Monthly Archives: June 2015

वेदव्यास भट्टर

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नमः
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

अजह्वान पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर के साथ

आल्वान पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर के साथ

जन्म नक्षत्र : वैशाख, अनुराधा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: एम्बार (गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया: श्रीरंगम

वेद व्यास भट्टर कुरेश स्वामीजी के यशस्वी पुत्र और पराशर भट्टर के अनुज थे। उन्हें श्री राम पिल्लै, श्री राम सूरी आदि नामों से भी जाना जाता है। सुदर्शन सूरी (श्रुत प्रकाशिक भट्टर), जिन्होंने श्रीभाष्य पर व्याख्यान लिखा है, वे वेद व्यास भट्टर के वंशज हैं।

अळ्वान और आण्डाल के यहाँ, पेरिय पेरुमाल (श्री रंगनाथ) के प्रसाद से दोनों ही भट्टर बंधुओं का जन्म हुआ। एक रात जब अळ्वान और आण्डाल बिना प्रसाद पाए लेटे थे (उस दिन अळ्वान उन्जा वृत्ति कर रहे थे और भारी बारिश की वजह से वे अनाज जमा नहीं कर सके) तब वे मंदिर की अंतिम नैवेद्य घंटी सुनते हैं। आण्डाल भगवान से कहती है “यहाँ आपके अनन्य भक्त, अळ्वान बिना प्रसाद पाए बैठे हैं और आप वहां उत्तम भोग का अन्दन ले रहे हैं”। यह जानकर पेरिय पेरुमाल, उत्तम नम्बि द्वारा अळ्वान और आण्डाल को अपना प्रसाद सभी साज-सामान के साथ भिजवाते हैं। प्रसाद को आते हुए देखकर अळ्वान चकित रह जाते हैं। वे तुरंत आण्डाल से पूछते हैं – “क्या आपने भगवान से प्रार्थना की थी” और आण्डाल उनके द्वारा किये हुए अनुरोध को स्वीकार करती है। अळ्वान उनके द्वारा प्रसाद के लिए भगवान से किये हुए आग्रह से व्याकुल हो जाते हैं। वे केवल दो मुट्ठी प्रसाद ही स्वीकार करते हैं, कुछ पाकर, शेष प्रसाद आण्डाल को दे देते हैं। उस दो मुट्ठी प्रसाद के फलस्वरूप उन्हें दो सुंदर बच्चों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

दोनों बालकों के जन्म के १२ दिन बाद, एम्पेरुमानार, एम्बार (गोविन्दाचार्य) और सभी शिष्यों के साथ अळ्वान के घर पधारते हैं। वे एम्बार से बालकों को बाहर लाने के लिए कहते हैं। बालकों को लाते हुए, एम्बार उनके कानों में द्वय महामंत्र का उच्चारण करते हैं और उन्हें एम्पेरुमानार को सौप देते हैं। एम्पेरुमानार तुरंत पहचान जाते हैं कि वे दोनों द्वय मंत्रोपदेश प्राप्त कर चुके हैं और एम्बार से कहते हैं कि वे उनके आचार्य हो। एम्बार सहर्ष उसे स्वीकार करते हैं और उन्हें संप्रदाय के सभी दिव्य सिद्धांतों का उपदेश देते हैं। तब एम्पेरुमानार, सनातन धर्म में ऋषि पराशर और ऋषि वेदव्यास के योगदान के लिए उनकी स्मृति में बालकों के नाम पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते हैं। इस तरह वे आलवन्दार के प्रति अपनी एक प्रतिज्ञा पूर्ण करते हैं, जहाँ उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे ऋषि पराशर और वेद व्यास के प्रति आभार प्रकट करने के लिए कोई कार्य करेंगे।

दोनों भाइयों में से, पराशर भट्टर अल्प अवधि तक जीवित रहे और संसार छोड़ने की अपनी तीव्र इच्छा से परमपद प्रस्थान किया। आण्डाल (भट्टर की माता) भट्टर के अंतिम क्षणों में बड़ी उदार थी, और भट्टर के अंतिम संस्कारों की देखरेख आनंद सहित करती हैं, इस विचार से कि भट्टर स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण की नित्य सेवा करने के लिए परमपद जाना चाहते थे। अंतिम संस्कारों के पूर्ण होने पर, वेद व्यास भट्टर घर लौटकर पराशर भट्टर के वियोग में व्याकुल होकर रोने लगते हैं। आण्डाल वेद व्यास भट्टर को सांत्वना देती है और उनसे पूछती है क्या वे पराशर भट्टर के परमपद प्रस्थान पर उनसे ईर्ष्या करते हैं। वेद व्यास भट्टर तुरंत अपनी गलती को समझ जाते हैं, स्वयं को सांत्वना देते हैं, और अपनी माता से क्षमा याचना करते हैं और पराशर भट्टर के परमपद गमन का उत्सव जारी रखते हैं।

पेरिय पेरुमाल, वेद व्यास भट्टर को अपनी सन्निधि में आमंत्रित करते हैं और उनसे कहते हैं कि “ ऐसा मत सोचो कि पराशर भट्टर ने तुम्हें छोड़ दिया है। मैं यहाँ तुम्हारे पिता के समान ही हूँ।” तब वेद व्यास भट्टर संप्रदाय को नन्जीयर (वेदांती स्वामीजी) जैसे अन्य दिग्गजों के साथ नेतृत्व करते हैं।

हमारे व्याख्यानों में कई उदाहरणों में वेद व्यास भट्टर की महिमा को देखा जा सकता है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं –

  • तिरुमालै 37 – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में, तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) समझाते हैं कि पेरिय पेरुमाल हमारे नित्य संबंधी हैं और वे हर समय हमारी रक्षा करते हैं। इस संदर्भ में यह देखा गया है कि जब वेद व्यास भट्टर पीड़ा की अवस्था से गुजर रहे थे, पराशर भट्टर उन्हें यह सिद्धांत समझाते हैं और उन्हें पुर्णतः पेरिय पेरुमाल के आश्रित रहने के लिए कहते हैं।
  • मुदल तिरुवन्दादि 4 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) /पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान – पोइगै आळ्वार (सरोयोगी स्वामीजी) बताते हैं कि अगस्त्य, पुलस्त्य, दक्ष और मार्कंडेय को रूद्र भगवत विषय समझा रहे थे (जैसे कि वे भगवान के विषय में सब कुछ जानते हैं)। जब वेद व्यास भट्टर रूद्र पर इस प्रकार व्यंग करते हैं, तब पराशर भट्टर कहते हैं “जब रूद्र के मस्तिष्क पर तमोगुण का प्रभाव रहता है वह विमूढ़ हो जाते हैं , पर अब वह भगवत विषय के अनुसरण में लगे हुये हैं – इसलिए अब उनकी आलोचना न करो”।
  • तिरुवाय्मोळि 1.2.10 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – इस पासूर में, नम्मालवार तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) का अर्थ समझाते हैं। इस परिपेक्ष्य में नम्पिल्लै एक सुंदर द्रष्टांत बाताते हैं। अष्टाक्षर मंत्र का अर्थ केवल आचार्य से ही सुनना चाहिए। एक बार अळ्वान इस पासूर को समझाते हुए कालक्षेप में, अपने दोनों पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं। वे उनसे कहते हैं कि वे लोग एम्बार (उनके आचार्य) के पास जाकर उनसे इसके अर्थ समझे। वे दोनों उनकी बात मानकर वहां से जाने लगते हैं। परंतु फिर अळ्वान उन्हें बुलाकर कहते हैं “इस संसार में सब कुछ इतना अल्पकालिक है कि हो सकता है तुम लोग आचार्य के मठ तक ठीक तरह से पहुँच न पाओ (तुम्हें रास्ते में कुछ भी हो सकता है)। इसलिए मैं स्वयं ही तुम्हें अष्टाक्षर मंत्र का अर्थ सिखाता हूँ” और फिर उन दोनों को वह अर्थ समझाते हैं। एक श्री वैष्णव को कैसा होना चाहिए- दूसरों के आत्मिक कल्याण के प्रति अति दयालू और दूसरों से अलग, अळ्वान इस बात का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 3.2 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान (प्रस्तावना खंड) – इस दशक में, नम्मालवार, तिरुमालीरुनचोल्लै अज्ह्गर के अनुभवों को नियंत्रित रखने में असमर्थ हैं। यहाँ वेद व्यास भट्टर पराशर भट्टर से एक प्रश्न पूछते हैं। “आलवार क्यूँ इतनी पीड़ा में हैं और अर्चावतार भगवान के दर्शन अनुभव करने में असमर्थ हैं जबकि परमपद (जो बहुत दूर है) या विभव (जो अवतार बहुत समय पहले हुए थे) के समान न होकर अर्चावतार में भगवान ठीक हमारे सामने हैं?” पराशर भट्टर कहते हैं “अल्पबुद्धि व्यक्ति के लिए भगवान के 5 अलग रूप (पर, व्यूह, विभव, अर्चा, अंतर्यामी) एक दुसरे से भिन्न है। परन्तु उनके लिए जिन्होंने सिद्धांतों को पूर्णतः समझ लिया है सभी रूप एकमात्र उन्हीं भगवान का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे सभी रूप सारे गुणों से परिपूर्ण हैं। परन्तु अब, आलवार तिरुमालीरुनचोल्लै अज्ह्गर की सुंदरता से अभिभूत हैं और वे अपने गुणानुभाव और भावनाओं को नियंत्रित रखने में असमर्थ हैं”।
  • तिरुवाय्मोळि 6.7.5 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – जब पराशर भट्टर तिरुक्कोलूर के वैत्तमानिधि भगवान के मंदिर के आसपास के सुंदर बगीचे आदि का वर्णन करते हैं, वेद व्यास भट्टर उन्हें एम्बार द्वारा दिए गए उस विस्तृत वर्णन का स्मरण कराते हैं जहाँ आलवार का मन दिव्य देश की सुंदरता देख कर अति आनंदित हो जाता है।
  • तिरुवाय्मोळि 7.2 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – जब दोनों भट्टर विवाह के लिए योग्य हुए, आण्डाल अळ्वान से कहती है कि वे जाये और जाकर पेरिय पेरुमाल को इसके बारे में बताये। अळ्वान कहते हैं “भगवान के परिवार के लिए हम क्यूँ चिंता करें?” – वे इस पूर्णता से भगवान को समर्पित थे कि किसी भी तरह के स्व-प्रयासों में संलग्न नहीं होते थे। जब अळ्वान पेरिय पेरुमाल के समक्ष गये, पेरिय पेरुमाल स्वयं उनसे पूछते हैं कि क्या वे कुछ कहना चाहते हैं। अळ्वान प्रतिउत्तर में कहते हैं “अन्य लोग कहते हैं, दोनों भाइयों का विवाह अब हो जाना चाहिए” और फिर भगवान उनके विवाह की व्यवस्था करते हैं।

इस तरह हमने वेद व्यास भट्टर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

वेद व्यास भट्टर की तनियन:

पौत्रं श्री राममिश्रास्य श्रीवत्सांगस्य नन्दनं ।

रामसूरीं भजे भट्टपराशरवरानुजम ।।

अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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श्रुत प्रकाशिका भट्टर् (सुदर्शन सूरि)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्शत्रः अपरिचित्

अवतार् स्तलः श्रीरन्गम्

आचार्य: वेदव्यास् भट्टर् और् नडादूरम्माळ्

लेखन् :  श्रुत प्रकाशिकै, श्रुत प्रदीपिकै, (तात्पर्य दीपिका) वेदार्थ् सन्ग्रह् की व्याख्यान्, शरनागति गद्य और् शुभाल उपनिशद् की व्याख्यान् , शुख पक्शीयम्

ये वेद् व्यास् भट्टर् के पोते थे. इनका नामकरण सुदर्शन सूरी (सुदर्शन भट्टर्) किया गया. ये हमारे सम्प्रदाय् के महान विद्वान बने. इन्होने ही श्री भाश्य के महत्वपूर्ण और गहरे टिप्पणियां श्रुत प्रकाशिकै तथा श्रुत प्रदीपिकै लिखे. इन ग्रंथों के नाम् इन्होने ऐसे रखा ताकी उपाधि से ही पता चले कि ये स्वामि रामानुज् से प्रकटित नडादूरम्माळ् द्वारा मिले विषय हैं|

अम्माळ् से श्री भाश्य सीख्ने के लिये भट्टर् कान्चीपुरम् पधारे. भट्टर् के अक्लमन्द् और् प्रतिभा से प्रभावित अम्माळ् अपना कालक्शेप् की शुरुवात भट्टर् की पहुँचने के बाद् ही करते थे. अम्माळ् के अन्य शिष्यों की सोच थी कि भट्टर् के उच्च परिवार की पृष्ठभूमि के कारण अम्माळ् भट्टर् के प्रति पक्शपात थे. भट्टर् की यश समझाने के लिये अम्माळ् एक बार कालक्शेप् के बीच रुखे और पिछले दिन की प्रसन्ग समझाने को वहा उपस्थित शिष्यों को आदेश दिया| इस पर उनके सारे शिष्य हैरान हुये और् मौन हो गये| उस समय भट्टर एक अक्षर भी बिना छोडे पिछले दिन की प्रसन्ग की परिपूर्ण सूचना दिया| इस सम्भव से वहाँ उपस्थित अम्माळ् के अन्य शिष्यों को भट्टर् की महानता की ज्ञान हुयी|

नम्पिळ्ळै तथा पेरियवाच्चान्पिळ्ळै के जैसे भट्टर् भी दिव्यप्रभन्धों के गहरे अर्थ स्थापित करने वाले टिप्पणियाँ लिखे| श्रीभाश्य अथवा वेदार्थ् सन्ग्रह् की टिप्पणियाँ लिखकर संस्कृत वेदान्त के गहरे अर्थो कि स्थाप्ना की|

इस प्रकार हम श्रुत प्रकाशिका भट्टर् के यशश्वी जीवन के कुछ झलक देखे. वे एक सम्पूर्ण महान विद्वान थे और नडदूरम्माळ् के अत्यन्त प्रीय शिष्य थे. हम उनकी चरण कमलो मे प्रर्थना करें कि हमे भी उनकी भागवत निश्ठा में से किन्चित प्राप्त् हो.

श्रुत प्राकसिका भट्टर् कि तनियन् :

यथीन्द्र क्रुत भाश्यार्था यद् व्याख्यानेन दर्शिताः |
वरम् सुदर्शनार्यम् तम् वन्दे कूर कुलादिपम् ||

अडियेन् प्रीति रामानुज दासी

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तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

Thiruvarangathu-Amudhanarतिरुनक्षत्र: हस्त , फाल्गुन

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: श्रीकुरेश स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

श्रीरंगामृत स्वामीजी पहले पेरिय कोइल नम्बी (श्रीरंग पूर्ण) के नाम से जाने जाते थे। वह श्रीरंगम मंदिर के अधिकारिक अभिभावक थे और पुरोहित (पुराण, वेद आदि पढते थे) का कार्य करते थे। शुरू में वह मंदिर का कार्य करने के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति अनुकूल नहीं थे जो मंदिर के कार्य में सुधार लाना चाहते थे। परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण की निर्हेतुक कृपा से उनके सम्बन्ध में सुधार हुआ और मंगल मनाया।

जब श्रीरंगनाथ भगवान (पेरिय पेरूमाल) ने श्रीरामानुज स्वामीजी को उडयवर घोषित किया और मंदिर के गतिविधि की व्यवस्था बहुत सही तरीके से करने को कहा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को सरलता से मंदिर में प्रवेश नहीं दिया। श्रीरामानुज स्वामीजी असंतुष्ट हो गये और पहले उन्हें उस स्थान से निलम्बित करने का निर्णय किया। परन्तु एक दिन जब श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु के लिये इंतजार कर रहे थे तब भगवान उनके स्वप्न में आकर उन्हें यह बताया कि पेरिय कोइल नम्बी उन्हें बहुत प्रिय हैं क्योंकि उन्होंने उनकी बहुत समय तक सेवा की है।

फिर पेरिय कोइल नम्बी को शिक्षा और मार्गदर्शक देने के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी को नियुक्त करते हैं ताकि वह उनकी सेवा कर सके और उनकी सुधार के लिये अनुमति दे सके। श्रीकुरेश स्वामीजी की कृपा धीरे धीरे उन पर असर करना प्रारम्भ करती है और अन्त में पेरिय कोइल नम्बी श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य होने के लिये तैयार होते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी पेरिय कोइल नम्बी को सलाह देते हैं कि आप श्रीकुरेश स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार करें क्योंकि उन्होंने हीं आपको सुधारा है। पेरिय कोइल नम्बी को बाद मे श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा रंगामृत नाम प्रदान किया गया क्योंकि उनमे रस भरे तमिल पद्य लिखने की उत्तम क्षमता थी। बाद मे श्रीरंगामृत स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव हुआ।

श्रीरंगामृत स्वामीजी द्वारा पेरिय कोइल (श्रीरंगम) का अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी को सौंपना

जब श्रीरंगामृत स्वामीजी के माता का परमपद हुआ, ११वें दिन एक धार्मिक विधि एकोतिष्टम मनाया जाता है जहाँ एक मनुष्य को उस मृतक के देह समझा जाता है और भोजन अर्पण किया जाता है। भोजन के अन्त में पाने वाले से यह पूछा जाता है कि क्या वह संतुष्ट है और जब तक वह यह न कहे कि वह संतुष्ट है तब तक वह विधि सपन्न नहीं होती। इस विधि का मुख्य पहलू यह है कि जो यह प्रसाद पाता है उन दिनों में मंदिर के कैंकर्य में वह एक साल भाग नहीं ले सकता। श्रीरंगामृत स्वामीजी उच्च श्रीवैष्णव चाहते थे, इसलिये वें श्रीरामानुज स्वामीजी के पास गये और कहा ऐसा कोई व्यक्ति पहचानीये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसी पल श्रीकुरेश स्वामीजी को कहा कि इस उत्सव में भाग ले और श्रीकुरेश स्वामीजी ने भी खुश होकर इसे स्वीकार कर लिया। जब भोज समाप्त हुआ तो श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी से पूछे कि क्या वह संतुष्ट हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी कहे कि वह तभी संतुष्ट होंगे जब मंदिर का अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी के हाथों में सौंपा जायेगा। श्रीरंगामृत स्वामीजी ने एक ही पल में उसे स्वीकार कर लिया और अपनी वचनबद्धता पूर्ण करने के लिये मंदिर कि चाबी और अधिकार श्रीकुरेश स्वामीजी के जरिये श्रीरामानुज स्वामीजी के हाथों में दे दिये। उस समय श्रीरंगामृत स्वामीजी ने पुरोहित का कैंकर्य भी श्रीकुरेश स्वामीजी को दे दिया (अत: आज भी हम यह देख सकते हैं कि श्रीकुरेश स्वामीजी के वंशज श्रीरंगम में यह कैंकर्य कर रहे हैं)। क्योंकि श्रीरंगामृत स्वामीजी ने मंदिर का सारा कैंकर्य दे दिया था इसीलिए वें मंदिर के प्रति कम लगाव रखने लगे। यह देखकर श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुवरंगप्पेरूमाल अरयर के पास जाकर उन्हें इयर्पा का अधिकार देने के लिये विनती करते हैं। अरयर आभार प्रगट करते हैं और यह अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी को प्रदान करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी फिर बाद में इयर्पा श्रीरंगामृत स्वामीजी को सिखाते हैं और उन्हें इयर्पा का गायन हमेशा के लिये श्रीरंगम के मंदिर में प्रदर्शित करने के लिये कहते हैं और ऐसे श्रीरंगामृत स्वामीजी को भी भगवान के कैंकर्य में लगाया।

श्रीरामानुज नृत्तंदादि की उपस्थिति और बढाई

serthi-amudhanar-azhwan-emperumanarकुछ समय पश्चात श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी पर श्रीरामानुजनूत्तंदादि (१०८ पाशुर) लिखते हैं और उसे रंगनाथ भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्पण करते हैं। एक बार ब्रम्होत्सव के अंतिम दिन श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी को आज्ञा किये कि वह सवारी में उनके साथ न आये और सभी श्रीवैष्णव को सवारी में श्रीरामानुजनृत्तंदादि गाने के लिये कहते हैं – जो बाद में हर उत्सव में पालन करने की दिनचर्या बन गया।   भगवान कि इच्छा जानकर श्रीरामानुज स्वामीजी भी स्वयं श्रीरंगामृत स्वामीजी कि इस उच्च कार्य को अंगीकार किये और जिस तरह श्रीमधुरकवि स्वामीजी का कण्णिनुणशीरुताम्बू (जो श्रीशठकोप स्वामीजी कि बढाई करता है) को मुधलायिरं में शामिल किया गया है वैसे ही इसे इयर्पा के एक भाग में शामिल किया गया। यह प्रबन्ध प्रपन्न गायत्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ और श्रीरामानुज स्वामीजी सभी श्रीवैष्णवों को आज्ञा करते हैं कि इस प्रबन्ध को दिन में कम से कम एक बार गाना चाहिये उसी तरह जैसे ब्रम्होपदेश (वह जिसने यज्ञोपवित धारण किया है) लेनेवाले को गायत्री जप करना अनिवार्य है।

श्रीरामानुजनृत्तंदादि में श्रीरामानुज स्वामीजी का नाम सभी पाशुर में दिखाई देता है। इसलिये इसे श्रीरामानुजनूत्तंदादि भी कहते हैं । यह वह सब कुछ समझाता है जो एक आचार्य अभिमान निष्ठावाले (जो आचार्य कृपा पर हीं निर्भर रहते हैं) को समझना जरूरी है। यह प्रबन्ध यह स्थापित करता है कि जो आचार्य पर हमेशा केन्द्रित रहेगा उसे भगवद् सम्बन्ध सहज ही मिल जाता है और कोई विशेष प्रयत्न करने की कोई जरूरत नहीं होती है। इसीलिये हमारे सभी पूर्वाचार्य घोषित करते हैं कि हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों पर ही हमेशा निर्भर रहना चाहिये।

नदातूर अम्माल जो बहुत बड़े पंडितो में पंडित थे श्रीरामानुजनूत्तंदादि के दिव्य प्रबन्ध के पाशुर पेरोनृ मररिललाई (४५) और निंर वण् कीर्तियुम् (७६) से यह घोषणा किये कि श्रीरामानुज स्वामीजी ही उपाय और उपेय है।

पेरियवाच्चान पिल्लै के पुत्र नायनाराच्चान पिल्लै ने अपने कार्य चरमोपाय निर्णय में श्रीरामानुज स्वामीजी कि दिव्य महिमा बताने के लिये बहुत सुन्दर तरीके से श्रीरामानुजनूत्तंदादि का उपयोग किया।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुजनूत्तंदादि पर एक छोटी और बहुत सुन्दर व्याख्या लिखी है। शुरूवात के खण्ड मे उन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी और श्रीरामानुजनूत्तंदादि पर  बहुत सुन्दर स्तुति लिखी है। जिसका भाव अब हम देखेंगे।

चरम पर्व निष्ठा (पूर्ण:त आचार्य पर निर्भर) मे तिरुमंत्र और सभी आल्वारों के पाशुरों का सार है। जो श्रीमधुरकवि स्वामीजी ने श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति बताई है। श्रीरंगामृत स्वामीजी ने भी श्रीमधुरकवि स्वामीजी जैसे ही अपने प्रबन्ध में श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति पूर्ण विश्वास प्रदर्शित किया। वह पुरी तरह श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा उनकी निर्हेतुक कृपा से और श्रीकुरेश स्वामीजी के अथक और निर्हेतुक कोशिश से ही सुधारे गये। जैसे श्रीमधुरकवि स्वामीजी ने अपनी आचार्य निष्ठा १० पाशुरों से बताई उसी तरह श्रीरंगामृत स्वामीजी ने अपनी आचार्य निष्ठा १०८ पाशुर द्वारा पूरे विवरण के साथ इस जगत के सभी लोगो के उद्धार के लिये और आचार्य निष्ठा जैसे मुख्य तत्व को समझाने के लिये, पालन करने के लिये और स्वयं के उद्धार के लिये लिखे।  श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह भी पहचाने कि जैसे यज्ञोपवित धारण किये हुए को गायत्री मंत्र उच्चारण करना चाहिये उसी तरह इसे प्रपन्न गायत्री कहा जाता है और उसे सभी श्रीवैष्णवों को प्रतिदिन गाना चाहिये।

श्रीरंगामृत स्वामीजी की दक्षता

श्रीरंगामृत स्वामीजी तमिल और संस्कृत में निपुण थे। इसका उन्हें दिव्य प्रबन्ध के पाशुर को प्रस्तुत करने के लिये बहुत उपयोग हुआ। हम एक उदाहरण देखेंगे:

तिरुविरुत्तं के ७२वें पाशुर में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीरंगामृत स्वामीजी का सुन्दर वर्णन लिखते हैं। इस पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी अंधेरी रात में भगवान के विरह में परांकुश नायिका के भाव में बहुत व्याकुल अनुभव करते हैं। सामान्यत: प्रेमी विरह दशा में रात में ज्यादा व्याकुल होते हैं । उस समय एक छोटा अर्धचंद्राकार चाँद दिखाई पड़ता है और अंधेरे को थोड़ा सा तोड़ देता है। जब प्रेमी मिलते हैं तो चाँद कि थंडी छाव आनंददायक होती है विरह में बहुत दु:ख दायक होती है। फिर परांकुश नायिका सोचती है कि अंधेरा ही अच्छा था और अब ठंडे अर्धचंद्राकार चाँद के साथ उनको भगवान के प्रति सोचते हुए अपने भाव को नियंत्रण में करना मुश्किल हो रहा है। यह समझाने के लिये श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़ी सुंदरता से एक कथा प्रस्तुत करते हैं। एक बार एक नाजुक हृदय वाले ब्राम्हण रात्री में जंगल से गुजर रहे थे। उनके पीछे एक जंगली मनुष्य लग गया और किसी तरह वे उससे बचकर एक पेड़ पर चढ गये। उस जंगली मनुष्य ने ब्राम्हण का इंतजार किया कि वो नीचे आयेगा और भोजन बनेगा पर वह ब्राम्हण डरा हुआ था। उस समय एक बाघ उस जंगली मनुष्य के पीछे लगकर उसे मार कर खा लेता है। उसे मारने के पश्चात वह बाघ उपर उस ब्राह्मण को देखता है और उसके नीचे आने का और उसे खाने का इंतजार करता है। अब वह ब्राह्मण इस डर के साथ कि बाघ उसे खा लेगा पहले से भी ज्यादा घबरा जाता है और कांपने लगता है। उसी तरह परांकुश नायिका पहले अंधेरे से डर रही थी और बाद में थंडी अर्धचंद्राकार चाँद से ज्यादा घबरा गयी ऐसा श्रीरंगामृत स्वामीजी समझाते हैं।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीरंगामृत स्वामीजी

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को श्रीरीकुरेश स्वामीजी का पुत्र होने में बहुत अभिमान था। वह स्वयं अपने सहस्त्रनाम में यह घोषणा करते है कि वह श्रीकुरेश स्वामीजी के कुल मे जन्म लिए हुए हैं जिनके पास श्रीरामानुज स्वामीजी के सम्बन्ध का बहुत बड़ा धन था। श्रीरंगामृत स्वामीजी का भी श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ सम्बन्ध था जिसे उन्होंने श्रीरामानुजनूत्तंदादि के ७वें पाशुर मे बताया। एक बार श्रीरंगामृत स्वामीजी बहुत उत्साह से श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को दूसरे श्रीवैष्णव के साथ यह सन्देश देते हैं कि “आपका श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ केवल देह सम्बन्ध है परन्तु मेरा तो उनके साथ बौद्धिक सम्बन्ध है”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी “बहुत अच्छा है! परन्तु तुम इसकी बढाई स्वयं न करो” ऐसा उत्तर देते हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी का सम्बन्ध ऐसा महान है कि वह श्रीरंगामृत स्वामीजी को गर्व से ऊंचा कर देता है। परन्तु इस विषय में एक बड़ी अच्छी बात हमारे पूर्वाचार्यों है कि वों कभी इन विषयों को चर्चा से आगे नहीं बढ़ाते थे और दूसरे के प्रति दुर्भावना नहीं रखते थे। मुद्दों को सुलझाते थे और बहुत उदार तरीके से यही बात हमे इन घटनाओं से समझना चाहिये। हमें अपने पूर्वाचार्यों के प्रति अभिमान होना चाहिये कि उन्होंने ऐसी बात भी सच्चाई के साथ हमें बताई नाकी हमसे छुपाई जो वे आसानी से कर सकते थे।

अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने सुन्दर आर्ति प्रबन्ध के ४०वें पाशुर में यह पहचानते हैं कि संसार बन्धन के खारे समुद्र में डूबने से अच्छा श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल के शरण होना, उनके प्रिय भक्तों के साथ हमेशा समय बिताना और निरंतर श्रीरामानुजनूत्तंदादि को गाना / ध्यान करना।

अत: हमने श्रीरंगामृत स्वामीजी के सुन्दर जीवन के कुछ झलक देखी है। वह पूरी तरह भागवत निष्ठा में रहते थे और श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी को बहुत प्रिय थे। हम उनके चरण कमल में यह विनंती करते हैं कि हम में थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीरंगामृत स्वामीजी कि तनियन :

मूंगिलकुडि अमुदन् प्रपन्नगायत्रीकवि:

श्रीवत्साङ्गुरोश्शिष्यं रामानुज – पदाश्रितम् |
मीनहस्ता – समुभ्दूतं श्रीरंगामृतमाश्रये ||

अदियेन् गोदा रामानुजदासी

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ईयुण्णि माधव पेरुमाळ्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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नम्पिळ्ळै कालक्षेप गोष्ठी – दाएँ से दुसरे स्थान पर ईयुण्णि माधव पेरुमाळ्

जन्म नक्षत्र : कार्तिक, भरणी

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामीजी)

शिष्य: ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ्  (उनके पुत्र)

ईयुण्णि माधव पेरुमाळ्, नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे। उन्हें सिरियाळ्वान् अप्पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है । तिरुवाय्मोळि का ईडु महा व्याख्यान उन्हीं के माध्यम से मणवाल मामुनि के पास पहुंचा।

तमिल में “ईथल” का अर्थ है परोपकार । “उन्नुथल” का अर्थ है भोजन करना । ईयुण्णि का अर्थ है – वह जो बड़े परोपकारी है, जो अन्य श्री वैष्णवों को भोजन कराने पर ही स्वयं भोजन करता है ।

नम्पिळ्ळै, भगवत विषय के कालक्षेप में निरंतर लगे हुए थे । वह श्रीरंगम में श्री वैष्णव संप्रदाय का सुनहरा समय था, जब सभी लोग नम्पिळ्ळै की अद्भुत बुद्धि के माध्यम से भगवत अनुभव में सराबोर हो रहे थे।  भगवान और अपने आचार्य (नंजीयर/ वेदांती स्वामीजी) की दिव्य कृपा से नम्पिळ्ळै एक श्रेष्ठ बुद्धिजीवी थे, जो दक्षता से मुख्यतः श्री रामायण और अन्य पुराण/ इतिहासिक घटनाओं के उदहारण के माध्यम से उन सुंदर सिद्धांतों की व्याख्या करने में सक्षम थे जो आलवारों के पासुरों में दर्शाये गये हैं।

वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे। दिन में नम्पिळ्ळै से तिरुवाय्मोळि के कालक्षेप सुनकर वे रात में उसे नियमित रूप से लिख लिया करते थे। व्याख्यान श्रृंखला के पूर्ण होने पर एक बार नम्पिळ्ळै वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के निवास पर जाते हैं और उनके द्वारा तिरुवाय्मोळि के कालक्षेप में कहे गये शब्दों को वहाँ ताड़ के पत्तों पर लिखा हुआ देखते हैं। वे उसे पूरा पढ़ते हैं और जिस सटीकता से सभी तत्वों को लिखा गया था, उस शैली से बहुत प्रसन्न होते हैं। तथापि उनकी आज्ञा के बिना उसे लिखने पर वे वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै से नाराज होते हैं। वे अपनी असहमति दर्शाते हैं पर अंततः वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के महान समर्पण भाव से आश्वस्त होते हैं। तिरुवाय्मोळि का यह व्याख्यान “ईडु 36000 पद” के नाम से प्रसिद्ध है। वे उन ताड़ के पत्तों को ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् को सौंप देते हैं और उन्हें अपने शिष्यों को उसे सिखाने को कहते हैं। यह चरित्र वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै में विस्तार से बताया गया है।

ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् अपने पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् को यह सिखाते हैं। ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का जन्म नक्षत्र स्वाति है । ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् इसे अपने प्रिय शिष्य नालूर् पिळ्ळै को सिखाते हैं।

नालूर् पिळ्ळै,  नालूर् रान (जो कुरेश स्वामीजी के शिष्य थे) के वंशज थे। उनका जन्म मैइपदगम (थोंदाई नाडू) में हुआ था। उनका जन्म पुष्य नक्षत्र में हुआ था। उन्हें सुमन:कोसलर, कोला वराह पेरुमाल नायनार, रामानुजार्य दासार, अरुलालर तिरुवाडी उनरियवर के नाम से भी जाना जाता है। उनके शिष्यों में नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, तिरुप्पुलिंगुडी जीयर और तिरुक्कण्णगुडी जीयर शामिल थे।

तिरुप्पुलिंगुडी जीयर ने श्री वैष्णव चरितम नामक के ग्रन्थ की रचना की।

नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, नालूर् पिळ्ळै के पुत्र और प्रिय शिष्य थे। उनका जन्म धनु-भरणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें देवाराज आच्चान् पिळ्ळै, देवेसर, देवादिपर और मैनाडू आच्चान् पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने 36000 पद ईदू का अध्ययन अपने पिताश्री के चरण कमलों के सानिध्य में किया था। उनके शिष्यों में तिरुनारायणपुरातू आय, इलाम्पिलीचैपिळ्ळै और तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै शामिल थे।

नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, दोनों ही तिरुनारायणपूर में निवास करते थे।

तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै, कूरकुलोत्तम दासर के आदेश के अंतर्गत, तिरुवाय्मोळि का अर्थ सीखने के लिए कांचीपुरम के लिए प्रस्थान करते हैं। उसी समय, नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै भी कांचीपुरम पहुँचते हैं। वे सभी देव पेरुमाल के समक्ष एक दूसरे से मिलते हैं। उस समय देव पेरुमाल, अर्चकर के माध्यम से बात करके, बताते हैं कि पिळ्ळै लोकाचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं और नालूर् पिळ्ळै को आदेश करते हैं कि वे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै को ईदू व्याख्यान का उपदेश दें। परंतु नालूर् पिळ्ळै देव पेरुमाल से पूछते हैं कि क्या वे ठीक तरह से उन्हें उपदेश कर पाएंगे (अपनी अधिक उम्र की वजह से)? इस पर देव पेरुमाल कहते हैं “तब आपके पुत्र (नालूर् आच्चान् पिळ्ळै) उन्हें उपदेश कर सकते हैं। उनका उपदेश करना आपके उपदेश करने के समान ही है”। इस तरह से तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै अन्य श्री वैष्णवों के साथ नालूर् आच्चान् पिळ्ळै से ईदू व्याख्यान का अध्ययन करते हैं और कालांतर में आलवार तिरुनगरी लौटकर उसे मणवाल मामुनिगल को सिखाते हैं, जो ईत्तू पेरुक्कर (जिन्होंने ईदू व्यख्यान का पोषण किया) के रूप में प्रसिद्ध हुए।

ऐसा कहा जाता है कि नालूर् पिळ्ळै अथवा नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने तिरुमोळि और पेरियाळ्वार् तिरुमोळि के लिए व्याख्यान लिखा है।

मामुनि ने अपने उपदेश-रत्नमाला में ईडु व्याख्यान के हस्तांतरण को पासूर ४८ और ४९ के माध्यम से सुंदरता से समझाया है।

  • ४८ वे पासूर में वे कहते हैं, वडुक्कू तिरुवीधि पिळ्ळै ने ईडु 36000 पद व्याख्यान की रचना की और नम्पिळ्ळै ने उसे उनसे लेकर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् को सौंप दिया ।
  • ४९ वे पासूर में वे कहते हैं ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् से उनके पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् ने उसका अध्ययन किया और फिर वह नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै को हस्तांतरित हो गया । तत्पश्चात् उसे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै, तिरुनारायणपुरातू आय, आदि को सिखाया गया।

इस तरह हमने ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी । वे एक महान विद्वान थे और नम्पिळ्ळै के बहुत प्रिय थे । हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो । इस अभिलेख में हमने देखा कैसे ईडु व्याख्यान नम्पिळ्ळै से हस्तांतरित होते हुए मणवाल-मामुनि तक पहुंचा।

ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् का तनियन:

लोकाचार्य पदाम्भोज समश्रयम् करुणाम्बुधिम् ।
वेदांत द्वय संपन्नम् माधवार्यम् अहम् भजे । । 

ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का तनियन:

माधवाचार्य सत्पुत्रं तत्पादकमलाश्रितम ।
वात्सल्यादी गुणैर्युक्तं पद्मनाभ गुरुम् भजे । ।

नालूर् पिळ्ळै का तनियन:

चतुर्ग्राम कुलोद्भूतं द्राविड़ ब्रह्म वेदिनं  ।
यज्ञार्य वंशतिलकं श्रीवराहमहं भजे  । ।

नालूर् आच्चान् पिळ्ळै का तनियन:

नमोस्तु देवराजार्य चतुर्ग्राम निवासिने ।
रामानुजार्य दासस्य सुताय गुणशालिने । ।

अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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पिल्लै उरंगा विल्ली (धनुर्दास स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नमः
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

जन्म नक्षत्र : माघ, अश्लेषा

अवतार स्थल: उरैयूर

आचार्य: एम्पेरुमानार

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया: श्रीरंगम

पिल्लै उरंगा विल्ली दासर राजा के सभा के एक महान पहलवान थे और अपनी पत्नी पोंन्नाच्चियार (हेमाम्बा) के साथ उरैयूर में रहते थे। वे अपनी पत्नी की सुंदरता (विशेषतः उनके सुंदर नेत्रों) की वजह से उनसे बहुत प्रेम करते थे। मूलतः उन्हें धनुर्दास नाम से जाना जाता है। वे बहुत धनाढ्य (धनी) थे और उनकी बहादुरी के लिए राज्य में उनका बहुत सम्मान था।

pud-1एक बार श्री रामानुज अपने शिष्यों के साथ मार्ग से जाते हुए देखते हैं कि धनुर्दास पोंन्नाच्चि (हेमाम्बा) के आगे आगे एक हाथ में छाता लेकर उसे धुप से बचाते हुए और एक हाथ में उसके आराम के लिए जमीन पर कपड़ा लिए हुए उसके सामने चल रहे थे। एम्पेरुमानार धनुर्दास के एक स्त्री के प्रति ऐसे लगाव को देखकर अचंभित रह जाते हैं और उन्हें अपने पास बुलाते हैं। एम्पेरुमानार उनसे पूछते हैं कि वे उस स्त्री की ऐसी सेवा क्यों कर रहे हैं? धनुर्दास कहते हैं कि उसके नेत्र बहुत ही सुंदर है और वह उसकी सुंदरता के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं और उसकी रक्षा के लिए कुछ भी कर सकते हैं। एम्पेरुमानार, जो सबसे बुद्धिमान हैं तुरंत धनुर्दास से कहते हैं कि अगर वे उन्हें उनकी पत्नी के नेत्रों से भी सुंदर नेत्र दिखा दे तो क्या वे इसी तरह उनके समक्ष समर्पित हो जायेंगे और उनकी रक्षा करेंगे? धनुर्दास तुरंत उसे स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वे उन अत्यंत सुंदर तत्व के समर्पित हो जायेंगे। एम्पेरुमानार उन्हें श्री रंगनाथ भगवान के समक्ष ले जाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे धनुर्दास को उन्ही सुंदर नेत्रों का दर्शन कराये जो उन्होंने परकाल आलवार को दिखाए थे। भगवान के नेत्र प्राकृतिक रूप से सबसे सुंदर है और उन्हें देखकर धनुर्दास को अनुभव होता है कि उन्हें वास्तविक सुंदरता मिल गयी है। वे तुरंत एम्पेरुमानार के शरण हो जाते हैं और उनसे उन्हें अपना शिष्य बनाने की प्रार्थना करते हैं। उनकी पत्नी भी भगवान और एम्पेरुमानार की महानता को समझकर एम्पेरुमानार के शरण हो जाती है और उनसे मार्गदर्शन की विनती करती है। दंपत्ति अपने सारे व्यामोह छोड़कर श्रीरंगम में निवास के लिए आ जाते हैं और एम्पेरुमानार व भगवान के चरण कमलों की सेवा करने लगते हैं । भगवान धनुर्दास पर बहुत कृपा करते हैं और क्यूंकि वे भगवान की सेवा पूजा लक्ष्मणजी के समान किया करते थे, जो श्रीराम के वनवास के समय कभी नहीं सोये, वे पिल्लै उरंगा विल्ली दासर नाम से प्रसिद्ध हुए।

धनुर्दास और पोंन्नाच्चियार (हेमाम्बा) का एम्पेरुमानार से बहुत लगाव था। वे श्री रंगम में एम्पेरुमानार और भगवान की सेवा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करने लगे। एक बार नम्पेरुमल के तीर्थवारी (उत्सव के समापन दिवस पर), मंदिर की टंकी पर चढ़ते हुए एम्पेरुमानार धनुर्दास का हाथ पकड़ते हैं। इस पर कुछ शिष्य सोचते हैं कि एम्पेरुमानार जैसे सन्यासी के लिए धनुर्दास (उनके वर्ण के कारण) का हाथ पकड़ना ठीक नहीं है। वे सब इस बात को एम्पेरुमानार के सामने रखते हैं और एम्पेरुमानार एक सुंदर द्रष्टांत द्वारा धनुर्दास और पोंन्नाच्चियार के गौरव को स्थापित करते हैं।

एम्पेरुमानार उन्हें धनुर्दास के घर जाकर गहने चुराकर लाने के लिए कहते हैं। वे सब धनुर्दास के घर जाते हैं और देखते हैं की पोंन्नाच्चियार सो रही थी। वे चुपके से उनके पास जाते हैं और उनके शरीर पर जो भी गहने थे उन्हें उतारने का प्रयत्न करते हैं। पोंन्नाच्चियार यह जानकर की ये श्रीवैष्णव कुछ चुराने की कोशिश कर रहे हैं और यह सोचकर की वे ऐसा अपनी निर्धनता के कारण कर रहे हैं वह उन्हें आसानी से गहने उतारने देती है। जब वे एक तरफ के गहने निकाल लेते हैं तो पोंन्नाच्चियार दूसरी तरफ के गहने उतारने के लिए करवट बदलती है, जिससे वे लोग आसानी से दूसरी और के गहने निकाल सके। परन्तु इससे वे लोग सतर्क हो जाते हैं और डरकर वहाँ से भाग जाते हैं और एम्पेरुमानार के पास लौट आते हैं। इस द्रष्टांत को सुनने के बाद एम्पेरुमानार उन्हें धनुर्दास के घर जाकर वहाँ का हाल जानने को कहते हैं। वे वहाँ जाकर देखते हैं कि धनुर्दास घर पर आ गये और पोंन्नाच्चियार से बात कर रहे हैं। वे उनसे एक तरफ के गहने नहीं होने का कारण पूछते हैं। पोंन्नाच्चियार बताती है कुछ श्री वैष्णव गहने चुराने के लिए आये थे और उन्होंने मुझे सोया हुआ जानकर एक तरफ के गहने उतार लिए तब मैंने दूसरी तरफ  निकालने के लिए करवट ली पर वे चले गये।

यह जानकर धनुर्दास बहुत दुखी होते हैं और पोंन्नाच्चियार से कहते हैं  कि उन्हें पत्थर के समान लेटे रहना चाहिए था जिससे वे लोग जैसे चाहे गहने निकाल सकते थे और करवट बदलकर उन्होंने श्री वैष्णवों को भयभीत कर दिया। वे दोनों ही इतने महान थे कि उनसे चोरी करने वालों की भी वे सहायता ही करना चाहते थे। सभी श्री वैष्णव एम्पेरुमानार के पास लौटते हैं और उन्हें पूरी घटना बताते हैं और उन दंपत्ति की महानता स्वीकार करते हैं। अगली सुबह एम्पेरुमानार सारी घटना धनुर्दास को बताते हैं और उनके गहने उन्हें लौटा देते हैं।

धनुर्दास, श्री विदुर और पेरियालवार (विष्णु चित स्वामीजी) के समान भगवान के प्रति अपने अत्यंत लगाव के कारण “महामती” (अत्यंत विवेकशील) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पूर्वाचार्यों की रचनाओं में कई द्रष्टांतों में पोंन्नाच्चियार (हेमाम्बा) के निष्कर्ष दर्शाये गये हैं, जो बताते हैं कि उनको शास्त्रों में बहुत जानकारी थी।

 पूर्वाचार्यों की रचनओं में बहुत से स्थानों पर धनुर्दास और उनकी पत्नी से संबंधित कई वृतांत प्रस्तुत किये गये हैं।

 हम उनमें से कुछ यहाँ देखेंगे:

  •  6000 पद गुरुपरंपरा प्रभाव – एक बार एम्पेरुमानार विभीषण की शरणागति पर व्याख्यान कर रहे थे। उस गोष्ठी में से धनुर्दास उठकर पूछते हैं “ अगर विभीषण (जिन्होंने सर्वस्व त्याग किया) को स्वीकार करने के लिए श्री राम लम्बे समय तक सुग्रीव और जामवंत से विचार विमर्ष करते हैं, तो मैं जो परिवार के मोह में पड़ा हुआ हूँ, उसे मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? एम्पेरुमानार कहते हैं – अगर मुझे मोक्ष प्राप्त होगा तो तुम्हें भी होगा; अगर महापूर्ण स्वामीजी (पेरियनम्बि)  को मोक्ष प्राप्त होगा तो मुझे भी होगा; अगर आलवन्दार स्वामीजी को मोक्ष प्राप्त होगा तो महापूर्ण स्वामीजी को भी होगा; इस तरह यह कड़ी गुरु परंपरा माला में उपर तक जाएगी। क्यूंकि शठकोप स्वामीजी (नम्माल्वार) ने घोषणा की है कि उन्हें मोक्ष प्राप्ती हुई है और क्यूंकि श्री महालक्ष्मीजी इस बाबत् भगवान से हमारे लिए अनुशंसा करती है, हम सभी को मोक्ष की प्राप्ति होगी। जिन्हें भागवत शेषत्व प्राप्त है उनकी मुक्ति निश्चित है – जैसे वे चार राक्षस जो विभीषण के साथ आए थे जिन्हें श्री राम ने विभीषण के संबंध से स्वतः ही संसार बंधन से छुड़ा दिया।
  • पेरिय तिरुमौली 2.6.1 – पेरियवाच्चन पिल्लै व्याख्यान– भगवान के प्रति धनुर्दास के प्रगाढ़ ममत्व (यशोदा और पेरियालवार /श्री विष्णुचित स्वामीजी  के समान) को यहाँ दर्शाया गया है। नम्पेरुमल (श्री रंगनाथ) की सवारी के दौरान धनुर्दास, सावधानी से भगवान् को देखते हुए उनके सन्मुख चला करते थे और अपने हाथों को तलवार पर रखते थे। यदि नम्पेरुमल को जरा सा भी झटका लग जावे तो वे तलवार से स्वयं को मार लेते (क्यूंकि उन्होंने स्वयं को नहीं मारा, हम समझ सकते हैं कि वे नम्पेरुमल को अत्यंत ध्यान से ले जाया करते थे)। इस विशेष ममत्व के कारण, धनुर्दास को “महामती” कहते थे। यहाँ ज्ञानी/ बुद्धिमान होने से आश्रय, भगवान के कल्याण के लिए चिंतित होने से है।
  • तिरुविरुथ्थम 99 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) व्याख्यान – जब भी कुरेश स्वामीजी तिरुवाय्मोळि का व्याख्यान आरम्भ करते थे, धनुर्दास बहुत भावुक हो जाते थे और श्री कृष्ण चरित्र का आनंद में मग्न हो जाते थे। उसे देखकर कुरेश स्वामीजी धनुर्दास की बहुत प्रशंसा करते हैं। वे कहते हैं कि “हम भागवत विषय का ज्ञान प्राप्त करके उसे दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं, परन्तु आप हमारे समान न होकर भगवान के ध्यान में भाव विभोर हो जाते हैं, आपका स्वाभाव अत्यंत प्रशंसनीय है”। कुरेश स्वामीजी स्वयं भगवान् के ध्यान में द्रवित हो जाया करते थे – यदि वे धनुर्दासजी के बारे में ऐसा कहते हैं तो हम उनकी महानता को समझ सकते हैं।
  • तिरुविरुथ्थम 9 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) स्वउपदेश – एक बार एम्पेरुमानार श्रीरंगम से तिरुमला जाना चाहते थे। उस समय वे एक श्रीवैष्णव को भण्डार से (जिसे धनुर्दास नियंत्रित करते हैं ) कुछ चावल लाने के लिए भेजते हैं। जब धनुर्दास को एम्पेरुमानार के श्रीरंगम से जाने की योजना के बारे में ज्ञात होता है, वे भण्डार में जाकर अत्यंत दुखी होकर रोने लगते हैं। इससे उनके एम्पेरुमानार के प्रति लगाव का पता चलता है। वह श्रीवैष्णव एम्पेरुमानार के पास लौटकर उन्हें पूरी घटना बताते हैं और धनुर्दास का भाव समझकर एम्पेरुमानार कहते हैं कि वे भी धनुर्दास से वियोग नहीं सह सकते।
  •  तिरुवाय्मोळि 4.6.6 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) व्याख्यान – एक बार धनुर्दास के दो भतीजे (जिनके नाम वंदर और चोंदर था) राजा के साथ जाते हैं। राजा उन्हें एक जैन मंदिर दिखाकर, उसे विष्णु भगवान का मंदिर बताते हुए उन्हें वहाँ प्रणाम करने को कहता है। वास्तुकला में समानता देखकर वे तुरंत उसे प्रणाम करते हैं परंतु फिर राजा उन्हें बताता है कि वह सिर्फ उन्हें सता रहा था और यह एक जैन मंदिर है। वंदर और चोंदर यह जानकर कि उन्होंने श्रीमन्नारायण भगवान के अतिरिक्त किसी और को प्रणाम किया है, तुरंत बेहोश हो जाते हैं। धनुर्दास यह वृत्तांत सुनकर उनके पास दौड़ते हुए जाते हैं और उन्हें अपने चरणों की धूल लगाते हैं जिससे वे तुरंत पुनः होश में आ जाते हैं। यह दर्शाता है की भागवतों के चरण कमल की धूल ही देवान्तर (भले ही अनजाने में किया गया) भजन का एक मात्र उपाय है।
  • तिरुवाय्मोळि 1.5.11 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) व्याख्यान – पालेय् तमिळर् इसै कारर् पत्तर्”, के लिए एक बार अजह्वान ने कहा था श्री परांकुश नम्बि पालेय् तमिळर् (तमिल भाषा में महान विशेषज्ञ) है। आलवार तिरुवरंग पेरुमाल अरयर इसै कारर् (संगीतज्ञ) और पिल्लै उरंगा विल्ली धनुर्दास पत्तर् (भक्त – महान प्रेमी)” है।

बहुत से द्रष्टांतों में धनुर्दास का कृष्ण भगवान के प्रति लगाव दर्शाया गया है-

  • तिरुविरुथ्थम 95 – पेरियवाच्चन पिल्लै व्याख्यान – एक बार एक ग्वाला राजा के लिए जा रहा दूध चुरा लेता है और राजा के सिपाही उसकी पिटाई करते हैं । वह देखकर धनुर्दास उस ग्वाले को कृष्ण समझकर, उन सिपाहियों के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं कि वे उस ग्वाले को छोड़ दे और उसके अपराध का जो भी दंड है वह उन्हें दे।
  • नाच्चियार तिरुमोळि 3.9 – पेरियवाच्चन पिल्लै व्याख्यान – धनुर्दास कहते हैं “क्यूंकि कृष्ण बहुत छोटे हैं, वे स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते। उनके माता पिता भी बहुत ही नरम स्वाभाव के हैं और उनकी रक्षा नहीं कर सकते क्यूंकि वे खुद कारागार में बंद हैं। कंस और उसके साथी निरंतर उन्हें मारने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। केवल अँधेरी रात ने ही (जिसमें कृष्ण का जन्म हुआ) उन्हें संरक्षित किया है। इसलिए हम मिलकर अँधेरी रात की प्रशंसा करे जिसने भगवान की रक्षा की।
  • पेरियाळ्वार तिरुमोळि 2.9.2 – तिरुवाय्मोळि पिल्लै व्याख्यान – धनुर्दास गोपियों द्वारा यशोदा से कृष्ण के माखन चुराने की शिकायत किये जाने पर कृष्ण के पक्ष में समर्थन करते हुए कहते हैं कि – क्या उन्होंने कोई ताला तोडा? क्या किसी के गहने/ जवाहरात चोरी किये? फिर क्यों वे कृष्ण की शिकायत करती हैं ? उनके स्वयं के घर में बहुत सी गायें हैं जिनसे दूध और बहुत सा मक्खन होता है। वे क्यों कहीं और से उसे चुरायेंगे? वे तो छोटे बच्चे हैं, संभवतः वे किसी और के घर को अपना घर समझकर अन्दर चले गये होंगे। ये गोपियाँ क्यों कहती रहती हैं कि उन्होंने दही, मक्खन, दूध आदि चुराया है?

पोंन्नाच्चियार (हेमाम्बा) भी उनके समान ही ज्ञानी थी और बहुत से द्रष्टांतों द्वारा यह दर्शाया गया है। चरमोपाय निर्णय में एम्पेरुमानार ने पोंन्नाच्चियार के विवेक को जानकर अपना वैभव उनके द्वारा स्थापित कराया। पूरा द्रष्टांत http://ponnadi.blogspot.com/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujar-our-saviour-2.html पर पढ़िए।

पिल्लै लोकाचार्य ने भी भगवान के मंगलाशासन (भगवान के कल्याण की चाहना) को समझाते हुए अपनी प्रसिद्ध रचना श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में पिल्लै उरंगा विल्ली धनुर्दास कि महिमा दर्शायी है।

कुछ समय बाद, धनुर्दास अपने अंतिम दिनों में सभी श्री वैष्णवों को आमंत्रित करते हैं, तदियाराधन करते हैं और उनका श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करते हैं। वे पोंन्नाच्चियार को बताते हैं कि वे परमपद की और प्रस्थान करेंगे और पोंन्नाच्चियार को यहीं कैंकर्य करना है। एम्पेरुमानार की पादुकायें अपने मस्तक पर रखकर, वे अपनी चरम तिरुमेनी का त्याग करते हैं। श्री वैष्णव उनकी अंतिम यात्रा की तैयारी करते हैं, कावेरी नदी का जल लाकर उन्हें उर्ध्वपूर्ण से सुसज्जित आदि करते हैं। पोंन्नाच्चियार (हेमाम्बा) यह समझते हुए कि धनुर्दास के लिए परमपद का कैंकर्य प्रतीक्षा कर रहा है, ख़ुशी से उस स्थान की सजावट करती है और पूरे समय सभी श्री वैष्णवों का ध्यान रखती है। अंततः जब धनुर्दास की तिरुमेनी पालकी पर ले जाई जाती है और सड़क के अंतिम छोर तक पहुँचती है, वे धनुर्दास के वियोग को सहन नहीं कर पाती और जोर से विलाप करने लगती है और तुरंत अपना शरीर भी त्याग देती है। सभी श्री वैष्णवजन उन्हें देखकर चकित रह जाते हैं और उसी समय उन्हें भी धनुर्दास के साथ ले जाने की व्यवस्था करते हैं। यह भागवतों के प्रति लगाव के अत्यधिक स्तर को दर्शाता है जहाँ वे भागवतों से क्षण भर का वियोग भी सहन नहीं कर सकते।

मणवाल मामुनिगल ने विभिन्न आचार्यों के पासुरों के आधार पर “इयल सार्रुमुरै” (जिसका उत्सव के समय में इयरपा के अंत में गाया जाता है) का संकलन किया है। इसका पहला पासूर धनुर्दास द्वारा लिखा गया है और हमारे संप्रदाये का सार है।

नन्रुम् तिरुवुदैयोम् नानिलथ्थिल् एव्वुयिर्क्कुम
ओन्रुम् कुरै  इल्लै ओदिनोम्
कुंरम् एदुथ्थान अदिचेर इरामनुजन थाल
पिदिथ्थाऱ् पिदिथ्थारैप् पर्ऱि

अर्थ:- हम घोषणा करते हैं कि कोई चिंता-फिकर न करते हुए, वास्तविक संपत्ति (कैंकर्य) को करते रहें क्यूंकि हम श्रीवैष्णवों की शरण में है, जो श्रीरामानुज की शरण है, जो स्वयं भगवान कृष्ण के शरण है, जिन्होंने अपने प्रिय भक्तों (गोप और गोपियों) की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था।

इस पासूर में धनुर्दास ने निम्न सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत दर्शाये है:

  • श्री वैष्णवों की सबसे बड़ी संपत्ति – कैंकर्यश्री (दासत्व की संपत्ति)
  • श्री वैष्णवों को सांसारिक विषयों की चिंता नहीं करना चाहिए
  • श्री वैष्णवों को कैंकर्यश्री की महा संपत्ति भगवान और एम्पेरुमानार की कृपा से मिलती है
  • आचार्य परंपरा के द्वारा श्री वैष्णवों का एम्पेरुमानार से संबंध है

बार बार हमारे पूर्वाचार्यों ने बताया है कि श्रीवैष्णव की महिमा किसी विशेष वर्ण में जन्म से नहीं होती अपितु भगवान और अन्य श्री वैष्णवों के प्रति उसकी निष्ठा और प्रेम से होती है। पिल्लै उरंगा विल्ली धनुर्दास का जीवन और हमारे आचार्यों द्वारा उनकी महिमा गान, हमारे आचार्यों का इस सिद्धांत पर उनके मनोभाव का स्पष्ट संकेत है।

इस तरह हमने पिल्लै उरंग विल्ली धनुर्दास और पोंन्नाच्चियार के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे दोनों ही भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि  हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

पिल्लै उरंगा विल्ली (धनुर्दास) की तनियन :

जागरूग धनुष्पाणिम पानौऊ कत्गासमंविधम्।
रामानुजस्पर्शवीधिम राधधान्तार्थ प्रकाशकम्।।
भागीनैयाध्वयायुतं भाष्यकारभारम्वहम्।
रंगेशमंगलकरम धनुर्दासम् अहं भजे।।

अडियेन् भगवति रामानुजदासी

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एन्गळाळ्वान्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

engaLazhwanएन्गळाळ्वान् सहित नडादूरम्माळ् (उत्तरवर्ती पूर्ववर्ती के चरणकमलों मे)

जन्म नक्षत्र – चैत्र मास, रोहिणि नक्षत्र

अवतार स्तल् – तिरुवेळ्ळरै

आचार्य   –  श्रीरामानुजाचार्य स्वामी तथा तिरुक्कुरुगैपिरान् पिळ्ळान्

शिष्य    –  नडादूरम्माळ्

परम्पद प्राप्त स्थल – कोल्लन्कोन्डान् (मदुरै के निकट)

लेखन (ग्रन्थ सूची) – सारार्थ चतुष्टयम् ( वार्तामाला का ) , विष्णु चित्तीयम् ( विष्णु पुराण की व्याख्या )

इन्का जन्म तिरुवेळ्ळरै मे हुआ और इन्के माता पिता ने इन्का नामकरण विष्णुचित्त नाम रखा|  आपश्री स्वामी रामानुजाचार्य के शिष्य बने और तिरुक्कुरुगैपिरान्पिळ्ळान् से भगवत विषय एवम् श्रीभाष्य सीखा | कहा जाता है कि स्वयं स्वामी रामानुजाचार्य ने “एन्गळाळ्वान्” का पद् पेश कर इन्को सम्मानित किया | (कारण भक्ति, ज्ञान तथा आचार्य निष्ठा मे ये कूरताळ्वान् के जैसे थे) | नडादूरम्माळ् (वात्स्य वरदाचार्य) इन्के प्रथम शिष्यों मे से एक थे और नडादूराळ्वान् ( स्वामी रामानुजाचार्य के शिष्य) के पोते थे | जब अम्माळ को अपने दादाजी से श्रीभाष्य सीखने कि इच्छा हुई तो नडादूराळ्वान् ने अपनी बडती उमर के कारण अपने पोते को एन्गळाळ्वान् के चरणो मे सीखने के लिये भेजा |

अम्माळ् एन्गळाळ्वान् के गृह पहुंचे और द्वार खट्खटाये |  भीतर से अळ्वान् ने प्रश्न किया, “कौन है ?” इसके जवाब मे अम्माळ् ने उत्तर दिया, “मैँ वरदाचार्य हूँ” | अळ्वान् कि आवाज़ आयी, “मैँ” कि मृत्यु होने पर लौटो” |  स्व-घर लौटने पर अम्माळ् ने अपने दादाजी नडादूराळ्वान् को यह घटना सुनाई | एन्गळाळ्वान् के जवाब का अर्थ आपश्री ने आपश्री के दादाजी से पूछा | नडादूराळ्वान् ने सम्झाया कि, खुद् को हमेशा “अडियेन्”, याने “दास” कह कर ही परिचय करना है | इससे अहंकार मिटता है | यह अर्थ समझने के पश्चात् आपश्री एन्गळाळ्वान् के घर पधारे और इस बार परिचय देते हुए खुद् को “अडियेन्” से संबोधित किया | इस उत्तर से प्रसन्न होकर एन्गलाळ्वान् ने नडादूरम्माळ् को अपने शिष्य के रूप मे स्वीकार किया | भविष्य मे अम्माळ् एक प्रसिद्द् ज्ञानी बनने के कारण एन्गळाळ्वान् “अम्माळ् आचार्य” के नाम से भी जाने गये | अपने चरम स्तिथी में, स्वामी रामानुजाचार्य ने एन्गलाळ्वान् को तिरुक्कुरुगैपिरान्पिळ्ळान् के चरणों मे आश्रय लेने का आदेश दिया |

हमारे व्यख्यानो मे एन्गळाळ्वान् कि महिमा जो घटनायें प्रकट करते हैं, उनमे से कुछ् निम्नलिखित प्रस्तुत हैं:

  1. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि -2.9.10- तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै व्याख्यान् – इस पासुर मे पेरियाळ्वार् भगवान् कृष्ण का जामून फलों के प्रति प्रेम का झलक दिखाते हैं| इस संबन्ध मे एन्गळाळ्वान् और नन्जीयर् के मध्य एक सम्वाद सुनाते हैं| एन्गळाळ्वान् ने निद्र के पहले जागृत अवस्था मे एक स्वप्न देखा | उसमे एक बालक ने आळ्वान् से जामून् माँगा | और आळ्वान् के पूछने पर अपना नाम “आयर् तेवु, नन्जीयर् का पुत्र” बताया | (आयर् तेवु नन्जीयर् का तिरुवारधन मूर्ती है | एन्गळाळ्वान् नन्जीयर् से मिलकर उनको बताये कि आपके मूर्ती हमे सोने नही देते |  फिर नन्जीयर् ने अपने पूजा-मन्दिर मे जाके, अपने भगवान से एन्गळाळ्वान् को तंग न करने की प्रार्तना की|
  2. मुदल् तिरुवन्दादि 44 – नम्पिळ्ळै/पेरियवाच्चान् पिळ्ळै की व्याख्या के अनुसार – इस पासुर मे पोइगैआळ्वार् स्थापित् करते हैं कि जो नाम और रूप भक्त को प्रिय है उनको भगवान् स्वीकार करते हैं| आगे देखे उसी विषय को यहा दूसरी दृष्टिकोण मे फिर दोहराते हैं| भगवान एन्गळाळ्वान् से अपना परिचय देते समय नन्जीयर् के दिया हुआ नाम देते हैं| एन्गळाळ्वान् के द्वारा यह सुनकर, नन्जीयर् अति प्रसन्न हुये |

एन्गळाळ्वान् के चरित्र से वार्तामाला मे लिखित कुछ विषयः

जब अम्मङ्गि अम्माळ् एन्गळाळ्वान् से हमारे सम्प्रदाय ज्ञान सीखने की प्रार्थना करते हैं, एन्गळाळ्वान् उनको सारार्थ- चतुष्ठयम् से  साम्प्रदायिक दर्शन के चार महत्वपूर्ण सिद्धान्त सम्झाते हैं|

  • स्वरूप ज्ञान (आत्मा के सच्चे स्वभाव का ज्ञान) – जीवात्मा परमात्मा का दास है और उनके अधीन  मे है |
  • स्वरूप यातात्म्य ज्ञान (आत्मा के सच्चे स्वभाव का विकसित ज्ञान) – जीवत्मा भागवतो का दास है और उनके अधीन में है |
  • विरोधी ज्ञान (बाधाओं का ज्ञान) – भागवतो से संबन्ध विच्छेद होने पर भी सामान्य कार्यो मे ध्यान देना | (अर्थात् भागवतो से दास का वियोग असहनीय होना चाहिये |
  • विरोधी यातात्म्य ज्ञान (विरोधी कि विकसित ज्ञान) – भागवत् संबन्ध मिलने के पश्चात्, उनमे अवगुण ढूँढना (अर्थात् भागवतो मे कभी अवगुण नहीं ढूँढना चाहिये |
  • फल ज्ञान (उद्देश्य का ज्ञान) – भागवतो के निर्देशों को बिना हिचकिचाहट पालन करना.
  • फल यातात्म्य ज्ञान (उद्देश्य से विकसित ज्ञान) – भूलोक के भागवतो की सेवा मे परमपद् भी त्याग करने केलिये तैयार रहना |
  • उपाय ज्ञान (विधि का ज्ञान) – जीवात्मा और परमात्मा के संबन्ध को निस्संदेह समझना और उसीके अनुसार पेश आना | (इसका विस्तृत स्पष्टीकरण है) |
  • उपाय यातात्म्य ज्ञान (विधि कि विकसित ज्ञान) –  परमात्मा रूपी भगवान शरीर रूपी चित (आत्मा) का शरीरी (आत्मा) है, जो सारे कार्य अपने प्रसन्नता के लिये ही करते हैं और भगवान् को छोड़कर (भगवान् को साध्य-साधन मानकर) अन्य सभी विधियों एवं साधनों के प्रती अनासक्त होना ही उपाय यातात्म्य ज्ञान है |

११८ – नडादूरम्माळ् को एन्गळाळ्वान् चरमश्लोक समझा रहे थे | “सर्व धर्मान् परित्यज्य” का विवरण सुनते समय, नडादूरम्माळ् को यह संकोच आता है कि भगवान् स्वतंत्रा (स्वातंत्रय) से शास्त्रो मे विवरित सारे धर्मो (उपायो) की उपेक्शा करने के बारे मे क्यो बात करते हैं| इसका उत्तर देते हुये एन्गलाळ्वान् कहते हैं कि यह भगवान का सच्चा स्वरूप है, वह सम्पूर्ण भाव से स्वतन्त्र हैं और भगवान जीवात्मा को, अपने स्वरूप के विरुध कोई और उपाय अपनाने के दोष से छुटकारा दिला रहे हैं – भगवान पर निर्भर होने के कारण, जीवात्मा को भगवान को अपना उपाय बनाना ही सही है | इस प्रकार एन्गळाळ्वान् स्पष्ट रूप मे स्थापित करते हैं कि यहाँ भगवान् के शब्द सर्वथा उचित है |

१५३ – इसमे एन्गळाळ्वान् एक आचार्य के सद्गुणों को बहु-सुन्दरता से प्रकट करते हैं| आचार्य वह है जो आत्मा को शारीरिक संबंधो से मुक्त करे, जिनको भगवान के प्रति स्वाभाविक दास्यता का ज्ञान है | अन्य देवातान्तारो के संबंधरहित एवं उनके प्रति अनासक्त हो , जिसको भगवान के सर्वज्ञता का ज्ञान हो , जो इस लोक मे सारा समय अर्चावतार भगवान के ध्यान मे हो और जो अन्त मे परमपद प्राप्त करता हो | केवल नामात्मक अन्य आचार्य जन खुद को संसार का नेता घोषित कर, अपने शिष्यों का धन समेटने मे ध्यान देते हैं और उनकी सेवा मे लगे रह्ते है |

१७३ – जब पिन्भळघराम पेरुमाळ् जीयर् ( नम्पिळ्ळै के खास शिष्य) बीमार पडे तो वे श्रीवैष्णवों को अपना स्वास्थ्य अभिवॄद्धि के लिये भगवान से प्रार्थना करने के लिये कहते हैं- यह श्रीवैष्णव शिष्टाचार के अनुसार अनुचित माना जाता है -भगवान् से किसी भी वस्तु की प्रार्थना नही करना चाहिये, स्वास्त्य भी नही ( तो चिकित्सक के पास जाने के बारे मे क्या कहे? ) | नम्पिळ्ळै के शिष्य उनसे जीयर के इस व्यवहार के बारे मे पूछे |  नम्पिळ्ळै बोलते हैं, आप पहले शास्त्र-निपुण एनगळाळ्वान् से इसका अर्थ पूछिए| इसके उत्तर मे एन्गळाळ्वान् बोलते हैं कि “शायद् जीयर् की श्रीरङ्गदिव्यदेश के प्रति आसक्ति के कारण कुछ दिन और यही निवास करना चह्ते हैं| इसके पश्चात् नम्पिल्लै अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् के पास भेजते हैं | अरयर् स्वामी का जवाब था, “सम्भवतः जीयर् का कोई अपूर्ण कार्य रह गया हो जिसके कारण वे अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं” | नम्पिल्लै की आज्ञा का पालन कर, इसके बाद उनके शिष्य अम्मङ्गि अम्माळ् से यही सवाल् पूछे | उनक उत्तर था, ” नम्पिल्लै कि घोष्ठी कौन छोडना चाहेगा ? शायद नम्पिल्लै कि कालक्षेप सुनने की इच्छा से जीयर् यहा और दिन बिताना चाहते हैं|” नम्पिल्लै फिर अपने शिष्यों को पेरिय मुदलियार् के पास भेजते हैं | उनका ख्याल था कि “जीयर् शायद् भगवान श्री रङ्गनाथ के प्रति उनके प्रेम के कारण यहा से निकलना नही चाह्ते हैं | ” नम्पिल्लै अन्त मे जीयर् से ही पूछे कि यदि इनमे से कोई दृष्टिकोण उनके विचार से मिलती है | जीयर् कहे, “नही | आप सर्वज्ञ है, आपकी कृपा के कारण यह मेरे मुख से प्रकट करना चाहते हैं | मै अपना जीवन इस लिये ज़ारी रखना चाहता हूँ क्योकि, प्रति दिन आपको स्नान के बाद आपके रूप का दिव्य दर्शन प्राप्त होती है और आपके लिये पंखा चलाने इत्यादि का कैङ्कर्य प्राप्त होता है | ये सब कैङ्कर्य त्याग कर कैसे परमपद् चलू ?” इस प्रकार पिन्भळघ पेरुमाळ् जीयर्, एक शिष्य के सर्व श्रेष्ठ सिद्दान्त को प्रकट करते हैं – अपने आचार्य के दिव्य स्वरूप के प्रति अत्यन्त प्रेमाभक्ति | नम्पिळ्ळै के प्रति जीयर् कि भक्ति के बरे मे सुनके सब आश्चर्यचकित हुये | इस सिद्दान्त के विवरण को पिळ्ळैलोकाचार्य ने अपने श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र मे (सूत्र ३३३) और मणवाळमामुनि ने अपने उपदेशरत्नमाला मे (पासुर ६५,६६) किया है|

इस प्रकार एन्गळाळ्वान् के यशस्वी जीवन का कुछ झलक हमने देखा | वह भागवत् निष्ठा मे सम्पूर्ण भावसे स्थित थे और स्वामी रामानुजाचार्य के भी प्रिय थे |

इनके चरण कमलों मे हमारी प्रार्थना यह है कि इनके जैसे भागवत् निष्ठा हममे भी थोड़ा आये |

एन्गळाळ्वान् जी का तनियन्

श्री विष्णुचित्त पद पङ्कज संश्रयाय चेतो मम स्पृहयते किमतः परेण |
नोचेन् ममापि यतिशेकरभारतीनाम् भावः कथम् भवितुमर्हति वाग्विधेयः ||

अडियेन् प्रीति रामानुज दासी

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