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तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार

श्री:

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचल महामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र : मार्गशीर्ष मास – ज्येष्ठा नक्षत्र

आवतार स्थल : तिरुमण्डंगुडि

आचार्यं : श्रीविष्वक्सेन स्वामीजी

ग्रंथ रचना सूची : तुरुमालै, तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि

परमपद प्रस्थान प्रदेश : श्रीरंगम

आचार्य नन्जीयर/वेदांती स्वामीजी, अपने  तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि के व्याख्यान की अवतारिका में “अनादि मायया सुप्तः” प्रमाण से साबित करते है कि आळ्वार संसारी (बद्धजीव) थे (अनादि काल से अज्ञान के कारण सँसार में निद्रावस्था में थे) और एम्पेरुमान (भगवान श्रीमान्नारायण) ने उन्हें जागृत किया (उन्हें परिपूर्ण ज्ञान से अनुग्रह किया) है। उसके बाद पेरियपेरुमाळ (श्रीरंगनाथ) योगनिद्रा में चले जाते है और आळ्वार उन्हें उठाने की चेष्ठा करते है और भगवान से प्रार्थना करते है कि उन्हें कैंकर्य प्रदान करे।

आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै, तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि के व्याख्यान की अवतारिका में आळ्वार के पाशुरों द्वारा ही उनकी वैभवता को प्रकाशित करते है। भगवान के दिव्य परिपूर्ण कृपा से जागृत आळ्वार, स्वरूप ज्ञान प्राप्त कर, पेरियपेरुमाळ के पास जाते है| आपश्री यह पाते है कि भगवान आपश्री का स्वागत, कुशल क्षेम नहीं पूछते है, अपितु आँख बन्द किये लेटे हुए है। इससे यह नहीं समझना चाहिए की भगवान को आळ्वार के ऊपर श्रद्धा नही है (संबंध रहित) क्यूँकि आळ्वार और भगवान को एक दूजे के प्रति बहुत लगाव है। हम यह भी नहीं कह सकते की भगवान अस्वस्थता के कारण शयन किये हुए है क्यूँकि इस प्रकार के दोष केवल भौतिक तत्व के अंग है, जो तमो गुण से परिपूर्ण है, लेकिन पेरियपेरुमाळ भौतिक तत्व से परे आलौकिक शुद्धसत्व है और इसमें कोई संशय नहीं है। पेरियपेरुमाळ शयन अवस्था में सोच रहे है की जैसे उन्होंने आळ्वार को सुधार कर निम्न गुणों से अनुग्रहित किया, उसी प्रकार कैसे सँसारियों को सुधार कर अनुग्रह करें।

  • आळ्वार कहते हैं “आदलाल् पिरवि वेन्डेन्” मतलब इस सँसार में मैं पैदा होना नहीं चाहता हुँ – इससे यह साबित होता हैं की उन्हें यह ज्ञात हैं की प्रकृति सम्बन्ध एक जीवात्मा के लिए सही नहीं हैं ।
  • आळ्वार को स्वरूप यथात्म्य ज्ञान (आत्मा का निजस्वरुप) अर्थात भागवत शेषत्व का परिपूर्णज्ञान है क्यूँकि वे कहते हैं “ पोनगम शेयद सेशम् तरुवरेल पुनिदम” जिसका मतलब हैं श्रीवैष्णव का शेषप्रसाद (झूठा किया गया प्रसाद ) ही श्रेष्ठमहाप्रसाद है।
  • इन्हें साँसरिक विषय भोग और आध्यात्मिक विषयों का भेद ज्ञान स्पष्ठ रूप से है क्यूँकि वे कहते हैं “ इच्चुवै तविर अच्चुवै पेरिनुम वेण्डेन” – मतलब हैं मेरे लिए पेरिय पेरुमाळ (भगवान) के सिवा कोई भी चीज़ अनुभव के योग्य नहीं हैं।
  • आळ्वार कहते हैं “ कावलिल पुलनै वैत्तु ” मतलब अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना, इससे यह पता चलता हैं की वे इन्द्रियों को जीत कर अपने वश में उन्हें रखा हैं ।
  • आळ्वार कहते हैं “ मून्नु अनलै ओम्बुम कुरिकोल अणदंण्णमै तन्नै ओलित्तिट्टेन” – अर्थात मै कर्म योगादि मार्गो कों त्याग दिया हुँ । इससे यह साबित होता हैं की आळ्वार ने (भगवान को पाने के लिए) सँसार के अन्य उपायों(रास्ते) का परित्याग किया हैं ।
  • आळ्वार को उपाय यथात्म्य ज्ञान संपूर्ण रूप से है। यह विषय हमें उनकी कहावत “ उन अरुल एन्नुम आचै तन्नाल पोय्यनेन वन्दुणिंदेन ” अर्थात मै यहाँ केवल आपके दया को उपाय मानकर ,पूरी तरह से निर्भर होकर आया हूँ ।

अन्तिम मे आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै कहते हैं आळ्वार के इन विशेष गुणों के कारण वे पेरियपेरुमाल को अत्यन्तप्रिय है जैसे बताते हैं “ वालुम शोम्बरै उगत्ति पोलुम” अर्थात जो भगवान को पूरि तरह शरणागति करते है वे भगवान के अत्यन्त प्रीति का पात्र है।

वेद सार के परिपूर्ण ज्ञानि और आळ्वार से किये गए शास्त्रानुसार कार्यों के गुण गाने वेद विद्वान से कीर्तित आळ्वार का कीर्तन मामुनिगळ करते हैं । आळ्वार  के अर्चानुभव को हम यहाँ पढ़ सकते हैं ।

आळ्वार की वैभवता को जानने के बाद आईये अब हम उनका दिव्य चरित्र जानने के लिए प्रयत्न करेगेँ।

उनके जन्म काल में नम्पेरुमाळ के दिव्य आशीर्वाद से आळ्वार शुद्धसत्व गुणों से ‘विप्रनारयण’ नाम से जन्म लेते हैं । कालाणुगुन किये जाने वाले पूरे संस्कार (चौलम् , उपनयनादि) प्राप्त करते हैं और सारे वेद वेदांग का अर्थ सहित अध्यायन करते हैं । ज्ञानवैराग्य संपन्न विप्रनारायण श्रीरंगं पहुँचकर पेरियपेरुमाळ की पूजा करते हैं । उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पेरियपेरुमाळ अपना दिव्य मँगल सौन्दर्य दर्शन का अनुग्रह करके उनकी भक्ति को बढ़ाते हैं और श्रीरङ्गम् में ही आपश्री के नित्यनिवास की व्यवस्था करते हैं ।

कैंकर्य पण्डित जैसे पुण्डरीक (उत्तम भक्त), मालाकार (मथुरा मे श्रीकृष्ण और बलराम को पुष्पमाला बनाकर समर्पित करते थे), गजेन्द्र और अपने विष्णुचित्त (पेरियाळ्वार आठ फूलों से सुन्दर माला बनाकर एम्पेरुमान को अलंकरण करते थे ) के पद छाया को अनुसरित विप्रनारायण एक सुन्दर नन्दनवन का निर्माण करते हैं और प्रतिदिन पुष्पमाला बनाकर पेरिय पेरुमाळ को समर्पित करते थे ।

एक दिन तिरुकरम्बनूर गाँव वाली देवदेवि नामक वेश्या उरैयूर से अपने गाँव को लौटते समय सुन्दर पुष्पों से और पक्षियों से भरे हुए उस बगीचे को देखकर आश्चर्यचकित होकर नन्दनवन आ पहुँचती हैं ।

उस समय मे देवदेवि, सुन्दर मुखी, सर पे लंबे सुन्दर केश, सुन्दर वस्त्र पहने, तुलसि और पद्ममाला अलंकृत , द्वादश उर्ध्वपुण्ड्र से तेजोमय, पौधों को पानी देने वाले उपकरण को हाथों में लिए हुए विप्रनारयण को देखती हैं । विप्रनारायण कैंकर्य मे निमग्न रहते हैं और उनकी दृष्ठि उस वेश्या पे नही आती हैं । तब देवदेवि अपनि सहेलियों से पूछती हैं की “यह मनुष्य पागल हैं या अपुरुष है जो अपने सामने खडि सौन्दर्यराशी को देख नही रहा हैं ” ।
सहेलियाँ जवाब देती हैं की वे विप्रनारायण हैं , भगवान श्रीरंगनाथ का कैंकर्यं करते हैं और उनकी सुन्दरता की ओर नही देखेंगे । सहेलियाँ देवदेवि को चुनौती देते हैं की यदि विप्रनारायण को छः महीनों मे देवदेवी अपनी तरफ मोड लेती हैं तब वे मानेंगेँ की वह लोकत्तर सौन्दर्य राशी है और छः महीन उनकी दासि बन जाएँगी। उस चुनौती को स्वीकार करके देवदेवि अपने आभरण सहेलियों को देकर एक सात्विक रूप ले लेती हैं ।

देवदेवि विप्रनारायण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करते हुए भगवान के अत्यन्त आंतरांगिक सेवा में निमग्न हुए भागवत की शरण में अपने आप को पाने की इच्छा प्रकट करती हैं । आळ्वार से देवदेवि कहती हैं की वह आळ्वार भिक्षाटन पूर्ती करके लौट आने तक निरीक्षण करेँगी । विप्रनारायण उनकी विनती स्वीकार कर लेते हैं । तब से देवदेवि विप्रनारायण की सेवा करते हुए उनका शेषप्रसाद पाते कुछ समय बिताती हैं ।

एक दिन देवदेवि बगीचे मे काम करते समय बहुत बारिश/बरसात होती हैं । तब देवदेवि गीले कपडों से विप्रनारायण के आश्रम में प्रवेश करती हैं । विप्रनारायण पोंछ ने के लिए अपनी ऊपर की वस्त्र को देते हैं । उस समय दोनों अग्नि और घी की तरह नजदीख हो जाते हैं । अगले दिन देवदेवि अपने आभरणों से अलंकृत होकर विप्रनारायण के सामने पेश आती हैं । उनकी सौंदर्य देखकर विप्रनारायण उस दिन से उनका दास/सेवक बन जाते हैं और भगवान का कैंकर्य को भूल जाते हैं और पूरी तरह से छोड देते हैं । देवदेवि विप्रनारायण के ऊपर कुछ समय तक अपना कपट प्रेम दिखाती हैं । उस प्यार को देख कर विप्रनारायण पूरी तरह से सेवक बन जाते हैं । देवदेवि विप्रनारायण की धन धौलत को हडप कर उन्हें बाहर धकेल देती हैं। विप्रनारायण उस दिन से देवदेवि की अनुमति के लिये उनकी आँगन मे प्रतीक्षा करते हुए समय बिताने लगे। एक दिन भगवान श्रीरंगनाथ(पेरियपेरुमाळ) और माता श्रीरंगनायकि(पेरियपिराट्टि) टहल रहे थे और उस समय विप्रनारायण को देख कर श्रीरंगनायकि अपने स्वामि से विचार करती हैं की वेश्या गृह इन्तज़ार करने वाला ये व्यक्ति कौन है। तब भगवान श्रीरंगनाथजी उत्तर देते हैं की ये उनका कैंकर्य करने वाला भक्त था लेकिन अब वेश्यालोल होकर एसे तडप रहा है। तब पुरुषाकार रूपिणि माता श्रीरंगनायकि श्रीरंगनाथजी से पूछते हैं ” एक अंतरङ्गिक कैंकर्य करने वाला भक्त विषयभोगों में डूब रहा हैं और वे उसे कैसे छोड रहे हैं । इनकी माया को दूर करके फिर से इन्हें अपने कैंकर्य मे लगा दीजिये”। भगवान श्रीरंगनाथ श्रीरंगनायकि की बात मान लेते हैं और उन्हें सूधारने के लिये अपने तिरुवाराधना(पूजा) से एक स्वर्ण पात्र को लेकर अपना रूप बदल कर देवदेवि के घर जाकर उनके दरवाज़ा पे कटखटाते हैं । तब देवदेवि उनसे अपने बारे में पूछने से बताते हैं की वे विप्रनारायण के दास अळगिय मणवाळन हैं । विप्रनारायण ने आप के लिए ये स्वर्ण पात्र (कटोरा) भेजा हैं । ये सुनकर देवदेवि आनन्द से विप्रनारायण को अन्दर आने के लिए आज्ञा दे देती हैं अळगिय मणवाळन विप्रनारायण के पास जाकर देवदेवि की मंज़ूरी बताते हैं । विप्रनारायण देवदेवि के घर पहुँच कर फिर से विषयभोगों में डूब जाता हैं । पेरियपेरुमाळ अपने सन्निधि को लौट कर आदिशेष पे आनंद से लेट जाते हैं ।

अगले दिन सन्निधि पूजारियोने पूजा करने के द्रव्य में एक पात्र कम पाया और इस विषय को महाराज तक पहुँचाते हैं । महाराजा पूजारियों की अश्रद्धता पे आग्रह करते हैं ।एकनक सेविका कुएँ से पानी लाते समय , सुनती हैं की उनके रिश्तेदारों में एक रिश्तेदार को राजा के आग्रह का पात्र होना पड़ा हैं और इस कारण वह उन्हें बता देती हैं की विप्रनारायण ने देवदेवि को उपहार के रूप मे एक स्वर्ण पात्र दिया हैं जिसे देवदेवि ने अपनी तकिया के नीछे रखा हैं । पूजारी ने महाराजा के सैनिकयों को विषय की सूचना कि और तुरन्त कर्मचारियों ने देवदेवि के घर पहुँचकर पात्र खोज निकालते हैं । देवदेवि के साथ विप्रनारायण को निर्भन्ध (गिरफ्तार)‌ कर देते हैं । राजा ने देवदेवि से पूछा ‘ कोई देता भी हैं तब भी भगवान का पात्र कैसे ले सकती हो’।देवदेवि ने राजा से कहा ’मुझे यह नही मालूम की यह पात्र भगवान का है, विप्रनारायण ने इसे अपना पात्र कहकर अपने दास अळगिय मणवाळन के द्वारा भेजा हैं और इस कारण निसंकोच से स्वीकार किया हैं ’। ये सुनकर विप्रनारायण चोक कर कहते हैं ‘न ही उनके कोई दास हैं और न ही कोई स्वर्ण पात्र उनके पास हैं ’ । यह वाद-विवाद सुनकर राजा देवदेवि को जुरमाना डाल कर छोड देते हैं । पात्र को भगवान के सन्निधि मे वापस कर देते हैं और विचारण पूरी होने तक विप्रनारायण को कारागृह(जैल) मे रखने के लिए आज्ञा दिया।

घटित संघटनों को देख कर माता श्रीरंगनायकि ने भगवान श्रीरंगनाथ से विप्रनारायण को अपने लीला की नहीं अपनी कृपा का पात्र बनाने की  विनती करती हैं । भगवान श्रीरंगनाथ उनकी बात मान लेते हैं और  उस दिन रात को महाराजा के सपने मे साक्षात्कार होकर  कहते हैं  की विप्रनारायण  मेरा अत्यंत अन्तरङ्गिक कैंकर्य करने वाले  भक्त है।  विप्रनारायण के प्रारब्द कर्म को मिटाने के लिए  मुझ से रचि हुई यह  रचना है। भगवान श्रीरंगनाथ  महाराजा को आदेश करते हैं की विप्रनारयण को तुरन्त छोड़ दे और  उन्हें उनकी पूर्व कैंकर्य(भगवान को पुष्पमाला बनाने की सेवा )में जुटाने की आज्ञा देते हैं । महाराज नीन्द से जाग उठते हैं  और  विप्रनारयण का वैभव जानकर उन्हें  आज़ाद कर देते हैं और सपने का वृतान्त सभी को बता देते हैं ।  विप्रनारयण को  धन दौलत से गौरवान्वित करते हैं और घर भेज देते हैं ।तब विप्रनारयण भगवान की महानता और उन्हें सुधार ने के लिए भगवान के प्रयास को महसूस करते हैं । इस साँसारिक भोगों को छोड देते हैं और  भागवतों का श्रीपाद तीर्थं स्वीकार करते हैं ।( भागवतों का श्रीपाद तीर्थं समस्त पापों का प्रायश्चित करता  है)

तत्पश्चात विप्रनारयण तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार एवं भक्तांघ्रिरेणु के नामों से मशूर हुए । तोण्डर = भक्त , अडि/ अंघ्रि = पाद पद्म , पोडि/ रेणु = धूल। पूरा अर्थ है- भगवत भक्तों का पाद धूल।अन्य आळ्वार से अद्वितीय वैभवता इन आळ्वार की हैं – केवल इन्हीं के नाम में भागवत शेषत्व का प्रकाश होता हैं ।जैसे तिरुवडि(हनुमान/गरुड़ ) ,इळय पेरुमाळ (लक्षमण) एवं नम्माळ्वार (शठगोप) ने भगवान के अलाव किसी भी अन्य विषय को मूल्यवान नहीं माना वैसे ही तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार भी कहते हैं “ इन्दिर लोकं आलुं अच्चुवै पेरिनुं वेंडेन” – अर्थात मुझे श्री वैकुण्ठ के बारे मे सोचने की भी इच्छा नहीं हैं मुझे केवल श्रीरंग क्षेत्र मे पेरिय पेरुमाळ का अनुभव चाहिए। पेरियपेरुमाळ के कृपा से ही उनमे बद्लाव आने के कारण ,आळ्वार उन पे बेहद आभारी हो चुके थे और इसी कारण अन्य आळ्वारों की तरह दिव्यदेशो मैं विराजमान अर्चामूर्तियों के बारे मे प्रबन्ध गाने से भिन्न केवल पेरियपेरुमाळ को ही अपना प्रबन्ध समर्पित किया हैं । आळ्वार के अटूट विश्वास और पेरुमाळ पे वास्तल्य को देखकर पेरियपेरुमाळ भी उस प्यार का प्रति फल चुकाते हुए उन्हें परिपूर्ण ज्ञान से अनुग्रह करते हैं और अपना पर्वतादिपञ्चक(एम्पेरुमान के पाँच निवास क्षेत्र – विवरण यहाँ पढ़ सकते हैं ) मे स्थित विविध नाम, रूप, दिव्य लीलाओं को श्रीरंगम से ही आळ्वार को दर्शन कराते हैं । देवदेवि भी आळ्वार की भक्ति और ज्ञान को देख कर अपना सार धन भगवदर्पित करके सेवा निरत हो जाती हैं ।

पर भक्ति , पर ज्ञान और परम भक्ति में डुबे और अपना सर्वस्व पेरिय पेरुमाळ को मान आळ्वार तिरुमंत्र अनुसन्दान और नाम संकीर्तन से पेरिय पेरुमाळ को निरन्तर अनुभव करते थे । अपने दिव्य अवस्था का अनुभव करते हुए , आळ्वार घोषित करते हैं की यम राज को देखकर श्री वैष्णव को कम्पित होने की आवश्यकत नहीं हैं । आळ्वार कहते हैं की यमराज के दूत श्री वैष्णव के तिरुवडि पाने के लिए काँक्षित होते हैं और एक श्री वैष्णव दूसरे श्री वैष्णव के श्री पाद पद्मों को पूजनीय मानते हैं । जैसे सौनका ऋषि ने सदानन्दर को एम्पेरुमान के दिव्य नामों की वैभवता समझाई हैं उसी तरह आळ्वार पेरिय पेरुमाळ के सामने तिरुमालै गान करते हैं । जैसे नम्माळ्वार अचित तत्व के दोषों को पहचानते हैं (२४ तत्व – मूल प्रकृति ;महान ; अहँकाराम ; मनस ; पाँच ज्ञान-इन्द्रिय ,पाँच कर्म-इन्द्रिय, पाँच तनमात्र , पाँच भूत ), आळ्वार भी अचित तत्व स्पस्ट रूप से पहचानते हैं जैसे “पुरम सुवर ओट्टै माडम” मतलब यह शरीर केवल बहार का दीवार हैं और आत्मा ही अन्दर निवास करता हैं और नियंत्रक हैं । आळ्वार प्रतिपादित करते हैं की जीवात्मा का स्वरूप एम्पेरुमान के भक्तों का सेवक होना हैं और यह विषय “अड़ियारोरक्कु” में बताते हैं मतलब जीवात्म भागवतों का सेवक हैं । तिरुमन्त्र के निष्ठा से परिपूर्ण आळ्वार “मेम्पोरुळ ” पाशुर में प्रकट करते हैं की केवल एम्पेरुमान ही उपाय हैं जो तिरुमालै प्रबन्ध का सार हैं । “मेम्पोरुळ ” पाशुर के अगले पाशुरों में ऐलान करते हैं की भागवत सेवा ही श्री वैष्णव का अंतिम लक्ष्य हैं और उनके तिरुपळ्ळियेळ्ळुचि के अन्तिम पाशुर में एम्पेरुमान को विनती करते हैं “उंनडियार्क्काटपडुताय” जिसका मतलब हैं मुझे आपके भक्तों का अनुसेवी बना दीजिये । इस तरह ,आळ्वार इन महान सिद्धान्तों को पूरे दुनिया की उन्नती की आकांक्षा से अपने दो दिव्य प्रबन्ध तिरुमालै और तिरुपळ्ळियेळ्ळुचि से समर्पण किया हैं ।

तनियन:

तमेव मत्वा परवासुदेवम् रन्गेसयम् राजवदर्हणियम् |

प्राभोद्कीम् योक्रुत सूक्तिमालाम् भक्तान्ग्रिरेणुम् भगवन्तमीडे ||

source

-अडियेन शशिधर रामानुज दासन

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आण्डाल

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र : आशड मास, पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र

अवतार स्थल : श्री विल्लिपुत्तूर

आचार्य : पेरियाल्वार

ग्रंथ रचना : नाच्चियार तिरुमोलि, तिरुप्पावै

तिरुप्पावै ६००० पड़ी व्याख्यान में, श्री पेरियवाच्चान पिल्लै सर्वप्रथम अन्य आल्वारों की तुलना में आण्डाल के वैभव और महत्व का प्रतिपादन करते है | वे विभिन्न प्रकारों के जीवो का उदहारण देते हुए अत्यंत सुन्दरता से इनका विभाग करते है और इनके बीच का फर्क समझाते है जो आगे प्रस्तुत है :

सर्वप्रथम : संसारियो ( देहात्म अभिमानी संसारिक जन ) और ऐसे ऋषि जिन्हें स्वरूप ज्ञान का साक्षात्कार हुआ है इनमे छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

दूसरा : पूर्वोक्त ऋषियों (जिन्हें अपने बल बूते पर आत्म साक्षात्कार हुआ है, जो कभी कभी अपने स्थर से नीचे गिर जाते थे) और आल्वारों (जिन्हें केवल भगवान के निर्हेतुक कृपा से आत्म साक्षात्कार हुआ है और जो अत्यंत शुद्ध है) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

तीसरा : पूर्वोक्त आल्वारों (जो कभी कभी स्वानुभव और मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) और पेरियाल्वार (जो सदैव मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

चौथा : पेरियाल्वार और आण्डाल में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है | इसके अनेनानेक कारन है जो निम्नलिखित है

) अन्य आल्वारों को सर्वप्रथम भगवान के निर्हेतुक कृपा के पात्र बनाकर सुसुप्त बद्ध जीवो को जगाया (दिव्य ज्ञान – भगवत विषय) | परन्तु श्री आण्डाल अम्मा ने (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) भगवान को अपनी नीदं से जगाया और उनके कर्तव्य का स्मरण कराया (सारे जीवो का संरक्षण) | नंपिल्लै ने तिरुविरुत्तम और तिरुवाय्मोलि के व्याख्या में यह प्रतिपादित किया है की आल्वार संसारी ही थे जिन पर भगवान का निर्हेतुक कृपा कटाक्ष हुआ है और अत: भगवान से दिव्य ज्ञान प्राप्त किये है | इसके विपरीत में आण्डाल अम्मा तो साक्षात् भू देवी का अवतार स्वरूप है, जो नित्यसूरी है, और भगवान की दिव्य महिषी है | इनके मार्गदर्शन में चलते श्री पेरिय वाच्चान पिल्लै ने भी यही निरूपण दिया है |

) आंडाल अम्मा एक स्त्री होने के नाते उनका भगवान के साथ पतिपत्नी का सम्बन्ध स्वाभाविक था | अत: इसी कैंकर्य का आश्रय लेकर उन्होंने कैंकर्य किया | इसके विपरीत देखा जाए तो अन्य आल्वार को पुरुष देह प्राप्त हुआ था | इसी कारण कहा जाता है की आण्डाल अम्मा और इन आल्वारों के भगवद प्रेम में बहुत अन्तर है | आण्डाल अम्मा का भगवद प्रेम आल्वारों के भगवद प्रेम से उत्कृष्ट और कई गुना श्रेष्ठ है |

पिल्लै लोकाचार्य स्वरचित श्रेष्ठ और उत्तम ग्रंथ श्री वचन भूषण में आण्डाल अम्मा के वैभव को इन निम्नलिखित सूत्रों से दर्शाते है जो इस प्रकार है :

सूत्र २३८ : ब्राह्मण उत्तम राणा पेरियाल्वारुम तिरुमगलारुम गोपजन्मत्तै अस्थानं पन्ननिण्णार्घळ

पिल्लै लोकाचार्य इस सूत्र में बिना जन्म, जाती, इत्यादी के भेदभाव से भागवतो की श्रेष्ठता को समझाते है | यहाँ वे यह समझाते है की ऐसे कई भागवत है जो स्वरुपनुरूप कैंकर्य और भगवद अनुभव हेतु विभिन्न योनियों में जन्म लेना चाहते है | वे आगे कहते है की हालाँकि पेरियाल्वार और आण्डाल अम्मा ने ब्राह्मण योनी में जन्म लिया परन्तु वे दोनों चाहते थे की वे वृन्दावन के गोपी बनकर भगवान की सेवा करे | आण्डाल अम्मा ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है की भगवान को प्रिय कैंकर्य ही सभी जीवो का लक्ष्य और उद्देश्य है | इसीलिए हम सभी को ऐसे कैंकर्य का गुन गान करना चाहिए और चाहे कैंकर्य किसी रूप में हो ऐसे कैंकर्य की चाहना करनी और होनी चाहिए |

सूत्र २८५ : कोडुत्तुक कोळ्ळाते कोण्डत्तुक्क कैकुलि कोडुक्कवेन्णुम

इस प्रकरण में, पिळ्ळै लोकाचार्य जी कहते है की कैंकर्य किस प्रकार करना चाहिए | यह सूत्र २३८ से संबंधित है जिसमे लोकाचार्य कहते है कि किस प्रकार एक जीव को चाहना होनी चाहिए की भगवान् को प्रिय सेवा में कैसे तत्पर रहे | पूर्वोक्त सूत्र (२८४) में कहते है की कैंकर्य निस्वार्थ और अन्याभिलाश रहित होनी चाहिए | कैंकर्य के बदले में किसी भी प्रकार की चाहना नहीं होनी चाहिए | यानि तुच्छ फल की प्राप्ति हेतु कैंकर्य नहीं करना चाहिए | लेकिन इस सूत्र में लोकाचार्य जी कहते है की प्रत्येक जीव को भगवान का कैंकर्य करना चाहिए और अगर भगवान हमारे कैंकर्य से प्रसन्न है तो उनके प्रति और कैंकर्य करना चाहिए | श्री वरवरमुनि इस भाव को अत्यंत स्पष्ट और सरल रूप में आण्डाल अम्मा की स्वरचना नाच्चियार तिरुमोळिके ९.७ पासुर इन्रु वाण्तु इत्तनैयुम चेय्दिप्पेरिल णान् ओन्रु नूरु आयिरमागक्कोडुत्तु पिन्नुं आळुम चेय्वान” से समझाते है | इस पासुर में गोदाअम्मा जी कहती है की पूर्वोक्त पासुर के अनुसार उनकी इच्छा थी की वे भगवान तिरुमालिरुन्सोलै अळगर को १०० घड़े माखन और १०० घड़े मिश्रान्न समर्पित करे और जब उन्होंने यह सेवा सम्पूर्ण किया तो उन्होंने देखा की किस प्रकार भगवान उनकी इस सेवा से संतुष्ट है और आनंदोत्फुल्ल चित्त भाव से समर्पित भोग्य आहार को ग्रहण किये | तदन्तर गोदा अम्मा भी और हर्षोत्त्फुल्ल भाव से कही मै आपके के लिए इसी प्रकार की सेवा आशारहित होकर मै तत्पर रहूंगी और आपकी सेवा का आनंद का रसास्वादन करूंगी | अत: कुछ इस प्रकार से गोदा अम्मा ने स्वरचित पासुरों में हमारे संप्रदाय के उच्च कोटि विषय तत्वों को अत्यंत सरल रूप में प्रकाशित किया है |

तिरुप्पावै के २०००पड़ी” और ४०००पड़ीके व्याख्यान कर्ता श्री आई जनन्याचार्य अपने व्याख्या की भूमिका में तिरुप्पावै के वैभव को अति सुंदर रूप में वर्णन करते है | इस भूमिका में वे श्री रामानुजाचार्य के समय हुई एक घटना का उदाहरण देते हुए कहते है की स्वयं गोदा देवी (जो आळ्वारों के उत्तम गुणों का समागम है) ही सर्वोत्कृष्ट और योग्य है जिनसे हम सभी उनकी स्वरचित भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के रस का आस्वदान कर सकते है | इसी में श्री रामानुजाचार्य से एक बार कई शिष्यों ने निवेदन किया की वे गोदा अम्मा जी के भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा करे | तब श्री रामानुजाचार्य ने कहा हे उपस्थित शिष्यों ! आप सभी भलीभाँती जानते है की तिरुप्पल्लाण्डु की कथा और श्रवण करने के लिए बहुत से वैष्णव होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै के नहीं | क्योंकि तिरुप्पल्लाण्डुनिम्न स्थर पर भगवद मंगलाशासन के लिए ही किया गया था और इसकी कथा और श्रवण करने के लिए बहुत सारे योग्य लोग होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की रचना श्री गोदा अम्मा जी ने भागवतो का मंगलाशासन के लिए किया है जो अत्यंत उच्च श्रेणी (चरमपर्व) की रचना है और जिसका रसास्वादन  कुछ महा रसिक भागवत ही कर सकते है | आगे रामानुजाचार्य कहते है की तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के लिए पुरुष कभी भी योग्य नहीं है क्योंकि गोदा अम्मा जी के कैंकर्योत्फुल्ल और भावुक हृदय और तिरुप्पावै के गोपनीय अर्थों को समझने के लिए हमें भी पतिव्रता स्त्री (जो पति पर पूर्ण रूप से निर्भर होती है) के अनुसार भगवान की अहैतुक और निर्हेतुक कृपा पर निर्भर होना चाहिए | आगे और भी कहते है की भगवान की पत्नियाँ (जो स्वानुभव की प्रतीक्षा से कैंकर्य में तत्पर है) भी भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण नहीं कर सकती है | इसका पूर्ण श्रेय केवल श्री गोदा अम्माजी का ही है |

श्री वरवरमुनि स्वरचित उपदेश रत्नमाला के २२, २३, २४ पासुर में गोदा अम्मा जी के वैभव का गुण गान करते है जो इस प्रकार है :
पासुर २२ : श्री वरवरमुनि किस प्रकार भावोत्फुल्ल होकर सोचते है, किस प्रकार माता गोदा ने अपने निज निवास परमपद को छोड़कर, उन्हें बचाने के लिए (बद्ध जीवो का उद्धार हेतु) इस भव सागर में श्री पेरियाल्वर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई | कहा जाता है की जिस प्रकार नदी में अपने शिशु को डूबते हुए  देखकर उसकी माता स्वयं नदी में कूदती है ठीक उसी प्रकार सभी जीवों की माता गोदा अम्मा भी इस भव सागर में कूदती (अवतार लेती)  है |

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पासुर २३ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा के तिरुनक्षत्र की भांति कोई और नक्षत्र नहीं हो सकता है क्योंकि उनका तिरुनक्षत्र सर्वश्रेष्ट और अत्योत्तम है |
पासुर २४ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा “अंजु कुडी” की बेटी है | उनके दिव्य कार्य अन्य आल्वारों के कार्यों से भिन्न और सर्वोत्कृष्ट है | और किस प्रकार से उन्होंने भगवान के प्रति अपने निष्क्रिय प्रेम भावना को छोटे उम्र में ही प्रकाशित किया | पिल्लै लोकम जीयर “अंजू कुडी” का मतलब समझाते हुए कहते है :
१) जिस प्रकार पांडवो के वंश का अंतिम उत्तराधिकारी परीक्षित महाराज थे उसी प्रकार हमारे आल्वारों के वंश की अंतिम उत्तराधिकारी गोदा अम्मा जी है |
२) वे आल्वारों के प्रपन्न कुल में अवतरित हुई |
३) वे पेरियाल्वार (जो सदैव भगवान के लिए भयभीत थे और मंगलाशसन किया करते थे) की उत्तराधिकारी थी |

कहा जाता है कि गोदाअम्माजी पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठावान थी | कहते हैं कि पेरिय आळ्वार की भगवान में रति के कारन ही श्री आण्डाल अम्माजी भी भगवान में रति से संपन्न हुई और तदन्तर उनका मंगलाशाशन कर गुणगान किया | निम्नलिखित स्व वचनों पर आधारित कुछ प्रस्तुत है :

१) आप श्री अपने नाच्चियार तिरुमोळि के १०.१० वे पासुर में कहती है : ” विल्लिपुदुवै विट्टूचित्तार तंगळ देवरै वल्ल परिचु वरुविप्परेल अदु कान्ण्दुमे ” अर्थात वे स्वत: अपनी ओर से भगवद आराधना नहीं करेंगी अपितु अगर उनके पिताश्री भगवान को स्वयं बुलाकर मनाएंगे तभी आप श्री भगवद आराधना करेंगे |

२) श्री वरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला में सुन्दर रूप से पहले १० आळ्वारों का परिचय देते हुए तदन्तर “श्री गोदा अम्माजी”, “मधुर कवि आळ्वार”, “श्री भाष्यकार – एम्पेरुमानार” का परिचय देते है क्योंकि ये तीन मुख्यत: आचार्य निष्ठावान है |

पूर्वोक्त वाक्यांशों को ध्यान में रखते हुए, श्री गोदाम्माजी के चरित्र का संक्षिप्त वर्णन का अनुभव अब करे :

आण्डाल जी श्री विल्लिपुत्तूर के तुलसी वन (जहा वर्तमान नाच्चियार मंदिर है) में अवतरित हुई थी | जिस प्रकार राजा जनक की भूमि में भू सिंचन के जयिरे प्राप्त शिशु का नाम (हल के नाम के अनुसार) सीता रखा गया, उसी प्रकार श्री पेरियाल्वार ने तुलसी वन में प्राप्त शिशु (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) का नाम कोदै (गोदा – अर्थात माला) रखा इत्यादी |

आप श्री को बचपन से ही भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन कराया गया था | इसी कारण आप विशेषत: भगवान से आकर्षित थी | आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार हर रोज़ वटपत्रशायी भगवान के लिए सुघंदित पुष्पों की माला बनाते थे | भगवान भावनामृत रति के कारन आप श्री भगवान को ही उचित वर मान लिया और यही सुनिश्चित किया | आप श्री के पिता के अनुपस्थिति में, आप ने भगवान की माला (जो हाल ही में भगवान को समर्पित की जाने वाली थी) को स्वयं पहनकर आईने के सामने खड़ी होकर सोचने लगी – अरे ! कितनी सुन्दर माला है | मै खुद इस माला के प्रति आकर्षित हो रही है | क्या यह माला पहनकर मै भगवान के साथ योग्य हूँ या अयोग्य हूँ ?  ऐसा सोचकर तदन्तर आप श्री ने माला को उक्त जगह पर रख दी | तन्दंतर आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार आये और यही माला भगवान को अर्पण किये | यह घटना क्रम कई दिनों तक चल रहा था | अचानक एक दिन आप श्री के पिता ने देखा – आप श्री भगवान के भोग्य वस्तु को (असमर्पित माला) स्वयं पहनकर उसका रसास्वादन कर रही थी | यह देखकर आप श्री के पिता बहुत व्याकुल और निराश हुए और तदन्तर उन्होंने यह माला भगवान को अर्पण नहीं किया | उस रात, भगवान स्वयं आप श्री के पिता जी के स्वप्न में आकर पेरियाल्वार से पूछे : श्रीमान, आप मेरे लिए फूलो की माला क्यों नहीं लाये ? आळ्वार ने कहा – आप सर्वज्ञाता है| मेरी बेटी ने असमर्पित माला को स्वयं पहन लिया | इसी कारण आप को यह उच्श्रिष्ट माला अर्पण नहीं किया | तदन्तर भगवान बोले – आपने ऐसा क्यों किया ? मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की आप की बेटी के पहनने के कारन एक विशेष भक्तिरस की सुगंध आई | इस कारन आप इस कर्म को अनुचित ना समझे | मुझे ऐसी मालाये बहुत पसंद है | ऐसा भगवान से सुनकर अत्यंत प्रसन्न और भावुक आळ्वार ने प्रतिदिन – माला बनाकर, फिर अपनी बेटी को यही माला पहनाकर,फिर भगवान को अर्पण करना शुरू किया | अत: इस प्रकार से अपनी बेटी के प्रति उनका सम्मान और बड़ गया |

श्री आण्डाल नाच्चियार, जन्म से ही अत्यंत भक्ति भाव (परम भक्ति) से संपन्न थी क्योंकि आप श्री भू देवी की अवतार है और स्वभावत: आप श्री को भगवान से अनुरक्ति है | कहा जाता है की : आप श्री की भगवदानुरक्ति आप श्री के पिता के भगवदानुरक्ति से अधिकाधिक और सर्वश्रेष्ठ है | इस भगवदानुरक्ति के कारन आपमें विरह भाव की व्युत्पत्ति हुई और इस कारणवश आप सदैव व्याकुलता, भगवान को तुरंत पाने की इच्छा से ग्रस्त थी (भगवान् से ब्याह रचाना करना चाहती थी) | इस भावमयी अवस्था में आप श्री ने भगवान को पति के रूप में पाने के लिए तरह तरह के उपायो का अवलम्ब शुरू किया| जिस प्रकार वृन्दावन की गोपिकाओं ने श्री कृष्ण की प्राप्ति की थी, उन्ही के अनुसार दर्शाये मार्ग में श्री गोदा अम्मा जी ने श्रीविल्लिपुत्तूर को तिरुवैप्पड़ी (वृन्दावन), वटपत्रशायी भगवान को श्री कृष्ण, भगवान के मंदिर को श्री नंद बाबा का घर, स्थानीय कन्याओं को गोपीस्वरूप इत्यादी मानकर तिरुप्पावै व्रत का शुभारम्भ किया |

आपश्री तिरुप्पावै में निम्नलिखत वेद वाक्यांशों को दर्शाती है :

१) प्राप्य और प्रापक ( उपाय और उपेय) स्वयं भगवान ही है |

२) वैष्णव शिष्ठाचार ( पूर्वाचार्य अनुष्ठान ) का प्रकाशन ( क्या सही और क्या गलत ) |

३) भगवद अनुभव सदैव भक्तों के सत्संग में करना है और अकेले (स्वार्थपर) होकर नहीं |

४) भगवान के दर्शनार्थ और शरण लेने से पूर्व, सर्वप्रथम उनके द्वारपालक, बलराम जी, यशोदा माता, नंद बाबा इत्यादियों का आश्रय लेना चाहिए |

५) हमे श्री लक्ष्मी जी के पुरुषकार से ही भगवद प्राप्ति होती है और इनका आश्रय लेना प्रपन्नों का कर्त्तव्य है |

६) हमें सदैव भगवान का मंगलाशासन करना चाहिए |

७) हमें भगवान से कैंकर्य मोक्ष की इच्छा व्यक्त करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए की भगवद-कैंकर्य का सौभाग्य प्रदान हो और हमारा कैंकर्य भगवान स्वीकार करे क्योंकि कि भगवद्कैंकर्य जीवात्मा का स्वस्वरूप है |

८) हमें पूर्ण रूप से समझना चाहिए की उपाय भगवान स्वयं है और एक क्षण के लिए यह नहीं सोचना चाहिए की स्वप्रयास भी उपाय है |

९) अन्याभिलाषी ना होते हुए,  केवल भगवदानुभव और भगवद्प्रीति हेतु भगवद्कैंकर्य करना चाहिए|

उपरोक्त व्रत के नियम पालन करने के बावजूद भी गोदा अम्माजी को भगवद-साक्षात्कार, भगवद्प्राप्ति नहीं हुई और भगवान ने उन्हें स्वीकार नहीं किया | यह जानकर, गोदा अम्माजी अत्यंत शोक ग्रस्त हुई | इसीलिए अपने असहनीय शोक और विरह भाव को स्वरचित “नाच्चियार तिरुमोलि” में व्यक्त करती है | हमारे सत्सम्प्रदाय के अनेकानेक विशेष तत्वों का निरूपण पूर्वोक्त ग्रन्थ में हुआ है | कहा जाता है कि नाच्चियार तिरुमोलि के श्रोताओं को वाकई में परिपक्व होना चाहिए वरना गलत भाव को समझेंगे | नाच्चियार तिरुमोलि में गोदा अम्मा जी कहती है ” मानिदवर्क्केंरु पेच्चुप्पदिल वाळगिन्रेन “: अगर कोई मेरे परिज्ञान के खिलाफ, बेईरादे से यह कह दे – आप श्री भगवान को छोड़कर किसी ओर से विवाहित है, मै तुरंत अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी | मै ऐसा सुनना हरकिस सहन नहीं कर सकती हूँ |

वारणमायिरम दशक पद्य में, गोदा अम्माजी स्वप्न में भगवान से ब्याह रचने की लीला का वर्णन करती है | तदन्तर भावनारसरत गोदा अम्माजी को  आप श्री के पिता ने आप श्री को श्रीरंग जी के अर्चावतार का वैभव दर्श कराया और इस कारण वश आप श्री श्रीरंग भगवान के प्रति आकर्षित हुई | परन्तु अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर पेरियाल्वार से रहा नहीं गया और वे भी शोक और व्याकुलता से ग्रस्त हुए | एक दिन, रात्री में, भगवान श्रीरंगनाथ उनके स्वप्न में आये और कहे – आप ज्यादा चिंतित ना हो श्रीमन ! आपको मै एक अच्छा शुभ दिन बतावूँगा और उस दिन आपको आपकी बेटी को मुझे सौपना होगा ताकि उनका उनकी प्रेमिका के मिलन हो | यह सुनकर हर्षित पेरियाल्वार ने भगवान को पुनः नमस्कार किया और बेटी की बारात की तय्यारी शुरी किया | भगवान के स्वयं उनके लिए अर्थात अपनी प्रेमिका भविष्य पत्नी के लिए पालकी, चामर, छत्री और उनके नित्य और वर्तमान कैंकर्यपरों को श्रीविल्लिपुत्तूर भेजा | आळ्वार अपने इष्टदेव श्री वतपत्रशायी भगवान से आज्ञा लेकर, बेटी को पालकी में बिठाकर, पूरे बरातीयों के साथ मंगल वाद्य यंत्रो के साथ श्रीरंग की ओर रवाना हुए |

सुसज्जित, अत्यंत सुन्दर, आभूषणों से अलंकृत गोदाम्माजी ने श्रीरंग में प्रवेश करते ही, पालकी से उतरी, मंदिर में प्रवेश करते हुए, तदन्तर मंदिर के गर्भ स्थान में प्रवेश की | तदन्तर आप श्री ने साक्षात श्रीरंग के चरण कमलों को छुआ और अंतर्धान हो गयी और इस प्रकार से अपने नित्य वास परमपद में प्रवेश किया|

 

यह दृष्टांत देखकर, उपस्थित अचंबित भक्तों ने भगवान के ससुर जी का अत्यंत आदर और सत्कार किया | भगवान ने तुरंत डंका घोषणा किये की पेरियाल्वार समुद्रराज की तरह उनके ससुर हो चुके है अत: उनका विशेष आदर और सत्कार हो | तदन्तर आप श्री के पिता, पेरियाल्वार श्रीविल्लिपुत्तूर को प्रस्थान हुए और वटपत्रशायी की सेवा में संलंग हुए |

श्री गोदा अम्माजी के जीवन वृत्तान्त की असीमित वैभव को सदैव या साल में मार्गशीष मॉस में अवश्य सुनते हुए मनन चिंतन करते है | परन्तु प्रत्येक बार हमें कुछ नया सा महसूस होता है जब भी इनकी कथा का श्रवण करे क्योंकि इनके स्वरचना और अन्य दिव्यप्रबंध में ऐसे असंख्य साम्प्रदायिक तत्त्व है  जिन्हें एक बार में जाना नहीं जा सकता है |

श्री गोदाम्माजी और उनकी स्वरचित तिरुप्पावै के असली वैभव के दृष्टांत को समझने के लिए, पराशरभट्टर जी के दिव्य वचन से समाप्त करेंगे | पराशर भट्टर कहते है – प्रत्येक प्रपन्न को तिरुप्पावै का पाठ और अनुसन्धान करना चाहिए | अगर यह संभव नहीं है तो मुख्य पासुर, अगर वों भी संभव नहीं हो तो अंत के दो पासुर (शित्तम शिरुघाले ..) का नित्य पाठ अवश्य करना चाहिए | अगर यह भी संभव नहीं है, तो याद करे श्री पराशर भट्टर को, जिन्हें तिरुप्पावै अत्यंत प्रिय है और जो तिरुप्पावैरत है | केवल यही सोच भगवान को संतुष्ट करती है | जैसे एक गाय, घास की पत्तियों और नकली चर्म से बने बछडे के स्पर्श मात्र से ही निसंकोच दूध देना शुरू करती है, उसी प्रकार भगवान जीवात्मा (जो नित्य तिरुप्पावै या तिरुप्पावैरत श्रीपराशर भट्टर का पाठ मनन चिंतन करता हो) के आचार्य सम्बन्ध को जानकर संकोच रहित अपनी कृपा वर्षा बरसाते है | श्री गोदाम्माजी ने अहैतुक कृपा से इस संसार में अवतार लिया और तिरुप्पावै का विशेष प्रसाद अनुगृहित किया ताकि बद्ध जीवात्माए भी भगवान के अहैतुक कृपा के पत्र बन सके और इस संसार के भव-बंधनों से विमुक्त होकर नित्य परमपद में भगवदनुभव और भगवद्कैंकर्य के आनंद का रसास्वादन करे |

श्री गोदाम्माजी का तनियन

नीळातुंगस्तनगिरितटी सुप्तमुद्बोध्य कृष्णम्
पारार्थ्यम् स्वम् श्रुतिशतशिरस्सिद्धमद्ध्यापयन्ती ।
स्वोचिष्ठायाम् श्रजनिगळितम् याबलात्कृत्य भुङ्ते
गोदा तस्यै नम इदं इदं भूय एवास्तु भूयः ॥

अडियेन सेत्तालूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तिक रामानुज दास
अडियेन सेत्तालुर वैजयंती आण्डाल रामानुज दासी

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