मधुरकवि आळ्वार्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

madhurakavi

मधुरकवि आळ्वार्

तिरुनक्षत्र – चैत्र मास , चित्रा नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुक्कोळूर्

आचार्य – नम्माळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार् तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – कण्णिनुण् शिरूताम्बु

नम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी) ने व्याख्यान अवतरिका में मधुरकवि आळ्वार की वैभवता के बारे में अति सुन्दरता से वर्णन किया है। आईये कुछ झलक यहाँ देखेते है।

ऋषियों का ध्यान सामान्य शास्त्र पर होता है जो ऐश्वर्य, कैवल्य और भगवत कैंकर्य को पुरुषार्थ (आत्म का लक्ष्य) मानते है। आळ्वारों का ध्यान उत्तम पुरुषार्थ (परम लक्ष्य) पर होता है, अर्थात श्रीमन्नारायण भगवान की प्रेम पूर्ण सेवा कैंकर्य। मधुरकवि आळ्वार का ध्यान अति उत्तम (परमोत्तम) पुरुषार्थ- भागवत कैंकर्य पर है। भागवत कैंकर्य – भगवत भक्तों की सेवा करना है, जो निश्चित रूप से एम्पेरुमान् को अत्यंत प्रिय हैं ।

यह विषय हम श्रीरामायण में भी देख सकते है। श्रीरामायण वेद उपबृह्मणम (वेद शास्त्र के निगूढ़ अर्थ को समझाता है) और इसी कारण वह वेद के मुख्य विषयों का अति सुलभता से विवरण करता है।

  • श्रीराम भगवान स्वयं धर्म के साक्षात स्वरूप है – इसलिए उन्होंने “पितृ वचन पालन” (बुज़ुर्ग लोगों के आदेश मानना इत्यादि) जैसे सामान्य धर्म की स्थापाना की।
  • इळया पेरुमाळ (श्रीलक्ष्मणजी) ने विशेष धर्म – शेषत्वम् की स्थापना की जिसके अनुसार शेष (दास) को हमेशा अपने शेषि (मालिक) का अनुगमन करना चाहिए और उनकी सेवा करना चाहिए। उन्होंने श्रीराम से कहा की “अहम् सर्वं करिष्यामि” (आपके लिए मैं सब कुछ करूँगा) और उस विषय का आचरण भी किया है।
  • श्री भरताल्वान् (भरत) ने पारतन्त्रियम् की स्थापना की है, जो जीवात्मा का स्वाभाविक स्वरूप है। बिना कुछ स्वपेक्षा किये अपने मालिक की इच्छा अनुसार आज्ञा का पालन करना पारतन्त्रियम् कहा जाता है। पेरुमाळ की इच्छा थी की भरताल्वान् अयोध्या में रहे और राज्य का परिपालन करे, भरताल्वान् उनकी आज्ञा पालन करते है और उसे परम आदेश मानकर अयोध्या के बाहर १४ साल श्री राम के समान वस्त्र धारणकर और अनुष्ठान से बिताते है।
  • श्री शत्रुघ्नाळ्वान (शत्रुघ्न) अपने स्वरूप का प्रतीक भागवत् शेषत्वम् की स्थापना करते हैं। अन्य विषयों के प्रति मोह त्याग केवल भरताल्वान् का अनुगमन करते हुए उनकी सेवा में जुट गए।

श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी यहाँ श्री भाष्यकार् (रामानुजर्) द्वारा बताये गए कथन का उल्लेख करते है कि श्रीशत्रुघ्नाळ्वान, भरताल्वान के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण के कारण, अपने अन्य भाईयों – इळया पेरुमाळ और भरताल्वान की अपेक्षा, श्री राम के अत्यंत प्रिय थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्री शत्रुघ्न आळ्वान् के समान थे, जो भागवत् निष्ठा में पूरी तरह से डूबे हुए थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्रीशठकोप स्वामीजी के श्री चरणों की शरण मे थे और पूर्णत: उनकी सेवा में थे। उनके लिए नम्माळ्वार् ही लक्ष्य (उपेय) है और वे ही लक्ष्य साधन के प्रक्रिया (उपाय) भी है। मधुरकवि आळ्वार ने अपने दिव्य प्रबन्ध में इसी विषय को सूचित किया है।

पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी अपनी प्रसिद्ध रचना, श्रीवचन भूषण के अन्तिम प्रकरण में आचार्य अभिमान निष्ठा (पूरी तरह से आचार्य पर निर्भर/आश्रित रहना) की महत्ता को मधुरकवि आळ्वार के जीवन और नम्माळ्वार् के प्रति उनके स्नेह और प्रेम का उदाहरण देते हुए समझाते है। 8वे प्रकरण में, भगवान की निर्हेतुक कृपा (अकारण ही कृपा करते है) का विवरण किया गया है। इसी के साथ, जीवात्मा को कर्मानुसार प्रतिफल देना भी उन्हीं पर निर्भर है। इस कारण हमें भगवान द्वारा हमारी स्वीकृति पर शंका हो सकती है। 9वे (अन्तिम) प्रकरण में पिळ्ळै लोकाचार्य, चरम उपाय (अन्तिम उपाय -आचार्यं पर निर्भर/आश्रित रहना) की महानता को स्थापित करते है और यह बताते है कि किस प्रकार से यह उपाय जीवात्मा को सुगमता से मुक्त कर देता है। आईये इसके बारे में देखे।

407 सूत्र में वे बताते है कि हमें यह भ्रम हो सकता है कि क्यूंकि भगवान स्वतन्त्र है, और इस हेतु वे हमें अपने कारुण्य (कृपा) द्वारा स्वीकार भी कर सकते है और शास्त्रों के विषयानुसार (जिसमें कर्मानुसार फल प्राप्ति होती है) अस्वीकार भी कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में बताते हैं की इस सूत्र की पूर्ती के लिए निम्न विषय का योग आवश्यक है- “जब हम आचार्य, जो परतन्त्र है (भगवान पर पूर्णरूप से निर्भर है) के श्रीचरणों में आश्रित होते हैं, तब कोई शंका नहीं रहती, क्यूंकि वे यह सुनिश्चित करते है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य (परमपद) प्राप्त करें, क्यूँकि आचार्य कारुण्य रूप है और केवल जीवात्मा की उन्नति के बारे में ही देखते हैं । “

408 सूत्र में बताते है की यह विषय, अन्य 10 आळ्वारों (मधुरकवि आलवार और आण्डाल के अतिरिक्त), जो पुर्णतः भगवान के आश्रित है, के पाशुरों के माध्यम से स्थापित नहीं हो सकता है। एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से यह आळ्वार दोष रहित ज्ञान से प्रासादित थे। जब वे भगवत अनुभव में डुबे हुए होते है, तब वे भागवतों का गुणगान करते है। परंतु एम्पेरुमान् के वियोग में, असहनीय परिस्तिथि के कारण व्याकुल होकर, वे भागवतों से उदास हो जाते है (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में कई जगह इस विषय का उदहारण देते हैं)। अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी संक्षिप्त में कहते है कि अन्य 10 आळ्वारों के पाशुरों के द्वारा आचार्य वैभव के महत्त्व का निरूपण करना संभव नहीं है परंतु मधुरकवि आळ्वार के पशुरों के द्वारा हम आचार्य वैभव निर्धारित कर सकते हैं ।

409 सूत्र, यह प्रतिपादित करता है कि मधुरकवि आळ्वार अन्य आळ्वारों से महत्तर है क्यूँकि अन्य आळ्वार कुछ समय भागवतों की वैभवता का गुणगान करते है और कुछ समय उनकी उपेक्षा करते हैं लेकिन मधुरकवि आळ्वार का ध्यान केवल आचार्य (नम्माळ्वार्) वैभव पर केंद्रित था। केवल इन्हीं के शब्दों से हम आचार्य वैभव को स्थापित कर सकते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, मधुरकवि आळ्वार की वैभवता को अपने उपदेश रत्न माला के 25वे और 26वे पाशुर में समझाते है।

25वे पाशुर् में वे कहते है कि मधुरकवि आळ्वार का अति पावन अवतार दिवस – चैत्र मास, चित्रा नक्षत्र, अन्य आळ्वारों के अपेक्षा, प्रपन्न जनों के स्वरूप के लिए सबसे उपयुक्त है।

26वे पाशुर् में वे आळ्वार और उनके प्रबन्ध का अत्यन्त वैभव युक्त वर्णन करते है-

वायत्त तिरुमॅतिऱत्तिं मत्तिममाम् पदम् पोल् ।
सीर्त्त मधुरकवि शेय कलैयै ॥
आर्त्त पुघळ आरियरगळ ताङ्गळ अरुळिचेयल नडुवे ।
सेरवित्तार् तार्परियम् तेर्न्दु ॥

पिळ्ळै लोकम् जीयर इस पाशुर् का सुन्दर विवरण देते है। कण्णिनुण् शिरूताम्बु के लिए तिरुमन्त्र के नमः पद का उदहारण देते है। तिरुमन्त्र की प्रसिद्धि यह है कि वह वाचक को संसारिक बंधनों से मुक्त कर देता है। तिरुमन्त्र में नमः पद एक मुख्य पद है – जो स्पष्ट रूप से यह स्थापित करता है कि स्वयं का संरक्षण करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है और अपने संरक्षण के लिए हमें अपने नाथ भगवान पर पूरी तरह से निर्भर होना चाहिए। इसी सिद्धांत का वर्णन मधुरकवि आळ्वार (जो स्वयं अपने आचार्य निष्ठा के लिए महान है) ने अपने दिव्य प्रबंध में किया है। वे बताते है कि हमें स्वयं के संरक्षण के लिए संपूर्णतः आचार्य पर निर्भर रहना चाहिए। शास्त्र के सार को वास्तविकता में दर्शाने के कारण ही, हमारे पूर्वाचार्यों ने इस प्रबंध को 4000 पाशुरों के दिव्य प्रबंध में जोड़ा है। जिस प्रकार मधुरकवि आळ्वार का तिरुनक्षत्र – चित्रा नक्षत्र , 27 नक्षत्रों के मध्य में हैं, उसी प्रकार उनके प्रबंध को भी दिव्य प्रबंध रत्न माला का केंद्र माना जाता है।

इस प्रकार हम देख सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस समान विषय का वर्णन पृथक दृष्टिकोणों से किया है।

इस विषय के साथ, आईये उनके चरित्र को देखे-

मधुरकवि आळ्वार ने चैत्र मास -चित्रा नक्षत्र में तिरुकोळूर् में अवतार लिया। जैसे सूरज के पहले सूरज की किरणे/ रौशनी आती है, उसी तरह श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य अवतार के पूर्व इन्होंने अवतार लिया है। इनकी महानता देखते हुए, गरुड़ वाहन पण्डित अपने दिव्य सूरी चरित्र में इन्हे “कुमुद गणेश” या “गरुडाळ्वार्” के अंश मानते हुए गौरवान्वित करते है (वास्तव में आळ्वारों को एम्पेरुमान् ने सँसार से चुनकर उन्हें दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया)।

साम वेद के पण्डित और पूर्व शिखा ब्राह्मण के परिवार में इनका जन्म हुआ। उचित समय में उनके जात कर्म, नाम कर्म, अन्न-प्रासन, चौळा, उपनयनम् इत्यादि कार्य पूर्ति हुए और उन्होंने वेद, वेदान्तम्, पुराण, इतिहास इत्यादि का अध्ययन भी किया। भगवान के अतिरिक्त अन्य विषयों से वे विरक्त थे और उत्तर भारत के कुछ दिव्य क्षेत्र जैसे अयोध्या, मधुरा इत्यादि के यात्रा पर निकले।

nammazhwar-madhurakavi-nathamuni

मधुरकवि आळ्वार,नम्माळ्वार,नाथमुनि-श्री कांचीपुरम

मधुरकवि आळ्वार के पश्चाद अवतार लिए नम्माळ्वार को किसी विषय में रूचि नहीं थी यहाँ तक की माता के दूध में भी नहीं और वे बिना कुछ कहे संसार में रह रहे थे। इनके माता -पिता कारी और उदयनंगै, उनके जन्म के 12 दिन बाद, शिशु के इस प्रकार के लक्ष्ण से उद्विग्न थे, और उन्हें पोलिन्द निण्र पिरान एम्पेरुमान् के समक्ष प्रस्तुत करते है। यह एम्पेरुमान् ताम्रपर्णी नदी के दक्षिण में स्थित एक सुन्दर मंदिर में, शंख और चक्र आयुधों से अलंकृत, पद्म के समान सुन्दर नेत्रों से, अभय हस्त प्रदान करते हुए (एक हाथ की मुद्रा जिससे भगवान अभय प्रदान कर रहे है कि वे अवश्य हमारा रक्षण करेंगे) और अपनी दिव्य महिषी – श्रीदेवि , भूदेवि ,नीळा देवि के साथ विराजमान है। भगवान के समक्ष, उनके माता-पिता उनका “मारण” (अर्थात जो सबसे अलग है) कहकर नामकरण करते है और उन्हें दिव्य इमली के वृक्ष के निचे रख, उन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानकर आराधन करते है। परमपदनाथ भगवान तब श्रीविष्वक्सेनजी से उन्हें पञ्चसंस्कार करके उन्हें द्राविड़ वेद (नायनार अपनी रचना आचार्य ह्रदय में बताते है कि द्राविड़ वेद सनातन है) और सभी रहस्य मंत्र और मंत्रार्थ की शिक्षा प्रदान का आदेश देते हैं और श्री विष्वक्सेनजी भगवान के निर्देश का पालन करते है।

तिरुप्पुळि आळ्वार् के निचे (दिव्य इमली के पेड़ ) नम्माळ्वार् 16 साल बिताते है। इनकी महानता को इनके माता – पिता समझ चुके थे लेकिन किसी से भी बात नहीं कर रहें थे क्यूँकि आळ्वार् की उत्कर्षत सभी जन नहीं पा सक रहें थे  और वे तिरुक्कुरुंगुडि नम्बि एम्पेरुमान् को ही निरंतर प्रार्थना कर रहे थे । इस विषय के बारे में मधुरकवि आळ्वार् भी सुन चुके थे और एक दिन रात में नदि के तट जा पहुँचते हैं और दक्षिण की ओर से एक उज्ज्वल प्रकाश दिखायी दिया। वे सोच बैठते हैं की वह प्रकाश किसी गाँव से या जँगल के आग से उत्पन्न हुई होगी । लेकिन , लगातार उसी प्रकाश २-३ दिन दिखने लगी । वे ठान लेते हैं की उसके बारे में जानेंगे और सुबह सोके उस दिन रात को उस प्रकाश का पीछा करते हैं । मार्ग में कई दिव्य देशों की यात्रा करते हुए श्री रंगम् पहुँचते हैं । दक्षिण दिशा से वह प्रकाश उन्हें और भी दिखाई दे रहा था और अपनी ख़ोज जारी रखते हुए अंत में तिरुक्कुरुगूर् (आळ्वार् तिरुनगरी )पहुँचते हैं । वहाँ पहुँचने के बाद , रौशनी नहीं दिख रही थी और वे निश्चित करते हैं की प्रकाश उधर से ही उत्पन्न हो रहा हैं । वे मन्दिर प्रवेश करते हैं और तिरुप्पुळिआळ्वार् के निचे निश्चल और परिपूर्ण ज्ञान युक्त , सुन्दर से आँखों वाले , केवल १६ वर्ष के बालक , पूर्णिमा के चन्द्रम के तरह प्रकाशित , पद्मासन में आसीन , एम्पेरुमान् के बारे में अनुदेश देते हुए उपदेश मुद्रा में विराजमान और प्रपन्न जन के आचार्य नम्माळ्वार् को पाते हैं । भगवत अनुभव में डुबे हुए उन्हें देखकर , वे एक छोटा सा पत्थर उनकी ओर फेंकते हैं । आळ्वार् अति सुन्दर तरह से जाग जाते हैं और मधुरकवि आळ्वार् को देखते हैं । उन्होंने उनकी बोलने की शक्ति को परखना चाहा और उनसे ” सत्ततिन् वैतिल् सिरियदु पिरन्दाल् एत्तैतिनृ एन्गे किडक्कुम्” करके प्रश्न पुछा मतलब जब एक चेतन आत्म ( संवेदन शील – जीवात्म ) अचेतन वस्तु (असंवेद्य ) में प्रवेश करता हैं , वह जीवात्म कहाँ रहता हैं और किसका आनंद लेता हैं । आळ्वार् उत्तर देते हैं “अत्तैतिनृ अंगे किडक्कुम् ” जिसका अर्थ हैं भौतिक और संसारिक सुख – दुख को अनुभव करते हुए उस असंवेद्य  वस्तु में नित्य स्थिरता प्राप्त करता हैं । यह सुनने के बाद मधुरकवि आळ्वार् जान लेते हैं की वे सर्वज्ञ हैं और इनकी सुश्रुत करके उन्नति पानी चाहिए । यह सोचकर वे नम्माळ्वार् के श्री पाद पद्मों केआश्रित हो जाते हैं । उस समय से वे आळ्वार् के साथ निरंतर उनकी सेवा करते हुए और उनकी कीर्ति गान करते बिता देते हैं ।

तत्पश्चात् , श्री वैकुण्ठ नाथ (परमपदनाथ ) को जो सभी बीजों के बीज हैं , जो सबके मालिक हैं , जो सब के नियंत्रक हैं , जो चेतन और अचेतन वस्तुओं में परमात्म बनकर स्थित हैं, जिनका शरीर(तिरुमेनि) काला / नील रंग का हैं ,आळ्वार् से मिलना की अभिलाष हुई । पेरिया तिरुवडि (गरुडाळ्वार् ) तुरन्त एम्पेरुमान् के सामने हाज़र होते हैं और एम्पेरुमान् श्री महा लक्ष्मी के साथ उन पे आसीन हो जाते हैं और तिरुक्कुरुगूर् पहुँच के आळ्वार् को अपना दिव्य दर्शन प्रदान करके , उन्हें दिव्य ज्ञान से अनुग्रह करते हैं । एम्पेरुमान् के अनुग्रह प्राप्त होने के कारण नम्माळ्वार् भगवत अनुभव में डूब जाते हैं और उस अनुभव आनंद की सीमायें पार किये तिरुविरुत्तम् , तिरुवासीरियम्, पेरिय तिरुवंदादि और तिरुवाय्मोळि (चार वेदों का सार ) के दिव्य पाशुरों के रूप में एम्पेरुमान् का दिव्य स्वरूप , दिव्य आकृति और दिव्य गुणों का कीर्तन करते हैं । नम्माळ्वार् इसे मधुरकवि आळ्वार् और उनके आश्रित लोगों को शिक्षा देते हैं । नम्माळ्वार् को आशीर्वाद करके उनसे मंगलाशासन पाके अपने आप का पोषण करने के लिए सभी दिव्य देश के एम्पेरुमान् तिरुप्पुळिआळ्वार् के सामने आते हैं । नम्माळ्वार् हम सभी को उनकी तरह बनने और उन्हीं के जैसे एम्पेरुमान् के प्रति प्रेम होने का आशीर्वाद करते हैं । परमपद से नित्य सूरी और क्षीर समुद्र से श्वेत दीप वासी नम्माळ्वार् की कीर्तन करने के लिए आते हैं और उन्हें देखे आळ्वार् उनका मँगलाशासन करते हैं । नित्य सूरी और श्वेत दीप वासी उनके लिए आकर उनकी स्तुति करने से नम्माळ्वार् प्रसन्न हो जाते हैं और ऐलान करते हैं की ब्रह्माण्ड में इनसे बड़कर कोई नहीं हैं (एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से उत्पन्न हुआ सात्विक अहँकार ), वे सीमा रहित कीर्ति से जीवन बितायेंगे और हमेश कण्णन् एम्पेरुमान् ( कृष्ण) के प्रति ध्यान करते हुए खुद को बनाये रखेंगे ।वे अर्थ-पंचक का ज्ञान (पाँच तत्वों का ज्ञान – परमात्म स्वरुप , जीवात्म स्वरुप, उपाय स्वरुप, उपेय स्वरुप और विरोधि स्वरुप ) और एम्पेरुमान् के भक्तों का दिव्य मधु तिरुवाय्मोळि द्वारा द्वय महा मंत्र का अर्थ पूरी तरह से प्रकाशित करते हैं । ३२ वर्ष की उम्र में इस सँसार को छोड़ के एम्पेरुमान् की दिव्य मनोरथ से परमपद पहुँचते हैं ।

नम्माळ्वार्(जो प्रपन्न जन कूटस्थर् – प्रपन्न कुल नायक मूलपुरुष ) के प्रधान शिष्य मधुरकवि आळ्वार् अपने आचार्य की स्तुति करते हुए कण्णिनुण् शिरुताम्बु की रचना करके पञ्चोपाय निष्ठा का पालन(पाँचवा उपाय – आचार्य निष्ट और कर्म , ज्ञान , भक्ति और प्रपत्ति बाकी चार उपाय हैं ) करने वाले मुमुक्षुओं को प्रदान करते हैं । आळ्वार् तिरुनगरि में नम्माळ्वार् की अर्चा विग्रह की स्थापना करके , नित्य(प्रति दिन ) , पक्ष , मास , अयन (अर्धवार्षिक ), सम्वत्सर् ( सालाना ) भव्य उत्सव आयोजन करके खुद भी भाग लेते हैं । वे नम्माळ्वार् को “वेदम् तमिळ सेयद पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवाय्मोळि पेरुमाळ वन्दार् , तिरुनगरि पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवळुतिवळणाडर् वन्दार् ,तिरुक्कुरुगूर नगर नम्बि वन्दार्, कारिमारर् वन्दार्, शटगोपर् वन्दार् , पराकुंशर वन्दार् ” कहके स्तुति करते हैं जिसका अर्थ हैं वेद सार देने वाले पेरुमाळ पधारे हैं , तिरुवाय्मोळि के महान कवि आये हैं , तिरुनगरि के नायक आये हैं , आळ्वार् तिरुनगरि के आस-पास (तिरुवळुतिवळणाडर्) रहने वाले आये हैं ,अतिमानुष गुणों से पूर्ण तिरुक्कुरुगूर नगर में निवास करने वाले आये हैं , कारी के पुत्र आये हैं , शटगोपर् आये हैं और सभी प्रत्यर्थ को अंकुश लगाने वाले पधारे हैं ।उस समय मधुरै (दक्षिण) तमिळ संघ से तमिळ पण्डित आते हैं और इनकी यह प्रशंसनीय शब्दों को टोक देते हैं और कहते हैं कि जब तक नम्माळ्वार् की महानता साबित न हो जाए और जब तब संघ पीठं(साहित्य की परख़ करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक दिव्य फलक पीठं ) उनकी साहित्य को अंगीकार नहीं कर लेता , वे नहीं मानेंगे की नम्माळ्वार् ने अपने साहित्य में वेद के सार को दिया हैं । मधुरकवि आळ्वार् कहते हैं की नम्माळ्वार् कहीं भी नहीं आयेंगे और एक खजूर भोज के पत्ते पर नम्माळ्वार् के तिरुवाय्मोळि (१०. ५. १ ) पाशुर का प्रथम दो शब्द “कण्णन् कळळिनै” लिखकर तमिळ संघ से आये उन कवियों को सौंप देते हैं । कहते हैं की अगर संघ पीठं आळ्वार् के इन दो शब्दों को मंज़ूर कर लेता हैं तो नम्माळ्वार् की महानत साबित हो जाएगी । मधुरकवि आळ्वार् के वचन को कवि जन मान लेते हैं और मधुरै लौटकर तमिळ संघ के उनके नेता को घटित संघटन के बारे में बताते हैं । नेता मानकर संघ पीठं पर उन दिनों के ३०० अन्य महान कवि के कविताएँ के साथ खजूर भोज के पत्ते पर आळ्वार् से लिखे गए शब्दों को रखते हैं । उस जादुई फलक नम्माळ्वार् की महानता को स्पष्ट करने के लिए केवल आळ्वार् के शब्दों को स्वीकार करके बाकी रचनों को ठुकरा देती हैं । संग के नेता तुरन्त नम्माळ्वार् के प्रति एक कविता लिखते हैं जो इस प्रकार हैं :

इयाडुवतो गरूडर्केतिरे
इरविक्केतिर् मिंमिनियाडुवतो
नायोडुवतो उरुमिप्पलिमुन्
नरिकेशरीमुन् नडैयाडुवतो
पेयडुवतो एळिळ्उर्वचिमुन्
पेरुमानडि शेर वकुलाभरणन् ओरायिरमामरैयिन् तमिळिळ् ओरु षोल पोरुमो उलक़िल् कवियै

संसारिक जीवन बिताने वाले कवियों की अनगिनित कविताओं की नम्माळ्वार् (जो श्री मन्नारायण के शरणागत और वेद सार अपने १०००+ पाशुरों से दिये हैं ) के एक शब्द से भी तुलना नहीं कर सकते

  • जैसे गरुड़ की उड़ान कौशल की मक्खी के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे सूरज की चमक की जुगनू के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे बाघ के गर्जन की कुत्ते की भौंकने से तुलना नहीं कर सकते
  • सिंह के राजसी चाल की लोमड़ी की साधारण चाल से तुलना नहीं कर सकते
  • ऊर्वशि (देव लोक में नर्तकि) के सुन्दर नृत्य की शैतान के नाच से तुलना नहीं कर सकते

यह देखकर, सभी कवि नम्माळ्वार् के गुण गाना शुरु करके उनसे क्षमा प्रार्थन करते है। इस तरह मधुर कवि आळ्वार् ने “गुरुम् प्रक़रशयेत् धीमान् ” ( आचार्य की स्तुति निरंतर करनी चाहिए) के अनुसार अपना समय आचार्य की स्तुति करने में बिताया और उनकी प्रभुता का विस्तार किया। सभी का अपने उपदेशों से सुधार किया। कुछ ही समय के बाद सँसार छोड़कर नम्माळ्वार् को नित्य कैंकर्य करने के लिए आचार्य तिरुवडि (श्रीपाद पद्म) पहुँच जाते हैं ।

तानियन :
अविदित विषयांतर शठारे उपनिशदाम् उपगाना मात्र भोगः ।
अपि च गुण वशात् तदैक शेषि मधुर कविर् हृदये ममा विरस्तु ॥

source

अड़ियेन् इन्दुमति रामानुज दासि

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