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वेदव्यास भट्टर

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नमः
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

अजह्वान पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर के साथ

आल्वान पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर के साथ

जन्म नक्षत्र : वैशाख, अनुराधा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: एम्बार (गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया: श्रीरंगम

वेद व्यास भट्टर कुरेश स्वामीजी के यशस्वी पुत्र और पराशर भट्टर के अनुज थे। उन्हें श्री राम पिल्लै, श्री राम सूरी आदि नामों से भी जाना जाता है। सुदर्शन सूरी (श्रुत प्रकाशिक भट्टर), जिन्होंने श्रीभाष्य पर व्याख्यान लिखा है, वे वेद व्यास भट्टर के वंशज हैं।

अळ्वान और आण्डाल के यहाँ, पेरिय पेरुमाल (श्री रंगनाथ) के प्रसाद से दोनों ही भट्टर बंधुओं का जन्म हुआ। एक रात जब अळ्वान और आण्डाल बिना प्रसाद पाए लेटे थे (उस दिन अळ्वान उन्जा वृत्ति कर रहे थे और भारी बारिश की वजह से वे अनाज जमा नहीं कर सके) तब वे मंदिर की अंतिम नैवेद्य घंटी सुनते हैं। आण्डाल भगवान से कहती है “यहाँ आपके अनन्य भक्त, अळ्वान बिना प्रसाद पाए बैठे हैं और आप वहां उत्तम भोग का अन्दन ले रहे हैं”। यह जानकर पेरिय पेरुमाल, उत्तम नम्बि द्वारा अळ्वान और आण्डाल को अपना प्रसाद सभी साज-सामान के साथ भिजवाते हैं। प्रसाद को आते हुए देखकर अळ्वान चकित रह जाते हैं। वे तुरंत आण्डाल से पूछते हैं – “क्या आपने भगवान से प्रार्थना की थी” और आण्डाल उनके द्वारा किये हुए अनुरोध को स्वीकार करती है। अळ्वान उनके द्वारा प्रसाद के लिए भगवान से किये हुए आग्रह से व्याकुल हो जाते हैं। वे केवल दो मुट्ठी प्रसाद ही स्वीकार करते हैं, कुछ पाकर, शेष प्रसाद आण्डाल को दे देते हैं। उस दो मुट्ठी प्रसाद के फलस्वरूप उन्हें दो सुंदर बच्चों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

दोनों बालकों के जन्म के १२ दिन बाद, एम्पेरुमानार, एम्बार (गोविन्दाचार्य) और सभी शिष्यों के साथ अळ्वान के घर पधारते हैं। वे एम्बार से बालकों को बाहर लाने के लिए कहते हैं। बालकों को लाते हुए, एम्बार उनके कानों में द्वय महामंत्र का उच्चारण करते हैं और उन्हें एम्पेरुमानार को सौप देते हैं। एम्पेरुमानार तुरंत पहचान जाते हैं कि वे दोनों द्वय मंत्रोपदेश प्राप्त कर चुके हैं और एम्बार से कहते हैं कि वे उनके आचार्य हो। एम्बार सहर्ष उसे स्वीकार करते हैं और उन्हें संप्रदाय के सभी दिव्य सिद्धांतों का उपदेश देते हैं। तब एम्पेरुमानार, सनातन धर्म में ऋषि पराशर और ऋषि वेदव्यास के योगदान के लिए उनकी स्मृति में बालकों के नाम पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते हैं। इस तरह वे आलवन्दार के प्रति अपनी एक प्रतिज्ञा पूर्ण करते हैं, जहाँ उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि वे ऋषि पराशर और वेद व्यास के प्रति आभार प्रकट करने के लिए कोई कार्य करेंगे।

दोनों भाइयों में से, पराशर भट्टर अल्प अवधि तक जीवित रहे और संसार छोड़ने की अपनी तीव्र इच्छा से परमपद प्रस्थान किया। आण्डाल (भट्टर की माता) भट्टर के अंतिम क्षणों में बड़ी उदार थी, और भट्टर के अंतिम संस्कारों की देखरेख आनंद सहित करती हैं, इस विचार से कि भट्टर स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण की नित्य सेवा करने के लिए परमपद जाना चाहते थे। अंतिम संस्कारों के पूर्ण होने पर, वेद व्यास भट्टर घर लौटकर पराशर भट्टर के वियोग में व्याकुल होकर रोने लगते हैं। आण्डाल वेद व्यास भट्टर को सांत्वना देती है और उनसे पूछती है क्या वे पराशर भट्टर के परमपद प्रस्थान पर उनसे ईर्ष्या करते हैं। वेद व्यास भट्टर तुरंत अपनी गलती को समझ जाते हैं, स्वयं को सांत्वना देते हैं, और अपनी माता से क्षमा याचना करते हैं और पराशर भट्टर के परमपद गमन का उत्सव जारी रखते हैं।

पेरिय पेरुमाल, वेद व्यास भट्टर को अपनी सन्निधि में आमंत्रित करते हैं और उनसे कहते हैं कि “ ऐसा मत सोचो कि पराशर भट्टर ने तुम्हें छोड़ दिया है। मैं यहाँ तुम्हारे पिता के समान ही हूँ।” तब वेद व्यास भट्टर संप्रदाय को नन्जीयर (वेदांती स्वामीजी) जैसे अन्य दिग्गजों के साथ नेतृत्व करते हैं।

हमारे व्याख्यानों में कई उदाहरणों में वेद व्यास भट्टर की महिमा को देखा जा सकता है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं –

  • तिरुमालै 37 – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में, तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) समझाते हैं कि पेरिय पेरुमाल हमारे नित्य संबंधी हैं और वे हर समय हमारी रक्षा करते हैं। इस संदर्भ में यह देखा गया है कि जब वेद व्यास भट्टर पीड़ा की अवस्था से गुजर रहे थे, पराशर भट्टर उन्हें यह सिद्धांत समझाते हैं और उन्हें पुर्णतः पेरिय पेरुमाल के आश्रित रहने के लिए कहते हैं।
  • मुदल तिरुवन्दादि 4 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) /पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान – पोइगै आळ्वार (सरोयोगी स्वामीजी) बताते हैं कि अगस्त्य, पुलस्त्य, दक्ष और मार्कंडेय को रूद्र भगवत विषय समझा रहे थे (जैसे कि वे भगवान के विषय में सब कुछ जानते हैं)। जब वेद व्यास भट्टर रूद्र पर इस प्रकार व्यंग करते हैं, तब पराशर भट्टर कहते हैं “जब रूद्र के मस्तिष्क पर तमोगुण का प्रभाव रहता है वह विमूढ़ हो जाते हैं , पर अब वह भगवत विषय के अनुसरण में लगे हुये हैं – इसलिए अब उनकी आलोचना न करो”।
  • तिरुवाय्मोळि 1.2.10 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – इस पासूर में, नम्मालवार तिरुमंत्र (अष्टाक्षर) का अर्थ समझाते हैं। इस परिपेक्ष्य में नम्पिल्लै एक सुंदर द्रष्टांत बाताते हैं। अष्टाक्षर मंत्र का अर्थ केवल आचार्य से ही सुनना चाहिए। एक बार अळ्वान इस पासूर को समझाते हुए कालक्षेप में, अपने दोनों पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं। वे उनसे कहते हैं कि वे लोग एम्बार (उनके आचार्य) के पास जाकर उनसे इसके अर्थ समझे। वे दोनों उनकी बात मानकर वहां से जाने लगते हैं। परंतु फिर अळ्वान उन्हें बुलाकर कहते हैं “इस संसार में सब कुछ इतना अल्पकालिक है कि हो सकता है तुम लोग आचार्य के मठ तक ठीक तरह से पहुँच न पाओ (तुम्हें रास्ते में कुछ भी हो सकता है)। इसलिए मैं स्वयं ही तुम्हें अष्टाक्षर मंत्र का अर्थ सिखाता हूँ” और फिर उन दोनों को वह अर्थ समझाते हैं। एक श्री वैष्णव को कैसा होना चाहिए- दूसरों के आत्मिक कल्याण के प्रति अति दयालू और दूसरों से अलग, अळ्वान इस बात का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
  • तिरुवाय्मोळि 3.2 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान (प्रस्तावना खंड) – इस दशक में, नम्मालवार, तिरुमालीरुनचोल्लै अज्ह्गर के अनुभवों को नियंत्रित रखने में असमर्थ हैं। यहाँ वेद व्यास भट्टर पराशर भट्टर से एक प्रश्न पूछते हैं। “आलवार क्यूँ इतनी पीड़ा में हैं और अर्चावतार भगवान के दर्शन अनुभव करने में असमर्थ हैं जबकि परमपद (जो बहुत दूर है) या विभव (जो अवतार बहुत समय पहले हुए थे) के समान न होकर अर्चावतार में भगवान ठीक हमारे सामने हैं?” पराशर भट्टर कहते हैं “अल्पबुद्धि व्यक्ति के लिए भगवान के 5 अलग रूप (पर, व्यूह, विभव, अर्चा, अंतर्यामी) एक दुसरे से भिन्न है। परन्तु उनके लिए जिन्होंने सिद्धांतों को पूर्णतः समझ लिया है सभी रूप एकमात्र उन्हीं भगवान का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे सभी रूप सारे गुणों से परिपूर्ण हैं। परन्तु अब, आलवार तिरुमालीरुनचोल्लै अज्ह्गर की सुंदरता से अभिभूत हैं और वे अपने गुणानुभाव और भावनाओं को नियंत्रित रखने में असमर्थ हैं”।
  • तिरुवाय्मोळि 6.7.5 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – जब पराशर भट्टर तिरुक्कोलूर के वैत्तमानिधि भगवान के मंदिर के आसपास के सुंदर बगीचे आदि का वर्णन करते हैं, वेद व्यास भट्टर उन्हें एम्बार द्वारा दिए गए उस विस्तृत वर्णन का स्मरण कराते हैं जहाँ आलवार का मन दिव्य देश की सुंदरता देख कर अति आनंदित हो जाता है।
  • तिरुवाय्मोळि 7.2 – नम्पिल्लै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – जब दोनों भट्टर विवाह के लिए योग्य हुए, आण्डाल अळ्वान से कहती है कि वे जाये और जाकर पेरिय पेरुमाल को इसके बारे में बताये। अळ्वान कहते हैं “भगवान के परिवार के लिए हम क्यूँ चिंता करें?” – वे इस पूर्णता से भगवान को समर्पित थे कि किसी भी तरह के स्व-प्रयासों में संलग्न नहीं होते थे। जब अळ्वान पेरिय पेरुमाल के समक्ष गये, पेरिय पेरुमाल स्वयं उनसे पूछते हैं कि क्या वे कुछ कहना चाहते हैं। अळ्वान प्रतिउत्तर में कहते हैं “अन्य लोग कहते हैं, दोनों भाइयों का विवाह अब हो जाना चाहिए” और फिर भगवान उनके विवाह की व्यवस्था करते हैं।

इस तरह हमने वेद व्यास भट्टर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

वेद व्यास भट्टर की तनियन:

पौत्रं श्री राममिश्रास्य श्रीवत्सांगस्य नन्दनं ।

रामसूरीं भजे भट्टपराशरवरानुजम ।।

अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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श्रुत प्रकाशिका भट्टर् (सुदर्शन सूरि)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्शत्रः अपरिचित्

अवतार् स्तलः श्रीरन्गम्

आचार्य: वेदव्यास् भट्टर् और् नडादूरम्माळ्

लेखन् :  श्रुत प्रकाशिकै, श्रुत प्रदीपिकै, (तात्पर्य दीपिका) वेदार्थ् सन्ग्रह् की व्याख्यान्, शरनागति गद्य और् शुभाल उपनिशद् की व्याख्यान् , शुख पक्शीयम्

ये वेद् व्यास् भट्टर् के पोते थे. इनका नामकरण सुदर्शन सूरी (सुदर्शन भट्टर्) किया गया. ये हमारे सम्प्रदाय् के महान विद्वान बने. इन्होने ही श्री भाश्य के महत्वपूर्ण और गहरे टिप्पणियां श्रुत प्रकाशिकै तथा श्रुत प्रदीपिकै लिखे. इन ग्रंथों के नाम् इन्होने ऐसे रखा ताकी उपाधि से ही पता चले कि ये स्वामि रामानुज् से प्रकटित नडादूरम्माळ् द्वारा मिले विषय हैं|

अम्माळ् से श्री भाश्य सीख्ने के लिये भट्टर् कान्चीपुरम् पधारे. भट्टर् के अक्लमन्द् और् प्रतिभा से प्रभावित अम्माळ् अपना कालक्शेप् की शुरुवात भट्टर् की पहुँचने के बाद् ही करते थे. अम्माळ् के अन्य शिष्यों की सोच थी कि भट्टर् के उच्च परिवार की पृष्ठभूमि के कारण अम्माळ् भट्टर् के प्रति पक्शपात थे. भट्टर् की यश समझाने के लिये अम्माळ् एक बार कालक्शेप् के बीच रुखे और पिछले दिन की प्रसन्ग समझाने को वहा उपस्थित शिष्यों को आदेश दिया| इस पर उनके सारे शिष्य हैरान हुये और् मौन हो गये| उस समय भट्टर एक अक्षर भी बिना छोडे पिछले दिन की प्रसन्ग की परिपूर्ण सूचना दिया| इस सम्भव से वहाँ उपस्थित अम्माळ् के अन्य शिष्यों को भट्टर् की महानता की ज्ञान हुयी|

नम्पिळ्ळै तथा पेरियवाच्चान्पिळ्ळै के जैसे भट्टर् भी दिव्यप्रभन्धों के गहरे अर्थ स्थापित करने वाले टिप्पणियाँ लिखे| श्रीभाश्य अथवा वेदार्थ् सन्ग्रह् की टिप्पणियाँ लिखकर संस्कृत वेदान्त के गहरे अर्थो कि स्थाप्ना की|

इस प्रकार हम श्रुत प्रकाशिका भट्टर् के यशश्वी जीवन के कुछ झलक देखे. वे एक सम्पूर्ण महान विद्वान थे और नडदूरम्माळ् के अत्यन्त प्रीय शिष्य थे. हम उनकी चरण कमलो मे प्रर्थना करें कि हमे भी उनकी भागवत निश्ठा में से किन्चित प्राप्त् हो.

श्रुत प्राकसिका भट्टर् कि तनियन् :

यथीन्द्र क्रुत भाश्यार्था यद् व्याख्यानेन दर्शिताः |
वरम् सुदर्शनार्यम् तम् वन्दे कूर कुलादिपम् ||

अडियेन् प्रीति रामानुज दासी

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