Monthly Archives: October 2015

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी का कालक्षेप गोष्टी- बाई ओर से दूसरे (पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्)

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श्री नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दिव्य चरणों मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्, श्रीरङ्गम्

तिरुनक्शत्र – तुला, शतभिषक्
अवतार स्थल् – तिरुपुट्कुळि
आचार्यनम्पिळ्ळै
परमपद् प्राप्ती स्थल् – श्रीरन्गम्
लिखित् ग्रन्थ् – 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव| इनको वार्ता माला के ग्रन्थकार भी कह्ते थे, पर इस सूचना में स्पष्टता नही है|

ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है| ये अपने 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव मे हमारे आळ्वारों और आचार्यो के ऐतिहासिक जीवन का वर्णन करते हैं|जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की|

एक बार जब पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् अस्वस्थ्य हुए, तब वे अन्य श्रीवैष्णवों को भगवान से उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने के लिये कहे- ये श्रीवैष्णव शिष्टाचार के विरुद्ध है|भगवान से किसी भी वस्तु की प्रार्थना नही करना चाहिये – अच्छे स्वास्थ्य के लिये भी नही|इस कारण नम्पिळ्ळै के शिष्य, उनको यह घटना बताते हैं, और पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के इस आचरण का आशय पूछते हैं|नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को यह विषय पूर्णता से समझाने के लिये कुछ स्वामियों के पास भेजते हैं| उनमें से प्रथम थे, एङ्गळाळ्वान् जो शास्त्रो में निपुण थे| एङ्गळाळ्वान् स्वामीजी की राय थी कि “शायद वे श्रीरङ्गम् से अनुरक्त हैं और यहाँ से निकलने के लिये तैयार नही हैं| इसके पश्चात्, नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् के पास भेजते हैं| तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् कहते हैं कि, “शायद पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी का कोई अधूरा काम रह गया हो जिसको पूर्ण करने के लिये वे अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं|” नम्पिळ्ळै इसके बाद शिष्यों को अम्मङ्गि अम्माळ् का अभिप्राय सुनने के लिये भेजते हैं| वे बताते हैं “नम्पिळ्ळै स्वामी के कालक्षेप गोष्ठी छोडने की इच्छा किसको होगी, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शायद इसी कारण अपने जीवन बढाने की इच्छा रखते हैं| “आखिर में नम्प्पिळ्ळै के कह्ने पर उनके शिष्य, पेरिय मुदलियार् से भी यह शंका पूछे| पेरिय मुदलियार् स्वामीजी का विचार था, ” नम्पेरुमाळ् के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामी का अत्यंत प्रेम ही उनमें यहाँ ज़्यादा दिन ठहरने की अभिलाषा जागृत कर रहा है|”अन्त में नम्पिळ्ळै, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से ही प्रश्न करते हैं कि इन में से कोई भी विचार उनके मन के विचार से मिलते है या नहीं? इस प्रश्न का उत्थर देते हुए पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् कह्ते हैं “आपकी कृपा के कारण ही आप यह उत्थर मेरी जिव्हा से सुनना चाह्ते हैं, जब की आप मेरे मन की बात से अनभिज्ञ नहीं हैं| प्रति दिन आपके स्नान के समय आपके दिव्य स्वरूप का दर्शन प्राप्त होता है तथा आपको पंखा करने का कैंकर्य प्राप्त होता है|यह कैंकर्य त्याग कर अभी परमपद कैसे जाऊँ? इस तरह पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् एक शिष्य के सबसे महत्त्वपूर्ण विधी को प्रकट करते हैं, अथार्थ अस्मदाचार्य के दिव्य रूप से आसक्त रह्ना|यह सुनकर अन्य शिष्य, नम्पिळ्ळै के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के भक्ति को समझ कर स्तम्भित हुये |

नडुविल् तिरुवीधि पिल्लै भट्टर को नम्पिळ्ळै के शिष्य बनाने मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् ही उपकारी थे | यह घटना पूर्ण तरह से यहाँ दोहराया गया है | https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/08/21/naduvil-thiruvidhi-pillai-bhattar/.

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से संबंधित यह घटना व्याख्यानों में प्रस्तुत है :

वार्तामाला पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के जीवन की कुछ घट्नायें निम्न प्रस्तुत है|

  • 2- पिन्भळगिय जीयर्, नम्पिळ्ळै से एक बार स्वरूपम (जीवात्मा की प्रकृति), उपाय (साधन), उपेय (लक्ष्य) के विषयों में प्रश्न करते हैं| नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि, जीवात्मा कि चाहना स्वरूप है, भगवान कि दया उपाय और् माधुर्य उपेय है| जीयर् कह्ते हैं कि उनके विचार अलग है तब नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि आपका सिद्धांत क्या कहता है| जीयर् ने कहा, ” आपके द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर में ऐसा विचार करता हूँ; श्री वैष्णवों के शरण में प्रपत्ती करना ही मेरा स्वरूप है, हमारे प्रती उनका प्रेम ही उपाय है और् उनका आनन्द ही मेरा उपेय है”| यह् सुनकर नम्पिळ्ळै बहुत आनन्दित हुये| इस प्रकार जीयर अपने आचार्य के सामने “भागवत् शेषत्व” को प्रमाणित किया|
  • 69- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर नम्पिळ्ळै से द्वय महामन्त्र के दिव्य अर्थों के विषय में पूछते हैं|नम्पिळ्ळै प्रतिपादन् करते हैं कि द्वयम् के प्रथम पद् में जीवात्मा स्वीकार् करती है कि श्रीमन्नारायण भगवान ही एकमात्र पुर्णतः उसके आश्रय् है और् दूसरे पद में जीवात्मा पिराट्टी (श्रीलक्ष्मीजी) के सन्ग् परमात्मा के कैंकर्य, सेवा करने की चाहत प्रकट् करती है और् प्रभु से विनती करती है कि यह् कैंकर्य केवल् भगवान् के भोग्य मात्र है, इसमें हमारा कण मात्र भी स्वार्थ नहीं है|जिन आचार्य के कारण शिष्यों में ऐसा गहरा विश्वास जागृत हुआ है, उन श्रीआचार्य के प्रति सदा कृतज्ञ रह्ना चाहिये| आगे जीयर् पूछते हैं कि, अगर् पिराट्टि निरन्तर् एम्पेरुमान् के ध्यान में ही लीन है, तो वे जीवात्माओं की सहायता कैसे करेंगी? नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि जैसे भगवान, निरंतर पिराट्टी के सौन्दर्य का आनंद लेते हैं, परंतु तब भी वे सृष्टि आदि का कार्य संभालते हैं, वैसे ही पिराट्टी भी भगवान के रूप में निरन्तर मग्न होते हुये भी पुरुषकारत्व-भूता होने के कारण सदा जीवात्माओं के पक्ष में एम्बेरुमान् से अनुग्रह करती रहती है|
  • 174 –नम्पिळ्ळै के सेवा खोने के भय से जीयर अपने स्वास्थ्य के हितार्थ प्रार्थना किये| इस घटन का उल्लेख इस लेख में देखा गया है|
  • 216- नडुविल् तिरुवीदिप्पिल्लै भट्टर्, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् और् नम्पिळ्ळै के बीच के एक सुन्दर वार्तालाप का उल्लेख करते हैं| जीयर् का एक प्रश्न था कि, “प्रत्येक मुमुक्षु को आळ्वार की तरह होनी चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और उन्हीं का ध्यान सदा करने वाली)|पर हमें अभी भी सामान्य लौकिक अभिलाषाएं हैं|हमें कैसे वह प्रतिफल (परमपद में कैंकर्य प्राप्ती) मिलेगा?” नम्पिळ्ळै उत्थर देते हैं कि , “इस शरीर में आळ्वारो के तरह उन्नती न हो, फिर भी हमारी आचार्य के प्रति परिशुद्धता के कारण हमारी मृत्यु और् परमपद पहुँचने के अन्तर के समय में भगवान हमें भी वही अभिलाषाएं(आळ्वारो के जैसे) प्रदान करते हैं|परमपद पहुँचते समय हम परिशुद्ध हो चुके होंगे और केवल भगवान के निरन्तर कैंकर्य ही हमारी एकमात्र रूचि रहेगी.”
  • 332- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् पूछते हैं, “जब किसी को कोई कष्ट होता है, तब एक् श्री वैष्णव से प्रार्थना करने पर  उसे उस कष्ट का निवारण मिलता है, तो क्या यह उस श्री वैष्णव की शक्ती से होता है या भगवान के शक्ती से है?” नम्पिळ्ळै उत्तर् देते हैं कि,” यह केवल भगवान की शक्ति से ही है”| आगे जीयर प्रश्न करते हैं, “तो क्या हमारे कष्टों के निवारण के लिए, हम स्वयं भगवान से प्रार्थना नहीं कर सकते?” नम्पिळ्ळै कह्ते हैं, “नहीं| भगवान से आग्रह, सदा एक श्रीवैष्णव के द्वारा ही करना चाहिये”| जीयर फिर प्रश्न करते हैं, “क्या ऐसा कोई द्रष्टांत है, जहाँ एक श्रीवैष्णव की इच्छा को भगवान ने पूरा किया हो?” इस प्रश्न के उत्थर में नम्पिळ्ळै महाभारत से एक चरित्र सुनाते हैं,” जब् अर्जुन ने सूर्यास्त के पह्ले, जयद्रत का वध करने की प्रतिज्ञा ली, सर्वेश्वर ने युद्ध में शस्त्र  ना उठाने की अपनी प्रतिज्ञा का त्याग किया और् सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर सूर्य को छुपा दिया| यह देखकर जयद्रत बाहर आया, तब तुरन्त् भगवान सुदर्शन चक्र को अपने पास लौटाकर स्पष्ट किये कि सूर्य अस्तमन नहीं हुआ है, और अर्जुन जयद्रत् का वध कर सका| इस चरित्र से हम समझ सकते हैं कि भगवान एक श्री वैष्णव के शब्द को निभाते हैं और इस कारण हमें भगवान का एक श्री वैष्णव के द्वारा ही आग्रह करना चाहिये”|

इस प्रकार पिन्भळगिय पेरुमाळ जीयर के यशश्वी जीवन के कुछ झलक हमें प्राप्त हुई| वे उत्तम विद्वान और् नम्पिळ्ळै के अति प्रिय शिष्य थे| उनके चरण कमलों में हम प्रार्थना करे कि हमें भी उनकी अंश मात्र  भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो|

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के तनियन् :

ज्ञान वैराग्य सम्पूर्णम् पश्चात् सुन्दर देशिकम् |
द्राविडोपनिषद् भाष्यतयिनम् मत् गुरुम् भजे ||

-अदियेन् प्रीति रामानुजदासी

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तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirumazhisaiazhwar

श्री भक्तिसार

तिरुनक्ष्त्र: ज्येष्ठ, धनिष्ठा

अवतार स्थल:  तिरुमलिसै

आचार्य: नरसिम्हाचार्य (उनके पिताश्री)

तिरुमलिसै (महिसार क्षेत्रं) में जन्मे, उनके पिता नरसिम्हाचार्य द्वारा उनका नाम वीरराघवन रखा गया। उनका जन्म श्री दाशरथि स्वामीजी के प्रसिद्ध वादुल वंश में हुआ था। उन्होंने भक्तिसारोदयं नामक अपने स्तोत्र ग्रंथ में स्वयं अपने पितामह श्रीरघुवाराचार्यजी के विषय में बताया है। उन्हें वादुल वीरराघवाचार्य नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म वर्ष 1766 ए.डी में हुआ था।

वे बहुत विद्वान् थे और 15 वर्ष की आयु तक उन्होंने स्वयं की यजुर्वेद शाकै के साथ तर्कं, व्याकरणं, मीमांसा, सांख्यं, पतंजलि योगं आदि की शिक्षा पूर्ण की और ज्योतिष, संगीत , भारत नाट्यम आदि में पारंगत हुए। 20 वर्ष की आयु तक, वे सभी शास्त्रों में पारंगत और अधिकृत हो गए थे। उन्होंने रहस्य ग्रंथ आदि की शिक्षा अपने पिताश्री से प्राप्त की और हमारे सत संप्रदाय के महत्वपूर्ण सिद्धातों की स्थापना के लिए व्याख्यान देना प्रारंभ किया। उन्होंने वादुल वरदाचार्य और श्रीरंगाचार्य (जिन्होंने विभिन्न दिव्यदेशों की यात्रा की और वहां चर्चा में बहुत से छद्म विद्वानों को पराजित किया) के सानिध्य में भी शिक्षा प्राप्त की।

वे 51 वर्षों के अल्प समय के लिए लीलाविभुती में रहे और फिर ईश्वर वर्ष, अश्विन मास, शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को परमपद के लिए प्रस्थान किया।

पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषण के श्री वरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यान ले लिए अरुमपदम (विस्तृत व्याख्यान) उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। उनका अन्य ग्रंथ, भक्तिसारोदयं, तिरुमलिसै आलवार के जीवन का बहुत सुंदरता से वर्णन करता है।

रचनायें:

अपने अल्प जीवन में, उन्होंने बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। उनकी रचानों की सूचि निम्न है:

  1. श्री भक्तिसारोदयं
  2. वेदवल्ली शतकम्
  3. हेमलताष्टकम्
  4. अभीष्ट दंडकम्
  5. सुक संदेशं
  6. कमला कल्याण नाटकं
  7. मलयजपरिणय नाटिका
  8. नृसिम्हाष्टकम्
  9. श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के श्रीवचन भूषण व्याख्यान के लिए अरुमपदम् विवरण
  10. तिरुच्चंत विरुत्त प्रतिपदम्
  11. श्रीरंगराज स्तव व्याख्यान
  12. महावीरचरित व्याख्या
  13. उत्तररामचरित व्याख्या
  14. सतश्लोकी व्याख्या
  15. रामानुजाष्टकम् व्याख्या
  16. नक्षत्रमालिका व्याख्या
  17. देवराजगुरू विरचित वरवरमुनिशतक व्याख्या
  18. दुशकरश्लोक टिपण्णी
  19. दिनचर्या
  20. शणमत दर्शिनी
  21. लक्ष्म्या: उपायत्व निरास:
  22. लक्ष्मीविभुत्व निरास:
  23. सूक्तिसाधुत्वमाला
  24. तत्वसुधा
  25. तत्वसार व्याख्या- रत्नसारिणी
  26. सच्चरित्र परित्राणं
  27. पलनदै विलक्कम
  28. त्रिमसतप्रश्नोत्तरं
  29. लक्ष्मीमंगलदीपिका
  30. रामानुज अतिमानुष वैभव स्तोत्रं
  31. अनुप्रवेश श्रुति विवरणं
  32. “सैलोग्निश्च” श्लोक व्याख्या
  33. महीसारविषय चूर्णिका
  34. ‘स्वान्ते मे मदनस्थितिम परिहार’ इत्यादि श्लोक व्याख्यान
  35. सच्चर्याक्ष्कम्
  36. प्राप्यप्रपंचन पञ्चविंशति:
  37. न्यायमंत्रम्
  38. तात्पर्य सच्च्रिकरम
  39. वचस्सुतामीमांसा
  40. वचस्सुतापूर्वपक्षोत्तारम
  41. ब्रह्मवतवतंगम
  42. लक्ष्मीस्तोत्रं
  43. वर्णापञ्चविंशति:

इस तरह हमने तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे एक महान विद्वान् थे और उन्होंने हमारे सत संप्रदाय के हितार्थ बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी भगवत विषय में उनके अंश मात्र ज्ञान की प्राप्ति हो।

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार की तनियन:

श्रीमद् वादुल नरसिम्ह गुरोस्थनुजम्,
श्रीमत् तदीय पदपंकज भृंगराजम् ।
श्रीरंगराज वरदार्य कृपात्त भाष्यं,
सेवे सदा रघुवरार्यं उदारचर्यं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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पिल्लै लोकम् जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

pillailokam-jeeyarपिल्लै लोकम् जीयर, तिरुवल्लिक्केणी

तिरुनक्षत्र:: चैत्र, श्रवण नक्षत्र

अवतार स्थल: कांचीपुरम

आचार्य: शठकोपाचार्य

रचनाएँ: तनियन व्याख्यान, रामानुज दिव्य चरित, यतीन्द्र प्रवण प्रभावं, रामानुज नूट्र्रांताति व्याख्यान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की प्रायः सभी सूक्तियों पर व्याख्यान, कुछ रहस्य ग्रंथों के लिए व्याख्यान, चेय्य तामरै तालिनै (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वालि तिरुनाम) के लिए व्याख्यान, श्रीवैष्णव समयाचार निष्कर्षम्

कांचीपुरम में जन्मे, वे परवस्तु पट्टरपिरान जीयर (जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक थे) के पड-पौत्र थे और उनका जन्म नाम वरदाचार्य था । वे पिल्लै लोकम जीयर और पिल्लै लोकाचार्य जीयर नाम से भी प्रसिद्ध थे।

उन्होंने तिरुक्कदलमल्लै (महाबलीपुरम-मामल्लपुरम) के स्थलशयन भगवान के मंदिर का जीर्णोद्धार किया और मंदिर में पूजा की उचित विधि स्थापित की। उनके योगदान के लिये राजा ने उनका सम्मान किया और आज भी मंदिर में उनके वंशजों को विशेष सम्मान प्रदान किया जाता है।

वे महान विद्वान् और एक महान इतिहासकार भी थे। उनके जीवन के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। परंतु उनकी रचनाएँ हमारे संप्रदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुछ शिलालेख पाए गए हैं, जिनमें दिव्यदेशों में उनके योगदान का उल्लेख मिलता है।

  • वर्ष 1614 ए.डी. से सम्बंधित एक ताम्बे का छापा, जो तिरुक्कदलमल्लै दिव्यदेश में प्राप्त हुआ, यह दर्शाता है कि जीयर अर्थात यतीन्द्र प्रवणं प्रभावं के रचयिता पिल्लै लोकम जीयर (जो यह दर्शाता है की उस समय तक वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की जीवनी लिखने के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गये थे)।
  • वर्ष 1614 ए.डी. का एक पत्थर का शिलालेख, जो श्रीरंगम के दूसरे प्राकारं में प्राप्त किया गया, से हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि पिल्लै लोकम जीयर के एक शिष्य ने श्रीरामानुज स्वामीजी की तिरुनक्षत्र दिवस पर क्षीरान का भोग लगाने के लिए 120 स्वर्ण सिक्कों का योगदान दिया था।

उन्होंने अधिकांश दिव्य प्रबन्धों के प्रारंभिक पद अर्थात तनियन पर व्याख्यान की रचना की। इन व्याख्यानों में उन्होंने उस विशिष्ट दिव्य प्रबंध के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाया है और उस दिव्य प्रबंध के रचयिता के ह्रदय/मनोभाव का चित्रण किया है।

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उन्होंने रामानुज दिव्य चरित्र, श्री रामानुज स्वामीजी के जीवन का बहुत सुंदर वर्णन की है। श्रीरामानुज स्वामीजी की विभिन्न यात्रियों, उनके जीवन और उनके अन्य शिष्यों के जीवन की घटनाओं का इस ग्रंथ में मधुरता से चित्रण किया गया है।

नम्पेरुमाल , श्री वरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशैलेश तनियन प्रस्तुत करते हुए

नम्पेरुमाल , श्री वरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशैलेश तनियन प्रस्तुत करते हुए

उनका यतीन्द्र प्रवण प्रभावं ग्रंथ पेरियावाच्चान पिल्लै, वडूक्कू तिरुविधि पिल्लै, पिल्लै लोकाचार्य, अळगिय मनवाळ पेरुमाळ् नायनार्, तिरुवाय्मौली पिल्लै और मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और कई अन्य आचार्यों के वैभवशाली जीवन परिचय का चित्रण करता है। इस ग्रंथ में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन का विस्तार से वर्णन किया गया है और उनके बहुमूल्य निर्देशों को अत्यंत सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है।

रामानुजार्य दिव्य चरितं और यतीन्द्र प्रवण प्रभावं दोनों ही बहुत से तमिल पसूरों से युक्त हैं जो उनके तमिल भाषा के गहरे ज्ञान को दर्शाता है।

उन्होंने कुछ रहस्य ग्रंथों के व्याख्यान की भी रचना की है।

उन्होंने विलान्चोलै पिल्लै द्वारा रचित सप्त गाथा के लिए भी बहुत सुंदर व्याख्यान की रचना की है। सप्त गाथा, पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र के सार – आचार्य निष्ठा के विषय में वर्णन करता है।

उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की श्री सूक्तियां, उपदेश रत्न माला, तिरुवाय्मौली नुरन्तादी और आरती प्रबंध पर वृहद व्याख्यानों की रचना की है।

उन्होंने श्रीवैष्णव समयाचार निष्कर्षम् नामक एक अत्यंत सुंदर काव्य ग्रंथ की रचना की, जो रामानुज दर्शन (हमारे सत-संप्रदाय) के महत्वपूर्ण सिद्धांतों की अधिकृत रूप से स्थापना करती है। इस ग्रंथ में बहुत से प्रमाणों का उल्लेख किया गया है जो पिल्लै लोकम जीयर के शास्त्रों के गहरे ज्ञान को दर्शाता है।

इस तरह हमने पिल्लै लोकम जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों पर विस्तृत व्याख्यान की रचना करके अथवा श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के महान जीवन परिचय को लिपिबद्ध करके हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय पर बहुत उपकार किया है। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी श्री रामानुज स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति उनके समान ही अनुराग विकसित हो।

पिल्लै लोकम जीयर की तनियन (यतीन्द्र प्रवणं प्रभाव से ली गयी):

श्रीसठारी गुरोर्दिव्य श्रीपादाब्ज मधुव्रतम।
श्रीमतयतीन्द्रप्रवणं श्री लोकार्य मुनिं भजे।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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श्री भूतपुरि आदि यतिराज जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: अश्विन मास पुष्य नक्षत्र

अवतार स्थल:  ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: श्रीपेरुम्बुदुर

यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर (श्रीरामानुज स्वामीजी का अवतार स्थल) आदि (प्रथम) यतिराज जीयर ने स्थापित किया था।

श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर

श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ, श्रीपेरुम्बुदुर

यह यतिराज जीयर मठ बहुत अनोखा है, क्यूंकि यह उन कुछ मठों में से एक है जो आलवार / आचार्य अवतार स्थल पर मंदिर के कैंकर्य के लिए और मंदिर में होने वाले उन कैंकर्य की देखभाल करने के लिए स्थापित किया गया है। भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी वर्षभर इस मठ में पधारते हैं।

यतिराज जीयर – श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ

यतिराज जीयर – श्रीपेरुम्बुदुर यतिराज जीयर मठ

उनकी तनियन से हम समझ सकते हैं कि उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अन्य आचार्यों जैसे वानमामलै जीयर, कोयिल कन्दाडै अण्णन् और दोडाचार्य के साथ एक अद्भुत संबंध था। यतिराज जीयर ने इन महान आचार्यों के चरण कमलों में शिक्षा प्राप्त की।

उनके वालि तिरुनाम से हम समझ सकते हैं कि उनकी श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल में बहुत प्रीति थी। उनका वालि तिरुनाम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वालि तिरुनाम से बहुत मिलता-जुलता है।

यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में, यह कहा गया है कि परमस्वामी (तिरुमालिरुन्चोलै कल्ललगर) के निर्देशानुसार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने यतिराज जीयर नामक अपने एक गोपनीय कैंकर्यपारर को तिरुमालिरुन्चोलै मंदिर के संशोधन और व्यवस्था के लिए भेजा। कुछ लोग, इन यतिराज जीयर को श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर मानते हैं, वहीं कुछ अन्य बताते हैं कि वे कोई और जीयर हैं जो बाद में तिरुमालिरुन्चोलै जीयर मठ के प्रथम जीयर हुए। इस बारे में अधिक जानने के लिए, विज्ञ विद्वानों से अनुसंधान कर सकते हैं।

इस तरह हमने श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी भगवत/भागवत/आचार्य कैंकर्य की प्राप्ति हो।

श्रीपेरुम्बुदुर आदि यतिराज जीयर की तनियन:

श्रीमत् रामानुजांघ्री प्रवण वरमुने: पादुकं जातब्रुंगम,
श्रीमत् वानान्द्री रामानुज गणगुरु सतवैभव स्तोत्र दीक्षम् ।
वादूल श्रीनिवासार्य चरणशरणम् तत् कृपा लब्ध भाष्यं,
वन्दे प्राज्ञं यतिन्द्रम् वरवरडगुरो: प्राप्त भक्तामृतार्तम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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कोयिल कन्दाडै अप्पन्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

untitled1कोयिल कन्दाडै अप्पन् – कांचीपुरम अप्पन स्वामी तिरुमाळिगै

तिरुनक्षत्र: भाद्रपद, मघा

तीर्थम्: कार्तिक शुक्ल पंचमी

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी

रचनाएँ: वरवरमुनि वैभव विजयं

मुदलियाण्डान्/दाशरथि स्वामीजी (जिन्हें यतिराज पादुका- श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणकमलों की पादुका के नाम से भी जाना जाता है) के प्रसिद्ध वंश में जन्मे, देवराज थोज्हप्पर के पुत्र और कोयिल कन्दाडै अण्णन् के अनुज, का जन्म नाम श्रीनिवास था। वे आगे चलकर मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के प्रिय शिष्यों में से एक हुए।

जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आलवार तिरुनागरी से श्रीरंगम पधारे, श्रीरंगनाथ उन्हें श्रीरंगम में ही निवास करने और सत संप्रदाय का पालन पोषण करने का आदेश देते हैं। तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी पूर्वाचार्यों के ग्रंथ एकत्रित करना प्रारंभ करते हैं, उन्हें पुर्णतः संकलित करते हैं और नियमित रूप से ग्रंथ कालक्षेप प्रदान करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य वैभव से प्रभावित होकर, बहुत से लोगों ने (आचार्य पुरुषों सहित) उनके चरण कमलों में आश्रय प्राप्त किया।

भगवान की दिव्य इच्छा के अनुसार, कोयिल कन्दाडै अण्णन् (दाशरथि स्वामीजी के वंश में उत्पन्न होने वाले एक प्रधान आचार्य) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए और अष्ट दिग्गजों (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा नियुक्त सत-संप्रदाय का प्रचार करनेवाले आठ अनुयायियों) में से एक हुए। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों का आश्रय प्राप्त करने के लिए आये, वे अपने बहुत से संबंधियों को भी साथ लाये और वे सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्ही में एक उनके भ्राता कोयिल कन्दाडै अप्पन् थे जिन पर उस समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने कृपा की थी। उनकी तनियन से हम समझ सकते हैं कि वे पुर्णतः चरम पर्व निष्ठा (भागवतों और आचार्य की सेवा) में स्थित थे।

एरुम्बी अप्पा (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के अन्य शिष्य) अपने पूर्व दिनचर्या (श्रीवरवरमुनी स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों की व्याख्या करते हुए एक दिव्य ग्रंथ) के श्लोक 4 में एक सुंदर द्रष्टांत बताते हैं।

पार्शवत: पाणीपद्माभ्याम परिगृह्य भवतप्रियऊ।
विनयस्यन्तं सनैर अंगरी मृदुलौ मेदिनितले।।

शब्दार्थ: एरुम्बी अप्पा, श्रीवरवरमुनी स्वामीजी से कहते हैं – “स्वामी के दोनों ओर, उनके दो प्रिय शिष्य (कोइल अण्णन और कोइल अप्पन) हैं और आप अपने कमल के समान कोमल हाथों से उन्हें द्रढ़ता से पकडे हुए, अपने कोमल चरणारविन्दों से धरती पर चल रहे हैं”।

-श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के दोनों और अण्णन और अप्पन (अप्पन स्वामी के निवास से प्राप्त चित्र, कांचीपुरम)श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के दोनों ओर अण्णन और अप्पन (अप्पन स्वामी के निवास से प्राप्त चित्र, कांचीपुरम)

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार, दिनचर्या स्त्रोत्र के अपने व्याख्यान में, दर्शाते हैं कि यहाँ दो प्रिय शिष्यों से अभिप्राय है “कोइल अण्णन और कोइल अप्पन”। यहाँ एक प्रश्न उठता है– क्या श्रीवरवरमुनी स्वामीजी को त्रिदंड धारण नहीं करना चाहिए, जैसा कि पांचरात्र तत्वसार संहिता में कहा गया है कि ‘एक सन्यासी को सदा त्रिदंड धारण करना चाहिए’? अण्णावप्पंगार इसे भली प्रकार से समझाते हैं:

  • ऐसे सन्यासी के लिए जो सर्व सिद्ध है– उनके त्रिदंड धारण न करने में कोई दोष नहीं है।
  • एक सन्यासी जो निरंतर भगवान के ध्यान में रहता है, जिसका व्यवहार कुशल है और जिन्होंने अपने आचार्य से शास्त्रों का अर्थ भली प्रकार से गृहण किया है, जिसको भगवत विषय में जानकारी है और जिनका अपनी इन्द्रियों और सम्पूर्ण विश्व पर नियंत्रण है– ऐसे सन्यासी के लिए उनके त्रिदंड की आवश्यकता नहीं है।
  • भगवान को साष्टांग प्रणाम करते हुए, त्रिदंड साष्टांग में व्यवधान हो सकता है, इसलिए वे उस समय त्रिदंड साथ नहीं ले जाते।

इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अप्पन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

कोयिल कन्दाडै अप्पन् की तनियन:

वरद्गुरु चरणं वरवरमुनिवर्य गणकृपा पात्रं ।
प्रवरगुणा रत्न जलदिम् प्रणमामि श्रीनिवास गुरुवर्यम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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अप्पिळ्ळार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: ज्ञात नहीं

अवतार स्थल: ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

रचनायें: संप्रदाय चन्द्रिका, काल प्रकाशिका

appiLLArअप्पिळ्ळार – चित्रपट

अप्पिळ्ळान नाम से भी पहचाने जाने वाले, अप्पिळ्ळार एक महान विद्वान् थे. ऐसा कहा जाता है कि वे श्री रामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य किदाम्बी अच्चान के वंशज थे| वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे और अष्ठ दिग्गजों में एक थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पेरिय पेरुमाल के निर्देशानुसार श्रीरंगम में निवास करते थे और हमारे सत-संप्रदाय की कीर्ति का प्रचार करते हुए अपना समय व्यतित करते थे। उनकी महानता को जानकर बहुत से आचार्य पुरुष और विद्वान उनके शिष्य हुए।

अप्पिळ्ळार एक महान विद्वान् थे जिन्होंने उत्तर भारत के बहुत से विद्वानों पर विजय प्राप्त किया। वे अपने ज्ञान के विषय में गर्व से भर गए और एरुम्बी अप्पा से वाद विवाद करने एरुम्बी पहुंचे। परंतु एरुम्बी अप्पा की महानता को जानकार, उन्होंने उनके समक्ष स्वयं को समर्पित किया और उनसे आवश्यक सिद्धांतों की शिक्षा प्राप्त की। कुछ दिनों बाद वे वहां से प्रस्थान करने का निर्णय लेते हैं। उन्हें विदा करते हुए, एरुम्बी अप्पा उनसे पूछते हैं कि वे कहाँ जायेंगे। अप्पिळ्ळार कहते हैं, वे श्रीरंगम जाकर जीयर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) से वाद विवाद करने की सोच में हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें अच्छी राय देते हुए कहते हैं “आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं जीयर की कीर्ति के बारे में जनता हूँ। उन्होंने कांचीपुरम में किदाम्बी नायनार के सानिध्य में श्रीभाष्य की शिक्षा ली है। उस समय किदाम्बी नायनार ने जीयर की स्मरण शक्ति की परीक्षा लेने के लिए मुझसे कहा कि मैं उनसे पिछले पथों के विषय में जानकारी लूँ और मैं उनकी कुशाग्र बुद्धि देखकर चकित था। वे सभी सिद्धांतों से भलीभांति अवगत हैं। उनसे कोई तर्क नहीं कर सकता। और अधिक वे सन्यासियों में अग्रणी हैं जिन्होंने श्रीवैष्णव संप्रदाय को तरुण रूप प्रदान किया। हमें केवल उनके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। उनके बारे में अधिक मैं आपको भविष्य में बताऊंगा”। ऐसा सुनकर अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में थोडा कुछ जानकर वहाँ से चले जाते हैं।

एरुम्बी अप्पा भी श्रीरंगम पहुंचे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्होंने कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मार्गदर्शन में बिताया और फिर श्रीरंगम से प्रस्थान करने का विचार किया। कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा करके, वे एरुम्बी (अपने पैतृक गाँव) लौटना चाहते थे। परंतु कुछ अशुभ संकेतों को देखकर, वे वहां से प्रस्थान नहीं करते। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं “आप प्रतीक्षा कीजिये और देखिए कि कुछ शुभ प्रकट होने वाला है। हम आपको उसके पश्चाद यहाँ से जाने की अनुमति देंगे”। इसे सुनने वाले सभी अति आनंदित होते हैं और उस शुभ घटना की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

उस समय, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार अपने परिवार और अन्य सहयोगियों के साथ श्रीरंगम पधारे और भगवान रंगनाथ की स्तुति की। हालाँकि उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना था, परंतु उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति कोई विशेष अनुराग नहीं था। वे महान विद्वान् थे, और अपने शिष्यों और अपार संपत्ति (वाद-विवाद जीतने पर अर्जित की गयी) के साथ कावेरी नदी के तट पर कुछ दिनों के लिए ठहरे। वहां रहते हुए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना और सुना की बहुत से महानुभावों जैसे कन्दाडै अण्णन्, एरुम्बी अप्पा आदि ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। उन्हें यह जानकार बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसे महान आचार्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। शास्त्रों में एरुम्बी अप्पा की दक्षता को जानते हुए, अप्पिळ्ळार विचार करते हैं कि यदि ऐसे शास्त्र में प्रवीण एरुम्बी अप्पा ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लिया है तो उनमें कुछ विशेष बात तो अवश्य होगी। अप्पिळ्ळार अपने एक निकट सहयोगी, जो बहुत बुद्धिमान थे, के साथ श्रीरंगम में जीयर मठ के समीप जाते हैं। बाहर ठहरकर, वे अपने सहयोगी को अंदर भेजते हैं और उनसे कहते हैं कि वे ऐसी घोषणा करे कि “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और अगर एरुम्बी अप्पा गोष्ठी में उपस्थित होंगे तों वे उन्हें पहचान कर उनका स्वागत करेंगे। उनके सहयोगी अंदर जाते हैं और एरुम्बी अप्पा को पहचान कर कहते हैं “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और यह सुनकर एरुम्बी अप्पा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और विचार करते हैं कि “यह अप्पिळ्ळार के लिए एक नई भौर है”। एरुम्बी अप्पा तुरंत अप्पिळ्ळार से भेंट करने हेतु बाहर आते हैं। अप्पिळ्ळार एरुम्बी अप्पा के बाजुओं में शंख चक्र अंकित देखते हैं और समझ जाते हैं कि वे हाल ही में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए हैं। अप्पिळ्ळार, एरुम्बी अप्पा को दंडवत प्रणाम करते हैं और एक दूसरे का कुशल मंगल पूछते हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें सभी घटना क्रमों के विषय में बताते हैं जिनके माध्यम से भगवान ने उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य होने का निर्देश दिया। अप्पिळ्ळार धीरे धीरे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति का अनुभव करते हैं और एरुम्बी अप्पा से कहते हैं कि अप्पिळ्ळै और कई अन्य भी यहाँ पहुंचे हैं और वे कावेरी के तीर पर ठहरे हुए हैं। वे एरुम्बी अप्पा से वहां पधारने का अनुरोध करते हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा बताने के लिए और सभी को सुधारने के लिए)। एरुम्बी अप्पा, अप्पिळ्ळार के आशय को जानकर प्रसन्न होते हैं, और वानमामलै जीयर के समक्ष जाकर उन्हें इस बात की सूचना देते हैं। वे वानमामलै जीयर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें आशीर्वाद प्रदान करे कि सभी का सुधार हो और सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार करें। फिर वे कावेरी तट पर पहुँचते हैं और सभी को संप्रदाय के मूलभूत सिद्धांत समझाते हैं।

उस समय वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष जाकर उन्हें बताते हैं कि अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै नाम के महान विद्वान् कावेरी के तट पर आये हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। यह दर्शाया गया है कि आचार्य संबंध के पूर्व 6 बातों का विचार होना चाहिए और इस सिद्धांत को निम्न श्लोक में बताया गया है।

ईश्वरस्य च सौहाद्रम् यतरुच्चा सुह्रुदं तथा विष्णो: कटाक्षम् अद्वेषम अभिमुख्यम च सात्विकै: संभाषणं शदेठानी

  • सर्व प्रथम, क्यूंकि भगवान कोमल ह्रदय है, वे सभी जीवों के भलाई के विषय में ही सोचते है।
  • द्वितीय, अच्छाई के लिए प्रासंगिक इच्छा/ क्रिया है।
  • तृतीय, भगवान की कृपामई दृष्टि जीवात्मा पर पड़ती है।
  • चतुर्थ, जीवात्मा अद्वेषम् प्रकट करता है– वह भगवान की कृपा को नहीं रोक सकता।
  • पंचम, जीवात्मा अभिमुख्यम् प्रकट करता है – वह भगवान की और झुकता है।
  • छठा, वह भागवतों के साथ भागवत विषय की चर्चाओं में संलग्न होगा जो उसका तुरंत सुधार करेंगे और उसे आचार्य के पास भेज देंगे।

वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहते हैं कि एरुम्बी अप्पा के साथ विचार विमर्श करके उनका कल्याण हुआ है और उन सभी में उनके शिष्य होने की पात्रता है। इसलिए, आप भी, जो सदा जीवात्माओं के कल्याण के विषय में सोचते हैं उन सभी को स्वीकार करें और एरुम्बी अप्पा और मेरी मनोकामना को पूर्ण कर उन सभी पर कृपा करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और कहते हैं “श्री रामानुज स्वामीजी ने अपना दिव्य मनोरथ मुझे दर्शाया है” । वे वानमामलै जीयर से कहते हैं कि उनमें से एक का दास्य नाम (पञ्च संस्कार के पश्चाद) रामानुज होगा। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की आज्ञा लेकर जाते हैं और उनका स्वागत करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे स्वीकार करते हैं। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पधारने की जानकारी देने के लिए  एक श्रीवैष्णव को अप्पिळ्ळार के पास भेजते हैं।

वानमामलै जीयर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अन्य शिष्यों के आने का समाचार सुनकर, अप्पिळ्ळार अति आनंदित हो जाते हैं और अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनकी प्रिय हरी शॉल लाये और उसे जमीन पर बिछा दे, जिससे वानमामलै जीयर और अन्य सभी उस पर अपने चरण रखे। वे अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनके चरण कमलों की रज को एकत्रित करें और उनके पास लाये, जिससे वे उसे अपने मस्तक पर सजा सके। फिर वे फल और ताम्बुल लेकर आये और वानमामलै जीयर का स्तुति के साथ स्वागत किया। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया और उनकी चरण कमल की रज को अपने मस्तक पर स्वीकार किया। एक दुसरे का कुशल मंगल जानने के पश्चाद, वानमामलै जीयर सभी को कोयिल अण्णन् के निवास पर ले जाते हैं। कोयिल अण्णन् विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश और महिमा का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के पुनरावतार हैं। यह सब सुनकर, अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेने का निर्णय करते हैं और वे सभी, फलों, ताम्बूल और अन्य भेंट के साथ जीयर मठ पहुँचते हैं। वे तिरुमलै आलवार मण्डप में पहुँचते हैं जहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दीप्तिमान होकर विराजे हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अद्वितीय प्रसन्न स्वरुप में दिखाई दिए जिनके सुंदर व व्यापक कंधे, वक्षस्थल, नेत्र आदि हैं। उन्होंने स्वच्छ केसरिया वस्त्र और त्रिदंड धारण किया है। अपने मुख पर सुंदर मुस्कान के साथ, वे सभी का स्वागत करते हैं। उनका अत्यंत सुंदर स्वरुप देखकर, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार उनके चरण कमलों में दंडवत प्रणाम करते हैं और उनकी स्वीकृति तक प्रतीक्षा करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अति स्नेह से उनकी भेंट स्वीकार करते हैं और उन्हें दिव्य आवश्यक सिद्धांत समझाते हैं जिसे सुनकर दोनों विद्वान् अचंभित रह जाते हैं। वे तुरंत श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी पञ्च संस्कार की विधि संपन्न करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, उन्हें पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं और उन्हें अपने शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं। फिर वे उन्हें क्रमानुसार पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में लेकर आते हैं (यह वह क्रम है जिसका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम मंदिर में मंगलाशासन करते हुए अनुसरण करते थे, जैसा की पूर्व दिनचर्या में दर्शाया गया है – आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, सेनै मुदलियार, गरुडालवार,श्री रंगनाथ, श्री रंगनाच्चियार, परमपदनाथन्) और उन महान विद्वानों को भगवान को समर्पित करते हैं। भगवान के मंगलाशासन के पश्चाद, वे मठ में लौटते हैं और जैसा शास्त्र सन्मत है कि एक शिष्य को अपने आचार्य का शेष प्रसाद ग्रहण करना चाहिए, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद स्वीकार करते हैं।

अप्पिळ्ळार को जीयर मठ के दैनिक गतिविधियों जैसे तदियाराधन आदि के देखरेख का उत्तरदायित्व दिया गया था। जैसे किदम्बी अच्चान ने श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के लिए मठ की देखरेख का उत्तरदायित्व लिया था, अप्पिळ्ळार ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अप्पिळ्ळार और जीयर नारायण (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पुर्वाश्रम से उनके पौत्र) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे उनकी दैनिक आराधना के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अर्चा विग्रह प्रदान करने की कृपा करे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें एक सोम्बू (पात्र) प्रदान करते हैं जो वे नित्य उपयोग किया करते थे और उन्होंने उसके उपयोग से दो विग्रहों का निर्माण किया और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का एक-एक विग्रह अपने दैनिक पूजा के लिए रख लिया।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळार के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

अप्पिळ्ळार की तनियन:

कांतोपयन्तृ योगीन्द्र सर्व कैंकर्यदुर्वहं ।

तदेक दैवतं सौम्यं रामानुज गुरुं भजे ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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अप्पिळ्ळै

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अप्पिळ्ळै – चित्रपट

तिरुनक्षत्र: ज्ञात नहीं

अवतार स्थल: ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

रचनायें: इयरपा के सभी तिरुवंतादी पर व्याख्यान, तिरुविरुत्तम् के लिए व्याख्यान (प्रथम 15 पासूरों), यतिराज विंशति के लिए व्याख्यान, वाळि तिरुनामं

प्रणतार्तिहर नाम से जन्मे, वे अप्पिल्लै नाम से प्रसिद्ध हुए। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे और अष्ठ दिग्गजों में एक थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पेरिय पेरुमाल के निर्देशानुसार श्रीरंगम में निवास करते थे और हमारे सत-संप्रदाय की कीर्ति का प्रचार-प्रसार करते हुए अपना समय व्यतित करते थे। उनके वैभव को जानकर बहुत से आचार्य पुरुष और विद्वान उनके शिष्य हुए।

एरुम्बी अप्पा भी श्रीरंगम पहुंचे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्होंने कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मार्गदर्शन में बिताया और फिर श्रीरंगम से प्रस्थान करने का विचार किया। कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा करके, वे एरुम्बी (अपने पैतृक गाँव) लौटना चाहते थे। परंतु कुछ अशुभ संकेतों को देखकर, वे वहां से प्रस्थान नहीं करते। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं “आप प्रतीक्षा कीजिये और देखिए कि कुछ शुभ प्रकट होने वाला है। हम आपको उसके पश्चाद यहाँ से जाने की अनुमति देंगे”। इसे सुनने वाले सभी अति आनंदित होते हैं और उस शुभ घटना की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

उस समय, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार अपने परिवार और अन्य सहयोगियों के साथ श्रीरंगम पधारे और भगवान रंगनाथ की स्तुति की। हालाँकि उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना था, परंतु उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति कोई विशेष अनुराग नहीं था। वे महान विद्वान् थे, और अपने शिष्यों और अपार संपत्ति (वाद-विवाद जीतने पर अर्जित की गयी) के साथ कावेरी नदी के तट पर कुछ दिनों के लिए ठहरे। वहां रहते हुए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना और सुना की बहुत से महानुभावों जैसे कन्दाडै अण्णन्, एरुम्बी अप्पा आदि ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। उन्हें यह जानकार बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसे महान आचार्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। शास्त्रों में एरुम्बी अप्पा की दक्षता को जानते हुए, अप्पिळ्ळार विचार करते हैं कि यदि ऐसे शास्त्र में प्रवीण एरुम्बी अप्पा ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लिया है तो उनमें कुछ विशेष बात तो अवश्य होगी। अप्पिळ्ळार अपने एक निकट सहयोगी, जो बहुत बुद्धिमान थे, के साथ श्रीरंगम में जीयर मठ के समीप जाते हैं। बाहर ठहरकर, वे अपने सहयोगी को अंदर भेजते हैं और उनसे कहते हैं कि वे ऐसी घोषणा करे कि “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और अगर एरुम्बी अप्पा गोष्ठी में उपस्थित होंगे तों वे उन्हें पहचान कर उनका स्वागत करेंगे। उनके सहयोगी अंदर जाते हैं और एरुम्बी अप्पा को पहचान कर कहते हैं “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और यह सुनकर एरुम्बी अप्पा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और विचार करते हैं कि “यह अप्पिळ्ळार के लिए एक नई भौर है”। एरुम्बी अप्पा तुरंत अप्पिळ्ळार से भेंट करने हेतु बाहर आते हैं। अप्पिळ्ळार एरुम्बी अप्पा के बाजुओं में शंख चक्र अंकित देखते हैं और समझ जाते हैं कि वे हाल ही में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए हैं। अप्पिळ्ळार, एरुम्बी अप्पा को दंडवत प्रणाम करते हैं और एक दूसरे का कुशल मंगल पूछते हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें सभी घटना क्रमों के विषय में बताते हैं जिनके माध्यम से भगवान ने उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य होने का निर्देश दिया। अप्पिळ्ळार धीरे धीरे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति का अनुभव करते हैं और एरुम्बी अप्पा से कहते हैं कि अप्पिळ्ळै और कई अन्य भी यहाँ पहुंचे हैं और वे कावेरी के तीर पर ठहरे हुए हैं। वे एरुम्बी अप्पा से वहां पधारने का अनुरोध करते हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा बताने के लिए और सभी को सुधारने के लिए)। एरुम्बी अप्पा, अप्पिळ्ळार के आशय को जानकर प्रसन्न होते हैं, और वानमामलै जीयर के समक्ष जाकर उन्हें इस बात की सूचना देते हैं। वे वानमामलै जीयर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें आशीर्वाद प्रदान करे कि सभी का सुधार हो और सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार करें। फिर वे कावेरी तट पर पहुँचते हैं और सभी को संप्रदाय के मूलभूत सिद्धांत समझाते हैं।

उस समय वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष जाकर उन्हें बताते हैं कि अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै नाम के महान विद्वान् कावेरी के तट पर आये हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। यह दर्शाया गया है कि आचार्य संबंध के पूर्व 6 बातों का विचार होना चाहिए और इस सिद्धांत को निम्न श्लोक में बताया गया है।

ईश्वरस्य च सौहाद्रम् यतरुच्चा सुह्रुदं तथा विष्णो: कटाक्षम् अद्वेषम अभिमुख्यम च सात्विकै: संभाषणं शदेठानी

  • सर्व प्रथम, क्यूंकि भगवान कोमल ह्रदय हैं, वे सभी जीवों के भलाई के विषय में ही सोचते हैं|
  • द्वितीय, अच्छाई के लिए प्रासंगिक इच्छा/ क्रिया है।
  • तृतीय, भगवान की कृपामई दृष्टि जीवात्मा पर पड़ती है।
  • चतुर्थ, जीवात्मा अद्वेषम् प्रकट करता है– वह भगवान की कृपा को नहीं रोक सकता।
  • पंचम, जीवात्मा अभिमुख्यम् प्रकट करता है – वह भगवान की ओर झुकता है।
  • छठा, वह भागवतों के साथ भागवत विषय की चर्चाओं में संलग्न होगा जो उसका तुरंत सुधार करेंगे और उसे आचार्य के पास भेज देंगे।

वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहते हैं कि एरुम्बी अप्पा के साथ विचार विमर्श करके उनका कल्याण हुआ है और उन सभी में उनके शिष्य होने की पात्रता है। इसलिए, आप भी, जो सदा जीवात्माओं के कल्याण के विषय में सोचते हैं उन सभी को स्वीकार करें और एरुम्बी अप्पा और मेरी मनोकामना को पूर्ण कर उन सभी पर कृपा करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और कहते हैं “श्री रामानुज स्वामीजी ने अपना दिव्य मनोरथ मुझे दर्शाया है” । वे वानमामलै जीयर से कहते हैं कि उनमें से एक का दास्य नाम (पञ्च संस्कार के पश्चाद) रामानुज होगा। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की आज्ञा लेकर जाते हैं और उनका स्वागत करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे स्वीकार करते हैं। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पधारने की जानकारी देने के लिए  एक श्रीवैष्णव को अप्पिळ्ळार के पास भेजते हैं।

वानमामलै जीयर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अन्य शिष्यों के आने का समाचार सुनकर, अप्पिळ्ळार अति आनंदित हो जाते हैं और अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनकी प्रिय हरी शॉल लाये और उसे जमीन पर बिछा दे, जिससे वानमामलै जीयर और अन्य सभी उस पर अपने चरण रखे। वे अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनके चरण कमलों की रज को एकत्रित करें और उनके पास लाये, जिससे वे उसे अपने मस्तक पर सजा सके। फिर वे फल और ताम्बुल लेकर आये और वानमामलै जीयर का स्तुति के साथ स्वागत किया। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया और उनकी चरण कमल की रज को अपने मस्तक पर स्वीकार किया। एक दुसरे का कुशल मंगल जानने के पश्चाद, वानमामलै जीयर सभी को कोयिल अण्णन् के निवास पर ले जाते हैं। कोयिल अण्णन् विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश और महिमा का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के पुनरावतार हैं। यह सब सुनकर, अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेने का निर्णय करते हैं और वे सभी, फलों, ताम्बूल और अन्य भेंट के साथ जीयर मठ पहुँचते हैं। वे तिरुमलै आलवार मण्डप में पहुँचते हैं जहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दीप्तिमान होकर विराजे हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अद्वितीय प्रसन्न स्वरुप में दिखाई दिए जिनके सुंदर व व्यापक कंधे, वक्षस्थल, नेत्र आदि हैं। उन्होंने स्वच्छ केसरिया वस्त्र और त्रिदंड धारण किया है। अपने मुख पर सुंदर मुस्कान के साथ, वे सभी का स्वागत करते हैं। उनका अत्यंत सुंदर स्वरुप देखकर, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार उनके चरण कमलों में दंडवत प्रणाम करते हैं और उनकी स्वीकृति तक प्रतीक्षा करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अति स्नेह से उनकी भेंट स्वीकार करते हैं और उन्हें दिव्य आवश्यक सिद्धांत समझाते हैं जिसे सुनकर दोनों विद्वान् अचंभित रह जाते हैं। वे तुरंत श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी पञ्च संस्कार की विधि संपन्न करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, उन्हें पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं और उन्हें अपने शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं। फिर वे उन्हें क्रमानुसार पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में लेकर आते हैं (यह वह क्रम है जिसका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम मंदिर में मंगलाशासन करते हुए अनुसरण करते थे, जैसा की पूर्व दिनचर्या में दर्शाया गया है – आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, सेनै मुदलियार, गरुडालवार, श्री रंगनाथ, श्री रंगनाच्चियार, परमपदनाथन्) और उन महान विद्वानों को भगवान को समर्पित करते हैं। भगवान के मंगलाशासन के पश्चाद, वे मठ में लौटते हैं और जैसा शास्त्र सन्मत है कि एक शिष्य को अपने आचार्य का शेष प्रसाद ग्रहण करना चाहिए, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद स्वीकार करते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर अप्पिळ्ळै तिरुवंतादी पर व्याख्यान की रचना करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को उनके बहुत से दिव्य प्रबंध सम्बंधित कैंकर्य में सहायता करते हैं।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

अप्पिळ्ळै की तनियन:

कांतोपयन्तृ योगीन्द्र चरणांभुज शठपदम् ।
वात्सान्वयभवं वन्दे प्रणतार्तिहरं गुरुं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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