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तिरुमंगै आळ्वार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirumangai-azhwar

तिरुनक्षत्र: कार्तिक मास- कृत्तिका नक्षत्र

आवतार स्थल: तिरुक्कुरैयलूर्

आचार्यं: श्री विष्वक्सेन, तिरुनरयूर नम्बी, तिरुकण्णपुरं शौरिराज पेरुमाळ

ग्रंथ रचना सूची: पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकूत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम

परमपद प्रस्थान प्रदेश: तिरुक्कुरुंगुडि

शिष्यगण: अपने साले इळयाल्वार , परकाल शिष्यर , नीर्मेळ नडप्पान(पानी पर चलने वाले ),तालूदुवान(ताला को मुँह से फूँक के खोलने वाले ), तोळा वळक्कन (झगड़कर धन को हासिल करने वाले), निललिळ ओदुन्गुवान(परछाई मे सिमट जाने वाले ),निळलिल मरैवान, उयरत तोंगुवान(सीमा रहित ऊंचाईयों को भी चडने वाले)

पेरियवाच्छान पिळ्ळै अपने ग्रंथ के अवतारिका मे तिरुमंगै आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए कहते हैं , एम्पेरुमान(भगवान) अपने निर्हेतुक कृपा से आळ्वार को संस्करण किए हैं और उनके द्वारा अनेक जीवात्म उज्जीवित हुए , आईये इसके बारे में ग़ौर करें ।

तिरुमंगै आळ्वार अपने शरीर को सुखद छाया में रखकर अपने आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखे थे । आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखने का मतलब यह हुआ की ख़ुद को भगवद् विषयों(अध्यात्मिक) में नहीं लगाना और शरीर को सुखद छाया में रखने का मतलब हैं की अनादि काल से भौतिक विषयों के प्रति आकर्षित होना और केवल उन विषयों का भोग लेना ही एक मात्र लक्ष्य होना। जैसे कहा गया हैं ‘ वासुदेव तरुच्छाय ’- अर्थात वासुदेव (श्रीकृष्ण) ही असली छाया देने वाले वृक्ष हैं और इससे यह सिद्ध होता हैं की केवल भगवद् विषय ही असली सुखद छाया हैं । वे ही हैं जो एक मनोज्ञ वृक्ष हैं जो सर्व काल और सर्वदा आनन्ददायक हैं । इस वृक्ष की छाया किसी भी तरह की वेदना को दूर कर देती हैं और अतन्त सौम्य हैं और ना ही यह बहुत गर्म और ना ही ठंडी हैं । तिरुमंगै आळ्वार आँखों को आह्लाद करने  विषयानन्तरों मे बहुत ही दिलचस्पि  रखते थे , भगवान ने उन सभी विषयों से उनका ध्यान हटाकर , कई  दिव्य देशों पे और आँखों को लुभाने वाली अपनी अर्चावतार एम्पेरुमान् की ओर मोड़ देते हैं और उन्हीं पे ध्यान मग्न कर  देते हैं और इतना परिपूर्ण अनुभव प्रदान करते हैं की आळ्वार को  भगवान से पल भर की जुदाई भी असहनीय हो जाती हैं।तद्नन्तर श्री भगवान आळ्वार को इस भौतिक संसार में रहने के बावज़ूद उन्हें  नित्यमुक्तों के बराबर की स्थिति को पहुँचा देते हैं और परमपद प्राप्त करने की चाह प्रवृद्ध करते हैं और अन्त में परमपद प्रदान करते हैं ।

आळ्वार मानते थे की भगवान ने इनकी अद्वेषत  (भगवान जीवात्मा की सहायता करने के लिए हर एक समय उपस्थित हैं , लेकिन जीवात्मा इस सहायता लेने के लिए अनादि काल से विमुख हैं और भगवान जीवात्मा के  उज्जीवन करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक जीवात्मा उनकी सहायता लेने के लिए सुमुख नहीं  हो जाते  – इस अद्वेषत को अधिकारी विशेषण में  गिनती की जाती हैं यानी अद्वेषत जीवात्मा का सहज स्वभाव हैं ), भौतिक विषयों की सीमाएँ , इनकी इन विषयों को अनुभव करने की चाह को आधार भूत बनाकर  (और उस चाह को एम्पेरुमान की ओर मोड़ते हैं ) और अनादि काल से किये गए पापों को अपनी करुणा का पात्र बना के , उन्हें तिरुमंत्र  और स्वरूप (प्राकृतिक स्वभाव ), रूप (अनेक रूप ), गुण (दिव्य गुण ) और विभूति (सम्पत्ति ) का ज्ञान प्रदान करते हैं । भगवान के करुणा समुद्र में डूबे हुए आळ्वार , एहसानमन्द होकर पेरिय तिरुमोळि में भगवान का कीर्तन करना शुरू करते हैं । यह जीवात्मा/चित्त(बोध – क्षम रखने वाले पदार्थ ) का स्वरूप हैं की वह ज्ञान का व्यक्तिकरण करें और अचित्त वस्तु(बोध – क्षम न रखने वाले पदार्थ ) ज्ञान रहित होने के कारण किसी विषय का अनुभव नहीं कर सकते हैं । इस तरह आळ्वार कृतज्ञता को दर्शाने के लिए और एम्पेरुमान् की अर्चावतार का कीर्तन करने के लिए , कई दिव्य प्रबंधों की रचना करते हैं।

अपने व्याकरण के अवतारिका में पेरियवाच्छान पिल्लै ने एम्पेरुमान की निर्हेतुक कृपा( कारण रहित कृपा ) और आल्वार की उपाय शून्यता (एमपेरुमान के दया पात्र होने के लिए स्वयं अनुकूल कार्य ,उपाय बुद्धि से नहीं करना) स्थापित करते हैं  | लेकिन एक समय जब एम्पेरुमान से परिपूर्ण रूप से आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् , एम्पेरुमान के प्रति आळ्वार का लगाव असामान्य और असीम हो जाता हैं इस विषय को वे स्वयं ही अपने पेरिय तिरुमोलि ४.९.६ में घोषित करते हैं “ नुम्मडियारोडुम ओक्क एण्णियिरुत्तीर अडियेनै  “अर्थात मुझे अपने दूसरे अडियारों (सेवक , दास) में गिनती नहीं करना ।

आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए पेरियवाच्छान पिल्लै और मामुनिगळ की विशेष स्तुति यहाँ पढ़ सकते हैं |

रामानुज नूतन्दादी (२ रा पाशुर ) में अमुदनार ने एमपेरुमानार( श्री रामानुज स्वामी ) को “कुरैयल पिरान अडिक्कीळ विळ्ळात अन्बन” कहके संबोधित करते हैं अर्थात श्री रामानुज स्वामी वोह हैं जिन्हें तिरुमंगै आळवार के श्री चरण कमल पे अचंचल प्रेम हैं |

मामुनिगळ तिरुवाली तिरुनगरी दिव्यदेशों की पर्यटन करते समय , आळ्वार की दिव्य मंगल तिरुमेनी(शरीर) के सौंदर्य पर इतने आकर्षित हुए की उसी वक्त आळवार के रमणीय रूप को अपने आँखों के सामने दर्शाते हुए एक पाशुर रचते हैं | आईये उस पाशुर का आनंद ले :

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अनैत्त वेलुम्, तोळुतकैयुम्, अळुन्तिय तिरुनाममुम्,
ओमेन्ऱ वायुम्, उयर्न्त मूक्कुम्, कुळिर्न्त मुकमुम्,
परन्त विळियुम्, इरुन्ड कुळलुम्, चुरुन्ड वळैयमुम्,
वडित्त कातुम्, मलर्न्त कातु काप्पुम्, ताळ्न्त चेवियुम्,
चेऱिन्त कळुत्तुम्, अगन्ऱ मार्बुम्, तिरन्ड तोळुम्,
नेळित्त मुतुगुम्, कुविन्त इडैयुम्, अल्लिक्कयिऱुम्,
अळुन्दिय चीरावुम्, तूक्किय करुन्ङ्कोवैयुम्,
तोन्ङ्गलुम्, तनि मालैयुम्, चात्तिय तिरुत्तन्डैयुम्,
चतिरान वीरक्कळलुम्, कुन्तियिट्ट कनैक्कालुम्,
कुळिर वैत्त तिरुवडि मलरुम्, मरुवलर्तम् उडल् तुनिय
वाळ्वीशुम् परकालन् मन्ङ्गैमन्नरान वडिवे एन्ऱुम्

परकालन / मंगै मन्नन का दिव्य मंगल विग्रह हमेशा मेरे ह्रदय में हैं | यह दिव्य रूप को दर्शाते हैं की एक भाला कंधों के बल , एमपेरुमान को अंजलि समर्पित करते हुए श्री हाथ, अति सुन्दर उर्ध्व पुण्ड्र, प्रणव उच्चारण करते होट, सीधी और थोड़ी सी ऊपर उठी नासिकाग्र , शीतल मुखमण्डल, विशाल नेत्र, घुन्ग्राते सुन्दर काले बाल, थोड़े से झुके हुए कान ( एम्पेरुमान से अष्ट अक्षरी महा मंत्र सुनने के लिए ), गोलाकार गर्दन, विशाल वक्षस्थल, बलिष्ट बाहु, सुंदर सी पीट की ऊपर भाग, पतली कटी प्रदेश, मनमोहक पुष्पमाला, अद्भुत नूपुर, आळ्वार के पराक्रम को सूचित करने वाले घुटने, थोडे से मुड़े हुई श्री चरण कमल और शत्रुओं का नाश करने वाली कद्ग|हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं की  तिरुवाली – तिरुनगरी के कलियन की अर्चा विग्रह यह श्रुष्टि में सबसे सुन्दर हैं ।

आळ्वार निम्न लिखित तिरु नामों से भी जाने जाते हैं – परकालन(अन्य मत को काल (यम) के समान खण्डन करने वाले ), कलियन (काल के बराबर), नील (नील वर्ण का देह ) कली ध्वंस (कली को ध्वंस करने वाले) कविं लोक दिवाकर (कवि लोक के सूर्य ) चतुष् कवि शिका मणि (चार तरह की कविता मे विद्वान), शट प्रबंध कवि (छह प्रबंधों के कृपा कारक), नालु कवि पेरुमाळ , तिरुवाविरुडय पेरुमान (महान कद्ग धारण), मंगैयर कोन (मंगै राष्ट्र के राजा), अरुळ मारी (वर्षा काल की वर्ष के समान कृपा बरसाने वाले ), मंगै वेन्दन (मंगै राष्ट्र के अधिकारी),आलीनाडॉन (आडल मा नामक अश्व अधिकारी), अरट्ट्मुक्की, अडयार सीयम (अन्य मतो को निकट पहुँचने न देने वाले सिंह), कोंगु मालार्क कुळलियर वेळ, कोर्चा वेन्दन (महान राजा), कोरवेळ मंगै वेन्दन( कुछ भी कमी न रहने वाले महा राजा) ।

इन विषयों को ध्यान मे रखते हुए ,आईये आळवार को जानेंगें

आळ्वार कार्मुक(कुमुद गण) अंश से तिरुक्कुरैयलूर् मैं (तिरुवालि- तिरुनगरि के समीप) चतुर्थ वर्ण में अवतरित हुए । जैसे दिव्यसूरि चरित में गरुड़ वाह पंडित बताते हैं उन्हें नीलन (श्याम देह वर्ण) कहके नामकरण किया गया हैं।

आपकी बाल्य अवस्था बिना कुछ भगवत सम्बन्ध से ही बीत गई। यौवन अवस्था प्राप्त करने पर, भौतिक विषयों में उलझ गए । बलिष्ट शरीर और अनेकानेक आयुध प्रयोग करने में कुशलता सहित युद्ध विद्य में नैपुण्यता होने के कारण चोल देश के राजा के पास जाते हैं और अपनि सेना में उन्हें स्थान देने की माँग करते हैं । चोल देश राजा उनकी सामर्थ्य देखकर उन्हें सैंयाध्यक्ष के स्थान पर नियुक्त करते हैं और एक छोटी प्रान्त का पालन आभार सौंप देते हैं ।

एकानक समय मे तिरवाली दिव्य देश मे स्थित सुन्दर सरोवर मे अप्सराएँ (देव लोक के  नृत्यांगनाएं) जल विहार करने के  लिये आते हैं । उनमे से तिरुमामगल (कुमुदवल्ली) नामक एक  कन्या पुष्प संचयन (फूलों की संग्रह) करने के लिए निकलती हैं और उनकी साखियाँ उन्हें भूलकर चली जाती हैं । जब वह कन्या मनुष्य शरीर लेकर सहायता  के लिए ढूँढती हैं , उस समय उस ओर से गुजरते  एक श्री वैष्णव वैद्य  कन्या को देखकर  अपना अता पता पूछते हैं और कन्या अपने सहेलियों से बिछड़ने और  इत्यादि घटित विषय बताती हैं । वैद्य निसंतान होने के कारण अपने साथ उस कन्या को ख़ुशी से घर ले आते हैं और  अपने पत्नी से परिचित करते हैं और निसंतान दम्पति बहुत प्रसन्न होकर कन्या को अपना लेते हैं और प्यार से पर्वरिश करते हैं । उनकी सुन्दरता देखकर कुछ लोग नीलन को इस कन्या के बारे में बताते हैं और नीलन उनके सौंदर्य पर मुग्ध होते हैं और तुरन्त वैद्य के पास जाकर बात चीत करना आरम्भ करते हैं । उस समय कुमुदवल्लि उस ओर से गुजरती हैं और वैद्य नीलन से बताते हैं की कन्या का कुल , गोत्र पता न होने के कारण उनकी विवाह के बारे में वे बहुत चिन्ता ग्रस्त हैं । नीलन तुरन्त उनसे अपनी विवाह का प्रस्ताव रखते हैं और ढ़ेर सारा धन उन्हें देते हैं । वैद्य दम्पति प्रस्ताव को मंजूर करते हैं लेकिन कुमुदवल्ली शर्त रखती हैं की वे  एक श्री वैष्णव जो आचार्य से पञ्च संस्कार प्रदित हो केवल उन्ही से विवाह रचेंगी । जैसे बताते हैं एक होशियार व्यक्ति अच्छे काम करने में देरी नहीं करता हैं , उसी तरह वे तिरुनरैयूर नम्बि के पास पहुँचकर , पञ्च संस्कार करने की विनती करते हैं।  एम्पेरुमान अपने दिव्य करुणा से उन्हें शंख , चक्र प्रदान करके , तिरुमंत्र उपदेश करते हैं ।

पद्म पुराण मे ऐसा कहा गया,

सर्वाश्च स्वेतामृथ्य धारयम ऊर्ध्व पुन्द्रम यधाविधि  ।
ऋजुवै साँथरालानी अङ्गेषु द्वादशस्वपि. ।।

दिव्य देशो मे प्राप्त श्वेत मृत्तिका से शरीर के द्वादश भागोमे निर्धारित उचित अंतराल के साथ द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करना आवश्यक हैं ।

ततपश्चात आळवार द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करते हैं और  कुमुदवल्ली से अपने  विवाह का प्रस्ताव रखते  है । कुमुदवल्ली विवाह के लिए सहमत होती  हैं परन्तु कहती हैं की उन्हें पति तब ही मानेंगी जब आप श्री एक साल प्रति दिन 1008 श्री वैष्णवों का तदियारधान करेंगे ।  कलुमुदवल्ली के प्रति अनुराग के  कारण आळवार उनका कहना मान लेते हैं और अति वैभव से कुमुदवल्ली से विवाह समारोह आयोजित होता हैं ।

पद्म पुराण सूचित किया गया है .

आराधनानाम सर्वेषाम विश्नोआराधनम् परम ।
तस्मात परतरं प्रोक्तं तदीयाराधनम नृपा 

हे राजन अन्य देवता आराधन से श्री विष्णु आराधन श्रेष्ठ हैं और विष्णु भक्तों की आराधन स्वयं श्री महा विष्णु से भी अधिक हैं ।

इस प्रमाण के अनुगमन करते हुए आळवार अपनि पूरी संपत्ति लगाकर तदीयाराधन (दिव्य प्रसाद से  श्री वैष्ण्वों की आराधना करना)करते हैं ।  यह देखकर कुछ लोग,राजा के पास शिकायत करते हैं की नीलन  (परकाल) प्रजा धन श्री वैष्णवों की तदीयाराधन करने में  दुरुपयोग कर रहा है ।लोगों की बात सुनकर  राजा परकालन को पेश होने का आदेश देते हैं और अपने सेना को उनके पास भेजते हैं । परकालन उनसे सौम्य रूप से पेश आते हैं और प्रतीक्षा करने के लिए कहते हैं । सैनिक राजा के आदेश अनुसार  शुल्क (लगान) देने के लिए निर्बंध करते  है । आळवार क्रोधित हो उठते हैं और  उन सैनिकों को बाहर घसीट देते  है। सैनिक राजा को पूरा वृतांत सुनाते है। राजा सैन्याद्यक्ष को आदेश देते हैं की पूरी सेना के साथ  परकालन को निर्बंध करें ।  वह सैन्याद्यक्ष पूरी सेना के साथ एक बड़ी सेना लाता है और आळ्वार पर हमला करता है।  तब परकालन  धैर्य और शक्ति के साथ सामना करके वह सैन्याद्यक्ष और पूरी सेना को वापस जाने पर मज़बूर करते है।  सैन्याद्यक्ष आळ्वार की विजय प्राप्ति का समाचार राजा को देता है ।  तब राजा स्वयं युद्ध लड़ने का निर्णय करके अपनी पूरी सेना के साथ आळ्वार पर हमला बोलते  है। आळ्वार फिर एक बार पराक्रम बताते हुए लड़कर पूरी सेना को परास्त कर देते  है। आळ्वार की पराक्रमता पर राजा बहुत प्रसन्न हो जाते हैं शान्ति घोषित करते हैं और उनकी जयजयकार करते हैं । राजा की कुयुक्ति से बेख़बर आळ्वार , उनके पास चल पड़ते हैं और राजा अपने मंत्री की सहायता से  उन्हें बंधी बनाकर बकाया शुल्क देने का निर्बंध करते है। मंत्री उन्हें एम्पेरुमान के  सन्निधि के अन्दर कैद कर देते हैं और आळ्वार 3 दिन तक बिना कुछ प्रसाद पाये रहते  हैं ।  कहा जाता हैं की उस समय तिरुनरयूर  नाच्चियार  अपने तिरुनरयूर नम्बि को बताती हैं की आळ्वार को भुखे देख उन्हें सहन नहीं हो रहा  हैं और स्वयं  प्रसाद लेकर आळ्वार को प्रदान करती हैं । आळ्वार उस समय पेरिया पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ जी) और तिरुवेन्गडमुडैयान (श्री निवास) के ध्यान मे निमग्न हो जाते  है।  काँची  देवपेरुमाळ आळ्वार के स्वप्न मे आकर बताते हैं की काँचीपुरम  मे बहुत बड़ा निधि का भाण्डागार हैं  और उनके आगमन पर उन्हें वह प्राप्त होगी । उस स्वप्न वृतांत राजा को बताने पर राजा अपनि सेना के साथ कड़ी निग्रनि से आळ्वार को काँचीपुरम भेजते है। वहाँ पहुँचने पर निधि का पता जान नहीं सके । तब अपने भक्तोंको सब कुछ देने वाले देवपेरुमाळ आळ्वार को पुनः स्वप्न में  साक्षात्कार होके,  वेगवती नदी के किनारे निक्षिप्त निधि का पता बताते हैं । आळ्वार निधि को लेकर राजा का बकाया शुल्क भर देते है और बाकि निधि से तदीयराधन जारी रखने के लिये तिरुक्कुरैयलूर् चले जाते हैं ।पुनः वह राजा अपने सैनिक को शुल्क वसूल करने  के लिए भेजने पर आळ्वार चिंता घ्रस्त होते हैं ।  पुनः देवपेरुमल स्वप्न में साक्षात्कार होते हैं और  वेगवती नदी तट पे स्थित रेती लेकर सैनिको को देने का आदेश देते  है । आळ्वार ठीक उसी तरह सैनिकों को रेती देते हैं । सैनिकों को रेती अणु अमुल्य रत्न जैसे दिखाई देते हैं ।  रेती के अणु लेकर ख़ुशी से सैनिक राजा के पास लौट जाते हैं और राजा को घटित विषय विस्तार रूप से निवेदन करते है। आळ्वार की महानता उन्हें समझ आती हैं उन्हें राज दरबार आने का निमंत्रण देते हैं सादर से उन्हें स्वागत करते हैं  अपने दोषों के  लिये  क्षमा प्रार्थना करते हैं और ढ़ेर सारा धन देते हैं ।अपने पापों का प्राय्श्चित्त करते हुए अपनी पूरी सम्पत्ति देवालयों और ब्राह्मणों में दान करते है।

आळ्वार अपना तदीयराधन ज़ारी रखते हैं  और इस कारण उनकी संपत्ति शून्य हो जाती हैं  । आळ्वार ठान लेते हैं की वे तदीयराधन  किसी भी तरह ज़ारी रखेंगे चाहे उन्हें राह में आने – जाने वाले लोगों की चोरी ही क्यूँ न करना हों । धनी लोगों से चोरी करके, भक्ति से  तदीयराधन में जुट जाते हैं । सर्वेश्वर सोचते हैं की आळ्वार चोरी करके भी उस संपत्ति को श्री वैष्णवों की तदीयाराधना में लगा रहे हैं यानि आळ्वार चरम पुरुषार्थ (चरमोपाय) में स्थित  है और आळ्वार को दिव्य निःसंकोच ज्ञान प्रदान करके उन्हें इस सँसार सागर से उन्नति की ओर मार्ग दर्शन करने का निर्णय लेते हैं । कहा जाता हैं की श्रीमन्नारायण स्वयं नर (आचार्य) के रूप मे अवतरित होके शास्त्र की सहायता से संसार में लीन दुःखी जीवत्मा को उज्जीवित करते हैं ठीक उसी तरह एम्पेरुमान अपने देवियों के साथ आळ्वार को अनुग्रहित करने के लिये उनकी राह में  नए दूल्हा दुल्हन की तरह , सुन्दर आभूषणों से सज़-दज़ बारात में वायळालिमणवालन के रूप मे निकल पडे ।बड़ी मात्रा मे लूटने का मौका देखकर आळ्वार जोश में आ जाते हैं और एम्पेरुमान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और सब कुछ लूट लेते हैं । आखिर में आळ्वार एम्पेरुमान के श्री पाद में लगी हुई बिछिया को क़तर देते हैं ।उनकी शूरता  पे  एम्पेरुमान आश्चर्य चकित हो जाते हैं और  “नम् कलियनो ” कहकर सम्बोधित करते  है, अर्थात क्या आप हमारे कलियन हो ? (महान शौर्यवान को कलियन कहा जाता हैं)।

तदनन्तर आळ्वार पूरे आभूषणों को और संपत्ति को एक पोटली में बांध कर उठाने का प्रयत्न करेते हैं लेकिन उठा नहीं सकते । आळ्वार दूल्हे राजा(एम्पेरुमान) की ओर देखकर गरजते हैं की उन्होंने ही कुछ मंत्र का प्रयोग किया हैं जिसके कारण वह पोटली उठाने में असफल हो रहे हैं । एम्पेरुमान उनके इंजाम को कबूल करते हैं और मान लेते हैं की वास्तव में ही एक मंत्र हैं और अगर आळ्वार सुनना चाहे तो वह उन्हें बता सकते हैं ।आळ्वार अपने छुरे को दिखाकर  शीघ्र से  उस मंत्र का उपदेश करने के लिए कहते  है । वह मंत्र जो सबसे सुमधुर हैं , जिसमे सभी शस्त्ररार्थ निहित हैं ,   अंतिम लक्ष्य को स्थापित करता हैं ,सकल वेद सार हैं , दुःख भरे संसार से विमुक्त करने वाला हैं, जप करने वाले वक्ता को ऐश्वर्य (भौतिक सम्पत्ति ) , कैवल्यं(स्वानुभवं), भगवत कैंकर्य से अनुग्रहित करती हैं , ऐसे तिरुमंत्र का उपदेश करते हैं ।  शास्त्रो में तिरुमंत्र की वैभवता के बारे में ऐसा वर्णन किया गया हैं

वृद्द हारीत स्मृति मे

रुचो याजस्मी सामानि ततैव अधर्वरार्णि च ।
सर्वं अष्टाक्षाराणान्तस्थम् यच्चचार्णयदपि वगमयम् ।।

रिग, यजुर, साम और अथर्वण वेदों का सर और आप श्री के उपब्रह्मणो का पूरा सार अष्टाक्षर मंत्र मे स्थित है।

नारदिय पुराण

सर्व वेदांत सारार्थस: संसारार्णव तारक: ।
गति: अस्ताक्षरो नॄणाम् अपुनर्बावकांक्षिणाम ।।

मुमुक्षु (मोक्ष कामी )को अष्ठाक्षरी मंत्र का आश्रयण करना आवष्यक है क्यूँकि इसी में सकल वेदांतों का सार हैं और केवल यही मंत्र संसार सागर से पार करवा सकता हैं । .

नारायणोपनिषद् मे

ओमित्यग्रे व्याहरेत नाम इति पश्चात नारायणायेति उपरिष्टात ।
ओमित्येकाक्षरम् नम इति द्वे अक्षरे नारायणायेति पञ्चाक्षराणी ।।

ओम का उच्चारण पहले ,नमः और नारायणाय अनुसरित उच्चारण किया जाता हैं ; ओम एकाक्षर से ,नमः दो अक्षरोंसे, नारायण शब्द पाँच अक्षरोंसे (1+2+5=8 से यह मंत्र अष्ठाक्षरी कहलाती है) । इस तरह शास्त्र वाक्य से अष्ठाक्षरी मंत्र का निर्माण और निसंकोच रूप से मंत्र की उच्चारण रीती हमें पता चलती हैं ।

नारदीय पुराण मे

मन्त्राणाम् परमो मंत्रो गुयाणाम् गुह्यमूत्तत्तम । 
पवित्रण्याच पवित्राणाम् मूलमन्त्रासनातनह: ।।

अष्ठाक्षरी महामंत्र सारे मंत्रों मे से महत्तम हैं, सारे रहस्य मंत्रों से भी रहस्य, सारे पवित्र मंत्रों से पवित्र और आनादी /सनातन मंत्र है।

इन सब से परे , महा ज्ञानी पूर्वाचार्यों की स्वीकृति यह अष्ठाक्षरी मंत्र को प्राप्त है । यह विषय हमें तिरुवाय्मोळि मे 7.4.4 से ” पिराळन पिरोधूम पेरियोर” पता चलता हैं अर्थात महान लोग जो एम्पेरुमान (भगवान)के नामों का उच्चारण करते हैं तथा आळवार स्वयं अपने पेरिय तिरुमोळि के पहले पदिग मे (पहले 10 पाशुरों मे) प्रकट करते हैं “पेत्त तायिनम आयिन सेयुम नलंतरुम सोल्लै नान कण्डु कोंडें” अर्थात मैं ने ऐसा मंत्र खोज लिया हैं जो स्वयं अपनी मय्या से भी ज्यादा उपकारक है ।

तिरुमंत्र स्वयं एम्पेरुमान से श्रवण करने के बाद   , करुणा स्वरूपी श्री महा लक्ष्मी और सुन्दर स्वर्णमय शरीर से प्रकाशित दिव्य गरुड़ आळ्वार के साथ अपना दिव्या मंगल रूप प्रकट करते हैं । भगवान अपनी निरहेतुक कृपा (कारण रहित कृपा )से आळ्वार को दोष रहित ज्ञान प्रदान करते हैं ।यह सब देखने के बाद , आळ्वार श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषाकार के द्वारा जनित एम्पेरुमान के  अनुग्रह समझ गए, तत्पश्चात छः दिव्य प्रबंधों को हम सबके लिए प्रदान करते हैं जो  नम्माल्वार के चार दिव्य प्रबंधों के छः अंगों की तरह माने जाते हैं – पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकुत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम हैं । आप श्री की  छः प्रबन्ध अलग-अलग काव्य रूप के ढ़ंग हैं -आसु , मधुरं, चित्रम, और विस्तार और येही एक वज़ह हैं की आप श्री “नालु कवि पेरुमाळ”  ख़िताब से प्रसिद्ध हुए ।

आखिर में एम्पेरुमान आळ्वार को आज्ञा देते हैं  की वे अपने शिष्य सहित अनेकानेक दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करे । आळ्वार अपने मंत्रि और शिष्यगण के साथ दिव्य देश की यात्रा पर निकलते हैं  और कई दिव्य नदियों में स्नानाचरण करते हुए , क्रमानुसार श्री  भद्राचलम, सिंहाचलम, श्रीकूर्मम, श्रीपुरुषोतमम्(पूरीजगन्नाधम), गया, गोकुलम, बृन्दावनम्, मधुरम्, द्वारका, अयोध्या, श्री बद्रिकाश्रमम्, काँचीपुरम, तिरुवेंगडम् इत्यादि दिव्य देश के एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करते हैं । आळ्वार चोळमण्डल पहुंचते हैं और आप श्री के  शिष्य  “चतुष्कवी पधार रहे है”, “कलियन पधार रहे है”, “परकालन  पधार रहे है”, “पर मतङ्को को परास्त करने वाले पधार रहे है” कहके जय जय कार करते हैं । उस प्रांत में तिरु ज्ञान सम्बन्धर नामक शिव भक्त उधर वास करते थे और उनके शिष्य गण आळ्वार के कीर्तन का खण्डन करते हैं । आळ्वार उन्हें चुनौती देते हैं की सम्बन्धर् से वाद प्रतिवाद करके नारायण परतत्व (आधिपत्य) स्थापित करेंगे । आळ्वार को तिरु ज्ञान सम्बन्धर के वास स्थान ले आते हैं और घटित विषय को विस्तार से अवगत कराते हैं और सुनने के बाद  उनसे वाद विवाद करने के लिए संहद हो जाते हैं । वह नगर अवैष्णवों से भरा हुआ था और कम से कम एक जगह पे भी एम्पेरुमान(भगवान) का विग्रह न होने के कारण आळ्वार बात शुरू नहीं कर पाते और संदिग्ध मे पड जाते  हैं । उस समय एक श्री वैष्णव माता जी को देखकर, उनसे उनकी तिरुवराधन मूर्ति को लाने की विनती करते हैं  और आप श्री  उनकी तिरुवराधना मूर्ति जो  श्री कृष्ण की मूर्ति हैं सम्बन्धर् के यहाँ लाने पर,आळवार वाद -विवाद शुरू करते हैं ।  सम्बन्धर् एक श्लोक प्रस्तुत करते हैं और आळ्वार उनमे स्थित दोषों को अवगत कराते हैं । सम्बन्धर् आळ्वार को चुनौती देते हैं की काव्य सुनाये , तब आळवार ने “ओरुकुरले” पदिग  (पेरिय तिरुमोळि 7.4) मे ताडाळन एम्पेरुमान (काळिच्चिरामविणगरम-शीरगाली) के प्रति पाशुर का वर्णन करते हैं । बख़ूबी और सुन्दरता से रची गई पदिग सुनने के बाद  सम्बन्धर प्रति युत्तर नहीं दे पाये और अंतः आळ्वार की महानता पर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और उनका गौरव स्वीकार करके, उनका पूजन करते हैं ।

आळ्वार श्री रंगम दर्शन करके , श्री रंगनाथ जी का मंगलशासन और कैंकर्य करने के इच्छुक थे । ब्रह्मांड पुराण मे कहा गया हैं :

विमानम् प्रणवाकाराम वेदश्रुन्गम महाद्भुतम् श्री रंगशायी भगवान प्रण वारर्थ प्रकाशकः ।

महत्तर श्री रंग विमानम्(गोपुर) ओम कार का आविर्भाव हैं । विमान की चोटी  एक वेद सामान हैं ।  भगवान श्री रंगनाथ स्वयं ही प्रणवार्थ को अभिव्यक्त (तिरु मंत्र सार को) कर रहे है।

आळ्वार श्री रंगम मंदिर के चारों ओर दुर्ग बनाने के आकांक्षित , निर्माण करने में धन के बारे में अपने शिष्यों के साथ सलाह – मशोहरा करते हैं । शिष्य बताते हैं की श्री नागपट्टनम मे अवैदिक संप्रदाय  सम्बंधित एक सुवर्ण प्रतिम है, यदि उसे हासिल करने में क़ामयाब हो साके तो  बहुत कैंकर्य कर सकते है ।  यह विषय सुनने के पश्चात , तुरन्त आळ्वार नागपट्टनम निकल पड़ते हैं ।  उस नगर की विशेषता के बारे में जानने के लिए एक स्त्री से पूछ-ताछ करते हैं ।वे बताती हैं की उनकी सॉस कहा करती थी की उस प्रदेश में एक स्वर्ण विग्रह है । वास्तुकार जिसने, उस मूर्ति को और उसे निक्षिप्त करने के लिए रक्षात्मक विमान को निर्माण किया हैं , एक असामान्य द्वीप में निवास  कर रहा हैं ।यह विषय जानने के बाद आळ्वार , उस द्वीप की ओर शिष्य गण के साथ प्रस्थान करते हैं और विश्वकर्मा (देवताओं का मुख्य वास्तुकार) से तुलनीय उस वास्तुकार के बारे मे पूछ-ताछ करते हैं । वास्तुकार के विशाल और सुन्दर महल का पता बताने पर आळ्वार वहाँ पहुँचते हैं । महल के बाहर आळ्वार अपने शिष्यों के साथ वार्तालाप करना शुरू करते हैं और उस समय स्नान पान समाप्त करके वास्तुकार बाहर आते हैं । उन्हें पाहकर  तब आळ्वार उद्देश  पूर्वक अफ़सोस जताते हुए कहते हैं की ” हो । कुछ घुसपैठों ने नागपट्टनम के मंदिर को ध्वंस करके स्वर्ण विग्रह को लूट लिया हैं । इस सँसार में अब हम किस कारण जीवित रहें “। यह सुनकर वास्तुकार क्लेश से बताते हैं की ” विमान चोटी को खोलकर ,भीतर प्रवेश करने का रहस्य किसी छिछोरा शिल्पी ने ही बहिर्गत कीई होगा। में ने जटील चाबी बनाई – एक पत्थर के अंदर फ़ेरी गई लोहे का ज़ंजीर और उसे झरने के निचे स्थित फलक के निचे रखा और न जाने कैसे उसे तोड़ पाये?” ऐसे कहकर अन्जाने में पोल ख़ोल देते हैं ।

रहस्य पता चलने पर आळ्वार खुशी-ख़ुशी अपने शिष्यों के  साथ निकल पड़ते हैं  नागपट्टनम जाने के लिए समुद्र तट पहुँचते हैं । उस समय, देखते हैं की  एक नेक व्यापारी अपने  बहु मूल्य सुपारी को नाव मे चढ़ा रहे थे, आळ्वार उनके पास जाकर , आशीर्वाद देते हैं और उन्हें उस पार छोड़ने के लिए कहते हैं । व्यापारी मान लेता हैं और सभी लोग नाव पे अपना प्रयाण आरम्भ करते हैं । उस समय आळ्वार सुपारी की राशि में से एक सुपारी को निकाल कर दो टुकड़े कर के एक टुकड़े को व्यापारी को देते  हैं और कहते हैं की प्रयाण के अंत में वापस लेंगे और उनसे एक कागज़ह पर अपने हस्ताक्षरों से “में आळ्वार को मेरी नाव की आधी सुपारी का आभारी हुँ ” कर लिखने की गुज़ारिश करते हैं ।व्यापारी आळ्वार का कहना मान लेता हैं । नागपट्टनम पहुँचने पर उस कीमती सुपारी का आधा भाग देने की  माँग करते  हैं (श्री रंगा मंदिर निर्माण कैंकर्य) व्यापारी हैरान हो जाता हैं और देने के लिए इन्कार कर देता हैं । दोनों लोग बहस करना शुरू करते हैं और फ़ैसला लेते हैं इंसाफ़ तब ही मिलेगा जब सारे व्यापारियों से सलाह मशोहरा ले । सारे व्यापारी एलान करते हैं की आधी सुपारी आळ्वार को दिजाए । उस व्यापारी के पास और कोई चारा नहीं रहा और आधी सुपारी का मूल्य आळ्वार को चूका कर , अपने रास्ते निकल पड़ते हैं ।

आळ्वार ,शिष्यों के साथ मिलकर मन्दिर पहुँचते हैं और रात होने का इंतज़ार करते हैं । रात मे उस फ़लक को निकाल कर चाबी हासील करके ,विमान की चोटी पे पहुँचते हैं और दोनों तरफ घुमा कर, ख़ोल देते हैं और अंदर स्थित चमकिलि मूर्ति का दर्शन पाते हैं । आळवार को देखकर ,मूर्ति से आवाज़ निकलती हैं “ईयत्ताल आगतो इरुम्बिनाल आगतो, भूयत्ताल मिक्कोतोरु, भूत्तत्ताल आगतो, तेयत्ते पित्तलै ,नरचेमबुगलै आगतो, मायप्पोन वेंनुमो मतित्तेनै पन्नुगैक्के ” अर्थात आप लोहा, पीतल, ताम्बा जैसे पदार्थ को  उपयोग नहीं कर सकते थे क्या,आप की माँग थी की  मैं स्वर्ण से बनु ताकि आप आकर भगवान की  सेवा मे मुझे उपयोग कर सके “। आळ्वार अपने साले की सहायता से उस मूर्ति को लेकर ,उधर से निकलते हैं ।

अगले दिन , एक छोटे नगर पहुँचते हैं और आळ्वार मूर्ति हाली ही में जोति हुई खेत  में हिफ़ाजत करके आराम करते हैं। किसान उस ज़मीन की जुताई शुरू करते हैं , मूर्ति पाहकर एलान करते हैं की मूर्ति उनकी हैं । जब आळ्वार कहते हैं की मूर्ति उनकी आनुवंशिकोने खेत में दफ़नाया है ।  एक बहस चल पड़ती हैं , अंत में आळ्वार मूर्ति के मालिक होने का गवाह बताने के लिए तैयार होते हैं और  किसान उनकी बात मानकर चले जाते हैं । सूर्यास्त होने के बाद , आळ्वार मूर्ति लेकर अपने शिष्यों के साथ  उत्तमर् कोइल नामक दिव्य देश पहुँच कर ,उस मूर्ति को हिफ़ाजत करते हैं । उसी दौरान  नागपट्टिनम मंदिर के कार्य निर्वाहणाधिकारी  स्थानिक नेता के साथ मूर्ति की चोरी होने का समाचार पाकर , पीछा करते हुए छुपाये गए खेत तक पहुँचते हैं और अंत में उत्तमर् कोइल पहुँचते हैं । विग्रह के बारे में आळ्वार से पूछने पर पहले बात को टाल देते हैं की उन्हें कुछ भी मालूम नहीं हैं तद्नन्तर वर्ष ऋतु के बाद  पंघुनी(फाल्गुन मास) में मूर्ति की छोटी ऊँगली तक लौटाने के लीए सहमत होते हैं । इस समझौते का एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करके उन्हें देने के पश्चात , वह लोग उधर से निकल पड़ते हैं । आळ्वार मूर्ति को पिगलाकर बेचते हैं और उस धन से श्री रंगम् मंदिर के दुर्ग का निर्माण करते हैं । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार  से निर्मित नंदनवन से गुज़रते हैं और  बिना कुछ ठेस पहुँचाये, श्रद्धा पूर्वक चारों ओर प्राकार का निर्माण करते । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार संतुष्ट होकर प्यार से अपने कतरनी को तिरुमंगै आळवार का नाम “अरुल मारी” कहके अनुग्रह करते हैं । इस तरह  तिरुमंगै आळ्वार अनेकानेक कैंकर्य/सेवा करते हुए  एम्पेरुमान के प्रति अपनि भक्ति प्रदर्शित करते हैं ।

वर्षा ऋतु के पश्चात ,  कार्यनिर्वाहणाधिकरी स्वर्ण विग्रह ले जाने के लिए आए ।उनसे पहले दस्ताविज़ पढने के लिए कहते है और उसके मुताबिक़ स्वर्ण मूर्ति की एक छोटी  ऊँगली देते हैं । इसी विषय पर बहस शुरू होती हैं और सब लोग एक मध्यस्त व्यक्ति के पास जाते हैं और मध्यस्त फैसला सुनाते हैं की  दस्ताविज़ के मुताबिक़ वे छोटी ऊँगली का स्वीकार करें ।कार्यनिर्वाहणाधिकारी आळ्वार की युक्ति समझ , बिना कुछ लिए उधर से निकल जाते हैं ।अनन्तर आळ्वार वास्तुकारों को निमंत्रण देते हैं की वह उन्हें कुछ भेंट देना चाहते हैं लेकिन वह भेंट एक द्वीप में निक्षिप्त हैं ।सभी वास्तुकारों से एक ही कश्ती मे बैठकर निकलते हैं और कुछ दूर जाने पर आळ्वार केवट को इशारा करके, उनके साथ एक छोटी नाव मे कूद जाते हैं और कश्ती को उलटकर सभी वास्तुकारों को डुबो देते हैं । आळ्वार अपने स्थान लौटते हैं और वास्तुकारों के पौते उनके दादा के तलाश में पूछ-ताछ करने वहाँ पहुँचते हैं । आळ्वार उन लोगों को बताते हैं की वे उनके पूर्वजों को धन के निक्षिप्त स्थान द्वीप का पता बता दिया हैं और वह सारी सम्पदा इकट्टा करके आएंगे। आळ्वार के उत्तर से असंतुष्ट वे आळ्वार पर शक करते  हैं और जिद्द करते हैं की वे आळ्वार को तब तक नहीं निकालेंगे जब तक उनके पूर्वज सही सलामत उनके हाथों में न सौंपे जाय ।आळ्वार चिंता ग्रस्त होते हैं और  श्री रंगनाथर उनके स्वप्न मे साक्षात्कार होकर  “निर्भय होने का आश्वासन देते हैं ” और सभी पौत्र लोगों को कावेरी मे स्नान करके उर्ध्व पुण्ड्र धारण करके ,उनकी मूल मंडप में आकर ,अपने-अपने दादो के नाम पुकारने के लिए कहते हैं । श्री रंगनाथ भगवान की आज्ञा के अनुसार, सभी अपने अपने पूर्वजों को बुलाना शुरू करते हैं । अचम्बित , सभी पूर्वज श्री रंगनाथ भगवान के मूर्ती  के पीछे से  प्रकटित होकर अपने पौत्र से कहते है की “हम आळ्वार की दिव्य कृपा के कारण , हम श्री रंगनाथ  भगवान की श्रीपद पदमों के पास पहुंच गये हैं । आप भी आळ्वार के आश्रण  पाकर , यह संसार मे कुछ समय तक बिता कर खुद को उज्जीवित करें  “। उनके पूर्वज के आदेश सुनकर आळ्वार को आचार्य के रूप में  स्वीकृत करके अपने अपने स्वस्थल लौट जाते है।

पेरिय पेरुमाळ आळ्वार से उनकी इच्छा के बारे में पूछते हैं । आळ्वार बताते हैं की एम्पेरुमान(भगवान) के दशावतार की सेवा करने के उत्सुक हैं । एम्पेरुमान अर्चा विग्रहों की स्थापना करके पूजा करने की आज्ञा देते हैं और आळ्वार श्री रंगम मे दशावतार सन्निधि का निर्माण करते हैं ।

तत पश्चात पेरिय पेरुमाळ आळ्वार के साले को बुलाकर, उनसे आळ्वार की अर्चा मूर्ति तैयार करके (क्योंकि आळ्वार उनके साले के आचार्य हैं ) तिरुक्कुरैयलूर् मे स्थापित करने की , विशाल मन्दिर का निर्माण करने की और अनेक महोत्सवों का आयोजन करने की आज्ञा देते हैं । आळ्वार के साले आळ्वार और उनकी धर्मपत्नि कुमुदवल्ली नाच्चियार् की अर्चा विग्रह तैयार करके , तिरुक्कुरैयलूर् में स्थापना करके , अनेक उत्सव मनाते हैं ।आळ्वार अपने शिष्यों को उज्जीवित करते हुए ,निरंतर उपेय और उपाय के रूप मे पेरिय पेरुमाळ पे ध्यान करते रहे ।

आप श्री की तानियन:

कलयामी कलिध्वंसम कविंलोक दिवाकरम ।
यस्यागोभी: प्रकाशभी:आविद्यम निहतं तम:

आपकी अर्चावतार अनुभव पूर्व यहाँ वर्णन किया गया हैं ।

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अड़ियेन नल्ला शशिधर रामानुज दास
अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

nampillai-goshti1श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी- श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी बायें से तीसरे

तिरुनक्षत्र: अश्विनी, धनिष्ठा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: उनके पिता (भट्टर स्वामीजी), श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी

शिष्य: वलमझगियार

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी, पिष्टपसु निर्णयम, अष्टाक्षर दीपिकै,   रहस्य त्रय, द्वय पीतक्कट्टु, तत्त्व विवरणम, श्रीवत्स विंशति, आदि।

वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र या पोते हैं। उनका नाम उत्तण्दा भट्टर रखा गया और तत्पश्चात वे नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर स्वामीजी नाम से प्रसिद्ध हुए। ध्यान देना: पेरिय तिरुमुडी अडैवु में यह लिखा गया है कि वे श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र हैं और ६००० पड़ी गुरु परम्परा प्रभावं में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का पोता कहा गया है। पट्टोलै में उन्हें श्रीवेदव्यास भट्टर का परपोता कहा गया है। उनकी पहचान के बारें में बहुत सही जानकारी कहीं भी नहीं है परंतु वें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के अति प्रिय शिष्य हुये।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का समय श्रारंगम में श्रीवैष्णवों के लिये बहुत आनंदमय और सुनहरा समय कहा गया है निरन्तर भगवद् अनुभव के कारण बिना कोई बाधा के, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के बहुत शिष्य और अनुयायी थे जो उनके कालक्षेप में नियमित से उपस्थित होते थे। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति ज्यादा अच्छा भाव नहीं था। अमीर परिवार से होने के कारण उनमे अभिमान आ गया था और प्रारम्भ में वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का आदर भी नहीं करते थे।

एक बार श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी राजा के दरबार में जा रहे थे। राह में वे श्रीपिन्बळगिय पेरुमाल जीयर से मिलते हैं और उन्हें भी राजा के दरबार में चलने के लिये न्योता देते हैं। क्योंकि उनके पारिवारिक परम्परा के कारण जीयर स्वामीजी को भट्टर स्वामीजी के परिवार के प्रति आदर था इसलिये वह उनके साथ चले गए। राजा ने उनको सम्मान देकर उनके हिसाब से आसन दिया। क्योंकि राजा अच्छा शिक्षित था भट्टर की समझधारी परखना चाहते थे और उन्हें श्रीरामायण से एक प्रश्न पूछा। वे कहते हैं “श्रीराम स्वयं कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। परन्तु श्रीजटायुजी के अंतिम समय में श्रीराम यह मंगल कामना करते हैं कि वह श्रीवैकुंठ पहुँच जाये। यह अंतर्विरोधी है?”। भट्टर शान्त हो गये और कुछ भी अच्छा अर्थ सहित न समझा सके। कुछ कार्य के कारण राजा का ध्यान दूसरी तरफ चला गया। उस समय भट्टर ने जीयर स्वामीजी के पास जा कर पूछा “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इसे कैसे समझाते थे?”। जीयर उत्तर देते हैं “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी” इसे ‘सत्येना लोकान जयति’ श्लोक से समझाते हैं| इसका अर्थ है, एक पूर्ण सत्यवादि मनुष्य सभी संसार का नियंत्रण कर सकता है – इसलिये केवल उनके सच्चाई के ही कारण वह संसार पर विजयी हो सकते हैं। जब राजा पुन: इधर ध्यान करते हैं ,भट्टर जो समझदार थे , राजा को यह बात समझाते हैं और राजा उसी क्षण उस तत्व को स्वीकृत कर भट्टर का बहुत धन के साथ सम्मान करते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति कृतज्ञ होकर भट्टर , जीयर को उन्हें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से जोड़ने के लिये कहते हैं और उसी क्षण श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर वह राजा द्वारा प्रदान सारा धन श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। भट्टर, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “मैंने यह सारा धन आपके केवल १ वर्णन से प्राप्त किया है” और सारा धन उन्हें अर्पण कर देते हैं। इसके पश्चात वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “इतने समय तक मैं आपका अमूल्य साथ / संचालन से वंचित रहा। अभी से मैं आपकी ही सेवा करूँगा और आपसे सम्प्रदाय के तत्त्वों को सीखूँगा”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को गले लगाते हैं और सम्प्रदाय के तत्वों को सिखाते हैं।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को पूरी तरह श्रीसहस्त्रगीति का पाठ सिखाते हैं। भट्टर उसे सुबह सुनते अर्थ पर विचार कर हर रात में विस्तार से दस्तावेज बनाते। एक बार उपदेश समाप्त हो जाने के बाद वे उस व्याख्यान को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी को अच्छी तरह से देखते हैं (जो श्रीमहाभारत की तरह लम्बी है)। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी घबरा जाते हैं कि अगर इतने विस्तार से व्याख्या है तो लोग गुरु शिष्य के सीखने / सिखाने के तरीके को भूलकर , ग्रन्थ वाचन कर स्वयं ही किसी अंतिम निर्णय पर आ जायेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को समझाते हैं कि जब पिल्लान ६००० पड़ी व्याख्यान किये (विष्णुपुराण जितना बड़ा) तब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी से आज्ञा ली थी। परन्तु यहाँ भट्टर ने श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से व्याख्यान लिखने के लिये आज्ञा नहीं ली। हालाकि भट्टर ने कहा उन्होंने केवल दस्तावेज बनाया है जो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने कहा है|उन्होंने स्वयं अपने मन से कुछ नहीं लिखा। अन्त में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ग्रन्थ के प्रकाशन को न माने, इसको नष्ट कर दिया।

(ध्यान देना: यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में इस घटना को पहचाना गया कि जब आचार्य का परमपद होता है तो शिष्य / पुत्र को उनका सर मुंड़ाना होता है और बाकि और जो शिष्य नहीं हैं उन्हें मुख और शरीर के केश निकालना होता है। जब श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी परमपद को प्रस्थान करते हैं, श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी अपना सर मुंड़ाते हैं जैसे उनके बाकि शिष्य को करना चाहिये। भट्टर के एक भाई यह देखकर दु:खी होते हैं और उनसे शिकायत करते हैं यह कहकर कि श्रीकुरेश स्वामीजी के परिवार में जन्म लेकर क्यों कोई श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के लिये सर मुंड़ाता है। भट्टर अपने भाई को व्यंग्यात्मक ढंग से उत्थर देते हैं “ओ! मैंने श्रीकुरेश स्वामीजी के परम्परा का अपमान किया है। अब आप इसे कैसे सुधारेंगे?”। भट्टर के भाई ऐसे व्यंग्यात्मक शब्द ग्रहण नहीं कर सके और श्रीरंगनाथ भगवान के पास जाकर उनकी इस कार्य के लिये शिकायत करते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान भट्टर को बुलाकर अर्चक के जरिये पूछते हैं कि “जब मैं जीवित हूँ तुमने ऐसा क्यों किया?” (श्रीरंगनाथ भगवान अपने आप को पराशर भट्टर और उनके वंश के पिता मानते हैं)। भट्टर उत्थर देते हैं कि “कृपया मेरे इस अपचार को क्षमा करें”। और आगे कहते हैं “असल में मुझे तो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति सम्पूर्ण समर्पण होना चाहिये था क्योंकि यह प्राकृतिक है जो भी श्रीकुरेश स्वामीजी (श्रीवैष्णव के प्रति समर्पण) के वंश से आता है वह मुख और शरीर के केश निकालता है। बल्कि मैंने केवल अपना सर मुंडाया जो यह दिखाता है कि मैंने एक शिष्य / पुत्र के नाते बहुत कम अनुष्ठान किया है । क्या मेरे थोड़ा सा आदर के कारण आप नाराज हैं?” भट्टर का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति समर्पण देखकर श्रीरंगनाथ भगवान बहुत खुश होते हैं और भट्टर को तीर्थ, पुष्प माला और वस्त्र के साथ सम्मान करते हैं। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी की ऐसी महिमा थी।

इन व्याख्यानों में श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी शामिल घटना बतायी गयी है। इसे हम अब देखेंगे:

श्रीसहस्त्रगीति – ९.३ – श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ईडु प्रवेसं (प्रस्तावना) – इस पद में श्रीशठकोप स्वामीजी नारायण नम: (और मन्त्र) कि महिमा बताते हैं। मुख्य ३ व्यापक मन्त्र है (वह मन्त्र जो भगवान कि सर्व उपस्थिती दर्शाता है) वह है अष्टाक्षर (ॐ नम: नारायणाय), शदक्षरम (ॐ नम: विष्णवे) और ध्वाधसाक्षारम(ॐ नम: भगवते वासुदेवाय)। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि प्रणवम का अर्थ, नम: का अर्थ, भगवान का सर्व उपस्थिती आदि सभी ३ व्यापक मंत्रों में बताया गया है परन्तु आल्वारों के समीप तो नारायण मन्त्र हीं है। ध्यान: नारायण कि महत्वता मुमुक्षुप्पड़ी के शुरुवात में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बोलते हैं।

वार्ता माला में भी श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी से संबन्धित कुछ घटनाये हैं।

२१६ – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी एक बहुत सुन्दर वार्तालाप श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी और श्रीपश्चात् सुन्दर देशिक स्वामीजी के बीच अवतरण किया। देशिक स्वामीजी यह प्रश्न पूछते हैं कि “सभी मुमुक्षु आल्वार जैसे होने चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और भगवान के अनुभव में हीं रहना)। परन्तु फिर भी हममे में सांसारिक इच्छा होती है। हमें इसका परिणाम (परमपद में कैंकर्य प्राप्ति) कैसे प्राप्त होगा जो आल्वारों को प्राप्त हुआ?” श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते हैं “हालाँकी हमें वहीं उन्नति प्राप्त नहीं होगी जो आल्वारों को प्राप्त हुयी परन्तु अपने आचार्य कृपा से जो पवित्र है, भगवान हमारे मरने और परमपद पहूंचने से पहिले वही भाव (आल्वारों जैसी) हमारे में भी प्रगट करेंगे । इसलिये हमारे परमपद पहूंचने से पूर्व हम पवित्र हो जाएँगे और निरंतर भगवान का कैंकर्य करने की चाह रहेगी”।.

४१० – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी यह समझाते हैं कि एक श्रीवैष्णव को कैसे होना चाहिये:

संसारियों का दोष देखते समय उनको सुधारने के लिये हम भगवान की तरह उतने सक्षम नहीं हैं इसीलिए उन्हें अनदेखा रहना चाहिये।

सात्विक जनों (श्रीवैष्णवों) में दोष देखते समय, क्योंकि वे पूरी तरह भगवान पर निर्भर हैं वे भगवान की कृपा से अपने को दोष मुक्त करने की क्षमता रखते हैं। हमे उन्हें उनदेखा रहना चाहिये।

जैसे कोई व्यक्ति अपने शरीर पर रसायनिक पदार्थ लगा लेता है तब अग्नि लगने पर भी उसे चोट नहीं लग सकती है वैसे ही हमें भगवद् ज्ञान से ढके हुए रहना चाहिये ताकि सांसारिक इच्छा और मुद्दों से हम प्रभावित नहीं हो सके।

हममें ज्ञान के दो पहलु होनी चाहिये- १) हमे परमपद पहुँचने की बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये जो पूर्णत: अध्यात्मिक है और २) हमे इस संसार बन्धन से छूटने की भी बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये (जो अज्ञानता का स्थान है)। अभी तक, इस संसार के बारे मे हमारा ज्ञान नादानी की अवस्था जैसे रहना बहुत जरूरी है, परंतु अगर हमे इस संसार से थोडासा भी लगाव रहा तो वह हमे नीचे खींच लेगा और हमे इस संसार मे ही रख लेगा।

अत: हमने श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी के जीवन के सुन्दर अंश देखे। वे बहुत बड़े विद्वान और श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। हम भगवान के चरण कमलों में यह प्रार्थना करते हैं कि हममें भी थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी तनियन :

लोकाचार्य पदासक्तं मध्यवीधि निवासिनं ।
श्रीवत्सचिन्नवंशाब्दिसोमम् भट्टारार्यम् आश्रये ।।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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कोयिल कन्दाडै अण्णन्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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कोयिल् कन्दाडै अण्णन – अण्णन का निवास, श्रीरंगम

तिरुनक्षत्र: भाद्रपद मास, पूर्वभाद्रपद नक्षत्र

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी

शिष्य: कन्दाडै नायन् (उनके पुत्र), कन्दाडै रामानुज इयेंगार, आदि।

रचनाएँ: श्री परांकुश पञ्च विंशति, वरवरमुनी अष्टकम्, मामुनिगल कण्णिनुण् शिरूताम्बु

मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी (जिन्हें यतिराज पादुका- रामानुज स्वामीजी के चरणकमलों की पादुका के नाम से भी जाना जाता है) के प्रसिद्ध वंश में जन्मे, देवराज थोज्हप्पर के पुत्र और कोयिल कन्दाडै अप्पन् के अग्रज, का जन्म नाम, वरद नारायण था। वे आगे चलकर मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रिय शिष्यों और अष्ट दिग्गजों (सत-संप्रदाय का प्रचार करनेवाले आठ अनुयायियों) में से एक हुए।

कोयिल अण्णन् (वे प्रायः इस नाम से जाने जाते हैं) अपने कई शिष्यों के साथ श्रीरंगम में निवास करते थे। उस समय, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् (गृहस्थाश्रम में वरवरमुनी स्वामीजी) श्रीरंगम पधारते हैं और भगवान श्री रंगनाथ और उनके कैंकर्यपाररों उनका बहुमान से स्वागत करते हैं। नायनार् सन्यासाश्रम स्वीकार करते हैं और श्री रंगनाथ भगवान उन्हें अलगिय मणवाळ मामुनिगल नाम प्रदान करते हैं (भगवान आग्रह करते हैं कि श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, श्रीरंगनाथ भगवान के प्रसिद्ध नाम अलगिय मणवाळन को स्वीकार करे)। भगवान उनसे कहते हैं कि वे पल्लवरायन मठ (जो रामानुज स्वामीजी के समय का एक प्राचीन मठ था) में रहे और परमपद जाने तक श्रीरंगम में ही निवास करे, जैसा आदेश उन्होंने रामानुज स्वामीजी को दिया था। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, पोन्नडिक्काल जीयर और अन्य शिष्यों को मठ के जीर्णोद्धार और वहां नियमित कालक्षेप सभा के लिए एक विशाल कक्ष बनाने का निर्देश देते हैं। कक्ष बनाने में, वे पिल्लै लोकाचार्य के निवास से प्राप्त मिट्टी का उपयोग करते हैं – क्यूंकि पिल्लै लोकाचार्य, रहस्य अर्थों (गोपनीय सिद्धांतों) को लिपिबद्ध करने में अग्रणी हुए। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी अपना सम्पूर्ण समय सत संप्रदाय सिद्धांतों की पुनः स्थापना में व्यतीत करते हैं क्यूंकि पिछली पीढ़ियों में लूटेरों द्वारा शहर पर आक्रमण करने और लोगों और साहित्य के नष्ट होने के बाद श्रीरंगम में बहुत ही उथल पुथल थी। उनके वैभव और उदारता के विषय में सुनकर, बहुत से लोग श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के पास पहुंचे और उनके शिष्य हुए।

एक बार श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, तिरुमंजन अप्पा की पुत्री आय्च्चियार पर कृपा करते हैं। आय्च्चियार, जो श्रीवरवरमुनी स्वामीजी (उनके पिता के आचार्य है) के प्रति अत्यंत निष्ठा रखती थी, उनसे प्रार्थना करती है कि वे उन्हें अपनी अनुयायी के रूप में स्वीकार करे। प्रथमतयः श्रीवरवरमुनी स्वामीजी संकोच करते हैं परंतु बाद में आय्च्चियार के समर्पण को देखकर, वे उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार करते हैं। आय्च्चियार यह बात किसी से नहीं बताती, अपने पति कन्दाडै सिर्रण्णर से भी नहीं कहती। कुछ समय के लिए वे अपने पिता के घर पर रहने आती है। उस समय कोयिल् अण्णन के पिता के श्राद्धपर्व पर आय्च्चियार से रसोई बनाने की विनती की जाती है। वे उस कैंकर्य को सच्चे मनोभाव से करती है और श्राद्ध के पूर्ण होने पर सभी लोग आंगन में आराम करते हैं।

उस समय, कोयिल् अण्णन एक श्रीवैष्णव को पेरिय जीयर (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी) के मठ से निकलते हुए देखते हैं। अण्णन उनके बारे में पूछते हैं और उनसे वहां से आने का कारण भी पूछते हैं। वे श्रीवैष्णव बताते हैं कि उनका नाम सिंगरैय्यर है, वे वल्लुव राजेन्द्र (समीप के गाँव) से हैं और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के अनुयायी बनने के लिए वहाँ आये हैं परंतु उनकी अभिलाषा अभी तक पूरी नहीं हो पाई। अण्णन उनसे कहते हैं कि श्रीरंगम में बहुत से आचार्य हैं और वे उनमें से किसी के भी शिष्य बन सकते हैं। वे श्रीवैष्णव उत्तर देते हैं कि स्वयं भगवान के ही आदेश पर वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य होना चाहते हैं। अण्णन आश्चर्यचकित होते हैं और इस बारे में उनसे और अधिक जानना चाहते हैं परंतु सिंगरैय्यर कहते हैं कि यह गोपनीय है और विस्तार से उन्हें कुछ नहीं बताते। अण्णन उन्हें प्रसाद और ताम्बूल गृहण करने के लिए आमंत्रित करते हैं और रात्रि में वहीँ विश्राम करने के लिए उनसे कहते हैं। रात्रि में जब अण्णन और उनके भाई बाहर बरामदे में लेटते हैं, आय्च्चियार भी घर के अंदर शयन करने के लिए लेटती है। शयन से पहले वे कहती है “जीयर तिरुवदिगले चरणं, पिल्लै तिरुवदिगले चरणं, वालि उलगासिरियन” (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, तिरुवाय्मौली पिल्लै और पिल्लै लोकाचार्य को प्रणाम)। अण्णन और उनके भाई इसे सुनते हैं और उनमें से एक इस विषय में जानने के लिए अंदर जाना चाहते हैं, परंतु अण्णन और अप्पन उन्हें रोक लेते हैं और उन्हें कहते हैं कि हम प्रातः देखेंगे।

अण्णन, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रति श्रद्धा से अभिभूत हो जाते हैं और शयन नहीं कर पाते। वे पुनः सिंगरैय्यर के पास जाते हैं और रात्रि में ही उनसे उस घटना के बारे में पूछते हैं। सिंगरैय्यर एक बहुत लम्बी घटना बताते हुए कहते हैं– मैं समय-समय पर अपने गाँव से सब्जियां आदि चुनकर उन्हें आचार्यों के मठ/आश्रम में अर्पण किया करता था। एक बार, एक श्रीवैष्णव ने मुझे इसे पेरिय जीयर के मठ में अर्पण करने का निर्देश दिया। मैंने इसे अपना परम सौभाग्य समझा और जीयर के मठ में सब्जियां लेकर पहुँच गया। जीयर ने मुझसे बहुत से प्रश्न पूछे जैसे कि इन्हें कहाँ उगाया?, इनकी सिंचाई किसने की?, आदि। मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे कहा कि यह सब पवित्र भूमि पर उगाई गई है और इन्हें आपके शिष्यों के ही द्वारा सींचा गया है। ऐसा सुनकर पेरिय जीयर बहुत प्रसन्न हुए और उन सब्जियों को स्वीकार किया। उन्होंने जाने से पहले मुझे पेरिय पेरुमाल के दर्शन और आराधना करने का आदेश दिया। मंदिर के अर्चकर (पुजारी) ने मुझसे सब्जियों के विषय में पूछा और यह भी पूछा कि इस बार मैंने उन्हें किसे अर्पण किया। मैंने उन्हें बताया कि इस बार मैंने उन्हें पेरिय जीयर मठ में अर्पण किया। यह सुनकर अर्चकर बहुत प्रसन्न हुए और मुझसे कहा कि मैं बहुत सौभाग्यशाली हूँ और मुझे महान आचार्य संबंध की प्राप्ति होगी। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और तीर्थ (चरणामृत), श्री शठकोप, माला, अभय हस्तं, आदि प्रदान किया। मैंने भी स्वयं को अति सौभाग्यशाली अनुभव किया। मैं जीयर मठ लौटा और पेरिय जीयर को बताया कि पेरिय पेरुमाल ने आपके पुरुष्कार से मुझ पर कृपा की और फिर उन्हें बताया कि अब मैं गाँव लौट रहा हूँ। मठ के कैंकर्यपारर (सेवकों) ने मुझे कुछ प्रसाद दिया और यात्रा में जब मैंने उसे पाया तों मेरी बुद्धि निर्मल हो गयी। रात्रि में मैंने एक स्वप्न देखा। मैंने देखा मैं पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में हूँ। पेरिय पेरुमाल ने आदि शेष की और संकेत करते हुए कहा “अलगिय मणवाळ जीयर ही आदि शेष है, तुम उनके शिष्य हो जाओ”। उस समय से ही मैं श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य बनने की राह देख रहा हूँ। इन घटनाओं को सुनकर, अण्णन गहन चिंतन करते हैं और फिर शयन करते हैं।

सोते हुए अण्णन एक स्वप्न देखते हैं। एक श्रीवैष्णव एक कोड़े के साथ सीढियों से नीचे आते हैं और उस कोड़े से अण्णन पर प्रहार करते हैं। अण्णन, जो उन्हें रोकने में सक्षम थे ऐसा नहीं करते और समझते हैं कि वे श्रीवैष्णव उन्हें किसी अपराध के लिए दंड दे रहे हैं। कुछ देर बाद वह कोड़ा टूट जाता है और वे श्रीवैष्णव अण्णन को अपने हाथों से खींचते हैं। अण्णन उनसे पूछते हैं कि अब उन्हें क्या करना चाहिए और वे श्रीवैष्णव अण्णन को ऊपर की और जाने का निर्देश देते हैं। अण्णन और वे श्रीवैष्णव दोनों ही ऊपर जाते हैं। वहां वे एक सन्यासी को देखते हैं जो बहुत क्रोधित थे, वे सन्यासी भी अण्णन को कोड़े मारते हैं और अंततः वह कोड़ा भी टूट जाता है। वे श्रीवैष्णव सन्यासी से प्रार्थना करते हैं और कहते हैं “यह एक बालक है और नहीं जनता कि ये क्या कर रहा है, कृपया इसे न मारे और अब इस पर कृपा करे”। तब वह सन्यासी, अण्णन को बुलाते हैं और उन्हें अपनी गोद में बैठाकर उनसे प्रेमपूर्वक बात करते हैं। वे कहते हैं“आपने और उत्तम नम्बि दोनों ने ही अपराध किया है”। अण्णन कहते हैं “मैंने अलगिय मणवाळ जीयर के वैभव को नहीं जाना और भ्रम में पड गया– कृपया अब मुझे क्षमा कर दे”। वे सन्यासी प्रेमपूर्वक बताते हैं “मैं भाष्यकार (श्री रामानुज स्वामीजी) हूँ और यह श्रीवैष्णव दाशरथि स्वामीजी (आपके पूर्वज) हैं। आप स्वयं को दोषनिवृत्त करें और दाशरथिजी के साथ अपने संबंध का दुरूपयोग न करें। मैं आदि शेष हूँ और मणवाळ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के रूप में फिर प्रकट हुआ हूँ। आप और आपके सम्बन्धियों को श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य होना चाहिए इसी में आपका उद्धार है”। इतने ही में उनका स्वप्न टूट जाता है और अण्णन चोंककर भय से जाग जाते हैं। वे अत्यंत भावनात्मक होकर अपने भाइयों को यह घटना बताते हैं। आय्च्चियार जो अंदर सों रही थी, वे लोग उनके पास जाते हैं और उन्हें स्वप्न के बारे में बताते हैं। वे उन्हें बताती है कि किस तरह से श्रीवरवरमुनी स्वामीजी ने उन्हें निर्मल किया और उन्हें दिव्य ज्ञान प्रदान किया। वे उसके बारे में सुनकर बहुत प्रसन्न होते हैं और सिंगरैय्यर के पास आकर उन्हें भी स्वप्न के बारे में बताते हैं। फिर कावेरी नदी पर जाकर वे अपने दैनिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं।

तद्पश्चाद वे अपने निवास पर लौटते हैं और उत्तम नम्बि और कई अन्य कन्दाडै परिवार के सदस्यों (दाशरथि स्वामीजी के वंशज) को वहां आमंत्रित करते हैं। वे सभी उनके निवास पर पहुँचते हैं और यह जानकर सभी को बहुत आश्चर्य होता है कि सभी ने एक ही समान स्वप्न देखा। वे सभी एम्बा के पास जाते हैं जो प्रसिद्ध आचार्य लक्ष्मणाचार्य के पौत्र हैं । एम्बा स्वप्न के बारे में सुनकर बहुत क्रोधित होते हैं और उन्हें कहते हैं कि किसी भी अन्य जीयर की शरण लेना उनके वंश परंपरा के लिए उचित नहीं है। कई अन्य भी यही कहते हैं और पेरिय जीयर के शरण नहीं जाना चाहते।

अण्णन, कन्दाडै परिवार के कई आचार्य पुरुषों के साथ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के आश्रित होने के लिए जीयर मठ जाते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी की शरण में जाने के लिए अण्णन अपने एक शिष्य तिरुवालियालवार और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रिय शिष्य शुद्ध सत्वं अण्णन की सहायता लेते हैं। शुद्ध सत्वं अण्णन प्रायः श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के वैभव की चर्चा कोयिल् अण्णन से किया करते थे। इसलिए, कोयिल् अण्णन उनकी सहायता लेकर श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के समक्ष जाना चाहते थे। फिर कोयिल् अण्णन अपने बहुत से संबंधियों के साथ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के मठ में जाते हैं । श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, तिरुमलै आलवार मण्डप में कालक्षेप व्याख्यान दे रहे थे। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के कालक्षेप में बाधा न डालने के विचार से अण्णन अपने आने की सूचना आय्च्चियार को देते हैं और आय्च्चियार सही समय पर उनके आने की जानकारी श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को देने के लिए एक श्रीवैष्णव को अंदर भेजती है। वह श्रीवैष्णव, कोयिल् अण्णन और उनके संबंधियों के आने की मंशा को गलत समझते हैं और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को इसकी जानकारी गलत बोध से देते हैं (जैसे कि वे लोग वहां तर्क/विवाद करने आये हो)। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, कोई विवाद नहीं चाहते थे, इसलिए वे मठ के पीछे चले जाते हैं। इस बीच, अण्णन और उनके संबंधी, वानमामलै जीयर के पास पहुँचते हैं और उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। वहां क्या हुआ यह जानने के लिए आय्च्चियार उन श्रीवैष्णव का अनुसरण करती है और कोयिल्  अण्णन के आने का प्रयोजन श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को बताती है। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी तब उन श्रीवैष्णव को फटकारते हैं और कोयिल् अण्णन और उनके सम्बन्धियों का आदर और सम्मान के साथ स्वागत करते हैं। कोयिल् अण्णन और उनके संबंधी उनके चरण कमलों में प्रणाम कर प्रार्थना करते हैं और पेरिय जीयर का मंगलाशासन करते हैं और फल फूल आदि अर्पण करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, तिरुप्पल्लाण्डू और तिरुवाय्मौली के “पोलिग-पोलिग” दशक पर संक्षिप्त उपदेश देते हैं। अण्णन, पोन्नडिक्काल् (तोताद्रि) जीयर के माध्यम से श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी तुरंत अंदर एक निजी स्थान पर जाते हैं और पोन्नडिक्काल् जीयर के माध्यम से अण्णन को अंदर आमंत्रित करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, अण्णन से कहते हैं “आप पहले से ही वधुल कुल (दाशरथि स्वामीजी के) से संबंध रखते हैं, जो एक स्थापित आचार्य पुरुष परिवार है। फिर इसकी (मेरे शिष्य होने की) क्या आवश्यकता है?”। अण्णन फिर भी आग्रह करते हैं कि श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उन्हें स्वीकार करे, और इससे पहले श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को उचित सम्मान और आदर न देने के लिए वे उनसे क्षमा याचना भी करते हैं और अपने दिव्य स्वपन के बारे में बताते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं और अण्णन से कहते हैं कि कुछ और सौभाग्यशाली जीवात्माएं हैं जिन्हें भगवान स्वप्न के द्वारा निर्देश देंगे और वे सभी को तीन दिन बाद पञ्च संस्कार के लिए एकत्रित होने का आदेश देते हैं। अण्णन प्रसन्नता से प्रस्ताव स्वीकार करते हैं और अपने सम्बन्धियों के साथ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से आज्ञा लेते हैं।

भगवान अन्य कई जीवात्माओं के स्वप्न में प्रकट होते हैं और अपनी अर्चा-समाधि की बेड़ियों (अर्चावतार स्वरुप में किसी से भी न मिलने का अपना प्रण) को तोड़कर निर्देश देते हैं कि श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, स्वयं भगवान से पृथक नहीं है और सभी को अपने उद्धार के लिए उनके चरणारविन्दों का आश्रय लेना चाहिए।

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श्रीवरवरमुनी स्वामीजी और कोयिल् अण्णन – अण्णन का निवास, श्रीरंगम

तीन दिनों के बाद, सभी पेरिय जीयर मठ में एकत्रित होते हैं। अण्णन, अपनी वंश परंपरा के विषय में कोई अभिमान न रखते हुए, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की चाहत से, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के समक्ष जाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे सभी की पञ्च संस्कार विधि संपन्न करे। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी वानमामलै (तोताद्रि/पोन्नडिक्काल्) जीयर को आवश्यक तत्वों की रचना करने का निर्देश देते हैं और कोयिल् अण्णन की पञ्च संस्कार विधि पूर्ण करके (तापं – बाजूओं पर शंख/चक्र अंकित करना, पुण्ड्र्– उर्ध्वपुण्ड्र्, नामं – दास्य नाम प्रदान करना, मंत्र – रहस्य त्रय मंत्र और याग – तिरुवाराधन की प्रक्रिया) उन्हें आशीर्वाद देते हैं।

यकायक, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, पोन्नडिक्काल् (तोताद्रि) जीयर के विषय में विचार करते हैं और उनकी ओर संकेत करते हुए सभा में उद्घोषणा करते हैं “पोन्नडिक्काल् जीयर मेरे जीवन श्वांस के समान है और मेरे हितैषी है। जो भी मेरा वैभव है, उन्हें भी वही प्राप्त होना चाहिए”। अण्णन, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के ह्रदय को समझकर कहते हैं “तब आप मुझे पोन्नडिक्काल् जीयर के शिष्य होने का आदेश दिए होते!” और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी यह कहते हुए अण्णन के प्रति अपना विशेष अनुराग दर्शाते हैं “जो मेरे निमित्त है, उनका त्याग मैं कैसे कर सकता हूँ (स्वयं पेरिय पेरुमाल के दिव्य आदेश के अनुसार)?”। आय्च्चियार के पुत्र अप्पाचियारण्णा तब उठकर श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें पोन्नडिक्काल् जीयर के शिष्य होने की आज्ञा दे। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उनसे बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें “नम अप्पाचियारण्णावो?” (क्या यह हमारे अप्पाचियारण्णा है), ऐसा कहकर उनका अभिवादन करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी फिर पोन्नडिक्काल् जीयर को अपने सिन्हासन पर बैठाते हैं और प्रबलता से उनके हाथों में शंख और चक्र प्रदान करते हुए उनसे अप्पाचियारण्णा की पञ्च संस्कार विधि संपन्न करने के लिए कहते हैं। पोन्नडिक्काल् (तोताद्रि) जीयर पहले विनम्रता से मना करते हैं, परंतु श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के आग्रह करने पर कि ऐसा करने से उन्हें प्रसन्नता होगी, पोन्नडिक्काल् जीयर उसे स्वीकार करते हैं। अप्पाचियारण्णा के पश्चाद उनके भाई दाशरथी अप्पै भी पोन्नडिक्काल् जीयर के शिष्य हुए। तद्पश्चाद पोन्नडिक्काल् जीयर, विनम्रता से वह आसन त्यागकर, अत्यंत आदर से श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को प्रणाम करते हैं। उसके बाद, अण्णन के भाई कन्दाडै अप्पन और कई अन्य श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य हुए। उस समय, पेरिय पेरुमाल का प्रसाद प्राप्त होता है और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उसे अत्यंत आदर और सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं। सभी फिर मंदिर जाते हैं और मंगलाशासन करके तदीयाराधन के लिए फिर से मठ को  लौटते हैं।

एक दिन, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, कोयिल् अण्णन के प्रति शुद्ध सत्व अण्णन कि प्रीति की प्रशंसा करते हैं। वे आण्ड पेरुमाल (जो कोमाण्डूर इलयविल्ली आच्चन के वंशज थे और महान विद्वान थे) को अण्णन का शिष्य होने का और सत संप्रदाय के प्रचार-प्रसार में अण्णन का साथ देने का निर्देश देते हैं।

एरुम्बी अप्पा जो कोयिल् अण्णन के संबंधी थे, वे कोयिल् अण्णन के पुरुष्कार के माध्यम से श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शरण होकर उनके प्रिय शिष्य हुए।

कन्दाडै नायन (कन्दाडै अण्णन के पुत्र) अल्प आयु से ही बहुत बुद्धिमान और ज्ञानी थे। जब श्रीवरवरमुनी स्वामीजी दिव्य प्रबंध के कुछ पसूरों के अर्थ समझा रहे थे, कन्दाडै नायन सुंदरता से उसकी व्याख्या करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उन्हें अपनी गोद में बैठाकर उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं और उन्हें संप्रदाय में अग्रणी होने का आशीर्वाद देते हैं। कन्दाडै नायन, पेरिय तिरुमुड़ी अदैवू के रचयिता हैं।

प्रतिवादी भयंकर अण्णन, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शरण होकर उनके शिष्य हुए। उसके पश्चाद वे सर्व प्रथम कोयिल् अण्णन के निवास पर जाते हैं। उनका एक दूसरे के प्रति बहुत आदर था।

श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, कोयिल् अण्णन को कन्दाडै अप्पन, तिरुक्कोपुरत्तु नायनार भट्टर, शुद्ध सत्व अण्णन, आण्ड पेरुमाल नायनार और अय्यनप्पा को भगवत विषय पर व्याख्यान देने का निर्देश देते हैं। वे उन्हें “भगवत संबंध आचार्य” की उपाधि प्रदान करते हैं और उन्हें भगवत विषय का मुख्य आचार्य नियुक्त करते हैं। एक बार, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी देखते हैं कि कन्दाडै नायन (अण्णन के पुत्र) और जीयर नायनार (पूर्वाश्रम में श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के पौत्र) अत्यंत विस्तार से भगवत विषय पर चर्चा कर रहे हैं और वे उन्हें ईदू व्याख्यान के लिए संस्कृत में अरुमपदम की रचना करने का निर्देश देते हैं।

श्रीरंगम में श्री रंगनाथ भगवान के समक्ष श्रीवरवरमुनी स्वामीजी द्वारा भगवत विषय के कालक्षेप के संपन्न होने के बाद, भगवान आणि तिरुमूलम के अंतिम दिन स्वयं प्रकट होकर, “श्रीशैलेष दयापात्रम” तनियन उन्हें समर्पित करते हैं और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करते हैं। तद्पश्चात भगवान सभी दिव्य देशों में यह निर्देश देते हैं कि यह तनियन दैनिक अनुष्ठान के रूप में प्रारम्भ और अंत में गाई जानी चाहिए। उसी समय, कोयिल् अण्णन के निवास पर, अण्णन की पत्नी और अन्य श्रीवैष्णवियां, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के वैभव की चर्चा कर रही थी। तभी एक बालक वहां आता है और एक पर्ची जिस पर वह तनियन लिखी थी उन्हें देकर अदृश्य हो जाता है। हर कोई समझ जाता है की यह भगवान की दिव्य लीला है।

एक बार, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी, कोयिल् अण्णन से कहते हैं कि हमें तिरुमाला जाकर तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) का मंगलाशासन करना चाहिए। उस समय, अप्पिल्लाई, अण्णन की प्रशंसा करते हुए कहते हैं “कावेरी कदवाथा कन्दाडै अण्णननरो” (वह जो कावेरी नदी के पार नहीं जायेंगे अर्थात जो कभी श्रीरंगम नहीं छोड़ेंगे)। परंतु श्रीवरवरमुनी स्वामीजी बताते हैं कि तिरुमाला के शिखर पर श्री रंगनाथ भगवान नित्य-सूरियों द्वारा पूजे जाते हैं। यह सुनकर अण्णन बहुत प्रसन्न होते हैं और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से तिरुमाला यात्रा की अनुमति देने का आग्रह करते हैं। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उन्हें पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में लेकर आते हैं और वे उन्हें तिरुमाला जाने की अनुमति प्रदान करते हैं और उत्तम नम्बि (पेरिय पेरुमाल के प्रिय कैंकर्य परार) को अण्णन के साथ भेजते हैं। कई श्रीवैष्णव भी अण्णन के साथ जाते हैं। जब अण्णन को पालकी प्रस्तुत की जाती है, अण्णन उसे लेने से मना कर देते हैं और अपनी महान विनम्रता दिखाते हुए श्रीवैष्णवों के साथ चलकर ही जाते हैं। जब वे तिरुमाला पर्वत के तल पर पहुँचते हैं, अनंतालवान (तिरुवेंकटमुदैयाँ के सेवक जो तिरुमलै अनंतालवान के वंशज है), पेरिय केल्वि जीयर, आचार्य पुरुष और बहुत से श्रीवैष्णव, अण्णन और उनके साथ आये श्रीवैष्णवों का स्वागत अत्यंत उत्साह से करते हैं।

अण्णन वहां रथोत्सव में सम्मिलित होते हैं और भगवान का मंगलाशासन करते हैं। वे अयोध्या रामानुज ऐय्यंगार से भेंट करते हैं जो श्री बदरिकाश्रम में सेवा किया करते थे। अयोध्या रामानुज ऐय्यंगार, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शरण होना चाहते थे, परंतु अनंतालवान समझाते हैं कि ऐय्यंगार को अण्णन की शरण लेना चाहिए जो श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के लिए बहुत आनंददायक है। ऐय्यंगार प्रसन्नता से उसे स्वीकार करते हैं और अण्णन से उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। अण्णन उनकी विनती स्वीकार करके उन्हें पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं। तिरुवेंकटमुदैयाँ, अण्णन के साथ उनके संबंध से प्रभावित होकर, उद्घोषित करते हैं की उन्हें “कन्दाडै रामानुज ऐय्यंगार” के रूप में जाना जायेगा। कन्दाडै रामानुज ऐय्यंगार ने कई विशिष्ट कैंकर्य किये।

अण्णन श्रीरंगम लौटने का निर्णय करते हैं और जाने की अनुमति लेने के लिए तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश) के पास जाते हैं। भगवान उन्हें अपने वस्त्र आदि प्रदान करते हैं और अण्णन सहर्ष उसे स्वीकार करते हैं। भगवान उन्हें कन्दाडै रामानुज ऐय्यंगार द्वारा अर्पण की गयी पालकी में श्रीरंगम लौटने का निर्देश देते हैं। अपनी यात्रा में, वे विभिन्न दिव्य देशों में भगवान का मंगलाशासन करते हैं और एरुम्बी में एरुम्बी अप्पा और अपने अन्य ज्येष्ठ संबंधियों से भेंट करते हैं। कांचीपुरम में अण्णन, सालैक्कीणरू (वह कुंवा जहाँ से रामानुज स्वामीजी देव पेरुमाल के कैंकर्य के लिए जल लाया करते थे) से जल लाने की इच्छा प्रकट करते हैं। अण्णन प्रसन्नता से वह कैंकर्य करते हैं और अप्पाचियारण्णा को उस कैंकर्य को ज़ारी रखने का निर्देश देते हैं।

अण्णन कांचीपुरम से श्रीपेरुम्बुत्तुर और आस-पास के अन्य दिव्यदेशों में जाने की योजना बनाते हैं। और निकलने से पहले देव पेरुमाल से अनुमति लेने के लिए उनके समक्ष जाते हैं। उस समय देव पेरुमाल तिरुवाराधन का आनंद ले रहे थे। देव पेरुमाल को भोग लगने पर, वे अण्णन को अपने समीप आमंत्रित करते हैं और अपने वस्त्र, माला, चन्दन और इत्र आदि उन्हें प्रदान करते हुए कहते हैं कि यह सब पेरिय जीयर (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी) के लिए है और उन्हें प्रसन्नता से विदा करते हैं। अण्णन बाहर आते हैं और कच्चिक्कू वायत्तान मण्डप में बैठकर श्रीवरवरमुनी स्वामीजी की कीर्ति का गान करते हैं। कुछ बड़े बताते हैं कि देव पेरुमाल स्वयं श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को “अण्णन जीयर” (कोयिल् अण्णन के आचार्य, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी) कहकर संबोधित करते हैं और उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं। वे उन्हें यह भी स्मरण कराते हैं कि किस तरह पेरिय पेरुमाल कोयिल् अण्णन को “जीयर अण्णन” (पेरिय जीयर के शिष्य, कोयिल् अण्णन) के रूप में संबोधित करते हैं। उस समय, श्रीरंगम लौटने के लिए श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का समाचार आता है क्यूंकि उन्हें वहां से निकले हुए लम्बा समय हो गया था। कोयिल् अण्णन तुरंत अपने आचार्य के आदेश को स्वीकार करते हुए, श्रीपेरुम्बुत्तुर और अन्य दिव्यदेशों की और प्रणाम करके वे श्रीरंगम लौट आये।

पेरिय जीयर, कोयिल् अण्णन के निवास पर पहुँचते हैं और तिरुमलै थांत पेरुमाल भट्टर मंदिर के कैंकर्य परारों के साथ पेरिय पेरुमाल की माला और प्रसाद के साथ वहां पहुँचते हैं। सभी अण्णन का स्वागत बहुत ही आनंद से करते हैं और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी अण्णन को बहुत आशीष देते हैं। श्रीवैष्णव जन श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को बताते हैं कि देव पेरुमाल ने “अण्णन जीयर” के रूप में आपकी प्रशंसा की है। श्रीवरवरमुनी स्वामीजी यह सुनकर बहुत प्रसन्न होते हैं और कहते हैं कि अण्णन के साथ ऐसा संबंध पाकर वे धन्य हुए। प्रतिवादी भयंकर अण्णन दर्शाते हैं कि अण्णन जीयर संबोधन श्रिय:पति के समान है – जिस प्रकार भगवान और अम्माजी परस्पर एक दुसरे का वैभव बढाते हैं, उसी प्रकार कोयिल् अण्णन और श्रीवरवरमुनी स्वामीजी एक दुसरे की कीर्ति बढाते हैं।

इस भूलोक में अपने अंतिम समय में, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी अत्यंत पीड़ा में आचार्य हृदयं पर व्याख्यान की रचना कर रहे थे। जब अण्णन उनसे पूछते हैं कि वे स्वयं को इतने अत्यधिक कष्ट में क्यों दे रहे हैं, तब श्रीवरवरमुनी स्वामीजी उदारता से उत्तर देते हैं कि वे यह व्याख्यान अपने पुत्रों और पौत्रों (भविष्य में आनेवाली पीढ़ियों) के लाभ के लिए लिख रहे हैं।

श्रीवरवरमुनी स्वामीजी ने कोयिल् अण्णन के लिए अधिकारों और विशेषाधिकारों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो श्रीरंगम के बुरे समय में आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिए गये थे।

एरुम्बी अप्पा (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के अन्य शिष्य) अपने पूर्व दिनचर्या (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों की व्याख्या करते हुए एक दिव्य ग्रंथ) के श्लोक 4 में एक सुंदर द्रष्टांत बताते हैं।

पार्शवत: पाणीपद्माभ्याम परिगृह्य भवतप्रियऊ
विनयस्यन्तं सनैर अंगरी मृदुलौ मेदिनितले

शब्दार्थ: एरुम्बी अप्पा, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से कहते हैं – “स्वामी के दोनों ओर, उनके दो प्रिय शिष्य (कोयिल् अण्णन और कोयिल् अप्पन) हैं और आप अपने कमल के समान कोमल हाथों से उन्हें द्रढ़ता से पकडे हुए, अपने कोमल चरणारविन्दों से धरती पर चल रहे हैं”।

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श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के दोनों और अण्णन और अप्पन (अप्पन स्वामी के निवास से प्राप्त चित्र, कांचीपुरम)

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार, दिनचर्या स्त्रोत्र के अपने व्याख्यान में, दर्शाते हैं कि यहाँ दो प्रिय शिष्यों से अभिप्राय है “कोयिल् अण्णन और कोयिल् अप्पन”। यहाँ एक प्रश्न उठता है– क्या श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को त्रिदंड धारण नहीं करना चाहिए, जैसा कि पांचरात्र तत्वसार संहिता में कहा गया है कि ‘एक सन्यासी को सदा त्रिदंड धारण करना चाहिए’? अण्णावप्पंगार इसे भली प्रकार से समझाते हैं:

  • ऐसे सन्यासी के लिए जो सर्व सिद्ध है– उनके त्रिदंड धारण न करने में कोई दोष नहीं है।
  • एक सन्यासी जो निरंतर भगवान के ध्यान में रहता है, जो व्यवहार कुशल है और जिन्होंने अपने आचार्य से शास्त्रों का अर्थ भली प्रकार से गृहण किया है, उन्हें जो भगवत विषय में जानकारी है और जिनका अपनी इन्द्रियों और सम्पूर्ण विश्व पर नियंत्रण है– ऐसे सन्यासी के लिए उनके त्रिदंड की आवश्यकता नहीं है।
  • भगवान को साष्टांग प्रणाम करते हुए, त्रिदंड साष्टांग में व्यवधान हो सकता है, इसलिए वे उस समय त्रिदंड साथ नहीं ले जाते।

श्रीवरवरमुनी स्वामीजी स्वयं कोयिल् अण्णन के वैभव को इस सुंदर पासूर के माध्यम से बताते हैं:

एक्कूणत्तोर एक्कुलत्तोर एव्वियल्वोर आयिडिनुम
अक्कणत्ते नम्मीरैवरावरे
मिक्कपुघल्क कारार पोलिल कोयिल कन्दाडै अण्णनेन्नुम
पेरालनै अडैन्त पेर

शब्दार्थ: जो कोई भी कोयिल कन्दाडै अण्णन् (जो अपने दयालु स्वभाव के कारण लोकप्रिय है) के शरणागत होता है, चाहे उसके गुण, धर्म या स्वभाव कैसा भी हो, वह तुरंत मुझे (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) प्राप्त करेगा।

इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

कोयिल कन्दाडै अण्णन् की तनियन:

सकल वेदांत सारार्थ पूर्णासयं,
विपुल वादुल गोत्रोद्भवानाम् वरं।
रुचिर जामातरू योगीन्द्र पादाश्रयम्,
वरद नारायणं मदगुरुं समाश्रये।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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अनन्ताळ्वान

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र — चित्रा, चैत्र मास
अवतार स्थान — सिरुपुत्तुऱ / किरङ्गनूर (बंगलूरु – मैसूर मार्ग में)
आचार्यअरुळाळ पेरुमाल एम्पेरुमानार
परमपद प्रस्थान प्रदेश : तिरुमला (तिरुप्पति)
रचनाएँ — वेंकटेश इतिहास माला, गोदा चतुश्लोकि, रामानुज चतुश्लोकि

रामानुज स्वामीजी की कीर्ति और वैभव के बारे में सुनकर, अनन्ताळ्वान जो अनन्ताचार्य, अनन्त सूरि आदी नामों से प्रख्यात हैं (एच्चान, तोण्डनूर नम्बि और मरुदूर नम्बि के साथ) उनके पास गए। वे रामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में आश्रय लेने की अपनी इच्छा को प्रकट किये। रामानुज स्वामीजी ने उसी समय यग्यमूर्ति को सुधार कर उन्हें अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार नाम से संप्रदाय में स्थापित किया था। रामानुज स्वामीजी, अनन्ताळ्वान को अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानर के शिष्य बनने का निर्देश देते हैं। वे सभी प्रसन्नता से उसे स्वीकार करते हैं और अत्यन्त आनन्द से उनके निर्देश का अनुसरण करते हैं। अरुळाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार उनसे कहते हैं कि वे उनके शिष्य होने पर भी केवल रामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणारविंदो के ही आश्रय करें। तिरुमला में श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य चरणकमलों को अनन्ताळ्वान कहा जाता है। अनन्ताळ्वान निम्न विषयों में मधुरकवि आळ्वार के समान थे :

  • दोनों के तिरुनक्षत्र चित्रा, चैत्र मास था।
  • वे दोनों ही पुर्णतः आचार्य निष्ठा में स्थित थे – मधुरकवि आळ्वार सदा शठकोप स्वामीजी के दिव्य चरणों के ही ध्यान में रहते थे और अनन्ताळ्वान हमेशा रामानुज स्वामीजी के चरण कमलों का ही चिन्तन किया करते थे।

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तद्पश्चाद तिरुवाय्मौली (सहस्त्रगीती) के मधुर पासूरों पर व्याख्यान देते हुए, रामानुज स्वामीजी “ओलिविल कालमेल्लाम” पद (3.3) समझाना प्रारंभ करते हैं जहां शठकोप आलवार, तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) के प्रति शुद्ध और सतत कैंकर्य करने की अपनी उत्कट अभिलाषा प्रकट करते हैं। उस पद में आलवार, तिरुवेंकटमुदैयाँ की ताज़े और प्रचुर मात्रा में पुष्पों की अभिलाषा को दर्शाते हैं। रामानुज स्वामीजी, आलवार के इस दिव्य मनोरथ का चिंतन करते हुए, अपनी सभा के समक्ष एक प्रश्न रखते हैं “क्या कोई है जो तिरुमला जाकर, एक सुंदर बगीचा बनाकर, प्रतिदिन भगवान की सुंदर पुष्पों से सेवा करेगा?” अनंतालवान, तुरंत उठकर कहते हैं कि वे आलवार और रामानुज स्वामीजी का मनोरथ पूरा करेंगे। रामानुज स्वामीजी अति प्रसन्न होते हैं और अनंतालवान तुरंत तिरुमला के लिए प्रस्थान करते हैं। प्रथम वे तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) का मंग्लाशासन करते हैं, बगीचे का निर्माण करते हैं और उसका नाम “इरामानुसन्” रखकर प्रतिदिन ताज़े पुष्पों से भगवान का कैंकर्य प्रारंभ करते हैं । यह सुनकर, रामानुज स्वामीजी निर्णय करते हैं कि वे तिरुमला जायेंगे और उनके बाग का दर्शन करेंगे। वे तीव्रता से अपने तिरुवाय्मौली कालक्षेप (व्याख्यान) को पूर्ण करते हैं और तिरुमला की ओर प्रस्थान करते हैं।

वे कांचीपुरम मार्ग से होते हुए (देव पेरुमाल और तिरुक्कच्चि नम्बि/ कान्चिपूर्ण स्वामीजी का मंग्लाशासन करते हुए) तिरुपति पहुँचते हैं। अनंतालवान, अन्य श्रीवैष्णवों के साथ तल पर आकर रामानुज स्वामीजी का स्वागत करते हैं। रामानुज स्वामीजी पहले तो तिरुमला पर्वत पर चढ़ाई करने से यह कहते हुए मना कर देते हैं कि तिरुवेंकट पर्वत स्वयं आदिशेष का अवतार रूप है। परंतु अपने शिष्यों के बारम्बार यह प्रार्थना किये जाने पर कि यदि रामानुज स्वामीजी चढ़ाई नहीं करेंगे तो वे लोग चढ़ाई कैसे कर सकते हैं, रामानुज स्वामीजी सहमती देते हैं और अत्यंत श्रद्धा के साथ पर्वत पर चढ़ाई करते हैं। तिरुमलै नम्बि (शैलपूर्ण स्वामीजी) स्वयं तिरुमला के प्रवेशद्वार पर आते हैं और रामानुज स्वामीजी का स्वागत करते हैं। फिर रामानुज स्वामीजी “इरामानुसन्” बगीचे में जाते हैं जिसकी देखरेख अनंतालवान कर कहे थे और वहां पुष्पों के विविध प्रकारों को देखकर अति प्रसन्न होते हैं। तिरुमंगै आलवार (परकाल आलवार) द्वारा कहा गया है “वलर्थतदनाल पयन पेट्रेन्” (परकाल नायकी उद्घोषणा करती है कि वे अपने प्रिय तोते की देखभाल करके बहुत प्रसन्न है क्यूंकि तोता हर क्षण भगवान के नाम/चरित्र को दोहराता है), रामानुज स्वामीजी भी अनंतालवान की अत्यंत निष्ठा से बहुत प्रसन्न थे।

एक बार, जब अनंतालवान और उनकी गर्भवती पत्नी, बगीचे में एक तालाब बनाने के लिए कार्य कर रहे थे, भगवान स्वयं एक छोटे बालक के रूप में प्रकट होकर उनकी सहायता करने की प्रयास करते हैं। क्यूंकि अनंतालवान अपने आचार्य के आदेश को स्वयं पूरा करना चाहते थे और इसलिए वे उस बालक की सहायता लेने से मना कर देते हैं। परंतु अनंतालवान की पत्नी उनकी अनुपस्थिति में उस बालक की सहायता स्वीकार कर लेती है। उसे जानकार, अनंतालवान बहुत क्रोधित होते हैं और वे उस बालक का पीछा करते हैं और अंततः अपनी छड़ी उस पर फेंकते हैं। वह छड़ी उस बालक के ठोड़ी पर लगती है परंतु वह बालक मंदिर में पहुंचकर अदृश्य हो जाता है। मंदिर में स्वयं तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की ठोड़ी पर चोट के निशान दिखाई देता है और इसीलिए आज भी तिरुवेंकटमुदैयाँ की ठोड़ी पर घाव को शीतल करने के लिए पचई कर्पूरं (कपूर) लगाया जाता है।

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एक बार अनंतालवान को सांप ने काट लिया। जब उनके सहयोगी इस बात पर चिंतित होते हैं, वे सरलता से कहते हैं कि यदि सांप अधिक शक्तिशाली है, तो मैं यह शरीर त्यागकर, विरजा नदी में नहाकर परमपद में भगवान की सेवा करूँगा। और यदि मेरा शरीर अधिक शक्तिशाली है तो मैं यही तिरुवेंकटाचल में पूष्करिणी में नहाकर अपना कैंकर्य ज़ारी रखूँगा। उन्हें कैंकर्य इतना प्रिय था कि वे अपने शरीर का किंचित मात्र भी ध्यान नहीं रखते थे।

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एक बार अनंतालवान तिरुवेंकटाचल से प्रसाद का एक झोला, यात्रा करते हुए समीप के गाँव में ले जाते हैं। जब वे उसे खोलते हैं, वे उसमें कुछ चीटियों को देखते हैं, वे तुरंत अपने शिष्यों को निर्देश देते हैं कि उन चीटियों को पर्वत पर पुनः छोड़ आये। वे कहते हैं “क्यूंकि कुलशेखर आलवार ने उद्घोषणा की है कि वे (और भगवान के अन्य भक्तगण) तिरुमला में निवास करने के लिए कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, यह (चींटी) वही हो सकते हैं ,इसलिए हमें तिरुवेंकटाचल में इनके जीवन में बाधा नहीं डालनी चाहिए”।

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एक बार जब अनंतालवान एक माला बना रहे थे, तब तिरुवेंकटमुदैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) उन्हें अपनी सन्निधि में बुलाने के लिए किसी को भेजते हैं। अनंतालवान अपने माला बनाने का कैंकर्य संपन्न करने के पश्चाद वहां विलंब से पहुँचते हैं। तिरुवेंकटमुदैयाँ पूछते हैं , “आपको विलंब कैसे हो गया?”तब अनंतालवान कहते हैं “जबकि पुष्प खिल रहे थे, मैं माला पिरोना चाहता था, रामानुज स्वामीजी के दिए आदेश के फलस्वरूप अपने कैंकर्य के अतिरिक्त इस सन्निधि में करने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है”। भगवान पूछते हैं , “यदि मैं आपको इस स्थान से जाने के लिए कहूँ, तब? इस पर अनंतालवान कहते हैं “आप मुझसे थोड़े ही पहले तिरुमला में पधारे और मैं तो अपने आचार्य के आदेश पर यहाँ आया हूँ। आप मुझे जाने के लिए कैसे कह सकते है?”। भगवान अनंतालवान की महान आचार्य निष्ठा देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं।

अनंतालवान के निर्देश और महिमा को व्याख्यान में अनेक स्थानों पर दर्शाया गया है। अब हम उनमें से कुछ यहाँ देखते हैं।

  • पेरियालवार तिरुमोळि 4.4.1 – मणवाल मामुनिगल (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी) व्याख्यान – इस पासूर में, आलवार तिरुक्कोष्टियुर के श्रीवैष्णवों की बढाई करते हुए कहते हैं कि वे अपने आचार्य के प्रिय वचनों के अतिरिक्त और कोई वचन नहीं कहेंगे। इस संबंध में मामुनिगल, अनंतालवान की पराशर भट्टर के प्रति प्रीति को दर्शाते हैं (हालांकि भट्टर उनसे आयु में बहुत छोटे थे)। अपने अंतिम दिनों में, अनंतालवान किसी श्रीवैष्णव से पूछते हैं कि पराशर भट्टर को कौन सा नाम अति प्रिय है। वे कहते हैं कि भट्टर को नम्पेरुमाल के “अलगिय मणवालन” नाम के प्रति अत्यंत प्रीति है। अनंतालवान फिर कहते हैं “हालांकि पति का नाम उच्चारण करना उचित शिष्टाचार नहीं है, परंतु क्यूंकि भट्टर को यह नाम प्रिय है तब मैं वही कहूँगा” और “अलगिय मणवालन” कहते हुए वे परमपद की ओर प्रस्थान करते हैं। हालांकि अनंतालवान परमपद जाने से पहले रामानुज स्वामीजी का नाम कहना चाहते थे, परंतु जब उन्हें भट्टर की “अलगिय मणवालन” के प्रति प्रीति के बारे में सुना, उन्होंने वही नाम लिया।
  • नाच्चियार तिरुमोळि 7.2 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में, आण्डाल (गोदाम्बाजी) कहती है कि पाञ्चजन्य का जन्म सागर में हुआ, परंतु अंततः वे भगवान के दिव्य हस्तकमलों में पहुंचे। इसे समझाने के लिए पेरियावाच्चान पिल्लै, अनंतालवान और नन्जीयर (वेदांती स्वामीजी) पर आधारित एक द्रष्टांत बताते हैं। वेदांती स्वामीजी ने भट्टर द्वारा किये गए उनके परिवर्तन के बाद, अपनी संपत्ति को तीन भाग में विभाजित कर दिया, एक-एक भाग अपनी दोनों पत्नियों को दिया और एक भाग अपने आचार्य (भट्टर) के समक्ष ले आये। तदंतर उन्होंने सन्यासाश्रम को स्वीकार किया और अपने आचार्य की सेवा हेतु श्रीरंगम आ गये। यह सुनकर अनंतालवान ने उन्हें कहा “आप गृहस्थाश्रम में भली प्रकार से स्थित थे, आप आध्यात्मिक मामलों में सही समझ के साथ वहीँ रहकर आचार्य और भागवतों की सेवा कर सकते थे और अंतत: परमपद की ओर प्रस्थान करते। आपने सन्यासाश्रम स्वीकार क्यों किया?”। इस पर अन्य श्रीवैष्णवों ने पूछा तब क्या करना चाहिए? अनंतालवान फिर समझाते हैं कि श्रीवैष्णवों का तिरुमंत्र में जन्म (परमात्मा, जीवात्मा और उनके संबंध का ज्ञान होना चाहिए) और द्वय महामंत्र में पालन होना चाहिए (यह जानना कि भगवान ही उपाय (साधन) और उपेय (लक्ष्य) है और उसी प्रकार जीवन यापन करना)।
  • नाच्चियार तिरुमोळि 12.5 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासूर में, आण्डाल समझाती है कि कृष्ण भगवान को कालिया नाग पर नाचते हुए देखकर कैसे सभी गोप गोपियाँ अचेत हो गये। अनंतालवान, श्री रामानुज स्वामीजी से भेंट करने के लिए श्री नम्बि गुह दासर के साथ यात्रा कर रहे थे। श्रीरंगम पहुंचकर उन्होंने रामानुज स्वामीजी के कुछ एकांगी (कैंकर्य-परार) को देखा जिनके मस्तक मुंडे हुए थे और जो कावेरी नदी से नहाकर बाहर आ रहे थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि रामानुज स्वामीजी ने संसार का त्याग किया और परमपद प्रस्थान किया। यह सुनकर, नम्बि गुह दासर समीप के एक पेड़ पर से कूदकर आत्म हत्या करने के लिए उस पर चढ़ जाते हैं। उस समय अनंतालवान, नम्बि से कहते हैं कि रामानुज स्वामीजी के परमपद जाने के समाचार सुनकर जब आपके प्राण नहीं गये तो पेड़ से कूदने पर भी आपकी मृत्यु नहीं होगी, इससे केवल आपके पैरों में चोट लग जायेगी। यह घटना गोप और गोपियों के कृष्ण के प्रति लगाव को सुंदरता से समझाती है।
  • पेरुमाल तिरुमोळि 4.10 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पद में, कुलशेखर आलवार तिरुवेंकटेश्वर के प्रति अपना महान लगाव प्रदर्शित करते हैं। वे कहते हैं कि वे तिरुमला दिव्य पर्वत पर किसी भी रूप में निवास करना चाहते हैं। अनंतालवान समझाते हैं कि तिरुमला दिव्य पर्वत से संबंध प्राप्त करने के लिए उन्हें स्वयं तिरुवेंकटमुदैयाँ भी होना पड़े तो उन्हें आपत्ति नहीं।
  • पेरिय तिरुमोळि 5.5.1 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पद में, तिरुमंगै आलवार, परकाल नायकी के रूप में दिव्य देश के प्रति अपनी महान प्रीति दर्शाने के लिए श्री वेंकटेश भगवान को पुकारते हुए कहती है “वेंकटमे वेंकटमे”। नन्जीयर (श्री वेदांती स्वामीजी) बताते हैं की यह भट्टर द्वारा “नम्पेरुमाल” को अलगिय मणवालन और अनंतालवान द्वारा “तिरुवेंकटमुदैयाँ” को श्रीनिवास पुकारने के समान ही है – उनके इस प्रकार पुकारने से उन नामों के प्रति उनके प्रेम का पता चलता है।
  • तिरुवाय्मोळि 6.7.1 – नम्पिळ्ळै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – इस पद में, शठकोप आलवार, वैतमानिधि भगवान और तिरुक्कोलुर दिव्यदेश के प्रति अपनी महान प्रीति दर्शाते हैं। नम्पिळ्ळै एक घटना बताते हैं जहाँ अनंतालवान अपने दिव्य देश में रहकर वहीँ पर भगवान की सेवा करने के महत्व को समझाते हैं। एक बार अनंतालवान एक श्री वैष्णव से भेंट करते हैं जो चोला कुलान्तकन नामक एक गाँव में रहते थे और कृषि करते थे। वे उनसे पूछते हैं कि वे कहाँ से हैं, तो वह श्रीवैष्णव बताते कि वे तिरुक्कोलुर से आये हैं। अनंतालवान फिर उनसे पूछते हैं कि आपने अपना पैतृक स्थान क्यों छोड़ा? वह श्रीवैष्णव कहते हैं कि वे वहां कोई भी श्रम प्राप्त करने में असमर्थ थे इसलिए उन्होंने वह स्थान छोड़ दिया। उसके लिए, अनंतालवान कहते हैं, इस गाँव में आकर कृषि करने के स्थान पर आप तिरुक्कोलुर, जो भगवान और शठकोप आलवार दोनों को ही प्रिय है, वहां रहकर गधों को चरा कर धन अर्जित कर सकते थे और वहां रहते हुए उनकी सेवा भी कर सकते थे। वे दर्शाते हैं कि जीवात्मा के लिए इस संसार में, श्री वैष्णवों के साथ दिव्य देश में रहते हुए कैंकर्य करना सबसे उत्तम है।
  • तिरुवाय्मोळि 6.8.1 – नम्पिळ्ळै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – इस पद में, शठकोप आलवार, परांकुश नायकी के रूप में भगवान के वियोग-जनित दुःख को उनके सामने प्रकट करने के लिए एक पक्षी को दूत के रूप में भेजती है। उस समय आलवार कहते हैं कि दूत के रूप में सहायता करने वाले उस पक्षी को वे इस संसार और परमपद दोनों विभूतियां प्रदान कर देंगी (क्यूंकि परांकुश नायकी, भगवान की नायिका/पत्नी है, भगवान के सभी वस्तुओं पर उनका भी स्वामित्व है)। किसी के द्वारा यह पूछने पर कि यदि परांकुश नायकी पक्षी को सभी कुछ दे देंगी, तों वे स्वयं कहाँ रहेंगी?, अनंतालवान सुंदरता से कहते हैं “वे उस स्थान पर रहेंगी जो पक्षी प्रदान करेगा”।
  • तिरुवाय्मोळि 7.2.9 – नम्पिळ्ळै (कलिवैरीदास स्वामीजी) ईदू व्याख्यान – इस पासूर में, शठकोप आलवार भगवान के लिए कहते है “एन तिरुमगल सेर मारबन” अर्थात भगवान, श्री महालक्ष्मीजी को धारण करते हैं। आलवार के इन दिव्य वचनों के प्रति अत्यंत प्रीति दर्शाते हुए अनंतालवान ने अपनी पुत्री का नाम “एन तिरुमगल” रखा।
  • वार्तामाला – 345 –एक बार भट्टर अपने एक शिष्य को यह जानने के लिए कि एक श्री वैष्णव को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, अनंतालवान के पास भेजते हैं। वे अनंतालवान के निवास पर तदियाराधन (प्रसाद पाने) के समय पहुँचते हैं। क्यूंकि वह स्थान पूर्ण भरा हुआ था, वे सभी के प्रसाद पाने तक रुकते हैं। अनंतालवान उन्हें देखते हैं और उन्हें अंत में अपने साथ प्रसाद पाने के लिए आमंत्रित करते हैं। अनंतालवान उस श्री वैष्णव से उनके बारे में पूछते हैं तब वह कहते हैं कि वे भट्टर के शिष्य हैं और भट्टर ने उन्हें यहाँ यह जानने के लिए भेजा है कि एक श्रीवैष्णव को कैसा होना चाहिए। अनंतालवान कहते हैं “एक श्रीवैष्णव को सारस, मुर्गी, नमक और आपके समान होना चाहिए”-
    • सारस सबसे उत्तम मछली की खोज करता है और सिर्फ उसे ही चुनता है। उसी प्रकार, श्रीवैष्णवों को हर समय भगवान की ओर समर्पित रहना चाहिए और भागवत कैंकर्य, जो सबसे उत्तम वरदान स्वरूप है, उसे स्वीकार करना चाहिए।
    • मुर्गी मिट्टी को अलग करके चावल के दानों को चुनती है। उसी प्रकार, श्रीवैष्णवों को शास्त्र (जिसमें विभिन्न लोगों के लिए विभिन्न वस्तुओं का वर्णन है) को खोजकर केवल बहुमूल्य सिद्धांतों जैसे परगत स्वीकार्य, भागवत कैंकर्य, आदि को ही चुनना चाहिए और उनका अनुसरण करना चाहिए।
    • नमक खाद्य पदार्थ के साथ सूक्ष्मता से मिल जाता है और उसे स्वादिष्ट बनाता है। और नमक के अभाव को भी सुगमता से समझा जा सकता है। उसी प्रकार, श्रीवैष्णवों को अपना अहंकार त्यागकर अपनी उपस्थिति से अन्य श्रीवैष्णवों के जीवन में आनंद लाना चाहिए। और उन्हें इस प्रकार से व्यवहार करना चाहिए कि उनकी उनुपस्थिती में सभी उनके द्वारा किये गए अच्छे कार्यों को याद करे।
    • अंततः, आप (श्रीवैष्णव जिन्होंने यह प्रश्न पूछा था) यहाँ आये, सभी के प्रसाद ग्रहण करने की राह देखी और फिर अत्यंत विनम्रता से सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत के बारे में मुझसे पूछा। उसी प्रकार, श्रीवैष्णवों को दूसरों की प्रसन्नता का ध्यान रखना चाहिए और अपने कार्यों में विनम्र होना चाहिए।

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आज भी तिरुवेंकटमुदैयाँ द्वारा अनंतालवान का सम्मान किया जाता है। उनके अवतार दिवस (चैत्र,चित्रा) और तीर्थदिवस/ परमपदगमन दिवस (पूर्व फाल्गुनी) दोनों पर, तिरुवेंकटमुदैयाँ अनंतालवान के बाग़ में जाते है और बकुल पेड़ को (जिसके नीचे अनंतालवान के दिव्य शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था) अपनी माला और श्री शठकोप को प्रदान करते हैं।

अनंतालवान - तिरुमाला

अनंतालवान – तिरुमला

इस तरह हमने अनंतालवान के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और रामानुज स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

अनंतालवान की रचनओं को http://acharya.org/anandazhvar/index.html से प्राप्त किया जा सकता है।

अनंतालवान की तनियन:

अकिलात्म गुणावासं अज्ञान् तिमिरापहम्।
अश्रितानाम् सूशरणं वन्दे अनंतार्य देसिकम्।।

-अदियेन् वैष्णवी रामानुजदासी
-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

जन्म नक्षत्र: अश्विन, पूर्वाषाढा (श्रावण, मृगशीर्ष– जैसा उनकी तनियन से ज्ञात होता है)

अवतार स्थल: आलवार तिरुनगरी

आचार्य: एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी)

रचनाएँ: तिरुवाय्मोलि 6000 पद व्याख्यान

पिल्लान, पेरिय तिरुमलै नम्बि (शैलपूर्ण स्वामीजी) के पुत्र हैं और वे कुरुगेसर, कुरुगाथीनाथर नाम से भी जाने जाते हैं। एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) ने स्वयं उन्हें यह नाम दिया और उन्हें तिरुवाय्मोलि के प्रथम व्याख्यान, जो 6000 पडि के नाम से प्रसिद्ध है, लिखने का निर्देश दिया।

एम्पेरुमानार, पिल्लान को अपना मानस पुत्र (अभिमान पुत्र –प्रिय पुत्र) मानते थे। एक बार एम्पेरुमानार के बहुत से शिष्य पिल्लान के समक्ष जाते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे एम्पेरुमानार से तिरुवाय्मोलि के व्याख्यान लिखने के लिए प्रार्थना करें। पिल्लान, एम्पेरुमानार की सभा में जाते हैं, उन्हें दंडवत प्रणाम करते हैं और कहना प्रारंभ करते हैं। वे एम्पेरुमानार से कहते हैं “आपने श्री भाष्य की रचना की और सभी जगह यात्रा कर विशिष्टाद्वैत सिद्धांत की स्थापना की है। अब हम आपसे आलवारों के पासूर पर व्याख्यान की रचना करने और उनकी भी रक्षा (जिससे दूसरा कोई भी उसका अनर्थ न करें) करने की विनती करते हैं ”। ऐसा सुनकर एम्पेरुमानार कहते हैं “हाँ , यह आवश्यक है। परंतु यदि मैं आलवारों के पासूरों की व्याख्यान लिखूंगा, सीमित बुद्धि वाले लोग सोचेंगे कि आलवारों की रचनाओं में मात्र यही सब कुछ है। और मेरे उपरांत कोई भी इन पर व्याख्यान लिखने का सहस नहीं करेगा। यह आलवारों के महान रचनाओं के प्रति एक अपराध होगा जो अद्भुत दिव्य अर्थों से भरी है, जिन्हें भविष्य में बहुत से अधिकृत आचार्यों द्वारा उजागर किया जा सकता है। इसलिए मैं तुम्हें तिरुवाय्मोलि के प्रथम व्याख्यान की रचना करने के निर्देश देता हूँ, जो आकार में विष्णु पुराण के समान हो (6000 श्लोक– 6000 पद)”। इस तरह एम्पेरुमानार की आज्ञा से पिल्लान 6000 पडि व्याख्यान की रचना करते हैं , जिसकी शिक्षा बाद में भट्टर ने नन्जीयर को दी।

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एम्पेरुमानार(रामानुज स्वामीजी) की देखरेख और आशीर्वाद में पिल्लान का विवाह

पिल्लान, श्री भाष्य और भगवत विषय दोनों ही में श्रेष्ठ/निपुण थे। एक बार जब पिल्लान सिरुप्पुत्तुर में विराजे हुए थे, सोमासियाण्डान उनसे तीन बार श्री भाष्य की शिक्षा लेते हैं। सोमासियाण्डान, पिल्लान से कुछ बहुमूल्य निर्देश देने की प्रार्थना करते हैं और पिल्लान कहते हैं “आप अन्य सिद्धांतों को समझाने और हमारे सिद्धांत को श्री भाष्य के द्वारा स्थापित करने में निपुण हैं। इस पर अहंकार करने के बजाय सदा यही ध्यान करना कि एम्पेरुमानार के चरण कमल ही हर समय हमारा एकमात्र आश्रय है”।

एम्पेरुमानार परमपद प्रस्थान करते हुए, किडाम्बी आच्चान, किदाम्बी पेरुमाल, एन्गलालवान, नदात्तुर आलवान, आदि को निर्देश देते हैं कि वे सब पिल्लान के प्रति समर्पित रहें और पिल्लान से उन सभी का मार्गदर्शन करने के लिए कहते हैं । एम्पेरुमानार, भट्टर से पिल्लान सहित सभी का मार्गदर्शन करने और उनकी अनुपस्थिति में संप्रदाय का नेतृत्व करने के लिए कहते हैं। और क्यूंकि पिल्लान को स्वयं एम्पेरुमानार ने अपना पुत्र माना था, वे एम्पेरुमानार के सभी चरम कैंकर्य करने में अग्रणी हुए।

व्याख्यान में अनेको स्थानों पर तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान के यश को दर्शाया गया है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं –

  • नाच्चियार तिरुमोलि 10.6 – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान– यहाँ आण्डाल उस तोते की आराधना करती है, जो कृष्ण की तरह नृत्य करता है। अम्माणियालवान (एक आचार्य) अपने एक शिष्य को प्रणाम किया करते थे। वे कहते हैं कि क्यूंकि हमें श्री वैष्णवों की आराधना करना चाहिए और क्यूंकि हम अपने शिष्य को एक योग्य श्रीवैष्णव के रूप में जानते हैं, उनकी आराधना करना भी उचित ही है। नन्जीयर इस विषय में एक बात समझाते हैं कि यदि शिष्य पर्याप्त परिपक्व नहीं है, तों वह उसके लिए अहंकार का कारण बनता है और अपने अहंकार के कारण उस शिष्य का अपनी आध्यात्मिक प्रगति में पतन हो सकता है। परंतु पिल्लान समझाते हैं कि जब एक शिष्य अम्माणियालवान जैसे आचार्य द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करता है, वह स्वाभाविक रूप से पूरी तरह से शुद्ध हो जाएगा और वह शिष्य पूर्णतः अम्माणियालवान के आधीन होगा – इसलिए आचार्य का कार्य ही उचित है।
  • पेरिय तिरुमोलि 2.7.6 – पेरियवाच्चान् पिल्लै व्याख्यान – यहाँ परकाल नायकी (तिरुमंगै आलवार-युवती के भाव में) की माता अपने परिवार का संबोधन परकाल नायकी के परिवार के रूप में करती है (हमारा परिवार कहने के स्थान पर), क्यूंकि परकाल नायकी बहुत ही यशस्वी है। पिल्लान समझाते हैं कि यह ठीक ऐसा ही है जैसा नम्पेरुमाल स्वयं हमारे संप्रदाय को “एम्पेरुमानार (रामानुज) दर्शन” नाम देते हैं और श्री वैष्णवों को “रामानुज उडैयार”(जिनका संबंध रामानुज से है) कहकर संबोधित करते हैं । अपने भक्तों को स्वयं के स्थान पर श्री रामानुज के प्रति समर्पित देखना, भगवान को प्रिय है। जैसे कि एक सुंदर माला, मध्य में रत्न जड़ित होने से और भी सुंदर लगती है, उसी प्रकार हमारी श्री वैष्णव गुरुपरंपरा (https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2013/08/29/introduction-2/) भी एम्पेरुमानार की मध्य में उपस्थिति से और भी सुंदर और दिव्य दिखाई देती है।
  • तिरुवाय्मोलि 1.4.7 – नम्पिल्लै ईदू व्याख्यान– यहाँ नम्मालवार भगवान के विरह में हैं और भगवान की पुकार करते हुए कहते हैं “अरुलाथ तिरुमालार” अर्थात श्रीमन्नारायण, जो दयालु नहीं है (यह विरोधाभासी है क्यूंकि जब भगवान अम्माजी के साथ होते हैं वे सबसे अधिक दयालु होते हैं)। नन्जीयर इसे ऐसे समझाते हैं – आलवार कह रहे हैं “आप अम्माजी के साथ हैं, जो सबसे दयालु हैं परंतु फिर भी आप मुझे अपनी प्रत्यक्ष दर्शन का आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं ”। पिल्लान इसे पृथक रूप से देखते हुए समझाते हैं कि आलवार कह रहे हैं “भगवान अम्माजी के सौंदर्य के दर्शन में पूर्ण रूप से ध्यानमग्न हैं ; इसलिए वे अपने नेत्रों/विचारों को अन्यत्र ना ले जाते हुए मुझे दर्शन नहीं दे रहे हैं ”।
  • तिरुवाय्मोलि 6.9.9 – नम्पिल्लै ईदू व्याख्यान– आलवार भगवान से उन्हें इस संसार के दुखों से मुक्त करने और उन्हें परमपद में बुलाने की करुण पुकार करते हैं । अपने अंतिम दिनों में पिल्लान, आलवार के इन्हीं शब्दों को बराबर कहते हुए भगवान से प्रार्थना करते हैं। इसे देखकर, नन्जीयर बहुत दुखी होकर विलाप करते हैं। उस समय पिल्लान नन्जीयर से कहते हैं “आप क्यों रुदन करते हैं? क्या आपको लगता है कि परमपद का गौरवशाली जीवन जो मुझे मिलने वाला है वो इस जीवन से कमतर हैं? कृपया व्यथित होकर विलाप करना बंद कीजिये और मेरे लिए आनंद का अनुभव कीजिये”।

चरमोपय निर्णय (https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/charamopaya-nirnaya/) में यह द्रष्टांत समझाया गया है। जब उदयवर तिरुवाय्मोलि के अर्थ तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान को समझा रहे थे (जो उनके अभिमान पुत्र थे), पोलिग पोलिग पासूर समझाते हुए, पिल्लान परमानन्द और भावनाओं से भर जाते हैं। इसे देखकर, उदयवर उनसे इस भावनात्मक परिवर्तन का कारण पूछते हैं। पिल्लान कहते हैं “आलवार जयकार करते हुए कहते हैं ‘कलियुम केदुम कण्डू कोण्मिन‘ अर्थात उनके तिरुवुल्लम में आपके अवतार को देखकर कलि का भी नाश हो जायेगा। उनकी घोषणा के अनुसार, आपने भी तिरुवाय्मोलि समझाते हुए हर समय यह व्यक्त किया है कि आप वह महान आचार्य है। उसे सोचते हुए, मैं अपने आनंद और भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ हूँ। यह सोचकर कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ जो मेरा संबंध आप के साथ है (जो आलवार के दिव्य उद्घाटन के अनुसार सभी का उत्थान कर रहे हैं) और प्रत्यक्ष दिव्य आप के द्वारा तिरुवाय्मोलि के दिव्य अर्थों का अध्ययन कर रहा हूँ”। इसे  सुनकर, उदयवर बहुत प्रसन्न होते हैं। उस रात्री, वे पिल्लान को आमंत्रित करते हैं और उन्हें पेरारुलालन (उदयवर के तिरुवाराधन/अर्चा भगवान) के समक्ष लाकर उनके चरण कमल पिल्लान के सिर पर रखते हैं और उन्हें बताते हैं “सदा इन चरण कमलों के शरण रहना; और जो तुम्हें समर्पित हो उन्हें भी इन्हीं का आश्रय दिखाना। कल से, आप तिरुवाय्मोलि पर श्री विष्णु पुराण की शैली (विष्णु पुराण में 6000 श्लोक है) में अर्थात 6000 पद में व्याख्यान लिखना प्रारम्भ करना”। इस तरह उदयवर स्वयं अपना उत्थाराकत्वम पिल्लान को व्यक्त करते हैं जो उनके बहुत प्रिय हैं।

श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, पिल्लै लोकाचार्य दर्शाते हैं कि पिल्लान ने हमारे संप्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया है-

  • सूत्र 122 – भक्ति योग की परिसीमा – एक स्वर्ण पात्र जो शुद्ध जल से भरा हो, उसमें यदि जरा सी सुरा (या कोई भी विषैला पदार्थ) मिला दिया जाये तों वह जल पीने योग्य नहीं रहता। उसी प्रकार, जब भक्ति (शुद्ध जल) से भरे जीवात्मा (स्वर्ण पात्र), में किंचित मात्र भी अहंकार (विष) मिल जाता है तो वह स्वरुप विरोधी हो जाता है। हालाँकि यह माना जाता है कि भक्ति में कोई अहंकार नहीं होता, परंतु यह अपेक्षा करना असंभव है क्यूंकि परिभाषा ही से भक्ति योग का अर्थ है एक प्रक्रिया जिसका एक कर्ता है और उस कर्ता का मनोभाव है कि वह भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई कार्य कर रहा है। इसलिए, पिल्लान कहते हैं कि भक्ति योग जीवात्मा के लिए स्वाभाविक नहीं है और केवल प्रपत्ति (सम्पूर्ण समर्पण – भगवान को एक मात्र उपाय स्वीकार करना) ही जीवात्मा के लिए भगवान को प्राप्त करने की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
  • सूत्र 177 – परगत स्वीकार करने की महिमा– अर्थात, भगवान अपनी निर्हेतुक कृपा से जीवात्मा पर कृपा करते हैं और स्वयं भगवान ही अपने श्रम से हमें चरम लक्ष्य (कैंकर्य) की प्राप्ति कराते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जीवात्मा द्वारा किया गया कोई भी स्व-प्रयास अवांछित परिणाम को देने वाला है, क्यूंकि स्वतंत्रता और स्व-प्रयासों में प्रवत्त होना जीवात्मा का स्वाभाविक लक्षण नहीं है। इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझाया गया है: जब हम स्व-प्रयासों से भगवान को प्राप्त करते हैं, वह उस तरह होता है जैसे बाज़ार से ख़रीदा हुआ दूध बालक को देना। परंतु जब हम भगवान को भगवान की कृपा से प्राप्त करते हैं, यह बालक को माता का दूध देने के समान है। इसलिए, परगत स्वीकार करना माता के दूध के सामान है, जो बालक के पोषण के लिए सबसे प्राकृतिक आहार है।

मामुनिगल अपनी उपदेश रत्ना माला (पासूर 40 और 41) में दर्शाते हैं– तिरुवाय्मोलि के 5 व्याख्यानों के बिना, हम तिरुवाय्मोलि के सही अर्थों को कभी नहीं समझ सकते हैं। मामुनिगल, पिल्लान की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि “तेल्लारुम ज्ञानथ तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान” अर्थात पिल्लान को भगवत विषय का सम्पूर्ण और स्पष्ट ज्ञान है। वे उनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि पिल्लान ने तिरुवाय्मोलि के दिव्य अर्थों को अत्यंत प्रेम से दर्शाया है और उनका व्याख्यान अत्यंत रस से किया है। तदपश्चाद नन्जीयर ने भट्टर के आदेश पर 9000 पद की रचना की, वदुक्कू तिरुविधि पिल्लै ने नम्पिल्लै के कालक्षेप को 36000 पद में अभिलिखित किया, पेरियवाच्चान पिल्लै ने नम्पिल्लै के आदेश पर 24000 पद की रचना की और वादि केसरी मणवाल जीयर ने तिरुवाय्मोलि पसूरों के शब्दशः अर्थों को समझाते हुए 12000 पद की रचना की।

इस तरह हमने तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान की तनियन (जो भगवत विषय कालक्षेप के साथ कही जाती है):

द्राविडगम् सारग्यम् रामानुज पदाश्रितम।
सुदियम कुरुगेसार्यम नमामि शिरसान्हवं।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

आधार : https://guruparamparai.wordpress.com/2013/04/14/thirukkurugaippiran-pillan/

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