Monthly Archives: April 2015

तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirukoshtiyur-nambiजन्म नक्षत्र: वैशाख, रोहिणी नक्षत्र

अवतार स्थल: तिरुक्कोष्टियूर

आचार्य: आळवन्दार

शिष्य: रामानुजाचार्य (ग्रन्थ कालक्षेप शिष्य)

पेरियालवार ने अपने पेरियालवार तिरुमोळि 4.4 – “नाव कारियम” दशक में तिरुक्कोष्टियूर दिव्य देश की बड़ी प्रशंसा की है। तिरुक्कुरुगै पिरान, जिनका जन्म इस सुन्दर दिव्य देश में हुआ था, तिरुक्कोष्टियूर नम्बी नाम से प्रसिद्ध हुए और वे आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। उन्हें गोष्ठीपूर्ण या गोष्ठीपुरिसर नाम से भी जाना जाता है।

यामुनाचार्यजी ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

तिरुक्कोष्टियूर नम्बी ने रामानुज को “एम्पेरुमानार” नाम से सम्मानित किया क्यूंकि उन्होंने बिना किसी शर्त के चरम श्लोक का अर्थ उन सभी के साथ साझा किया, जो उसे जानने के लिए इच्छुक थे, जो रामानुज के निःस्वार्थ कृत्य को दर्शाता है। नम्बी, आळवन्दार द्वारा सिखाये गए रहस्य त्रय के दिव्य अर्थो का अनुसन्धान करते हुए निरंतर भगवान के ध्यान में रहते थे और किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करते थे। उनके गॉव में कोई उनकी कीर्ति को नहीं जानता था। श्री रामानुज, नम्बी के यश को जानकर चरम श्लोक के अति गोपनीय अर्थ को सीखने के लिए श्रीरंगम से तिरुक्कोष्टियूर १८ बार चल कर गए। अंततः १८वी बार में नम्बी उन्हें चरम श्लोक के अति गोपनीय अर्थ का उपदेश देने का निर्णय लेते हैं । नम्बी श्री रामानुज से वचन लेते हैं की वे किसी भी अयोग्य व्यक्ति या ऐसे अधिकारी जिसने उस गूढ़ रहस्य के अर्थ को जानने के लिए बहुत कठिन प्रयास न किये हो, उसे इस ज्ञान का उपदेश नहीं देंगे। रामानुज उस समय उसे स्वीकार करते हैं और वचन देते हैं । तब नम्बी उन्हें चरम श्लोक का अति गोपनीय ज्ञान सिखाते हैं। गीताचार्य का “सर्व धर्मान परित्यज्य” श्लोक (गीता -18.6) ही चरम श्लोक है। इस श्लोक में “एकम” शब्द के माध्यम से बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत दर्शाया गया है– जिसका आशय है की केवल भगवान ही जीव के लिए उपाय है। इसके अतिरिक्त और कुछ भी, जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग, हमारी स्वयं की प्रपत्ति (समर्पण), आदि वास्तविक उपाय नहीं है। जब यह गोपनीय अर्थ किसी अयोग्य अधिकारी को बताया जाता है तब वह उसका आसानी से अपने कर्तव्यों को न निभाकर दुरूपयोग कर सकता है। इसलिए श्री रामानुज के समय तक आचार्यो ने बहुत सावधानी से उसकी रक्षा की। परन्तु रामानुज ने इस गोपनीय अर्थ को सीखने के तुरंत बाद उन सभी को एकत्र किया जो उस रहस्य को जानने के लिए तत्पर थे और उन्हें विस्तार से चरम श्लोक का अर्थ समझाया। रामानुज के इस रहस्योद्घाटन के बारे में सुनकर नम्बी तुरंत उन्हें बुलवाते हैं। रामानुज जब नम्बी के निवास पर पहुँचते हैं तो नम्बी उनसे उनके इस कृत्य के बारे में पूछते हैं और रामानुज गुरु के आदेश की अवहेलना किये जाने को स्वीकार करते हैं। जब नम्बी उनसे पूछते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो रामानुज कहते हैं, “मैं आपके आदेश की अवहेलना करके नरक में जाऊंगा पर दूसरे बहुत से लोगों को (जिन्होंने चरम श्लोक का अर्थ सुना) मोक्ष प्राप्त होगा और उनका उद्धार होगा”। दुसरो को सच्ची आध्यात्मिक सहायता प्रदान करने वाले, रामानुज के विशाल ह्रदय को देखकर नम्बी अभिभूत हो जाते हैं और उन्हें “एम्पेरुमानार” का विशेष नाम प्रदान करते हैं। एम्पेरुमान् का अर्थ है मेरे स्वामी (भगवान) और एम्पेरुमानार का अर्थ है जो भगवान से भी अधिक दयालु है। इस प्रकार तिरुक्कोष्टियूर में चरम श्लोक के गूढ़ अर्थ का रहस्योद्घाटन करके रामानुज एम्पेरुमानार हो गए। यह चरित्र (दृष्टांत), श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने मुमुक्षुपडि व्याख्यान परिचय के चरम श्लोक प्रकरण (भाग/ खंड) में बहुत स्पष्टता और सुंदरता से समझाया है।

नोट- 6000 पदी गुरु परंपरा प्रभाव में यह बताया गया है कि श्री रामानुज ने तिरुक्कोष्टियूर नम्बी से तिरुमंत्र का अर्थ सीखकर सबको बता दिया और उस वजह से नम्बी ने उन्हें एम्पेरुमानार नाम दिया और फिर बाद में उन्होंने चरम श्लोक का अर्थ सीखा। परन्तु वरवरमुनि स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से समझाया है कि जो एम्पेरुमानार द्वारा उद्घोषित हुआ था वो चरम श्लोक था और इस व्याख्यान के और भी दृष्टांतो (घटनाओं) से यह उपयुक्त लगता है। क्यूंकि चरम श्लोक के “एकम” शब्द को बहुत गोपनीय सिद्धांत घोषित किया गया है, हम उसे प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं (जैसे आचार्यो से सुना है)।

व्याख्यान में अनेको स्थानों पर नम्बी के यश को दर्शाया गया है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं:

  • नाच्चियार तिरुमोळि 12.2 – पेरियावाच्चन पिल्लै व्याख्यान
    • यहाँ आण्डाल (गोदा) को नम्बी के समान बताया गया है। जिस तरह से नम्बी अपने भगवद अनुभव किसी और से व्यक्त नहीं करते थे ठीक उसी तरह ऐसा कहा जाता है की आण्डाल भी भगवान से वियोग की पीड़ा किसी से प्रकट नहीं करती थी।
    • तिरुक्कोष्टियूर के स्थानीय निवासी नम्बी की वास्तविक महानता को तब तक नहीं जान पाये जब तक रामानुज वहां नहीं पहुंचे थे। जब रामानुज तिरुक्कोष्टियूर पहुंचे उन्होंने तिरुक्कुरुगै पिरान (नम्बी का वास्तविक नाम जो नम्मालवार के नाम पर था) के निवास के बारे में पूछा और उनके निवास की दिशा की ओर नीचे लेटकर दंडवत प्रणाम किया। जिनकी पूजा स्वयं रामानुज करते हैं, ऐसे नम्बी की कीर्ति को स्थानीय लोग तब समझ पाये।
    • यह दर्शाया गया है की दाशरथि स्वामीजी और कूरेश स्वामीजी दोनों ने सम्प्रदाय के बहुमूल्य अर्थो को समझने के लिए 6 महीने नम्बी के चरण कमलों कि सेवा की।
  • तिरुविरुथ्थम 10 – नमपिल्लै स्वउपदेश – हर बार जब नम्बी श्रीरंगम आते थे, उनके लौटने पर एम्पेरुमानार उन्हें विदा करने के लिए मारच्चिप्पुरम (श्रीरंगम के पास एक स्थान) तक उनके साथ जाते थे। एक समय नम्बी के लौटने पर एम्पेरुमानार उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें ऐसी आज्ञा दे जिस पर वो आश्रय कर सके। नम्बी कहते हैं – जब आळवन्दार नदी में नहाते हुए डुबकी लगाते थे, तब उनके पीठ का ऊपर का भाग कूर्मासन के पीठ के समान दिखाई देता था (एक आसन जो कछुए के कवच की तरह दिखता है)। आळवन्दार के परमपद गमन के बाद भी मैं आळवन्दार की पीठ के उसी दृश्य का नित्य ध्यान करता हूँ। तुम भी उसी पर भरोसा करो। इस घटना से नम्बी दर्शाते हैं की शिष्य को आचार्य के प्राकृत शरीर (दिव्य स्वरुप) पर वैसा ही लगाव होना चाहिए जैसा की उनके निर्देशो और ज्ञान के प्रति है।
  • तिरुविरुथ्थम 99 – पेरियावाच्चन पिल्लै व्याख्यान – आलवार कहते हैं कि वे ज्ञानापिरान को ही एकमात्र उपाय स्वीकार करते हैं । यह चरम श्लोक के “एकम” शब्द को समझाता है जो अन्य उपयो को अलग करके यह स्थापित करता है कि भगवान ही एकमात्र उपाय है। यह हमारे संप्रदाय का बहुत ही गोपनीय सिद्धांत है जो नम्बी ने रामानुज को सिखाया था। एकबार उत्सव के लिए श्रीरंगम पधारे नम्बी, रामानुज को श्रीरंगम मंदिर में एक एकांत स्थान पर बुलाते हैं और “एकम” शब्द के अर्थ समझाना शुरू करते हैं । लेकिन तभी वे खर्राटे लेते हुए गहरी नींद में सोये हुए मंदिर के एक कैंकर्यपरार को देखते हैं और यह कहते हुए कि यहाँ कोई है, तुरंत अर्थ की व्याख्या करना छोड़ देते हैं। परन्तु फिर बाद में वह एम्पेरुमानार को अर्थ का उपदेश देते हैं और उन्हें यह निर्देश भी देते हैं की वे उस अर्थ को केवल योग्य व्यक्ति को ही बताये। उसी समय तपते सूरज और चमकती दोपहर में दौड़ते हुए एम्पेरुमानार, कूरेश स्वामीजी के निवास जाते हैं और उन्हें यह गोपनीय अर्थ बता देते हैं। इसप्रकार कूरेश स्वामीजी द्वारा कोई विशेष प्रयास न होने पर भी उन्हें अर्थ समझाकर एम्पेरुमानार ने “सहकारी निरपेक्ष्यता” का प्रमाण दिया है (हमारे उद्धार के लिए हमारी ओर से किसी भी कार्य की आशा ना करते हुए, स्वयं कृपा करना)।
  • तिरुविरुत्तम् 95 – इस पासूर (याथानुम ओर् आक्कैयिल् पुक्कु पासूर) के व्याख्यान में, यह बताया है कि नम्बी के एक शिष्य नंजीयर को बताते है कि यह पासूर नम्बी का प्रिय पासूर है। इस पासूर में यह दर्शाया गया है कि जीवात्मा भले ही निरंतर लौकिक अनुष्ठानो में संलग्न रहती है पर भगवान फिर भी सदा ही उस पर कृपा करते हैं और उसका कल्याण करते हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 1.10.6 – नम्पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में आलवार अपने ही मन से चर्चा करते हैं। इसके अर्थ को समझाने के लिए नमपिल्लै कहते हैं कि भगवद विषय बहुत उच्च विषय है और हर कोई इसे नहीं समझ सकता। जैसे नम्बी एकांत में इस विषय का चिंतन निरंतर किया करते थे, वैसे ही आलवार भी भगवद विषय की चर्चा स्वयं अपने मन से करते हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 8.8.2 – एक बार एम्पेरुमानार के व्याख्यान में जीवात्मा के स्वरुप (प्रकृति) पर प्रश्न हुआ कि जीवात्मा ज्ञातृत्व (ज्ञानी /जानने वाली) है या शेषत्व (भगवान की सेवक) है? एम्पेरुमानार कूरेश स्वामीजी को निर्देश देते हैं कि वे इस अर्थ को सीखने के लिए नम्बी के पास जाये। कूरेश स्वामीजी तिरुक्कोष्टियूर जाते हैं और 6 महीने तक नम्बी की सेवा करते हैं। अंततः नम्बी अज़ह्वान से उनके आने का उद्देश्य पूछते हैं, तो कूरेश स्वामीजी उन्हें प्रश्न के बारे में बताते हैं। नम्बी कहते हैंआलवार ने “अडियेन उल्लान” के द्वारा जीवात्मा के स्वरुप को प्रमाणित किया है, जिसका तात्पर्य है कि जीवात्मा सेवक है– स्वरुप से भगवान कादास है। कूरेश स्वामीजी पूछते हैं- तो वेदांतम उसे ज्ञातृत्व (ज्ञानी /जानने वाली) क्यों बताती है? नम्बी कहते हैं वो इसलिए क्यूंकि यहाँ जीवात्मा के ज्ञाता होने का आश्रय उसके यह जानने से है कि वह भगवान का सेवक/दास है। इसलिए जीवात्मा का वास्तविक स्वरुप वह है जो आलवार और नम्बी ने बताया है, जीवात्मा वह है जिसे इस बात का ज्ञान है कि वह भगवान का अधीन है।

चरमोपाय निर्णय नाम के दिव्य ग्रन्थ में नम्बी द्वारा एम्पेरुमानार के यश को स्थापित करना विस्तार से बताया गया है। उसे http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html पर देखा जा सकता है।

जब तिरुमालै आण्डान् से हुए किसी मिथ्याबोध में तिरुवाय्मोळि के व्याख्यान को रोक देते है, तब नम्बी उस निर्गम को सुलझाते हैं और तिरुमालै आण्डान् को समझाते हैं कि एम्पेरुमानार एक अवतार पुरुष है जो हर तरह से सुविज्ञ है। वह उनसे आग्रह करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं की कालक्षेप जारी रहे।

एक बार जब कुछ शरारती तत्व एम्पेरुमानार को जहर देते हैं , तब इस बारे में जानकर एम्पेरुमानार उपवास शुरू कर देते हैं और प्रसाद ग्रहण नहीं करते हैं। उस समय नम्बी तिरुक्कोष्टियूर से आते हैंऔर तप्ती दोपहर में कावेरी नदी के तीर पर एम्पेरुमानार उनसे मिलने जाते हैं। एम्पेरुमानार उस तप्ती गर्म रेत पर नम्बी को साष्टांग प्रणाम (दंडवत प्रणाम) करते हैं और नम्बी मौन खड़े रहकर उन्हें देखते रहते हैं । किडाम्बी आच्चान्(प्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी) , जो एम्पेरुमानार के शिष्य थे तुरंत उन्हें गर्म रेत से उठाते हैं और नम्बी के इस कार्य को चुनौती देते हैं। नम्बी कहते हैं कि उन्होंने यह आडम्बर यह जानने के लिए किया कि एम्पेरुमानार के प्राकृत शरीर (दिव्य स्वरुप) पर सबसे ज्यादा लगाव किसको है। तद्पश्चात नम्बी, किडाम्बी आच्चान्(प्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी) को नियमित रूप एम्पेरुमानार के लिए प्रसाद बनाने का निर्देश देते हैं। इस तरह हम देख सकते हैं कि नम्बी एम्पेरुमानार से बहुत प्रभावित थे और हमेशा उनके कल्याण के बारे सोचते थे।

इन सभी द्रष्टांतो के माध्यम से हमने देखा कि नम्बी के कई वैभव हैं और उन्होंने ही रामानुज को एम्पेरुमानार का सुन्दर नाम दिया था। जिसके फलस्वरूप स्वयं नमपेरुमल ने हमारे संप्रदाय को एम्पेरुमानार दर्शन नाम से उध्बोधित किया है, जो स्वामी मामुनिगल ने अपनी उपदेश रत्न माला में बताया है।

हम नम्बी के श्री चरण कमलो में साष्टांग करते हैं , जिनका आळवन्दार और एम्पेरुमानार के प्रति विशेष लगाव था।

तिरुक्कोष्टियूर नम्बी की तनियन

श्रीवल्लभ पदाम्भोज धीभक्त्यामृत सागरं ।
श्रीमद् घोष्टिपूर्ण देशिकेन्द्रम् भजामहे ।।

अडियेन् भगवति रामानुज दासि

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आदार: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/02/27/thirukkoshtiyur-nambi/

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कोयिल् कोमाण्डूर् इळैयविल्लि आच्चान् (श्रीबालधन्वी गुरु)

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

komandur-ilayavilli-achanश्रीबालधन्वी गुरु– सेम्पोंसे कोइल, तिरुनांगूर

तिरुनक्षत्र: अश्लेषा नक्षत्र, चैत्र मास

अवतार स्थल: कोमाण्डूर

आचार्यश्री रामानुज स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: तिरूप्पेरूर

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई (श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के जैसे) थे। उन्हें श्रीबालधन्वी गुरु के नाम से बुलाते थे। इळैयविल्लि / बालधन्वी का अर्थ श्री लक्ष्मणजी है – उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि सेवा की, उसी तरह जैसे श्री लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी कि सेवा की। वह श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा स्थापित ७४ सिंहासनाधिपति में एक हैं।

आपकी तनियन और वाली तिरुनामं से यह सिखा जाता है कि आप श्री शैलपूर्णा स्वामीजी से जुड़े हुए थे और आपने उनकी बहुत सेवा भी की थी।

चरमोपाय निर्णय में श्री नायनाराच्चान् पिल्लै ने श्रीबालधन्वी गुरु (श्री इळैयविल्लि) के महिमा को दर्शाया है। इसे हम अब देखेंगे।

जब श्री रामानुज स्वामीजी परमपद के लिये प्रस्थान किया उनके अनेक शिष्यों ने उनके वियोग में अपने प्राण त्याग दिया। श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान रामानुज स्वामीजी के शिष्य थे, कुछ समय के लिये कैंकर्य हेतु अपने गाँव कणीयनूर में विराजमान थे। कुछ दिनों बाद श्रीरंगम की ओर श्री रामानुज स्वामीजी के पास उनकी सेवा के लिये जा रहे थे। जाते समय रास्ते में किसी श्रीवैष्णव से उन्होंने अपने आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के स्वास्थ के बारे में पूछा। तब श्रीवैष्णव ने श्री रामानुज स्वामीजी के परमपद गमन का समाचार सुनाया। यह सुनते ही उसी क्षण श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान ने “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” (श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविंदोंकि शरण ग्रहण करता हूँ) कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया।

श्री इळैयविल्लि तिरुप्पेरूर में विराजमान थे। एक दिन उनके स्वप्न में श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर आकाश की ओर बढ़ रहे थे। परमपदनाथ भगवान हजारों नित्यसूरीगण, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीनाथमुनी स्वामीजी और अनेक आचार्यागण वाद्य गान करते हुये श्री रामानुज स्वामीजी का परमपद में स्वागत कर रहे हैं। वह यह देख रहे थे श्री रामानुज स्वामीजी का विमान परमपद की ओर प्रस्थान कर रहें हैं और सब उनके पीछे जा रहे हैं। वे  निद्रा से उठे और उनको पता चल गया कि क्या हुआ है। वह अपने पड़ोसी को बताते हैं “वळ्ळल् मणिवण्णं” कि “हमारे आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर परमपद कि ओर प्रस्थान कर रहे हैं और उनके साथ परमपदनाथ और नित्यसुरी भी हैं”। मैं उनकी अनुपस्थिति में यहाँ नहीं रह सकता। “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया। ऐसे अनेक शिष्य थे जो श्री रामानुज स्वामीजी का वियोग सहन नहीं कर सके ओर अपना शरीर त्याग दिया। जो शिष्य श्री रामानुज स्वामीजी के अंतिम समय में उनके साथ थे उनको स्वामीजी ने आज्ञा दिया कि मेरे वियोग में शरीर त्यागना नहीं, आगे तुम लोगों को ही सम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करना है। स्वामीजी की आज्ञा का पालन करते हुये अनेक शिष्यजन कैंकर्य मे लग गये। यहाँ आचार्य के वियोग में शिष्यजन अपना शरीर त्यागते है, यह श्री रामानुज स्वामीजी के वैभव को प्रकाशित करता है।

हमने यहाँ पर श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) के जीवन के कुछ सुन्दर बातें देखी। वह पूरी तरह भागवत निष्ठा में अटल थे ओर स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी को प्रिय थे। हम उनके चरणारविन्द में यह प्रार्थना करते हैं कि हम में भी कुछ भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि ) की तनियन:

श्री कौसिकान्वया महाभूथि पूर्णचन्ध्रम
श्री भाष्यकार जननी सहजा तनुजम
श्री शैलपूर्ण पद पंकज़ सक्त चित्तम
श्री बालधन्वी गुरुवर्यम अहं भजामी

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: https://guruparamparai.wordpress.com/2013/04/03/koil-komandur-ilayavilli-achan/

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मुदलियाण्डान् (दाशरथि स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

mudhaliyandan

तिरुनक्षत्र: पुनर्वसु, मेष मास

अवतार स्थल: पेट्टै

आचार्य: श्री रामानुज स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: धाटी पंचकम, रहस्य त्रयं (अब उपलब्ध नहीं हैं)

आनन्द दीक्षितर और नाचियारम्मा के पुत्र के रूप में जन्में आपश्री का नाम दाशरथि रखा गया । ये श्री रामानुज स्वामीजी के सम्बन्धीक हैं। आप रामानुजन पोण्णदि, यतिराज पादुका, श्रीवैष्णव दासर, तिरुमरुमार्भन और मुदलियाण्दान (यानि श्रीवैष्णवों में मार्ग दर्शक) के नाम से अधिक विख्यात हुए। आप श्री रामानुज स्वामीजी के चरण पादुका और त्रिदण्ड के नाम से भी जाने जाते हैं।

नोट : श्री कुरेश स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी को इतने प्रिय थे कि वह उनसे कभी अलग हो ही नहीं सकते थे – श्री कुरेश स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के जल पवित्रं (श्री रामानुज स्वामीजी के त्रिदण्ड पर जो झण्डा लगा हैं) से जाने जाते हैं।

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श्री कुरेश स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री दाशरथि स्वामीजी – अपने अपने जन्म स्थान से

श्री रामानुज स्वामीजी श्री दाशरथि स्वामीजी को उनके भगवद् / भागवत निष्ठा (भगवान और उनके भक्तों के प्रति स्नेह) के कारण बहुत पसन्द करते थे। जब श्री रामानुज स्वामीजी ने सन्यास लिया तब उन्होंने यह घोषणा की कि उन्होंने सब कुछ त्याग किया, सिवाय दाशरथि ऐसी श्री दाशरथि स्वामीजी की महिमा थी। श्री रामानुज स्वामीजी के सन्यास ग्रहण करते ही श्री कुरेश स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी उनके पहले शिष्य बने। दोनों ने शास्त्र (उभय वेदान्त – संस्कृत और अरूलिच्चेयल) और उसके तत्व को श्री रामानुज स्वामीजी से ही सीखा। जब श्री रामानुज स्वामीजी कांचीपुरम से श्रीरंगम के लिये प्रस्थान किया तो वह दोनों भी उनके साथ निकल गये। श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञानुसार श्री दाशरथि स्वामीजी ने मंदिर के देख रेख का शासन पूर्णत: अपने हाथों में लिया और यह सुनिश्चित किया कि मंदिर का सभी कार्य सही तरीके से हो रहा है।

जब श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी को चरम श्लोक का अर्थ समझाया तब श्री दाशरथि स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी से यह उन्हें भी सिखाने के लिये प्रार्थना की। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के पास जाकर उनसे प्रार्थना करने के लिये कहा। श्री दाशरथि स्वामीजी श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के तिरुमाली में ६ महीने रहकर उनकी विनम्रता पूर्वक सेवा की। ६ महिने के पश्चात् जब श्री दाशरथि स्वामीजी ने श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को चरम श्लोक का अर्थ सिखाने के लिये प्रार्थना कीया तो स्वामीजी ने कहा कि श्री रामानुज स्वामीजी ही स्वयं उन्हें सिखायेंगे एक बार उनमें पूर्णत आत्म गुण आ जाये। श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने अपने चरण कमल श्री दाशरथि स्वामीजी के मस्तक पर रखा और जाने के लिये कहा। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को आते देख उनके भाव से बहुत खुश हुये और एक ही बार में उन्हें चरम श्लोक का श्रेष्ठ अर्थ समझाया।

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श्री दाशरथि स्वामीजी का श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति पूर्णत: समर्पण इस चरित्र के द्वारा समझा जा सकता है। एक बार श्री महापूर्ण स्वामीजी की बेटी श्री अतुलांबाजी अपने सास के पास जाती है और कहती है कि नदी में स्नान करने के लिये जाते समय उनके साथ कोई आए सुरक्षा / सहयोग के हिसाब से। उनकी सास कहती है “तुम्हें स्वयं अपने साथ सहायक को लाना होगा”। श्री अतुलांबाजी अपने पिताजी के पास जाकर उनसे एक सहायक का प्रबन्ध करने के लिये कहती है। श्री महापूर्ण स्वामीजी कहते हैं क्योंकि वे पूर्णत: श्री रामानुज स्वामीजी पर निर्भर हैं, उन्हें उनके पास जाकर ही विनती करनी होगी। श्री रामानुज स्वामीजी इधर उधर देखते हैं और श्री दाशरथि स्वामीजी को देखकर उन्हें श्री अतुलांबाजी के साथ सहायक के तौर पर जाने के लिये कहते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी आनंदित होकर अपने आचार्य की आज्ञा का पालन करते हुए श्री अतुलांबाजी के साथ चले गये। वह निरन्तर उनकी मदद करते थे। श्री अतुलांबाजी के ससुरालवाले श्री दाशरथि स्वामीजी (जो बड़े विद्वान और श्री रामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों मे से एक) को उनके तिरुमाली में इतना नीच काम करते देख दु:खी होने लगे और उन्हें यह बन्द करने के लिये कहा। श्री दाशरथि स्वामीजी ने तुरन्त कहा कि यह श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञा है और वह इसका पालन करेंगे। वह तुरन्त श्री महापूर्ण स्वामीजी के पास जाते हैं जो उन्हें श्री रामानुज स्वामीजी के पास भेजते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी ने कहा “आपको एक सहायक की जरूरत थी और मैंने एक भेज दिया अगर आपको वह नहीं चाहिये तो उसे वापस भेज दीजिये”। उनको अपनी गलती का एहसास हो गया और श्री दाशरथि स्वामीजी को उनके यहाँ काम करने से रोक दिया। उनको श्री महापूर्ण स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री दाशरथि स्वामीजी और श्री अतुलांबाजी की महिमा का पता चला और फिर उन्होंने श्री अतुलांबाजी का अच्छा ध्यान रखा। यह घटना श्री दाशरथि स्वामीजी की बढाई को दर्शाता है जहाँ वह अपने आचार्य के शब्दों का पूरी तरह पालन करते हैं। हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि अगर कोई श्री रामानुज स्वामीजी के चरण पादुका घोषित हैं तो उसमे यह सब अच्छे गुण होना चाहिये और श्री दाशरथि स्वामीजी इन सब अच्छे गुणों के सारसंग्रह थे।

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शैव राजा के अत्याचार से श्री दाशरथि स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के साथ मेलकोटे (तिरुनारायणपुरम) का भ्रमण किया। मितुलापुरी सालग्राम नामक एक जगह में बहुत लोग रहते थे जो वैदिक धर्म के खिलाफ थे। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को कहा नदी के उस स्थान को अपने चरणों से स्पर्श करें जहाँ से नदि उस गाँव में आती है और लोग वहाँ स्नान करते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी कृपा करते हैं और जब उस नदी में स्नान करते हैं जो अब श्री दाशरथि स्वामीजी के श्रीपाद का सम्बन्ध हैं सभी पवित्र हो जाते हैं। अगले दिन सभी श्री रामानुज स्वामीजी के पास आकार उनके शरण हो जाते हैं। अत: हम यह समझ सकते हैं कि पवित्र श्रीवैष्णव के श्रीपाद तीर्थ से सब लोग पवित्र हो जाते हैं।

कंडादै आण्डान् जो श्री दाशरथि स्वामीजी के पुत्र हैं श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञा लेकर उनके लिये एक अर्चा विग्रह बनाते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी इस विग्रह को गले से लगाते हैं और इस पर बहुत प्रेम आता है। यह विग्रह बाद में उनके अवतार स्थल श्रीपेरुंबूतूर में तै पुष्यम (यह दिन आज भी श्रीपेरुंबूतुर में गुरु पुष्यम नाम से मनाया जाता है) के दिन रखते हैं। यह विग्रह स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी को पसन्द थी।

श्री दाशरथि स्वामीजी के उपदेशों और कीर्ति व्याख्यानों के बहुत जगह में प्राप्त हैं। हम उनमे से कुछ अब देखेंगे।

  • सहस्त्रगीति २.९.२ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- श्री दाशरथि स्वामीजी की उदारता को यहाँ इस घटना में बहुत सुन्दरता से प्रकट किया है। एक बार श्री दाशरथि स्वामीजी के एक शिष्य श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी के पास जाता है उस समय श्री दाशरथि स्वामीजी नगर से बाहर गये हुये थे। श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी उस श्रीवैष्णव से कैंकर्य लेना स्वीकार करते हैं और यह सोचकर कि उसे आचार्य सम्बन्ध प्राप्त नहीं हुआ है उसे पञ्च संस्कार की दीक्षा देते हैं और उसे अच्छा ज्ञान भी देना शुरू कर देते हैं। जब श्री दाशरथि स्वामीजी लौट कर आते हैं वह श्रीवैष्णव भी लौट कर उनकी सेवा करने लगता है। जब श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी को यह पता चलता है तो वह दौड़ कर जाकर श्री दाशरथि स्वामीजी से कहते हैं “मुझे यह नहीं पता था कि वह आपका शिष्य है और मुझे इस अपचार के लिये क्षमा कीजिए”। श्री दाशरथि स्वामीजी शान्त रीति से उत्तर देते हैं “अगर कोई कुवें में गिरता है और उसे दो लोग बाहर निकालते हैं तो वह बहुत आसानी से बाहर आजायेगा। उसी तरह यह व्यक्ति संसार में है अगर हम दोनों इसे बाहर निकाले तो यह फायदा ही है”। इस तरह का पवित्र हृदय देखना बहुत मुश्किल है जो हमें श्री दाशरथि स्वामीजी में निरन्तर देखने को मिलता है।
  • सहस्त्रगीति ३.६.९ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- इस पदिगा में भगवान के अर्चावतार के कीर्ति को दर्शाया गया है। श्री दाशरथि स्वामीजी यह समझाते हैं कि “यह मत सोचो कि परमपदनाथ अर्चावतार का रूप यहाँ अपने भक्तों को खुश करने के लिये लेते हैं बल्कि यह सोचो कि यह भगवान का अर्चावतार बहुत महत्त्व का है और वह स्पष्ट है कि वो ही परमपद में परवासुदेव है”।
  • सहस्त्रगीति ५.६.७ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- इस पादिगा में भगवान का सर्व व्यापकत्व समझाया गया है। यहाँ परांकुश नायकी (श्री शठकोप स्वामीजी एक कन्या के भाव में) कहते हैं कि भगवान अपने संबंधियों का भी नाश कर देते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी इसकी एक सुन्दर व्याख्या करते हैं “भगवान अपनी पवित्र सुन्दरता दिखा कर” (जो उनकी तरफ आकर्षित होते हैं) उन्हें पूरी तरह पिगला देते हैं- नाश करते हैं।
  • सहस्त्रगीति ६.४.१० – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- यहाँ श्री दाशरथि स्वामीजी का अर्चावतार के प्रति लगाव और चिन्ता श्री कलिवैरिदास स्वामीजी समझाते हैं। श्री कलिवैरिदास स्वामीजी श्री वेदान्त स्वामीजी का वर्णन बताते हैं जिसमे श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी हैं। इस संसार में बहुत से लोग हैं जो भगवान को पसन्द नहीं हैं। अर्चावतार भगवान बहुत मृदु स्वभाव के हैं और अपने आप इन भक्तों पर ही पूर्णत: निर्भर रखते हैं। ब्रह्मोत्सव के सामापन के बाद श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी मिलते हैं, एक दूसरे को आदर देते हैं, गले लगाते हैं और खुशी प्रकट करते हैं कि श्रीरंगनाथ भगवान उत्सव के बाद अपने आस्थान में सुरक्षित पहुँच गये हैं। वह अपने पूर्वाचार्यों के स्वभाव को, जो हमेशा भगवान के मंगलाशासन के तरफ ध्यान देते थे, सच मानते थे।
  • सहस्त्रगीति ६.४.१० – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- जब पराशर भट्टर स्वामीजी श्री कुरेश स्वामीजी से “सिरुमामनिसर” (सिरु यानि छोटा और मा यानि बड़ा – कैसे एक हीं व्यक्ति में छोटा और बड़ा आता है) के बारें पूछते हैं तब श्री कुरेश स्वामीजी कहते हैं श्री दाशरथि स्वामीजी, श्री देवराजमुनि स्वामीजी और श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी अवस्था में छोटे हैं (और हमारे जैसे ही हैं भोजन पर निर्भर अपना जीवन चलाने के लिये) परन्तु भगवान के प्रति भक्ति में वें नित्य सुरियों से भी बड़े हैं- इस तरह छोटा और बड़ा दोनों गुण एक हीं व्यक्ति में हैं।
  • सहस्त्रगीति ९.२.८ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- श्रीरंगम में श्रीजयन्ती पुरप्पादु के समय वंगीप्पुरतु नम्बी अहीर गोप कन्याओं के समुह में मिलकर वहाँ भगवान की पुजा करते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी उनसे पूछते हैं कि उन्होंने क्या कहा जब वह उस समुह में थे। नम्बी कहते हैं “मैंने कहा विजयस्व”। श्री दाशरथि स्वामीजी कहते हैं जब आप उन गोप कन्याओं के समुह में हैं तब आप उन्हें उनकी भाषा में बढाई करना था नाकि कठिन संस्कृत में।

इस तरह हमने श्री दाशरथि स्वामीजी के सुन्दर जीवन के बारें में कुछ देखा। वह पूर्णत: भागवत निष्ठावाले थे और स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी के करीब थे। हम उनके चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि थोड़ी सी हम में भी भागवत निष्ठा आ जायें।

श्री दाशरथि स्वामीजी कि तनियन

पादुके यतिराजस्य कथयन्ति यदाख्यया
तस्य दाशरथे: पादौ शिरसा धारयाम्यहम्

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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तिरुक्कण्णमन्गै आण्डान्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

जन्म नक्षत्र : ज्येष्ठा – श्रवण नक्षत्र
अवतार स्थल : तिरुक्कण्णमन्गै
आचार्य : नाथमुनि स्वामीजी
जहाँ परमपद प्राप्त किया : तिरुक्कण्णमन्गै
रचना : नाच्चियार तिरुमोली की तनियन जो “अल्लि नाल थामरै मेल्” से शुरू होती है

Thirukkannamangai_bhakthavatsalanभक्तवत्सल भगवान तायार् के साथ – तिरुक्कण्णमन्गै

thirukkannamangai-andan-thiruvarasuतिरुक्कण्णमन्गै आण्डान् – तिरुक्कण्णमन्गै

तिरुक्कण्णमन्गै आण्डान्, नाथमुनीजी के प्रिय शिष्य, का अवतार तिरुक्कण्णमन्गै में हुआ। हमारे पूर्वाचार्य भगवान के संरक्षण (रक्षकत्व स्वभाव अर्थात् अपने आश्रयों की रक्षा करने की शक्ति) में परम विश्वास रखने वाले आप श्री की इस महिमा का सदैव गुणगान करते है।
उनकी महिमा श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में पिल्लै लोकाचार्य द्वारा बताया गया है। उपाय (भगवान को पाने का मार्ग) और उपेय (भगवान की सेवा ही लक्ष्य) के सबसे आदर्श उदाहरणो के बारे में समझाते हुए,  –

सूत्र 80 में वह कहते है –
“उपायत्तुक्कू पिराट्टियैयुम्, ध्रौपतियैयुम्, तिरुक्कण्णमन्गै आण्डानैयूम् पोले इरुककावेनुं; उपेयत्तुक्कू इलैय पेरुमालैयूम् , पेरिया उडैयारैयुम् , पिल्लै तिरुनरैयूर अरैयरैयुम् चिन्तयन्तियैयूम पोले इरुककावेनुं”

इस सूत्र और अगले कुछ सूत्रों में उन्होंने उपाय और उपेय को उत्कृष्ट उदाहरण के साथ समझाया है। उपाय एक प्रक्रिया है और उपेय लक्ष्य है। शास्त्रोँ के अनुसार भगवान सबसे अच्छे उपाय है और भगवान की सेवा ही सर्वोच्च लक्ष्य है। क्यूंकि भगवान हर तरह से सक्षम है, वे आसानी से किसी का भी उत्थान कर सकते है और इसलिए वे ही सर्वोत्तम उपाय है। भगवान श्रीमन्नारायण जगत के एकमात्र स्वामी है, उनका और उनकी पत्नी श्री महालक्ष्मी का कैंकर्य ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। उपाय और उपेय को समझाने के लिए कुछ उदाहरण संक्षेप में दिए गए है।

उपाय –

  • सीता जी (श्री महालक्ष्मी जी) – जब रावण ने सीता जी का हरण करके उन्हें बंदी बना कर रखा, तब वह स्वयं को बचाने और रावण को दंड देने में पूरी तरह से सक्षम थी । उन्होंने अपनी क्षमता का प्रदर्शन हनुमान की रक्षा द्वारा किया था जब राक्षसों ने उनकी पूंछ में आग लगा दी थी । उन्होंने “शीतो भवः” (इस आग का हनुमान पर शीतल प्रभाव हो) ऐसा आशीर्वाद दिया और हनुमान की रक्षा की। परंतु उन्होंने अपनी पूरी निर्भरता श्री राम के प्रति प्रकट की, स्वयं की रक्षा करने की शक्ति को त्याग दिया और श्री राम आकर उनकी रक्षा करेंगे ऐसी प्रतीक्षा करने लगी।
  • द्रौपदी – जब द्रौपदी को कौरवों की सभा में अपमानित किया गया था उन्होंने पूरी तरह से अपनी लाज की चिंता छोड कर अपने हाथ उपर उठाए और श्रीकृष्ण को पुकारी। उन्होंने अपनी लाज बचाने के लिए वस्त्रों को नहीं पकडा अपितु पूरी श्रद्धा से अपने हाथों को उठाया और श्रीकृष्ण ने उनकी निश्चित रुप से रक्षा की।
  • तिरुक्कण्णमन्गै आण्डान् ने अपने सभी कार्यों को छोड दिया और तिरुक्कण्णमन्गै दिव्य देश के भक्तवत्सल भगवान को अपना रक्षक स्वीकार करके उनके समक्ष स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर दिया।

वरवरमुनि स्वामी जी ने इस सूत्र के व्याख्यान में आण्डान् की निष्ठा को सुंदरता से समझाया है । एक बार आण्डान् ने देखा एक व्यक्ति एक कुत्ते पर हमला करता है। यह देखकर कुत्ते का मालिक बहुत नाराज होता है और कुत्ते पर हमला करने वाले से झगड़ा करता है। वे दोनों अपने चाकू बाहर निकालते है और एक दूसरे पर हमला करते हैं, यहाँ तक की एक दूसरे को मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसे देखकर आण्डान् को एहसास होता है। आण्डान् सोचते हैं कि जब एक साधारण व्यक्ति जिसके पास एक कुत्ता है अपने कुत्ते पर हमला करने वाले पर क्रोधित होता है और उसे मारने की हद तक जा सकता है क्यूंकि वह उस कुत्ते का स्वामी है, तो श्रीमन्नारायण जो जगत के स्वामी हैं, वे कैसे महसूस करते होंगे जब कोई शरणागत पीडित हो और स्वयं अपने को बचाने की कोशिश करता हो। ऐसा सोचकर आण्डान् तुरंत अपने सारे मोह का त्याग कर देते हैं और अपनी रक्षा के बाबत बिना किसी अधिक चिंता के मंदिर मेँ जाकर खुशी से भगवान के चरणो में लेट जाते हैं। यहाँ सभी कार्योँ के त्याग का अर्थ कुछ भी नहीं करने से समझा जा सकता था परंतु  वरवरमुनि स्वामीजी ने इस सिद्धांत को बहुत ही सुंदरता से अपने व्याख्यान में समझाया है।

“स्वरक्षण हेतुवान स्व-व्यापरंगलै विट्टान् एन्रपडि”, उनके दिव्य वचन है – अर्थ उन्होंने ऐसे सभी कार्यो का त्याग किया जो स्वयं की रक्षा से संबंधित थे। इसका अभिप्राय है कि उन्होंने भगवान की प्रति अपने अदभुत कैंकर्य को जारी रखा और सिर्फ स्वयं की रक्षा करने के प्रयासों का त्याग किया। आय जनन्याचार्य ने भी इसी सिद्धांत पर प्रकाश डाला है। इसे आगे आने वाले भागो में समझा जा सकता है, विशेषतः उस घटना के माध्यम से जो तिरुवाय्मोलि 9.2.1 व्याख्यान में दर्शायी गयी है।

उपेय (कैंकर्य) – सूत्र 80 के शेष भाग और आगे के भागों का संक्षिप्त विवरण

  • लक्ष्मणजी – लक्ष्मणजी श्री रामजी के प्रति अपने कैंकर्य में बहुत दृढ और तेज थे। जहाँ जहाँ श्री राम जाते थे लक्ष्मणजी वहाँ वहाँ उनकी सेवा किया करते थे।
  • जटायु महाराज – सीताजी को बचाने के लिए, रावण से लड़ाई करते हुए, जटायुजी को अपने प्राणो की भी परवाह नहीं थी, उनका पूरा ध्यान सिर्फ सीताजी को बचाने में था और अंत में वे रावण द्वारा मारे गए।
  • पिल्लै तिरुनरैयूर अरैयर – वह अपने परिवार के साथ तोट्टियम तिरुनारायणपुर (जो श्रीरंगम के पास स्थित है) के भगवान की सेवा करते थे। एक बार कुछ वंडलो ने मंदिर पर हमला किया और भगवान के अर्चा विग्रह को आग लगा दी। वे हमले को सहन न कर सके और भगवान की रक्षा के लिए अपने परिवार सहित भगवान के अर्चा विग्रह को गले से लगा लिया और इस तरह उन्होंने भगवान का संरक्षण किया। ऐसे में, आग से जलने के कारण उन्होंने अपने परिवार के साथ अपना जीवन छोड़ दिया। हमारे पूर्वाचार्यों ने भगवान के प्रति उनके समर्पण के लिए उनकी बड़ी प्रशंसा की है।
  • चिन्तयंती – ब्रज भूमि में एक गोपिका रहती थी। उनका श्री कृष्ण भगवान से बहुत लगाव था। एक बार श्री कृष्ण भगवान की दिव्य मधुर धुन सुनकर, वे आनंदित हो जाती है और उन्हें देखने के लिये घर से निकलना चाहती है। परंतु वह घर से नहीं निकल पाती और बहुत दुखी हो जाती है। भगवान की बांसुरी की धुन सुनने के आनंद से उनके पुण्य कर्म (पुण्य, खुशी प्रदान करता है) समाप्त हो जाते हैं और घर से ना निकल पाने के महान दुख से उनके पाप कर्म समाप्त हो जाते हैं । क्यूंकि उनके पुण्य और पाप सब समाप्त हो जाते हैं, वे उसी समय परमपद के लिये प्रस्थान करती है (हमारे पुण्य और पाप हमें इस संसार में बाँधते हैं, जब वो समाप्त होते हैं तब हमारा उत्थान हो जाता है)। इस प्रकार परमपद जाने और वहाँ सदा भगवान की सेवा के अंतिम लक्ष्य को उन्होंने आसानी से प्राप्त किया।

आण्डान् ने तिरुक्कण्णमन्गै भगवान की सेवा करते हुए अपना शेष जीवन व्यतीत किया और फिर भव्यता से परमपद की ओर प्रस्थान किया और वहाँ परमपदनाथ भगवान के दिव्य कैंकर्य को जारी रखा।

व्याख्यान और पूर्वाचार्यो के ग्रंथो में कुछ स्थानों पर आण्डान् के जीवन और वैभव को प्रस्तुत किया है। अब हम उन्हें देखते हैं।

  • नाच्चियार तिरुमोली 1.1 – पेरियवाच्चान् पिल्लै व्याख्यान – आंडाल बताती है “तरै विलक्कि” – फर्श की सफाई के द्वारा। पिल्लै बताते है की आण्डान् सफाई का कैंकार्य चरम लक्ष्य की तरह करते थे (कुछ पाने के साधन भाव से नहीं)।
  • तिरुमालै 38 – पेरियवाच्चान् पिल्लै व्याख्यान – “उन कदैत्तलाई इरुन्तु वालुम सोम्बर” को समझते हुए पिल्लै कहते है “वालुम सोम्बर” (जीवित आलसी व्यक्ति) का आश्रय उनसे है जिन्हें भगवान पर पूरा विश्वास है ठीक वैसा जैसे कुत्ते के स्वामी द्वारा कुत्ते की रक्षा किये जाने कि क्रिया को देखकर, आण्डान् ने भक्तवत्सल भगवान के प्रति प्रदर्शित किया । “वालुम सोम्बर” का विपरीत “तंजूम सोम्बर” (असली आलसी व्यक्ति) है, जो किसी भी कैंकर्य में संलग्न नहीं होते और जीवन बर्बाद करते है ।
  • तिरुवाय्मोलि – 9.2.1 – नम्पिल्लै ईडु व्याख्यान – शठकोप स्वामीजी 10.2.7 में कहते हैं “कदैत्तलै चीयक्कप्पेत्ताल कड़ुविनै कलैयलामें”, भगवान के मंदिर के फर्श की सफाई करने मात्र से पापो को हटाया जा सकता है। आण्डान् सब कुछ त्यागकर तिरुक्कनमंगै भक्तवत्सल भगवान की सन्निधि में रहने के लिये प्रसिद्ध थे। वे सफाई के कैंकर्य से जुड़े थे और वह यह कैंकर्य नियमित रूप से करते थे। तिरुवाय्मोलि 9.2.1 व्याख्यान में नम्पिल्लै बहुत सुंदरता से एक महत्वपूर्ण पहलू स्थापित करते है। यहाँ इस पासुर में शठकोप स्वामीजी भगवान से कहते है – “हम प़ीढियो से बहुत से अलग अलग कैंकर्य कर रहे है जैसे की मंदिर की सफाई करना, आदि”। यहाँ एक प्रश्न उठता है। प्रपन्न भगवान को ही एक मात्र उपाय रूप से स्वीकार करते हैं। प्रपन्न का किसी भी तरह के स्व प्रयासों से संबंध नहीं है– फिर आखिर कैंकर्य क्यूं ? यह नम्पिल्लै ने आण्डान् के निम्न व्रत्तांत द्वारा बहुत सुंदरता से समझाया है। उनके एक सहपाठी (जो नास्तिक थे) आण्डान् से पूछते हैं कि वो स्वयं को फर्श की सफाई करके क्यूं परेशान करते हैं जब उनकी स्वयं के प्रयासो में कोई भागीदारी नहीं है। आण्डान् उन्हें एक जगह दिखाते हैं जहाँ धुल है और दूसरी जगह जहाँ धुल नहीं है, और कहते हैं कि झाडू लगाने का परिणाम यह है की जगह साफ़ रहती है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। वह पूछते हैं – क्या तुम साफ और गंदी जगह के बीच अंतर नहीं पहचान सकते? इस तरफ से हम समझ सकते हैं कि कैंकर्य करना हमारे दास होने का प्राकृतिक गुण है और कैंकर्य करना उपाय नहीं है। वचन भूषण के सूत्र 88 में पिल्लै लोकाचार्य बड़ी सुंदरता से समझाते हैं – एक भौतिक इच्छाओं से संचालित व्यक्ति अपनी (या अपने प्रियजनों की) भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिये बहुत कुछ करता है, तो एक प्रपन्न (जिसने अपने को भगवान को समर्पित कर दिया हो) की कितनी चाहत होना चाहिये भगवान की सेवा करने की जो सर्वोच्च आनंददायक है और जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप से सेवित होने के लिये उपयुक्त है ?
  • चरमोपाय निर्णय – नाथमुनि स्वामीजी ने स्वयं शठकोप स्वामीजी से आल्वार तिरुनगरी में 4000 दिव्य प्रबंध सीखे और वीरनारायणपुर लौट आए। उन्होंने वहाँ मन्नार भगवान के समक्ष वह दिव्य प्रबंध सुनाया और भगवान से सभी सम्मान प्राप्त किये। फिर वे अपने निवास पर पहुंचे और अपने भतीजे कीऴै अगतु आल्वान और मेलै अगतु आल्वान को आमंत्रित किया। वह आलवार से मिली विशेष दया और आलवार द्वारा स्वप्न में दिखाये गये दिव्य स्वरूप के बारे में उन्हें बताते हैं ( नाथमुनि के स्वप्न में शठकोप स्वामीजी रामानुज का दिव्य स्वरूप दिखाते है, जो भविष्य में जीवो के उत्थान के लिये प्रकट होने वाले हैं)। वे दोनों इसे सुनकर चकित रह जाते हैं और संतुष्ट होते हैं की इन महानुभाव से वे किसी तरह संबंधित हैं। उसके बाद नाथमुनीजी अपने प्रिय शिष्य आण्डान् को तिरुवाय्मोलि के माध्यम से द्वय महा मंत्र का अर्थ सीखा रहे थे (जो एक उचित शिष्य होने के योग्य हैं )। “पोलीगा पोलीगा “ पासुर में नाथमुनीजी शठकोप स्वामीजी के दिव्य वचनों और स्वप्न में देखी हुई घटनायें बताते हैं । ऐसा सुनकर आण्डान् कहते हैं – मैं धन्य हूँ जो मेरा संबंध आप जैसे महानुभाव से है जिन्होंने स्वप्न में भविष्यदाचार्य का दिव्य स्वरूप देखा। इस वृत्तांत का उल्लेख नारायण पिल्लै, पेरियवाच्चान् पिल्लै के दत्तक पुत्र, ने अपने ग्रंथ चरमोपाय निर्णय (http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-thirumudi.html)  में किया है ।
  • वार्ता माला 109 – पिंभऴगिय पेरूमाल जीयर उसी सिद्धान्त को समझाते हैं जो हमने श्रीवचन भूषण सूत्र में पहले देखा। यहाँ वे बताते हैं कि कैसे भगवान को पाये और कैसे पुरी तरह से उन पर निर्भर रहे इसके सर्वोच उदाहरण है सीताजी, द्रौपदी और आण्डान्।
  • वार्ता माला 234 – यहाँ सामान्य शास्त्र (वर्णाश्रम धर्म) से अधिक विशेष शास्त्र (भागवत धर्म) के महत्व पर ध्यान केंद्रित करने पर बल दिया गया है और यह बताया गया है कि हमें यह नहीं सोचना चाहिये की ऐसी निष्ठा मात्र अत्यधिक ऊँचे अधिकारियों जैसे भरतजी, आण्डान् के लिये सम्भव है। अपितु हर किसी को उसके लिये प्रयास करना चाहिये और भगवान की कृपा से हम भी इस विश्वास में दृढ हो जायेंगे।

इस प्रकार हमने तिरुक्कण्णमन्गै आण्डान् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। हम भी उनके श्रीचरण कमलो में प्रार्थना करें कि हमे भी भगवान पर इस तरह का पूर्ण विश्वास प्राप्त करें ।

अडियेन् भगवति रामानुज दासि

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तिरुमालै आण्डान (मालाधर स्वामी)

श्रीः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल मुनये नमः

thirumalai-andan

तिरुनक्षत्र:   कुम्भ मास, मघा नक्षत्र
अवतार स्थल: तिरुमालिरुन्चोलै
आचार्य: आळवन्दार
शिष्य: श्री रामानुजाचार्य (ग्रन्थ कालक्षेप शिष्य)

तिरुमालै आन्डान् आलवन्दार के मुख्य शिष्यों मे एक थे । वे मालाधर और श्री ज्ञानपूर्ण स्वामी के नामों से सुपरिचित थे ।

आळवन्दार एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य) को हमारे सत्सम्प्रदाय के विभिन्न दृष्टिकोणों (विषय-तत्त्वों) को पढ़ाने के लिए अपने ५ प्रथम शिष्यों को निर्देश किये थे | उनमें से तिरुमालै आन्डान् को तिरुवाय्मोलि का अर्थ-शिक्षण की जिम्मेदारी दी गई थी| आलवन्दार के परमपद प्राप्ति और श्री रामानुजाचार्य के श्रीरंगम प्रवास होने के बाद तिरुकोष्टियूर नम्बि ने श्री रामानुजाचार्य को तिरुमालै आण्डान से तिरुवाय्मोलि का गुप्त-अर्थ एवं विशेषणों को समझने के लिये भेजे थे ।

pancha-acharyas

(श्री आळवन्दार इलायालवार (श्री रामानुजाचार्य) को पांच रहस्य सिखाने के लिए पांच नम्बी (आचार्यों) को नियुक्त कर रहे हैं)

तिरुमालै आण्डान ने जैसे आळवन्दार से तिरुवाय्मोलि के अर्थों को सुने वैसे ही श्री रामानुजाचार्य को व्याख्यान करते रहे | लेकिन कई बार, श्री रामानुजाचार्य ने कुछ श्लोकों (पासुरों) का अपना द्रुष्टिकोण (तिरुमालै आण्डान द्वारा बताया अर्थों से अलग अर्थ) प्रस्तुत किये । ऊसे सुनकर तिरुमालै आण्डान सोचते थे कि श्री रामानुजाचार्य स्वविचार, जो आलवन्दार के व्याख्याननुरूप से भिन्न है, को प्रस्तुत कर रहे थे । क्योंकि उन्होंने ऐसा निर्वचन आलवन्दार से कभी नहीं सुना था ।

इस तरह एक बार, आण्डान ने तिरुवाय्मोलि “२. ३. ३ – अरिया कालत्तुल्ले” पासुर की व्याख्या ऐसे किया – “आळ्वार सन्ताप से कह रहे हैं कि भगवान् श्रीमन्नारायण उनको निष्कलंक ज्ञान देने के बाद भी उसे इस शरीर के साथ इसी संसार में रखा है” । लेकिन श्री रामानुजाचार्य इसे दूसरे तरीके से (दूसरी पंक्ति पहले रखकर) देखे थे | उन्होंने कहा – कि वास्तव में यह पासुर में आल्वार के हर्षोत्फुल एवं सुखमय भाव अभिप्रेत है अर्थात् आलवार बहुत ख़ुशी में भगवान से कहते हैं कि “अनाधिकाल से मैं इस संसार में पीड़ित था | आपने मुझे इस अनायात से बचाया | क्योंकि इस दशक (१० श्लोक में) आलवार के पूर्ण आनंद का रहस्योद्घाटन करता है |” यह सुनकर आण्डान बहुत परेशान हुए और बोले थे कि ऐसे अर्थ को आळवन्दार से कभी नहीं सुना | जैसे विश्वामित्र मुनि ने त्रिशंगु महाराज के लिए एक नया लोक का निर्माण स्वयं किये थे , वैसे श्री रामानुजाचार्य नए अर्थों का सृजन कर रहे थे | ऐसे बोलकर उन्होंने अपना व्याख्यान भी बंद कर दिया | यह सुनकर तिरुक्कोष्टियूर नम्बी तुरंत तिरुक्कोष्टियूर से श्रीरंगम आये और आण्डान से इस घटने के बारे में पूछे | आण्डान बोले कि श्री रामानुजाचार्य आळवन्दार से अनसुना अर्थों को बताते हैं | जब आण्डान पूरी घटना बताये, तब नम्बी कहे कि वे स्वयं आळवन्दार से इसी अर्थ को सुना है और यह श्लोक (पासुर) का एक मान्य स्पष्टीकरण है | उन्होंने आगे कहा कि “जैसे भगवान् श्रीमन्नारायण (श्री कृष्ण) ने सांदीपनी मुनि से सीखा था , वैसे रामानुजाचार्य आप से तिरुवाय्मोलि सीख रहे हैं | आळवन्दार के विचार से भिन्न श्री रामानुजाचार्य कुछ् नहीं बोलेंगे । यह मत समझना कि श्री रामानुजाचार्य को जो भी आप सिखाते हैं वो उसे पहली बार सुन रहे हैं |” फिर वे आण्डान और पेरियनम्बी को श्री रामानुजाचार्य के मत में लाकर श्री रामानुजाचार्य को आण्डान से श्रवण पुनर्प्रारंभ करने की आवेदन किया |

इसके बाद, श्री रामानुजाचार्य अलग ढंग से एक और श्लोक (पासुर) का अर्थ बताये | आण्डान आश्चर्य से श्री रामानुजाचार्य को पूछे कि बिना आळवन्दार से मिले आप ऐसे अर्थविशेषों को कैसे समझते हैं ? श्री रामानुजाचार्य बोले कि जैसे एकलव्य के द्रोणाचार्य थे वैसे मुझे आळवन्दार हैं | (एकलव्य सीधे द्रोणाचार्य से मिले बिना उनसे सब कुछ सीखा था |) आण्डान श्री रामानुजाचार्य की महानता को समझे और उनको अपना सम्मान पेश किया | उनको ये सोचके बहुत हर्ष हुआ कि जो भी अर्थविशेषणों को आळवन्दार से वो सुन नहीं पाये वो सब सुनने का एक और अवसर मिला  |

ऐसे कई पासुर है जिनकी व्याख्या श्रवण में, आण्डान और श्री रामानुजाचार्य के विभिन्न दृश्यकोण (विचारों) को देख सकते हैं जो निन्मलिखित हैं :

तिरुवाइमोळि १.२ – नमपिल्लै व्याख्यान – “वीडुमिन मुट्रवुम्”  

परिचय अनुभाग – आळवन्दार से सुना आण्डान, श्री रामानुजाचार्य को इस दशक को प्रपत्ति योग का विवरण जैसे व्याख्यान किये | श्री रामानुजाचार्य भी आरम्ब में वही दृष्टिकोण का पालन किये | लेकिन श्री भाष्य पूरी करने के बाढ़ में उन्होंने इस दृष्टिकोण को बदलके इस दशक को भक्ति योग विवरण जैसे व्याख्यान करने लगे | श्री रामानुजाचार्य प्रपत्ति को “साध्य भक्ति” नाम से पृथक किये, क्योंकि प्रपत्ति योग सबसे गोपनीय है और आसानी से गलत व्याख्यान किया जा सकता है (“मैं हूँ भक्ति कर्ता और भोक्ता ” ऐसे अहंभाव के बिना सिर्फ श्रीमन्नारायण के आनंद के लिए जो भक्ति होता है वही साध्य भक्ति है) | यह साध्य-भक्ति उपाय/साधन-भक्ति से अलग है (जो अक्सर भक्ति योग नाम से प्रख्यात है ) | श्री गोविन्द पेरुमाळ भी श्री रामानुजाचार्य की ऐसे दृष्टिकोण का पालन किये |

तिरुवाइमोळि २.३.१ – नमपिल्लै व्याख्यानम् – “तेनुम पालुम् अमुदुमोत्ते कलन्दोळिन्दोम्

इस पासुर का व्याख्यान आण्डान ने ऐसे किया था – “आळ्वार बोलते हैं कि जैसे शहद और शहद या दूध और दूध स्वाभाविक रूप से अपने आप में मिश्रण होता हैं वैसे ही श्रीमन्नारायण और मैं समेकित हो गये |” लेकिन श्री रामानुजाचार्य उसका व्याख्यान ऐसे किये – आळ्वार कहते हैं कि हम (मैं और श्रीमन्नारायण) इस प्रकार मिले जिससे मधु, दूध और चीनी आदि मीठे सामग्री के मिश्रण से प्राप्त अमृतमय भोग्यवस्तु का पूर्ण अनुभव किये |

नाचियार् तिरुमोळि ११.६ व्याख्यान में पेरियवाचान् पिल्लै ने आण्डान का आचार्य भक्ति को स्वयं दिखाते हैं – आण्डान कहा करते थे कि “यद्यपि हमें इस शरीर और उससे संबंधित सारे बंधनों को छोड्ना चाहिये परन्तु मुझे इस शरीर की उपेक्षा करना अमान्य है, क्योंकि मुझे इस शरीर से ही आलवन्दार का संबंध प्राप्त हुआ।”

नायनार् आचान् पिल्लै ने अपने चरमोपाय-निर्णय ग्रन्थ में प्रदर्शन किये कि एक बार तिरुमालै आण्डान “पोलिग पोलिग” श्लोक (पासुर) (तिरुवाइमोळि ५.२) का व्याख्यान करते समय तिरुक्कोश्टियूर नम्बि घोष्टि (भक्त समूह) में प्रकट किये कि इस श्लोकम में वर्णित श्री रामानुजाचार्य ही है । इसे सुनकर  आण्डान को परमानंद की प्राप्ति हुई और श्री रामानुजाचार्य को तब से अपना आचार्य अलवन्दार मानकर यही घोषित किये । इस घटना के बारे में और जानकारी के लिए इस हाइपरलिंक को दबाएं – http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html

आइये हम तिरुमाळै आण्डान के कमल चरणों में प्रणाम करें जो आळवन्दार और श्री रामानुजाचार्य से बहुत संलग्न थे ।

आण्डान् का ध्यान श्लोक 

रामानुज मुनीन्द्राय द्रामिडी सम्हितार्थदम् |
मालाधर गुरुम् वन्दे वावधूकम् विपस्चितम् || 

अडियेन् लक्ष्मी नरसिंह रामानुज दास

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Source: https://guruparamparai.wordpress.com/2013/02/24/thirumalai-andan/