Monthly Archives: May 2015

पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्री शैलपूर्ण स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः periya-thirumalai-nambi

जन्म नक्षत्र: वैशाख, स्वाति

अवतार स्थल: तिरुमला (तिरुवेंकटम)

आचार्य: आलवन्दार

शिष्य: एम्पेरुमानार (ग्रंथ कालक्षेप शिष्य), मलैकुनिय निन्र पेरुमाल, पिल्लै तिरुक्कुलामुदैयार, भट्टारियरिल शठगोपदासार

तिरुमलै नम्बि का जन्म तिरुमला में श्री वेंकटेश भगवान के आशीर्वाद से हुआ। वे आलवन्दार के प्रधान शिष्यों में से एक थे। उन्हें श्री शैलपूर्ण के रूप में भी जाना जाता है। श्री वेंकटेश भगवान के प्रति उनके वृहद प्रेम और लगाव के लिए भगवान ने उन्हें ” पितामह ” के रूप में सम्मानित किया।

आलवन्दार ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें तिरुमलै नम्बि को श्री रामायण, जो हमारे संप्रदाय में शरणागति शास्त्र के रूप में प्रसिद्ध है, का अर्थ समझाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे और उन्होंने ही उनके जन्म के बाद उन्हें “इळैयाळ्वार” नाम प्रदान किया था। उन्हें तिरुमला दिव्यदेश के श्रीवैष्णवों में अग्रणी स्थान प्राप्त है। वे तिरुमला के श्रीनिवास भगवान के नित्य कैंकर्य परार थे और तिरुमला में आकाश गंगा (पानी के स्तोत्र) से प्रतिदिन तीर्थ लाने के कार्य में लगे हुए थे।

एम्पेरुमानार गोविंद को फिर से संप्रदाय में लाने की इच्छा से (क्यूँकि वाराणसी यात्रा के दौरान गोविंद उल्लन्गै  कोनर्न्थ नायनार बनकर कालहस्ती में देवांतर का अनुसरण करने लगते है) एक श्रीवैष्णव के माध्यम से तिरुमलै नम्बि से अनुरोध करते हैं कि वे जाये और गोविंद को संप्रदाय में फिर से लेकर आये।

तिरुमलै नम्बि, तुरंत अपने शिष्यों और एक श्रीवैष्णव (जो बाद में श्रीरंगम लौटकर पूरा वृतांत एम्पेरुमानार को सुनाते हैं ) के साथ गोविंद से मिलने के लिए कालहस्ती की ओर प्रस्थान करते हैं। जिस मार्ग से गोविंद जाया करते थे, नम्बि वहीँ पर एक वृक्ष की छाया में अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। तभी गोविंद शिव भक्त के वेश में, रूद्र माला लिये हुए, सारे शरीर पर भभूत लगाये हुए रूद्र के वैभव को गाते हुए वहाँ आते हैं। नम्बि श्रीमन्नारायण भगवान का मंगल गान करते हैं जिसे गोविंद बहुत जिज्ञासा से देखते हैं। कुछ दिनों बाद नम्बि उसी जगह उसी समय पर लौटते हैं और आलवन्दार द्वारा रचित स्त्रोत्र रत्न के ११वें श्लोक (जो श्रीमन्नारायण की प्राकृतिक सर्वोच्चता और अन्य देवताओं की भगवान पर निर्भरता को स्थापित करता है) को एक ताड़ के पत्ते पर लिखते हैं जो फिसल कर नीचे गिर जाता है। वहाँ से जाते हुए गोविंद उसे उठाते हैं, पढ़ते हैं और उसे फिर से वहीँ गिरा देते हैं । लौटते हुए वे उस ताड़ के पत्ते को खोजते हैं और उसे प्राप्त करके उस श्लोक के दिव्य अर्थ पर गहराई से विचार करते हुए नम्बि के पास जाकर उनसे पूछते हैं कि क्या वह प्रलेख उनका है? गोविंद और तिरुमलै नम्बि के बीच उस समय एक संवाद होता है जहाँ नम्बि श्रीमन्नारायण भगवान की सर्वोच्चता पर गोविंद के सभी संदेहों का स्पष्टीकरण करते है। मुख्यतः आश्वस्त होकर गोविंद वहाँ से चले जाते हैं। तत्पश्चात नम्बि फिर उस स्थान पर आते हैं जहाँ गोविंद रूद्र के लिए पेड़ से फूल तोड़ रहे थे। नम्बि “तिण्णन् वीडु” पद (तिरुवाय्मोळि 2.2) का व्याख्यान शरू करतें हैं जिसमें आलवार भगवान की सर्वोच्चता के बारे में बात करते हैं। नम्बि बड़ी सुंदरता से चौथे पासूर का व्याख्यान करते हैं जहाँ नम्माल्वार स्थापित करते हैं कि पुष्प और आराधना की उप्युक्तता तो केवल भगवान श्रीमन्नारायण को समर्पित करने में ही है। यह सुनकर गोविंद तुरंत पेड़ से कूदते हैं और नम्बि के चरण कमलों में लेट जाते हैं। वे अपनी अब तक की अनावश्यक संगति के लिए रुदन करते हैं और नम्बि से उन्हें स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। नम्बि तत्काल उन्हें उठाकर सांत्वना देते हैं। गोविंद कालहस्ती से अपने सारे संबंध त्याग देते हैं और कोष की चाबियाँ स्थानीय रूद्र भक्तों को सोंप देते हैं। वे लोग बताते हैं कि रूद्र पिछली रात उनके स्वप्न में आये और उन्हें बताया की एम्पेरुमानार सभी को सच्चे ज्ञान प्रदान करने के लिए इस दुनिया में अवतरित हुए हैं और गोविंद को रूद्र के प्रति लगाव त्यागने पर रोका नहीं जाना चाहिए, इसलिए वे लोग उन्हें प्रसन्नता से विदा करते हैं।

तिरुमला लौटने पर नम्बि गोविंद का उपनयन संस्कार और पंच संस्कार विधिपूर्वक पूर्ण करते हैं और उन्हें आलवारों के दिव्य प्रबंधन सिखाते हैं।

एक बार एम्पेरुमानार तिरुपति पधारते हैं और भगवान् के मंगलाशासन के लिए तिरुमला पहाड़ पर चढाई करते हैं, नम्बि स्वयं द्वार पर जाकर एम्पेरुमानार का स्वागत और बहुमान करते हैं। नम्बि, जो अत्यंत योग्य हैं , एम्पेरुमानार से ज्येष्ठ हैं और उनके आचार्य भी हैं , उनसे एम्पेरुमानार पूछते हैं कि आपने स्वयं यहाँ आने का कष्ट क्यों किया, स्वागत के लिए किसी को भी भेज देते? नम्बि, अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि उन्होंने आस पास सभी स्थानों पर देखा परन्तु स्वयं से कम योग्य किसी को नहीं पाया। एम्पेरुमानार श्री वेंकटेश भगवान का मंगलाशासन करके तिरुमला से प्रस्थान करते हैं ।

पेरिया तिरुमलै नम्बि की श्री रामायण कालक्षेप गोष्ठी

श्री रामानुज, तिरुमलै नम्बि से श्री रामायण सीखने के लिए तिरुपती आते हैं । वे वहाँ एक वर्ष तक निवास करते हैं । कालक्षेप के अंत में तिरुमलै नम्बि एम्पेरुमानार से कहते हैं कि वे उनसे कुछ स्वीकार करे। एम्पेरुमानार नम्बि से कहते हैं कि वे गोविंद को उनके साथ भेज दे। नम्बि प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं और एम्पेरुमानार गोविंद के साथ तिरुपति से प्रस्थान करते हैं। परन्तु गोविंद अपने आचार्य से वियोग सहन न कर सकने पर कुछ समय बाद तिरुपति लौट आते है। परन्तु तिरुमलै नम्बि गोविंद से यह कहते हुए कोई बात नहीं करते कि वे एम्पेरुमानार की संपत्ति हैं और उन्हें तत्काल उनके पास लौट जाना चाहिए। ऐसी उनकी निष्ठा थी। इस द्रष्टांत का वर्णन http://ponnadi.blogspot.com/2013/01/embars-acharya-nishtai.html में किया गया है। तदन्तर गोविंद सन्यास आश्रम स्वीकार करते हैं और एम्बार नाम से जाने जाते हैं।

नम्बि के वैभव और उनके विवरण इस व्याख्यान में बहुत से स्थानों पर दर्शाए गये हैं। उनमें से कुछ हम अब देखेंगे:

  • तिरुप्पावै 14 – अजहगीय मनवाल पेरूमल नायनार – “चेंगल पोदिक्कूरै वेन्पल थवथ्थवर” का नम्बि द्वारा दिया गया विवरण यहाँ समझाया गया है। नम्बि समझाते हैं कि क्यूंकि गोपियों को उठाते हुए हम सुबह के समय में होने वाली शुभ घटनाओं को दर्शाना चाहते हैं, इन्हें अच्छे सन्यासी की तरह देखना चाहिए जो सुबह जल्दी जागते हैं और भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर जाते हैं।
  • नाच्चियार तिरुमोळि 10.8 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान– ऐसा पाया गया है कि ये पासूर (मळैयै मळैयै) और अगला पासूर (कदलै कदलै) नम्बि के प्रिय पासूर थे। इन पासूरों में आण्डाल श्री वेंकटेश भगवान के वियोग में अपनी भावनाओ को उन तक पहुँचाने के लिए अपने सन्देश वाहक के रूप में बादलों को भेजती है। हर बार जब भी नम्बि इन पसूरों का पाठ करते थे, वे भावनाओ से अभिभूत होकर आवक रह जाते थे। नम्बि के इस लगाव के कारण, हमारे आचार्यों का इन पसूरों से प्रगाढ़ प्रेम है।
  • तिरुविर्रुथम 3 – नम्पिळ्ळै व्याख्यान– पिल्लै तिरुनरैयूर नम्बि समझाते हैं कि पेरिया तिरुमलै नम्बि, आलवार के मन को दर्शाते हैं जहाँ आलवार सोचते हैं कि उनका भागवत अनुभव मात्र “मानस साक्षात कारम् (दिव्य आंतरिक द्रष्टि) है अथवा वह बाह्य द्रष्टि और अनुभव में भी विकसित होगा।
  • तिरुवासीरियम 1 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – भगवान् की सुंदरता को समझाते हुए आलवार कहते हैं कि वे एक हरे भरे पर्वत के सामान है जो शयन किये हुए दिखाई देते हैं। वे आराम के लिए “तून्गुवदु” के बजाये “कण्वळर्वदु” शब्द का प्रयोग करते हैं। जहाँ “कण्वळर्वदु” आराम के लिए एक उच्च शब्द है वहीँ “तून्गुवदु” बोलचाल में प्रयोग किये जाने वाला सामान्य शब्द है। पेरिया तिरुमलै नम्बि की शब्दों कि दक्षता को एक द्रष्टांत के द्वारा यहाँ समझाया गया है। नम्बि, एम्पेरुमानार द्वारा किसी को समझाने के विषय में कहते है “स्वर्ण से बनी हुई होने पर भी वह व्यक्ति कानों की बालियाँ नहीं पहन सकता”। यहाँ नम्बि का आश्रय ऐसे व्यक्ति से है जिसे सर्वोत्तम उपदेश दिए जाये तो भी वह उसे नहीं सुनेगा। नम्बि, उस सिद्धांत को समझाने के लिए महान शब्दों का प्रयोग करके यह दर्शाते हैं कि श्री वैष्णव को अपनी सभी अभिव्यक्तियों के लिए सम्मानित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
  • तिरुवाय्मोळि 1.4.8 – नम्पिळ्ळै व्याख्यान – इस पासूर में आलवार (नायिका भाव में) एक पक्षी से (जिसे उन्होंने भगवान के पास दूत के रूप में अपनी स्थिति बताने भेजा था) कहते हैं कि उन्होंने अपनी सारी शारीरिक शक्ति और सौंदर्य को खो दिया है और भगवान से वियोग में वे बहुत कमज़ोर हो गए हैं। आलवार उस पक्षी से स्वयं अपना भोजन खोजने के लिए कहते हैं क्यूंकि अब वे उसके लिए ऐसा नहीं कर सकते। इस परिपेक्ष्य में नम्पिळ्ळै, पेरिया तिरुमलै नम्बि के चरित्र को दर्शाते हैं। अपने अंतिम दिनों में नम्बि अपने अर्चा भगवान- वेण्णैक्कादुम पिल्लै (श्री कृष्ण के वह स्वरुप जो माखन के लिए नृत्य करते हैं) के पास जाते हैं और कहते हैं कि अब वे बहुत कमज़ोर हो गये हैं और भगवान को अपने देखभाल के लिए किसी और को खोज लेना चाहिए।

तिरुमलै नम्बि द्वारा स्थापित एम्पेरुमानार के वैभव को चरमोपाय निर्णय नामक दिव्य ग्रंथ में दर्शाया गया है और उसे http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html पर देखा जा सकता है।

इस तरह हमने तिरुमलै नम्बि के वैभव की कुछ झलकियाँ देखी।

हम तिरुमलै नम्बी के श्री चरण कमलों में साष्टांग प्रणाम करते हैं, जिनका आळवन्दार और एमपेरुमानार के प्रति विशेष लगाव था।

टिप्पणी: ६००० पद गुरु परंपरा प्रभाव और पेरिया तिरुमुड़ी अदैवू में नम्बि का जन्म नक्षत्र चित्रा- स्वाति दर्शाया गया है, परन्तु वाजही तिरुनाम में उसे वैशाख- स्वाति बताया गया है और नम्बि का जन्म उत्सव इसी दिन मनाया जाता है।

तिरुमलै नम्बि की तनियन

पितामहस्यापि पितामहाय प्राचेतसादेचफलप्रदाय।
श्रीभाष्यकारोत्तम देशिकाय श्रीशैलपूर्णाय नमो नमः स्तात् ।।

अडियेन् भगवति रामानुज दासी

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सोमासियाण्डान् (सोमयाजि स्वामीजी)

  श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

ramanuja_srirangam

रामानुजाचार्य

जन्म नक्षत्र – चैत्र मास आर्द्रा नक्षत्र

अवतार स्थल – काराञ्ची

आचार्यरामानुजाचार्य

रचना श्रीभाष्य-विवरण , गुरु-गुणावली (रामानुजाचार्य कि महिमा के बारे में वार्ता), संक्षेप-षडर्थ

सोमासियाण्डान् (सोमयाजि स्वामीजी) सोम यज्ञ की अनुष्ठान करने वाले परिवार में पैदा हुए. बचपन में उनका नाम श्री राममिश्र था |  वे ७४ सिंहासनाधिपति [ आचार्यों] में से एक थे | इन ७४ सिंहासनाधिपति को स्वयं रामानुजाचार्य ने, हमारे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की उन्नति के लिए नियमित किया था | वे सोमयाजियार के नाम से भी जाने जाते थे. श्री-भाष्य का विवरण पहले उन्ही ने लिखा था | सोमयाजि स्वामीजी का वंश आज भी श्रीरंगम पेरियकोविल में वाख्य पंचांग का संकलन करने का कैंकर्य कर रहे हैं | श्रुतप्रकाशिक भट्टर, नायनार आच्चान पिल्लै और वेदांताचार्यार स्वामी ने अपने ग्रंथों में सोमयाजि स्वामीजी के श्रीसूक्तियों को निर्दिष्ट किया है |

कृपामात्र प्रसन्नाचार्यों का महत्व समझाने के लिए नायनार आच्चान पिल्लै स्वामी अपने “चरमोपाय निर्णय” ग्रन्थ में सोमयाजि स्वामीजी के “गुरु-गुणावली” ग्रंथ से श्लोक उद्धृत है | उन आचार्यों को “कृपामात्र प्रसन्नाचार्य” कहते हैं जो सिर्फ अपने कृपा के माध्यम से, उन सभी का उत्थान करने की अभिलाषा लेते हैं जो संप्रदाय के तत्त्वज्ञान मे दिलचस्पी रखते हैं|

यस्सापराधान् स्वपधप्रपन्नान् स्वकीयकारुण्य गुणेन पाति
स एव मुख्यो गुरुरप्रमेयस् तदैव सद्भिः परिकीर्त्यदेहि || 

अर्थ : वो आचार्य जो अपने अत्यंत कृपा के कारण अपने शिष्यों की रक्षा और उद्धार करते हैं, वैसे आचार्य ही सबसे मुख्य होते हैं | यही हमारे संप्रदाय का अटल विश्वास है और सम्प्रदाय के अधिक से अधिक भरोसेमंद लोगों की भी यही विश्वास है |

चरमोपाय निर्णय में एक ऐसी घटना के बारे में लिखा गया है जो स्वामी रामानुजाचार्य की अकारण कृपा पर प्रकाश डालता है | इस अकारण और दिव्य कृपा के पात्र बनकर ही स्वामी सोमयाजि स्वामीजी के दिल में सांसारिक सुखों से अलगाव पैदा हुआ |

सोमयाजि स्वामीजी , स्वामी रामानुजाचार्य के चरणो में आत्मसमर्पण करके कैंकर्य में लगे थे और तदनंतर अपने जन्म स्थान [कारांची] को वापस लौटे और कुछ और समय तक वहाँ रहे | जन्म स्थान जाने के कुछ ही दिनों में उनका दिल स्वामी रामानुजाचार्य के चरण कमलों के प्रति और आकर्षित हुआ लेकिन उनके पत्नी उनके जाने से सहमत नहीं थी और इस लिए सोमयाजि स्वामीजी ने रामानुजाचार्य की एक मूर्ती बनवाकर उसकी पूजा करने का निर्णय लिया | लेकिन सोमयाजि स्वामीजी उस मूर्ती की बनावट से संतुष्ट नहीं थे | उन्होंने एक मूर्तिकार से पुराने मूर्ती को नष्ट करके एक नई मूर्ती बनाने को कहा | उस रात, स्वामी रामानुजाचार्य सोमयाजि स्वामीजी के स्वप्न में आकर पूछे, ” मेरे पुराने मूर्ती को नष्ट करने की क्या अवश्यकता है? तुम जहाँ भी हो, अगर तुम यह नहीं समज सकते कि मेरे अभिमत अर्थात् मेरे उद्धार मे पूर्ण विश्वास नहीं है, तो यह मूर्ति बने तो भी तुम इससे भला क्या पा सकते हो? मेरे उद्धार पर अविश्वास होते हुए क्या मेरे मूर्ति पर लगाव हो सकता है?” सोमयाजि स्वामीजी अनायास अपने स्वप्न से जाग ऊठे, उस मूर्ति को एक सुरक्षित जगह पर रखकर, तुरंत अपने सांसारिक सुखों को त्याग दिया और श्रीरंगम कि ओर निकल पड़े |

श्रीरंगम पहुंचते ही स्वामी रामानुजाचार्य के चरण कमल पर आ पड़े और स्वामी के चरणो को अपने आसुओं से भिगा दिया | रामानुजाचार्य उनसे कारण पूछने पर, सोमयाजि स्वामीजी अपने स्वप्न के बारे में बताते हैं | स्वामी रामानुजाचार्य की दिव्य मुकुट पर, हमेशा कि तरह, एक बँध-मुस्कान दिखाई दी |  रामानुजाचार्य सोमयाजि स्वामीजी से कहते हैं , ” हे अबोध, पधारो ! मैंने यह सारी नाटक तुम्हे इस सांसारिक समस्याओं के  भार से मुक्त करने के लिए किया था | तुम्हे मेरी सराहना न हो फिर भी मुझे हमेशा तुम्हारी ख़्याल रहती है | मैं कभी मेरे शिष्यों को त्यागता नहीं  | जहाँ भी तुम हो, मेरी अनुकूलता सदैव तुम्हारी ओर हमेशा होगी, अथार्थ तुम्हारी अंतिम लक्षय जरूर पूरी होगी | निश्चिंत और आनंद से रहो ” | पेरियावाच्चान पिल्लै ने इस कथा का व्याख्यान दिया है | इस कथा के दौरान स्वामी रामानुजाचार्य, सोमयाजि स्वामीजी को ही नहीं बल्कि हम सभी भद्धात्माओं को यह सत्य समझाया कि उनके  चरण कमल के संबद्ध से सारे श्री वैष्णव जन निश्चिंत और आनंद से रह सकते हैं |

तिरुनेडुन्ताण्डकम् 27पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – तिरुमंगै-आळ्वार (परकाल स्वामीजी – नायिका भाव में) एक सारस को अपने प्यार का दूत बनाकर तिरुकन्नपुरम के भगवान के पास, अपने दिल की बात व्यक्त करने हेतु भेंजी | पेरियावाच्चान पिल्लै स्थापित करते हैं कि तिरुमंगै-आळ्वार जब “तिरुकन्नपुरम ” का नाम लेते हैं तो उनमे एक अद्भुत और अनोखी मनोदशा होती है और वो मनोदशा बड़ी लाजवाब है | यह ऐसी एक अतुल्य और विशेष मनोदशा है जो स्वामी अनंताल्वान “तिरुवेंकटम“, भट्टर स्वामी “अलगिय मणवाल पेरुमाल” और सोमयाजि स्वामीजी “एम्पेरुमानारे चरणम् ” कहते समय प्राप्त होती है | हम जैसे साधारण जन ऐसे शब्द उच्चारण करने की इच्छा तो ज़रूर प्रकट कर सकते हैं मगर उन महापुरुषों की यह मनोदशा पाना असंभव और अकल्पनीय है |

तिरुवाय्मोळी 6.5.7नंपिल्लै ईडु व्याख्यान – पहले कही गयी उसी सिद्धांत को यहाँ दूसरी दृष्टिकोण  में दर्शाया गया है |  यहाँ नम्माल्वार [ परांकुश नायिका भाव में ] तुलैविल्लीमंगलम भगवान के संबन्ध को प्राप्त करने की लालसा-दशा को दर्शा रही थी | नम्पिल्लै यहाँ स्थापित करते हैं कि जब परांकुश नायकी एम्पेरुमान का नाम अपने होठों पे लेती है तो उन नामों की सुंदरता बढ़ती रहती है, बिलकुल वैसे जैसे अनंताल्वान, भट्टर और सोमयाजि स्वामीजी के महिमा से “तिरुवेंकटम” , “अलगिय मणवाल पेरुमाल” और “रामानुजाचार्य ” के नामों की सुंदरता बढ़ती है | यह अनोखी सुंदरता का रहस्य इन महानों का बेमिसाल प्यार और विशेष मनोदशा ही है |

वार्तामाला में कुछ कथाएँ हैं जो सोमयाजि स्वामीजी के यश और महिमा के बारे में प्रकाश डालते हैं | उनमे से कुछ अब हम देखेंगे:

  • 126 – यहाँ सोमयाजि स्वामीजी बहुत ही सुन्दर रूप से यह स्थापित करते हैं कि एक प्रपन्न [ जो शरणागति-मार्ग चुने हो] को केवल सर्वेश्वर श्रीमन नारायण ही उपाय होते हैं |  भगवान की कृपा का पात्र बनना हो तो स्वप्रयास त्यागे और भगवान की शरण कमल में आश्रय ले |  न भक्ति न प्रप्पति वास्तविक उपाय होते हैं, सिर्फ वो श्रियपति जिसपर हमारा सारा भोज होती है, वही सत्यसंकल्प, जो हमारे अंतिम लक्ष्य को प्रधान करते हैं, सत्य में हमारे उपाय होते हैं |
  • 279 – अप्पिळ्ळै [ सोमयाजि स्वामीजी से उम्र में छोटे तो थे लेकिन सुव्यवस्थित और महान श्रीवैष्णव थे] सोमयाजि स्वामीजी  को इस प्रकार सलाह दिया , “सोमयाजि स्वामीजी, आप तो बड़े पड़े- लिखे , सयान महापुरुष हैं जो हमारे पूर्वाचार्य के विश्वासों और रचनाओं को मानते हैं | आप को श्रीभाष्यम् और भगवद विषयों पर ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार है | फिर भी, कृपया आप अपने धोती में एक पट्टी भांध लीजिये ताकी आप किसी भी तरह की भागवद-अपचार में न फँसें | ” उन दिनों में यह एक मामूली तरीका था जब किसी भी चीज़ या विषय की याद दिलाने के लिए कोई अपनी धोती में पट्टी भांध लेता है. जब वह उस पट्टी को देखे तो उसे उस विषय की याद आ जायेगी जिसे वह भूल गया हो. यहाँ अप्पिळ्ळै , सोमासियाण्डान्  को चेतावनी देते हैं ताकी आण्डान् किसी भी भागवत के खिलाफ अपराध या अपचार न करे क्योंकि वो हमारी स्वरुप-नष्ट कर देती है – बड़े से बड़े शिक्षित और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व भी इस जाल में गिर सकते हैं. इसीलिए स्वामी अप्पिळ्ळै ने स्वामी सोमासियाण्डान् को यह चेतावनी दी.
  • 304 – स्वामी सोमासियाण्डान् यह सलाह देते थे कि मनुष्य कभी भी सांसारिक आनन्दों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. उनके बताये गए कुछ कारण :
    अगर हम समज सकते हैं कि जीवात्मा परमात्मा पर पराधीन है, तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि हमारी अस्तित्व का कारण भगवान की सेवा करना है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि सांसारिक संभंध अस्थायी है और सिर्फ भगवद संभंध स्थायी, शाश्वत और सत्य है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि ये जो शारीरिक सुखों और देहाभिमान से हम पीड़ित हैं वह भी अनित्य है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
  • 375 – जब स्वामी सोमासियाण्डान्  ने यह सुना कि किसी ने एक चरवाहे को दूध चुराने के कारण दंड दिया तो वे मूर्छित गिर पड़े. उन्हें तुरंत मैय्या यशोदा और कन्हैय्या की याद आ गयी. वे भावनाओं से अभिभूत हो गए यह सोचकर कि यशोदा मैय्या भी कृष्ण को इसी तरह मक्खन चुराने के लिए दंड दी होगी. स्वामी सोमासियाण्डान् की इस अद्बुत अनुभव, और सारे पूर्वाचार्यों के अनुभव की तरह, अवर्णनीय ही है|

इस प्रकार स्वामी सोमासियाण्डान् की शानदार जीवन की झलक हमें मिली है. वे पूरी तरह से भागवत कैंकर्य और निष्ठा में तल्लीन थे और स्वामी एम्बेरुमानार के प्रिय शिष्यों में से एक थे| आज हम सब स्वामी सोमाजि आण्डान् के शरण कमल में प्रार्थना करें कि हमारे इस जीवन काल में, उस कैंकर्य सागर की एक बूंद हम भी पी सके|

सोमासियाण्डान्  तनियन (ध्यान श्लोक ) :

नौमि लक्ष्मण योगीन्द्र पादसेवैक धारकम्
श्रीरामक्रतुनातार्याम श्रीभाष्यामृत सागरम्

अडियेन जानकी रामानुज दासी

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वन्गि पुरत्तु नम्बि

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य) और् वन्गि पुरत्तु नम्बि

जन्म नक्षत्र: जानकारी प्राप्त नहीं

अवतार स्थल: जानकारी प्राप्त नहीं (संभवतः वन्गिपुरम जो उन के पिताश्री का पैतृक गाँव है या श्रीरंगम, जहाँ मणक्काल् नम्बि के शिष्य बनने के बाद उन के पिताश्री वन्गि पुरत्तु आचि निवास करते थे)

आचार्य: एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य)

शिष्य: सिरियाथ्थान

रचना: विरोधी परिहार

वन्गि पुरत्तु आचि, मणक्काल् नम्बि के शिष्य थे। वन्गि पुरत्तु नम्बि, जो वन्गि पुरत्तु आचि के पुत्र हैं , वे एम्पेरुमानार के शिष्य हुए।

विरोधी परिहार ग्रंथ (जो हमारे सम्प्रदाय के उत्कृष्ट ग्रंथो में से एक है) के प्रकाशन में उनकी अहम भूमिका थी। एक बार वन्गि पुरत्तु नम्बि, एम्पेरुमानार के पास जाते हैं और उनसे पूछते हैं कि संसार में रहते हुए एक प्रपन्न को क्या-क्या बाधाओं का सामना करना पड़ता है? एम्पेरुमानार उन्हें प्रपन्न के सामने आने वाली 83 बाधाओं की सूची बताते हैं। वन्गि पुरत्तु नम्बि ने शब्दशः इन सभी 83 बाधाओं को विस्तृत विवरण के साथ “विरोधी परिहार” नामक ग्रंथ में संग्रहित किया है। इस ग्रंथ में हमारे जीवन के सभी पहलुओं का परत दर परत विश्लेषण किया गया है और सभी पहलुओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश प्रस्तुत किया गया है।

वन्गि पुरत्तु नम्बि के पुत्र का नाम वन्गि पुरत्तु आचि है और कुछ द्रष्टांतो में उनके विषय में चर्चा की गयी है।

हमारे पूर्वाचार्यों के व्याख्यानों के कई उदाहरणों में नम्बि की महिमा को देखा जा सकता है। उनमें से कुछ हम अब देखते है:

  • नाच्चियार तिरुमोळि 9.6 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान –आण्डाल, भगवान की स्तुति करते हुए कहती है कि भगवान के पास श्री महालक्ष्मीजी के रूप में दिव्य संपत्ति है। इसी संबंध में एक बार, वन्गि पुरत्तु नम्बि अपने शिष्य सिरियाथ्थान को यह निर्देश देते हैं कि – “बहुत से मत /सिद्धांत किसी परम शक्ति को स्वीकार करते हैं, परन्तु हम (श्रीवैष्णव) शास्त्र संमत राय को स्वीकार करते हैं– कि श्रीमन्नारायण भगवान ही परमेश्वर है और जीव के एकमात्र रक्षक है”।
  • पेरिय तिरुमोळि 6.7.4 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में तिरुमंगै आलवार बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण (जो स्वयं परमेश्वर है) यशोदा मैया से डरते थे और माखन चोरी करते हुए पकडे जाने पर रुदन शुरू कर देते थे। इस संबंध में एक बहुत सुन्दर दृष्टांत बताया गया है। एक बार वन्गि पुरत्तु नम्बि, एम्पेरुमानार से तिरुवर्धन क्रम (घर में दैनिक पूजा करने की प्रक्रिया) सीखने की प्रार्थना करते हैं। एम्पेरुमानार अपनी व्यस्ताओं के चलते नम्बि को सिखाने का समय नहीं निकल पाते हैं। परंतु एक बार नम्बि की अनुपस्थिति में, एम्पेरुमानार कुरेश और हनुमत दासार को तिरुवर्धन क्रम का अध्यापन प्रारंभ कर देते हैं। उसी समय नम्बि कक्ष में प्रवेश करते हैं और उन्हें देखकर एम्पेरुमानार कुछ विशेष अनुभव करते हैं। वे कहते हैं “मेरे मन में यह संदेह लम्बे समय से था, परंतु अब मैं समझ सकता हूँ कि भगवान (सर्वश्रेष्ठ होने पर भी) माखन की चोरी करते हुए पकडे जाने पर क्यों भयभीत हो जाया करते थे। मैं अभी उन्हीं भावनाओ का अनुभव कर रहा हूँ। तुम्हारे विनती करने पर भी मैंने तुम्हें तिरुवर्धन क्रम नहीं सिखाया और तुम्हारी अनुपस्थिति में वही ज्ञान मैंने इन दोनों को सीखना आरंभ कर दिया। अपितु मैं आचार्य हूँ और तुम शिष्य और मुझे तुमसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है पर अपने इस कार्य के कारण मुझे तुम्हें देखकर भय का अनुभव हो रहा है।” हमारे एम्पेरुमानार में ऐसी महानता है कि जब उनसे एक गलती हो गयी तब उन्होंने सभी के सामने उसे स्वीकार किया और इसके द्वारा एक महान सिद्धांत को सुंदरता से समझाया।
  • तिरुविरुथ्थम – म्पिल्लै इदु व्याख्यान – प्रस्तावना – म्पिल्लै आलवार के विषय में बताते हैं कि नम्मालवार पहले एक संसारी थे और भगवान की निर्हेतुक कृपा से वे आलवार हुए। परन्तु आलवार के वैभव के अनुरूप विभिन्न आचार्यो ने विभिन्न रूपों में उनका वर्णन किया है – कुछ उन्हें मुक्तात्मा की तरह देखते हैं (वह आत्मा जो संसार से मुक्त हो गया है); अरूलाल पेरुमाल एम्पेरुमानार के एक शिष्य के मतानुसार वे मुक्तजीव नहीं हैं पर प्रतिष्ठा में उन्हीं के सामान है; कुछ के अनुसार वे नित्यसूरी हैं; वन्गि पुरत्तु नम्बि कहते हैं कि नम्मालवार स्वयं भगवान ही हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 7.2.7 – म्पिल्लै इदु व्याख्यान – इस “कंगुलुम पगलुम”, दशक में नम्मालवार माता के भाव में गाते हैं, जहाँ आलवार की मनःस्थिति उनकी माता द्वारा भगवान को बताई जा रही है। दशक के हर पासूर में आलवार (माता के भाव में) भगवान तिरुवरंग की पुकार करते हैं परंतु इस पासूर में वे ऐसा नहीं करते हैं। वन्गि पुरत्तु नम्बि इसे इस तरह समझाते हैं – जब किसी रोगी की स्थिति बहुत बिगड़ जाती है तब वैद्य रोगी के संबंधियों को प्रत्यक्ष् देखते हुए उन्हें सूचित नहीं करता है अपितु वह किसी ओर दिशा में देखते हुए रोगी की दशा उस के संबंधियों को बताता है। वैसे ही, क्यूंकि भगवान के विरह में आलवार की अवस्था बहुत ही गंभीर है, इसलिए इस पासूर में आलवार (मातृ भाव में) भगवान की पुकार नहीं करते अपितु अपनी उस स्थिति की पीड़ा प्रदर्शन करते हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 9.2.8 – नमपिल्लै इदु व्याख्यान – श्रीरंगम के एक श्रीजयंती पुरप्पाडु में वन्गि पुरत्तु नम्बि ग्वालिनों के एक समूह में शामिल हो जाते हैं और वही से भगवान का मंगलशासन करते हैं । दाशरथि स्वामीजी उनसे पूछते हैं की आपने उन ग्वालिनों के समूह में रहकर भगवान के मंगलशासन में क्या कहा? नम्बि कहते हैं “मैंने कहा विजयस्व”। दाशरथि स्वामीजी कहते हैं उन ग्वालिनों के साथ रहते हुए आपको भगवान का मंगल उन्हीं की बोली में करना चाहिए था, न की संस्कृत जैसी कठिन भाषा में।

वार्तामाला के कुछ उदाहरणों में वन्गि पुरत्तु नम्बि (और उन के पुत्र) के गौरव को दिखाया गया है। अब हम उन्हें देखते हैं:

  • वार्तामाला 71 – वन्गि पुरत्तु नम्बि, यतिवर चूड़ामणि दासर को निर्देश देते हैं– जब एक जीवात्मा (जो सूक्ष्म और अक्षम/ असमर्थ है), भगवान को प्राप्त करता है (जो सर्व शक्तिमान, सर्व समर्थ और सर्व व्यापी है), तब उसमें स्वयं जीवात्मा या किसी और का कोई स्वतंत्र प्रयास नहीं है अपितु भगवान की ही निर्हेतुक कृपा है। जीवात्मा के पास केवल दो ही विकल्प है – या तो आचार्य के कृपा पात्र बनकर, द्वय महा मंत्र का अनुसन्धान करते हुए, परमपद जाये या नित्य संसारी बनकर हमेशा के लिए इसी संसार चक्र में पड़े रहे।
  • वार्तामाला 110 – वन्गि पुरत्तु आचि, किडाम्बी आच्चान् को उपदेश देते हैं कि– जो जीवात्मा अनंत समय से इस संसार चक्र में पड़ा है, उन्हें यह विश्वास करना चाहिए कि श्रीलक्ष्मीजी उस जीव को भगवान के श्रीचरणों तक पहुँचाने में अवश्य सहायता करेंगी।
  • वार्तामाला 212 – यहाँ एक सुंदर घटना का वर्णन है। वन्गि पुरत्तु आचि की एक श्रीवैष्णवी शिष्या थी जिनका नाम त्रैलोक्यल थी। एक बार अनंतालवार के श्रीरंगम आगमन पर, वह उनके पास रहकर 6 महीने तक उनकी सेवा करती है। अनंतालवार के लौटने पर जब वह पुनः आचि के पास जाती है तब आचि उनसे उनकी अनुपस्थिति का कारण पूछते हैं। वे बताती हैं कि वे अनंतालवार की सेवा में थी। आचि उनसे पूछते हैं कि क्या उन्होंने तुम्हें किसी बहुमूल्य सिद्धांत का उपदेश दिया। इसके प्रतिउत्तर में वे कहती है “मैंने बहुत वर्षो आपकी सेवा की –आपने दर्शाया की मैं भगवान के श्रीचरण कमलों पर पूरी तरह से आश्रित हूँ। इन 6 महीनो में उन्होंने दर्शाया की मुझे आप के श्रीचरण कमलों पर ही सदा आश्रित होना चाहिए। अनंतालवार ने उस वैष्णवी के द्वारा यह समझाया की हमें सदा श्री आचार्य चरणों पर ही पूर्ण विश्वास करके रहना चाहिए और इस दृष्टांत से यह बात समझा जा सकता है।

पिल्लै लोकाचार्य, मुमुक्षुपडि में वर्णित वन्गि पुरत्तु नम्बि के चरम श्लोक के सार के विषय में बताते हैं। चरम श्लोक प्रकरण के इस भाग में, चरम श्लोक की महिमा को पूरी तरह से दर्शाया गया है। सूत्र 265 – “वन्गि पुरत्तु नम्बि कहते हैं कि श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को विभिन्न द्रष्टांतो द्वारा अपनी श्रेष्ठता और शक्ति दर्शाने के पश्चात चरम श्लोक का उपदेश किया, इसलिए चरम श्लोक के गूढ़ रहस्य को समझना अर्जुन के लिए आसान हुआ। इसके व्याख्यान में, मामुनिगल कहते हैं कि वन्गि पुरत्तु नम्बि “आप्था तमर” है – वह जो हमारी सच्ची आध्यात्मिक भलाई में पूर्णतः लग्न है।

इस प्रकार, हम वन्गि पुरत्तु नम्बि के गौरवशाली जीवन के कुछ झलक देखी है। वह पूरी तरह से भागवत निष्ठा में स्थित थे और स्वयं एम्पेरुमानार को बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

वन्गि पुरत्तु नम्बि की तनियन:

भारद्वाजा कुलोद्भूतम् लक्ष्मणार्य पदाश्रितम्
वन्दे वन्गिपुराधीशम् सम्पूर्णायम् कृपानिधिम् ।।

अडीयेन भगवती रामानुजदासी

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अरुळाळ पेरुमाल एम्पेरुमानार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अरुळाळ पेरुमाल एम्पेरुमानार – तिरुप्पाडगम्

तिरुनक्षत्रम — भरणी, वृश्चिक मास
अवतार स्थान — विन्जिमूर
आचार्यएम्पेरुमानार (भगवत रामानुज)
शिष्य — अनन्ताळ्वान, एच्चान, तोण्डनूर नम्बि, मरुदूर नम्बि आदी
कार्यज्ञान सारम, प्रमेय सारम् आदी

अरुळाळपेरुमाल एम्पेरुमानार ने आन्द्र प्रदेश के विन्जिमूर मे पैदा हुये थे। पहले उन्के नाम यग्य मूर्ति था और वे अद्वैति थे। एक बार वे गंगा स्नान के लिये निकले थे और वहाँ कई विद्वानों को हराय और मायावाद सन्यासी बन गये।  उनके अपार शस्त्र विद्या के कारण वे प्रख्यात हुए और कई लोग उन्के शिष्य हुए। एम्पेरुमानार के कीर्ति के बारे मे सुन कर, यग्य मूर्ति उनसे विवाद करने चाहते थे। वे कई ग्रन्थ को तयारी करके  उनके शिष्यों के साथ एम्पेरुमानार से मिलने के लिए श्रीरंगं आये थे।

एम्पेरुमानार् उनको स्वागत किये और 18 दिन विवाद के लिए तैयारी किये। यग्यमूर्ति ने घोषित किया कि यदी उनके हार हुआ तो वे अपने नाम को एम्पेरुमानार के दर्शन के नाम में बदलेंगे और एम्पेरुमानार के पादुकों को सिर पर ले जायेंगे। एम्पेरुमानार ने पराजय होने पर ग्रन्थों को न छूने का प्रतिज्ञा किया।

विवाद शुरू हुआ और 16 दिन हो गये। दोनों बहुत तेज और अर्थपूर्ण ढंग से विवाद कर रहे थे जैसे दो हाथियों एक दुसरे से लड रहे थे। 17त् के दिन यग्य मूर्ति मजबूत स्थिति मे थे जैसे लगा। एम्पेरुमानार् तनिक चिंतित हुए और अंत मे अपने आश्रम लोटे। उस रात उन्होने पेररुळाळन (अपने आराधना मूर्ति) से प्रर्थना किए कि , यदी वे हार गये तो नम्माळ्वार से स्थापित और आळवन्दार से बढाया उत्तम सांप्रदाय के पतना होगा। और वो पतन अपनेसे  होना उनको बहुत दुःख हुआ। पेररुळाळन एम्पेरुमानार के स्वप्न मे प्रत्यक्ष हुए और निश्चिन्त रहने को बोले। ये सब एम्पेरुमानार को एक चतुर और बुध्दिमान् शिष्य ले आने के लिये उनके दिव्य लीला है। और एम्पेरुमानार को आळवन्दार के मायावद के खण्डन को उपयोग करने का सूचना दिया। इससे एम्पेरुमानार भगवान के महत्व को समझकर खुश हुए और सुबह तक एम्पेरुमान के नामस्मरन किये, फिर नित्यानुष्टानम् और तिरुवाराधनम् करके विवाद के अन्तिम दिन के लिये शानदार ढंग से आये। यग्यमूर्ति प्रज्ञावान होने के कारण, एम्पेरुमानार के तेजस को सही अर्थ मे समझे और एम्पेरुमानार के दिव्य कमल चरणों मे प्रर्थना किये और उनके पादुकों को अपने सिर पर रख कर , अपने हार को मान लिये। जब एम्पेरुमानार ने उनसे विवाद करने के लिये पूछे तो, तब यग्यमूर्ति ने बोले ” एम्पेरुमानार और पेरिय पेरुमाल (श्री रंगनातर्) दोनों अपने दृष्टि मे एक है, इसलिये विवाद का आवश्य नहीं है “. पर एम्पेरुमानार ने अपने अपार कृपा से एम्पेरुमान के सगुणत्वम को ओचितपूर्ण प्रमाणों से स्पष्ट किये। यग्यमूर्ति ने एम्पेरुमानार से फिर सही मार्ग मे सन्यास देने के लिये प्रर्थना की। एम्पेरुमानार ने उनको पहले  शिका और यज्ञोपवीतम को त्याग करने का प्रयश्चित करने के लिये कहा (क्योंकी वे पहले मायावादि सन्यासि थे) । और उसको वे एहसान करते हैं। फिर एम्पेरुमानार ने यग्यमूर्ति को त्रिदण्डम्, काषायम् आदी देते हैं। पेररुळाळन् की सहायता के याद मे और एम्पेरुमानार के नाम लेने का इच्छा को पूरी करने के लिये उनको अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार  नाम दिये। एम्पेरुमानार अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार् को नम्पेरुमाळ और अपने तिरुवारधन पेरुमाळ के पास रखकर नित्य पूजा करते आये. ये सब एम्पेरुमानार और अरुळाळ पेरुमाळ  एम्पेरुमानार को सम्बंध करने के लिये एम्पेरुमान के दिव्य लील को दिखाने के लिये ले गये थे।

एम्पेरुमानार ने अरुळिचेयल (दिव्य प्रबन्ध) और उनके अर्थों को अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार को सिखाये। जब अनन्ताळ्वान, एच्चान आदी एम्पेरुमानार के शिष्य बनने के लिये श्रीरंगं पहुंचे थे, तब एम्पेरुमानार ने उन्को अरुळाळ पेरुमळ एम्पेरुमानार के पास पञ्च संस्कार लेने की सूचना दी। अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार अपने शिष्यों को निर्देश किये कि हमेशा सिर्फ़ एम्पेरुमानार मे चित्तलय करना ही उपाय है।

अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार को एम्पेरुमानार के प्रति विशेष कैंकर्य एम्पेरुमानार के आराधन एम्पेरुमान् पेररुळान को आराधन करना ही था।

एक बार दो श्रीवैष्णव यात्रियों ने श्रीरंगम् के गलि मे किसी को एम्पेरुमानार आश्रम के बारे मे पूछ रहे थे। तब एक स्थानिक ने जवाब मे पूछा “किस एम्पेरुमानार के आश्रम? “। इसको सुन कर वो श्रीवैष्णवों नेपूछा, “क्या हमारे सांप्रदाय मे दो एम्पेरुमानार है?” । स्थानिक ने बोला ” हाँ, एम्पेरुमानार् और अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार हैं” । अन्त मे श्रीवैष्णवों ने बोले ” हम उडयवर के आश्रम के बारे मे पूछ रहे हैं” और स्थानिक ने उनको आश्रम दिखाय। उस सम्वाद के समय अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार वहाँ थे और उन बातों को सुनकर वे दुःखित हुए और सोचे वो एम्पेरुमानार के नाम मे अलग कुटिल मे रहना ही इस संवाद का कारण है। तुरन्त वे अपने आश्रम् को विध्वंस करके, एम्पेरुमानार के पास गये और उनको वो संवाद के बारे मे बोलकर , एम्पेरुमानार के साथ ही रहने के लिये अनुमति माँगा। एम्पेरुमानार उनको वहाँ रहने के अनुमति दिये और सभि रहस्य अर्थों को सिखाया।

अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार, अपनी अपार करुणा से दो प्रबन्दं तमिळ मे लिखे। वे ज्ञान सारम और प्रमेय सारम। ये दो प्रबन्द हमारे सांप्रदाय के दिव्य और सुन्दर अर्थों को, विशेष मे आचार्य के वैभव को अत्यन्त सुन्दर रुप मे देता है। पिळ्ळै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषणम् अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार के प्रबन्दों के विचारों को अनुकरण करते हैं। मामुनिगळ ने इन प्रबन्दों के सुन्दर व्याख्यान दिये थे।

भट्टर के बाल्यप्राय मे एक बार, वे आळ्वान से “सिरुमामनिसर” (तिरुवाळ्मोळि 8.10.3) के अर्थ अन्तर्विरोधि जैस लगते है, इसिलिये उसको समजाने को पुछे थे। तब आळ्वान ने बोले की ” श्रीवैष्णवों जैसा मुदलिआण्डान, एम्बार और अरुळाळ पेरुमाल एम्पेरुमानार ने भौतिक शरीर से छोटे थे पर नित्य सूरियों जैसे महान थे। ये चरित्र नम्पिळ्ळै के ईडु महा व्याख्यान मे भी लिखे थे।

इसिलिए हम सब अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार को याद करें, जिन्होने हमेशा एम्पेरुमानार के याद मे थे।

अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार के तनियन :  
                                           रामानुजार्य सच्शिष्यम् वेदासास्त्रार्त सम्पदम।
                                           चतुर्ताश्रम सम्पन्नम् देवराज मुनिम् भजे॥

अडियेन् वैष्णवि रामानुज दासि

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किडाम्बि आच्चान्

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

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जन्म नक्षत्र – चित्रा, हस्त

अवतार स्थल – कांचीपुरम

आचार्यरामानुजाचार्य

बचपन में उनका नाम “प्रणतार्तिहरर्” था. ( देवराज अष्टकम में स्वामी तिरुकच्ची नम्बि ने वरदराज स्वामी को बड़े सम्मान और प्यार से प्रणतार्तिहरर् कहके पुकारा.)

उनको श्री रामानुजाचार्य / एम्बेरुमानार के मुख्य रसोइया बनाया गया था. इस फैसले का निर्णय स्वामी तिरुकोष्टियुर नम्बि ने किया था. इस फैसले के पीछे एक दिलचस्प कहानी “६००० पड़ी गुरु परंपरा प्रभावम” और कुछ और पूर्वाचार्य ग्रंथों में लिखा गया है.

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रामानुजाचार्य गद्यत्रयम् का अध्ययन किये और नित्य ग्रन्थम (तिरुवाराधन क्रम) भी लिखे. इस तरह वे इस श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का पालन और पोषण करते आये. रामानुजाचार्य के काल में भी, आज की तरह,  कुछ एसे लोग थे जो खुद लाभकारी काम नहीं करते और दूसरों को करने भी नहीं देते. ऐसे कुछ लोग श्रीरंगम में थे जो श्री रामानुजाचार्य के विचारण से सहमत नहीं थे. वे व्याकुल पड़े और ऐसी एक अकल्पनीय और दुष्ट कार्य किया जिससे स्वामी रामानुजाचार्य की जान खतरे में पड़ी.

उन्होंने खाने में जहर मिलाकर उसे भीक्षा के रूप में स्वामी रामानुजाचार्य को देने की योजना बनाई. श्री रामानुजाचार्य हर एक घर में, हमेशा की तरह, उस दिन भी भीक्श मांगते आये और उस घर के सामने आ खड़े जिस घर की महिला के हाथ में वो दूषित आहार थी.  स्वामी उस आहार को स्वीकार करते निकल ही पड़े कि उस  औरत के आखों में आँसू आ भरे. वो स्वामी को सूक्ष्म रूप से यह संदेश देना चाहती थी कि वे उस दुष्ट आहार को न छूए. वो अपने पति की इस सादिश का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी. वो अपने भीक्श को स्वामी के अन्य भिक्षा से अलग किया और अपने चेहरे में अत्यंत दुख की भावना दिखाई. स्वामी को दण्डवत प्रणाम करने के बाद भारी मन से घर वापस लौटी. स्वामी रामानुजाचार्य को समज में आ गया कि उस भीक्श में कुछ गलत बात है. वे उसे कावेरी नदी में बहा दिया और उस दिन से कठिन व्रत का पालन करने लगे.

तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) , इस घटना के बारे में सुनते ही तुरंत श्रीरंगम आ पहुँचे. स्वामी एम्बेरुमानार भी अपने आचार्य को स्वागत करने गर्मी धूप में कावेरी नदी के किनारे शिष्य-सहित आए. अपने आचार्य को देखते ही स्वामी दंडवत प्रणाम करते हुए उस अत्याधिक गर्म रेत पर अपने आचार्य क़ी आज्ञा क़ी इंतज़ार करते लेटे थे. (हमारी संप्रदाय का एक और विशेष क्रम है कि एक शिष्य, अपने आचार्य को दंडवत प्रणाम करते समय, तभी उठे जब आचार्य कहे ). तिरुकोष्टियुर नम्बि कुछ समय कि देरी की, यह जानने के लिए कि कौन स्वामी रामानुज की इस दिव्यमंगलरूप की ओर तरसता है और इसी से स्वामी की शुभचिंतक की जानकारी भी हो जाएगी.

किडाम्बि आच्चान् तड़प ऊठे और स्वामी रामानुज को तुरंत उठाया और तिरुकोष्टियुर नम्बि से पुछा ” यह कैसा अजीब रिवाज़ है? स्वामी रामानुज को इस गर्मी धूप में इतनी देर लेटे रहने दिया आपने? इस कोमल फूल की यह क्या कठोर परीक्षा कर रहे हैं आप?” किडाम्बि आच्चान की इस फिकर और विनम्रता से प्रसन्न होकर नम्बि विज्ञापन किये ,” तुम ही हो जो स्वामी रामानुज से अत्याधिक प्रेम करते हो. तुम ही उसके शुभचिंतक हो. आज से तुम्हे रामानुज की भीक्षा की जिम्मेदारी सौंपा जाए!!” किडाम्बि आच्चान् खुद को सौभाग्यशाली मानकर उसी दिन से अपने कर्त्तव्य का पालन किया.

हमारे व्याख्यानों में ऐसे कुछ कथाएँ हैं जो स्वामी किडाम्बि आच्चान् के यश और महिमा के बारे में प्रकाश डालते हैं.  उनमे से कुछ उदहारण नीचे देखें :

  • तिरुप्पावै 23  : – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासुरम के द्वारा आंडाल,  गोपियों और कृष्ण परमात्मा के बीच हुयी सम्भाषण के बारे में बताती है| गोपिका स्त्री श्री कृष्ण से कहते हैं कि उनका कोई आश्रय नहीं है| यह साबित करने के लिए कि उनको श्री कृष्ण के चरण कमल ही एकमात्र शरणस्थान है, एक दिलचस्प कहानी सुनाया जाता है| एक बार स्वामी किडम्बि आच्चान तिरुमालिरुंचोलाई में भगवान अयगर की दर्शन करने निकल पड़े. भगवान अयगर उनको आदेश दिया कि वे कुछ पाठ सुनाये. स्वामी किडम्बि आच्चान “अपराध सहस्रा भाजनम् … अगतिम ..” (आळवन्दार स्तोत्र रत्नम ४८ ) सुनाने शुरू किये. तब भगवान अयगर, नम्बि से अनुशासन की ” जब एम्पेरुमानार के चरणो में आत्मसमर्पण किया है तो खुद को अगतिम कैसे पुकार सकते हो ?”
  • तिरुविरुत्तम 99  – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान  – इसमें एक कहानी के ज़रिये,कूरत्ताळ्वान् की महिमा प्रकाशित की जाती है. एक बार किडाम्बि आच्चान्, कूरत्ताळ्वान् की उपन्यास सुनकर देर से लौटे. एम्बेरुमानार ने पूछताछ की तो बताया कि कूरत्ताळ्वान् की कथा सुनकर देर हो गई. एम्बेरुमानार फिर प्रश्न की कि कालक्षेप किस बात ( पासुरम)  पे हो रहा था. आच्चान ने जवाब दी कि ” पिरन्दवारुं वलरंतवारुं (तिरुवाय्मोई 5.10) व्याख्यखण्ड ” में कालक्षेप हो रहा था. एम्बेरुमानार विवरण से पूछे तो आच्चान ने कहा “कूरत्ताळ्वान् पहले उस अनुच्छेद को पड़े , उस अनुच्छेद के तात्पर्य का विश्लेषण करने लगे और जैसे ही करते रहे उनका दिल पिगल्ने लगा और कूरत्ताळ्वान शोक में डूब गए. कूरत्ताळ्वान् कहने लगे कि नम्माल्वार  बड़े ही अनोखे थे, उनका अनुभव भी कितना अनोखा, अद्बुत और दिव्य था. भगवान से बिछडके, वे जो विरह-ताप में जल रहे थे, उसे ना कोई समज सकता है और ना ही कोई वर्णन कर सकता है. यह कहकर कूरत्ताळ्वान् कालक्षेप की अंत कर दी. इसे सुनकर एम्बेरुमानार अत्यंत खुश हुए और कूरत्ताळ्वान् की शुद्ध ह्रदय और उनकी भक्ति की प्रशंसा की.
  • तिरुवाय्मोळी  4.8.2 नंपिल्लै ईडु व्याख्यान  – नम्माल्वार हमेशा भगवान की सोच में ही डूबे रहते हैं. कैंकर्य प्राप्ति होते ही भगवान की करुण्यता से अभिभूत हो जाते हैं.  नम्माल्वार के दिव्य भावनाओं को स्थापित करते हुए एक कहानी है जिसे हम अब देखेंगे. एक बार ददियारादन के समय किडाम्बि आच्चान् सभी श्री वैष्णव जनों को पानी पिलाने का कैंकर्य कर रहे थे. ( उन दिनों, हर एक श्री वैष्णव के मुंह में सीधा पानी पिलाते थे , आज की तरह हर एक को अलग अलग गिलास दिया नहीं जाता था ) गोष्टी में से एक श्री वैष्णव जब पानी मांगे, तो आच्चान उस श्री वैष्णव के बगल से पानी पिला रहे थे. इसे देखकर एम्बेरुमानार ने आच्चान को समझाया कि सामने से पानी पिलाते हैं, बगल से नहीं ताकि उस श्री वैष्णव महान को तकलीफ ना पहुंचे. एम्बेरुमानार के काल में भागवत कैंकर्य को  इतनी महत्व दी जाती थी. इसे सुनकर आच्चान अति आनन्दित हुए और स्वामी एम्बेरुमानार को शुक्रिया अदा किया और नम्माल्वार के शब्दों से उनकी प्रशंसा करने लगे , “पणिमानम् पियैयामे अडियेनै पणी कोन्ड” अथार्थ ” मैं उस एम्बेरुमानार से कृतज्ञ हूँ जो मेरे जैसे अनुपयुक्त को भी भागवत कैंकर्य में उपयोग करे!”
  • तिरुवाय्मोळी 6.7.5नंपिल्लै ईडु व्याख्याननम्माल्वार हमेशा दिव्यदेशोँ की सौन्दर्यता की प्रशंसा करते रहते थे. उनका मानना था कि मनुष्य को आँख दिया गया है, एम्पेरुमान की इस सौंदर्य दिव्यदेशोँ  को देखने के लिए और इनकी सुंदरता में मोहित होने के लिए. किडाम्बि आच्चान् और मुदलियान्डान् (दाशरथि स्वामीजी) एक बार अप्पकुड़थ्थान मंदिर की सुंदरता में डूब गए थे.
  • तिरुवाय्मोळी 10.6.1 – किडाम्बि आच्चान्, श्री पराशर भट्टर् की ओर बहुत प्यार और विनम्रता दिखाई. इसे देखकर एक स्वामी उनसे पूछे कि उनकी इस व्यवहार का कारण क्या था. आच्चान ने समझाया , ” आप नहीं जानते उस दिन क्या हुआ और स्वामी एम्बेरुमानार ने हम सब से क्या कहा. एक दिन जब भट्टर अपने युव में थे , तब पेरिय पेरुमल ( श्रीरंगम ) की सन्निधि में आ पहुंचे. एम्बेरुमानार भट्टर को भीतरी मन्दिरगर्भ में ले चले और उनको पेरिय पेरुमल के सामने श्लोक पाठ करने को कहा. पाठ समाप्ति के बाद वे दोनों बाहर आये और एम्बेरुमानार अपने शिष्यों को ये आदेश दिया की सारे शिष्य भट्टर से ऐसे व्यवहार करे जैसे वे एम्बेरुमानार से करे. इसलिए मेरे मन में भट्टर की तरफ बहुत मर्यादा और प्यार है ” .

तिरुवेकका में किडाम्बि नायनार ( किडाम्बि आच्चान् वंश के संतति ) अळगिय मनवाळ मामुनि को श्री भाष्यम् सिखा रहे थे. किडाम्बि नायनार के अनुरोध पर स्वामी मनवाळ मामुनि अपने स्वाभाविक रूप ( आदि सेशन का रूप) को नायनार को दिखाते हैं. उस समय से किडाम्बि नायनार स्वामी मामुनि के ओर अधिक से अधिक लगाव महसूस करने लगे.

इस प्रकार स्वामी किडाम्बि आच्चान् की शानदार जीवन की झलक हमें मिली है. वे पूरी तरह से भागवत कैंकर्य और निष्ठा में तल्लीन थे और स्वामी एम्बेरुमानार के प्रिय शिष्यों में से एक थे. आज हम सब स्वामी किडाम्बि आच्चान् के शरण कमल में प्रार्थना करे कि हमारे इस जीवन काल में, उस कैंकर्य सागर की एक बूंद हम भी पी सके.

किडाम्बि आच्चान् तनियन (ध्यान श्लोक ) :

रामानुज पदाम्भोजयुगली यस्य धीमतः
प्राप्यम् च प्रापकम् वन्दे प्रनाथार्थीहरम गुरूम्

अडिएन जानकी रामानुज दासि

Source: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/03/31/kidambi-achan/

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