तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र: श्रावण मास, रोहिणी

अवतार स्थलमधुरमंगलम

आचार्य: कोइल कन्दाडै रंगाचार्य स्वामी (चण्दमारुतं डोडाचार्य तिरुवंश)

शिष्य: अनेक शिष्य

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: भूतपुरी

तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर का जन्म गौरवशाली  श्रीवत्स वंश में, मधुरमंगलम क्षेत्र में 1805 क्रिस्चन इरा, आंग्ल  वर्ष में हुआ था।  में, भगवान श्रीकृष्ण और पेरीयावाच्चन पिल्लै के नक्षत्र में जन्म जन्मे , इस बालक का नाम , इनके पिता-माता राघवाचार्य और जानकी अम्मा ने कृष्णन रखा।

बालक कृष्णन को बाल्यकाल में ही माता पिता ने,  वैदिक संस्कारो  से अभिसिंचित किये । यद्यपि बहुत ही अल्प आयु में बालक कृष्णन को, भगवान के प्रति अत्यंत प्रगाढ़ प्रेम था। बचपन से ही वे सदा भगवान के दिव्य विग्रहों के साथ खेला करते थे और भगवत विषय के प्रति इनमे जिज्ञासा और तल्लीनता थी । कृष्णन उर्फ़ कृष्णमाचार्य  के विवाह योग्य उम्र पा लेने के बाद , पिताश्री राघवाचार्य , कृष्णमाचार्य के लिए योग्य कन्या की तलाश प्रारंभ करते हैं।

इसी दरम्यान एक बार पिताश्री राघवाचार्य, कृष्णमाचार्य को लेकर , एक यात्रा पर निकलते हैं । मार्ग में कृष्णमाचार्य  एक दंपत्ति को अपनी संतान के साथ यात्रा करते हुए दीखते हैं। कृष्णमाचार्य का ध्यान इस दम्पति की तरफ जाता है , और अनुभव करते है की , पति बहुत सारा  सामान,  और अपनी संतान को संभाले हुए चल रहा है,  साथ ही कभी कभी अपनी पत्नी के साथ ऊँची आवाज़ में झगड भी रहा है, कृष्णमाचार्य यह भी महसूस करते है की , वह व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक प्रेम और लगाव की वजह से , झगडे के बावजूद भी उसके प्रति समर्पित भाव से उसके साथ चल रहा है ।

कृष्णमाचार्य वैवाहिक जीवन की इस  कटुता को महसूस कर स्तब्ध हो,  उसी क्षण निर्णय लेते है की वह कभी विवाह नहीं करेंगे और अपना यह निर्णय अपने पिता से भी कह देते हैं ।

कुछ समय बाद , कृष्णमाचार्य अपने आचार्य कोयिल कन्दाडै रंगाचार्य, को अपने पैतृक स्थान (कप्पियामुर) पधारने पर उनसे  आचार्य संबंध स्थापित कर , समाश्रयण लेते है। कोयिल कन्दाडै रंगाचार्य , कृष्णमाचार्य को पञ्च संस्कार संस्कार दीक्षा प्रदान कर , सत संप्रदाय के सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतो का ज्ञान प्रदान करते हैं।

कृष्णमाचार्य अपने आचार्य के साथ कई  यात्राओं  में उनके साथ उनकी सेवा में सलंग्न रहते है ।

एक समय की बात है जब कृष्णमाचार्य  तिरुवेंकटाचल में थे, एम्बार ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर मधुरमंगलं दिव्यदेश आने के लिए आमंत्रित करते है, साथ ही निर्देश देते है की आते समय , गर्म रजाई साथ लेकर आये, कहा की मधुरमंगलं में उन्हें बहुत शीतलता का आभास हो रहा है। कृष्णमाचार्य, भगवान वेंकटेश्वर के समक्ष पहुंचकर , उनसे मधुरमंगलं प्रस्थान करने की अनुमति लेते हैं,   भगवान श्री वेंकटेश उन्हें अपनी रजाई प्रदान करते हुए मधुरमंगलम यात्रा की विनती स्वीकार लेते है . कृष्णमाचार्य मधुरमंगलं पहुंचकर वेंकटचलपति द्वारा प्रदत्त रजाई एम्बार को समर्पित करते हैं। एम्बार की कृपा से, कृष्णमाचार्य में संन्यास आश्रम अंगीकार करने की प्रबल इच्छा जाग्रत होती है  । कृष्णमाचार्य वेंकटाचल लौटकर , वकुलाभरण जीयर (पेरिय जीयर) से,  सन्यास  दीक्षा प्रदान करने का आग्रह करते हैं।

वकुलाभरण जीयर सोचते हैं कि कृष्णमाचार्य अभी युवा हैं और उन्हें कुछ और समय प्रतीक्षा करनी चाहिए। इस पर कृष्णमाचार्य पेरिया जीयर से कहते हैं कि एम्बार की कृपा से उन्हें पुर्णतः विरक्ती की प्राप्ति हो गयी है और अब सन्यास  दीक्षा स्वीकार किये बिना उनका रहना संभव नहीं है। वकुलाभरण जीयर कहते हैं कि,  यदि पेरुमाल (वेंकटचलपति) इसकी स्वीकृति देते हैं तो वे उन्हें सन्यास  दीक्षा प्रदान करेंगे।

इसके पश्चात जीयर तिरुमाला के लिए प्रस्थान करते हैं , यात्रा करते समय जीयर को राह में एक त्रिदंड पर नज़र पड़ती हैं,  त्रिदण्ड अत्यंत कुशलता से बनाया हुआ था, जीयर उसे अपने साथ ले लेते हैं। राह में जब जीयर आराम के लिए रुकते हैं, तब  भगवान श्री वेंकटेशजी उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर आदेश देते हैं कि,  कृष्णमाचार्य को सन्यास दीक्षा से दीक्षित कर उन्हें यह त्रिदण्ड प्रदान करे।

भगवान का आदेश पाकर पेरिय जीयर प्रसन्नता पूर्वक कृष्णमचार्य को आमंत्रित कर , सन्यास दीक्षा  प्रदान करते हैं।।

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तिरुमलै जीयर का चित्रपट, साथ में एम्बार जीयर –तिरुमाला जीयर मठ में देखी गयी

 वकुलाभरण जीयर, कृष्णमाचार्यजी का भगवान श्री वेंकटेश्वरजी के प्रति अतीव प्रेम और समर्पण भाव को जानते थे। इसलिए जीयर उन्हें तिरुवेंकट रामानुज जीयर नाम प्रदान करते है , तद्पश्चात  कृष्णमाचार्यजी  मधुरमंगलं प्रस्थान कर , वहां कुछ समय एम्बार के कैंकर्य में संलग्न होकर , मधुरमंगलं एम्बार जीयर नाम से गौरव प्राप्त करते है ।

तिरुवेंकट रामानुज जीयर, ने अनेक दिव्य देशों की यात्रा की  , अंत में भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के उद्देश्य से , उनके अवतार स्थल श्री भूतपुरी पधारे। तिरुवेंकट रामानुज जीयर के शिष्यों ने मंदिर के दक्षिण दिशा में, तिरुवेंकट रामानुज जीयर के लिए एक मठ का निर्माण किये , तिरुवेंकट रामानुज जीयर इसी मठ में रहकर भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी का कैंकर्य करने लगे।

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आदि केशव पेरुमालभाष्यकार मंदिर, भूतपुरी

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एम्बार जीयर मठ, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कोइल स्ट्रीट, भूतपुरी

भूतपुरी में उनके समय में अनेक श्रीवैष्णवों ने उनके सानिध्य में हमारे सत संप्रदाय के विशेष सिद्धांतों का अध्ययन किया। हमारे पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों में वर्णित सिद्धांतों को उन्होंने अत्यंत कुशलता से समझाया और उस समय के बहुत से विद्वानों के ज्ञान को पोषित किया।

वे इस लीला विभूति में अल्प समय (77 वर्ष) के लिए रहे और विष्णु वर्ष के पौष्य मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि के दिन परमपद प्रस्थान किया।

उनकी सभी रचनाओं में से मुख्य है श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पिल्लै लोकाचार्य के श्रीवचनभूषण पर रचित व्याख्यान के लिए अरुमपदम। उन्होंने न केवल हमारे संप्रदाय के उत्कृष्ट ग्रंथ (श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र) पर व्याख्यान की रचना की अपितु श्रीवचन भूषण में दर्शाए गए भगवत/ भागवत कैंकर्य को सम्पूर्ण निष्ठा के साथ अपने जीवन में अनुसरण किया। हमारे सत संप्रदाय के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए उन्होंने अन्य कई ग्रंथों की रचना की।

विष्णु पुराण, तत्व त्रय, यतीन्द्रं मत दीपिका आदि ग्रंथों के आधार पर उन्होंने अत्यंत सूक्ष्मता से ब्रह्माण्ड की संरचना का वर्णन किया। इस संरचना को चित्रों द्वारा दर्शाया गया है और कुछ समय पहले ही श्री रवि नामक श्रीवैष्णव के प्रयत्नों से उसका पुनः मुद्रण किया गया है।

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तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जियर स्वामी का चित्रपट

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ब्रह्मांड– ब्रह्मा के ब्रह्माण की कल्पना

रचनाएँ: उनकी रचनाओं की सूचि इस प्रकार है:

  1. श्रीवचन भूषण के लिए अरुमपदम
  2. सिद्धोपाय सुदरिसनम
  3. सददरिसन सुदरिसनम
  4. दुदरिसन करिसनम
  5. विप्रतीपत्ति निरसनम
  6. श्री शठकोप स्वामीजी की श्रीसुक्ति “चेत्तत्तिन”…..पर व्याख्यान
  7. शरणागतिक्कु अधिकारी विशेषणत्व समर्थतनम्
  8. ज्योतिष पुरानंगलुक्कु ऐक कंत्य समर्थतनम्
  9. दुरुपदेसाधिक्कारम
  10. शरण शब्दार्थ विचारं
  11. श्रुतप्रकाशिका विवरणं
  12. मुक्तिपदशक्ति वादं
  13. ब्रह्मपदशक्ति वादं
  14. भूकोळ निर्णयं
  15. त्यागशब्दार्थ टिपण्णी
  16. गीतार्थ टिपण्णी
  17. कैवल्य सतदूषणी
  18. श्रीरामानुज अष्टपति
  19. सिद्धांत तूलिकै
  20. सिद्धोपाय मंगल दीपिका
  21. धर्मग्या प्रामाण्य प्रकाचिका
  22. सिद्धांत परिभाषा
  23. श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य विग्रह के ध्यान से श्रृंगारित – तिरुमंजन कट्टियम् आदि

इस तरह हमने अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे एक महान विद्वान् थे और उन्होंने हमारे सत संप्रदाय के हितार्थ बहुत से साहित्यिक रचनाओं का योगदान किया। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों का भी भगवत विषय में उनके अंश मात्र ज्ञान/भक्ति की प्राप्ति हो।

अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर की तनियन:

श्रीवादुल रमाप्रवाल रुचिर सरकसैन्य नाथाम्चज
श्रीकुरविन्द्रम महार्य लभ्ध निजसत सत्तम चरुथा भिष्ठं
श्रीरामानुज मुख्य देसिकलसत कैंकर्य समस्तापकम
श्रीमतवेंकटलक्ष्मणार्य यमिनाम तमसतगुणम भावये

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

आधार : https://guruparamparai.wordpress.com/2013/08/28/sriperumbuthur-first-embar-jiyar/

स्त्रोत्र : तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर प्रभावं नामक एक प्राचीन ग्रंथ- इस पूर्ण ग्रंथ को यहाँ देखा जा सकता है – https://drive.google.com/?tab=go&authuser=0#folders/0ByVemcKfGLucZnZBMjlIa1JHdFk

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