Monthly Archives: July 2015

कूर नारायण जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

जन्म नक्षत्र : मृगशीर्ष, ज्येष्ठा नक्षत्र

अवतार स्थल : श्रीरंगम

आचार्य : कूरेश स्वामीजी, पराशर भट्टर स्वामीजी

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया : श्रीरंगम

रचनाएं : सुदर्शन शतक, स्तोत्र रत्न व्याख्यान, श्रीसूक्त भाष्य, उपनिषद् भाष्य, नित्य ग्रथं (तिरुवाराधनं), आदि

शिष्य चेमं जीयर, तिरुक्कुरुगैप् पिरान जीयर, सुंदर पाण्डिय देवन्, आदि

उनका जन्म श्रीरंगम में मृगशीर्ष, ज्येष्ठा नक्षत्र में सिरीय गोविन्द पेरुमाल (एम्बार के भ्राता) के यहाँ हुआ था। सन्यास ग्रहण करने के बाद वे कूर नारायण जीयर, नलं थिगल नारायण जीयर, नारायण मुनि, पेरिय जीयर और श्रीरंग नारायण जीयर आदि के नाम से ज्ञात हुए।

एम्पेरुमानार, कुरेश स्वामीजी, भट्टर

एम्पेरुमानार, कुरेश स्वामीजी, भट्टर

सन्यासाश्रम ग्रहण करने से पहले उनके “एदुत्त कै अलगिय नायनार” नाम के एक पुत्र थे। वे पहले कूरेश स्वामीजी के शिष्य हुए और बाद में वे आल्वान के पुत्र भट्टर के शिष्य हुए और उनसे भी शिक्षा प्राप्त की।

उन्होंने श्रीरंगम मंदिर में बहुत से बाह्य कैंकर्य संपन्न किये जैसे पार्थसारथी सन्निधि, गरुडालवार सन्निधि आदि का निर्माण और पेरिय पेरुमाल के लिए आंतरिक/गोपनीय कैंकर्य।

वेदांताचार्य जो कूर नारायण जीयर के बहुत समय बाद अवतरित हुए, उन्होंने अपनी रचनाओं में उन्हें पेरिय जीयर नाम से संबोधित किया है (नोट: ऐसा माना जाता है कि वहां एक और कूर नारायण जीयर रहते थे, जो वेदंताचार्य के कुछ समय के बाद पैदा हुए)। वेदान्ताचार्य अपने स्तोत्र व्याख्यान में जीयर के स्तोत्र व्याख्यान का उल्लेख करते हैं । उन्होंने जीयर के श्री सूक्त भाष्य और नित्य ग्रंथ का उल्लेख भी अपने रहस्य त्रय सार में किया है। क्यूंकि कूर नारायण जीयर कूरेश स्वामीजी के शिष्य थे तो उन्हें नन्जीयर से आयु में अधिक होना चाहिए- इसलिए नन्जीयर और कूर नारायण जीयर की अलग पहचान करने के लिए वेदान्ताचार्य ने उन्हें पेरिय (बड़े) जीयर कहकर संबोधित किया होगा।

मामुनिगल ने अपने ईडु प्रमाण संग्रह (नम्पिल्लै के ईडु महा व्याख्यान के लिए प्रमाणों का संकलन) में कूर नारायण जीयर के उपनिषद भाष्य का उल्लेख किया है। मामुनिगल ने उनकी महिमा “शुद्ध संप्रदाय निष्ठावान” (वह जिन्हें हमारे संप्रदाय में शुद्ध निष्ठा है) के रूप में की है।

कूर नारायण जीयर को सुदर्शन उपासक के रूप में भी जाना जाता है। एक बार कुरेश स्वामीजी जीयर से कहते है “हमारा जन्म श्री वैष्णव परिवार में हुआ, जहाँ उपासना में प्रवत्त होना अनुचित माना जाता है –उपासना जैसे स्व-प्रयासों में प्रवत्त होने के बजाय हमें पूर्ण रूप से भगवान के श्री चरणों के अधीन होना चाहिए”। जीयर कहते है “मेरी उपासना मेरे लाभ के लिए नहीं है। वह एकमात्र भगवान और भागवतों की सेवा के लिए है”। जीयर के जीवन के बहुत सारे द्रष्टांत उनके इस सिद्धांत को दर्शाते हैं।

  • पुराने समय में नम्पेरुमाल, कावेरी नदी में तेप्पोत्सव (नौका पर्व) का आनंद लिया करते थे। एक बार ऐसे उत्सव में, अचानक बाड़ आ जाती है और तेप्पम (नौका) उस बाड़ के पानी के साथ दूर तक बह जाती है। परन्तु जीयर अपनी उपासना शक्ति के प्रयोग से नौका को बहने से रोक देते हैं और उन्हें सुरक्षा से नदी के किनारों पर ले आते है। यह सब देखकर, वे कैंकर्यपरारों को श्रीरंगम शहर में ही एक बड़े तालाब का निर्माण करने का निर्देश देते हैं और व्यवस्था करते हैं कि उसके बाद से तेप्पोत्सव सुरक्षित रूप से मनाया जाये।

नौका में नाचियार के साथ नम्पेरुमाल

नौका में नाचियार के साथ नम्पेरुमाल

  • एक बार तिरुवरंगप्पेरुमाल अरैयर किसी रोग से ग्रसित हो जाते हैं, जो पेरिय पेरुमाल के प्रति उनके कैंकर्य को प्रभावित करते हैं। उस समय, कूर नारायण जीयर, सुदर्शन शतक की रचना कर, उसे गा कर सुनाते हैं और अरयर को उस रोग से मुक्ति दिलाते हैं। यह बात सुदर्शन शतक की तनियन में स्पष्टता से दर्शायी गयी है।एम्पेरुमानार के समय के तुरंत बाद, श्रीरंगम के एम्पेरुमानार मठ का कार्य-भार कूर नारायण जीयर को दिया गया। इस मठ का नाम “श्रीरंग नारायण जीयर मठ” हुआ और अनेकों जीयर स्वामी ने इस पद की प्रतिष्ठा को ज़ारी रखा और श्रीरंगम मंदिर कैंकर्य में सहयोग किया।
तिरुवरंगप्पेरुमाल अरयर

तिरुवरंगप्पेरुमाल अरयर

इस तरह हमने कूर नारायण जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। हम सब उनके श्री चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भगवत/ भागवत/ आचार्य कैंकर्य प्राप्त हो।

कूर नारायण जीयर की तनियन :

श्रीपराशर भट्टार्य शिष्यं श्रीरंगपालकं।
नारायण मुनिं वन्दे ज्ञानादि गुणसागरं।।

मैं, श्री नारायण मुनि को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीपराशर भट्टर के शिष्य हैं, जो श्री रंगम की रक्षा करते हैं और जो ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि के सागर हैं।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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तिरुनारायणपुरत्तु आय् जनन्याचार्यर्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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जन्म नक्षत्र: अश्विनी, पूर्वाषाढा

अवतार स्थल: तिरुनारायणपुर

आचार्य: उनके पिता लक्ष्मणाचार्य (पञ्च संस्कार), नालूराच्चान् पिळ्ळै (देवराजाचार्य स्वामीजी) (ग्रंथ कालक्षेप)

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त कियातिरुनारायणपुर

रचनाएं: तिरुप्पावै व्याख्यान (2000 पद और 4000 पद) और स्वापदेश, तिरुमालै व्याख्यान, आचार्य हृदयं और श्रीवचन भूषण के लिए व्याख्यान, मामुनिगल की महिमा में एक तमिल पासूर, आदि

उनके जन्म पर उनके माता-पिता ने उनका नाम देवराज रखा। उन्हें देव पेरुमाल, आसुरी देवराय, तिरुत्तालवार दासर, श्रीसानु दासर, मातरू गुरु, देवराज मुनीन्द्र और जनन्याचार्यर् नामों से भी जाना जाता है।

आय् अर्थात माता। वे तिरुनारायण भगवान के लिए दूध बनाने और भोग लगाने का कैंकर्य करते थे। एक बार जब उनके कैंकर्य में देरी हो गयी, भगवान ने आय् की उनके प्रति ममता के सम्मान में पूछा “आय् (माता) कहाँ है?” उस समय से, उन्हें आय् अथवा जनन्याचार्यर् के नाम से जाना जाता है। यह देव पेरुमाल से नडातुर अम्माळ् के संबंध के समान ही है।

वे एक महान विद्वान् थे और संस्कृत और द्राविड वेद/वेदांत दोनों में निपुण थे।

उन्होंने तिरुवाय्मोळि पिल्लै और तिरुवाय्मोळि आचान (इलम्पिलिचै पिल्लै) के साथ नालूराच्चान् पिळ्ळै से नम्पिल्लै के ईदू व्याख्यान सुना करते थे (ईदू का पूर्ण इतिहास https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/06/21/eeyunni-madhava-perumal/ पर पढ़ा जा सकता है)। आचार्य हृदयं परंपरा के अंश होने से उनकी महिमा है (अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार – पेत्रार (1) – पेत्रार (2) – आय् जनन्याचार्यर् – मणवाल मामुनिगल)।

मामुनिगल ने आचार्य हृदयं के लिए व्याख्यान लिखना प्रारंभ किया। 22वें चूर्णिका के लिए व्याख्यान लिखते हुए, मामुनिगल कुछ स्पष्टीकरण चाहते थे। उन्होंने इस चूर्णिका की चर्चा आय् जनन्याचार्यर् के साथ करने का निर्णय लिया, जो तिरुवाय्मोळि पिल्लै के सहपाठी थे और मामुनिगल, आय् को अपने आचार्य भी मानते थे। मामुनिगल, नम्मालवार से तिरुनारायणपुर जाने और आलवार तिरुनगरी छोड़ने की अनुमति लेते हैं। उसी समय, मामुनिगल के यश और महान प्रसिद्धि के बारे में सुनकर, आय् जनन्याचार्यर् तिरुनारायणपूर से आलवार तिरुनगरी की और प्रस्थान करते हैं। वे दोनों आलवार तिरुनगरी के बाहर मिलते हैं और एक दूसरे को दण्डवत प्रणाम करते हुए, बड़े आनन्द के साथ एक दूसरे के गले लगते हैं। मामुनिगल के शिष्य इन महान आत्माओं की इस भेंट को पेरिय नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) और एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) की भेंट के समान मानते हैं और उनकी एक-दूसरे के प्रति आपसी श्रद्धा देखकर खुश हो जाते हैं। वे दोनों आलवार तिरुनगरी लौटते हैं और मामुनिगल, आय् से पूर्ण आचार्य हृदयं कालक्षेप सुनते हैं। व्याख्यान श्रृंखला के अंत में, मामुनिगल आय् के लिए सुंदर तनियन की रचना करते हैं और उन्हें प्रस्तुत करते हैं। आय्, उसे स्वयं के योग्य न मानकर, प्रतिक्रिया में, मामुनिगल की महिमा में निम्नलिखित सुंदर तमिल पासूर प्रस्तुत करते हैं –

पुतुरिल वंदुदित्त पुण्णियनो?
पुंगकमळुम् तातारूमगीलमार्भन तानिवनो?
तूतूर वनत नेडूमालो?
मणवालमामुनिवं एन्तैयिवर मुवरिलुम यार?

सामान्य अनुवाद:

क्या वे एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) हैं, जो श्रीपेरुम्बुतुर में अवतरित हुए और जो सबसे गुणी हैं?
क्या वे नम्मालवार हैं, जो वकुल पुष्प की माला धारण करते हैं?
क्या वे स्वयं श्रीकृष्ण हैं, जो पांडवों के हित के लिए उनके दूत बनकर गये – अपनी सौलभ्यता (सुगमता) को दर्शाते हुए?
मामुनिगल उपरोक्त तीनों में से कौन हैं, जो मेरे प्रति पिता समान स्नेह दर्शाते हैं?

इस तरह आय् आलवार तिरुनगरी में कुछ समय बिताते हैं और अंततः तिरुनारायणपूर लौट आते हैं। परंतु उनकी अनुपस्थिती में कुछ लोग जो उनसे इर्षा करते थे, वे उनके परमपद प्रस्थान करने की घोषणा कर देते हैं (क्यूंकि वे लम्बे समय तक लौटकर नहीं आये थे) और उनकी सारी संपत्ति मंदिर के संचालन में दे देते हैं। इसे देखकर, आय् बहुत प्रसन्न होते हैं और कहते हैं “भगवान कहते हैं जो उनके प्रिय हैं, वे उनका सभी धन ले लेते हैं, इसलिए यह एक महान आशीष है” और उसके पश्चाद वे एक सादा जीवन व्यतीत करते हैं। वे अपने अर्चाविग्रह भगवान (ज्ञान पिरान), जो उनके आचार्य के द्वारा दिए गये थे, से विनती करते हैं और अपना कैंकर्य जारी रखते हैं। तदन्तर, वे सन्यास आश्रम स्वीकार करते हैं और अंततः परमपद में भगवान की नित्य सेवा प्राप्त करने के लिए वे परमपद कि ओर प्रस्थान करते हैं।

इस तरह हमने तिरुनारायणपुरत्तु आय् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे महान विद्वान् थे और और अपने आचार्य और मणवाल मामुनिगल के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

तिरुनारायणपुरत्तु आय् की तनियन:

आचार्य ह्रुदयस्यार्त्था: सकला येन दर्शिता:।
श्रीसानुदासम् अमलं देवराजम् तमाश्रये।।

अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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वडुग नम्बि (आंध्रपूर्ण स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नमः
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

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तिरुनक्षत्र: चैत्र, अश्विनी

अवतार स्थल: सालग्राम (कर्नाटक)

आचार्य: एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी)

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया: सालग्राम

रचनाएँ: यतिराज वैभव, रामानुज अष्टोत्तर सत् नाम् स्त्रोत्रं, रामानुज अष्टोत्तर सत् नामावली

अपनी तिरुनारायणपुर की यात्रा के दौरान, एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) मिथिलापुरी सालग्राम पहुँचते हैं, जहाँ वे मुदलियाण्डान (दाशरथि स्वामीजी) को निर्देश देते हैं कि वे स्थानीय जल के स्त्रोत (नदी) को अपने चरण कमलों से स्पर्श करें। मुदलियाण्डान (दाशरथि स्वामीजी) के चरण कमलों की पवित्रता से, जिन स्थानीय लोगों ने उस नदी में स्नान किया वे भी पवित्र हुए और एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के शिष्य हो गये। उन्हीं में से एक थे वडुग नम्बि, जिन्हें आंध्रपूर्ण नाम से भी जाना जाता है। एम्पेरुमानार, अपनी निर्हेतुक दया से, वडुग नम्बि का उद्धार करते हैं, उन्हें हमारे संप्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सिखाते हैं और उन्हें आचार्य निष्ठा में  पूर्णतः स्थापित करते हैं। और उसके बाद वडुग नम्बि एम्पेरुमानार से कभी अलग नहीं हुए।

वडुग नम्बि पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठा में स्थित थे। वे एम्पेरुमानार की चरण पादुकाओं का प्रतिदिन अराधना किया करते थे।

एक बार एम्पेरुमानार के साथ यात्रा करते हुए, वडुग नम्बि अपने अर्चा भगवान (एम्पेरुमानार की पादुकायें) उसी पेटी में लेकर चले जिसमें एम्पेरुमानार के अर्चा भगवान विराजे थे। यह जानकार एम्पेरुमानार बहुत अचंभित होते हैं और वडुग नम्बि से पूछते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? वडुग नम्बि त्वरित उत्तर देते हैं “मेरे आराध्य भगवान भी आपके आराध्य भगवान के समान ही श्रेष्ठ है, इसलिए आपके भगवान के साथ मेरे भगवान के होने में कुछ भी गलत नहीं है”।

जब भी एम्पेरुमानार, पेरिय पेरुमाल का मंगलाशासन करने जाते थे, वे उनके दिव्य स्वरुप से आनंदित हो जाया करते थे। परंतु वडुग नम्बि, पूरे समय एम्पेरुमानार के दिव्य स्वरुप के दर्शन करके आनंदित हुआ करते थे। यह देखकर एम्पेरुमानार उनसे पेरिय पेरुमाल के सुंदर नेत्रों के दर्शन करने के लिए कहते हैं। वडुग नम्बि, तिरूप्पाणाळवार (योगिवाहन स्वामीजी) के शब्दों द्वारा कहते हैं “एन अमुदिनैक कण्ड कण्गल मर्रोंरिनैक काणावे” अर्थात “मेरे नेत्रों, जिन्होंने एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) का दिव्य स्वरुप देखा है, वे अब और कुछ भी नहीं देखेंगे”। ऐसा सुनकर एम्पेरुमानार उनकी आचार्य निष्ठा से बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें आशीष देते हैं।

वडुग नम्बि नियमित रूप से एम्पेरुमानार का शेष प्रसाद पाया करते थे और उसे पाने के बाद, सम्मान से, वे अपने हाथ अपने मस्तक से पोंछ लिया करते थे (हाथों को जल से धोने के बजाये) – सामान्यतः भगवान/ आचार्य, आलवार का प्रसाद, जो अत्यंत पवित्र है, उसे पाने के पश्चाद हमें अपने हाथों को जल से नहीं धोना चाहिए, अपितु अपने हाथों को अपने मस्तक से पोंछना चाहिए। एक बार, यह देखकर एम्पेरुमानार अचंभित होते हैं और शेष प्रसाद पाने के बाद वे नम्बि को अपने हाथ धोने के लिए कहते हैं। नम्बि उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और अपने हाथ धो लेते हैं। अगले दिन, जब एम्पेरुमानार को भगवत प्रसाद प्राप्त होता है, वे उसमें से थोडा पाकर, शेष वडुग नम्बि को प्रदान कर देते हैं। वडुग नम्बि उसे पाकर अपने हाथों को जल से धो लेते हैं। एम्पेरुमानार फिर से अचंभित होकर वडुग नम्बि से पूछते हैं कि भगवत प्रसाद पाने के बाद उन्होंने अपने हाथों को क्यों धोया। वडुग नम्बि, बड़ी ही विनम्रता और सुंदरता से उत्तर देते हैं “मैं तो केवल भगवान द्वारा दिए हुए कल के निर्देश का पालन कर रहा हूँ”। एम्पेरुमानार कहते हैं “आपने मुझे बड़ी सरलता से पराजित कर दिया” और उनकी निष्ठा की सराहना करते हैं।

एक बार वडुग नम्बि, एम्पेरुमानार के लिए दूध तैयार कर रहे थे। उस समय, नम्पेरुमाल की सवारी एम्पेरुमानार के मठ के बाहर से निकलती है। एम्पेरुमानार, वडुग नम्बि को बाहर बुलाते हैं पर वडुग नम्बि कहते हैं “अगर मैं आपके भगवान के दर्शन के लिए बाहर आऊंगा, तो मेरे भगवान का दूध जल जायेगा। इसलिए मैं नहीं आऊंगा”।

एक बार वडुग नम्बि के शरीर संबंधी (जो श्री वैष्णव नहीं थे) उनसे भेंट करने के लिए आते हैं। उनके जाने के पश्चाद वडुग नम्बि सभी बर्तन नष्ट कर देते हैं और स्थान को पूरी तरह से शुद्ध करते हैं। फिर वे मुदलियाण्डान (दाशरथि स्वामीजी) के निवास पर जाकर, उनके द्वारा त्याग दिए गए बर्तन उठाते हैं और उन्हें उपयोग करना प्रारंभ करते हैं। इस तरह वे स्थापित करते हैं कि जिनके पास शुद्ध आचार्य संबंध होता है, उनसे सम्बंधित सभी कुछ (यहाँ तक की उनकी त्याग की हुई वस्तुयें भी) पूरी तरह से शुद्ध/पवित्र होती है और हमारे लिए स्वीकार करने योग्य होती है।

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एक बार एम्पेरुमानार तिरुवनंतपुरम जाते हैं और वहां अनंत-शयनम् भगवान के मंदिर का आगमन बदलने के बारे में सोचते हैं। परंतु भगवान की योजना कुछ और ही थी। इसलिए जब एम्पेरुमानार शयन करते हैं, भगवान उन्हें वहां से उठाकर तिरुक्कुरुन्गुडी दिव्य देश पहुंचा देते हैं। एम्पेरुमानार प्रातः जागकर, पास की नदी में स्नान करके, द्वादश उर्ध्वपूर्ण लगाकर (12 उर्ध्वपूर्ण), तिरुमण का शेष वडुग नम्बि को प्रदान करने के लिए वडुग नम्बि को पुकारते हैं(जो उस समय तिरुवनंतपुरम में थे)। तिरुक्कुरुन्गुडी नम्बि, स्वयं वडुग नम्बि का रूप लेकर उनके शेष तिरुमण (पवित्र मिट्टी) को स्वीकार करते हैं। तत्पश्चाद एम्पेरुमानार तिरुक्कुरुन्गुडी नम्बि को शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं।

  • पेरियालवार तिरुमोली 4.3,1 – मणवाल मामुनिगल (वरवरमुनी स्वामीजी) व्याख्यान – यह पद “नाव कारियम” (ऐसे शब्द जिनका उच्चारण नहीं करना चाहिए) के विषय में दर्शाता है। वडुग नम्बि के जीवन की एक घटना यहाँ दर्शायी गयी है। एक बार, वडुग नम्बि के समीप, एक श्री वैष्णव तिरुमंत्र का उच्चारण करते हैं। उसे सुनकर, वडुग नम्बि (जो पुर्णतः आचार्य निष्ठा में स्थित हैं) कहते हैं “यह नाव कारियम है” और वहां से चले जाते हैं। इस संबंध में यह स्मरणीय है कि जब भी हम तिरुमंत्र, द्वय मंत्र और चरम श्लोक का ध्यान करते हैं, तब प्रथम हमें गुरु परंपरा का ध्यान करना चाहिए और उसके उपरांत ही रहस्यत्रय का ध्यान करना चाहिए। पिल्लै लोकाचार्य इसे श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र (सूत्र 274) में इस प्रकार दर्शाते हैं “जपत्वयं गुरु परम्परैयुम द्वयमुम” (गुरु परंपरा और द्वय महामंत्र का निरंतर ध्यान करते रहना चाहिए)।
  • पेरियालवार तिरुमोली 4.4.7 – मणवाल मामुनिगल व्याख्यान – जब वडुग नम्बि परमपद के लिए प्रस्थान करते हैं, एक श्रीवैष्णव, अरुलाल पेरुमाल एम्पेरुमानार को यह समाचार यह कहते हुए देते हैं कि “वडुग नम्बि ने परमपद की ओर प्रस्थान किया”। अरुलाल पेरुमाल एम्पेरुमानार कहते हैं “क्यूंकि वडुग नम्बि एक आचार्य निष्ठ थे, आपको कहना चाहिए कि उन्होंने एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के चरण कमलों को प्राप्त किया। आपको यह नहीं कहना चाहिए कि उन्होंने परमपद के लिए प्रस्थान किया”।
  • वडुग नम्बि ने यतिराज वैभवं नामक एक सुंदर ग्रंथ कि रचना की। इस ग्रंथ में उन्होंने दर्शाया कि 700 सन्यासी, 12000 श्री वैष्णव और कई वैष्णवीयाँ आदि, एम्पेरुमानार के अनुयायी थे और वे लोग सदा उनकी सेवा और पूजा किया करते थे।

पेरियवाच्चान पिल्लै, माणिक्क माला में दर्शाते हैं कि “वडुग नम्बि ने स्थापित किया है कि आचार्य का पद (स्थान) सबसे श्रेष्ठ है और केवल एम्पेरुमानार के लिए ही उपयुक्त है”।

पिल्लै लोकाचार्य वडुग नम्बि की महानता को श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र (सूत्र 411) में दर्शाते हैं –

वडुग नम्बि आलवानैयुम आण्डानैयुम इरुकरैयर एन्बर।

मामुनिगल समझाते हैं कि वडुग नम्बि, मधुरकवि आलवार के समान थे जिनके लिए नम्मालवार ही सब कुछ थे। कुरत्तालवान (कूरेश स्वामीजी) और मुदलियाण्डान (दाशरथि स्वामीजी) पूर्ण रूप से एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के आश्रित/ समर्पित थे – फिर भी समय समय पर वे भगवान का मंगलाशासन किया करते थे और इस क्रूर संसार को सहन करने में असमर्थ होने पर उनसे मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना करते थे। इसलिए वडुग नम्बि कहते हैं कि “यद्यपि उन दोनों का संबंध एम्पेरुमानार के साथ था, वे भगवान और एम्पेरुमानार दोनों पर निर्भर थे”।

अंततः, आर्ति प्रबंध (पासूर 11) में, मामुनिगल स्थापित करते हैं कि वडुग नम्बि का स्थान (आचार्य निष्ठ) ऐसा है, जिसे प्राप्त करने की उत्कट चाहना उनकी भी है और वे एम्पेरुमानार से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें भी वडुग नम्बि के समान बनने का आशीर्वाद दे। वडुग नम्बि की एम्पेरुमानार के प्रति इतनी अतुल्य श्रद्धा थी कि वे अलग से भगवान की पूजा में संलग्न नहीं होते थे। हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा यह स्थापित किया गया है कि जब हम आचार्य का पूजन करते हैं , भगवान का पूजन स्वतः ही हो जाता है। परन्तु जब हम भगवान की पूजा करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हमनें अपने आचार्य का पूजन भी कर लिया। इसलिए, आचार्य की आराधना और उन पर पूर्ण निर्भरता हमारे संप्रदाय का सबसे अभीष्ट सिद्धांत है और मामुनिगल दर्शाते हैं कि इसे वडुग नम्बि ने पुर्णतः प्रकट किया है।

इस तरह हमने वडुग नम्बि के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

वडुग नम्बि की तनियन:

रामानुजार्य सच्शिष्यम् सालग्राम निवासिनम् ।
पंचमोपाय संपन्नाम सालग्रामार्यम् आश्रये।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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नडातुर अम्माल

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

इंगलाल्वान के चरण कमलों में नडातुर अम्माल

इंगलाल्वान के चरण कमलों में नडातुर अम्माल

तिरुनक्षत्र : चैत्र, चित्रा

अवतार स्थल: कांचीपुरम

आचार्य: एन्गलाल्वान्

शिष्य: श्रुतप्रकाशिका भट्टर (सुदर्शन सूरी), किदाम्बी अप्पिल्लार आदि

स्थान जहाँ परमपद प्राप्त किया: कांचीपुरम

रचनायें: तत्व सारं, परत्ववादी पंचकं (वृस्तत विवरण http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html पर), गजेन्द्र मोक्ष श्लोक द्वयं, परमार्थ श्लोक द्वयं, प्रपन्न पारिजात, चरमोपाय संग्रहम्, श्री भाष्य उपन्यासं, प्रमेय माला, यातिराज विजय भाणं, आदि।

कांचीपुरम में जन्म के बाद उनके माता पिता ने उनका नाम वरदराजन रखा। वे नादतुर आल्वान के पौत्र हैं, जो स्वयं एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) द्वारा नियुक्त किये गए श्रीभाष्य सिंहासनाधिपतियों में एक हैं।

वे प्रतिदिन कांचीपुर के देव पेरुमाल (श्री वरदराज भगवान्) की सेवा में गर्म दूध का भोग लगाते थे। जैसे एक माता ठीक तरह से जाँच कर अपने बालक के लिए दूध बनाती है, उसी प्रकार वे भी भगवान के लिए उत्तम गर्माहट युक्त, उचित ताप का दूध बनाया करते थे। इसीलिए स्वयं देव पेरुमाल ने सानुराग उन्हें अम्माल और वातस्य वरदाचार्य कहकर सम्मानित किया।

जब अम्माल अपने दादाजी से श्रीभाष्य सीखने की विनती करते हैं, तो वे अपनी वृद्धावस्था के कारण अम्माल से कहते हैं कि वे एंगलाल्वान के पास जाएँ और उनसे श्रीभाष्य सीखें। अम्माल, एंगलाल्वान के निवास पर जाकर दरवाज़ा खटखटाते हैं। जब एंगलाल्वान पूछते हैं “कौन है?” तब अम्माल उत्तर देते हैं “मैं वरदराजन”। इस पर एंगलाल्वान कहते हैं “मैं के मरने के बाद वापस आना”। अम्माल अपने निवास पर लौट आते हैं और अपने दादाजी को पूरा द्रष्टांत बताते हैं। नदातुर आल्वान उन्हें समझाते हैं कि हमें हमेशा पूर्ण विनम्रता से अपना परिचय “अदियेन”(दास) ऐसा कहकर देना चाहिए और मैं, मेरा आदि जो अहंकार सूचक शब्द है उनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। सिद्धांत को समझकर, अम्माल एंगलाल्वान के पास लौटते हैं और फिर दरवाज़ा खटखटाते हैं। इस समय जब इंगलाल्वान पूछते हैं कि दरवाज़े पर कौन है, तब अम्माल कहते हैं “अदियेन् वरदराजन”। ऐसा सुनकर प्रसन्न, एंगलाल्वान, अम्माल का स्वागत करते हैं, उन्हें अपना शिष्य स्वीकार करके उन्हें संप्रदाय के मूल्यवान सिद्धांत सिखाते हैं। क्यूंकि एंगलाल्वान नडातुर अम्माल जैसे महान विद्वान् के आचार्य हैं, उन्हें अम्माल के आचार्य के रूप में भी जाना जाता है।

अम्माल के प्रमुख शिष्य श्रुतप्रकाशिका भट्टर हैं (सुदर्शन सूरी– वेद व्यास भट्टर के पौत्र), जिन्होंने अम्माल से श्रीभाष्य सीखा और श्रीभाष्य पर महान व्याख्यान श्रुत प्रकाशिक और वेदार्थ संग्रह और शरणागति गद्यम पर भी व्याख्यान लिखा।

एक बार अम्माल दर्जनों श्रीवैष्णवों को श्रीभाष्य सिखा रहे थे। शिष्य कहते भक्ति योग का पालन करना बहुत कठिन है। तब वे उन्हें प्रपत्ति के बारे में समझाते हैं। वे लोग फिर कहते हैं कि प्रपत्ति का अभ्यास करना तो और भी कठिन है। उस समय अम्माल कहते हैं, “एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के चरण कमल ही हमारा एक मात्र आश्रय है केवल ऐसा ध्यान करो और यही तुम्हें मुक्ती प्रदान करेगा”।

चरमोपय निर्णय में भी समान घटना दर्शाई गयी है।

नडातुर अम्माल कुछ श्री वैष्णवों को श्रीभाष्य का अध्यापन कर रहे थे। उस समय उनमें से कुछ लोग ने कहा “जीवात्मा द्वारा भक्ति योग का अभ्यास नहीं किया जा सकता क्यूंकि वह बहुत कठिन है (उसमें बहुत से अधिकारों की आवश्यकता है जैसे पुरुष होना, त्रिवर्ण- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, एक समान ध्यान और भगवान की सेवा आदि) और प्रपत्ति भी नहीं की जा सकती क्यूंकि वह स्वरुप के विरुद्ध है (जीवात्मा पुर्णतः भगवान के आधीन है, चरम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए स्वयं के द्वारा किया गया कोई भी कार्य उस पराधीनता के विरुद्ध है)। ऐसी स्थिति में, जीवात्मा चरम लक्ष्य को कैसे प्राप्त कर सकता है?”। नडातुर अम्माल कहते हैं “उनके लिए जो यह सब करने में असमर्थ है, एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) का अभिमान ही परम मार्ग है। इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है। मैं इस बात पर द्रढ़ता से विश्वास करता हूँ”। अम्माल के अंतिम निर्देश इस लोकप्रिय श्लोक में समझाया गया है:

प्रयाण काले चतुरस् च्वशिष्याण् पदातिकस्ताण् वरदो ही वीक्ष्य
भक्ति प्रपत्ति यदि दुष्करेव: रामानुजार्यम् नमतेत्यवादित् ।।

उनके अंतिम दिनों में, जब नडातुर अम्माल के शिष्य उनसे पूछते हैं कि हमारे आश्रय क्या है, अम्माल कहते हैं “भक्ति और प्रपत्ति तुम्हारे स्वरुप के लिए उपयुक्त नहीं है; केवल एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) के चरण शरण होकर पुर्णतः उनके आश्रित हो जाओ; तुम्हें परम लक्ष्य प्राप्त हो जायेगा”।

वार्ता माला में, कई द्रष्टांतों में नडातुर अम्माल को दर्शाया गया है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं:

  • 118 – एंगलाल्वान नडातुर अम्माल को चरम श्लोक का उपदेश दे रहे थे। “सर्व धर्मान् परित्यज्य” समझाते हुए– नडातुर अम्माल सोचते हैं कि भगवान इतनी स्वतंत्रता से शास्त्रों में बताये गए सभी धर्मों (उपायों) का त्याग करने के लिए क्यूँ कह रहे हैं? एंगलाल्वान कहते हैं- यह भगवान का वास्तविक स्वरुप है– वे पुर्णतः स्वतंत्र हैं– इसलिए उनके लिए ऐसा कहना एकदम उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त वे कहते हैं कि भगवान जीवात्मा को किसी भी अन्य उपायों, जो जीवात्मा के वस्तविक स्वरुप के विरुद्ध है, में प्रयुक्त होने से बचाते हैं– क्यूंकि जीवात्मा पूर्ण रूप से भगवान के आश्रित है, जीवात्मा के लिए भगवान को उपाय स्वीकार करना ही उपयुक्त है। इसलिए, एंगलाल्वान स्पष्टतया समझाते हैं कि यहाँ भगवान के शब्द सबसे उपयुक्त है।
  • 198 – जब नडातुर अम्माल और एक श्री वैष्णव जिनका नाम आलीपिल्लान था (संभवतया एक अब्राह्मण श्रीवैष्णव या आचार्य पुरुष्कार हीन) एक साथ प्रसाद पा रहे थे, पेरुंगुरपिल्लाई नामक एक अन्य श्रीवैष्णव उसे बहुत आनंद से देखते हैं और कहते हैं “आपको इन श्री वैष्णव के साथ स्वतंत्र रूप से घुलते-मिलते देखे बिना, यदि मैं केवल सामान्य निर्देश सुनाता कि वर्णाश्रम धर्म का सब समय पालन करना चाहिए, तो मैं सारतत्व को पूरी तरह से खो देता”। अम्माल कहते हैं “सत्य यह है कि कोई भी/ कैसा भी, जो एक सच्चे आचार्य से सम्बंधित हो हमें उसे स्वीकार करके गले से लगा लेना चाहिए। इसलिए एक महान श्रीवैष्णव के साथ घुलने मिलने के मेरे इस अनुष्ठान को विशेष निर्देश (भागवत धर्म) जो हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा समझाया गया है के अनुसार समझना चाहिए”।

पिल्लै लोकाचार्य के तत्व त्रय के सूत्र 35 के व्याख्यान में (http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html), मणवाल मामुनिगल अम्माल के तत्व सारं के एक सुंदर श्लोक के माध्यम से प्रत्येक कार्य के प्रथम विचार में जीव का स्वातंत्रियम् (भगवान द्वारा जीव को दी गयी स्वतंत्रता) स्थापित करते हैं और यह बताते हैं कि कैसे भगवान प्रत्येक कार्य के प्रथम विचार द्वारा जीवात्मा का मार्ग दर्शन करते हैं।

इस तरह हमने नडातुर अम्माल के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे एक महान विद्वान् थे और एंगलाल्वान के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

नडातुर अम्माल की तनियन:

वन्देहम् वरदार्यम् तम् वत्साबी जनभूषणं
भाष्यामृतं प्रदानाद्य संजीवयती मामपि ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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वेदांताचार्य

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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 श्रीमान् वेंकटनाथार्य: कवितार्किक केसरी |

वेदांताचार्यवर्यो मे सन्निधत्ताम् सदा ह्रुदी ||

[वे जो विरोधी पंडितों और तर्क करनेवालों के लिए शेर के समान है और वे जो अलौकिक संपत्ति (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि) के स्वामी है और जिनका पवित्र नाम वेंकटनाथ है, ऐसे श्री वेदांताचार्य सदा मेरे ह्रदय में रहे।]


अवतार

जन्म नाम : वेंकटनाथ

जन्म वर्ष :  कलि युग, वर्ष 4370 (1268 AD)

माह और नक्षत्र :  भाद्रपद , श्रवण (श्रीनिवास् भगवान् के समान)

जन्म स्थान : कांचीपुरम्, तिरुत्तंक

गोत्र : विश्वामित्र गोत्र

अवतार : श्रीनिवास् भगवान् की पवित्र घंटी (जैसा की उन्होंने अपने ग्रंथ संकल्प सूर्योदय में बताया है)

माता-पिता : अनंत सूरी और तोतारम्बै

इस विभूति को छोड़ने के समय उनकी आयु : लगभग सौ वर्ष। उन्होंने यह विभूति कलि युग के 4470 वर्ष (1368 AD) के लगभग श्रीरंगम में छोड़ी


उनका ‘वेदांताचार्य’ नाम श्री रंगनाथ ने दिया, और ‘कवितार्किक केसरी’ और ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’, यह नाम श्री रंग नाच्चियार (श्री महालक्श्मीजि) ने प्रदान किया।

उनके “वरदाचार्य” नाम के एक पुत्र थे। श्री वरदाचार्य और एक जीयर जिनका नाम “ब्रह्मतंत्र स्वतंत्र जीयर” था, वे वेदांताचार्य के शिष्य थे।

किडाम्बी आच्चान् के पौत्र किडाम्बी अप्पुल्लार, श्री नदादूर अम्माल के शिष्यों में एक थे।

तिरुविरुत्तम-3 में बताये गये “अप्पुल” का अर्थ है गरुड। उनके नाम में अप्पुल्लार शब्द उनके गरुड़ के समान गुणों को दर्शाता है। उनका अन्य नाम ‘वादि हंसाबुवाहन” है – एक मेघ के समान जो हंसों को पराजित करता है, वे अपने विरोधी तर्क करनेवालों को पराजित करते हैं। उनका अन्य नाम ‘रामानुजर’ था।

सर्व प्रसिद्ध श्री वेदांताचार्य, श्री किदाम्बी अप्पुलार के भांजे और शिष्य थे।

जब वेदांताचार्य छोटे थे, वे अपने मामा श्री किदाम्बी अप्पुलार के साथ श्री नदादूर अम्माल की कालक्षेप गोष्ठी में सम्मिलित होने गये थे। इसका उल्लेख करते हुए वेदांताचार्य कहते हैं कि श्री नदादूर अम्माल ने उन पर कृपा कर कहा कि सत्य की स्थापना करेंगे और विशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव सिद्धांत के सभी विरोधियों को समाप्त करेंगे।


ग्रंथ

नदादूर अम्माल की क्रिपा से, श्री वेदांताचार्य ने असंख्य ग्रंथों कि रचना की और विशिष्टाद्वैत के विरोधी बहुत से दार्शनिक और तर्क करनेवालों को पराजित किया।

श्री वेदांताचार्य ने सौ से अधिक ग्रंथों कि रचना की और वे ग्रंथ संस्कृत, तमिल और मणिप्रवालम (संस्कृत और तमिल का मिश्रण) भाषाओं में हैं।

उनके प्रमुख ग्रंथों में से कुछ निम्न है –

  • तात्पर्य चन्द्रिका, जो गीता भाष्य का व्याख्यान है
  • तत्वटीका, श्री भाष्य के एक खंड का व्याख्यान
  • न्याय सिद्धज्ञानं, जो हमारे संप्रदाय की सिद्धांत का विश्लेषण करता है
  • सदा दूषणी, जो अद्वैत सिद्धांत के विरुद्ध है
  • अधिकर्ण सारावली, श्री भाष्य के वर्ग विभाजन से सम्बंधित है
  • तत्व मुक्ताकलापं, जो हमारे तत्व को समझाता है और सर्वार्थ सिद्धि नामक उसका व्याख्यान
  • चतुःश्लोकी स्त्रोत्र और गद्य त्रय के लिए संस्कृत में भाष्य
  • संकल्प सूर्योदय, जो एक नाट्य के रूप में है
  • दया शतकम्, पादुका सहस्रं, याद्वाभ्युध्यम्, हंसासंदेशं;
  • रहस्य त्रय सारं, संप्रदाय परिशुद्धि, अभयप्रदान सारं, पर मत् भंगम्
  • मुनिवाहन भोगं, जो अमलनादिपिरान पर व्याख्यान है
  • आहार नियम, अनुशंसित भोजन की आदतों पर एक तमिल लेख
  • दशावतार् स्त्रोत्र, गोदा स्तुति, श्री स्तुति, यतिराज सप्तति जैसे स्त्रोत्र
  • द्रमिदोपनिषद् तात्पर्य रत्नावली, द्रमिदोपनिषद् सारं, जो तिरुवाय्मौली के अर्थों को प्रदान करता है

और बहुत कुछ।

इस लेख के अब तक के प्रकरण श्री पुतुर स्वामी द्वारा प्रकाशित मलर पर आधारित है।

कांची श्री तोपुल वेदांताचार्य अवतार उत्सव के समय

कांची श्री तोपुल वेदांताचार्य अवतार उत्सव के समय

वेदांताचार्य और अन्य आचार्य

वेदांताचार्य ने पिल्लै लोकाचार्य की प्रशंसा में ‘लोकाचार्य पंचासत’ नामक एक सुंदर प्रबंध कि रचना की। वेदांताचार्य, पिल्लै लोकाचार्य से आयु में 50 वर्ष छोटे थे और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे जिसे इस ग्रंथ के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है; इस ग्रंथ का आज भी तिरुनारायणपुरम (मेलकोट, कर्नाटक) में नियमित रूप से पाठ किया जाता है। श्री उ.वे. टी.सी.ए. वेंकटेशन स्वामी द्वारा लिखित श्री उ.वे. वि.वि. रामानुजम् स्वामी के व्याख्यान पर आधारित, ‘लोकाचार्य पंचासत्’ के अंग्रेजी शब्दार्थ http://acharya.org/books/eBooks/vyakhyanam/LokacharyaPanchasatVyakhyanaSaram-English.pdf पर प्राप्त कर सकते हैं।

वादिकेसरी अलगिय मणवाल जीयर ने अपने “तत्वदीप” और अन्य ग्रंथों में वेदांताचार्य के ग्रंथों का उल्लेख किया है।

श्री मणवाल मामुनिगल ने तत्वत्रय और मुमुक्षुपदी (पिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित) के अपने व्याख्यान में वेदांताचार्य के शब्दों का उपयोग किया है; और मणवाल मामुनिगल प्रेम से वेदांताचार्य को ‘अभियुक्तर’ कहते थे।

श्री ऐरुम्बिअप्पा, मणवाल मामुनिगल के एक अष्ट दिग्गज, ने अपने ‘विलक्षणमोक्षाधिकारी निर्णय’ में वेदांताचार्य के ‘न्यायविंशति’ का उल्लेख किया है, और उसके अर्थों का सार भी समझाया है।

चोलसिंहपुर (शोलिंगुर) के स्वामी डोड्डाचार्य ने वेदांताचार्य के सतदूषणी पर चण्डमारुतम् नामक टिका लिखा। इसलिए उन्हें छन्दमृतं डोडाचार्य कहा गया और उनकी परंपरा के सभी अगले आचार्यों को भी आज तक यही कहा जाता है।

प्रतिवादी भयंकर अण्ण् और उनके शिष्यों और वंशजो का वेदांताचार्य के प्रति समर्पण सभी को ज्ञात है। यहां तक की तिरुविन्दलूर और अन्य दक्षिणी केंद्रों में निवास करने वाले वंशजो के नाम वेदांताचार्य के पुत्र के नाम “नायिनाचार्य” पर रखे गये हैं, जो उनके पुत्र के प्रति अपनी श्रद्धा को दर्शाते है।

कई अन्य आचार्यों और विद्वानों ने वेदांताचार्य के ग्रंथों पर व्याख्यान लिखा है या उनका उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है ।

……….श्री डोड्डाचार्य के शिष्य नरसिंहराजाचार्य स्वामी ने, ‘न्याय परिशुद्धि’ पर समीक्षा की है;

……….मैसूर (मण्डयम), उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में हुए अनंताल्वान ने वेदांताचार्य के ग्रंथों का संदर्भ अपने कई लेखों में की है;

……….उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तर काल में कांचीपुरम में रहने वाले कुंरप्पाक्कम स्वामी ने अपनी रचना ‘तत्व्- रत्नावली’ में वेदांताचार्य को सानुराग ‘जयति भगवान् वेदंताचार्य स् तार्किक-केसरी’ कहकर संबोधित किया है।

* श्री वेदांताचार्य को भी, अपने पूर्वाचार्यों और समकालीन आचार्यों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था, जिसका प्रमाण उनकी “अभितिस्तव्” में मिलता है, “कवचं रंगमुक्ये विभो ! परस्पर-हितैषीणाम् परिसरेशु माम् वर्त्य” , (हे भगवान! कृपया मुझे श्रीरंगम में उन महान भागवतों के चरणों में निवास प्रदान करे जो परस्पर एक दुसरे के शुभ चिन्तक हैं)।

*  “भगवद् ध्यान सोपान्” की अंतिम पंक्ति में, श्री वेदांताचार्य, श्री रंगम के बहुश्रुत विद्वानों और कला प्रेमियों के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं, जिन्होंने उनके विचारों को स्पष्टता प्रदान की और उन्हें एक सरल और आकर्षक शैली विकसित करने के सक्षमता प्रदान की”।

*  श्री वेदांताचार्य की श्री रामानुज के प्रति भक्ति को सभी भली प्रकार जानते हैं; अपने ग्रंथ “न्यास तिलका” की प्रारंभिक कविता “उकत्य धनंजय” में, वे संतुष्टी करते हैं कि भगवान परोक्ष रूप में उन्हें यह बताते हैं की उनके द्वारा मोक्ष दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्री रामानुज के संबंध मात्र से ही उन्हें मोक्ष मिलने का निर्धारण हो गया है।

यह सब वेदांताचार्य और अन्य विद्वानों का एक दुसरे के प्रति सम्मान, प्रेम और आदर को दर्शाता है और जिसने हमारे श्री वैष्णव संप्रदाय पर सर्वमान्य विचार विमर्श के रास्ते बनाये।


आचार्य – चंपू

श्री एस. सत्यमूर्ति ईयेंगर, ग्वालियर (ग्वालियर स्वामी के रूप में भी जाने जाते हैं), अपनी 1967 की एक पुस्तक “अ क्रिटिकल अप्प्रेसिएशन ऑफ़ श्री वेदांत देसिका विस-अ-विस द श्रीवैष्णवाइट वर्ल्ड” में श्री वेदांतार्चार्य के विषय में कुछ अन्य जानकारी बताये हैं। निम्न बताई गयी बहुत सी बातें इसी पुस्तक से ली गयी है।

वे एक रचना, वेदांताचार्य विजय (आचार्य चंपू) का उल्लेख करते हैं, जो गद्य और कविता के रूप में संस्कृत भाषा में महान विद्वान और कवि “कौशिक कवितार्किकसिंह वेदंताचार्य” द्वारा लिखी गयी है, जो लगभग 1717 AD के समय में हुए। इस रचना को वेदांताचार्य के जीवन का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमाणिक अभिलेख माना जाता है।

इस रचना के पहले स्तबक (भाग / खंड) का प्रारंभ मंगलाशासन से होता है, उसके बाद रचयिता के परिवार, कांचीपुरम शहर और वेदांताचार्य के दादाजी श्री पुंडरिक यज्व के बारे में बात की गयी है।

दूसरा स्तबक अनंत सूरी (श्री वेदांताचार्य के पिता) के जन्म और विवाह और उनकी पत्नी के गर्भ में दिव्य घंटी (वेदांताचार्य भगवान की घंटी के अवतार माने गये हैं) के प्रवेश से सम्बंधित है।

वेदांताचार्य का जन्म, उनका बचपन, उनका अपने मामाजी के साथ श्री वत्स्य वरदाचार्य की पाठशाला में जाना और फिर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना, जनेऊ धारण करना, वेद और पुराण आदि कि शिक्षा प्रारंभ करना, विवाह, भगवान हयग्रीव के कृपापात्र होना, न्याय सिद्धज्ञान सहित कई ग्रंथो की रचना करना और कवितार्किकसिंह की उपाधि प्राप्त करना, यह सब तीसरा स्तबक में विस्तार से वर्णन किया गया है।

चौथे स्तबक में कांची के उत्सव, वेदांताचार्य द्वारा “वरदराज पञ्चासत्” की रचना करना, अद्वैत विद्वान् विद्यरन्य के साथ सामना और उस पर विजय प्राप्त करना, और वेंकटाद्री की तीर्थ यात्रा का वर्णन किया गया है।

पांचवे स्तबक में उनकी यात्रा का वर्णन, “दया- शतकम्” की रचना और उनकी “वैराग्य-पंचक”, जो विद्यरन्य द्वारा राज दरबार में आने के निमंत्रण का प्रतिउत्तर है, की रचना; उत्तर क्षेत्र की यात्रा; कांचीपुरम लौटना; विद्यरन्य और एक द्वैत विद्वान् अक्षोभ्य मुनि के वाद विवाद में निर्णय देना; दक्षिण के मंदिरों की यात्रा; तिरुवेंदिपुरम में कुछ समय निवास करना; बहुत से ग्रंथों की रचना करना; श्री मुष्णम् की यात्रा; और श्री रंगम पधारने का निमंत्रण मिलना आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन है।

‘आचार्य चंपू’ का अंतिम और छठा स्तबक, वेदांताचार्य की श्री रंगम की यात्रा, उनके श्री रंगनाथ के दर्शन करना, ‘भगवद ध्यान सोपान’ आदि की रचना, कृष्णमिश्र नाम के एक अद्वैती पर 18 दिनों तक चले लम्बे वाद विवाद के बाद विजय प्राप्त करना और ‘वेदांताचार्य’, ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’ आदि उपाधि प्राप्त करना, कवि द्वारा चुनौती देने पर ‘पादुका सहस्रं’ की रचना करना, मुस्लिमों द्वारा श्रीरंगम पर हमला, वेदांताचार्य का देश के पश्चिमी भाग में निवास करना, ‘अभितिस्तव’ की रचना, अन्य क्षेत्रों में उनकी यात्रा, सपेरे की चुनौती पर ‘गरुडान्डक’ की रचना, उनके पुत्र का जन्म और ‘रहस्यत्रयसार’ की रचना का वर्णन करता है।

इस पुस्तक ‘आचार्य चंपू’ ने वृहद लोकप्रियता प्राप्त की, संस्कृत विद्वानों द्वारा इसे उत्सुकता से पढ़ा गया; फिर भी इस मूल्यवान पुस्तक के पुनः प्रकाशन के कोई प्रयास नहीं किये गए।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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विळान् चोलै पिल्लै

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

आलवार एम्पेरुमानार् जीयर तिरुवडीगले चरणं

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श्री विळान् चोलै पिल्लै, श्री पिल्लै लोकाचार्य के शिष्यों में से एक हैं।

उनका दास्य नाम “नलम् थिगल नारायण दासर्” है।

उनका जन्म स्थल तिरुवनंतपुरम के समीप “आरनुर” ग्राम है।

यह स्थान “करैमनै” नदी के किनारे स्थित है।

उनका जन्म अश्विनी -उत्तरभाद्रपद नक्षत्र में हुआ था (शनिवार 27 अक्टूबर 2012, नंदन वर्ष)।

उनका जन्म ईलव कुल में हुआ था। अपने कुल के कारण वे मंदिर के अंदर नहीं जा सकते थे, इसलिए तिरुवनंतपुरम के अनंत पद्मनाभ मंदिर के गोपुर के दर्शन और मंगलाशासन के लिए वे अपने गाँव के विलम वृक्ष पर चढ़ जाया करते थे।

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तनियन

तुला हिर्बुधन्य संभूतं श्रीलोकार्य पदाश्रितम् |

सप्तगाथा प्रवक्तारं नारायण महं भजे ||

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श्रीलोकार्य पदारविंदमखिलम् श्रुत्यर्थ कोसामस्थथा

गोष्ठीन्जचापि तदेकलीन मनसा संजितयनन्तम् मुदा |

श्री नारायण् दासमार्यममलम् सेवे सतां सेवधिम्

श्री वाग्भूषण गूढ़भाव विवृतिम् यस सप्तगाताम् व्यधात् ||

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विळान् चोलै पिल्लै के बारे में अधिक जानकारी

विळान् चोलै पिल्लै ने ईदू, श्री भाष्य, तत्वत्रय और अन्य रहस्य ग्रंथ, अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनाराचार्य से सीखा, जो श्री पिल्लै लोकाचार्य के अनुज थे।

उन्होंने श्री वचन भूषण अपने आचार्य श्री पिल्लै लोकाचार्य से सीखा और वे उसके अर्थों में विशेषज्ञ (अधिकारी) माने जाते थे।

श्री विळान् चोलै पिल्लै ने “सप्तगाथा” कि रचन की जिसमें उनके आचार्य के “श्री वचन भूषण” के सार तत्व का वर्णन है।

Note: सप्त गाथा की मूल प्रति संस्कृत, अंग्रेजी और तमिल में http://acharya.org/sloka/vspillai/index.html पर उपलब्ध है।

अपने आचार्य के प्रति सबसे बड़े कैंकर्य स्वरुप, उन्होंने आचार्य द्वारा दिए हुए अंतिम निर्देशों का पालन किया– श्री पिल्लै लोकाचार्य चाहते थे कि उनके शिष्य, तिरुवाय्मोली पिल्लै (तिरुमलै आलवार/ शैलेश स्वामीजी) के समक्ष जायें और उन्हें इस सुनहरी वंशावली के अगले आचार्य के रूप में तैयार करें; श्री पिल्लै लोकाचार्य, विळान् चोलै पिल्लै को तिरुमलै आलवार को श्री वचन भूषण के अर्थ सिखाने के निर्देश देते हैं।

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विळान् चोलै पिल्लै और तिरुवाय्मोली पिल्लै

जब तिरुवाय्मोली पिल्लै तिरुअनंतपुरम पहुंचे, नमबूधिरीयों ने उनका स्वागत किया और तीन खिडकियों से अनंत पद्मनाभ के दर्शन और मंगलाशासन करके उन्होंने श्री विळान् चोलै पिल्लै कि खोज प्रारंभ की।

जब उन्हें उनके स्थान की जानकारी हुई और वे वहाँ पहुंचे, उन्हें बड़ा अचम्भा हुआ! विळान् चोलै पिल्लै अपने आचार्य पिल्लै लोकाचार्य के दिव्य विग्रह और उनके सभी शिष्यों की महानता और उन दिनों उनकी तिरुवरंगम में उपस्थिति के ध्यान योग में थे।

विळान् चोलै पिल्लै का दिव्य विग्रह मकड़ी के जाले से ढका हुआ था।

तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) उनके चरणों में प्रणाम करके उनके समक्ष शांति से खड़े हो जाते हैं। विळान् चोलै पिल्लै तुरंत अपनी आँखें खोलकर तिरुवाय्मोली पिल्लै पर कृपा करते हैं। वे अपने शिष्य को देखकर बहुत प्रसन्न हुए जिनकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे।

उन्होंने श्री वचन भूषण के दिव्य अर्थों को तिरुवाय्मोली पिल्लै को सिखाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने 7 पासूरों की सप्त गाथा की रचना की जो श्री वचन भूषण का सार बताती है और वह सप्त गाथा भी उन्होंने तिरुवाय्मोली पिल्लै को समझाया।

यह तोंडराडीप्पोड़ी आलवार (भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी) द्वारा कहे गये “कोडुमिन कोणमिन” पासूर का प्रमुख उदाहरण था कि लव् कुल के विळान् चोलै पिल्लै ने श्री वैष्णवता का सार दिया और ब्राह्मण कुल के तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) ने उसे प्राप्त किया।

कुछ समय बाद, तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी), विळान् चोलै पिल्लै से आज्ञा लेकर प्रस्थान करते हैं, और श्री रामानुज के दर्शन प्रवर्तक बनने की राह पर आगे चलते हैं।

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विळान् चोलै पिल्लै की चरम यात्रा

एक दिन नमबूधिरी, अनंत पद्मनाभ भगवान की आराधना करते हुए देखते हैं कि विळान् चोलै पिल्लै पूर्वी द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं, ध्वज स्तंब और नरसिंह भगवान की सन्निधि को पार करते हुए वे उत्तर द्वार से गर्भ गृह में प्रवेश करते हुए “ओर्रै कल मण्डप” के समीप से सीढियाँ चढते हैं और भगवान के सेवा दर्शन देने वाली तीन खिडकियों में से उस खिड़की के समीप खड़े होते हैं जहाँ से भगवान के चरण कमलों के दर्शन होता है।

जब नमबूधिरी यह देखते हैं, वे सन्निधि के द्वार बंद करके मंदिर से बाहर आते हैं क्योंकि उस समय की रीती के अनुसार विळान् चोलै पिल्लै अपने कुल के कारण मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते थे।

उसी समय, विळान् चोलै पिल्लै के कुछ स्थानीय शिष्य मंदिर में पहुंचकर यह बताते हैं कि उनके आचार्य विळान् चोलै पिल्लै ने अपने आचार्य पिल्लै लोकाचार्य के चरणों में प्रस्थान किया!! और वे लोग विळान् चोलै पिल्लै के दिव्य विग्रह के लिए तिरु पारियट्टम और भगवान की फूल माला चाहते थे !! वे लोग मंदिर प्रवेश द्वार के समीप खड़े होकर इरामानुज नूतरंदादी इयल आदि का पाठ करते हैं।

जब नमबूधिरी यह देखते हैं, उनके पूर्व में हुई गर्भगृह की घटना से बहुत अचंभा होते है और वे सभी को इसके बारे में बताते हैं!

जिस प्रकार तिरुप्पणालवार (योगिवाहन स्वामीजी) पेरिय कोइल में पेरिय पेरुमाल के श्री चरण कमलों में पहुंचे, उसी प्रकार यहाँ विळान् चोलै पिल्लै ने अनंत पद्मनाभ भगवान के श्री चरणों में प्रस्थान किया!

इस समाचार को सुनने के बाद, तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) ने सभी चरम कैंकर्य किये जो एक शिष्य को अपने आचार्य के लिए करना चाहिए और पूर्ण रूप से तिरुवध्ययन भी संपन्न किया। यह द्रष्टांत पेरिय नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) द्वारा मारनेरी नम्बि के प्रति किये गए चरम कैंकर्य का स्मरण कराता है।

उनका जन्मनक्षत्र अश्विनी -उत्तरभाद्रपद है, जो नंदन वर्ष 2012 में शनिवार, 27 अक्टूबर को मनाया गया था।

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यह पंक्तियाँ उन शिष्यों द्वारा दी गयी है, जो विळान् चोलै पिल्लै के प्रति तिरुवाय्मोली पिल्लै के शिष्य भाव की महानता को दर्शाते हैं।

पटराद् एंगल मणवाल योगी पदम् पणीन्दोन्

नररेवरास-नलनतिन्गल् नारनता दरुदन्

कटरारेंकूरकुलोत्तम् तादन् कलल् पणीवोन्

मटरारुम् ओव्वातिरुवाय्मोली पिल्लै वलियवे

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निम्न मंगलाशासन तिरुवाय्मोली पिल्लै द्वारा विळान् चोलै पिल्लै को समर्पित की गयी है।

वालि नलम् तिगल् नारणतादन् अरुल्

वालि अवन् अमुद वायमोलिगल् – वालिये

एरू तिरुवुदैयान् एन्दै उलगारियन् सोल्

तेरू तिरुवुदैयान् सीर्

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अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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कूर कुलोत्तम दासर्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

जन्म नक्षत्र: अश्विनी, आद्रा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: वडक्कू तिरुविधि पिल्लै (कालक्षेप आचार्य पिल्लै लोकाचार्य और अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार्)

kurakulothama-dhasar

उनका जन्म श्रीरंगम में हुआ और वे कूर कुलोत्तम् नायन् के नाम से भी जाने जाते थे।

कूर कुलोत्तम दासर् ने तिरुमलै आलवार (तिरुवायमोली पिल्लै/ शैलेश स्वामीजी) को फिर से संप्रदाय में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पिल्लै लोकाचार्य के निकट सहयोगियों में से एक हैं और उन्होंने उनके साथ तिरुवरंगन उला (नम्पेरुमाल की कलाब काल की यात्रा) के दौरान यात्रा की थी। ज्योतिषकुड़ी में, पिल्लै लोकाचार्य अपने अंतिम समय में, कूर कुलोत्तम दासर्, तिरुक्कण्णकुड़ी पिल्लै, तिरुप्पुत्कुली जीयर, नालूर् पिळ्ळै और विलान्चोलै पिल्लै को तिरुमलै आलवार (जिनका पञ्च संस्कार बहुत ही छोटी आयु में पिल्लै लोकाचार्य के चरण कमलों में हुआ था) को संप्रदाय के सभी दिव्य ज्ञान प्रदान करने और उन्हें संप्रदाय के प्रमुख बनाने का निर्देश देते हैं।

पहले कूर कुलोत्तम दासर्, तिरुमलै आलवार से भेंट करने जाते हैं, जो मदुरै के राज्य में मंत्री थे। तिरुमलै आलवार की प्रशासन और तमिल भाषा की विशेषज्ञता के कारण और राजा की अल्प आयु में मृत्यु के बाद वे राज्य के उत्तरदायित्व और युवराज की देखभाल करते थे। जब कूर कुलोत्तम दासर् वहाँ पहुंचे, उन्होंने नम्मालवार का तिरुविरुत्तम का पाठ शरू किया। तिरुमलै आलवार, पालकी में अपने नगर-भ्रमण पर थे और तभी उनका ध्यान कूर कुलोत्तम दासर् पर जाता है। पालकी से नीचे उतरे बिना ही वे कूर कुलोत्तम दासर् से उसका प्रबंध का अर्थ पूछते और प्रतिउत्तर में दासर उन पर थूकते हैं। इसे देखकर तिरुमलै आलवार के परिचारक उत्तेजित हो जाते हैं और कूर कुलोत्तम दासर् को दंड देने के लिए आगे बढ़ते हैं परंतु तिरुमलै आलवार द्वारा रोक दिए जाते हैं, जो दासर की महानता को जान जाते हैं।

तिरुमलै आलवार अपने महल को लौटते हैं और सम्पूर्ण द्रष्टांत अपनी सौतेली माता को बताते हैं जो उनका मार्गदर्शन कर रही थी, वे उन्हें पिल्लै लोकाचार्य से उनका संबंध स्मरण कराती है और कूर कुलोत्तम दासर् की महिमा बताती है। फिर वे कूर कुलोत्तम दासर् को ढूँढना प्रारंभ करते हैं।

एक बार तिरुमलै आलवार हाथी पर जा रहे थे, तब कूर कुलोत्तम दासर् एक ऊँची जगह पर चढ़ जाते हैं, जहाँ से आलवार उन्हें देख सके। तिरुमलै आलवार उन्हें पहचान जाते हैं और तुरंत हाथी से नीचे उतरकर कूर कुलोत्तम दासर् के चरण कमलों में लेट जाते हैं और उनका वैभवगान करते हैं। फिर वे कूर कुलोत्तम दासर् को अपने महल में लेकर आते हैं और पिल्लै लोकाचार्य द्वारा प्रदान किये हुए सभी मूल्यवान निर्देश उनसे संक्षेप में समझते हैं। उन निर्देशों से पवित्र होकर, वे कूर कुलोत्तम दासर् से विनती करते हैं कि वे प्रतिदिन प्रातः अनुष्ठान में पधारकर उन्हें संप्रदाय विषय का ज्ञान प्रदान करें, क्योंकि अन्य समय में वह राज्य कार्यों में व्यस्त रहते हैं। वे कूर कुलोत्तम दासर् के लिए वैगै नदी के किनारे निवास की व्यवस्था करते हैं , और आजीविका के लिए सभी आवश्यक वस्तुएँ भी उपलब्ध कराते हैं।

कूर कुलोत्तम दासर् प्रतिदिन तिरुमलै आलवार के पास जाना प्रारंभ करते हैं। एक दिन वे देखते हैं कि तिरुमलै आलवार उर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हुए, पिल्लै लोकाचार्य की तनियन का पाठ कर रहे थे (उर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हुए श्री आचार्य चरण का ध्यान करना चाहिए) और बहुत प्रसन्न होते हैं। वे उन्हें सभी दिव्य अर्थो का अध्यापन प्रारंभ करते हैं परंतु एक सुबह वे महल नहीं आ पाए। तब तिरुमलै आलवार अपने परिचारकों को कूर कुलोत्तम दासर् के पास भेजते हैं, परंतु उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। इसलिए अपने आचार्य के प्रति अत्यंत प्रीति के साथ वे स्वयं उनके पास जाते हैं और कूर कुलोत्तम दासर् उन्हें कुछ समय तक प्रतीक्षा कराते हैं। अंततः वे जाकर कूर कुलोत्तम दासर् के चरण कमलों में गिर जाते हैं और उनसे अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हैं। क्योंकि वे कालक्षेप के समय आते हैं, वे उसमें सम्मलित होते हैं और कूर कुलोत्तम दासर् का श्रीपाद तीर्थ और शेष प्रसाद स्वीकार करते हैं। भगवत दासों के शेष पसाद में किसी को भी पवित्र करने की महान क्षमता होती है और उसी प्रसाद के प्रभाव से तिरुमलै आलवार में भी महान परिवर्तन हुआ। उसे पाने के बाद, तिरुमलै आलवार ने बारम्बार “कूर कुलोत्तम् दास नायन् तिरुवडीगले शरणं” कहना प्रारंभ कर दिया और राज्य और सांसारिक प्रकरणों के प्रति अपने अनुराग को त्याग दिया।

उसके बाद कूर कुलोत्तम दासर् सिक्किल (तिरुप्पुल्लाणि के समीप एक स्थान) के लिए प्रस्थान करते हैं। तिरुमलै आलवार अपने राज्य के सभी उत्तरदायित्वों को त्यागकर कूर कुलोत्तम दासर् के साथ जाते हैं और वहीँ रहते हुए उनकी संपूर्ण सेवा करते हैं। अपने अंतिम दिनों में, कूर कुलोत्तम दासर्, तिरुमलै आलवार को विलान्चोलै पिल्लै और तिरुक्कण्णकुड़ी पिल्लै के पास जाकर संप्रदाय विषय में और अधिक सीखने का निर्देश देते हैं। अंत में वे पिल्लै लोकाचार्य का ध्यान करते हुए, प्राकृत शरीर को छोड़कर परमपद प्रस्थान करते हैं।

तिरुमलै आलवार को सुधारने के लिए किये गए उनके अनेक प्रयासों और पिल्लै लोकाचार्य से सीखे हुए दिव्य ज्ञान को तिरुमलै आलवार तक पहुंचाने में, उनके द्वारा की गयी असीम कृपा के कारण मामुनिगल, उनकी महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें “कूर कुलोत्तम् दासं उदारं” से संबोधित करते हैं (वह जो बहुत ही दयालु और उदार है)। रहस्य ग्रंथ कालक्षेप परंपरा में उनका एक महत्वपूर्ण स्थान है और उनकी महिमा का वर्णन रहस्य ग्रंथों की कई तनियों में किया गया है।

श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, यह निर्णय किया गया है कि एक शिष्य के लिए “आचार्य अभिमानमे उत्थारगम्”। इसके व्याख्यान में मामुनिगल समझाते हैं कि एक प्रपन्न के लिए जिसने सभी अन्य उपायों का त्याग किया है, आचार्य कि निर्हेतुक कृपा और श्री आचार्य का यह विचार कि “यह मेरा शिष्य है“ ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर् और तिरुवैमोली पिल्लै के चरित्र में हम यह स्पष्ट देख सकते हैं। यह पिल्लै लोकाचार्य का तिरुवायमोली पिल्लै के प्रति अभिमान और कूर कुलोत्तम दासर् का अभिमान और अथक प्रयास है, जिन्होंने संप्रदाय को महान आचार्य तिरुवायमोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) को दिए, जिन्होंने फिर संप्रदाय को अलगिय मणवाल मामुनिगल को दिए।

हम दास भी कूर कुलोत्तम दासर् का स्मरण करें जो सदा-सर्वदा पिल्लै लोकाचार्य का स्मरण किया करते थे।

कूर कुलोत्तम दासर् की तनियन:

लोकाचार्य कृपापात्रं कौण्डिन्य कुल भूषणं ।
समस्तात्म गुणावासं वन्दे कूर कुलोत्तमं ।।

अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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