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कूरत्ताळ्वान्

श्री:

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवर मुनये नमः

श्री वानाचल महामुनये नमः

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कूरत्ताळ्वान् – कूरम्

तिरुनक्षत्र : पुष्य मास – हस्त नक्षत्र

आवतार स्थल : कूरम्

आचार्यं : एम्पेरुमानार्

शिष्य : तिरुवरंगत्तमुदानार

परमपद प्रस्थान प्रदेश : श्रीरंगं

ग्रंथ रचना सूची : पञ्च स्तव (श्री वैकुण्ठ स्तव, अति मानुष स्तव, सुन्दर बाहु स्तव, वरदराज स्तव और श्री स्तव) , “यो नित्यम् अच्युत” और “लक्ष्मी नाथ” तनियन

  • कूरम् गाँव के सज्जन घराने में सन् १०१० (सौम्य वर्ष , पुष्य मास ,हस्ता नक्षत्र ) में कूरताळ्वार् और पेरुन्देवी अम्माळ को पैदा हुए थे । इन्हें “श्री वत्साङ्गन्” कहके नामकरन किया गया ।
  • बाल्य अवस्थ में ही इनकी माताजी आचार्य के श्री चरण कमल प्राप्त की थी (अर्थात् उनका परम् पदवास हुआ) |अगर शादी-शुदा व्यक्ति की पत्नी मर जाती है, तो शास्त्र के अनुसार, एक वर्ण-आश्रम में जीवन बिताने के लिए, उस व्यक्ति का पुनः विवाह करने का नियम है । लेकिन इनके पिताजी ने पुनः विवाह करने के लिए अनिष्ट प्रदर्शन किये और कहे कि “मेरी दूसरी शादी के बाद, अगर मेरी दूसरी पत्नी कूरत्ताळ्वान् के प्रति ठीक तरह से पेश नहीं आएगी, वह भागवत् अपचार ही होगा “। अति यौवन अवस्था में ही ऐसे महत्वपूर्ण गुण कूरत्ताळ्वान् मे विकसित हुए थे ।
  • देवपेरुमाळ की सेवा करने वाले तिरुक्कच्चि नम्बि से निर्देश प्राप्त करते थे ।
  • आण्डाळ से विवाह किया जो उनके समान उत्कृर्ष गुणों से परिपूर्ण थी ।
  • एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामी जी) का शरण पाकर, उनसे पञ्च संस्कार प्राप्त किये |
  • अपना सारा धन कूरम् में छोड़कर, अपनी धर्म पत्नी के साथ श्री रङ्गम् पहुँचकर, भिक्षा माँगकर अपना जीवन बिताने लगे ।
  • एम्पेरुमानार् के साथ बोधायन व्रुति ग्रन्थ प्राप्त करने कश्मीर को जाते हैं । वापस आते समय ग्रन्थ खो जाता है और परेशान एवं शोखाग्रस्त एम्पेरुमानार् को दिलासा देते हैं कि उन्होंने पूरा ग्रन्थ कंठस्थ कर लिया है । तत्पश्चात् श्री रङ्गम् पहुँचकर,एम्पेरुमानार् का अद्भुत ग्रन्थ “श्री भाष्यम् ” को ताड़ पत्र में ग्रन्थस्थ करने में सहायता किये ।
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अमुदनार                                                   कूरत्ताळ्वान्                                             एम्पेरुमानार्

  • नित्य तिरुवरङ्ग अमुदनार् को उपदेश करके उन्हें एम्पेरुमानार् का शिष्य बनाया | साथ ही एकाग-रीती के अनुसार अपने (तिरुवरङ्ग अमुदनार् के) आधीन मन्दिर एवं मन्दिर की चाबियों को तदनन्तर एम्पेरुमानार् को समर्पित किया | अत: कूरत्ताळ्वान् ने (तिरुवरङ्ग अमुदनार् के) हृदय परिवर्तन मे एहम पात्र का पोषण किया है ।
  • एम्पेरुमानार् के बदले शैव राजा के पास खुद जाकर, उनका दावा “परमात्म रुद्र ही है ” को तर्क से असत्य ठहराया और श्रीमन्नारायण के परत्त्वता कि स्थापना की, और अंत में श्री वैष्णव दर्शन (सम्प्रदाय) के लिए खुद अपने दर्शन (आँखों) खो दिया ।
  • श्री रङ्गम् छोड़कर, तदनन्तर तिरुमाळिरुम् शोलै मे १२ साल बिताते हैं । कळ्ळळगर् ( तिरुमाळिरुम् शोलै एम्पेरुमान् ) के प्रति सुन्दर बाहु स्तवम् (उनसे रचित पाँच स्तावोंमे से एक) का गान करते हैं ।
  • एम्पेरुमान् के आदेश के अनुसार, देव पेरुमाळ के प्रति वरदराज स्तव गाते हैं और अपने सभी सम्बंधी के लिए मोक्ष की माँग करते हैं – विशेष रूप से नालूरान् (जो उनके आँख खोने में प्रमुख पात्र थे) । कुल मिलकर, पाँच स्तव जो वेद-रस से पूर्ण हैं उनकी रचना करते हैं – श्री वैकुण्ठ स्तव , अति मानुष स्तव , सुन्दर बाहु स्तव , वरदराज स्तव और श्री स्तव ।
  • एम्पेरुमानर् इन्हें श्री रङ्गम् में पौराणिक कैङ्कर्य करने में नियुक्त करते हैं और उनके समय में अपने सम्प्रदाय के ग्रन्थ निर्वाही (कालक्षेपाचार्य) के रूप में सेवा करते थे ।

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    आळ्वान् अपने सुपुत्रों – पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर क साथ

  • श्री रङ्गनाथजी से महा प्रसाद प्राप्त करते हैं और प्रसाद पाने से उन्हें दो सुन्दर शिशु जन्म होते हैं । उन्हें पराशर और वेद व्यास भट्टर का नामकरण करते हैं ।
  • अरुळिचेयळ अनुभव में इतने मस्तमञ्जक होते थे कि जब कभी भी उपन्यास शुरू करते हैं, वह अनुभव से अपने आँखों में आसु भर देते थे या वह मूर्छित हो जाते थे ।
  • पेरिय पेरुमाळ इनसे वार्तालाप करते थे ।
  • आखिर में पेरिय पेरुमाळ से मोक्ष की प्रार्थना करते हैं और पेरिय पेरुमाळ उनकी विनती को स्वीकार करते हैं ।एम्पेरुमानार् उनसे पूछते हैं “कैसे आप मेरे से पहले जा सकते हैं ? ” उत्तर देते हुए कहते हैं “तिरुवाय्मोळि के शूळ विसुम्बणि मुगिळ के अनुसार जब एक जीवात्मा परम पद प्रस्थान होता हैं तब नित्य और मुक्त आत्मा स्वागत करते हुए उनकी पाद-पूजन करते हैं । आप मुझसे ऐसा पेश आना इससे मै असहमत हूँ । इसीलिए मैं आपसे पहले निकल रहा हूँ । “
  • कूरत्ताळ्वान् की वैभवता के बारे में और उनके जीवन के अनेक संघठन (ऐदिह्यम् ) व्याख्यन और गुरु परमपरा में विवर्णित है ।
  • क्या कूरत्ताळ्वान् की वैभवता को इस एक पृष्ठी में लिख सकते हैं ? बिल्कुल नहीं, अपितु यह हमारी अशक्तता है कि इनकी वैभवता जो असीमित है , इस एक पृष्ठी में लिख रहे हैं ।

कूरत्ताळ्वान् का तनियन

श्रीवत्स चिह्न मिश्रेभ्यो नम उक्तिम दीमहेः।
यदुक्तयः त्रयि कण्ठे यान्ति मङ्गल सूत्रताम् ।।

मैं श्री कूरत्ताळ्वान् का नमन करता हूँ, जिनके पाँच स्तव वेदों के मङ्गल सूत्र के समान है और जिनके ज्ञान के बिना परदेवता के बारे में स्पष्टता नहीं मिलती।

आळ्वान् की महत्त्वता (श्री उ. वे. वेळुक्कुड़ी कृष्णन् स्वामी आळ्वान् के १००० साल के उत्सव के अवसर पर प्रसङ्गित उपन्यास पर आधारित – मूल रूप http://koorathazhwan1000.webs.com/ में प्रचुरित किया गया है )

अर्वान्चो यत् पद सरसिज द्वन्द्वम् आस्रित्य पूर्वे ।
मूर्द्ना यस्यान्वयम् उपगता देसिका मुक्तिमापुः।।
सोयम् रामानुज मुनिर् अपि स्वीय मुक्तिम् करस्ताम्।
यत् सम्भन्दाद् अमनुत कटम् वर्नयते कूरनाथः।।

सीमित शब्दों से कैसे हम कूरत्ताळ्वान् की वैभवता के बारे में लिख सकते हैं (मोळिऐ कडक्कुम् पेरुम् पुघळान / वाचा मागोचर ) ? एम्पेरुमानार् सम्बन्धि होने के नाते सभी को मोक्ष प्राप्त होगी , कुछ लोगों को (जो एम्पेरुमानार् से भी बुज़ुर्ग हैं ) उनको तिरुमुडि (सिरस्) सम्बन्ध से और दूसरों को (जो एम्पेरुमानार् के बाद में पैदा हुए) उनके तिरुवडि (श्री पाद पद्म) सम्बन्ध से । ऐसे एम्पेरुमानार् खुद ऐलान करते हैं कि कूरत्ताळ्वान् के सम्बन्ध से ही उनको मोक्ष प्राप्त होगी ।

एम्पेरुमानार् के प्रधान शिष्यों में से कूरत्ताळ्वान् एक हैं । काञ्चीपुरम के कूरम् गाँव में एक सज्जन कुटुंब में इनका जन्म हुआ था। इन्हें श्री वैष्णव आचार्य के प्रतीक माना जाता है । आप श्री, तीन विषयों का घमंड न होने के कारण आप सुप्रसिद्ध एवं सर्वज्ञात हैं (अर्थात् अपने पढ़ाई यानि ज्ञान पे, एवं धन पे और कुल पे गर्व करना) । तिरुवरङ्गतु अमुदनार रामानुज नूट्रन्दादि में आप श्री की प्रशंसा करते हुए गाते हैं “मोळिइयै कडक्कुम् पेरुम् पुगळान् वन्झ मुक् कुरुम्बाम् कुळियै कडक्कुम् नम् कूरत्ताळ्वान् ” और यतिराज विंशति में मणवाळा मामुनि ने “वाचामगोचर महागुण देशिकाग्र्य कूराधिनाथ” कहके कीर्तन किया है अर्थात् यहाँ सूचित करते हैं कि उनकी वैभवता शब्दों के अतीत है । असल में एम्पेरुमानार् की कीर्तन करने के लिए रामानुज नूट्रन्दादि और यतिराज विंशति स्तोत्र हैं ।

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में एम्पेरुमानार् प्रधान आचार्य हैं । यह श्री सम्प्रदाय, सनातन धर्म जो चित – आत्मा , अचित – द्रव्य पदार्थ और ईश्वर – परमात्मा तत्व का असीमित ज्ञान का भाण्डागार है, इसको यथारूप मे प्रतिनिधित्व करता है । एम्पेरुमानार् ने इस सार्वभौमिक धर्म को देश भर में प्रचार किया है । आप श्री दिव्य एवं अलौलिक असाध्य व्यक्तिगत स्वरूप वाले व्यक्ति है और आपने अनेक भूमिका निभाई जैसे – प्रचारक ,मन्दिर व्यवस्थापक, समाज सुधारक, मानवतावादी इत्यादि । वेद, वेदान्त, भगवत गीता, शरणागति शास्त्र (भगवान पे पूरी तरह से निर्भर होकर शरण पाना), वैदिक अनुष्ठान के अनेक अंश विवरण करते हुए ९ ग्रन्थ की रचना किया है ।

एम्पेरुमानार् श्री पार्थसारथी मंदिर से बहुत नज़दीकी तौर से झुड़े हुए थे । आप श्री के पिता श्री ने तिरुवळ्ळिकेनी के मूल मूर्ति श्री वेङ्कट कृष्णनन्/ श्री पार्ध सारथी के प्रार्थना के फल स्वरूप में एम्पेरुमानार् का जन्म हुआ । यह दिव्य देश १०८ दिव्य देशों में से एक है जिसका मङ्गलाशासन पेयाळ्वार , तिरुमळिसै आळ्वार और तिरुमँगै आळ्वार ने  किया है ।

गीताचार्य और आळ्वान् १ 

श्री पार्थ सारथी जो गीताचार्य हैं ने अर्जुन को भगवद् गीता प्रदान किया है । यह ग्रन्थ सनातन धर्म और विशेष तौर श्री कृष्ण की बोली होने के कारण श्री वैष्णवों के लिये सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है ।

श्री भगवद् गीता के १३ आध्याय में , क्षेत्र(शरीर) और क्षेत्रज (शरीर के ज्ञाता – आत्मा ) का अंतर समझाते हैं । उपदेश के अंतर्गत , भगवान के बारे में ज्ञात व्यक्ति के २० गुणों का वर्णन करते हैं । कूरत्ताळ्वान् के जीवन में यह सारे गुण अद्भुत रूप से प्रकाशित होते हैं । आईये एकेक करके कृष्ण भगवान से वर्णन किये गए इन गुणों को कूरत्ताळ्वान् के जीवन में से विशिष्ट उदहारण से देखें।

श्री भगवद् गीता – १३ अध्याय – ७-११ श्लोक

अमानित्वम् अडम्भित्वम् अहिंसा शान्तिर् आर्जवम् |
आचर्योपासनम् सौचम् स्थैर्यम् आत्म-विनिग्रहः ||

इन्द्रियार्तेशु वैराग्यम् अनहंकार एव च |
जन्म मृत्यु जरा व्याधि दुख दोशानुदर्शनम् ||

अशक्तिर् अनभिस्वङ्गः धार गृहादिषु |
नित्यम् च साम चित्तत्वम् इश्ठानिश्ठोपपत्तिसु ||

मयि चानन्य योगेन भक्तिर् अव्यभिचारिणि
विविक्त देश सेवित्वम् आरतिर् जन सम्सदि ||

अध्यात्म ग्यान नित्यत्वम् तत्त्व ग्यानार्थ् दर्शनम् |
एतत् ज्ञानानं इति प्रोक्तम् अज्ञानानम् यद् अतो अन्यथा ||

1. अमानित्वम् – विनम्रता

  • सज्जन और आलिशान घराने में पैदा होने के बावज़ूद श्री रङ्गम् में एम्पेरुमानार् की सेवा करने के लिए अपना सर्वस्व छोड़ दिया ।
  • श्री रङ्गम् में एकानक समय एम्पेरुमानार् पेरिय नम्बि से विनती करते हैं कि वे एक मुट्ठी भर रेत को मन्दिर के आस पास चारों ओर छिड़के ताकि दुष्ट शक्तियों से मन्दिर की रक्षा हो । पेरिय नम्बि किसीको अपने संगत ले जाने की सोचते हैं लेकिन एक शर्त लगाते हैं कि वह व्यक्ति बहुत ही विनम्र होना चाहिए – जो एक क्षण भी दूसरे व्यक्ति का अनुगमन के बारे में नहीं सोचेगा । कृपया आप कूरत्ताळ्वान् को भेजे क्यूँकि उनके अलावा और कोई भी दूसरा व्यक्ति विनम्र नहीं हो सकता ।

 2. अडम्भित्वम् – गर्वहीनता

  • बोधायन वृत्ति ग्रन्थ (ब्रह्म सूत्र का संक्षिप्त उपन्यास) हासिल करने के लिए श्री रामानुज के साथ कश्मीर जाते हैं और ग्रन्थ प्राप्त कर लौटते हैं । उस समय एम्पेरुमानार् के प्रति द्वेष भाव रहने वाले कुछ स्थानिक पण्डित उनसे ग्रन्थ छीन लेते हैं । एम्पेरुमानार् निराश होते हैं और सदमे में चले जाते हैं | तदनन्तर उन्हें आप श्री दिलासा देते हैं कि रात में उनकी सेवा करने के बाद ग्रन्थ को कण्ठस्थ किया है और चिन्ता करने की कोई बात नहीं है । इस संगठन में किञ्चित मात्र भी आप श्री ने गर्व नहीं दिखलाई ।

3. अहिंसा

  • एक बार साँप से शिकार हुयी एक मेंढक की ध्वनि को सुनते हैं । उस नादान प्राणी के बारे में सोचकर , रोते हैं और मूर्छित हो जाते हैं । इस दृष्टान्त से, वे सभी प्राणियों के प्रति अपने प्रेम-भावना को व्यक्त करते हैं। यह स्वयं श्री राम के अवतार माने जाते हैं जो वाल्मीकि रामायणं के अनुसार अयोध्या में अगर कुछ अशुभ सम्भव होता है , घटित व्यक्ति से पहले श्री राम रो पड़ते थे और अगर कुछ शुभ कार्य होता है , तब भी उस शुभ सम्भावित व्यक्ति से पहले श्री राम खुश होते थे ।

4. क्षान्ति – सहनशीलता

  • श्री तिरुकोष्ठियूर् नम्बि से एम्पेरुमानार् श्री भगवद् गीता चरम श्लोक का अर्थ सीखते हैं । श्री तिरु कोष्ठियूर् नम्बि सलाह देते हैं कि उनके शिष्य को सिखाने के लिए शिष्यों की कठिन परीक्ष करके ही शिक्षा दी जाय । जब कूरत्ताळ्वान् अर्थ सिखाने के लिए पूछते हैं तब एम्पेरुमानार् उनसे उनकी निष्टा का उदाहरण देने के लिए पूछते हैं और कूरत्ताळ्वान् उनके मठ के सामने पूरे एक महीने तक उपवास करते हैं । अंत में इनकी प्रतीक्षा का फल पाकर अर्थ प्राप्त करते हैं ।
  • शैव राजा के महल में आप श्री आँखों को खो जाने में मुख्य पात्र नालूरान् को क्षमा करते हैं और राजा को मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रार्थन करते हैं ।

5.  आर्जवम् – सच्चापन

  • कुछ समय तक भगवद् विषय पर तिरुवरङ्गत् अमुदनार् को उपन्यास करने के बाद , जब उन्होंने शिष्य बनने की इच्छा प्रकट किया, तब एम्पेरुमानार् के श्री चरण पाने के लिए सूचित किया।
  • पिळ्ळै पिळ्ळै आळ्वान् को उपदेश करने के बाद , सदा एम्पेरुमानार् पर निर्भर होने के लिए कहते हैं ।

6.  आचार्य उपासनम् – सदा आचार्य पर निर्भर रहना

  • जब श्री रङ्गम् में जीवन बिताने वाले एक गूँगे और बहरे व्यक्ति पर एम्पेरुमानार् अपना श्री चरण का स्पर्श कराते हैं , तब कूरत्ताळ्वान् रो पड़ते हैं और कहते हैं कि वेद सीखने से कुछ भी प्रयोजन नहीं हैं क्यूँकि एम्पेरुमानार् के श्री चरण पाना ही परम उपेय है । “त्रुणि क्रुत विरिन्चादि निरंकुश विभूतयः रामानुज पदाम्भोज समाश्रयण शालिन:” भी इसी अर्थ को सूचित करता है ।

7.  शौचम् – निर्मलता – बाहर की और अंदर की

यह ज़ाहिर है कि इतने महान व्यक्ति बाहर से स्वछ होंगे , नीचे दिया गया उदहारण आप श्री के ह्रदय की निर्मलता / शुद्धता को बताता है ।

  • जब शैव राजा के हरखतों के कारण एम्पेरुमानार् श्री रङ्गम् छोड़कर मेलकोटे निकल गए तब कूरत्ताळ्वान् श्री रङ्गम् में ही रहे । एक दिन , मन्दिर के अन्दर जाते समय , रक्षक भट उन्हें टोक कर कहता है “राजा ने आज्ञा दिया है कि एम्पेरुमानार् के सम्बन्धी को आलय में प्रवेश नहीं है ” । उसी समय दूसरा रक्षक भट कहता है की “कूरत्ताळ्वान् सद् गुणों के सम्पन्न हैं , इसीलिये हमें उन्हें जाने देना चाहिए ” यह सुनकर कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं “अगर मुझ में कुछ सद् गुण हैं वह केवल एम्पेरुमानार् के सम्बन्ध से ही है ” और आलय प्रवेश किये बिना वहाँ से निकल पड़ते हैं । इनका ह्रदय इतना निर्मल है की अगर कोई इन्हे स्वतः महान व्यक्ति माने , वे नहीं मानते हैं चाहे वह बात श्री रंगनाथ की दर्शन के लिए भी क्यों न कहा हो ।

8.  स्थैर्यम् – दृढ़ता

  • कुछ भक्त आप श्री से पूछते हैं कि क्यों श्री वैष्णव अन्य देवी-देवताओं का पूजन नहीं करते ? कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं कि यह इसलिए क्यूँकि हमारे पूर्वज (पूर्वाचार्य – महान वेद विद्वान ) नहीं करते थे, हम भी नहीं कर रहे हैं । इन्हे अपने पूर्वाचार्य के श्रीवचनों और अनुष्ठान मे ऐसी अटल दृढ़ता और अचञ्चल विश्वास था ।

9.  आत्मा विनिग्रहा – वैराग्य

  • जब आप श्री के पुत्र कल्याण प्राय में आते हैं तब आप श्री की पत्नी और कई और उन्हें वधु ढूढ़ने के लिए कहते हैं । कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं की “ईश्वर कुटुम्बत्तुक्कू नम् यार् करैवतु ” माने “भगवान के कुटुम्ब के बारे में मैं क्यों आलोचना करूँ । यह श्री रंगनाथ की जिम्मेदारी है । “
  • जब एम्पेरुमानार् उनसे काँचीपुरम् के देव पेरुमाळ से प्रार्थना करके अपने आँखों की माँग करने के लिए कहते हैं तब कूरत्ताळ्वान् खुद को और नालूरान जो आप श्री के आँखों को खो देने में मुख्य पात्र थे उनको मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना की ।

10.  इन्द्रिय – अर्थेसु वैराग्य – इन्द्रियों के मामले में सन्यास

  • जब तिरुवरङ्गत् अमुदनार् कूरत्ताळ्वान् को अपना सारा धन देते हैं तब कूरत्ताळ्वान् उसे सड़क पर फ़ेंक देते हैं और एम्पेरुमानार् से कहते हैं कि अनावश्यक चीझों से छुटकारा पा लिया है ।

11.  अहँकार – झूठा अहंकार रहित

  • महान पंडित और धनवान होने के बावज़ूद , जब एम्पेरुमानार् उनसे श्री भाष्यम् लिखने के समय नाराज़ होते हैं , तब कूरत्ताळ्वान् कहते हैं “एम्पेरुमानार् मेरे स्वामी हैं और उनका मैं दास हूँ , इसी लिए मेरे साथ वह कुछ भी कर सकते हैं “

12.  जन्म-म्रुत्यु-जर-व्यधि-दुख-दोषानुदर्शनम् – निरंतर सँसार में दोष ढूंढना

  • एक बार एक शिशु के जन्म के बारे में सुनते हैं और कूरत्ताळ्वान् श्री रंगनाथ के पास जाकर रोते हैं । जब उनकी आसुँ का कारण पूछते हैं तो वे जवाब देते हैं कि “जब किसीको संसार के इस कैदखाना में डाल दिया जाय उन्ही के पास जाकर प्रार्थना करना चाहिए जो इस बन्दीखाने से छुटकारा दिला सके । क्यूंकि भगवान श्री रंगनाथ ही हैं जो हमें इस संसार से विमुक्त कर सकते हैं , इस शिशु के लिए मैंने उनके पास जाकर विनती की “।

13.  अशक्तिर् – अलगाव

  • जब एम्पेरुमानार् के शरण पाने के लिए श्री रङ्गम् निकलते हैं और जँगल के रास्ते चल रहे थे , कूरत्ताळ्वान् की देवी चिन्ताग्रस्त थी । उनकी चिंता का कारण पूछने पर बताती है कि नित्य कूरत्ताळ्वान् प्रसाद पाने का एक सोने का पात्र अपने साथ लेकर आई है । यह सुनते ही कूरत्ताळ्वान् उनसे पात्र छीनकर दूर फ़ेंक देते हैं और कहते हैं कि जब एम्पेरुमानार् और श्री रंगनाथ जी हैं तब इस पात्र की क्या आवश्यकता है । इससे यह पता चलता है कि इन में लेश मात्र भी लौकिक विषयों पे लगाव नहीं था ।

14.  पुत्र, धार, ग्रुह-आदिसु अनभिस्वन्गह् – पुत्र , धर्मपत्नी , ग्रुह से अलगाव

  • अपना सारा धन त्याग करके , श्री रङ्गम् पहुँचने के बाद बिक्षा वृत्ति स्वीकृत किया । अपना परिवार होने के बाद भी , शास्त्र के आचरण में बहुत अनुशासित थे ।
  • रहस्य त्रय (तिरुमंत्र , द्वय मन्त्र , चरम श्लोक ) के बारे में अपने शिष्यों को निर्देश देते समय , अपने संतान को उधर से निष्क्रम होने के लिए कहते हैं – लेकिन उन्हें वापस बुलाकर , रहस्य अर्थ का बोध करते हैं । किसीने इसके बारे में पुछा तो , आप श्री कहते हैं “भला कौन जानता है कि यह कितने दिन जीवित रहेंगे , घर पहुँचने से पहले ही इनकी मृत्यु हो सकती है , इसी कारण , मैं ने सुनिश्चित किया है कि रहस्य त्रय का अर्थ वे सीखे “। इस संघटना से पता चलता है कि , अपने संतान के प्रति आप शिर भावुक नहीं थे , लेकिन उन्हें भी आत्मा के रूप में देखते थे जो ज्ञान प्राप्त करके इस संसार से मुक्ति प्राप्त करें ।
  • यह भी कहा जाता है कि , अपनी पत्नी से कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं था और श्री रंगनाथ जी की प्रसाद से ही इन्हें सन्तान (वेद व्यास और पराशर भट्टर ) प्राप्त हुई ।

15.  इष्ठा अनिष्ठा उपपत्तिसु नित्यं सम चित्तत्वम् – सुख – दुःख में सम भावना

  • आप श्री ने अपने आँखों को त्यागने के बाद कुछ चिंता प्रकट नहीं किया । कहते हैं “जब भगवद् विरोधी के दर्शन करने के बाद यह आँखों क्या का प्रयोजन है ?” जब एम्पेरुमानार् श्री काँची वरद राजा से अपने आँखों को अनुग्रह करने की प्रार्थना करने के लिए कहते हैं , आप श्री खुश नहीं थे – कहते हैं “मैं एम्पेरुमानार् और एम्पेरुमान् को अपने अंतर दृष्टी से देख रहा हूँ | यह बाह्य आँखों की अब क्या ज़रूरत है? “

16.  मई अनन्य – योगेन भक्ति अव्यभिचारिनि – निरंतर श्री कृष्णा पे ध्यान करना

  • आँखों को खो देना, श्री रङ्गम् छोड़ना इत्यादि कई प्रतिकूल परिस्थितियों एवं अनुकूल सर्वावस्थितियों में भी निरंतर एम्पेरुमान् का सदैव ध्यान करने की प्रार्थना करते थे । कभी भी किसी और के पास नहीं गए न ही एम्पेरुमान् के अलावा किसी और चीज़ के लिए प्रार्थना किया ।

17.  विविक्त देश सेवित्वम् – विशेष स्थान में निवास करना

  • एक श्री वैष्णव के लिए विशेष स्थान में निवास करना मतलब उधर निवास करें जहाँ सिर्फ एम्पेरुमान् (भगवान) की सेवा होती है । कूरत्ताळ्वान् अपने आचार्य एम्पेरुमानार् के साथ रहते थे और सर्वदा एम्पेरुमान् और एम्पेरुमानार् की सेवा करने की ध्यान करते थे ।

18.  अरति: जना सम्सदी – सामान्य व्यक्तियों से अलगाव

  • महान भक्त सामान्य प्रजा से जुटने के बाद भी उनके प्रति अलगाव प्रदर्शन करते हैं । जब आप श्री को राजा जो इनसे उपदेश पाते थे और इत्यादि सामान्य जन से मिलना पड़ा तब भी किञ्चित मात्र भी लगाव का प्रदर्शन नहीं किया ।

19.  अध्यात्म ज्ञान नित्यत्वम् – अनन्त आत्मा ज्ञान के विषय में

  • बहुत कम उम्र से ही कूरत्ताळ्वान् आत्मा ज्ञान के प्रति आसक्त थे और आप श्री के चाल चलन में यह ज्ञान – सभी जीवात्मा परमात्मा के शेष भूत हैं – स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।

20.  तत्व – ज्ञान अर्थ चिन्तनम् – सच्चे ज्ञान की ध्यान करना

  • सभी जीवात्मा श्रीमन्नारायण के शेष भूत हैं इस सच्चे ज्ञान पे निरंतर ध्यान करते थे । इसी कारण जब आप श्री परम पद प्रस्थान हुए , तब एम्पेरुमानार् श्री वैष्णव को आज्ञा देते हैं कि कूरत्ताळ्वान् के कानों में द्व्य महा मन्त्र का उच्चारण करें क्यूँकि उसी मन्त्र के बारे में वे निरन्तर ध्यान करते थे ।

समापन
यह आश्चर्य का विषय है कि इतने सारे अद्भुत गुण एक ही व्यक्ति में समेटे गए हैं । इसी लिए पेरिय वाच्छान पिळ्ळै मणिक्क माला में कहते हैं “आचार्य और शिष्य के गुण कूरत्ताळ्वान् में प्रकाशित है “। आईये हम भी आप श्री से कुछ सीख पाकर अपने जीवन में लागू करके कूरत्ताळ्वान् और पूर्वाचार्य को प्रसन्न करें ।

source

अड़ियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

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तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

thiruvarangaperumal-arayar

श्री रङ्गम -तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर्

तिरुनक्षत्र: वैशाख मास ज्येष्ठ नक्षत्र
अवतार स्थल: श्री रङ्गम
आचार्य: मणक्काळ नम्बि , आळवन्दार्
शिष्य: एम्पेरुमानार्(ग्रन्थ कालक्षेप शिष्य )
परमपद(वैकुण्ठ)प्राप्ति स्थल: श्री रङ्गम

तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् आळवन्दार् के सुपुत्र और उनके शिष्य गण में मुख्य थे । अरैयर् संगीत ,नृत्य और नाटक के महान कोविद थे । अध्ययन उत्सव के अरैयर् सेवा में, नम्पेरुमाळ के उपस्तिथि में, तिरुवायमोळि(१०.२) के “केडुमिडर् ” पदिग का गान कर रहे थे । उस समय में गोष्टी के नेता आळवन्दार् की ओर देखते हुए “नडमिनो नमर्गळउळ्ळिर् नामुमक्कु अरिय चोणोम्” का गान करते हैं अर्थात् “मेरे प्यारे भक्तों , इसी वक्त तिरुवनन्तपुरम जाईये “। आळवन्दार् इसे नम्पेरुमाळ का सन्देश मानते हैं और तिरुवनन्तपुरम के अनन्त शयन पेरुमाळ को मंगलाशासन करने के लिए निकल पड़ते हैं । आळवन्दार् के अन्तिम काल में बताई गई बातों से पता चलता है कि अरैयर् को तिरुप्पाणाळ्वार के प्रति बहुत लगाव था । तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् को पेरिय पेरुमाळ और तिरुप्पाणाळ्वार के प्रति अत्यन्त भक्ति थी और इसी कारण अपने आख़री समय आळवन्दार् सभी लोगों को उनके प्रति लगाव बढ़ाने की सलाह  देते हैं । इनकी ऐसी महानता है कि स्वयं आळवन्दार् ने सभी के समक्ष इनकी प्रशंसा की है । श्री रामानुज स्वामी जी का श्रीरङ्ग में आगमन के पीछे आप श्री ने एहम भूमिका निभाई है। आळवन्दार् के समय के बाद और एम्पेरुमानार् सन्यास आश्रम ग्रहण करने के बाद , श्रीरङ्गम के सभी श्री वैष्णव नम्पेरुमाळ से प्रार्थना किया करते थे कि श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीरङ्गम ले आये और तदनंतर इस क्षेत्र में उनके नित्य निवास की व्यवस्था करे । पेरिय पेरुमाळ तुरन्त देव पेरुमाळ से विनती करते हैं कि श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीरङ्गम भेजे । श्री रामानुज उनके बहुत प्रिय होने के कारण पेररुळाळन उनकी विनती इन्कार कर देते हैं । उस समय पेरिय पेरुमाळ एम्पेरुमानार् को श्रीरङ्गम लाने के लिए एक विशेष योजना बनाते हैं । अरैयर से कहते हैं की पेररुळाळन को संगीत और स्तोत्र बहुत पसन्द है और जब प्रसन्न होंगे तब कुछ भी देंगे । इस प्रकार अरैयर को आदेश देते हैं कि पेररुळाळन को प्रसन्न कर उनसे एम्पेरुमानार् को प्रसाद के रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना करें |

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अरैयर् उसके बाद काँचीपुरम की ओर निकलते हैं । वहाँ वरम् तरुम् पेरुमाळ अरैयर् (स्थानीय अरैयर् ) उन्हें गौरव-मर्याद से स्वागत करके उन्हें अपने तिरुमालिगै को ले जाकर उनकी अच्छी देख-भाल करते हैं । उसके अगले दिन, अरैयर् का आगमन सुनकर तिरुकच्चि नम्बि उनसे मिलकर, प्रणाम समर्पण कर उनका सुःख-दुःख विचार करते हैं । अरैयर् नम्बि से उन्हें देव पेरुमाळ का मंगलाशासन करने की विनती करते हैं (यह परम्परां है कि जो कोई भी दिव्य देश दर्शन करने जाते हैं तो उस दिव्य-देश के स्थानीय श्री-वैष्णव के द्वारा ही दिव्य-देश के एम्पेरुमान् का दर्शन सेवा करते हैं ।) नम्बि उनकी विनती को स्वीकृत करते हैं और अरैयर् देव पेरुमाळ के दर्शन कर प्रणाम करते हुए कहा – “कधा पुनस् शङ्ख रथाङ्ग कल्पक ध्वज अरविन्द अङ्गुच वज्र लाञ्चनम् ; त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्भुज द्वयम् मदिया मूर्द्धनम् अलङ्करिष्यति ” मतलब “ओह त्रिविक्रम ! शंख , सुदर्शन चक्र ,कल्पक वृक्ष,कमल इत्यादि दिव्य चिन्हों से प्रकाशित चरण कमल कब मेरे सिर को अलंकृत करेंगे”। अपने अर्चक के द्वारा एम्पेरुमान् उन्हें तीर्थं, प्रसाद और श्री शठगोप इत्यादि प्रसाद करते हैं और उन्हें अपने सामने अरैयर सेवा करने का आदेश देते हैं। अरैयर् उत्कृष्ट भक्ति और  प्रेम से अनेकानेक श्लोक, आळ्वार् के श्री सूक्त से अभिनय पूर्वक गान करते हैं । एम्पेरुमान् बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और अनेक भेंट प्रसादित करते हैं । अरैयर् उन भेंट को निराकर करते हैं क्यूँकि देव पेरुमाळ ही हैं जो सभी के इच्छाओं की पूर्ति करते हैं , एम्पेरुमान् उनकी भी इच्छा पूर्ती करेंगे । एम्पेरुमान् राज़ी होते हैं और कहते हैं “मुझे और मेरी अर्धांगिनी के अलावा जो भी चाहो तुम पूछ सकते हो ।” अरैयर् श्री रामानुज की ओर इशारा करते हैं और उन्हें श्रीरङ्गम् ले जाने की प्रस्तावना करते हैं । देव पेरुमाळ कहते हैं “मैंने नहीं सोचा की आप उन्हें पूछने वाले हैं, कुछ और माँगीये”। अरैयर् जवाब देते हैं “आप दूसरे और नहीं हैं स्वयं श्रीराम के अवतार हैं – आप मेरे विनती को और टाल नहीं सकते हैं “।  देव पेरुमाळ आखिर में उनकी विनती स्वीकार करते हैं और श्री रामानुज को विदा करते हैं । अरैयर् श्री रामानुजर् का हाथ पकड़कर, श्रीरङ्गम् की ओर चल पड़ते हैं, श्री रामानुज आण्डान् और आळ्वान् के मठ जाकर , तिरुवाराधन पेरुमाळ (पेररुळाळन) और आराधन के वस्तु सामग्री लाने को कहते हैं और सब मिलकर देव पेरुमाळ से आज्ञा लेकर श्रीरङ्गम् निकल पड़ते हैं । इस तरह उन्होंने श्री वैष्णव सम्प्रदाय के सबसे प्रधान कैङ्कर्य यानि “श्री रामानुज को श्रीरङ्गम् लाकर, दृढता पूर्वक सम्प्रदाय की स्थापना करने एवं सम्प्रदाय नई ऊँचाईयों को छूने” मे एहम पात्र का पोषण किया । उडैयवर् को पाँच विविध अंश-बोध करने के लिए आळवन्दार् ने अपने पाँच शिष्यों को नियुक्त किया था । पेरिय नम्बि उडैवर् को पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं । पेरिय तिरुमलै नम्बि ने उन्हें श्री रामायण का बोध किया  । तिरुकोष्टियूर् नम्बि ने  तिरुमन्त्र और चरम श्लोक का ज्ञान प्रदान किया । तिरुमलै आण्डान् तिरुवाय्मोळि का अर्थ अनुग्रह किया । तिरुवरंगपेरुमाळ अरैयर् को अरुळिचेयळ और चरमोपायम्(उत्कृर्ष साधन  – आचार्य निष्ट ) का कुछ भाग शिक्ष देने का आदेश आळवन्दार् से प्राप्त हुआ । एम्पेरुमानार् तिरुवाय्मोळि का सारार्थ परिपूर्ण रूप से  तिरुमलै आण्डान् से ग्रहण करते हैं । तत्पश्चात् पेरिय नम्बि उन्हें अरैयर् से सम्प्रदाय का सार ग्रहण करने की आज्ञा देते हैं ।  एम्पेरुमानार् , शास्त्र से नियमित सिद्धान्त का अनुशीलन करते हुए , अरैयर् के पास अध्यायन करने से पहले उनकी शुश्रूषा ६ महीने तक करते हैं । प्रति दिन दूध को उचित उष्ण में प्रस्तुत करते थे और साथ ही आवश्यक अनुसार शरीर पर लगाने के लिए हल्दी का मिश्रण भी तैयार करके देते थे ।

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एकदा एम्पेरुमानार् से तैयार किया गया हल्दी का मिश्रण अरैयर् को पसन्द नहीं आया और उडैयवर् अरैयर् के मुखमण्डल को देखकर, जो असंतुष्टि प्रकट कर रहा था, नापसंदगी का कारण जान गए । उडैवर् तुरन्त हल्दी का दूसरा मिश्रण तैयार करते है जो अरैयर् के मन को अत्यन्त मोहित करता है और तदनन्तर अरैयर् उन्हे चरम उपाय और उपेय अर्थात् “आचार्य कैङ्कर्य” का बोध करते हैं । अरैयर् शिक्षा देते हैं की “आचार्य कोई और नहीं बल्कि एम्पेरुमान् जो क्षीर सागर में शयनित हैं उनका प्रत्यक्ष रूप हैं “।  हमने चर्मोपाय में इसके बारे में चर्चा की हैं ।

कई ऐधियम् (पूर्वाचार्य के निज़ी जीवन में घटित संघटन) में अरैयर् की महानता वर्णित हैं । आईये कुछ यहाँ देखे

१. ईडु व्याख्यान (१. ५. ११ ) “पालेय् तमिळर् इशैकारर्” के विवरण में – ” इशैकारर् ” अर्थात् संगीत विद्वान और नम्पिळ्ळै आळ्वान् को बताते समय तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् को इशैकारर् से सम्बोधित करते हैं ।

२. ईडु व्याख्यान(३.३.१) मे, नम्पिळ्ळै विवरण देते हुए बताते हैं जब अरैयर् “ओळिविळ कालमेलाम्” का गान करते समय, भावुक होकर कालमेलाम्, कालमेलाम्, कालमेलाम्, कालमेलाम् (सारा समय) यह कहते हुए ही पासुर की पूर्ती करते हैं । इस पदिग में, आळ्वार तिरुवेङ्कट अमुदायन् नित्य कैङ्कर्य के लिए प्रार्थना करते हैं और इस पदिग को द्वय मन्त्र के दूसरी पंक्ति (कैङ्कर्य प्रार्थना) का विवरण माना जाता हैं । आईये तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् के श्री चरण कमलों मे प्रार्थना करें कि हम भी उनकी तरह एम्पेरुमान् , आळ्वार  एवं आचार्य के प्रति भक्ति कैङ्कर्य भाव प्राप्त करें ।

तनियन

श्रीराममिश्र पदपंकज संचरीकम् श्रीयामुनार्यवरपुत्रमहंगुणाब्यम् |
स्रीरन्गराज करुणा परिणाम दत्तम् श्रीभाश्यकार शरणम् वररन्गमीडे ||

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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