नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

nampillai-goshti1श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी- श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी बायें से तीसरे

तिरुनक्षत्र: अश्विनी, धनिष्ठा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: उनके पिता (भट्टर स्वामीजी), श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी

शिष्य: वलमझगियार

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी, पिष्टपसु निर्णयम, अष्टाक्षर दीपिकै,   रहस्य त्रय, द्वय पीतक्कट्टु, तत्त्व विवरणम, श्रीवत्स विंशति, आदि।

वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र या पोते हैं। उनका नाम उत्तण्दा भट्टर रखा गया और तत्पश्चात वे नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर स्वामीजी नाम से प्रसिद्ध हुए। ध्यान देना: पेरिय तिरुमुडी अडैवु में यह लिखा गया है कि वे श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र हैं और ६००० पड़ी गुरु परम्परा प्रभावं में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का पोता कहा गया है। पट्टोलै में उन्हें श्रीवेदव्यास भट्टर का परपोता कहा गया है। उनकी पहचान के बारें में बहुत सही जानकारी कहीं भी नहीं है परंतु वें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के अति प्रिय शिष्य हुये।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का समय श्रारंगम में श्रीवैष्णवों के लिये बहुत आनंदमय और सुनहरा समय कहा गया है निरन्तर भगवद् अनुभव के कारण बिना कोई बाधा के, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के बहुत शिष्य और अनुयायी थे जो उनके कालक्षेप में नियमित से उपस्थित होते थे। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति ज्यादा अच्छा भाव नहीं था। अमीर परिवार से होने के कारण उनमे अभिमान आ गया था और प्रारम्भ में वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का आदर भी नहीं करते थे।

एक बार श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी राजा के दरबार में जा रहे थे। राह में वे श्रीपिन्बळगिय पेरुमाल जीयर से मिलते हैं और उन्हें भी राजा के दरबार में चलने के लिये न्योता देते हैं। क्योंकि उनके पारिवारिक परम्परा के कारण जीयर स्वामीजी को भट्टर स्वामीजी के परिवार के प्रति आदर था इसलिये वह उनके साथ चले गए। राजा ने उनको सम्मान देकर उनके हिसाब से आसन दिया। क्योंकि राजा अच्छा शिक्षित था भट्टर की समझधारी परखना चाहते थे और उन्हें श्रीरामायण से एक प्रश्न पूछा। वे कहते हैं “श्रीराम स्वयं कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। परन्तु श्रीजटायुजी के अंतिम समय में श्रीराम यह मंगल कामना करते हैं कि वह श्रीवैकुंठ पहुँच जाये। यह अंतर्विरोधी है?”। भट्टर शान्त हो गये और कुछ भी अच्छा अर्थ सहित न समझा सके। कुछ कार्य के कारण राजा का ध्यान दूसरी तरफ चला गया। उस समय भट्टर ने जीयर स्वामीजी के पास जा कर पूछा “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इसे कैसे समझाते थे?”। जीयर उत्तर देते हैं “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी” इसे ‘सत्येना लोकान जयति’ श्लोक से समझाते हैं| इसका अर्थ है, एक पूर्ण सत्यवादि मनुष्य सभी संसार का नियंत्रण कर सकता है – इसलिये केवल उनके सच्चाई के ही कारण वह संसार पर विजयी हो सकते हैं। जब राजा पुन: इधर ध्यान करते हैं ,भट्टर जो समझदार थे , राजा को यह बात समझाते हैं और राजा उसी क्षण उस तत्व को स्वीकृत कर भट्टर का बहुत धन के साथ सम्मान करते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति कृतज्ञ होकर भट्टर , जीयर को उन्हें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से जोड़ने के लिये कहते हैं और उसी क्षण श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर वह राजा द्वारा प्रदान सारा धन श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। भट्टर, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “मैंने यह सारा धन आपके केवल १ वर्णन से प्राप्त किया है” और सारा धन उन्हें अर्पण कर देते हैं। इसके पश्चात वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “इतने समय तक मैं आपका अमूल्य साथ / संचालन से वंचित रहा। अभी से मैं आपकी ही सेवा करूँगा और आपसे सम्प्रदाय के तत्त्वों को सीखूँगा”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को गले लगाते हैं और सम्प्रदाय के तत्वों को सिखाते हैं।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को पूरी तरह श्रीसहस्त्रगीति का पाठ सिखाते हैं। भट्टर उसे सुबह सुनते अर्थ पर विचार कर हर रात में विस्तार से दस्तावेज बनाते। एक बार उपदेश समाप्त हो जाने के बाद वे उस व्याख्यान को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी को अच्छी तरह से देखते हैं (जो श्रीमहाभारत की तरह लम्बी है)। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी घबरा जाते हैं कि अगर इतने विस्तार से व्याख्या है तो लोग गुरु शिष्य के सीखने / सिखाने के तरीके को भूलकर , ग्रन्थ वाचन कर स्वयं ही किसी अंतिम निर्णय पर आ जायेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को समझाते हैं कि जब पिल्लान ६००० पड़ी व्याख्यान किये (विष्णुपुराण जितना बड़ा) तब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी से आज्ञा ली थी। परन्तु यहाँ भट्टर ने श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से व्याख्यान लिखने के लिये आज्ञा नहीं ली। हालाकि भट्टर ने कहा उन्होंने केवल दस्तावेज बनाया है जो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने कहा है|उन्होंने स्वयं अपने मन से कुछ नहीं लिखा। अन्त में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ग्रन्थ के प्रकाशन को न माने, इसको नष्ट कर दिया।

(ध्यान देना: यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में इस घटना को पहचाना गया कि जब आचार्य का परमपद होता है तो शिष्य / पुत्र को उनका सर मुंड़ाना होता है और बाकि और जो शिष्य नहीं हैं उन्हें मुख और शरीर के केश निकालना होता है। जब श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी परमपद को प्रस्थान करते हैं, श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी अपना सर मुंड़ाते हैं जैसे उनके बाकि शिष्य को करना चाहिये। भट्टर के एक भाई यह देखकर दु:खी होते हैं और उनसे शिकायत करते हैं यह कहकर कि श्रीकुरेश स्वामीजी के परिवार में जन्म लेकर क्यों कोई श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के लिये सर मुंड़ाता है। भट्टर अपने भाई को व्यंग्यात्मक ढंग से उत्थर देते हैं “ओ! मैंने श्रीकुरेश स्वामीजी के परम्परा का अपमान किया है। अब आप इसे कैसे सुधारेंगे?”। भट्टर के भाई ऐसे व्यंग्यात्मक शब्द ग्रहण नहीं कर सके और श्रीरंगनाथ भगवान के पास जाकर उनकी इस कार्य के लिये शिकायत करते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान भट्टर को बुलाकर अर्चक के जरिये पूछते हैं कि “जब मैं जीवित हूँ तुमने ऐसा क्यों किया?” (श्रीरंगनाथ भगवान अपने आप को पराशर भट्टर और उनके वंश के पिता मानते हैं)। भट्टर उत्थर देते हैं कि “कृपया मेरे इस अपचार को क्षमा करें”। और आगे कहते हैं “असल में मुझे तो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति सम्पूर्ण समर्पण होना चाहिये था क्योंकि यह प्राकृतिक है जो भी श्रीकुरेश स्वामीजी (श्रीवैष्णव के प्रति समर्पण) के वंश से आता है वह मुख और शरीर के केश निकालता है। बल्कि मैंने केवल अपना सर मुंडाया जो यह दिखाता है कि मैंने एक शिष्य / पुत्र के नाते बहुत कम अनुष्ठान किया है । क्या मेरे थोड़ा सा आदर के कारण आप नाराज हैं?” भट्टर का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति समर्पण देखकर श्रीरंगनाथ भगवान बहुत खुश होते हैं और भट्टर को तीर्थ, पुष्प माला और वस्त्र के साथ सम्मान करते हैं। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी की ऐसी महिमा थी।

इन व्याख्यानों में श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी शामिल घटना बतायी गयी है। इसे हम अब देखेंगे:

श्रीसहस्त्रगीति – ९.३ – श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ईडु प्रवेसं (प्रस्तावना) – इस पद में श्रीशठकोप स्वामीजी नारायण नम: (और मन्त्र) कि महिमा बताते हैं। मुख्य ३ व्यापक मन्त्र है (वह मन्त्र जो भगवान कि सर्व उपस्थिती दर्शाता है) वह है अष्टाक्षर (ॐ नम: नारायणाय), शदक्षरम (ॐ नम: विष्णवे) और ध्वाधसाक्षारम(ॐ नम: भगवते वासुदेवाय)। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि प्रणवम का अर्थ, नम: का अर्थ, भगवान का सर्व उपस्थिती आदि सभी ३ व्यापक मंत्रों में बताया गया है परन्तु आल्वारों के समीप तो नारायण मन्त्र हीं है। ध्यान: नारायण कि महत्वता मुमुक्षुप्पड़ी के शुरुवात में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बोलते हैं।

वार्ता माला में भी श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी से संबन्धित कुछ घटनाये हैं।

२१६ – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी एक बहुत सुन्दर वार्तालाप श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी और श्रीपश्चात् सुन्दर देशिक स्वामीजी के बीच अवतरण किया। देशिक स्वामीजी यह प्रश्न पूछते हैं कि “सभी मुमुक्षु आल्वार जैसे होने चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और भगवान के अनुभव में हीं रहना)। परन्तु फिर भी हममे में सांसारिक इच्छा होती है। हमें इसका परिणाम (परमपद में कैंकर्य प्राप्ति) कैसे प्राप्त होगा जो आल्वारों को प्राप्त हुआ?” श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते हैं “हालाँकी हमें वहीं उन्नति प्राप्त नहीं होगी जो आल्वारों को प्राप्त हुयी परन्तु अपने आचार्य कृपा से जो पवित्र है, भगवान हमारे मरने और परमपद पहूंचने से पहिले वही भाव (आल्वारों जैसी) हमारे में भी प्रगट करेंगे । इसलिये हमारे परमपद पहूंचने से पूर्व हम पवित्र हो जाएँगे और निरंतर भगवान का कैंकर्य करने की चाह रहेगी”।.

४१० – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी यह समझाते हैं कि एक श्रीवैष्णव को कैसे होना चाहिये:

संसारियों का दोष देखते समय उनको सुधारने के लिये हम भगवान की तरह उतने सक्षम नहीं हैं इसीलिए उन्हें अनदेखा रहना चाहिये।

सात्विक जनों (श्रीवैष्णवों) में दोष देखते समय, क्योंकि वे पूरी तरह भगवान पर निर्भर हैं वे भगवान की कृपा से अपने को दोष मुक्त करने की क्षमता रखते हैं। हमे उन्हें उनदेखा रहना चाहिये।

जैसे कोई व्यक्ति अपने शरीर पर रसायनिक पदार्थ लगा लेता है तब अग्नि लगने पर भी उसे चोट नहीं लग सकती है वैसे ही हमें भगवद् ज्ञान से ढके हुए रहना चाहिये ताकि सांसारिक इच्छा और मुद्दों से हम प्रभावित नहीं हो सके।

हममें ज्ञान के दो पहलु होनी चाहिये- १) हमे परमपद पहुँचने की बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये जो पूर्णत: अध्यात्मिक है और २) हमे इस संसार बन्धन से छूटने की भी बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये (जो अज्ञानता का स्थान है)। अभी तक, इस संसार के बारे मे हमारा ज्ञान नादानी की अवस्था जैसे रहना बहुत जरूरी है, परंतु अगर हमे इस संसार से थोडासा भी लगाव रहा तो वह हमे नीचे खींच लेगा और हमे इस संसार मे ही रख लेगा।

अत: हमने श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी के जीवन के सुन्दर अंश देखे। वे बहुत बड़े विद्वान और श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। हम भगवान के चरण कमलों में यह प्रार्थना करते हैं कि हममें भी थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी तनियन :

लोकाचार्य पदासक्तं मध्यवीधि निवासिनं ।
श्रीवत्सचिन्नवंशाब्दिसोमम् भट्टारार्यम् आश्रये ।।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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Disciple of SrImath paramahamsa ithyAdhi pattarpirAn vAnamAmalai jIyar (29th pattam of thOthAdhri mutt). Descendant of komANdUr iLaiyavilli AchchAn (bAladhanvi swamy, a cousin of SrI ramAnuja). Born in AzhwArthirungari, grew up in thiruvallikkENi (chennai), presently living under the shade of the lotus feet of jagathAchArya SrI rAmAnuja, SrIperumbUthUr. Learned sampradhAyam principles from vELukkudi krishNan swamy, gOmatam sampathkumArAchArya swamy and many others. Full time sEvaka/servitor of SrIvaishNava sampradhAyam. Taking care of koyil.org portal, which is a humble offering to our pUrvAchAryas. koyil.org is part of SrI varavaramuni sambandhi Trust (varavaramuni.com) initiatives.

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