तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

जन्म नक्षत्र: अश्विन, पूर्वाषाढा (श्रावण, मृगशीर्ष– जैसा उनकी तनियन से ज्ञात होता है)

अवतार स्थल: आलवार तिरुनगरी

आचार्य: एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी)

रचनाएँ: तिरुवाय्मोलि 6000 पद व्याख्यान

पिल्लान, पेरिय तिरुमलै नम्बि (शैलपूर्ण स्वामीजी) के पुत्र हैं और वे कुरुगेसर, कुरुगाथीनाथर नाम से भी जाने जाते हैं। एम्पेरुमानार (रामानुज स्वामीजी) ने स्वयं उन्हें यह नाम दिया और उन्हें तिरुवाय्मोलि के प्रथम व्याख्यान, जो 6000 पडि के नाम से प्रसिद्ध है, लिखने का निर्देश दिया।

एम्पेरुमानार, पिल्लान को अपना मानस पुत्र (अभिमान पुत्र –प्रिय पुत्र) मानते थे। एक बार एम्पेरुमानार के बहुत से शिष्य पिल्लान के समक्ष जाते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे एम्पेरुमानार से तिरुवाय्मोलि के व्याख्यान लिखने के लिए प्रार्थना करें। पिल्लान, एम्पेरुमानार की सभा में जाते हैं, उन्हें दंडवत प्रणाम करते हैं और कहना प्रारंभ करते हैं। वे एम्पेरुमानार से कहते हैं “आपने श्री भाष्य की रचना की और सभी जगह यात्रा कर विशिष्टाद्वैत सिद्धांत की स्थापना की है। अब हम आपसे आलवारों के पासूर पर व्याख्यान की रचना करने और उनकी भी रक्षा (जिससे दूसरा कोई भी उसका अनर्थ न करें) करने की विनती करते हैं ”। ऐसा सुनकर एम्पेरुमानार कहते हैं “हाँ , यह आवश्यक है। परंतु यदि मैं आलवारों के पासूरों की व्याख्यान लिखूंगा, सीमित बुद्धि वाले लोग सोचेंगे कि आलवारों की रचनाओं में मात्र यही सब कुछ है। और मेरे उपरांत कोई भी इन पर व्याख्यान लिखने का सहस नहीं करेगा। यह आलवारों के महान रचनाओं के प्रति एक अपराध होगा जो अद्भुत दिव्य अर्थों से भरी है, जिन्हें भविष्य में बहुत से अधिकृत आचार्यों द्वारा उजागर किया जा सकता है। इसलिए मैं तुम्हें तिरुवाय्मोलि के प्रथम व्याख्यान की रचना करने के निर्देश देता हूँ, जो आकार में विष्णु पुराण के समान हो (6000 श्लोक– 6000 पद)”। इस तरह एम्पेरुमानार की आज्ञा से पिल्लान 6000 पडि व्याख्यान की रचना करते हैं , जिसकी शिक्षा बाद में भट्टर ने नन्जीयर को दी।

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एम्पेरुमानार(रामानुज स्वामीजी) की देखरेख और आशीर्वाद में पिल्लान का विवाह

पिल्लान, श्री भाष्य और भगवत विषय दोनों ही में श्रेष्ठ/निपुण थे। एक बार जब पिल्लान सिरुप्पुत्तुर में विराजे हुए थे, सोमासियाण्डान उनसे तीन बार श्री भाष्य की शिक्षा लेते हैं। सोमासियाण्डान, पिल्लान से कुछ बहुमूल्य निर्देश देने की प्रार्थना करते हैं और पिल्लान कहते हैं “आप अन्य सिद्धांतों को समझाने और हमारे सिद्धांत को श्री भाष्य के द्वारा स्थापित करने में निपुण हैं। इस पर अहंकार करने के बजाय सदा यही ध्यान करना कि एम्पेरुमानार के चरण कमल ही हर समय हमारा एकमात्र आश्रय है”।

एम्पेरुमानार परमपद प्रस्थान करते हुए, किडाम्बी आच्चान, किदाम्बी पेरुमाल, एन्गलालवान, नदात्तुर आलवान, आदि को निर्देश देते हैं कि वे सब पिल्लान के प्रति समर्पित रहें और पिल्लान से उन सभी का मार्गदर्शन करने के लिए कहते हैं । एम्पेरुमानार, भट्टर से पिल्लान सहित सभी का मार्गदर्शन करने और उनकी अनुपस्थिति में संप्रदाय का नेतृत्व करने के लिए कहते हैं। और क्यूंकि पिल्लान को स्वयं एम्पेरुमानार ने अपना पुत्र माना था, वे एम्पेरुमानार के सभी चरम कैंकर्य करने में अग्रणी हुए।

व्याख्यान में अनेको स्थानों पर तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान के यश को दर्शाया गया है। उनमें से कुछ हम अब देखते हैं –

  • नाच्चियार तिरुमोलि 10.6 – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान– यहाँ आण्डाल उस तोते की आराधना करती है, जो कृष्ण की तरह नृत्य करता है। अम्माणियालवान (एक आचार्य) अपने एक शिष्य को प्रणाम किया करते थे। वे कहते हैं कि क्यूंकि हमें श्री वैष्णवों की आराधना करना चाहिए और क्यूंकि हम अपने शिष्य को एक योग्य श्रीवैष्णव के रूप में जानते हैं, उनकी आराधना करना भी उचित ही है। नन्जीयर इस विषय में एक बात समझाते हैं कि यदि शिष्य पर्याप्त परिपक्व नहीं है, तों वह उसके लिए अहंकार का कारण बनता है और अपने अहंकार के कारण उस शिष्य का अपनी आध्यात्मिक प्रगति में पतन हो सकता है। परंतु पिल्लान समझाते हैं कि जब एक शिष्य अम्माणियालवान जैसे आचार्य द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करता है, वह स्वाभाविक रूप से पूरी तरह से शुद्ध हो जाएगा और वह शिष्य पूर्णतः अम्माणियालवान के आधीन होगा – इसलिए आचार्य का कार्य ही उचित है।
  • पेरिय तिरुमोलि 2.7.6 – पेरियवाच्चान् पिल्लै व्याख्यान – यहाँ परकाल नायकी (तिरुमंगै आलवार-युवती के भाव में) की माता अपने परिवार का संबोधन परकाल नायकी के परिवार के रूप में करती है (हमारा परिवार कहने के स्थान पर), क्यूंकि परकाल नायकी बहुत ही यशस्वी है। पिल्लान समझाते हैं कि यह ठीक ऐसा ही है जैसा नम्पेरुमाल स्वयं हमारे संप्रदाय को “एम्पेरुमानार (रामानुज) दर्शन” नाम देते हैं और श्री वैष्णवों को “रामानुज उडैयार”(जिनका संबंध रामानुज से है) कहकर संबोधित करते हैं । अपने भक्तों को स्वयं के स्थान पर श्री रामानुज के प्रति समर्पित देखना, भगवान को प्रिय है। जैसे कि एक सुंदर माला, मध्य में रत्न जड़ित होने से और भी सुंदर लगती है, उसी प्रकार हमारी श्री वैष्णव गुरुपरंपरा (https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2013/08/29/introduction-2/) भी एम्पेरुमानार की मध्य में उपस्थिति से और भी सुंदर और दिव्य दिखाई देती है।
  • तिरुवाय्मोलि 1.4.7 – नम्पिल्लै ईदू व्याख्यान– यहाँ नम्मालवार भगवान के विरह में हैं और भगवान की पुकार करते हुए कहते हैं “अरुलाथ तिरुमालार” अर्थात श्रीमन्नारायण, जो दयालु नहीं है (यह विरोधाभासी है क्यूंकि जब भगवान अम्माजी के साथ होते हैं वे सबसे अधिक दयालु होते हैं)। नन्जीयर इसे ऐसे समझाते हैं – आलवार कह रहे हैं “आप अम्माजी के साथ हैं, जो सबसे दयालु हैं परंतु फिर भी आप मुझे अपनी प्रत्यक्ष दर्शन का आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं ”। पिल्लान इसे पृथक रूप से देखते हुए समझाते हैं कि आलवार कह रहे हैं “भगवान अम्माजी के सौंदर्य के दर्शन में पूर्ण रूप से ध्यानमग्न हैं ; इसलिए वे अपने नेत्रों/विचारों को अन्यत्र ना ले जाते हुए मुझे दर्शन नहीं दे रहे हैं ”।
  • तिरुवाय्मोलि 6.9.9 – नम्पिल्लै ईदू व्याख्यान– आलवार भगवान से उन्हें इस संसार के दुखों से मुक्त करने और उन्हें परमपद में बुलाने की करुण पुकार करते हैं । अपने अंतिम दिनों में पिल्लान, आलवार के इन्हीं शब्दों को बराबर कहते हुए भगवान से प्रार्थना करते हैं। इसे देखकर, नन्जीयर बहुत दुखी होकर विलाप करते हैं। उस समय पिल्लान नन्जीयर से कहते हैं “आप क्यों रुदन करते हैं? क्या आपको लगता है कि परमपद का गौरवशाली जीवन जो मुझे मिलने वाला है वो इस जीवन से कमतर हैं? कृपया व्यथित होकर विलाप करना बंद कीजिये और मेरे लिए आनंद का अनुभव कीजिये”।

चरमोपय निर्णय (https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/charamopaya-nirnaya/) में यह द्रष्टांत समझाया गया है। जब उदयवर तिरुवाय्मोलि के अर्थ तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान को समझा रहे थे (जो उनके अभिमान पुत्र थे), पोलिग पोलिग पासूर समझाते हुए, पिल्लान परमानन्द और भावनाओं से भर जाते हैं। इसे देखकर, उदयवर उनसे इस भावनात्मक परिवर्तन का कारण पूछते हैं। पिल्लान कहते हैं “आलवार जयकार करते हुए कहते हैं ‘कलियुम केदुम कण्डू कोण्मिन‘ अर्थात उनके तिरुवुल्लम में आपके अवतार को देखकर कलि का भी नाश हो जायेगा। उनकी घोषणा के अनुसार, आपने भी तिरुवाय्मोलि समझाते हुए हर समय यह व्यक्त किया है कि आप वह महान आचार्य है। उसे सोचते हुए, मैं अपने आनंद और भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ हूँ। यह सोचकर कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ जो मेरा संबंध आप के साथ है (जो आलवार के दिव्य उद्घाटन के अनुसार सभी का उत्थान कर रहे हैं) और प्रत्यक्ष दिव्य आप के द्वारा तिरुवाय्मोलि के दिव्य अर्थों का अध्ययन कर रहा हूँ”। इसे  सुनकर, उदयवर बहुत प्रसन्न होते हैं। उस रात्री, वे पिल्लान को आमंत्रित करते हैं और उन्हें पेरारुलालन (उदयवर के तिरुवाराधन/अर्चा भगवान) के समक्ष लाकर उनके चरण कमल पिल्लान के सिर पर रखते हैं और उन्हें बताते हैं “सदा इन चरण कमलों के शरण रहना; और जो तुम्हें समर्पित हो उन्हें भी इन्हीं का आश्रय दिखाना। कल से, आप तिरुवाय्मोलि पर श्री विष्णु पुराण की शैली (विष्णु पुराण में 6000 श्लोक है) में अर्थात 6000 पद में व्याख्यान लिखना प्रारम्भ करना”। इस तरह उदयवर स्वयं अपना उत्थाराकत्वम पिल्लान को व्यक्त करते हैं जो उनके बहुत प्रिय हैं।

श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, पिल्लै लोकाचार्य दर्शाते हैं कि पिल्लान ने हमारे संप्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया है-

  • सूत्र 122 – भक्ति योग की परिसीमा – एक स्वर्ण पात्र जो शुद्ध जल से भरा हो, उसमें यदि जरा सी सुरा (या कोई भी विषैला पदार्थ) मिला दिया जाये तों वह जल पीने योग्य नहीं रहता। उसी प्रकार, जब भक्ति (शुद्ध जल) से भरे जीवात्मा (स्वर्ण पात्र), में किंचित मात्र भी अहंकार (विष) मिल जाता है तो वह स्वरुप विरोधी हो जाता है। हालाँकि यह माना जाता है कि भक्ति में कोई अहंकार नहीं होता, परंतु यह अपेक्षा करना असंभव है क्यूंकि परिभाषा ही से भक्ति योग का अर्थ है एक प्रक्रिया जिसका एक कर्ता है और उस कर्ता का मनोभाव है कि वह भगवान को प्रसन्न करने के लिए कोई कार्य कर रहा है। इसलिए, पिल्लान कहते हैं कि भक्ति योग जीवात्मा के लिए स्वाभाविक नहीं है और केवल प्रपत्ति (सम्पूर्ण समर्पण – भगवान को एक मात्र उपाय स्वीकार करना) ही जीवात्मा के लिए भगवान को प्राप्त करने की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
  • सूत्र 177 – परगत स्वीकार करने की महिमा– अर्थात, भगवान अपनी निर्हेतुक कृपा से जीवात्मा पर कृपा करते हैं और स्वयं भगवान ही अपने श्रम से हमें चरम लक्ष्य (कैंकर्य) की प्राप्ति कराते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जीवात्मा द्वारा किया गया कोई भी स्व-प्रयास अवांछित परिणाम को देने वाला है, क्यूंकि स्वतंत्रता और स्व-प्रयासों में प्रवत्त होना जीवात्मा का स्वाभाविक लक्षण नहीं है। इसे निम्न उदाहरण द्वारा समझाया गया है: जब हम स्व-प्रयासों से भगवान को प्राप्त करते हैं, वह उस तरह होता है जैसे बाज़ार से ख़रीदा हुआ दूध बालक को देना। परंतु जब हम भगवान को भगवान की कृपा से प्राप्त करते हैं, यह बालक को माता का दूध देने के समान है। इसलिए, परगत स्वीकार करना माता के दूध के सामान है, जो बालक के पोषण के लिए सबसे प्राकृतिक आहार है।

मामुनिगल अपनी उपदेश रत्ना माला (पासूर 40 और 41) में दर्शाते हैं– तिरुवाय्मोलि के 5 व्याख्यानों के बिना, हम तिरुवाय्मोलि के सही अर्थों को कभी नहीं समझ सकते हैं। मामुनिगल, पिल्लान की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि “तेल्लारुम ज्ञानथ तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान” अर्थात पिल्लान को भगवत विषय का सम्पूर्ण और स्पष्ट ज्ञान है। वे उनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि पिल्लान ने तिरुवाय्मोलि के दिव्य अर्थों को अत्यंत प्रेम से दर्शाया है और उनका व्याख्यान अत्यंत रस से किया है। तदपश्चाद नन्जीयर ने भट्टर के आदेश पर 9000 पद की रचना की, वदुक्कू तिरुविधि पिल्लै ने नम्पिल्लै के कालक्षेप को 36000 पद में अभिलिखित किया, पेरियवाच्चान पिल्लै ने नम्पिल्लै के आदेश पर 24000 पद की रचना की और वादि केसरी मणवाल जीयर ने तिरुवाय्मोलि पसूरों के शब्दशः अर्थों को समझाते हुए 12000 पद की रचना की।

इस तरह हमने तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे भागवत निष्ठा में पूर्णतः स्थित थे और एम्पेरुमानार के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान की तनियन (जो भगवत विषय कालक्षेप के साथ कही जाती है):

द्राविडगम् सारग्यम् रामानुज पदाश्रितम।
सुदियम कुरुगेसार्यम नमामि शिरसान्हवं।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

आधार : https://guruparamparai.wordpress.com/2013/04/14/thirukkurugaippiran-pillan/

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