विरुद्ध काम क्यूँ कर रहें हैं ? (यहाँ शास्त्र का मतलब विशेष शास्त्र – भागवत कैंकर्य) “। पेरिय नम्बि जवाब देते हैं कि “भागवत कैंकर्य करने के लिए हम किसी और को नियमित नहीं कर सकते हैं । कैंकर्य खुद करना चाहिए । जटायु के अन्तिम सँस्कार श्री राम ने किया है । मैं श्री राम से बड़ा नहीं हूँ और वह जटायु से कम नहीं हैं – इसलिए उनके लिए कैंकर्य करना दोष रहित हैं । नम्माळ्वार् के पयलुम् शुडरोळि (तिरुवाय्मोळि ३.७ ) और नेडुमार्केडिमै (तिरुवाय्मोळि ८.१० ) भागवत शेषत्व को गौरवान्वित करना केवल सैद्धान्तिक नहीं हैं । उनके दिए गए दिव्य उपदेशों में से हमें कम से कम कुछ विषयों का पालन करने की कोशिश करना चाहिए ।” यह सुनकर एम्पेरुमानार्  बहुत प्रसन्न होते हैं और पेरिय नम्बि को दण्डवत प्रणाम करते हैं और घोषणा कर देते हैं कि पेरिय नम्बि ने वास्तव में एक महान कार्य ही किया हैं । यह सुन्दर संवाद को अति सुन्दरता से मणवाळ मामुनिगळ ने पिळ्ळै लोकाचार्यर् के श्री वचन भूषण २३४ सूत्र के व्याख्यान में लिखा है।

कैसे नम्बि जी का वैभव उपरोक्त व्याख्यान में कुछ जगह पर प्रकाश डाला गया हैं । आईये कुछ यहाँ देखे ।

  • तिरुप्पावै २९ – आई जनन्याचार्यर् व्याख्यान – इस पाशुर के व्याख्यान में पेरिय नम्बि और एम्पेरुमानार् के बीच में घटित सम्वाद का वर्णन किया गया है । मारनेरि नम्बि के अन्तिम दिनों में उन्होंने बहुत शारीरिक बाधायें झेलि । उस समय वह चिन्तित हो जाते हैं कि उनके अन्तिम क्षण में वह एम्पेरुमान् पे ध्यान नहीं कर सकेंगे । उनकी दशा देखकर पेरिय नम्बि एम्पेरुमानार् से पूछते हैं कि क्या मारनेरि नम्बि परम पद प्राप्त करेंगे। एम्पेरुमानार् जवाब देते हैं कि अवश्य उन्हें परम पद प्राप्त होगा क्यूँकि श्री वराह पेरुमाळ ने अपने वराह चरम श्लोक में बताया है कि जो कोई भी उन्हें आश्रय किये हैं वो उनके बारे में सोचेंगे और उनके अन्तिम समय में परम पद अनुग्रह करेंगे । पेरिय नम्बि कहते हैं कि ऐ शब्दों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं क्यूँकि यह हो सकता हैं कि केवल अपने दया(भू देवी के प्रति उनकी प्रेम) के कारण उन्होंने कहा होगा और वास्तव में अपने वचन की पूर्ती नहीं भी कर सकते हैं । एम्पेरुमानार् कहते हैं कि पिराट्टी हरदम एम्पेरुमान् के साथ रहते हैं और उन्हें उस समय संतुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे । पेरिय नम्बि उनसे प्रमाणं (सबूत) माँगते हैं जहाँ बतलाया गया है कि भगवद् विषय में संलग्न हुए भक्तों को मोक्ष मिला है। एम्पेरुमानार् कण्णन एम्पेरुमान् – गीता ४. १० ( श्रीमद् भगवद् गीता ) श्लोक बताते हैं – “जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वत्: त्यक्त्वा देहम् पुनर् जन्म नैति मामेति सोर्जुना ” कहते हैं की जो भगवान के जन्म और कार्यकलाप जो सच्ची तौर से जानेंगे, वह अपने जीवन के आखिर में परम पद प्रस्थान जरूर होंगे । एम्पेरुमानार् के इन शब्दों को सुनकर पेरिय नम्बि संतुष्ट हो जाते हैं ।
  • पेरिय तिरुमोळि ७.४ – पेरिय वाच्चन पिळ्ळै के व्याख्यान के प्रस्तावन में – इस पदिग (कंसोरा वेंकुरुति ), तिरुमंगै आळ्वार् ने तिरुसेरै सारनाथ एम्पेरुमान् के आश्रित श्री वैष्णवों का कीर्तन करते हैं । यहाँ पेरिय नम्बि  मारनेरि नम्बि का अन्तिम सँस्कार पूर्ती करने का विषय सूचित किया जाता है ।
  • मुदल तिरुवन्दादि १ – नम्पिळ्ळै व्याख्यान – यहाँ बताया जाता है कि – अगर कोई मारनेरि नम्बि से यह पूछे कि कैसे एम्पेरुमान् को याद रखे , तब एम्पेरुमान् को भूलने का रास्ता बताने के लिए उत्तर देते हुए पूछते हैं (क्यूँकि उनका ध्यान एम्पेरुमान् पर निरंतर लग्न रहता हैं और उन्हें भूलना वह सोच भी नहीं सकते )।
  • श्री वचन भूषणम्(३२४) – पिळ्ळै लोकाचार्यर् ने इस अनुच्छेद में श्री वैष्णवों का कीर्तन किया हैं और स्थापित करते हैं कि एक खास वर्ण में पैदा होने के कारण श्री वैष्णव की महानता कम नहीं होती है । कई उदाहरणों में से उन्होंने पेरिय नम्बि एम्पेरुमानार् को मारिनेरि नम्बि के अन्तिम सँस्कार करने का विवरण देते हैं । मणवाळ मामुनिगळ अपने सुन्दर व्याख्यान में इस सम्वाद का सार बहुत अच्छी तौर से बताते हैं ।
  • आचार्य ह्रदय ८५ -अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार्, अपने बड़े भाई पिळ्ळै लोकाचार्यर् का अनुगमन करते हुए – इस चुरनिकै (श्लोक) में इसी घटना का प्रस्ताव करते हुए मारनेरि नम्बि की कीर्ति पे प्रकाश डालते हैं ।

इस प्रकार मारनेरि नम्बि के जीवन के कुछ झलक देखे हैं । आळवन्दार् के प्रति बहुत प्रीति रहने वाले मारनेरि नम्बि के श्री कमल चरणों को अपना प्रणाम समर्पण करें ।

टिप्पणी : मारनेरि नम्बि का तिरुनक्षत्र पेरिय तिरुमुडि अडैवु में आषाढ़ मास , आश्ळेषा नक्षत्र लिखा गया लेकिन वाळि तिरुनाम में ज्येष्ठ मास , आश्ळेषा नक्षत्र लिखा गया है ।

मारनेरि नम्बि तनियन

यामुनाचार्य सच्शिष्यम् रंगस्थलनिवासिनम् ।
ज्ञानभक्त्यादिजलधिम् मरनेरिगुरुम् भजे ।।

source

अड़ियेन् इन्दुमति रामानुज दासि

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तिरुमळिशै आळ्वार (भक्तिसारमुनि)

श्री
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्री मद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमुनये नमः

thirumazhisaiazhwar

तिरुनक्षत्र – माघ मास मघा नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुमळिशै (महीसारपुरम)

आचार्यविष्वक्सेन,(भगवान नारायणा के मुख्य सेनाधिपति),पेयालवार (महदयोगि)

शिष्य: कणिकण्णन, धृढव्रत

ग्रन्ध: नान्मुगन तिरुवन्दादि, तिरुचन्द विरुत्तम

परमपद(वैकुण्ठ) प्राप्ति स्थल: तिरुकुडन्दै (कुम्बकोणं)

मामुनिगळ, आळ्वार के गुणगान करते हुए बताते हैं कि इन्हें शास्त्रार्थ का सुस्पष्ठ ज्ञान है। शास्त्र से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही हमारे आराध्य है और हमारा लेष मात्र भी अन्य देवताओं से सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। इन्हें “तुय्या मदि” अर्थात निर्मल चित्त कहकर सम्बोधित करते है। पिळ्ळै लोकम् जीयर् के अनुसार यहाँ निर्मलता का अर्थ है की अन्य देवताओं के परतत्व पर किञ्चित मात्र भी विश्वास नहीं करना और दूसरों के मन में इस के बारे में जो शंका हो उसे दूर कर देना। अन्य देवताओं के प्रति श्रीवैष्णव के व्यवहार के बारे में कई पाशुरों से समझाया है।

उदाहरण –

नान्मुगन तिरुवन्दादि- 53 वे पाशुरं (गीत) ; “ तिरुविल्लात तेवरैत तेरेल्मिन तेवु ” (திருவில்லாத் தேவரைத் தேறேல்மின் தேவு) –जो मनुष्य श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ संबंध रखने (पति) वाले को आराधनीय नहीं मानते है , ऐसे लोगों को महत्त्व नहीं देना चाहिए ।

नान्मुगन तिरुवन्दादि- 68 वे पाशुरं : “ तिरुवडि तन नामम मरण्दुम पुरण्तोजा माण्दर”(திருவடி தன் நாமம் மறந்தும் புறந்தொழா மாந்தர்) – सर्व स्वामि श्रीमन्नारायण भगवान को भी अगर भूल भी जाये परंतु अन्य देवता की पूजा, श्रीवैष्णव नहीं करेंगे।

नान्मुगन तिरुवन्दादि के व्याख्यान की अवतारिका में आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै (श्रीकृष्णदास) और आचार्य नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदासजी), दोनों ने ही सबके मन की शंका दूर करते हुए भगवान श्रीमन्नारायण के परतत्व और अन्य देवताओ की सिमितता के विषय में अनुग्रह किया है।

आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै (श्रीकृष्णदास) का विवरण :मुदलाळ्वार (प्रथम तीन आल्वार – भूतयोगी, सरोयोगी, महदयोगी स्वामीजी) स्थापित करते है कि केवल -भगवान श्रीमन्नारायण ही जानने और अनुभव योग्य है। भक्तिसारमुनि ने इस रास्ते के काँटों को निकाल दिया है। जो लोग अन्य देवताओं को ईश्वर (सर्वाधिकारि – नियन्ता) मानते है, वे उन्हें समझाते हैं की वह देवता भी क्षेत्रज्ञ है (जीवात्मा – शरीर के प्राप्त) और नियमों के अधीन है। वे समझाते है की केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही इस संसार के नियन्ता है।

आचार्य नम्पिळ्ळै(कलिवैरिदासजी) का व्याख्यान :मुदलाळ्वार, भगवान श्रीमन्नारायण को साँसारिक दृष्टि से, शास्त्र से, भक्ति से तथा भगवान श्रीमन्नारायण कि निर्हेतुक कृपा से जानते हैं । भक्तिसारमुनि भी इसी तरह भगवान श्रीमन्नारायण को जानते है और अनुभव करते है। परंतु आस -पास के सँसार को देखकर दुःखी होते है कि शास्त्रों में विदित होने पर जीवात्मा समझ नहीं पाते कि श्रीमन्नारायण भगवान ही परतत्व और सभी जगत के पालक है और उन्होंने ही अपनी अपार कृपा से वेद के रहस्य को प्रकट किया है। कहते है की ब्रह्मदेव (जो प्रथम सृष्टि कर्ता) स्वयं एक जीवात्मा है और सृष्टि के समय श्रीमन्नारायण भगवान द्वारा नियुक्त हुए है और क्यूँकि वेद में सुस्पष्ट रूप से समझाया गया है की सभी चेतन और अचेतन वस्तुओं को श्रीमन्नारायण अन्तर्यामि है, श्रीमन्नरायण ही परम पुरुष है। इस सिद्धान्त को सदा सर्वदा बिना चुक के याद रखना चाहिए।

इस तरह आचार्य श्रीवरवरमुनि तथा आचार्य नम्पिळ्ळै अपनी श्रीसूक्तियों में भक्तिसारमुनि के विशेष वैभव की प्रस्तुति करते है।

इसके अतिरिक्त तिरुचन्दविरुत्तम तनियन (वैभव बताने वाले श्लोक) में यह बहुत सुन्दरता से बताया गया है कि एक बार महा ऋषियों ने तप करने के लिए अनुकूल प्रदेश को जानने के लिए सारे भूप्रपंच की तुलना तिरुमळिशै (भक्तिसारपुरं, जो भक्तिसारमुनि का अवतार स्थल है) से किया और तिरुमळिशै को उस तुलना में सर्वोत्तम माना। आळ्वार और आचार्य के अवतार स्थलों को दिव्य देशों से भी उंचा स्थान प्राप्त है क्यूँकि आळ्वार और आचार्य ने ही हमें एम्पेरुमान् के बारे में बताया है और उनके बिना एम्पेरुमान् का विशेष अनुभव हम नहीं कर पाते।

इस को ध्यान में रखते हुये हम भक्तिसारमुनि के चरित्र को जानेंगेँ।

आळ्वार श्रीकृष्ण भगवान की तरह है। जैसे श्रीकृष्ण भगवान- देवकि/वसुदेव के यहाँ जन्म लेकर, नन्दगोप/यशोदा माई के पुत्र बनकर बड़े हुए उसी तरह भक्तिसारमुनि – भार्गवऋषि/कनकाँगि के यहाँ जन्म लेकर, तिरुवाळन/पँगयचेल्वि (लकडी काटनेवाला और उनकी पत्नि) के पुत्र बनकर बड़े हुए। भक्तिसारमुनि के अन्य नाम – महीसारपुराधीश, भार्गवात्मज, तिरुमळिशैयार/ तिरुमळिशै आळ्वार तथा विशेष रूप से तिरुमळिशै पिरान भी है। जो महान उपकारक होते हैं उन्हें ‘पिरान’ कहते है। भक्तिसारमुनि ने भगवान श्रीमन्नारायण की परतत्वता स्थापित करके ‘पिरान’ का नाम प्राप्त किया।

एक समय अत्रि, भृगु, वशिष्ठ, भार्गव और अँगीरस आदि ऋषियों ने चतुर्मुख ब्रह्मा के पास उपस्थित होकर उनसे विनती की ‘हे भगवान! हम पर कृपा करके भूलोक मे ऐसा प्रदेश दिखायिए जहाँ तप और अनुष्ठान करने के लिए अनुकूलता हो। चतुर्मुख ब्रह्माजी, विश्वकर्मा की सहायता से सारे सँसार को एक तरफ रखकर और तिरुमळिशै को दूसरी तरफ रखकर तुलना करते है। इस तुलना में तिरुमळिशै देश विजय प्राप्त करता है। इस प्रदेश को ‘महीसार क्षेत्र’ भी कहते है। कुछ दिन अपना जीवन यहाँ बिताने के लिए ,ऋषि लोग यहाँ अपना निवास स्थान कायम कर लेते है।

उस समय, भार्गव महर्षि श्रीमन्नारायण की प्रसन्नता के लिए धीर्ग सत्र याग नामक यज्ञ कर रहे थे और उनकी पत्नि गर्भवती होती है और १२ महीनों के बाद ,एक पिण्ड को जन्म देती हैं (मांस का टुकड़ा – प्रारंभिक चरण भ्रूण) जो तिरुमळिशै आळ्वार है। भक्तिसारमुनि, श्री सुदर्शन भगवान के अंश के समान प्रतीत होते थे ।(इनकी वैभवता देखकर  कुछ आचार्य पुरुष इन्हें नित्यसूरि अंश भी कहते है, लेकिन हमारे पूर्वाचार्यो ने दृढ़ता से कायम किया है कि आळ्वार इस सँसार में अगिणत काल से रहते आ रहे थे और अचानक से एम्पेरुमान का आशीर्वाद प्राप्त किये है)। अशरीर पिण्ड को पालने के लिए भार्गव महर्षि और उनकी पत्नि तैयार नहीं थे और उस पिण्ड को झाड़ी के निचे छोड़ देते है। भूदेवि ने श्रीदेवि के दिव्य आदेशानुसार पिण्ड का संरक्षण किया और उनके स्पर्श से उस पिण्ड ने सुन्दर शरीर प्राप्त किया। तुरन्त वह बालक भुख से रोने लगा। तब भगवान श्री जगन्नाथ (महीसारपुराधीश) ने इस बालक को कुंभकोणम के भगवान “आरावमुदन” के रूप मे दर्शन देकर, संपूर्ण ज्ञान प्रदान किया और जब एम्पेरुमान अदृश्य हुए तो वह बालक फिर उनके वियोग में रोने लगा।

उस समय, तिरुवालन नामक एक लकडी काटने वाला वही रास्ते से जा रहा था। वे उस रोते हुए बालक को देखते है और ख़ुशी से गोद में लेकर अपनी पत्नी के पास घर ले आते है। सन्तानहीन होने के कारण धर्मपत्नी उस बच्चे को स्वीकार कर लेती है और उसका पालन-पोषण शुरू कर देती है। पुत्रवास्तल्य से बालक को अपना दूध देने का प्रयत्न करती है। परंतु क्यूंकि वह बालक भगवान के कल्याण गुण के अनुभव और भक्ति में लीन था, उसने खाना, पीना, रोना आदि के प्रति अनासक्ति प्रदर्शित की, फिर भी भगवान कि कृपा से वे प्रवर्थमान हो रहे थे।

चतुर्थ वर्ण के एक वृद्ध दम्पति इस आश्चर्यपूर्वक वृतांत को सुनकर एक दिन सुबह गरम दूध लेकर उस बालक को देखने के लिए आते है। तेजस्वी बालक के दर्शन करके दूध स्वीकार करके पीने की प्रार्थना करते है। आळ्वार उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर थोड़ा दूध पीकर बचा हुआ शेष उनको देते है। उसे पीने की आज्ञा देते है और शीघ्र सुपुत्र प्राप्ति का आशिर्वाद देते है। आळ्वार की कृपासे वृद्ध दम्पति पुनः यौवनत प्राप्त करते है और वह स्त्री गर्भवती होती हैं। दस महीने के बाद श्री विदुरजी (जिन्हें श्रीकृष्ण के प्रति बहुत प्रेम था) की तरह एक बालक को जन्म देती है। उनका नाम ‘कणिकण्णन’ रखकर उन्हें भगवान के बारे में सब कुछ सीखाते है।

भगवान श्रीमन्नारायण के कृपा पात्र और भार्गव ऋषि के सुपुत्र होने के कारण, ७ साल के होने पर  भक्तिसारमुनि ने अष्टाङ्गयोग का अभ्यास करना चाहा। उसे सम्पन्न करने के लिए उन्होंने पहले परब्रह्म को अच्छी तरह से जानना चाहा और यह स्थापित करने के लिए कि अन्य सारे मत दोषपूर्ण है,वे अनेक मत – भाह्य मत  (सांख्य, उलूक्य, अक्षपाद, कृपण, कपिल और पातंजल) और कुदृष्टि मत (शैव, मायावाद, न्याय, वैशेषिक, भाट्ट और प्रभाकर) में अपनी ख़ोज प्रारंभ करते है और सुस्पष्टता से घोषित करते है कि सारे मत सच की स्थापना नहीं करते है। सनातन धर्म श्रीवैष्णव सिद्धान्त में ही स्थित है। इस प्रकार सात सौ साल बीत जाते हैं ।

भगवान श्रीमन्नारायण सर्वेश्वर उन्हें दिव्य और पूर्ण ज्ञान का आशीर्वाद प्रदान करते है और उन्हें दिखाते है-

  •  अपना दिव्यस्वरूप।
  • अपने कल्याण गुण।
  • अपने दिव्य अवतार (उनके स्वरूप गुणो को बताती है)।
  • दिव्य अवतारों मे अपने आभूषण।
  • अपने दिव्य आयुधों को, जो भक्तों को अनुकूल और सौन्दर्य भारित आभूषण के समान दिखते है।
  • अपनी दिव्य महिषियो को (श्रीदेवी,भूदेवी, नीलादेवि) तथा नित्यसूरियो को दर्शाते है, ये नित्यसूरि सदा भगवान श्रीमन्नारायण के कल्याण गुणों (स्वरूप, गुण, अवतार, सौन्दर्य गहण, दिव्य आयुध) का कीर्तन करते है।
  • परमपद- अपना दिव्य नित्य निवास स्थल, अंत मे
  • सँसार सागर – इस सँसार, प्रकृति, पुरुष, काल, तत्वों को तथा भगवान श्रीमन्नारायण के प्रत्यक्ष या अन्य देवताओ से परोक्ष निरंतर चलनेवाला सृष्टि, स्थिति और लय विध्यमान होता है।

कल्याण गुणों से परिपूर्ण भगवान श्रीमन्नारायण, अळ्वार को दर्शन कराते है कि कैसे वह अपनी नाभि कमल (नाभि में कमल) से चतुर्मुख ब्रह्मा की सृष्टि करते है। श्वेतश्वतारोपनिषद के अनुसार “यो ब्रह्मणाम् विदधाति पूर्वम” अर्थात परब्रह्म (भगवान श्रीमन्नारायण) ने चतुर्मुख ब्रह्मा की रचना की। छांन्दोग्य ब्राह्मण के अनुसार “ ब्रह्मणः पुत्राया जेष्ठाय श्रेष्ठाय” इसका अर्थ है कि रुद्र, चतुर्मुख ब्रह्मा के प्रथम और श्रेष्ठ सन्तान है। ये देखकर भक्तिसारमुनि तुरन्त अपनी ‘नान्मुगन तिरुवन्दादि’ में इस भावना की इस प्रकार से पुनरुक्ति करते है “नान्मुगनै नारायणन पडैत्तान नान्मुगनुम तान्मुगमाय शंकरनैत्तानपडैत्तान” अर्थात- भगवान श्रीमन्नारायण ने चतुर्मुखब्रह्मा की सृष्टि की। और चतुर्मुखब्रह्मा ने रुद्र की रचना की। इस विषय से सँसारियों के मन में भगवान के परतत्वता के प्रति सभी शंकाओं को आळ्वार ने समाप्त किया। आळ्वार घोषित करते हैं की उन्होंने स्वयं बहुत से मतों के बारे में सीखकर अंत में एम्पेरुमान की कृपा से उनके श्री चरण कमलों को प्राप्त किया है। उसके बाद तिरुवळ्ळिकेनि (बृन्दारण्य क्षेत्र) में कैरवैनि पुष्कर के तट पर श्रीपति (श्री महालक्ष्मी के पति) के कल्याण गुणों पर ध्यान करते रहे।

एक दिन शिवजी अपनी पत्नि के साथ वृषभ वाहन पर आकाश में भ्रमण कर रहे थे। तब जैसे ही उनकी छाया आळ्वार को छूने वाली थी तब आळ्वार वहां से हट गए। यह देखकर उमा, शिवजी से कहती है की उन्हें आळ्वार से मिलना चाहिए। तब शिवजी समझाते है कि आलवार भगवान श्रीमन्नारायण के महान भक्त है और वे उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देगें। लेकिन पार्वती नहीं मानी और उनसे मिलने की ज़िद्द करती रही तब अंत में शिवजी मिलने के लिए राज़ी हो जाते है। भक्तिसारमुनि ने उन्हें आँख उठाके भी नहीं देखा। तब रुद्र आळ्वार से पूछते हैं की “हम आपके समक्ष है फिर भी आप हमारी उपेक्षा कैसे कर सकते है ? भक्तिसारमुनि जवाब देते हैं “हमें आपसे कुछ काम नहीं हैं”। शिवजी कहते है कि – हम आपको वरदान देना चाहते है”। भक्तिसारमुनि उत्तर देते है की – “मुझे आपसे कुछ भी नही चाहिए”। शिवजी कहते है- “मेरा इधर आना असफ़ल रह जायेगा, आपकी मनोकामना जो भी है आप मुझसे माँग सकते हैं”। भक्तिसारमुनि हँसते हुए कहते है – ” क्या आप मुझे मोक्ष दे सकेंगे”? शिवजी -“मोक्ष प्रदान करने का अधिकार केवल भगवान श्रीमन्नारायण को ही है”। भक्तिसारमुनि फिर कहते है- “क्या आप मृत्यु को रोक सकेंगे?” शिवजी- “मृत्यु अपने-अपने कर्माणुगत है उसके ऊपर मेरा अधिकार नहीं है”। भक्तिसारमुनि व्यंग्यात्मकता से कहते है “क्या आप ये सूई मे धागा चढ़ा सकेंगे?” शिवजी क्रोधित हो जाते हैं और उन्हें कामदेव की तरह भस्म करने की धमकी देते है। अपने तीसरे नेत्र खोलकर अग्नि प्रसारित करना शुरू कर देते है। भक्तिसारमुनि भी अपने बाये पैर की अंगुष्ट से अपना तीसरा नेत्र खोलकर अग्नि ज्वाला की धारा प्रगट करते है। रुद्र, आळ्वार के श्री चरण कमलों से निकले अग्नि सहन नहीं कर पाते और भगवान श्रीमन्नारायण की शरण कर लेते है। सभी देवी देवता, ऋषिगण भी भगवान के पास पहुँचकर विशृंखलता को नष्ट करने की विनती करते है। भगवान श्रीमन्नारायण जल से भरे प्रलय मेघों को अग्निप्रलय को शान्त करने का आज्ञा देते है। जब मेघ भगवान से पूछते है कि क्या उनमें आळ्वार से प्रगटित अग्निप्रलय को बुझाने की शक्ति है? तब एम्पेरुमान उन्हें आश्वासन देते है की वह उन्हें वह शक्ति प्रदान करेंगे। अग्नि बुझाने के पश्चाद बाढ़ सी स्थिति आ जाती है। परंतु आळ्वार का ध्यान भगवान में अचल था और बिना कुछ दुविधा के ज़ारी था। यह देखकर शिवजी आश्चर्यचकित होते है और उन्हें ‘भक्तिसार’ कहके गौरवान्वित करते है। पार्वती को समझाते है कि अम्बरीषजी के प्रति किये गए अपचारों के लिए दुर्वास ऋषि को भी दंड भुगतना पड़ा था। “भगवत भक्तों की कभी हार नही होती” ऐसा कहकर वह कैलाश लौट जाते है।

भक्तिसारमुनि ध्यान मे निमग्न हो गये। उस समय एक ‘केचर’ (आकाश मे फिरने वाला) अपने  वाहन शेर/बाघ पर विराजमान होकर भ्रमण कर रहा था। आळ्वार को देखकर और उनकी योग शक्ति के कारण उन्हें पार करके आगे नहीं बढ पा रहा था। वे केचर अपनी माया से एक दिव्य शाल बनाता है और आळ्वार से “हे ! महापुरुष , आप अपनी पुरानी फ़टी हुई शाल को निकालकर यह नई शाल को स्वीकार करें” कहके प्रार्थना करता हैं। भक्तिसारमुनि मणि मानिक्य युक्त उनके दिए गए शाल से भी बेहतरीन और सुन्दर शाल की रचना करते है। उसे देखकर केचर शर्मिंदा हो जाता है। तब केचर अपने गले में पहना हुआ मणि युक्त हार भक्तिसारमुनि को समर्पित करता है। भक्तिसारमुनि अपने कण्ठ की तुलसी माला को रत्न हार बनाके केचर को दिखाते है। इस तरह केचर भक्तिसारमुनि की योगशक्ति को जान लेते है और  उन्हें गौरवान्वित करके, उनको प्रणाम कर लौट जाते है।

भक्तिसारमुनि की वैभवता के विषय में सुनकर एक कोण्कणसिद्ध नामक ज़ादुगर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष एक रसविज्ञान पत्थर समर्पित करता है (ये पत्थर लोहे को सोना बना देता है)। आळ्वार उसकी उपेक्षा करते है। अपने दिव्य शरीर (कान के भाग से) से थोडा मैल निकाल कर उनको देते है और कहते है कि उस मैल से पत्थर भी सोना बन जाता है। ज़ादुगर उसकी झाँच करके खुश होता है और भक्तिसारमुनि को प्रणाम करके लौट जाता है।

आळ्वार ने कुछ समय एक गुफ़ा में ध्यान करते हुए बिताया। मुदलाळ्वार (प्रथम तीन आळ्वार- भूतयोगि, सरोयोगि तथा महदयोगि) जो भगवान श्रीमन्नारायण के कीर्तन करके अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, उन्होंने देखा की गुफ़ा से एक दिव्य तेज प्रसरित हो रहा था। मुदलाळ्वारों की मुलाक़ात भक्तिसारमुनि से हुई। एक दूजे के विषय में जानकर परस्पर क्षेम विचार पूछकर सब मिलकर भगवद् गुणानुभव में कुछ समय व्यतीत करते है। बाद में उधर से निकलकर पेयाल्वार(महदयोगि) के अवतार स्थाल ‘तिरुमयिलै (प्रस्तुतकालमे मैलापूर) को पहुँचते है। वहां ‘कैरविणि’ तीर्थ के तटपर वे लोग कुछ समय व्यतीत करते है। मुदलाळ्वार अपनी दिव्य यात्रा को ज़ारी रखते है और भक्तिसारमुनि अपने अवतार स्थल तिरुमळिशै पहुँच जाते है।

भक्तिसारमुनि शरीर में धारण करने वाला तिरुमणकाप्पु (श्वेतमृत्तिका) ढूंढ़ते है लेकिन तलाश नहीं कर पाते है। वह उदास होकर सो जाते है। भगवान श्रीनिवास (तिरुवेंकट मुदैयाँ) स्वप्न में साक्षात होकर तिरुमणकाप्पु का पता बताते है। वे उस पते पर छान -बीन करते है और तिरुमणकाप्पु प्राप्त करके ख़ुशी से द्वदशा उर्ध्व पुण्ड्र (शास्त्र के अनुसार शरीर पर १२ प्रदेशों में तिरुमणकाप्पु  लगाया जाता है) लगाकर अपना भगवत अनुभव ज़ारी रखते है। पोइगै आळ्वार के अवतार स्थल जाने के अभिलाषा से वे कांचीपुर -तिरुवेक्का क्षेत्र में पहुँचते है जिसे सभी पुण्य क्षेत्रों में श्रेष्ठ कहा जाता है। श्रीदेवी और भूदेवि की सेवा स्वीकार करते हुये आदिशेष पर अति सुन्दरता से शयनित एम्पेरुमान की सेवा करते हुए 700 साल बिताते है। भूतयोगि का अवतार जिस पुष्करिणी के तट पर हुआ, वहाँ भक्तिसारमुनि भूतयोगि स्वामीजी का ध्यान करते हुए कुछ समय व्यतीत करते है।

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उभय देवेरियों से युक्त यथोक्तकारि भगवान,तिरुवेक्का

उस समय, कणिकण्णन उनके पास आकार उनके श्री चरणों की शरण लेते है। एक वृद्ध नारी प्रति दिन आळ्वार के पास आकर उनकी सेवा करती थी। भक्तिसारमुनि उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उनसे उनकी मनोकामना पूछते है। वृद्ध नारी अपनी यौवन अवस्था को पुनः प्राप्त करने का वरदान माँगती है। भक्तिसारमुनि उनकी मनोकामना की पूर्ति करते है और वह वृद्ध नारी अति सुन्दर युवती बन जाती है। युवती की सुन्दरता पर स्थानिक महाराज पल्लवराय आकर्षित हो जाते है और उनसे विवाह करने की विनती करते है। एक बार पल्लवराय ने देखा कि वे तो दिन प्रतिदिन बूढ़े हो रहे थे और बुढ़ापा उनकी पत्नी के आस -पास भी नहीं था। यह देखकर उनकी दिव्य यौवनता का रहस्य पूछते है। पत्नी भक्तिसारमुनि से प्राप्त आशिर्वाद के विषय में बताती है और उन्हें सलाह देती है की आळ्वार को प्रसन्न करके यौवनता का वरदान माँगे और कहती है कि इसके लिए उनके शिष्य कणिकण्णन (जो अपनी कैंकर्य सामाग्रि के लिए पल्लवराय के पास आते थे ) की सिफ़ारिश का उपयोग करे। पल्लवराय, कणिकण्णन से पूजार्थ भक्तिसारमुनि को राज दरबार में पेश करने की आज्ञा देते हैं । कणिकण्णन राजा से कहते हैं की भक्तिसारमुनि भगवान के द्वार (एम्पेरुमान) को छोडकर कहीं नहीं आएँगे। पल्लवराय उन्हें कीर्तन करने के लिए आदेश करते है परंतु वे आदेश को यह कहते हुए ठुकरा देते है की शिष्टाचार (जो पूर्विक के सिद्धान्त और अनुष्ठान के प्रकार) के अनुसार भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्तो के सिवा किसी का भी वे कीर्तन नही करेंगे। यह सुनकर पल्लवराय बहुत क्रोधित होते हैं और कणिकण्णन को देश से बहिष्कृत कर देते है। राजा का महल छोड़कर कणिकण्णन अपने गुरु भक्तिसारमुनि के पास पहुँचकर घटित क्रम बताकर, देश से जाने के लिए अनुमति माँगते है। भक्तिसारमुनि कणिकण्णन से कहते है कि “आप नहीं रहेंगे तो हम भी यहाँ नहीं रहेंगे, अगर हम नहीं रहेंगे तब भगवान भी यहाँ नहीं रहेंगे। अगर एम्पेरुमान चले जायेंगे तब सभी देवी देवता इधर से निकल जायेंगे। “मैं अभी मन्दिर जाकर भगवान को अपने साथ लेकर आता हूँ “और मंदिर तक पहुँचते है। आलवार भगवान तिरुवेक्का के द्वार पर यह गान करते हैं  

‘कणिकण्णन पोगिन्नान

कामरुपू कच्चि मणिवण्न नी किडक्का वेण्डा

तुण्णि वुडया चेण्णाप्पुलवनुम पोगिन्नेन

नीयुम उन्नन पैण्णागप्पाय चिरुट्टिक्कोळ ’

हे! अति सौन्दर्य रूपी तिरुवेक्का के निवासि ! कणिकण्णन यह राज्य छोड कर जा रहे है। दास भी उनके साथ जा रहा है। आप भी अपना आसन आदिशेष को बाँधकर हमारे साथ चलिए!

भगवान भक्तिसार मुनि की बात मानकर उनके और कणिकण्नन के पीछे पीछे चल देते है। इसलिए उन्हें यदोक्तकारी तिरुनाम प्राप्त है (कारी – करने वाला ,यध – जैसे , उक्त – कहे)। सब देवगण भगवान यधोक्तकारि के पीछे चल पड़े। मँगलता नष्ट हो गयी और काञ्चीपुरम जीव रहित हो गया। काञ्चीपुरम मे सूर्य का उदय नहीं हुआ और सम्पूर्ण और अन्धकार छा गया। पल्लवराय इसका कारण समझ चुके थे। अपने राज परिवार के साथ उनके पीछे जाकर, कणिकण्णन के श्रीचरणों पर अपना मस्तक रखकर क्षमा याचना करते है। कणिकण्णन, भक्तिसारमुनि को और भक्तिसारमुनि, भगवान यधोक्तकारि से अपने यथा स्थान लौटने के लिए प्रार्थना करते है।

कणिकण्णन पोक्कोजिण्तान

कामरुपू कच्चि मणिवण्णा नी किडक्का वेण्डुम

तुनि वुडया चेण्णाप्पुलवनुम पोक्कोजिण्तेन

नीयुम उन्नन पैण्णागप्पाय पडुत्तक्कोळ ’

हे। अति सुन्दर तिरुवेक्का के निवासि! कणिकण्णन लौट रहा हैं, मैं (आप के बारे में गान करने वाला कवि) भी लौट रहा हूँ, आप भी बंधे हुए आदिशेष की शय्या को बिछाकर यथा स्थान विराजियें।

ये भगवान श्रीमन्नारायण की सौलभ्यता- सादगी के गुण का प्रत्यक्ष उदहारण है और भगवान श्रीमन्नारायण के इसी गुणानुभव में आल्वार निमग्न थे और उन पर व्यामोह से गाते है- वेक्कानै क्किडंद तेन्न नीर्मैयै- अर्थात एम्पेरुमान कितने दयालु हैं जो मेरी विनती को स्वीकार करके ‘तिरुवेक्का’ में विराजे है।

उसके बाद भक्तिसारमुनि अत्यन्त आशा से तिरुक्कुडंदै (कुम्भकोणम) भगवान “आरावमुदाळ्वार” का मँगलाशासन करने के लिए निकल पड़ते हैं। तिरुक्कुडंदै महात्म्य में कहा जाता है की “जो यहाँ (तिरुक्कुडंदै) क्षण मात्र समय भी व्यतीत करते है उनको वैकुण्ठ में स्थान प्राप्त है और लौकिक सँसार की संपदा के विषय में कहने की क्या आवश्यकता हैं”। ऐसी इस दिव्यदेश की महानता है। एक बार भक्तिसारमुनि अपनी यात्रा के दौरान ‘पेरुम्पुलियूर’ नामक गाँव पहुँचते है। एक गृह के आँगन में  बैठे हुये कुछ ब्राह्मण लोग वेद का पाठ कर रहे थे। उस समय वे लोग भक्तिसारमुनि के फटे और पुराने पहनावट को देखकर अपने वेद अध्यन को रोक देते है। इस विषय को ग्रहण करते हुए भक्तिसारमुनि विनम्रता से वहाँ से निकल पडे। ब्राह्मण गण अपने वेदपाठ को फिर से आरम्भ करने की कोशिश करते हैं परंतु जिस स्थान पर उन्होंने वेद पाठ रोका था उसे भूल जाने के कारण आरम्भ नहीं कर पा रहें थे। भक्तिसारमुनि यह जानकर एक चावल का धान/बीज लेकर अपना नखोँ से धान्य को चीरते है। ये दृश्य देखने के बाद उन ब्राह्मण लोगों को अपने वेदपाठ की पंक्ति स्मरण आ गई। “कृष्णाणाम व्रिहिणाम नखनिर्भिन्नम” -ये यजुरवेद का खण्ड है। वे सब भक्तिसारमुनि की वैभव को जान लेते हैं और अपनी भूल और बुरे बर्ताव के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए भक्ति से उनकी वन्दना करते है।

भक्तिसारमुनि अपनी पूजा सामाग्रि की तलाश कर रहे थे तब उस गाँव में स्थित एम्पेरुमान उन्हीं की ओर मुड़ रहे थे। पूजारी लोग उस आश्चार्यपूर्वक दृश्य को देखकर उसके बारे में कुछ ब्राह्मण लोगों को बताते है, जो उस गाँव मे याग करने वाले पेरुम्पुळियूर अडिगळ को भक्तिसारमुनि की वैभवता के बारे में और इस विशेष वृतांत के विषय में बताते है। पेरुम्पुळियूर अडिगळ तुरन्त यागशाला (यज्ञ भूमि ) को छोडकर भक्तिसारमुनि के पास जाते है और उनकी दिव्य देह को देखकर विनम्रता से प्रणाम करते है और उनको यागशाला आने के लिए निमंत्रित करते है। भक्तिसारमुनि उनका निमंत्रण स्वीकार करते है और यागशाला पहुँच जाते है। पेरुम्पुळियूर अडिगळ आल्वार को प्रथम स्थान देते हुए उनको मर्यादा करते हैं (अग्र पूजा)। राजसूय यज्ञ में जब धर्मराज ने श्री कृष्ण भगवान को प्रथम स्थान देकर उनकी अग्र पूजा की तब शिशुपालन आदि लोगों ने विरोध किया था और ठीक उसी तरह भक्तिसारमुनि की अग्र पूजा करने का कुछ लोग तिरस्कार कर रहे थे। पेरुम्पुळियूर अडिगळ उनकी बातों से उदास हो जाते है और आलवार से कहते है कि वे आलवार के विषय में ऐसे कठोर शब्दों को नहीं सुन सकते। भक्तिसारमुनि अपनी वैभवता प्रकट करने का निर्णय करते है और अन्तर्यामि एम्पेरुमान (भगवान श्रीमन्नारायण) को एक पाशुर से विनति करते है की उनके ह्रदय में स्थित दिव्य मूर्ति का दर्शन सभी लोगों को कराया जाय। उनकी प्रार्थना  सुनकर भगवान श्रीमन्नारायण अपने  देवियों से, आदिशेष, गरुड़ इत्यादि परिवार के साथ भक्तिसारमुनि के हृदय में सब को दर्शन देते है। यह देखकर जिन लोगों ने भक्तिसारमुनि की अग्र पूजा का विरोध किया था वे ही उनकी वैभवता को देखकर क्षमा माँगकर शाषटाङ्ग प्रणाम करते है। भक्तिसारमुनि को सब लोग मिलकर ब्रह्मरथ में विराजित करते हैं (पालकी मे बैठाना) और आळ्वार की दया के पात्र बनते है। भक्तिसारमुनि ने उन लोगो को शास्त्र के सार उपदेश प्रदान किया। उसके बाद आळ्वार आरावमुदन एम्पेरमान को मिलने तिरुकुडंदै पहुँचते हैं ।

तिरुकुडंदै पहुँचने के बाद भक्तिसारमुनि उनके द्वारा रचित सारे ग्रंथ कावेरी नदी के पानी में फ़ेंक देते है। भगवान आरावमुदन की  कृपा से नान्मुगन तिरुवन्दादि और तिरुचन्द विरुत्तम दो ग्रंथ लहरों के विपरीत दिशा में तैरते हुए भक्तिसारमुनि के पास वापस आ जाते है। भक्तिसारमुनि उन ग्रंथों को लेकर भगवान आरावमुदन की सन्निधि में पहुँचकर आपादमस्तक पर्यन्तं दर्शन करके उनका मंगलाशासन करते है। भक्तिसारमुनि अत्यन्त प्रीति से भगवान आरावमुदन को कहते है “ काविरिक्कारैक कुडंदयुल किडंद वार एलुंदिरुन्दु पेच्चु”। अर्थात –“ हे ! कावेरी तट पे तिरुकुडंदै में शयन मूर्ति एक बार उठ के मुझ से बात कीजिये”। उनकी बोली मानकर तिरुकुडंदै आरावमुदन उठने के लिए प्रयत्न करते है  तब उन्हें देखकर आळ्वार खुश हो जाते है और उन्हें “वाळि केशने” कहकर उनका  मँगलाशासन करते है अर्थात “हे सुन्दर केशवाले ! आपका सदा मँगल हो”। इस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुऐ भक्तिसारमुनि ने 2300 साल तक तिरुकुडंदै क्षेत्र मे केवल दूध पीकर समय बिताया। एसे भक्तिसारमुनि ने 4700 साल भूलोक में जीवित रहकर अपने दिव्य प्रबंधो से सँसारियों के उज्जीवन के लिए शास्त्र का सार दया के साथ अनुग्रह किया।

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कोमलवल्लि तायार समेत श्री आरावमुदन भगवान ,तिरुकुडंदै (कुम्भकोणम)

भक्तिसारमुनि को ‘तिरुमळिशैपिरान’ नाम से जाना जाता है। (पिरान- महान उपकारक होते है -साधारण में ये वाचक शब्द केवल भगवान को संबोधन करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं) – भक्तिसारमुनि ने भगवान के परतत्व को बताकर महान उपकार किया है इसलिए वह पिरान हुए। उस दिन से तिरुमलिशै आळ्वार ‘तिरुमळिशै पिरान’ हुए और तिरुकुडंदै आरावमुदन, आरावमुदाळ्वार के रूप में प्रसिद्धि हुए। (आळ्वार उन्हें कहा जाता हैं जो  भगवान के कल्याण गुणो में तथा उनके दिव्य सौन्दर्य मे डूबे रहते है और ये वाचक शब्द भगवान के भक्तों को संबोधन करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं) क्यूँकि तिरुमलिशै आळ्वार के नाम, रूप और गुणों में आरावमुदन डूबे हुए थे, उन्हें आरावमुदाळ्वार कहकर संबोधन किया जाता है।

आळ्वार की दिव्य कृपा के लिए प्रार्थना करें ताकि हमें भी उन्हीँ की तरह एम्पेरुमान और उनके सेवकों के प्रति भक्ति भाव और लगाव प्राप्त हो।

तनियन

शक्ति पंचमय विग्रहात्मने शुक्तिकारजात चित्त हारिणे।

मुक्ति दायक मुरारि पादयोः भक्तिसार मुनये नमो नमः॥

-अडियेन नल्ला शशिधर रामानुजदास

source

मधुरकवि आळ्वार्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

madhurakavi

मधुरकवि आळ्वार्

तिरुनक्षत्र – चैत्र मास , चित्रा नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुक्कोळूर्

आचार्य – नम्माळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार् तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – कण्णिनुण् शिरूताम्बु

नम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी) ने व्याख्यान अवतरिका में मधुरकवि आळ्वार की वैभवता के बारे में अति सुन्दरता से वर्णन किया है। आईये कुछ झलक यहाँ देखेते है।

ऋषियों का ध्यान सामान्य शास्त्र पर होता है जो ऐश्वर्य, कैवल्य और भगवत कैंकर्य को पुरुषार्थ (आत्म का लक्ष्य) मानते है। आळ्वारों का ध्यान उत्तम पुरुषार्थ (परम लक्ष्य) पर होता है, अर्थात श्रीमन्नारायण भगवान की प्रेम पूर्ण सेवा कैंकर्य। मधुरकवि आळ्वार का ध्यान अति उत्तम (परमोत्तम) पुरुषार्थ- भागवत कैंकर्य पर है। भागवत कैंकर्य – भगवत भक्तों की सेवा करना है, जो निश्चित रूप से एम्पेरुमान् को अत्यंत प्रिय हैं ।

यह विषय हम श्रीरामायण में भी देख सकते है। श्रीरामायण वेद उपबृह्मणम (वेद शास्त्र के निगूढ़ अर्थ को समझाता है) और इसी कारण वह वेद के मुख्य विषयों का अति सुलभता से विवरण करता है।

  • श्रीराम भगवान स्वयं धर्म के साक्षात स्वरूप है – इसलिए उन्होंने “पितृ वचन पालन” (बुज़ुर्ग लोगों के आदेश मानना इत्यादि) जैसे सामान्य धर्म की स्थापाना की।
  • इळया पेरुमाळ (श्रीलक्ष्मणजी) ने विशेष धर्म – शेषत्वम् की स्थापना की जिसके अनुसार शेष (दास) को हमेशा अपने शेषि (मालिक) का अनुगमन करना चाहिए और उनकी सेवा करना चाहिए। उन्होंने श्रीराम से कहा की “अहम् सर्वं करिष्यामि” (आपके लिए मैं सब कुछ करूँगा) और उस विषय का आचरण भी किया है।
  • श्री भरताल्वान् (भरत) ने पारतन्त्रियम् की स्थापना की है, जो जीवात्मा का स्वाभाविक स्वरूप है। बिना कुछ स्वपेक्षा किये अपने मालिक की इच्छा अनुसार आज्ञा का पालन करना पारतन्त्रियम् कहा जाता है। पेरुमाळ की इच्छा थी की भरताल्वान् अयोध्या में रहे और राज्य का परिपालन करे, भरताल्वान् उनकी आज्ञा पालन करते है और उसे परम आदेश मानकर अयोध्या के बाहर १४ साल श्री राम के समान वस्त्र धारणकर और अनुष्ठान से बिताते है।
  • श्री शत्रुघ्नाळ्वान (शत्रुघ्न) अपने स्वरूप का प्रतीक भागवत् शेषत्वम् की स्थापना करते हैं। अन्य विषयों के प्रति मोह त्याग केवल भरताल्वान् का अनुगमन करते हुए उनकी सेवा में जुट गए।

श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी यहाँ श्री भाष्यकार् (रामानुजर्) द्वारा बताये गए कथन का उल्लेख करते है कि श्रीशत्रुघ्नाळ्वान, भरताल्वान के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण के कारण, अपने अन्य भाईयों – इळया पेरुमाळ और भरताल्वान की अपेक्षा, श्री राम के अत्यंत प्रिय थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्री शत्रुघ्न आळ्वान् के समान थे, जो भागवत् निष्ठा में पूरी तरह से डूबे हुए थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्रीशठकोप स्वामीजी के श्री चरणों की शरण मे थे और पूर्णत: उनकी सेवा में थे। उनके लिए नम्माळ्वार् ही लक्ष्य (उपेय) है और वे ही लक्ष्य साधन के प्रक्रिया (उपाय) भी है। मधुरकवि आळ्वार ने अपने दिव्य प्रबन्ध में इसी विषय को सूचित किया है।

पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी अपनी प्रसिद्ध रचना, श्रीवचन भूषण के अन्तिम प्रकरण में आचार्य अभिमान निष्ठा (पूरी तरह से आचार्य पर निर्भर/आश्रित रहना) की महत्ता को मधुरकवि आळ्वार के जीवन और नम्माळ्वार् के प्रति उनके स्नेह और प्रेम का उदाहरण देते हुए समझाते है। 8वे प्रकरण में, भगवान की निर्हेतुक कृपा (अकारण ही कृपा करते है) का विवरण किया गया है। इसी के साथ, जीवात्मा को कर्मानुसार प्रतिफल देना भी उन्हीं पर निर्भर है। इस कारण हमें भगवान द्वारा हमारी स्वीकृति पर शंका हो सकती है। 9वे (अन्तिम) प्रकरण में पिळ्ळै लोकाचार्य, चरम उपाय (अन्तिम उपाय -आचार्यं पर निर्भर/आश्रित रहना) की महानता को स्थापित करते है और यह बताते है कि किस प्रकार से यह उपाय जीवात्मा को सुगमता से मुक्त कर देता है। आईये इसके बारे में देखे।

407 सूत्र में वे बताते है कि हमें यह भ्रम हो सकता है कि क्यूंकि भगवान स्वतन्त्र है, और इस हेतु वे हमें अपने कारुण्य (कृपा) द्वारा स्वीकार भी कर सकते है और शास्त्रों के विषयानुसार (जिसमें कर्मानुसार फल प्राप्ति होती है) अस्वीकार भी कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में बताते हैं की इस सूत्र की पूर्ती के लिए निम्न विषय का योग आवश्यक है- “जब हम आचार्य, जो परतन्त्र है (भगवान पर पूर्णरूप से निर्भर है) के श्रीचरणों में आश्रित होते हैं, तब कोई शंका नहीं रहती, क्यूंकि वे यह सुनिश्चित करते है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य (परमपद) प्राप्त करें, क्यूँकि आचार्य कारुण्य रूप है और केवल जीवात्मा की उन्नति के बारे में ही देखते हैं । “

408 सूत्र में बताते है की यह विषय, अन्य 10 आळ्वारों (मधुरकवि आलवार और आण्डाल के अतिरिक्त), जो पुर्णतः भगवान के आश्रित है, के पाशुरों के माध्यम से स्थापित नहीं हो सकता है। एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से यह आळ्वार दोष रहित ज्ञान से प्रासादित थे। जब वे भगवत अनुभव में डुबे हुए होते है, तब वे भागवतों का गुणगान करते है। परंतु एम्पेरुमान् के वियोग में, असहनीय परिस्तिथि के कारण व्याकुल होकर, वे भागवतों से उदास हो जाते है (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में कई जगह इस विषय का उदहारण देते हैं)। अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी संक्षिप्त में कहते है कि अन्य 10 आळ्वारों के पाशुरों के द्वारा आचार्य वैभव के महत्त्व का निरूपण करना संभव नहीं है परंतु मधुरकवि आळ्वार के पशुरों के द्वारा हम आचार्य वैभव निर्धारित कर सकते हैं ।

409 सूत्र, यह प्रतिपादित करता है कि मधुरकवि आळ्वार अन्य आळ्वारों से महत्तर है क्यूँकि अन्य आळ्वार कुछ समय भागवतों की वैभवता का गुणगान करते है और कुछ समय उनकी उपेक्षा करते हैं लेकिन मधुरकवि आळ्वार का ध्यान केवल आचार्य (नम्माळ्वार्) वैभव पर केंद्रित था। केवल इन्हीं के शब्दों से हम आचार्य वैभव को स्थापित कर सकते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, मधुरकवि आळ्वार की वैभवता को अपने उपदेश रत्न माला के 25वे और 26वे पाशुर में समझाते है।

25वे पाशुर् में वे कहते है कि मधुरकवि आळ्वार का अति पावन अवतार दिवस – चैत्र मास, चित्रा नक्षत्र, अन्य आळ्वारों के अपेक्षा, प्रपन्न जनों के स्वरूप के लिए सबसे उपयुक्त है।

26वे पाशुर् में वे आळ्वार और उनके प्रबन्ध का अत्यन्त वैभव युक्त वर्णन करते है-

वायत्त तिरुमॅतिऱत्तिं मत्तिममाम् पदम् पोल् ।
सीर्त्त मधुरकवि शेय कलैयै ॥
आर्त्त पुघळ आरियरगळ ताङ्गळ अरुळिचेयल नडुवे ।
सेरवित्तार् तार्परियम् तेर्न्दु ॥

पिळ्ळै लोकम् जीयर इस पाशुर् का सुन्दर विवरण देते है। कण्णिनुण् शिरूताम्बु के लिए तिरुमन्त्र के नमः पद का उदहारण देते है। तिरुमन्त्र की प्रसिद्धि यह है कि वह वाचक को संसारिक बंधनों से मुक्त कर देता है। तिरुमन्त्र में नमः पद एक मुख्य पद है – जो स्पष्ट रूप से यह स्थापित करता है कि स्वयं का संरक्षण करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है और अपने संरक्षण के लिए हमें अपने नाथ भगवान पर पूरी तरह से निर्भर होना चाहिए। इसी सिद्धांत का वर्णन मधुरकवि आळ्वार (जो स्वयं अपने आचार्य निष्ठा के लिए महान है) ने अपने दिव्य प्रबंध में किया है। वे बताते है कि हमें स्वयं के संरक्षण के लिए संपूर्णतः आचार्य पर निर्भर रहना चाहिए। शास्त्र के सार को वास्तविकता में दर्शाने के कारण ही, हमारे पूर्वाचार्यों ने इस प्रबंध को 4000 पाशुरों के दिव्य प्रबंध में जोड़ा है। जिस प्रकार मधुरकवि आळ्वार का तिरुनक्षत्र – चित्रा नक्षत्र , 27 नक्षत्रों के मध्य में हैं, उसी प्रकार उनके प्रबंध को भी दिव्य प्रबंध रत्न माला का केंद्र माना जाता है।

इस प्रकार हम देख सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस समान विषय का वर्णन पृथक दृष्टिकोणों से किया है।

इस विषय के साथ, आईये उनके चरित्र को देखे-

मधुरकवि आळ्वार ने चैत्र मास -चित्रा नक्षत्र में तिरुकोळूर् में अवतार लिया। जैसे सूरज के पहले सूरज की किरणे/ रौशनी आती है, उसी तरह श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य अवतार के पूर्व इन्होंने अवतार लिया है। इनकी महानता देखते हुए, गरुड़ वाहन पण्डित अपने दिव्य सूरी चरित्र में इन्हे “कुमुद गणेश” या “गरुडाळ्वार्” के अंश मानते हुए गौरवान्वित करते है (वास्तव में आळ्वारों को एम्पेरुमान् ने सँसार से चुनकर उन्हें दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया)।

साम वेद के पण्डित और पूर्व शिखा ब्राह्मण के परिवार में इनका जन्म हुआ। उचित समय में उनके जात कर्म, नाम कर्म, अन्न-प्रासन, चौळा, उपनयनम् इत्यादि कार्य पूर्ति हुए और उन्होंने वेद, वेदान्तम्, पुराण, इतिहास इत्यादि का अध्ययन भी किया। भगवान के अतिरिक्त अन्य विषयों से वे विरक्त थे और उत्तर भारत के कुछ दिव्य क्षेत्र जैसे अयोध्या, मधुरा इत्यादि के यात्रा पर निकले।

nammazhwar-madhurakavi-nathamuni

मधुरकवि आळ्वार,नम्माळ्वार,नाथमुनि-श्री कांचीपुरम

मधुरकवि आळ्वार के पश्चाद अवतार लिए नम्माळ्वार को किसी विषय में रूचि नहीं थी यहाँ तक की माता के दूध में भी नहीं और वे बिना कुछ कहे संसार में रह रहे थे। इनके माता -पिता कारी और उदयनंगै, उनके जन्म के 12 दिन बाद, शिशु के इस प्रकार के लक्ष्ण से उद्विग्न थे, और उन्हें पोलिन्द निण्र पिरान एम्पेरुमान् के समक्ष प्रस्तुत करते है। यह एम्पेरुमान् ताम्रपर्णी नदी के दक्षिण में स्थित एक सुन्दर मंदिर में, शंख और चक्र आयुधों से अलंकृत, पद्म के समान सुन्दर नेत्रों से, अभय हस्त प्रदान करते हुए (एक हाथ की मुद्रा जिससे भगवान अभय प्रदान कर रहे है कि वे अवश्य हमारा रक्षण करेंगे) और अपनी दिव्य महिषी – श्रीदेवि , भूदेवि ,नीळा देवि के साथ विराजमान है। भगवान के समक्ष, उनके माता-पिता उनका “मारण” (अर्थात जो सबसे अलग है) कहकर नामकरण करते है और उन्हें दिव्य इमली के वृक्ष के निचे रख, उन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानकर आराधन करते है। परमपदनाथ भगवान तब श्रीविष्वक्सेनजी से उन्हें पञ्चसंस्कार करके उन्हें द्राविड़ वेद (नायनार अपनी रचना आचार्य ह्रदय में बताते है कि द्राविड़ वेद सनातन है) और सभी रहस्य मंत्र और मंत्रार्थ की शिक्षा प्रदान का आदेश देते हैं और श्री विष्वक्सेनजी भगवान के निर्देश का पालन करते है।

तिरुप्पुळि आळ्वार् के निचे (दिव्य इमली के पेड़ ) नम्माळ्वार् 16 साल बिताते है। इनकी महानता को इनके माता – पिता समझ चुके थे लेकिन किसी से भी बात नहीं कर रहें थे क्यूँकि आळ्वार् की उत्कर्षत सभी जन नहीं पा सक रहें थे  और वे तिरुक्कुरुंगुडि नम्बि एम्पेरुमान् को ही निरंतर प्रार्थना कर रहे थे । इस विषय के बारे में मधुरकवि आळ्वार् भी सुन चुके थे और एक दिन रात में नदि के तट जा पहुँचते हैं और दक्षिण की ओर से एक उज्ज्वल प्रकाश दिखायी दिया। वे सोच बैठते हैं की वह प्रकाश किसी गाँव से या जँगल के आग से उत्पन्न हुई होगी । लेकिन , लगातार उसी प्रकाश २-३ दिन दिखने लगी । वे ठान लेते हैं की उसके बारे में जानेंगे और सुबह सोके उस दिन रात को उस प्रकाश का पीछा करते हैं । मार्ग में कई दिव्य देशों की यात्रा करते हुए श्री रंगम् पहुँचते हैं । दक्षिण दिशा से वह प्रकाश उन्हें और भी दिखाई दे रहा था और अपनी ख़ोज जारी रखते हुए अंत में तिरुक्कुरुगूर् (आळ्वार् तिरुनगरी )पहुँचते हैं । वहाँ पहुँचने के बाद , रौशनी नहीं दिख रही थी और वे निश्चित करते हैं की प्रकाश उधर से ही उत्पन्न हो रहा हैं । वे मन्दिर प्रवेश करते हैं और तिरुप्पुळिआळ्वार् के निचे निश्चल और परिपूर्ण ज्ञान युक्त , सुन्दर से आँखों वाले , केवल १६ वर्ष के बालक , पूर्णिमा के चन्द्रम के तरह प्रकाशित , पद्मासन में आसीन , एम्पेरुमान् के बारे में अनुदेश देते हुए उपदेश मुद्रा में विराजमान और प्रपन्न जन के आचार्य नम्माळ्वार् को पाते हैं । भगवत अनुभव में डुबे हुए उन्हें देखकर , वे एक छोटा सा पत्थर उनकी ओर फेंकते हैं । आळ्वार् अति सुन्दर तरह से जाग जाते हैं और मधुरकवि आळ्वार् को देखते हैं । उन्होंने उनकी बोलने की शक्ति को परखना चाहा और उनसे ” सत्ततिन् वैतिल् सिरियदु पिरन्दाल् एत्तैतिनृ एन्गे किडक्कुम्” करके प्रश्न पुछा मतलब जब एक चेतन आत्म ( संवेदन शील – जीवात्म ) अचेतन वस्तु (असंवेद्य ) में प्रवेश करता हैं , वह जीवात्म कहाँ रहता हैं और किसका आनंद लेता हैं । आळ्वार् उत्तर देते हैं “अत्तैतिनृ अंगे किडक्कुम् ” जिसका अर्थ हैं भौतिक और संसारिक सुख – दुख को अनुभव करते हुए उस असंवेद्य  वस्तु में नित्य स्थिरता प्राप्त करता हैं । यह सुनने के बाद मधुरकवि आळ्वार् जान लेते हैं की वे सर्वज्ञ हैं और इनकी सुश्रुत करके उन्नति पानी चाहिए । यह सोचकर वे नम्माळ्वार् के श्री पाद पद्मों केआश्रित हो जाते हैं । उस समय से वे आळ्वार् के साथ निरंतर उनकी सेवा करते हुए और उनकी कीर्ति गान करते बिता देते हैं ।

तत्पश्चात् , श्री वैकुण्ठ नाथ (परमपदनाथ ) को जो सभी बीजों के बीज हैं , जो सबके मालिक हैं , जो सब के नियंत्रक हैं , जो चेतन और अचेतन वस्तुओं में परमात्म बनकर स्थित हैं, जिनका शरीर(तिरुमेनि) काला / नील रंग का हैं ,आळ्वार् से मिलना की अभिलाष हुई । पेरिया तिरुवडि (गरुडाळ्वार् ) तुरन्त एम्पेरुमान् के सामने हाज़र होते हैं और एम्पेरुमान् श्री महा लक्ष्मी के साथ उन पे आसीन हो जाते हैं और तिरुक्कुरुगूर् पहुँच के आळ्वार् को अपना दिव्य दर्शन प्रदान करके , उन्हें दिव्य ज्ञान से अनुग्रह करते हैं । एम्पेरुमान् के अनुग्रह प्राप्त होने के कारण नम्माळ्वार् भगवत अनुभव में डूब जाते हैं और उस अनुभव आनंद की सीमायें पार किये तिरुविरुत्तम् , तिरुवासीरियम्, पेरिय तिरुवंदादि और तिरुवाय्मोळि (चार वेदों का सार ) के दिव्य पाशुरों के रूप में एम्पेरुमान् का दिव्य स्वरूप , दिव्य आकृति और दिव्य गुणों का कीर्तन करते हैं । नम्माळ्वार् इसे मधुरकवि आळ्वार् और उनके आश्रित लोगों को शिक्षा देते हैं । नम्माळ्वार् को आशीर्वाद करके उनसे मंगलाशासन पाके अपने आप का पोषण करने के लिए सभी दिव्य देश के एम्पेरुमान् तिरुप्पुळिआळ्वार् के सामने आते हैं । नम्माळ्वार् हम सभी को उनकी तरह बनने और उन्हीं के जैसे एम्पेरुमान् के प्रति प्रेम होने का आशीर्वाद करते हैं । परमपद से नित्य सूरी और क्षीर समुद्र से श्वेत दीप वासी नम्माळ्वार् की कीर्तन करने के लिए आते हैं और उन्हें देखे आळ्वार् उनका मँगलाशासन करते हैं । नित्य सूरी और श्वेत दीप वासी उनके लिए आकर उनकी स्तुति करने से नम्माळ्वार् प्रसन्न हो जाते हैं और ऐलान करते हैं की ब्रह्माण्ड में इनसे बड़कर कोई नहीं हैं (एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से उत्पन्न हुआ सात्विक अहँकार ), वे सीमा रहित कीर्ति से जीवन बितायेंगे और हमेश कण्णन् एम्पेरुमान् ( कृष्ण) के प्रति ध्यान करते हुए खुद को बनाये रखेंगे ।वे अर्थ-पंचक का ज्ञान (पाँच तत्वों का ज्ञान – परमात्म स्वरुप , जीवात्म स्वरुप, उपाय स्वरुप, उपेय स्वरुप और विरोधि स्वरुप ) और एम्पेरुमान् के भक्तों का दिव्य मधु तिरुवाय्मोळि द्वारा द्वय महा मंत्र का अर्थ पूरी तरह से प्रकाशित करते हैं । ३२ वर्ष की उम्र में इस सँसार को छोड़ के एम्पेरुमान् की दिव्य मनोरथ से परमपद पहुँचते हैं ।

नम्माळ्वार्(जो प्रपन्न जन कूटस्थर् – प्रपन्न कुल नायक मूलपुरुष ) के प्रधान शिष्य मधुरकवि आळ्वार् अपने आचार्य की स्तुति करते हुए कण्णिनुण् शिरुताम्बु की रचना करके पञ्चोपाय निष्ठा का पालन(पाँचवा उपाय – आचार्य निष्ट और कर्म , ज्ञान , भक्ति और प्रपत्ति बाकी चार उपाय हैं ) करने वाले मुमुक्षुओं को प्रदान करते हैं । आळ्वार् तिरुनगरि में नम्माळ्वार् की अर्चा विग्रह की स्थापना करके , नित्य(प्रति दिन ) , पक्ष , मास , अयन (अर्धवार्षिक ), सम्वत्सर् ( सालाना ) भव्य उत्सव आयोजन करके खुद भी भाग लेते हैं । वे नम्माळ्वार् को “वेदम् तमिळ सेयद पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवाय्मोळि पेरुमाळ वन्दार् , तिरुनगरि पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवळुतिवळणाडर् वन्दार् ,तिरुक्कुरुगूर नगर नम्बि वन्दार्, कारिमारर् वन्दार्, शटगोपर् वन्दार् , पराकुंशर वन्दार् ” कहके स्तुति करते हैं जिसका अर्थ हैं वेद सार देने वाले पेरुमाळ पधारे हैं , तिरुवाय्मोळि के महान कवि आये हैं , तिरुनगरि के नायक आये हैं , आळ्वार् तिरुनगरि के आस-पास (तिरुवळुतिवळणाडर्) रहने वाले आये हैं ,अतिमानुष गुणों से पूर्ण तिरुक्कुरुगूर नगर में निवास करने वाले आये हैं , कारी के पुत्र आये हैं , शटगोपर् आये हैं और सभी प्रत्यर्थ को अंकुश लगाने वाले पधारे हैं ।उस समय मधुरै (दक्षिण) तमिळ संघ से तमिळ पण्डित आते हैं और इनकी यह प्रशंसनीय शब्दों को टोक देते हैं और कहते हैं कि जब तक नम्माळ्वार् की महानता साबित न हो जाए और जब तब संघ पीठं(साहित्य की परख़ करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक दिव्य फलक पीठं ) उनकी साहित्य को अंगीकार नहीं कर लेता , वे नहीं मानेंगे की नम्माळ्वार् ने अपने साहित्य में वेद के सार को दिया हैं । मधुरकवि आळ्वार् कहते हैं की नम्माळ्वार् कहीं भी नहीं आयेंगे और एक खजूर भोज के पत्ते पर नम्माळ्वार् के तिरुवाय्मोळि (१०. ५. १ ) पाशुर का प्रथम दो शब्द “कण्णन् कळळिनै” लिखकर तमिळ संघ से आये उन कवियों को सौंप देते हैं । कहते हैं की अगर संघ पीठं आळ्वार् के इन दो शब्दों को मंज़ूर कर लेता हैं तो नम्माळ्वार् की महानत साबित हो जाएगी । मधुरकवि आळ्वार् के वचन को कवि जन मान लेते हैं और मधुरै लौटकर तमिळ संघ के उनके नेता को घटित संघटन के बारे में बताते हैं । नेता मानकर संघ पीठं पर उन दिनों के ३०० अन्य महान कवि के कविताएँ के साथ खजूर भोज के पत्ते पर आळ्वार् से लिखे गए शब्दों को रखते हैं । उस जादुई फलक नम्माळ्वार् की महानता को स्पष्ट करने के लिए केवल आळ्वार् के शब्दों को स्वीकार करके बाकी रचनों को ठुकरा देती हैं । संग के नेता तुरन्त नम्माळ्वार् के प्रति एक कविता लिखते हैं जो इस प्रकार हैं :

इयाडुवतो गरूडर्केतिरे
इरविक्केतिर् मिंमिनियाडुवतो
नायोडुवतो उरुमिप्पलिमुन्
नरिकेशरीमुन् नडैयाडुवतो
पेयडुवतो एळिळ्उर्वचिमुन्
पेरुमानडि शेर वकुलाभरणन् ओरायिरमामरैयिन् तमिळिळ् ओरु षोल पोरुमो उलक़िल् कवियै

संसारिक जीवन बिताने वाले कवियों की अनगिनित कविताओं की नम्माळ्वार् (जो श्री मन्नारायण के शरणागत और वेद सार अपने १०००+ पाशुरों से दिये हैं ) के एक शब्द से भी तुलना नहीं कर सकते

  • जैसे गरुड़ की उड़ान कौशल की मक्खी के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे सूरज की चमक की जुगनू के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे बाघ के गर्जन की कुत्ते की भौंकने से तुलना नहीं कर सकते
  • सिंह के राजसी चाल की लोमड़ी की साधारण चाल से तुलना नहीं कर सकते
  • ऊर्वशि (देव लोक में नर्तकि) के सुन्दर नृत्य की शैतान के नाच से तुलना नहीं कर सकते

यह देखकर, सभी कवि नम्माळ्वार् के गुण गाना शुरु करके उनसे क्षमा प्रार्थन करते है। इस तरह मधुर कवि आळ्वार् ने “गुरुम् प्रक़रशयेत् धीमान् ” ( आचार्य की स्तुति निरंतर करनी चाहिए) के अनुसार अपना समय आचार्य की स्तुति करने में बिताया और उनकी प्रभुता का विस्तार किया। सभी का अपने उपदेशों से सुधार किया। कुछ ही समय के बाद सँसार छोड़कर नम्माळ्वार् को नित्य कैंकर्य करने के लिए आचार्य तिरुवडि (श्रीपाद पद्म) पहुँच जाते हैं ।

तानियन :
अविदित विषयांतर शठारे उपनिशदाम् उपगाना मात्र भोगः ।
अपि च गुण वशात् तदैक शेषि मधुर कविर् हृदये ममा विरस्तु ॥

source

अड़ियेन् इन्दुमति रामानुज दासि

अऴगिय मणवाळ मामुनि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै की चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाऴि के अगले आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें मे चर्चा करेंगे ।

 

श्री वरवरमुनि

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र

अवतार स्थल – आऴ्वारतिरुनगरि

आचार्य – तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

शिष्यगण

  • अष्ट दिक गज – 1) पोन्नडिक्काल जीयर 2) कोइल अण्णन 3) पतंगि परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर 4) तिरुवेंकट जीयर 5) एऱुम्बियप्पा 6) प्रतिवादि भयन्करमण्णन 7) अप्पिळ्ळै 8) अप्पिळार
  • नव रत्नगळ – 1) सेनै मुडलियाण्डान नायनार 2) शठगोप दासर (नालूर सिट्रात्तान) 3) कन्दाडै पोरेट्रु नायन 4) येट्टूर सिंगराचार्य 5) कन्दाडै तिरुक्कोपुरन्तु नायनार 6) कन्दाडै नारणप्पै 7) कन्दाडै तोऴप्परैप्पै 8) कन्दाडै अऴैत्तु वाऴवित्त पेरुमाळ | इसके अलावा उनके कई अन्य शिष्य थे जो अनेक तिरुवंश, तिरुमाळिगै, दिव्यदेश इत्यादि के सदस्य थे ।

 स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंग / तिरुवरंगम

ग्रंथ रचना सूची – श्री देवराज मंगलम्, यतिराज विंशति, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि, आर्ति प्रबंधम्

व्याख्यान सूची – मुम्मुक्षुप्पाडि, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्, आचार्यहॄदयम्,  पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि [पेरियवाच्चान पिळ्ळै का व्याख्यान जो नष्ट हो गया], रामानुज नूट्ट्रन्दादि

प्रमाण तिरट्टु [श्लोक संग्रह, शास्त्र टिप्पणि विशेषतः] – ईदु छत्तीस हज़ार पाडि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम्, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्

अऴगियमणवाळ पेरुमाळनायनार आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री अनैतुलगुम् वाऴप्पिरन्त यतिराज के अवतार के रूप मे प्रकट हुए । वे कई अन्य नामों के भी जाने गये है जो इस प्रकार है – अऴगियमणवाळमामुनि, सुन्दरजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुयोगी, वरवरमुनि, यतीन्द्रप्रणवर, कान्तोपयन्त, रामानुजपोन्नडि, सौम्यजामात्रुयोगीन्द्र, कोइल शेल्वमणवाळमामुनिगल् इत्यादि । वे पेरियजीयर, वेळ्ळैजीयर, विश्तवाकशिखामणि, पोइल्लादमणवाळमामुनि इत्यादि उपाधियों से भी प्रसिद्ध है ।

मणवाळमामुनि के जीवन का संक्षिप्त वर्णन –

  • श्रीपेरियपेरुमाळ के विशेषनुग्रह से आदिशेष के अवतार के रूप मे आऴ्वार तिरुनगरि मे प्रकट हुए ।
  • अपने माताश्री के जन्मस्थान मे वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है । समयानुसार उनका विवाह भी सम्पन्न होता है ।
  • श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के वैभव को सुनकर, वे आऴ्वारतिरुनगरि जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लेते है और यह हमने पूर्वलेख मे प्रस्तुत किया है ।
  • उनकी पत्नी एक नवजातशिशु को जन्म देती है जिनका नामकरण स्वयम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै उस शिशु का नाम एम्मैयनिरामानुशन् रखते है । रामानुजनूट्ट्रन्दादि मे श्री रामानुज शब्द अष्टोत्तरशत बार प्रयोग किया गया है जिसके आधारपर वे इस शिशु का नामकरण करते है ।
  • तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के परमपद को प्रस्थान होने के बाद श्री वरवरमुनि अगले दर्शनप्रवर्तक हुए ।
  • श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखते है ।
  • श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानकर श्री अऴगियवरद दास ( वानमामलै नाम के जगह से थे ) उनके प्रथम शिष्य हुए और उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर संयासाश्रम स्वीकार किये और उनकी सेवा मे संलग्न हुए । श्री अऴगियवरद दास को उनके जन्मस्थान के आदारपर वानमामलै जीयर और पोन्नडिक्कालजीयर का दास्यनाम दिया गया । पोन्नडिक्कालजीयर मायने सुवर्णनिर्माण – जिन्होने आने वाले कल मे बहुतों को पथप्रदर्शन कराया ।
  • उनके आचार्य के दिव्यौपदेश का स्मरण करके वे नम्माऴ्वार से निवेदन किये और फिर श्रीरंग की ओर रवाना हुए और जहाँ से उन्होने इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार किया ।
  • श्रीरंग की ओर जाते समय बींच मे श्रीविल्लिपुत्तूर आण्डाळ रंगमन्नार और तिरुमालिरुन्चोलैयऴगर का मंगलाशासन करते है ।
  • श्रीरंग पहुँचकर उन्होने कावेरी तट पर अपना नित्यकर्मानुष्टान सम्पूर्ण किया । उसके पश्चात श्रीरंग के सारे श्रीवैष्णव सामूहिक रूप से उनका स्वागत दिव्यभव्य रूप से करते है और स्थानीय श्रीवैष्णवों के घरों से प्राप्त पुष्कर जल से विधिपूर्वक और क्रम मे एम्पेरुमानार, नम्माऴ्वार, पेरिय पिराट्टि, सेनै मुदलियार, पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ इत्यादियों का मंगलाशासन करते है । श्री पेरुमाळ उनका स्वागत उसी प्रकार से करते है जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य का स्वागत हुआ था और अपना शेष प्रसाद और शठगोप से अपना अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के घर जाकर सत्सांप्रदाय के प्रति उनका और उनके छोटे भाई श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार का योगदान को गौरान्वित करते है ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने उन्हे उपदेश दिया की वे अपने निवास समय को स्थाई करे अर्थात वे अपना शेष काल श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय पर आधारित विषयतत्वों का बोध करते हुए भगवद्-भागवत्कैंकर्य करें । वे इस कैंकर्योपदेश को स्वीकार करते है और मुसलमानों के आक्रमण मे लुप्त ग्रंथों को खोजने के प्रयास मे जुट जाते है ।
  • एक बार श्री पोन्नडिक्काल जीयर एक वैष्णव उत्तमनम्बि के कैंकर्य के बारें मे श्री वरवरमुनि से शिकायत करते है और इससे उन्हे उपदेश मिलता है की वे इस वैष्णव को पूर्ण रूप से भगवद्-भागवत्कैंकर्य मे संलग्न करे ।
  • उसके पश्चात वे श्री तिरुवेंकटम् जाने की इच्छा व्यक्त करते है और पोन्नडिक्काल जीयर के साथ रवाना होते है । बींच मे श्री तिरुक्कोवलूर और तिर्क्कडिगै दिव्यदेशों का मंगलाशासन भी करते है ।
  • श्री तिरुमल (तिरुवेंकटम्) मे श्री रामानुजाचार्य द्वारा नियुक्त श्रीवैष्णव पेरियकेळ्वियप्पन्जीयर एक स्वप्न देखते है जिसमे व्यक्ति जो साक्षत पेरियपेरुमाळ जैसे प्रतीत होते है उनके साथ एक संयासि उनके चरणकमलों पर आश्रित उनकी सेवा मे जुटे है । स्वप्न से बाह्य दुनिया मे आकर वे स्थानीय श्रीवैष्णवों से इन दोनो महपुरुषों के बारे मे जानने की कोशिश करते है । उन्हे यह पता चलता है की एक व्यक्ति श्री वरवरमुनि और दूसरे पोन्नडिक्कालजीयर (तिरुवाय्मोऴि ईट्टु पेरुक्कर आऴ्गिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार और उनके प्राण सुक्रुत) । आश्चर्य की बात यह ती की वे दोनो तिरुमल की ओर ही आ रहे थे । यह जानकर अती प्रसन्न होकर उन्होने इन दोनो के लिये व्ययस्था करते है । श्री वरवरमुनि और पोन्नडिक्कालजीयर श्री तिरुवेंकटमलै, गोविन्दराज और नरसिंह इत्यादियों और अंत मे तिरुवेंकटमुदायन् का मंगलाशासन करते है । तिरुवेंकटमुदायन् बहुत प्रसन्न होकर अपना प्रसाद और श्री शठगोप का अनुग्रह देते है और अन्ततः वे दोनो वहाँ से कांचिपुरम की ओर रवाना होते है ।
  • उसके पश्चात श्री कांचिपुरम पहुँचकर वे दोनो श्री देवराजपेरुमाळ का मंगलाशासन करते है और सक्षात श्री देवराजभगवान कहते है की श्री वरवरमुनि स्वयम श्री रामानुजस्वामि है और अन्ततः अपना प्रसाद और शठारी का अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद मे श्री रामानुजाचार्य के जन्मस्थान श्रीपेरुम्बुदूर पहुँचकर उनके अनुभवों का स्मरण करते हुए वहाँ उन्होने मंगलाशासन करते है ।
  • फिर श्रीपेरुम्बुदूर से कांचिपुरम लौटकर वे श्रीभाष्य का बोध किडाम्बिनायनार (जो किडाम्बि आच्चान के वंशज थे) के आध्वर्य मे करने लगे । जब कुछ श्रीवैष्णव उनसे कुछ तत्वविषयों पर तर्क करने आते है तो वे अपने आचार्य के सदुपदेश का स्मरण करके कहते है की उनके आचार्य ने कहा की वे केवल भगवद्विषय के बारें मे ही चर्चा, प्रसार और प्रचार इत्यादि करें । परन्तु स्थानीय श्रीवैष्णव हितैषी के निरन्तर निवेदन से उन्होने उन सभी को तर्क मे पराजित किया और अन्ततः वे सारे उनके चरणकमलों का आश्रय लिये ।
  • किडाम्बिनायनार श्री वरवरमुनि के प्रतिभा को देखकर उनसे विनती किये की वे उन्हे उनको उनका मौलिक रूप दिखाये । श्री वरवरमुनि ने तुरन्त आदिशेष का मौलिक रूप का दर्शन दिया । यह मौलिक रूप देखकर अचम्भित किडाम्बिनायनार उनके प्रती आकर्शित हुए और उस समय से वे उनके प्रती अनुरक्त हुए । श्रीभाष्य का बोध सम्पूर्ण करने के पश्चात श्री वरवरमुनि वहाँ से विदा होकर श्रीरंग लौट गए ।
  • उनको वापस श्रीरंग मे देखकर श्री पेरियपेरुमाळ बहुत खुश होते है और उनसे दर्ख़्वास्त करते है की वे अभी भविष्य यात्रा स्थगित करें और इधर ही रह जाए ।
  • उसी समय, श्री वरवरमुनि के रिश्तेदारों से समाचार प्राप्त होता है की कुछ अपवित्रता है और इसके कारण उनकी सेवा मे बाधा होती है । तत्पश्चात उन्होने संयासाश्रम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के संयासिशिष्य श्री शठगोपजीयर से लिया और यही समाचार देने वे श्री पेरियपेरुमाळ से मिलने जाते है । यह जानकर श्रीपेरियपेरुमळ अत्यन्त खुश होकर उनका स्वागत बहुत भव्यरूप से करते है और कहते है की वे संयासाश्रम का दास्यनाम वही रखे जो उनका वर्तमान नाम था (क्योंकि वे चाहते थे की उनके आचार्य का नाम वही हो) और उनको पल्लविरायन मठ दिये जहाँ वे दिव्यप्रबंधों और अन्यशास्त्रों का बोध करें । कुछ इस प्रकार से वे श्रीअऴगियमणवाळपेरुमाळनायनार से श्रीअऴगियमणवाळमामुनि हुए । श्रीरंग के सारे हितैषी श्रीवैष्णवो श्री उत्तमनम्बि के आध्वर्य मे उनके मठ जाकर खुशी खुशी “मणवाळमामुनिये इन्नुमोरु नूट्ट्रान्डिरुम्” गाने लगे ।
  • वे अपने शिष्यों को श्रीपोन्नडिक्कालजीयर के आध्वर्य मे मठ का पुरने मठ का पुनर्निर्माण करने का आदेश देते है । उनके अनुग्रह से शिष्य एक नया मठ का निरमाण करते है और तो और इसी प्रकार पिळ्ळैलोकाचार्य के घर को नवीनीकरण कर दिव्यभव्य मण्डप का निर्माण करते है । तत्पश्चात वे अपना सार दिन केवल ईडु ग्रंथ, अन्य दिव्यप्रबंध, श्री रामानुजाचार्य के वैभव, श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र इत्यादि के कालक्षेप के माध्यम से बिताने लगे ।
  • कहते ही जंगल मे लगी आग जिस प्रकार फैलता है उसी प्रकार श्री वरवरमुनि का विख्यात चारों ओर फैलता गया । इसी कारण कई श्रीवैष्णवों मुख्यतर तिरुमंजनमप्पा (जो पेरियपेरुमाळ के नित्यकैंकर्यपर थे), उनकी बेटी (आय्चियार), पट्टर्पिरान इत्यादियों के उनके चरणमकमलों का आश्रय लिया ।
  • सिंगरैयर नामक गाँव से वळ्ळुवराजेन्द्र नाम के एक प्रपन्नभक्त प्रत्येक दिन श्री वरवरमुनि के आश्रम को सब्जियाँ भेजा करते थे । एक दिन उनके स्वप्न मे श्री भगवान ने स्वयम आकर कहा की उन्हे तुरन्त श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये जो साक्षात आदिशेष के अवतार है । वळ्ळुवराजेन्द्र जी तुरन्त श्रीरंग गए और वहाँ उन्होने कोईलकन्दादै-अण्णन के घर मे आश्रय लिया और तत्पश्चात इस स्वप्न का वर्णन किया । अण्णन यह सुनकर अचम्भित रह गए और फिर सोने चले गए । सोते वक्त उन्हे यह एहसास हुआ की साक्षात एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य) और श्री मुडलियाण्डान प्रकट हुए और श्रीरामानुजाचार्य ने कहा की वे ही श्री वरवरमुनि है और कोई अन्य नही और मुडलियाण्डान ने कहा की उन्हे तुरन्त उनका शरण लेना चाहिये । उसके अगले दिन कोईलकन्दादै-अण्णन अपने सभी बन्धुवों के साथ जाकर श्री पोन्नडिक्कालजीयर के पुरुशाकार के माध्यम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त किये । श्री वरवरमुनि ने उन सभी को स्वीकार किया और उनको पंञ्चसंस्कार प्रदान किये ।
  • तत्पश्चात श्री आचियार के सुपुत्र ( तिरुमंजनमप्पा के पोते ) श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेने की इच्छा व्यक्त किये । हलांकि श्री वरवरमुनि स्वीकार तो करते है परन्तु अपने प्रिय शिष्य श्री पोन्नडिक्कालजीयर के द्वारा उनका पंञ्चसंस्कार सम्पन्न होता है । यहाँ श्री पोन्नडिक्कालजीयर पहले इनकार करते है परन्तु अपने आचार्य के मनोभावना को समझते हुए उनके आसन मे बैठकर उनका तिरुच्चक्र और तिरुवाऴि स्वीकार कर अप्पाचियारण्णा को पंञ्चसंस्कार प्रदान करते है ।
  • एम्मैयन इरामानुशनन् ( श्रीवरवरमुनि के पूर्वाश्रम मे पूत्र ) दो दिव्य पुत्रों अऴगियमणवळ पेरुमाळनायनार (जो वरवरमुनि के प्रती उनकी अनुरक्ति और कैंकर्य से अन्ततः जीयरनायनार से जाने गए ) और पेरियाऴ्वारैयन को जन्म देते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपनी इच्छानुसार श्री पेरियपेरुमाळ की आज्ञा लेकर नम्माऴ्वर का मंगलशासन हेतु आऴ्वारतिरुनगरि निकल पडे । वहाँ पहुँचकर उन्होने तामिरभरणि नदी के तट पर अपना नित्यकर्मानुष्ठान सम्पूर्ण कियाऔर तत्पश्चात भविष्यदाचार्य (श्री रामानुजाचार्य), तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, तिरुवाराधन पेरुमाळ् इनवायर् तलैवन, नम्माऴ्वर और पोलिन्दु निन्ऱ पिरान् इन सभी का मंगलशासन किया ।
  • एक बार उन्हे आचार्य हृदय के कुछ सूत्रों मे संदेह होता है और उस समय वह अपने सब्रह्मचारि दोस्त तिरुनारायणपुरतु आयि के बारे मे सोचते है । यह सोचते हुए श्री वरवरमुनि अपने दोस्त से मिलने हेतु रवाना हुए । परन्तु आऴ्वार तिरुनगरि के सर्हद मे वरवरमुनि उन्से मिलते है जो तिरुनारायणपुरम् से खुद चलके आये । एक दूसरे को देखकर अती प्रसन्न हुए और गले लगाये । इस मिलन की खुशी मे श्री वरवरमुनि आयि पर एक तनियन की रचना करते है और उसी प्रकार श्री आयि भी एक पासुर की रचना करते है जिसमे वह उनसे पूछते है की क्या आप श्रीमान स्वयम एम्पेरुमानार है या नम्माऴ्वार है या भगवान है । कुछ दिनो के पश्चात श्री आयि तिरुनारायणपुरम लौटते है और श्री वरवरमुनि आऴ्वार तिरुनगरि मे रह जाते है ।
  • कहा जाता है कि ऐसे कृदृष्टि लोग थे जो श्री वरवरमुनि के वैभव से जलते थे । एक बार उन सभी ने श्री वरवरमुनि के मट्ट को चुपके से आग लगा दिया । श्री वरवरमुनि अपने स्वस्वरूप आदिशेष का रूप धारण कर आग से घिरा हुए मट्ट से बचकर स्थानीय श्रीवैष्णवों के समूह के मध्य मे खडे हुए । उसके पश्चात स्थानिय राजा को मालूम पडा की यह नीच कार्य किन लोगों ने किया और उन्हे दण्ड देना उचित समझा । श्री वरवरमुनि अपने कारुण्यता को प्रकाशित करते हुए कहे – उन सभी को माफ़ करे और उन्हे दण्ड ना दे । उनके करुणाभाव को देखकर उन सभी का हृदय परिवर्तन हुआ और उन सभी ने उनके चरणकमलों का आश्रय लिया । स्थानीय राजा श्री वरवरमुनि के इस वैभव को देखकर उनसे पंञ्चसंस्कार प्राप्त किया और इसके पश्चात राजा ने आऴ्वारतिरुनगरि और तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्यदेशों मे बहुत साराकैंकर्य किया ।
  • श्री वरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्य कैंकर्य जारी किये । उसी समय एरुम्बि गाँव के श्री एरुम्बिअप्पा श्री वरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे । श्रीवरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्यकैंकर्य जारी किये। उसी समय एरुम्बि गाँव  के श्रीएरुम्बिअप्पा श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे। अपने गाँव पहुँचकर जब वह श्रीएम्पेरुमान चक्रवर्ति-तिरुमगन सन्निधि का द्वार खोलने का प्रयास किये तो द्वार नही खोल पाये । चकाचौन्द एरुम्बिर्यप्पा भगवान कहते है – हेएरुम्बियप्पा ! तुम ने बहुत ही बडा भागवतापचार किया है क्योंकि तुमने श्री आदिशेष के स्वरूप श्रीवरवरमुनि के शेषप्रसाद ग्रहण नही किया अतःतुम तुरन्त जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लो और प्रसाद ग्रहण करो और उन की सेवा करो । पछतावा महसूस कर एरुम्बियप्पा तुरन्त श्रीरंग लौटकर श्रीवरवर मुनि के चरणकमलों का आश्रय लेते है । श्रीवरवरमुनि के प्रातःकाल और सन्ध्याकाल दिनचर्या वैभव को एक बहुत खूबसूरत ग्रंथ मे संग्रहित किये जिसे हम पूर्वदिनचर्या और उत्तरदिनचर्या से नाम से जानते है ।
  • जीयर श्रीकन्डाडै अण्णन जिन्होने अपने बाल्य अवस्था मे उत्तमप्रतिभा दर्शाया है उनका प्रशंसा करते है।
  • अप्पिळ्ळै और अप्पिळार श्रीपोन्नडिकाल जीयार के पुरुषाकार के माध्यम सेश् रीवरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लिये। एरुम्बियप्पा श्रीवरवरमुनि का व्यक्तिगत समीपता छोडकर अपने गाँव चले गये जहाँ उन्होने श्रीवरवरमुनि के वैभव का प्रचार प्रसार किया ।
  • एक बार उत्तमनम्बि जो श्रीवैष्नवों मे प्रख्यात हैव ह पेरियपेरुमाळ का तिरुवालवट्टम्कैंकर्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवरवरमुनि श्रीपेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करने हेतु प्रवेश किये। उन्हे प्रवेश करते हुए देखकर श्रीउत्तमनम्बि उन से कहे – कृपयाकर आप यहाँ से प्रस्थान करे क्योंकि भगवान का आन्तरिक सेवा हो रही है। यह सुनकर वरवरमुनि वहाँ से चले गये। सेवा के पश्चात थके नम्बि थोडि देर विश्राम लेते है । उस समय उनके सपने मे श्री पेरियपेरुमाळ आकर अपने निजसेवक श्रीआदिशेष की ओर इशारा करतुए हुए कहते हैहे नम्बि ! श्री मामुनि स्वयम श्रीआदिशेष है । उठने के तत्पश्चात अपने अपचार को जानकर मामुनि के मट्ट की ओर दौडे । मामुनि से मिलकर उनसे अपने अपराध की क्षमा मांगे और उनके चरनकमलों का आश्रय लिया और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने लगे ।
  • एक श्रीवैष्णवी शठगोप कोत्ति आय्चियार से अरुळिचेयल सीख रही थी । दोपहर के समय जब श्री वरवरमुनि एकान्त मे विश्राम ले रहे थे तब यह अम्माजी मुख्य प्रवेश द्वार के रंध्र से झाँकती है तो यह देकती है की श्री वरवरमुनि का असली स्वरूप श्री आदिशेषजी का है । परन्तु उसी समय एक आवाज़ से श्री वरवरमुनि उठते है और श्री वैष्णव अम्माजी से पूचते है की आपने क्या देखा  ? श्री अम्मजी ने साफ़ साफ़ बता दिया उन्होने क्या देखा । यह जानकर श्री वरवरमुनि कहे आप श्री यह बात गुप्त रखना और फिर वहा से चले गए ।
  • श्री वरवरमुनि निर्णय लेते है की अब उन्हे रहस्यग्रंथों पर टिप्पणि लिखनी चाहिये । पहले वह रहस्यग्रंथों जैसे मुम्मुक्षुप्पडि तत्वत्रय श्रीवचनभूषण पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणि लिखते है जिसमे वेद इतिहास पुराण वेदान्त दिव्यप्रबंधों इत्यादि संदर्भों से सिद्धान्तनिरूपण व्यक्त किये है । तत्पश्चात रामानुजनूत्रन्दादि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम् (जो चरमोपाय – श्रीआचार्यनिष्ठा को दर्शाता है यानि आचार्य ही सब कुछ) की टिप्पणि भी लिखे ।
  • स्थानीय श्रीवैषणवों श्री वरवरमुनि से निवेदन् करते है कि वह तिरुवाय्मोऴि दिव्यप्रबंध पर व्याख्या करे । श्री वरवरमुनि भगवान की निर्हेतुक कृपा और आचार्य कृपा से तिरुवाय्मोऴि नूत्तन्दादि ग्रंथ की रचना करते है । यह अद्वितीय ग्रंथ जो वेन्पा भाषा शैली मे लिखी गई है । यह याद करने मे सरल होता है परन्तु लिखने मे अति कठिन होता है । इस ग्रंथ मे वरवरमुनि श्री तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक पदिगम् (दस पासुर) के शुरुवात और अन्त के शब्दों का प्रयोग एक एक पासुर मे किये है । प्रत्येक पासुर के शुरुवात के दो वाक्य श्री तिरुवाय्मोऴि के पदिगम् का सार बतलाता है और अन्त के दो वाक्य श्री नम्माऴ्वार की प्रशंसा करता है ।
  • पूर्वोक्त श्रीवैष्णव श्री वरवरमुनि से निवेदन करते है कि वह पूर्वाचार्य के मूल सिद्धन्तों और उपदेशों का वर्णन करते हुए एक ग्रंथ प्रस्तुत करे । श्री वरवरमुनि तुरन्त  उपदेशरत्तिनमालै ग्रंथ की रचना करते है जिसमे वह पूर्वाचार्यों के जन्म-नक्षत्र, जन्मस्थल, उनके वैभव, श्री रामानुजाचार्य के अपार कारुण्य ( करुणा ), तिरुवाय्मोऴि के व्याखायन, ईडु महाग्रंथ की रचना, उसका प्रचार प्रसार, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के अवतार का वर्णन, उनकी श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव । इसी ग्रंथ वह कहते है कि श्री तिरुवाय्मोऴि का सार श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र ही है और अन्ततः इन सभी के अर्थों का स्पष्टीकरण करते है ।
  • एक बार कुछ मायावादि उनसे तर्क-वितर्क करने हेतु उनके समक्ष जाते है, परन्तु श्री वरवरमुनि यह तिरस्कार करते है क्योंकि वह अपना उसूल “तर्क-वितर्क नहि करेंगे केवल् भगवद्-विषय पर ही चर्चा प्रसार प्रचार करेंगे” का उल्लंघन नही करना चाहते थे । इसके विपरीत वह अपने शिष्य वेदलप्पै को उन मायावादियों से तर्क-वितर्क करने के लिये कहते है । श्री वेदलप्पै बहुत आसानी से उन सभी को पराजित करते है । उसके पश्चात वेदलप्पै अपने मूल निवास स्थान को त्यागते है ।
  • इसी दौरान श्री प्रतिवादि भयंकर अण्णन (जो कांचिपुरम के एक प्रख्यात विद्वान थे) अपनी पत्नी के साथ श्री श्रीनिवास भगवान की तिरुमंजन सेवा तिरुमला मे कर रहे थे । एक बार श्रीरंग से आए एक श्रीवैष्णव भगवान के तिरुमंजन सेवा के समय उनसे मिलते है और वह श्री वरवरमुनि के वैभव का वर्णन करते है । श्री वरवरमुनि के वैभव को सुनने के बाद, अण्णाजी अति प्रसन्न होते है जिसकी वजह से वरवरमुनि से मिलने की आकांक्षा व्यक्त किये । परन्तु इस प्रसन्न अवस्था मे वह यह भूल जाते है कि भगवान के श्रीपादतीर्थ मे परिमल (इलायचि) नही डाले और अर्चकस्वामि को श्रीपादतीर्थ देते है । जब उन्हे यह एहसास होता है तो वह दौडते हुए इलायचि लेकर आते है और अर्चकस्वामि के यह कहते है । अर्चकस्वामि कहते है कि बिना इलायचि के यह श्रीपादतीर्थ बहुत सुगंधित और मीठा हो गया है । यह सुनकर अण्णाजी समझ गए कि यह श्री वरवरमुनि के वैभव से यह संभव हुआ है और तुरन्त श्रीरंग की ओर निकल पडे । वह श्रीरंग पहुँचने के तदंतर श्री वरवरमुनि के मठ्ठ पहुँचे और चुपके से वरवरमुनि के कालक्षेप को सुनने लगे । श्री वरवरमुनि उस समय तिरुवाय्मोऴि के चौथे शतक के दसवाँ पासुर (ओन्रुम् देवुम् .. 4.10) कई शास्त्रों के आधारपर समखा रहे थे ।  यह पासुर भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को दर्शाता है । श्री अण्णाजी वरवरमुनि के ज्ञान और प्रस्तुतिकरण को देखर दंग रह गए । इसी दौरान श्री वरवरमुनि तीसरे पासुर समझाते हुए रुक गए और गम्भीर आवाज़ मे कहे – अगर अण्णजी का आऴ्वार से संबंध होगा तो ही आगे सुने वरना नही सुने यानि ओराण्वळि गुरुपरंपरा संबंध । तत्पश्चात अण्णाजी ने श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशशन किया । श्री पेरियपेरुमाळ अपने अर्चक स्वामि से उन्हे उपदेश देते है की आप श्रीमान को वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये और इस प्रकार विलक्षण संबन्ध प्राप्त करे ।  अण्णाजी श्री पोन्नडिक्काल जीयर के पुरुषाकार के माध्याम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त करते है और कुछ समय तक श्रीरंग मे निवास करते है ।
  • तदन्तर फिर से श्रीवरवमुनि तिरुमला की यात्रा मे जाते है । यात्रा के बींच मे श्री कांञ्चिपुर पेररुळाळ का मंगलाशासन करते है और कुछ दिनो तक कांञ्चिपुरम् मे निवास करते है ताकि अन्य श्रीवैष्णवों का उद्धार हो । वह अपने शिष्य अप्पाचियारण्णा को उपदेश देते है कि वह कांञ्चिपुरम् मे उनके प्रतिनिधि बनकर निवास करे । यह सदुपदेश देकर वरवरमुनि तिरुमला की ओर तिरुकडिगै, एरुम्बि, तिरुप्पुट्कुऴि इत्यादि के रास्तों से तिरुमला पहुँचे । मंगलाशासन करने तत्पश्चात अपने एक और शिष्य सिरिय केल्वियप्पन् जीयर को नियुत्क्त करते है जो अब से श्री पेरियप्पन् जीयार ( श्रीरामानुजाचार्य ने स्वयम इन्हे नियुत किया था ) के कैंकर्यों मे सहायता करे यानि अपना हाथ बटाये । उनकी वापसी मे वरवरमुनि तिरुएव्वुळ वीरयराघव , तिरुवल्लिक्केणि के वेंकटकृष्ण और अन्य दिव्यदेशों के पेरुमाळों ( अर्चमूर्तियों ) का मंगलाशासन किये ।  वे श्री मधुरान्तकम् दिव्यदेश पहुँचकर उस स्थान का अपने सिर से अभिवन्दन करते है जहाँ हमारे जगदाचार्य श्री रामानुजाचार्य श्री पेरियनम्बि के हाथों से पंञ्चसंस्कार से प्राप्त किये । उसके बाद वे तिरुवालि तिरुनगरि दिव्यदेश पहुँचकर श्री तिरुमंगयाऴ्वार के वैभव का आनन्द अनुभव कर, वदिवऴगु पासुर का समर्पण कर, आस-पास मे स्थित सारे अर्चमूर्तियों का मंगलाशासन करते है । तत्पश्चात तिरुक्कण्णपुरम् दिव्यदेश पहुँचकर श्रि सर्वांगसुन्दर ( सौरिराज ) अर्चा-विग्रह और उस दिव्यदेश मे श्री तिरुमंगैयाऴ्वार के समाधि का निर्माण करते है ।  इस प्रकार कई सारे दिव्यदेशों का भ्रमण कर अन्ततः श्रीरंग पहुँचे और वही निवास किये ।
  • उपरोक्त कहा गया है कि – श्री वरवरमुनि ने आदेश दिया कि अप्पाचियारण्णा कांञ्चिपुरम् जाए और उनके प्रतिनिधि बने । उस समय श्री अण्णाजी बहुत दुःखित होकर कहते है – यहाँ इतनी शुद्ध घोष्टि है जिसे छोडकर मुझे जाना पड रहा है । उन्हे दुःखित देखकर श्री वरवरमुनि ने कहा – उनके प्रयुक्त पात्र के धातु से उनके दो विग्रह बनाये जिसकी श्री पोन्नडिक्काल जीयर पूजा किया करते थे । एक विग्रह उन्होने श्री पोन्नडिक्काल जीयर को दिया और दूसरा श्री अण्णजी को दिया । ये दिव्य विग्रह हम श्री वानमामलै मट्ट, सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित वानमामलै और मुदलियाण्डान के वंशज के घरों मे यह अभी भी देख सकते है । वरवरमुनि ने अपने पूजनीय भगवान ( तिरुवाराधन भगवान – जिनका नाम एन्नै तीमनम् केदुत्ताइ) को भेट के रूप मे अण्णाजी को दिया जिन्हे हम सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित मुदलियाण्डान के वंशज के घर मे देख सकते है ।
  • श्री वरवरमुनि प्रतिवादिभयंकरमण्णा को श्रीभाष्य के अगले आचार्य और श्री कन्दादै अण्णन् शुद्धसत्त्वमण्णन् को भगवद्-विषयाचार्य के रूप मे नियुक्त करते है । वह श्री कन्दादै नायन् को ईडु 3600 पाडि पर आधारित अरुमपदम् की रचना करने का उपदेश दिये । इस ग्रंथ की रचना अन्ततः हुई और प्रसिद्ध भी है ।
  •  अब विस्तार मे कैसे श्री पेरिय पेरुमाळ श्री ववरमुनि के शिष्य हुए का वर्णन आप सभी के लिये प्रस्तुत है ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ बिना रुकावट के श्री वरवमुनि के श्रीमुख से अपने विषय (भगवद्-विषय) को सुनना चाहते थे । और अपने इच्छानुसार उनको (वरवरमुनि) को अपना आचार्य मान लिया । जब श्रीरंग मे पवित्रोत्रसव मनाया जा रहा था उस पवित्रोत्रसव साट्ट्रुमरै के दौरान, श्री नम्पेरुमाळ तिरुप्पवित्रोत्सव मण्डप को ले जाया गया और भगवान फिर वही रहने लगे । उस समय श्री वरवरमुनि भगवान का मंगलाशासन हेतु उसी मण्डप मे पहुँचे । उस समय भगवान ने स्वयम सबके यानि कैंकर्यपर, आचार्य पुरुष, जीयर, श्रीवैष्णवों समक्ष श्री वरवरमुनि को यह आदेश दिया – “आप श्रीमान तुरन्त श्री नम्माऴ्वार के तिरुवाय्मोऴि का ईडु व्याखायन का कालक्षेप करे” । भगवान यह भी कहा कि यह कालक्षेप निर्विराम होना चाहिए । भगवान ने इन्हे यह कार्य सौंपा यह जानकर वे अत्यन्त खुश हुए और विनम्रतापूर्वक भगवान के इस आदेश का पालन करना उचित समझा ।
  • इसके अगले दिन जब श्री वरवरमुनि पेरिय तिरुमण्डप (जो पेरियपेरुमाळ के द्वार-पालकों कि सन्निधि के भीतर पडता है) पहुँचते है, वे यह देखकर दंग होते है कि भगवान अपने समस्त परिवार सहित (उभयनाच्चियार – दोनो पत्नियों) , तिरुवनन्ताऴ्वान्, पेरिय तिरुवडि, सेनै मुदलियार, अन्य आऴ्वार, आचार्य इत्यादियों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब ये आये और कालक्षेप आरंभ हो । श्री वरवरमुनि अपने आपको भाग्यवान मानते है और कालक्षेप अन्य व्याख्यानों जैसे छे हज़ार पाडि, नौ हज़ार पाडि, बारह हज़ार पाडि और चौबीस हज़ार पाडि इत्याडि के माध्यम से आरंभ करते है । कालक्षेप के अन्तर्गत सत्-साम्प्रदाय के गोपनीयरहस्यों का विवरण वे अन्य ग्रंथ जैसे श्रुति, स्मृति, श्रीभाष्य, श्रुतप्रकाशिक, श्रीगीताभाष्य, श्रीपंञ्चरात्र, श्री विष्णुपुराण इत्यादि के माध्यम से दिये । वे ईडु व्याख्यान का वर्णन शब्दार्थ सहित, आन्तरिक-अर्थ इत्यादि से समझाये । यह निर्विराम दस महीनो तक चलता रहा । और अन्ततः भगवान की आज्ञा से साट्ट्रुमुरै के समाप्ति तिथि आनिमूल (आवणि मूल नक्षत्र) के दिन यह सम्पूर्ण हुआ । साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये ।  हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कहकर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक तीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्रीवैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया । इसी समय यह घटना एक विशाल दावाग्नि की तरह फैल गया और इस प्रकार यह गौरवनीय श्लोक अन्य दिव्यदेशों मे भगवान के द्वारा प्रचार हुआ । उसी समय अन्य श्रीवैष्णवों के आग्रह से अप्पिळ्ळै ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि का वाळितिरुनाम को प्रस्तुत कर उनकी गौरव की प्रशंसा की ।
  • कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।
  • श्री वरवरमुनि तत्पश्चात वडनाट्टुदिव्यदेश यात्रा के बारे मे सोचते है । वरवरमुनि इस यात्रा का आयोजन करते है और अपने शिष्यों के साथ यात्रा के लिये निकल पडते है ।
  • एरुम्बियप्पा को अपने दिव्यचरणों के पादुकों को प्रदान करते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान (अरंगनगरप्पन्) को पोन्नडिक्काल जीयर को सौंपते है । और उन्हे उपदेश देते है कि वह वानमामलै जाकर एक मट्ट का निर्माण करे और अविराम भगवान का कैंकर्य करे ।
  • वरवरमुनि फिर से पाण्दियनाट्टुदिव्यदेश यात्रा मे जाते है । यात्रा के दौरान, वे उस राज्य के राजा (महाबलि वण नाथ रायन्) को अपना शिष्य बनाकार उनसी बहुत सारे कैंकर्य करवाये ।
  • कहते है कि जब वरवरमुनि मदुरै के निकट यात्र कर रहे थे तो एक दिन वे एक इमली के पेड के नीचे विश्राम लिये । विश्राम लेने के पश्चात, जब वह उठे तो उनके दिव्यचरणों ने उस वृक्ष को स्पर्श किया तो तुरन्त इस वृक्ष को मोक्ष की प्राप्ति हुई । तत्पश्चात वे अन्य दिव्यदेशों के अर्चामूर्तियों का मंगलाशासन किये और अन्ततः श्रीरंग पहुँचे ।
  • कहते है – अपने शिष्यों द्वारा उन्होने बहुत सारे कैंकर्य सम्पूर्ण किये । उनके आदेशानुसार जीयर तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर की सेवा करने लगे ।
  • श्री वरवरमुनि पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि का व्याख्यान लिखते है जो उस समय लुप्त हो गई थी । पेरियवाच्चान पिळ्ळै ने पूर्व ही इस पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर चुके थे परन्तु अन्ततः यह लुप्ट् हो गई । इसका पुणर्निर्माण श्री वरवरमुनि के शब्दार्थ सहित किया ।
  • श्रीवरवरमुनि के अपार कारुण्य की भावना गौरवनीय और प्रशंसनीय है । वरवरमुनि का स्वास्थ्य रोगग्रस्त हो गया परन्तु अविराम वह पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की व्याख्या कर रहे थे । उनके बिगडते स्वास्थ्य को देखकर उनके शिष्य उनसे पूछे – स्वामि आप इतना कष्ट क्यों उठा रहे है ? वरवरमुनि ने हसते हुए कहा – यह कार्य मै हमारे भविष्य के पीढी के लिये कर रहा हूँ यानि पुत्र, पौत्र इत्यादि ।
  • वह अपना शरीर त्यागकर परमपद जाने की इच्छा व्यक्त करते है । उस समय वे अपने भावनावों को आर्ति प्रबंध नामक ग्रंथ मे प्रस्तुत करते है । इस ग्रंथ मे वे श्री रामानुजाचार्य से रोते हुए प्रार्थना कर रहे है कि उन्हे स्वीकार करे और उन्हे इस भवबंधन से मुक्त करे यानि इस भौतिक शरीर से मुक्त करे । इस ग्रंथ के माध्यम से वह दर्शाये है की कैसे रामानुजाचार्य से प्रार्थना करे, किस प्रकार आर्त दृप्त होकर प्रपन्न इस भव-बंधन से विमुक्त हो सकता है । क्योंकि वह स्वयम रामानुजाचार्य थे ।
  • उन्होने अन्त मे अपना भौतिक शरीर त्यागकर ( यानि अपनी सेवा इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण कर ), श्री वैकुण्ठ धाम पधारे और भगवत्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न हुए । वह सारे अरुळिचेयल सुनने की इच्छा व्यक्त करते है । उनके इच्छानुसार उनके शिष्य अत्यन्त प्रेम भावना से इसका आयोजन करते है । मामुनि इतने प्रसन्न होते है कि उन्होने सभी श्रीवैष्णवों के लिये तदियाराधन का आयोजन किया । और इन सभी से विनम्र्तापूर्वक अनजाने मे किये अपराधों की क्षमा याचना करते है । इसके उत्तर मे प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव कहते है – आप श्रीमान निष्काम, दोषरहित, अकलंकित थे । अतः आप को क्षमा याचना शोभा नही देता । तत्पश्चात श्री वरवरमुनि सभी श्रीवैष्णवों ने निवेदन करते है की श्री पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ के कैंकर्य संपूर्ण प्रेम से और केवल उन पर केंद्रित करते हुए करे ।
  • फिर वह “पिळ्ळै तिरुवडिगळे शरणम्, वाऴि उलगासिरियन् और श्री एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम्” कहकर अपनी लीला को इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण करते है । इस भौतिक जगट से जाने के पहले श्री भगवान को देखने की इच्छा से अपने कमल जैसे नयनों को खोले, तो साक्षत परम ब्रह्म श्रीमन्नारायण गरुड पर बैठकर पधारे और स्वयम उनको अपने साथ परम धाम ले गए । इस प्रकार अपनी लीला को अत्यन्त शानदार तरीके से सम्पूर्ण किये ।
  • श्री वरवरमुनि के जाने बाद, सारे श्रीवैष्णव बहुत रोते है । भगवान स्वयम बहुत शून्य महसूस करते है और किसि प्रकार के भोग को स्वीकार नही करते है । अन्ततः सारे श्रीवैष्णव खुड को दिलासा देते है और अन्तिम चरम कैंकर्य का आयोजन करते है । तिरुवध्यायन महामहोत्सव का आयोजन श्रेष्ठता, दिव्य-भव्य रूप से होता है । यह महामहोत्सव भगवान के ब्रह्मोत्सव से भी श्रेष्ठ था क्योंकि यह भगवान ने आदेशानुसार इसका आयोजन हुआ ।
  • पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

श्री वरवरमुनि (मामुनि) के दिव्य उपदेशों का संक्षिप्त वर्णन :

  • एक बार दो श्रीवैष्णवों के बींच मे गलतफ़हमि के कारण लड रहे थे । उसी समय रास्ते मे दो कुत्ते भी लड रहे थे । श्रीवरवरमुनि कुत्तों की ओर देखते हुए कहे – क्या आप कुत्तों ने श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र, तिरुमंत्र इत्यादि का अनुसंधान किया है ? तो क्यों इन श्रीवैष्णवों को अपने आप मे इतना घमण्ड क्यों है ? यह सुनकर वे दोनों परिवर्तित हुए और विशुद्ध सत्व से भगवद्-भागवत् कैंकर्य किये । कहने का तात्पर्य यह था – अगर कोई पूर्वाचार्य के ग्रंथों का अनुसंधान, कालक्षेप करे तो उसके मन मे क्लेश घमण्ड, इत्यादि दोष होना नहि चाहिये ।
  • एक बार वड देश से कोई व्यक्ति वरवरमुनि को अर्जित धन का समर्पण करता है । वरवरमुनि को यह जानकारी प्राप्त हुआ कि यह धन तीख तरीके से अर्जित नही है । अतः तुरन्त उन्होने इस धन का तिरसकार कर दिया और वापस भेज दिया । श्री वरवरमुनि धन दौलत मे कदाचित भी इच्छा नही रखते थे । कैंकर्य के लिये आवश्यक धन की इच्छा भी वे केवल सुनिश्चित श्रीवैष्णवों से रखते थे ।
  • एक बार एक वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे अचानक प्रवेश करती है । और श्री वरवरमुनि से एक रात के निवास के लिये निवेदन करती है । वरवरमुनि कहते है – “एक वृद्ध चिखुर भी पेड़ चडने के काबिल है” यानि आप कही और अपने निवास की व्यवस्था करे । अगर यह वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे रहती तो उनके वैराग्य के विरुद्ध भावना जागरुक हो सकती थी । अतः इस प्रकार वह ऐसे गलत फ़हमियों को बढावा नही देते थे जो लोगों के मन मे शंखा पैदा कर सके ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव अम्माजी बिना भक्ति-भाव के खाने की सब्जिया काटने मे मदद कर रही थी । यह जानकर श्री वरवरमुनि तुरन्त उनका बहिष्कार किया और सजा मे छे महीनो तक अन्य प्रदेश मे रहने का आदेश दिया । उनका उद्धेश्य साफ़ था – कैंकर्य करने वाले श्री वैष्णव सदैव भगवद्-भागवत निष्टा मे रहने चाहिये ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव “वरम् तरुम् पिळ्ळै” अकेले अकेले श्रीवरवरमुनि के मिलने हेतु चले गए । श्रीवरवरमुनि के उन्हे टोकते हुए कहे – कदाचित भी किसी भी व्यक्ति को आचार्य और भगवान के समक्ष अकेला नही जाना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति का धर्म और कर्तव्य है कि वह श्रीवैष्णवों के साथ भगवान और आचार्य के समक्ष जाये ।
  • उन्होने बहुत बार भागवतापचार के बारें मे समझाया और उसकी निर्दयी कठोर स्वभाव का वर्णन भी किया है और इससे कैसे प्रपन्न भक्तों का नाश हो सकता है ।
  • एक बार एक अर्चक स्वामि श्री वरवरमुनि ने निवेदन करते है कि उनके शिष्य उनका अभिनन्दन नहि कर रहे है और उनका उनको सम्मान नहि दे रहे है । श्री वरवरमुनि के उनके शिष्यों को समझाया अर्चक स्वामि को सदैव सम्मान दे क्योंकि उनमे श्रीमन्नारायण और श्रीदेवि सदैव बिराजमान है ।
  • एक बार वडुनाट्टुदिव्यदेश से एक धनी श्रीवैष्णव श्रीवरवरमुनि के समक्ष आकर एक श्रीवैष्णव के लक्षण के बारें मे पूछते है । श्रीवरवरमुनि उत्तर मे कहते है –
    • केवल भगवान के चरणकमलों का आश्रय लेने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भगवान का संबन्ध (यानि तप्त मुद्र – संख चक्र ) पाकर कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल तिरुवाराधन करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल आचार्याभिमान (परतंत्र) होने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भागवतों की सेवा करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता ।
    • हलांकि यह करना अत्यन्त आवश्यक है परन्तु निम्नलिखित बिन्दु और भी महत्वपूर्ण है –
    • हमे ऐसे कैंकर्य समयानुसार करना चाहिये जो श्री भगवान को सन्तुष्ट या प्रसन्न करे ।
    • श्रीवैष्णवों के लिये सदैव अपने घरों के द्वार खुले रहना चाहिये । और साथ ही उनके लिये जब चाहे जो चाहे सेवा करने के लिये सदैव तैय्यार रहना चाहिये ।
    • पेरियाऴ्वार के कथन के अनुसार “एन् तम्मै विर्कवुम् पेरुवार्गळे” हमे सदैव अन्य श्रीवैष्णवों के लिये बिक जाने के लिये भी तैय्यार रहना चाहिये ।
  • जब हम भगवद्-शेषत्वम् (भगवान के सेवक है यह भावना) को विकसित करेंगे तो हमे साम्प्रदाय के अर्थ, श्री भगवान और आऴ्वार आचार्य के अनुग्रह से सीख सकते है । एक श्रीवैष्णव जो पहले से ही निष्ठावान है उसके लिये यह आवश्यक नही की वह कुछ और व्यक्त-अव्यक्त रूप से सीखने की ज़रूरत नही क्योंकि पहले से ही वह चरम निष्ठा मे स्थित है |
  • कहते है अगर हम किसी भी व्यवहार-तत्व का प्रचार प्रसार करेंगे जिसका पालन हम नही कर रहे है तो यह केवल एक वेश्या का स्वभाव दर्शा रहे है । क्या वेश्या यह कह सकती है की कैसे शुद्ध आचरण करना चाहिये ? नही ना । इसीलिये जो भी प्रचार प्रसार करे उसका पालन अवश्य करे ।
  • कहा जाता है कि श्रीवैष्णवों की आराधना से श्रेष्ठ कोई कैंकर्य नही और श्रीवैष्णवों कि निन्दा से बड़कर महाप्राध कुछ भी नही है ।

ये दिव्य उपदेश सुनकर प्रफ़ुल्लित श्रीवैष्णव मामुनि के प्रति प्राणर्पित निष्ठावान हुआ । उनका चिन्तन मनन करते हुए अपने गाँव लौट गया ।

हमारे सत्-सांप्रदाय मे श्रीवरवरमुनि का विषेश स्थान –

  • कहते है कि किसी भी अन्य आचार्य के वैभव के बारें मे बोलना/बात करना और संक्षेप मे इसका विवरण कर सकते है परन्तु श्रीवरवरमुनि का वैभव असीमित है । वे खुद अपने हज़ार जबानों से अपने वैभव का वर्णन नही कर सकते है । तो हम सभी क्या चीज़ है । हम तो कदाचित पूर्णसन्तुष्टिकरण के लिये भी नहि कर सकते । हमे तो केवल उनके बारें मे पढकर, उनकी चर्चा करते हुए अपने आप को सन्तुष्ट करना चाहिये ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने स्वयम उन्हे अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार किया और इस प्रकार आचार्य रत्नहार और ओराण्वळि गुरुपरम्परा को सम्पूर्ण किया ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ उनके शिष्य होने के नाते, अपना शेषपर्यन्क (शेष सिंहासन) अपने आचार्य को भेंट मे दे दिया जो हम अभी भी सारे दिव्यदेशों मे देख सकते है । केवल श्रीमणवाळमामुनि के अलावा अन्य आऴ्वार और आचार्य को यह शेषपर्यन्क उपलब्ध नही है ।
  • आऴ्वार तिरुनगरि मे, इप्पासि तिरुमूलम (मणवाळमामुनि के आविर्भाव दिवस पर) आऴ्वार अपने तिरुमंजनसेवा के बाद अपनी पल्लकु (पालकी), कुडै, चामार, वाद्य इत्यादि मामुनि के सन्निधि को भेजकर उनक आगमन का स्वागत करते है । मामुनि के आगमन के बाद वे तिरुमान्काप्पु (तिलक से) सुसज्जित होकर मामुनि को अपना प्रसाद प्रदान करते है ।
  • मामुनि केवल एकमात्र ऐसे आचार्य है जिनका तिरुवध्यनम् (तिरोभावदिवस) दिव्यभव्य रूप से मनाया जाता है । तिरोभावदिवस केवल पुत्र और शिष्य ही करते है । लेकिन इस विषय मे, साक्षात श्रीरंग पेरुमाळ उनके शिष्य है जो अभी भी प्रचलित है । वही उनका यह दिन दिव्य भव्य रूप से मनाते है । इस दिन वह अपने अचर्क स्वामि, परिचारक, निज़ि सामग्री इत्यादि उनके लिये भेजते है । इस महामहोत्सव की जानकारी इस लिंक पर उपलब्ध है |
  • श्रीरंग और आऴ्वार तिरुनगरि मे मामुनि कदाचित भी अपने वैभव और कीर्ती के उत्सव पर ज़्यादा ध्यान नही दिया करते थे । उनके अनुसार उनका अर्च-तिरुमेनि (विग्रह) बहुत ही छोटा होना चाहिये और पुरपाड्डु बिलकुल भी नहि होना चाहिये क्योंकि वहाँ पे केवल आऴ्वार और नम्पेरुमाळ पर पूरे कैंकर्य केंद्रित है । इसी कारण उनका विग्रह बहुत छोटा और अत्यन्त सुन्दर है ऐसा प्रतीत होता है ।
  • मामुनि इतने विनयशील और अभिमानरहित थे की कभी भी किसी का बुरा नहि लिखते और चाहते थे । अगर पूर्वाचार्य के व्याख्यानो मे भी अगर परस्पर विरोधि प्रतीत होता है फिर भी ऐसे संदर्भ मे भी वह इसका ज़िक्र या इसकी वीणा नही करते और अपक्षपात रहते है । (किसी का भी पक्ष नही लेते और एक दूसरे पक्ष का विरोध और निन्दा कदाचित भी नहि करते) ।
  • श्री मामुनि ने केवल अरुळिचेयल पर अपना ध्यान केंद्रित किया और वेदान्त का विवरण इन्ही अरुळिचेयल से ही समझाया । अगर वह प्रकट नही होते तो निश्चित है कि तिरुवाय्मोऴि और उसके अर्थ भिगोया गया इमली की तरह होगा (माने पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता) ।
  • मामुनि से स्वयम पूर्वाचार्यों के ग्रंथों को सम्मिलित कर उन पर अपनी व्याख्या लिखे और भविष्य मे हम सभी के उद्धार हेतु उनका संरक्षण किये ।
  • उनकी अपार कारुण्य भावना प्रशंसनीय है । जिस किसि ने भी उनका विरोध, अपमान, परेशान किया उन सभी के प्रती वह अपना कारुण्य भाव दिखाते थे । वे हमेशा उनका आदर और उनके साथ अच्छा बर्ताव करते थे ।
  • कहा जाता है कि अगर हम उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर उनके चरण कमल अपने मस्तिष्क पर धारण करने के लिये तैय्यार है, तो यह अवश्य मानो कि अमानवम् (जो विरजा नदी पार करवाने मे सक्षम) याने स्वयम मामुनि हमारे हाथ पकडकर इस भव सागर से पार करवायेंगे ।
  • श्री रामानुजाचार्य के प्रती उनका उत्सर्ग अपूर्व है और अपने जीवन चरित्र से कैसे उनकी पूजा कैसे करे यह दर्शाया है ।
  • उनका जीवन चरित्र हमारे पूर्वाचार्यों के कथानुसार एक साक्षात उदाहरण है की कैसे एक श्रीवैष्णव को व्यवहार करना चाहिये । यह पूर्व ही श्री आचार्यनिष्ठावान कैंकर्यपर भागवतोत्तम श्री सारथितोताद्रि के असीम कृपा से इस लिंक (श्रीवैष्णव के लक्षण) पर अन्ग्रेज़ि मे उपलब्ध है । कृपया इस लिंक पर क्लिक करे और सारे लेख और ई-पुस्तकें का लाभ उठायिये ।

मामुनि का तनियन् – (ध्येय नित्य अनुस्मरण श्लोक)

श्रीशैलेश दयापात्रम् धीभक्त्यादिगुणार्णवम् । यतीन्द्र प्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम् ॥

संक्षिप्त अनुवाद – मै (श्रीरंगनाथ) श्रीमणवाळमामुनि का नमन करता हूँ जो श्री तिरुवाय्मोऴि के दया के पात्र है, जो ज्ञान भक्ति वैराग्य इत्यादि गुणों से सम्पन्न एक विशाल सागर है और जिनको श्री रामानुजाचार्य के प्रति अत्यन्त रुचि रति और आस्था है ।

इस लेख से हमने ओराण्वळिगुरुपरंपरा के अन्तर्गत सारे आचार्यों के वैभव और उनके जीवन का संक्षित वर्णन प्रस्तुत कर सम्पूर्ण किया है । कहा जाता है कि सदैव प्रत्येक कार्य का अन्त मीठा होना चाहिये । इसीलिये हमरी यह ओराण्वळिगुरुपरंपरा श्री मणवाळमामुनि के जीवन चरित्र से सम्पूर्ण होती है और जिनकी लीला इस लीला विभूति और नित्य विभूति (दोनों) मे रसाननन्द से भरपूर है अतः रसमयी और मीठी है ।

उनका आविर्भाव दिवस का महामहोत्सव (नक्षात्रानुसार) दिव्य भव्य रूप से कई दिव्य देशों मे होती है जैसे आऴ्वार तिरुनगरि, श्रीरंगम्, कांञ्चिपुरम्, श्रीविल्लिपुत्तूर, तिरुवहिद्रपुरम्, वानमामलै, तिरुनारायण इत्यादि । हम सभी इस महामहोत्सव का भरपूर लाभ उठा सकते है और इस उत्सव मे भाग लेकर, उनके समक्ष रहकर, अपने आप को परिष्कृत करना चाहिये जो स्वयम श्रीरंगनाथ भगवान के प्रिय आचार्य हुए ।

हम आगे यानि भविष्य मे अन्य श्रेष्ठ आचार्यों के जीवन चरित्र के बारे मे चर्चा अवश्य इन्ही लेखों द्वारा करेंगे । अन्य आचार्यों के अन्तर्गत सबसे पहले श्री पोन्नडिक्काळ जीयर के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे जो श्री मामुनि के तिरुवडि (चरणकमलों के सेवक) है और जिसे स्वयम मामुनि अपना श्वास और जीवन मानते थे ।  अगले लेख मे आप सभी पोन्नडिक्काल जीयर के वैभव के बारें मे अवश्य पढे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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मुदल आळवार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अपने पूर्व अनुच्छेद में हमने पोन्नडिकाल जीयर् के जीवन के विषय में चर्चा की थी। इस क्रम को आगे बढ़ते हुए, अब हम अन्य आळवार और आचार्यों के विषय में जानेंगे। इस अनुच्छेद में मुदल आळवारों की वैभवता के बारे में चर्चा करेंगे।

पोइगै आळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , श्रवण नक्षत्र

अवतार स्थल – काँचीपुरम्

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना – मुदल तिरुवन्दादि

इनका जन्म तिरुवेखा यथोक्ताकारि मन्दिर के तालाब में हुआ था। इन्हें कासार योगी और सरो मुनीन्द्र भी कहते हैं ।

तनियन्

कांञ्चयाम् सरसि हेमाब्जे जातम् कासारा योगिनम् ।

कलये यः श्रियः पति रविम् दीपम् अकल्पयत् ।।

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भूदताळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , धनिष्ट नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुकडलमल्लै

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना – इरंडाम् तिरुवन्दादि

भूदताळवार का जन्म तिरुकडलमल्लै में शयन पेरुमाळ मन्दिर के तालाब में हुआ था। इन्हे भूतःवयर् और मल्लपुरवराधीशर के नामों से भी जाना जाता है।

तनियन्

मल्लापुर वराधीसम् माधवी कुसुमोधभवम् ।

भूतम् नमामि यो विष्णोर् ज्ञानदीपम् अकल्पयत् ।।

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पेयाळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , शतभिषक नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुमयिलै

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना सूची – मून्राम तिरुवन्दादि

पेयाळवार का जन्म तिरुमयिलै केशव पेरुमाळ के तालाब में हुआ था। इन्हे महताह्वयर, मयिलापुराधिपर् से भी जाना जाता हैं ।https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2013/08/31/dhivya-dhampati/

तनियन

दृष्ट्वा हृष्टम् तधा विष्णुम् रमैया मयिलाधिपम् ।

कूपे रक्तोतपले जातम् महताह्वयं आश्रये ।।

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मुदल आळ्वारों का वैभव

मुदल आळ्वारों (तीनो आलवारों) को साथ में गौरवान्वित किया जाता है, इसके निम्न कारण है-

  • द्वापर युग की समाप्ति और कलि-युग के प्रारंभ में (युग संधि – संक्रमण काल में) इन तीन आळ्वारों का जन्म क्रमानुसार हुआ – सरोयोगी आळ्वार, भूदताळ्वार, महदयोगी आळ्वार।  ।
  • ये तीनों आळ्वार अयोनिज थे – अयोनिज अर्थात वह जिनका जन्म माता के उदर से नहीं हुआ है। वे सभी भगवान के दिव्य अनुग्रह के द्वारा पुष्प से उत्पन्न हुए।
  • इन्हें जन्म से ही भगवान के प्रति अत्यंत प्रीति थी- भगवान का परिपूर्ण अनुग्रह उन्हें प्राप्त था और उन्होंने जीवन पर्यंत भगवत अनुभव का आनन्द प्राप्त किया।
  • एक समय, उनकी एक दूसरे से भेंट हुई और उस समय से वे साथ-साथ रहने लगे। उन्होंने साथ मिलकर कई दिव्य देशों /क्षेत्रों के दर्शन किये। इन्हें “ओडि तिरियुम योगीगळ” – निरन्तर तीर्थ यात्रा में रहने वाले योगि भी कहा जाता हैं ।

यह तीनों आळ्वार विभिन्न प्रदेशों में अवतरित होकर, भगवान का अनुभव कर रहे थे। भगवान, जो सदा अपने अडियार (भक्तों) को ही अपना जीवन मानते हैं (गीता -ज्ञानी तु आत्म एव मे मतम्) इन तीनों आलवारों को इकट्ठे देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तिरुक्कोवलूर में तीन आळ्वारों के मिलन के लिए एक दिव्य व्यवस्था की।

एक दिन जोरदार बारिश में वे एक -एक करके एक छोटी सी कुटिया में आने लगे। कुटिया के अन्दर पहुँचने पर, उन्होंने देखा की वहाँ केवल तीन व्यक्तियों के खड़े रहने का स्थान है। भगवत भाव में पूर्णरूप से निमग्न होने के कारण, वे एक दूसरे के बारे में विचार करके एक दूसरे के बारे में जानना प्रारंभ करते है। जिस समय वे एक दूसरे के साथ अपने दिव्य भगवत अनुभव बाँट रहे थे, तब भगवान अपनी तिरुमामगळ के साथ अचानक उस अँधेरी कुटिया में पधारे। वहां कौन पधारे है, यह जानने हेतु –

  • सरोयोगी आळ्वार ने संसार रूपी दीपक, समुद्र रूपी तेल और सूरज रूपी रौशनी से दीप प्रज्वलित किया।
  • भूदताळ्वार ने अपने प्रेम रूपी दीपक, अपने प्रेम स्नेह रूपी तेल और मानस रूपी प्रकाश से दीप प्रज्वलित किया |
  • महद्योगि आळ्वार, अन्य दो अळ्वारों की सहायता द्वारा, पिराट्टि, शंख ,चक्र आदि आयुधों से सुशोभित आभायमान भगवान के अत्यंत सुन्दर रूप का दर्शन प्राप्त करते हैं और उनके उस सेर्ति (पिरट्टि ,शंख ,चक्र और भगवान साथ-साथ ) का मँगलाशासन करते हैं ।

इस प्रकार, ये तीनों आळ्वार, तिरुक्कोवलूर आयन और अन्य अर्चावतार भगवान के स्वरूपों का साथ-साथ अनुभव करते हुए इस लीला विभूति में अपना जीवन बिताये।

ईडु व्याख्यान में , नम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी), मुदल आळ्वारों के विषय में अति सुन्दरता से वर्णन करते हैं। आईये ऐसे कुछ उदहारण देखते है-

  • पैए तमिळर्(1.5.11) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, आळवन्दार् द्वारा दिए गए विवरण का उदहारण देकर बताते हैं। नम्माळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी), मुदल आळ्वारों को गौरवान्वित करते हुए कहते हैं कि भगवान की महानता/ प्रभुत्वता को प्रथम बार सुमधुर तमिल भाषा में इन्होने ही प्रकाशित किया हैं ।
  • इन्कवि पाडुम परमकविगळ (7.9.6 ) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, मुदल आळ्वारों को “सेन्तमिळ पाडुवार” (मधुर तमिल भाषा में गाने वाले) करके संबोधित करते हैं। वे बताते हैं कि तीनों आळ्वार तमिल भाषा के महान पण्डित थे – उदहारण देते हैं की जब सरोयोगी आळ्वार और महद्योगी आळ्वार ने भूदताळ्वार से भगवान के गुण कीर्ति को गाने के लिए पूछा, तब जिस प्रकार एक नर-हाथी अपनी मादा-हाथी के कहने पर तुरन्त मधु इकट्ठा करके देते है, उसी प्रकार उन्होंने अनायास ही भगवान के गुण गान प्रारंभ किये। ( भूदताळ्वार – “पेरुगु मधवेळम”- इरंडाम तिरुवन्दादि- 75 पाशुर)
  • पलरड़ियार मुन्बरुळिय (7.10.5) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी अति सुन्दरता से श्रीशठकोप स्वामीजी के मन की बात बताते है। श्रीशठकोप स्वामीजी बताते हैं की भगवान ने श्री वेद व्यास , श्री वाल्मीकि , श्री पराशर और तमिल विद्वान मुदल आळ्वारों आदि महऋषियों के बजाये उन्हें तिरुवाय् मोळि गाने के लिए अनुग्रहित किया।
  • शेङशोर कविकाल(10.7.1) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, मुदल आळ्वारों को “इन्कवि पाडुम परमकविगळ”, “सेन्तमिळ पाडुवार” इत्यादि शब्दों से पुकारते हैं और यह निर्धारण करते हैं कि वे अनन्य प्रयोजनर्गळ (बिना लाभ अपेक्षा के एम्पेरुमान् के गुण गाते) हैं ।

मामुनिगळ (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) अपनी उपदेश रत्न माला (७ पाशुर) में बताते है कि किस प्रकार ये तीन आळ्वार मुदल आळ्वारों के रूप में प्रसिद्ध हुए-

मत्तुल्ला आळ्वार्गल्लुक्कु मुन्ने वन्दुदित्त नळ तमिळाल् नूल सेयता नाट्टैयुत्त –

पेत्तिमैयोर् एंरु मुदल आळ्वार्गळ ऐन्नुम पेयरिवर्क्कु निंर्दुलगत्ते निघळन्दु

अनुवाद :

यह तीन आळ्वार अन्य 7 आळ्वारों से पहले उत्पन्न हुए और अपने दिव्य तमिल पाशुरों से इस जगत को प्रकाशित किया। इनके ऐसे महानतम कार्यों के फलस्वरूप ही, इन्हें मुदल आळ्वार, ऐसे नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

पिळ्ळै लोकम् जीयर् अपने व्याख्यान में कुछ रमणीय भाव बताते है-

  • वे बताते है कि मुदल आळ्वारों को संप्रदाय में उसी प्रकार माना जाता है, जिस प्रकार प्रणव (ॐ कार) को आरंभ के रूप में माना जाता है।
  • वे यह भी सूचित करते हैं ये आळ्वार द्वापर – कलि युग संधि (संक्रमण काल में ) प्रकट हुए थे और तिरुमळिशै आळ्वार (श्रीभक्तिसार स्वामीजी) भी उसी समय प्रकट हुए। तदन्तर, कलि युग के प्रारंभ में, अन्य आळ्वार एक के बाद एक प्रकट हुए।
  • मुदल आळ्वारों ने तमिळ भाषा में दिव्य प्रबन्ध की स्थापना की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि अश्वयुज मास – श्रवण, धनिष्ट और शतभिषक  नक्षत्रों  की महत्वता और वैभवता इन तीनों आलवारों के प्रकट होने से ही है।

पेरियावाच्चान पिल्लै के तिरुनेडुताणडगम व्याख्यान के अवतारिका (भूमिका खंड) में बताया है कि मुदल आळ्वार, भगवान की परतत्वता/ प्रभुत्वता पर अधिक केन्द्रित थे। इसी कारण, प्रायः वे भगवान के त्रिविक्रम अवतार की स्तुति किया करते थे। दूसरी और, बहुत से अर्चावतर भगवान का भी इन्होंने गान किया है, क्यूँकि सहज स्वभाव/ प्रकृति से ही सभी आलवारों को अर्चावतर भगवान के प्रति अत्यंत प्रीति है। उनके अर्चावतर भगवान अनुभव को http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-azhwars-1.html पर देखा जा सकता है।

युग संधि

हमारे सम्प्रदाय के बहुत से विशेष विषय “यतीन्द्र मत दीपिका” में समझाये गये है और श्रीवैष्णव सिद्धांत का यह अत्यंत प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है। यहाँ काल तत्व के बारे में विस्तृत विवरण और विविध युग एवं सन्धि काल के बारे में जानकारी प्रदान की गयी है।

देवताओं का एक दिन (स्वर्ग में) मनुष्य काल में (भूमि पर) एक वर्ष का है ।

  • एक चतुर युग 12000 देव वर्षों का होता हैं – (कृत युग – 4000, त्रेता युग – 3000, द्वापर युग – 2000, कलि युग – 1000 ) ब्रह्मा का एक दिन 1000 चतुर युग के बराबर है।
  • उनकी रात की अवधि भी दिन के बराबर होती है, परंतु उस समय सृष्टि नहीं होती। ब्रह्मा ऐसे 360 दिन से बने 100 साल जीवित रहते हैं ।
  • युगों के बीच का संधि काल अधिक अवधि होती हैं ।युगों के बीच के संधि काल निचे दिया गया हैं:
    • कृत युग और त्रेता युग के बीच का संधि काल 800 देव वर्ष है।
    • त्रेता युग और द्वापर युग के बीच का संधि काल 600 देव वर्ष है।
    • द्वापर युग और कलि युग के बीच का संधि काल 400 देव वर्ष है।
    • कलि युग और अगले कृत युग के बीच का संधि काल 200 देव वर्ष है।
    • और ब्रह्मा के एक दिन में , 14 मनु , 14 इन्द्र और 14 सप्त ऋषि (ये सब जीवात्मा के कर्मानुसार दिए गए पद्वी है)

-अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

आधार – http://guruparamparai.wordpress.com/2012/10/22/mudhalazhwargal/

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