Monthly Archives: April 2015

तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirukoshtiyur-nambiजन्म नक्षत्र: वैशाख, रोहिणी नक्षत्र

अवतार स्थल: तिरुक्कोष्टियूर

आचार्य: आळवन्दार

शिष्य: रामानुजाचार्य (ग्रन्थ कालक्षेप शिष्य)

पेरियालवार ने अपने पेरियालवार तिरुमोळि 4.4 – “नाव कारियम” दशक में तिरुक्कोष्टियूर दिव्य देश की बड़ी प्रशंसा की है। तिरुक्कुरुगै पिरान, जिनका जन्म इस सुन्दर दिव्य देश में हुआ था, तिरुक्कोष्टियूर नम्बी नाम से प्रसिद्ध हुए और वे आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उन्हें गोष्ठीपूर्ण या गोष्ठीपुरिसर नाम से भी जाना जाता है।

यामुनाचार्यजी ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

तिरुक्कोष्टियूर नम्बी ने रामानुज को “एम्पेरुमानार” नाम से सम्मानित किया क्यूंकि उन्होंने बिना किसी शर्त के चरम श्लोक का अर्थ उन सभी के साथ साझा किया, जो उसे जानने के लिए इच्छुक थे, जो रामानुज के निःस्वार्थ कृत्य को दर्शाता है। नम्बी, आळवन्दार द्वारा सिखाये गए रहस्य त्रय के दिव्य अर्थो का अनुसन्धान करते हुए निरंतर भगवान के ध्यान में रहते थे और किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करते थे। उनके गॉव में कोई उनकी कीर्ति को नहीं जानता था। श्री रामानुज, नम्बी के यश को जानकर चरम श्लोक के अति गोपनीय अर्थ को सीखने के लिए श्रीरंगम से तिरुक्कोष्टियूर १८ बार चल कर गए। अंततः १८वी बार में नम्बी उन्हें चरम श्लोक के अति गोपनीय अर्थ का उपदेश देने का निर्णय लेते हैं । नम्बी श्री रामानुज से वचन लेते हैं की वे किसी भी अयोग्य व्यक्ति या ऐसे अधिकारी जिसने उस गूढ़ रहस्य के अर्थ को जानने के लिए बहुत कठिन प्रयास न किये हो, उसे इस ज्ञान का उपदेश नहीं देंगे। रामानुज उस समय उसे स्वीकार करते हैं और वचन देते हैं । तब नम्बी उन्हें चरम श्लोक का अति गोपनीय ज्ञान सिखाते हैं। गीताचार्य का “सर्व धर्मान परित्यज्य” श्लोक (गीता -18.6) ही चरम श्लोक है। इस श्लोक में “एकम” शब्द के माध्यम से बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत दर्शाया गया है– जिसका आशय है की केवल भगवान ही जीव के लिए उपाय है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी, जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, हमारी स्वयं की प्रपत्ति (समर्पण), आदि वास्तविक उपाय नहीं है। जब यह गोपनीय अर्थ किसी अयोग्य अधिकारी को बताया जाता है तब वह उसका आसानी से अपने कर्तव्यों को न निभाकर दुरूपयोग कर सकता है। इसलिए श्री रामानुज के समय तक आचार्यो ने बहुत सावधानी से उसकी रक्षा की। परन्तु रामानुज ने इस गोपनीय अर्थ को सीखने के तुरंत बाद उन सभी को एकत्र किया जो उस रहस्य को जानने के लिए तत्पर थे और उन्हें विस्तार से चरम श्लोक का अर्थ समझाया। रामानुज के इस रहस्योद्घाटन के बारे में सुनकर नम्बी तुरंत उन्हें बुलवाते हैं। रामानुज जब नम्बी के निवास पर पहुँचते हैं तो नम्बी उनसे उनके इस कृत्य के बारे में पूछते हैं और रामानुज गुरु के आदेश की अवहेलना किये जाने को स्वीकार करते हैं। जब नम्बी उनसे पूछते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो रामानुज कहते हैं, “मैं आपके आदेश की अवहेलना करके नरक में जाऊंगा पर दूसरे बहुत से लोगों को (जिन्होंने चरम श्लोक का अर्थ सुना) मोक्ष प्राप्त होगा और उनका उद्धार होगा”। दुसरो को सच्ची आध्यात्मिक सहायता प्रदान करने वाले, रामानुज के विशाल ह्रदय को देखकर नम्बी अभिभूत हो जाते हैं और उन्हें “एम्पेरुमानार” का विशेष नाम प्रदान करते हैं। एम्पेरुमान् का अर्थ है मेरे स्वामी (भगवान) और एम्पेरुमानार का अर्थ है जो भगवान से भी अधिक दयालु है। इस प्रकार तिरुक्कोष्टियूर में चरम श्लोक के गूढ़ अर्थ का रहस्योद्घाटन करके रामानुज एम्पेरुमानार हो गए। यह चरित्र (दृष्टांत), श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने मुमुक्षुपडि व्याख्यान परिचय के चरम श्लोक प्रकरण (भाग/ खंड) में बहुत स्पष्टता और सुंदरता से समझाया है।

नोट- 6000 पदी गुरु परंपरा प्रभाव में यह बताया गया है कि श्री रामानुज ने तिरुक्कोष्टियूर नम्बी से तिरुमंत्र का अर्थ सीखकर सबको बता दिया और उस वजह से नम्बी ने उन्हें एम्पेरुमानार नाम दिया और फिर बाद में उन्होंने चरम श्लोक का अर्थ सीखा। परन्तु वरवरमुनि स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से समझाया है कि जो एम्पेरुमानार द्वारा उद्घोषित हुआ था वो चरम श्लोक था और इस व्याख्यान के और भी दृष्टांतो (घटनाओं) से यह उपयुक्त लगता है। क्यूंकि चरम श्लोक के “एकम” शब्द को बहुत गोपनीय सिद्धांत घोषित किया गया है, हम उसे प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं (जैसे आचार्यो से सुना है)।

व्याख्यान में अनेको स्थानों पर नम्बी के यश को दर्शाया गया है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं:

  • नाच्चियार तिरुमोळि 12.2 – पेरियावाच्चन पिल्लै व्याख्यान
    • यहाँ आण्डाल (गोदा) को नम्बी के समान बताया गया है। जिस तरह से नम्बी अपने भगवद अनुभव किसी और से व्यक्त नहीं करते थे ठीक उसी तरह ऐसा कहा जाता है की आण्डाल भी भगवान से वियोग की पीड़ा किसी से प्रकट नहीं करती थी।
    • तिरुक्कोष्टियूर के स्थानीय निवासी नम्बी की वास्तविक महानता को तब तक नहीं जान पाये जब तक रामानुज वहां नहीं पहुंचे थे। जब रामानुज तिरुक्कोष्टियूर पहुंचे उन्होंने तिरुक्कुरुगै पिरान (नम्बी का वास्तविक नाम जो नम्मालवार के नाम पर था) के निवास के बारे में पूछा और उनके निवास की दिशा की ओर नीचे लेटकर दंडवत प्रणाम किया। जिनकी पूजा स्वयं रामानुज करते हैं, ऐसे नम्बी की कीर्ति को स्थानीय लोग तब समझ पाये।
    • यह दर्शाया गया है की दाशरथि स्वामीजी और कूरेश स्वामीजी दोनों ने सम्प्रदाय के बहुमूल्य अर्थो को समझने के लिए 6 महीने नम्बी के चरण कमलों कि सेवा की।
  • तिरुविरुथ्थम 10 – नमपिल्लै स्वउपदेश – हर बार जब नम्बी श्रीरंगम आते थे, उनके लौटने पर एम्पेरुमानार उन्हें विदा करने के लिए मारच्चिप्पुरम (श्रीरंगम के पास एक स्थान) तक उनके साथ जाते थे। एक समय नम्बी के लौटने पर एम्पेरुमानार उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें ऐसी आज्ञा दे जिस पर वो आश्रय कर सके। नम्बी कहते हैं – जब आळवन्दार नदी में नहाते हुए डुबकी लगाते थे, तब उनके पीठ का ऊपर का भाग कूर्मासन के पीठ के समान दिखाई देता था (एक आसन जो कछुए के कवच की तरह दिखता है)। आळवन्दार के परमपद गमन के बाद भी मैं आळवन्दार की पीठ के उसी दृश्य का नित्य ध्यान करता हूँ। तुम भी उसी पर भरोसा करो। इस घटना से नम्बी दर्शाते हैं की शिष्य को आचार्य के प्राकृत शरीर (दिव्य स्वरुप) पर वैसा ही लगाव होना चाहिए जैसा की उनके निर्देशो और ज्ञान के प्रति है।
  • तिरुविरुथ्थम 99 – पेरियावाच्चन पिल्लै व्याख्यान – आलवार कहते हैं कि वे ज्ञानापिरान को ही एकमात्र उपाय स्वीकार करते हैं । यह चरम श्लोक के “एकम” शब्द को समझाता है जो अन्य उपयो को अलग करके यह स्थापित करता है कि भगवान ही एकमात्र उपाय है। यह हमारे संप्रदाय का बहुत ही गोपनीय सिद्धांत है जो नम्बी ने रामानुज को सिखाया था। एकबार उत्सव के लिए श्रीरंगम पधारे नम्बी, रामानुज को श्रीरंगम मंदिर में एक एकांत स्थान पर बुलाते हैं और “एकम” शब्द के अर्थ समझाना शुरू करते हैं । लेकिन तभी वे खर्राटे लेते हुए गहरी नींद में सोये हुए मंदिर के एक कैंकर्यपरार को देखते हैं और यह कहते हुए कि यहाँ कोई है, तुरंत अर्थ की व्याख्या करना छोड़ देते हैं। परन्तु फिर बाद में वह एम्पेरुमानार को अर्थ का उपदेश देते हैं और उन्हें यह निर्देश भी देते हैं की वे उस अर्थ को केवल योग्य व्यक्ति को ही बताये। उसी समय तपते सूरज और चमकती दोपहर में दौड़ते हुए एम्पेरुमानार, कूरेश स्वामीजी के निवास जाते हैं और उन्हें यह गोपनीय अर्थ बता देते हैं। इसप्रकार कूरेश स्वामीजी द्वारा कोई विशेष प्रयास न होने पर भी उन्हें अर्थ समझाकर एम्पेरुमानार ने “सहकारी निरपेक्ष्यता” का प्रमाण दिया है (हमारे उद्धार के लिए हमारी ओर से किसी भी कार्य की आशा ना करते हुए, स्वयं कृपा करना)।
  • तिरुविरुत्तम् 95 – इस पासूर (याथानुम ओर् आक्कैयिल् पुक्कु पासूर) के व्याख्यान में, यह बताया है कि नम्बी के एक शिष्य नंजीयर को बताते है कि यह पासूर नम्बी का प्रिय पासूर है। इस पासूर में यह दर्शाया गया है कि जीवात्मा भले ही निरंतर लौकिक अनुष्ठानो में संलग्न रहती है पर भगवान फिर भी सदा ही उस पर कृपा करते हैं और उसका कल्याण करते हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 1.10.6 – नम्पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में आलवार अपने ही मन से चर्चा करते हैं। इसके अर्थ को समझाने के लिए नमपिल्लै कहते हैं कि भगवद विषय बहुत उच्च विषय है और हर कोई इसे नहीं समझ सकता। जैसे नम्बी एकांत में इस विषय का चिंतन निरंतर किया करते थे, वैसे ही आलवार भी भगवद विषय की चर्चा स्वयं अपने मन से करते हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 8.8.2 – एक बार एम्पेरुमानार के व्याख्यान में जीवात्मा के स्वरुप (प्रकृति) पर प्रश्न हुआ कि जीवात्मा ज्ञातृत्व (ज्ञानी /जानने वाली) है या शेषत्व (भगवान की सेवक) है? एम्पेरुमानार कूरेश स्वामीजी को निर्देश देते हैं कि वे इस अर्थ को सीखने के लिए नम्बी के पास जाये। कूरेश स्वामीजी तिरुक्कोष्टियूर जाते हैं और 6 महीने तक नम्बी की सेवा करते हैं। अंततः नम्बी अज़ह्वान से उनके आने का उद्देश्य पूछते हैं, तो कूरेश स्वामीजी उन्हें प्रश्न के बारे में बताते हैं। नम्बी कहते हैंआलवार ने “अडियेन उल्लान” के द्वारा जीवात्मा के स्वरुप को प्रमाणित किया है, जिसका तात्पर्य है कि जीवात्मा सेवक है– स्वरुप से भगवान कादास है। कूरेश स्वामीजी पूछते हैं- तो वेदांतम उसे ज्ञातृत्व (ज्ञानी /जानने वाली) क्यों बताती है? नम्बी कहते हैं वो इसलिए क्यूंकि यहाँ जीवात्मा के ज्ञाता होने का आश्रय उसके यह जानने से है कि वह भगवान का सेवक/दास है। इसलिए जीवात्मा का वास्तविक स्वरुप वह है जो आलवार और नम्बी ने बताया है, जीवात्मा वह है जिसे इस बात का ज्ञान है कि वह भगवान का अधीन है।

चरमोपाय निर्णय नाम के दिव्य ग्रन्थ में नम्बी द्वारा एम्पेरुमानार के यश को स्थापित करना विस्तार से बताया गया है। उसे http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html पर देखा जा सकता है।

जब तिरुमालै आण्डान् से हुए किसी मिथ्याबोध में तिरुवाय्मोळि के व्याख्यान को रोक देते है, तब नम्बी उस निर्गम को सुलझाते हैं और तिरुमालै आण्डान् को समझाते हैं कि एम्पेरुमानार एक अवतार पुरुष है जो हर तरह से सुविज्ञ है। वह उनसे आग्रह करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं की कालक्षेप जारी रहे।

एक बार जब कुछ शरारती तत्व एम्पेरुमानार को जहर देते हैं , तब इस बारे में जानकर एम्पेरुमानार उपवास शुरू कर देते हैं और प्रसाद ग्रहण नहीं करते हैं। उस समय नम्बी तिरुक्कोष्टियूर से आते हैंऔर तप्ती दोपहर में कावेरी नदी के तीर पर एम्पेरुमानार उनसे मिलने जाते हैं। एम्पेरुमानार उस तप्ती गर्म रेत पर नम्बी को साष्टांग प्रणाम (दंडवत प्रणाम) करते हैं और नम्बी मौन खड़े रहकर उन्हें देखते रहते हैं । किडाम्बी आच्चान्(प्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी) , जो एम्पेरुमानार के शिष्य थे तुरंत उन्हें गर्म रेत से उठाते हैं और नम्बी के इस कार्य को चुनौती देते हैं। नम्बी कहते हैं कि उन्होंने यह आडम्बर यह जानने के लिए किया कि एम्पेरुमानार के प्राकृत शरीर (दिव्य स्वरुप) पर सबसे ज्यादा लगाव किसको है। तद्पश्चात नम्बी, किडाम्बी आच्चान्(प्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी) को नियमित रूप एम्पेरुमानार के लिए प्रसाद बनाने का निर्देश देते हैं। इस तरह हम देख सकते हैं कि नम्बी एम्पेरुमानार से बहुत प्रभावित थे और हमेशा उनके कल्याण के बारे सोचते थे।

इन सभी द्रष्टांतो के माध्यम से हमने देखा कि नम्बी के कई वैभव हैं और उन्होंने ही रामानुज को एम्पेरुमानार का सुन्दर नाम दिया था। जिसके फलस्वरूप स्वयं नमपेरुमल ने हमारे संप्रदाय को एम्पेरुमानार दर्शन नाम से उध्बोधित किया है, जो स्वामी मामुनिगल ने अपनी उपदेश रत्न माला में बताया है।

हम नम्बी के श्री चरण कमलो में साष्टांग करते हैं , जिनका आळवन्दार और एम्पेरुमानार के प्रति विशेष लगाव था।

तिरुक्कोष्टियूर नम्बी की तनियन

श्रीवल्लभ पदाम्भोज धीभक्त्यामृत सागरं ।
श्रीमद् घोष्टिपूर्ण देशिकेन्द्रम् भजामहे ।।

अडियेन् भगवति रामानुज दासि

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कोयिल् कोमाण्डूर् इळैयविल्लि आच्चान् (श्रीबालधन्वी गुरु)

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

komandur-ilayavilli-achanश्रीबालधन्वी गुरु– सेम्पोंसे कोइल, तिरुनांगूर

तिरुनक्षत्र: अश्लेषा नक्षत्र, चैत्र मास

अवतार स्थल: कोमाण्डूर

आचार्यश्री रामानुज स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: तिरूप्पेरूर

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई (श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के जैसे) थे। उन्हें श्रीबालधन्वी गुरु के नाम से बुलाते थे। इळैयविल्लि / बालधन्वी का अर्थ श्री लक्ष्मणजी है – उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि सेवा की, उसी तरह जैसे श्री लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी कि सेवा की। वह श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा स्थापित ७४ सिंहासनाधिपति में एक हैं।

आपकी तनियन और वाली तिरुनामं से यह सिखा जाता है कि आप श्री शैलपूर्णा स्वामीजी से जुड़े हुए थे और आपने उनकी बहुत सेवा भी की थी।

चरमोपाय निर्णय में श्री नायनाराच्चान् पिल्लै ने श्रीबालधन्वी गुरु (श्री इळैयविल्लि) के महिमा को दर्शाया है। इसे हम अब देखेंगे।

जब श्री रामानुज स्वामीजी परमपद के लिये प्रस्थान किया उनके अनेक शिष्यों ने उनके वियोग में अपने प्राण त्याग दिया। श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान रामानुज स्वामीजी के शिष्य थे, कुछ समय के लिये कैंकर्य हेतु अपने गाँव कणीयनूर में विराजमान थे। कुछ दिनों बाद श्रीरंगम की ओर श्री रामानुज स्वामीजी के पास उनकी सेवा के लिये जा रहे थे। जाते समय रास्ते में किसी श्रीवैष्णव से उन्होंने अपने आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के स्वास्थ के बारे में पूछा। तब श्रीवैष्णव ने श्री रामानुज स्वामीजी के परमपद गमन का समाचार सुनाया। यह सुनते ही उसी क्षण श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान ने “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” (श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविंदोंकि शरण ग्रहण करता हूँ) कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया।

श्री इळैयविल्लि तिरुप्पेरूर में विराजमान थे। एक दिन उनके स्वप्न में श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर आकाश की ओर बढ़ रहे थे। परमपदनाथ भगवान हजारों नित्यसूरीगण, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीनाथमुनी स्वामीजी और अनेक आचार्यागण वाद्य गान करते हुये श्री रामानुज स्वामीजी का परमपद में स्वागत कर रहे हैं। वह यह देख रहे थे श्री रामानुज स्वामीजी का विमान परमपद की ओर प्रस्थान कर रहें हैं और सब उनके पीछे जा रहे हैं। वे  निद्रा से उठे और उनको पता चल गया कि क्या हुआ है। वह अपने पड़ोसी को बताते हैं “वळ्ळल् मणिवण्णं” कि “हमारे आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर परमपद कि ओर प्रस्थान कर रहे हैं और उनके साथ परमपदनाथ और नित्यसुरी भी हैं”। मैं उनकी अनुपस्थिति में यहाँ नहीं रह सकता। “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया। ऐसे अनेक शिष्य थे जो श्री रामानुज स्वामीजी का वियोग सहन नहीं कर सके ओर अपना शरीर त्याग दिया। जो शिष्य श्री रामानुज स्वामीजी के अंतिम समय में उनके साथ थे उनको स्वामीजी ने आज्ञा दिया कि मेरे वियोग में शरीर त्यागना नहीं, आगे तुम लोगों को ही सम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करना है। स्वामीजी की आज्ञा का पालन करते हुये अनेक शिष्यजन कैंकर्य मे लग गये। यहाँ आचार्य के वियोग में शिष्यजन अपना शरीर त्यागते है, यह श्री रामानुज स्वामीजी के वैभव को प्रकाशित करता है।

हमने यहाँ पर श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) के जीवन के कुछ सुन्दर बातें देखी। वह पूरी तरह भागवत निष्ठा में अटल थे ओर स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी को प्रिय थे। हम उनके चरणारविन्द में यह प्रार्थना करते हैं कि हम में भी कुछ भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि ) की तनियन:

श्री कौसिकान्वया महाभूथि पूर्णचन्ध्रम
श्री भाष्यकार जननी सहजा तनुजम
श्री शैलपूर्ण पद पंकज़ सक्त चित्तम
श्री बालधन्वी गुरुवर्यम अहं भजामी

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: https://guruparamparai.wordpress.com/2013/04/03/koil-komandur-ilayavilli-achan/

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