Monthly Archives: September 2015

पत्तन्गि परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: कार्तिक पुनर्वसु

अवतार स्थल: कांचीपुरम (पेरिय तिरुमुड़ी अदैवू के अनुसार तिरुमला)

आचार्य: मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

शिष्य: कोइलअप्पन (उनके पुर्वाश्रम के पुत्र),  परवस्तु अण्णन, परवस्तु अलगिय मणवाल जीयर, अण्णराय चक्रवर्ती, मेल्नाट्टू तोज्हप्पर नायनार, आदि

रचनाएं: अंतिमोपाय निष्ठा

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: तिरुमला

पत्तन्गि परवस्तु परिवार में मधुरकवि अय्यर (जो अरणपुरत्ताळ्वान के वंशज थे, ऐसा भी प्रचलित हैं कि वे नदुविल आळ्वान तिरुवंश से संबंधित हैं) के यहाँ गोविंद नाम से जन्मे, उन्हें पुर्वाश्रम में गोविन्द दासरप्पन, भट्टनाथ नाम से भी जाना जाता है। संन्यास ग्रहण करने के पश्चाद, उन्हें पट्टरपिरान् जीयर, भट्टनाथ मुनि आदि नाम से जाना जाता है। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्ट दिग्गजों (हमारे संप्रदाय के आठ मुख्य अनुयायी और अधिनायक) में से एक थे। पिल्लै लोकम जीयर जिन्होंने बहुत से महत्वपूर्ण लेखन कैंकर्य किये, वे उनके पौत्र थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं अपने शिष्यों की सभा में गोविन्द दासरप्पन (पट्टरपिरान् जीयर) की प्रशंसा करते हैं। एक बार सभी लोगों की उपस्थिति में, श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि मात्र श्रीगोविन्ददासरप्पन ही मधुरकवि आलवार के समान योग्य हैं, जिन्होंने कहा था देवूमरररियेन (मैं श्रीशठकोप स्वामीजी के अतिरिक्त अन्य किसी भगवान को नहीं जानता)। पट्टरपिरान् जीयर उसी प्रकार थे जैसे मधुरकवि आलवार के लिए शठकोप आलवार, दैववारियांडान के लिए आलवन्दार  और वडुक नम्बि के लिए रामानुज स्वामीजी । वे सदा श्री वरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहा करते थे और उनसे कभी पृथक नहीं हुए, जिस प्रकार एम्बार/गोविन्दाचार्य स्वामीजी सदा श्री रामानुज स्वामीजी के साथ रहा करते थे। इस प्रकार उन्होंने शास्त्र के सभी सारतत्व प्रत्यक्ष श्री वरवरमुनि स्वामीजी से अध्यन किये और नित्य उनकी सेवा करते रहे।

अपने पुर्वाश्रम में 30 साल, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद ही ग्रहण किया। वे “मोर मुन्नार अय्यर” (अत्यंत सम्मानीय जिन्होंने पहले दद्ध्योदन ग्रहण किया) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक भोजन में पहले दाल-चावल, सब्जियां आदि पाई जाती है। अंत में दद्ध्योदन के साथ समाप्त किया जाता है। पट्टरपिरान् जीयर, प्रसाद उसी केले के पत्तल पर पाते थे, जिसमें श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने प्रसाद ग्रहण किया था। श्री वरवरमुनि स्वामीजी दद्ध्योदन के साथ प्रसाद समाप्त करते थे और क्यूंकि गोविन्द दासरप्पन स्वाद को बदले बिना ही प्रसाद पाना चाहते थे (दद्ध्योदन से दाल तक), वे प्रतिदिन दद्ध्योदन से प्रारंभ करते थे। इस प्रकार वे “मोर मुन्नार अय्यर” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को “भट्टनाथ मुनिवर अभीष्ट दैवतं” कहकर संबोधित किया, अर्थात “वह जो पट्टरपिरान् जीयर के प्रिय स्वामी है”। वे लोग, मधुरकवि आलवार के समान ही, पट्टरपिरान् जीयर की श्री वरवरमुनि स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा की प्रशंसा करते थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अण्णराय चक्रवर्ती (जो तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती के वंशज थे) तिरुमला से श्रीरंगम पधारते हैं। पेरिय कोयिल के मंगलाशासन के पश्चाद, अपनी माता के सुझाव से, वे पेरिय जीयर (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) के मठ में पहुंचकर आदर-सम्मान सहित उन्हें प्रणाम करते हैं। अपने कुटुंब सहित वहां जाने के लिए, वे पट्टरपिरान् जीयर के माध्यम से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं। पेरिय जीयर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) अपने दिव्य चरण कमल अण्णराय चक्रवर्ती के मस्तक पर रखते हैं और उन पर कृपा करते हैं। वे तिरुमला में अण्णराय चक्रवर्ती के कैंकर्य की प्रशंसा करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर से अण्णराय चक्रवर्ती को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए कहते हैं। श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं जैसे “रामस्य दक्षिणो बाहू:” (लक्ष्मणजी श्रीरामजी के दायें हाथ थे), पट्टरपिरान् जीयर भी मेरे दाहिने हाथ हैं– इसलिए, वे ही आपकी पञ्च संस्कार विधि पूर्ण करके, आपको अपने शिष्य रूप में स्वीकार करके, आपको हमारे संप्रदाय में स्थापित करेंगे। अण्णराय चक्रवर्ती प्रसन्नता से आभार प्रकट करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करते हैं।

अंततः, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के पश्चाद, पट्टरपिरान् जीयर तिरुमला में निवास करने लगे और वहां बहुत जीवात्माओं को निर्मल किया। उन्होंने अंतिमोपाय निष्ठा नामक एक ग्रंथ की रचना की, जो हमारी आचार्य परंपरा की महिमा का गुणगान करती है और बताती है कि कैसे हमारे पूर्वाचार्य अपने आचार्यों पर पुर्णतः आश्रित थे। वे ग्रंथ के प्रारंभ में घोषणा करते हैं कि ग्रंथ में बताये गए सभी सिद्धांत/ द्रष्टांत स्वयं श्री वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा समझाए गए हैं और वे उन बहुमूल्य निर्देशों के लेखन में मात्र कागज और कलम के समान हैं।

इस प्रकार, हमने परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे महान विद्वान् थे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर की तनियन:
रम्यजामातृयोगीन्द्र पादसेवैक धारकम्
भट्टनाथ मुनिं वन्दे वात्सल्यादी गुणार्नवं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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प्रतिवादि भयंकर अण्णन्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र: आषाढ़ पुष्य

अवतार स्थल:  कांचीपुरम (तिरुत्तण्का दीप प्रकाशर सन्निधि के निकट)

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

शिष्य: उनके पुत्र अण्णनप्पा, अनंताचार्य, अलगिय माणवाल पेरुमाल नायनार

रचनाएँ:

  • श्रीभाष्य, श्रीभागवतं, सुभालोपनिषद के लिए संक्षिप्त व्याख्यान
  • भट्टर द्वारा रचित अष्ट-श्लोकी के लिए व्याख्यान
  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर श्रीवेंकटेश सुप्रभातम्, श्रीवेंकटेश स्तोत्रं, श्रीवेंकटेश प्रपत्ति, श्रीवेंकटेश मंगलाशासन – http://acharya.org/books/eBooks/index-all.html पर श्रीवेंकटेश सुप्रभातं देखा जा सकता है
  • वरवरमुनि शतकं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव में संस्कृत के 100 श्लोक,)
  • वरवरमुनि मंगलम्– http://acharya.org/sloka/pb-anna/index.html
  • वरवरमुनि सुप्रभातम् – http://acharya.org/sloka/pb-anna/varavaramuni-suprabhatam-tml.pdf
  • “चेय्य तामरै तालीणै वालिये…” – वरवरमुनि स्वामीजी का वालि तिरुनाम (दिव्य प्रबन्ध गोष्ठी के अंत में पाठ किया जाता है)
  • अन्य श्लोक /स्तोत्र ग्रंथ

मुडुम्बै नम्बि के वंश में जन्म लेने वाले हस्तिगिरिनाथर, को अण्णा के नाम से भी जाना जाता है और वे प्रतिवादी भयंकर नाम से प्रसिद्ध हुए।

कुरेश स्वामीजी जो श्रीरामानुज स्वामीजी से पहले अवतरित हुए परंतु तदन्तर रामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य हुए उनके समान ही अण्णा भी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पहले अवतरित हुए परंतु वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य हुए। वे अष्ट दिग्गजों में से एक हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आठ प्रमुख शिष्य)।

अपने जीवन के प्रारंभिक काल में, वे कांचीपुरम में रहते थे और वेदान्ताचार्य की उन पर बहुत कृपा थी। उन्होंने कुमार नयनाचार्य (वेदान्ताचार्य के पुत्र) के सानिध्य में अध्ययन किया। वे एक महान विद्वान हुए और उन्होंने अपनी तर्क विशेषता से अन्य संप्रदाय के बहुत से पंडितों को पराजित किया। अपने प्रतिवादियों के मन में भय उत्पन्न करने और अत्यंत स्पष्टता से विवाद कर सिद्धांत को स्थापित करने की उनकी योग्यता के बनिस्पत वे प्रतिवादी भयंकर अण्णा के नाम से जाने गए।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चाद, अण्णा ने तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की सेवा के लिए तिरुमला प्रस्थान किया। उनकी पत्नी को भी समान रूप से शास्त्रों की जानकारी थी और ज्ञान/ वैराग्य में श्रीकुरेश स्वामीजी की पत्नी आण्डाल के समान थी (आलवान की पत्नी शास्त्रों के आवश्यक सिद्धांतों में सुविज्ञ थी और एक स्त्री को अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान/भागवतों की सेवा में समर्पण कैसे करना चाहिए इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण थी)। उनके तीन पुत्र हुए जो आगे चलकर महा विद्वान हुए। अण्णा, ने सांसारिक सुखों में अपनी अनासक्ति विकसित की और भगवान के समक्ष जाकर, उनसे निरंतर और दोषरहित कैंकर्य प्रदान करने की प्रार्थना की (जैसे आलवार ने तिरुवाय्मौली 3.3 में ओलिविल कालमेल्लाम पद में प्रार्थना की थी)। उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, तिरुवेंकटमुडैयाँ, तोळप्पर (तिरुमला के एक श्रीवैष्णव आचार्य) के माध्यम से अण्णा को निर्देश देते हैं कि वे तिरुमंजन (पवित्र स्नान) और तिरुवाराधन (पूजा) के लिए जल लाने का कैंकर्य करे। तोळप्पर, अण्णा से कहते हैं कि भगवान को बहुत ही सुगमता से प्रसन्न किया जा सकता है और उनके दैनिक अनुष्ठान के लिए जल लाना भगवान को बहुत प्रिय होगा। तोळप्पर, अण्णा को एक चांदी का घड़ा देकर आकाश गंगा से जल लाने और तिरुवाराधन से पहले उसमें सुगंधी (इलायची, लौंग, आदि) से उसे युक्त करके उसे अर्चक (पूजारी) को देने का निर्देश देते हैं। अण्णा प्रसन्नता से उसे स्वीकार करते हैं और अत्यंत प्रेम से भगवान के प्रति अपनी दासय्ता दर्शाते हुए वह कैंकर्य प्रारम्भ करते हैं।

एक दिन, श्रीरंगम से एक श्रीवैष्णव तिरुमला आते हैं। अण्णा उन्हें भगवान के समक्ष लाते हैं और दर्शन की व्यवस्था करते हैं। उसके बाद वे श्रीवैष्णव उन्हें श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ, श्री रंग नाच्चियार, आलवारों और आचार्यों के लिए हो रही श्रेष्ठ गतिविधियाँ के बारे में बताते हैं। अण्णा, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव और श्रीरंगम में उनके द्वारा की जा रही दिव्य गतिविधियों के विषय में श्रवण करते हैं और उनकी करुणा, विद्वत्ता आदि के प्रति बहुत आकर्षित होते हैं। तदन्तर कुछ दिनों बाद, अण्णा उन श्रीवैष्णव को आकाश गंगा पर अपने कैंकर्य के लिए लेकर जाते हैं। लौटते हुए राह में, श्रीवैष्णव के माध्यम से वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अनुभव में डूब जाते हैं। तभी उन्हें स्मरण होता है कि वे जल को सुगंधी युक्त करना भूल गये और जैसे ही वे ऐसा करने जाते हैं तभी भगवान के एक एकांकी (भगवान के सेवक) उनसे वह घड़ा ले लेते हैं क्यूंकि उन्हें पूजा के लिए विलंभ हो रहा था। अण्णा उन्हें बताने का प्रयास करते हैं कि वह जल सुगंधी युक्त नहीं है परंतु एकांकी उनकी नहीं सुनते। अत्यंत व्यग्रता से, अण्णा दौड़ते हुए सन्निधि में पहुँचते हैं और देखते हैं कि पूजन विधि प्रारंभ हो चुकी है। वे अर्चक को सुगंधी प्रस्तुत करते हैं। अर्चक कहते हैं “आज मैंने देखा कि महक पहले से कहीं अधिक मधुर है”। अण्णा समझ जाते हैं कि यह सब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा सुनने का परिणाम, जिससे भगवान को भी प्रसन्नता प्राप्त हुई और भगवान की कृपा से, जल स्वतः ही सुगंधी युक्त हो गया। वे उन श्रीवैष्णव को धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने ऐसे सुंदर द्रष्टांत साझा किये और उन्हें बताते हैं कि वे शीघ्रातिशीघ्र श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करना चाहते हैं।  कुछ दिनों के बाद वे तिरुवेंकटमुडैयाँ से आज्ञा लेकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने के लिए सकुटुंब श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते हैं।

श्रीरंगम पहुँचने पर, वे पेरिय पेरुमाल के दर्शन स्तुति के लिए क्रम से पहुँचते हैं (आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, सेनै मुदलियार/ विष्वकसेनजी, आदि को वंदन करते हुए पेरिय पेरुमाल और पेरिय पिराट्टी)। परंतु पेरिय पेरुमाल के दर्शन के पहले ही वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशठकोप स्वामीजी के तिरुवाय्मौली 4.10– ऑन्रूम देवं पर दिव्य व्याख्यान प्रदान करते हुए देखते हैं। इस पासूर में आलवार, अर्चावतार में विशेषतः आलवार तिरुनगरी के आदिनाथ भगवान की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। अण्णा, गोष्ठी के समक्ष उन्हें दंडवत प्रणाम करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें ह्रदय से लगा लेते हैं और उनका कुशल-मंगल पूछते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते हैं कि वे अण्णा से भेंट करके अत्यंत आनंदित हुए। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुवाय्मौली के उस दशक के प्रथम तीन पसूरों की व्याख्या करते हैं और फिर उसे विराम देते हैं। नेत्रों को अति आनंदित करने वाली श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की उभय वेदांत (संस्कृत और द्राविड वेदांत) में पारंगतता देखकर अण्णा बहुत आश्चर्यचकित होकर कहते हैं कि जब तक वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य नहीं होगे वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की निर्हेतुक कृपा प्राप्त नहीं कर पाएंगे और अर्चावतार में श्रेष्ठता के महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्टता से नहीं समझ पाएंगे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्यान को विराम देते हैं और उन्हें पेरिय पेरुमाल के समक्ष ले जाते हैं। पेरिय पेरुमाल, अण्णा को तीर्थ, श्री शठकोप, माला आदि प्रदान करते हैं और अर्चक के माध्यम से अण्णा से बात करते हैं। वे कहते हैं “हे प्रतिवादि भयंकराचार्य! आपको स्मरण होगा, एक बार आप तिरुमला में आकाश गंगा से जल लेकर आये और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश को सुनकर स्वतः ही वह जल पवित्र हो गया और दिव्य महक से भर गया। आप यहाँ ऐसा कार्य करने आये हैं जिससे मुझे आनंद की प्राप्ति होगी – अब आपका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से अद्वितीय और दिव्य संबंध है” और तद्पश्चाद वे उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण दर्शाते हैं। इसके पश्चाद पेरिय जीयर अपने मठ की ओर लौटते हैं।

अण्णा प्रसन्न होते हैं और कन्दाडै अण्णन के निवास पर पहुँचते हैं और अण्णा और कन्दाडै अण्णन दोनों ही एक दुसरे को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं, जो उस समय की सामान्य प्रथा थी। शास्त्र कहता है “वैष्णवो वैष्णवं दृष्टवा दंडवत प्रणामेद् भुवि” – जब एक वैष्णव अन्य वैष्णव से भेंट करते हैं, उन्हें एक दुसरे को परसपर प्रणाम करना चाहिए। वे एक दुसरे का कुशल मंगल जानते हैं और अण्णन के निवास की ओर प्रस्थान करते हैं। सौभाग्यवश, पोन्नडिक्काल् (वानमामलै) जीयर/तोताद्री स्वामीजी भी उस समय वहीँ उपस्थित थे। अण्णा, पोन्नडिक्काल् जीयर की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि “अरूल कोण्डादुम अदियवर” (कण्णिनुण् शिरूताम्बु– 7) – जो सदैव श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कृपा के अनुभव में लीन रहते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं। पोन्नडिक्काल् जीयर, अण्णा को गले लगा लेते हैं और यतिराज के पुनरावतार (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – यतिराज का द्वितीय अवतार) की दिव्य महिमा का गुणगान करते हैं। अण्णा (अपनी पत्नी और संतानों सहित) पोन्नडिक्काल् जीयर और कन्दाडै अण्णन के सानिध्य में पेरिय मठ पहुँचते हैं। वे सभी जीयर के समक्ष पहुँचते हैं और उनसे पञ्च संस्कार प्राप्त करके उन्हें ही अपना आश्रय स्वीकार करते हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का श्रीपाद तीर्थ और प्रसाद ग्रहण करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा से पूछते हैं “आप तो प्रतिवादी भयंकराचार्य है! आप मुझे अपने आचार्य के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं?” और अण्णा अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि “वे श्रीवैष्णव सिद्धांत के विरोधियों के लिए प्रतिवादी भयंकराचार्य हैं परंतु श्रीवैष्णवों के चरण कमलों के सच्चे सेवक हैं”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह सुनकर बहुत प्रसन्न होते हैं और अण्णा को “श्रीवैष्णव दासन्” के रूप में संबोधित करते हैं। आचार्य निष्ठा में पूर्णतः स्थित, उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा गुणगान में व्यतीत करते हैं। जैसे कूरेश स्वामीजी ने हमारे सिद्धांत की स्थापना में श्रीरामानुज स्वामीजी का सहयोग किया ठीक उसी प्रकार अण्णा ने सम्पूर्ण जीवन सत् संप्रदाय सिद्धांत की स्थापना में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का सहयोग किया।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कांचीपुरम, चोलसिंहपुरम, एरुम्बी आदि के जरिए तिरुमला की यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। अण्णा भी यात्रा में उनके साथ ही जाते हैं। तिरुमला में तिरुवेंकटमुडैयाँ के लिए सुप्रभात के अभाव को देखते हुए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा को भगवान के लिए सुप्रभात की रचना करने का निर्देश देते हैं। अण्णा, कृतज्ञता से अपने आचार्य के दिव्य विग्रह का ध्यान करते हुए, श्री वेंकटेश सुप्रभातम, स्तोत्रं, प्रपत्ति और मंगल श्लोकों की रचना करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा की रचनाओं से बहुत प्रसन्न होते हैं और तिरुमला में भगवान की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उनका पाठ करने का निर्देश देते हैं।

श्रीरंगम लौटने के बाद, एक बार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा को आमंत्रित करते हैं और कन्दाडै अण्णन्, पोरेर्रू नायनार, अनंत्तय्यनप्पै, एम्पेरुमानार जीयर नायनार, कन्दाडै नायन और सभी को श्रीभाष्य की शिक्षा देने का निर्देश देते हैं। तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा को श्रीभाष्याचार्य की उपाधि प्रदान करते हैं और उन्हें श्रीभाष्य सिंहासन के अधिनायक के रूप में नियुक्त करते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव दर्शाते हुए अण्णा ने बहुत से साहित्यिक रचनाएँ की है। “चेय्य तामरै तालीणै वालिये…”, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर स्वरुप और उनकी असीमित कृपा का एक दिव्य वर्णन है। ऐसे बहुत सी रचनाएँ है जो अत्यंत सुंदर है और जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा का पुर्णतः वर्णन करती है। उनमें से कुछ हम यहाँ देख सकते हैं:

उभय नाच्चियार के साथ श्रीनिवास भगवान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अण्णा (तिरुपति)

उभय नाच्चियर के साथ श्रीनिवास भगवान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अण्णा (तिरुपति)

श्रीवेंकटेश प्रपत्ति (श्लोक 15)
सत्वोत्तरैस् सतत सेव्य पदाम्भुजेन।
संसार तारक दयार्द्र दृगचलेन।।
सौम्यो पयंतृ मुनिना मम दर्शितौते।
श्रीवेंकटेश चरणौ शरणम् प्रपद्ये।।

मैं, श्री वेंकटेश भगवान के चरण कमलों में आश्रय लेता हूँ, जिन चरण कमलों को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपनी निर्हेतुक कृपा द्वारा दर्शाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, सच्चे ह्रदयवाले परम सात्विकों द्वारा सेवित है। ऐसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने मुझे भगवान के दिव्य चरण कमल दर्शाये हैं, जो संसार से हमारा उद्धार करेंगे और परमपद में पहुंचाएंगे।

श्रीवेंकटेश मंगलं (श्लोक 13)
श्रीमत् सुंदरजामातरूमुनि मानस वासिने।
सर्वलोकनिवासाये श्रीनिवासाये मंगलं।।

वह जो सर्व-व्यापी है, जिनके वक्ष स्थल में श्री महालक्ष्मीजी सर्वदा निवास करती है और जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ह्रदय में नित्य निवास करते हैं, ऐसे तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) का सदा मंगल हो।

प्रतिवादि भयंकर अण्णन के तिरुवेंकटमुडैयां के लिए सभी स्तोत्र विभिन्न भाषाओं में http://acharya.org/acharya/pbanna/index.html पर उपलब्ध है।

इस प्रकार, हमने प्रतिवादि भयंकर अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे उभय वेदांत में महा विद्वान् थे, पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठा में स्थित थे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

प्रतिवादि भयंकर अण्णन् की तनियन:

वेदांतदेशिक कटाक्ष विवृद्धबोधम् ।
कान्तोपयंतृयमिन: करूणैकपात्रं ।।
वत्सान्वायमनवद्य गुणैरूपेतं ।
भक्त्या भजामि प्रतिवादिभयंकरार्यम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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