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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी का कालक्षेप गोष्टी- बाई ओर से दूसरे (पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्)

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श्री नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दिव्य चरणों मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर्, श्रीरङ्गम्

तिरुनक्शत्र – तुला, शतभिषक्
अवतार स्थल् – तिरुपुट्कुळि
आचार्यनम्पिळ्ळै
परमपद् प्राप्ती स्थल् – श्रीरन्गम्
लिखित् ग्रन्थ् – 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव| इनको वार्ता माला के ग्रन्थकार भी कह्ते थे, पर इस सूचना में स्पष्टता नही है|

ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है| ये अपने 6000 पडि गुरु परम्परा प्रभाव मे हमारे आळ्वारों और आचार्यो के ऐतिहासिक जीवन का वर्णन करते हैं|जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की|

एक बार जब पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् अस्वस्थ्य हुए, तब वे अन्य श्रीवैष्णवों को भगवान से उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करने के लिये कहे- ये श्रीवैष्णव शिष्टाचार के विरुद्ध है|भगवान से किसी भी वस्तु की प्रार्थना नही करना चाहिये – अच्छे स्वास्थ्य के लिये भी नही|इस कारण नम्पिळ्ळै के शिष्य, उनको यह घटना बताते हैं, और पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के इस आचरण का आशय पूछते हैं|नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को यह विषय पूर्णता से समझाने के लिये कुछ स्वामियों के पास भेजते हैं| उनमें से प्रथम थे, एङ्गळाळ्वान् जो शास्त्रो में निपुण थे| एङ्गळाळ्वान् स्वामीजी की राय थी कि “शायद वे श्रीरङ्गम् से अनुरक्त हैं और यहाँ से निकलने के लिये तैयार नही हैं| इसके पश्चात्, नम्पिळ्ळै अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् के पास भेजते हैं| तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् कहते हैं कि, “शायद पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी का कोई अधूरा काम रह गया हो जिसको पूर्ण करने के लिये वे अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं|” नम्पिळ्ळै इसके बाद शिष्यों को अम्मङ्गि अम्माळ् का अभिप्राय सुनने के लिये भेजते हैं| वे बताते हैं “नम्पिळ्ळै स्वामी के कालक्षेप गोष्ठी छोडने की इच्छा किसको होगी, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शायद इसी कारण अपने जीवन बढाने की इच्छा रखते हैं| “आखिर में नम्प्पिळ्ळै के कह्ने पर उनके शिष्य, पेरिय मुदलियार् से भी यह शंका पूछे| पेरिय मुदलियार् स्वामीजी का विचार था, ” नम्पेरुमाळ् के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामी का अत्यंत प्रेम ही उनमें यहाँ ज़्यादा दिन ठहरने की अभिलाषा जागृत कर रहा है|”अन्त में नम्पिळ्ळै, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से ही प्रश्न करते हैं कि इन में से कोई भी विचार उनके मन के विचार से मिलते है या नहीं? इस प्रश्न का उत्थर देते हुए पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् कह्ते हैं “आपकी कृपा के कारण ही आप यह उत्थर मेरी जिव्हा से सुनना चाह्ते हैं, जब की आप मेरे मन की बात से अनभिज्ञ नहीं हैं| प्रति दिन आपके स्नान के समय आपके दिव्य स्वरूप का दर्शन प्राप्त होता है तथा आपको पंखा करने का कैंकर्य प्राप्त होता है|यह कैंकर्य त्याग कर अभी परमपद कैसे जाऊँ? इस तरह पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् एक शिष्य के सबसे महत्त्वपूर्ण विधी को प्रकट करते हैं, अथार्थ अस्मदाचार्य के दिव्य रूप से आसक्त रह्ना|यह सुनकर अन्य शिष्य, नम्पिळ्ळै के प्रति पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के भक्ति को समझ कर स्तम्भित हुये |

नडुविल् तिरुवीधि पिल्लै भट्टर को नम्पिळ्ळै के शिष्य बनाने मे पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् ही उपकारी थे | यह घटना पूर्ण तरह से यहाँ दोहराया गया है | https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2015/08/21/naduvil-thiruvidhi-pillai-bhattar/.

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से संबंधित यह घटना व्याख्यानों में प्रस्तुत है :

वार्तामाला पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के जीवन की कुछ घट्नायें निम्न प्रस्तुत है|

  • 2- पिन्भळगिय जीयर्, नम्पिळ्ळै से एक बार स्वरूपम (जीवात्मा की प्रकृति), उपाय (साधन), उपेय (लक्ष्य) के विषयों में प्रश्न करते हैं| नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि, जीवात्मा कि चाहना स्वरूप है, भगवान कि दया उपाय और् माधुर्य उपेय है| जीयर् कह्ते हैं कि उनके विचार अलग है तब नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि आपका सिद्धांत क्या कहता है| जीयर् ने कहा, ” आपके द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर में ऐसा विचार करता हूँ; श्री वैष्णवों के शरण में प्रपत्ती करना ही मेरा स्वरूप है, हमारे प्रती उनका प्रेम ही उपाय है और् उनका आनन्द ही मेरा उपेय है”| यह् सुनकर नम्पिळ्ळै बहुत आनन्दित हुये| इस प्रकार जीयर अपने आचार्य के सामने “भागवत् शेषत्व” को प्रमाणित किया|
  • 69- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर नम्पिळ्ळै से द्वय महामन्त्र के दिव्य अर्थों के विषय में पूछते हैं|नम्पिळ्ळै प्रतिपादन् करते हैं कि द्वयम् के प्रथम पद् में जीवात्मा स्वीकार् करती है कि श्रीमन्नारायण भगवान ही एकमात्र पुर्णतः उसके आश्रय् है और् दूसरे पद में जीवात्मा पिराट्टी (श्रीलक्ष्मीजी) के सन्ग् परमात्मा के कैंकर्य, सेवा करने की चाहत प्रकट् करती है और् प्रभु से विनती करती है कि यह् कैंकर्य केवल् भगवान् के भोग्य मात्र है, इसमें हमारा कण मात्र भी स्वार्थ नहीं है|जिन आचार्य के कारण शिष्यों में ऐसा गहरा विश्वास जागृत हुआ है, उन श्रीआचार्य के प्रति सदा कृतज्ञ रह्ना चाहिये| आगे जीयर् पूछते हैं कि, अगर् पिराट्टि निरन्तर् एम्पेरुमान् के ध्यान में ही लीन है, तो वे जीवात्माओं की सहायता कैसे करेंगी? नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि जैसे भगवान, निरंतर पिराट्टी के सौन्दर्य का आनंद लेते हैं, परंतु तब भी वे सृष्टि आदि का कार्य संभालते हैं, वैसे ही पिराट्टी भी भगवान के रूप में निरन्तर मग्न होते हुये भी पुरुषकारत्व-भूता होने के कारण सदा जीवात्माओं के पक्ष में एम्बेरुमान् से अनुग्रह करती रहती है|
  • 174 –नम्पिळ्ळै के सेवा खोने के भय से जीयर अपने स्वास्थ्य के हितार्थ प्रार्थना किये| इस घटन का उल्लेख इस लेख में देखा गया है|
  • 216- नडुविल् तिरुवीदिप्पिल्लै भट्टर्, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् और् नम्पिळ्ळै के बीच के एक सुन्दर वार्तालाप का उल्लेख करते हैं| जीयर् का एक प्रश्न था कि, “प्रत्येक मुमुक्षु को आळ्वार की तरह होनी चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और उन्हीं का ध्यान सदा करने वाली)|पर हमें अभी भी सामान्य लौकिक अभिलाषाएं हैं|हमें कैसे वह प्रतिफल (परमपद में कैंकर्य प्राप्ती) मिलेगा?” नम्पिळ्ळै उत्थर देते हैं कि , “इस शरीर में आळ्वारो के तरह उन्नती न हो, फिर भी हमारी आचार्य के प्रति परिशुद्धता के कारण हमारी मृत्यु और् परमपद पहुँचने के अन्तर के समय में भगवान हमें भी वही अभिलाषाएं(आळ्वारो के जैसे) प्रदान करते हैं|परमपद पहुँचते समय हम परिशुद्ध हो चुके होंगे और केवल भगवान के निरन्तर कैंकर्य ही हमारी एकमात्र रूचि रहेगी.”
  • 332- पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् पूछते हैं, “जब किसी को कोई कष्ट होता है, तब एक् श्री वैष्णव से प्रार्थना करने पर  उसे उस कष्ट का निवारण मिलता है, तो क्या यह उस श्री वैष्णव की शक्ती से होता है या भगवान के शक्ती से है?” नम्पिळ्ळै उत्तर् देते हैं कि,” यह केवल भगवान की शक्ति से ही है”| आगे जीयर प्रश्न करते हैं, “तो क्या हमारे कष्टों के निवारण के लिए, हम स्वयं भगवान से प्रार्थना नहीं कर सकते?” नम्पिळ्ळै कह्ते हैं, “नहीं| भगवान से आग्रह, सदा एक श्रीवैष्णव के द्वारा ही करना चाहिये”| जीयर फिर प्रश्न करते हैं, “क्या ऐसा कोई द्रष्टांत है, जहाँ एक श्रीवैष्णव की इच्छा को भगवान ने पूरा किया हो?” इस प्रश्न के उत्थर में नम्पिळ्ळै महाभारत से एक चरित्र सुनाते हैं,” जब् अर्जुन ने सूर्यास्त के पह्ले, जयद्रत का वध करने की प्रतिज्ञा ली, सर्वेश्वर ने युद्ध में शस्त्र  ना उठाने की अपनी प्रतिज्ञा का त्याग किया और् सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर सूर्य को छुपा दिया| यह देखकर जयद्रत बाहर आया, तब तुरन्त् भगवान सुदर्शन चक्र को अपने पास लौटाकर स्पष्ट किये कि सूर्य अस्तमन नहीं हुआ है, और अर्जुन जयद्रत् का वध कर सका| इस चरित्र से हम समझ सकते हैं कि भगवान एक श्री वैष्णव के शब्द को निभाते हैं और इस कारण हमें भगवान का एक श्री वैष्णव के द्वारा ही आग्रह करना चाहिये”|

इस प्रकार पिन्भळगिय पेरुमाळ जीयर के यशश्वी जीवन के कुछ झलक हमें प्राप्त हुई| वे उत्तम विद्वान और् नम्पिळ्ळै के अति प्रिय शिष्य थे| उनके चरण कमलों में हम प्रार्थना करे कि हमें भी उनकी अंश मात्र  भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो|

पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के तनियन् :

ज्ञान वैराग्य सम्पूर्णम् पश्चात् सुन्दर देशिकम् |
द्राविडोपनिषद् भाष्यतयिनम् मत् गुरुम् भजे ||

-अदियेन् प्रीति रामानुजदासी

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श्रुत प्रकाशिका भट्टर् (सुदर्शन सूरि)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्शत्रः अपरिचित्

अवतार् स्तलः श्रीरन्गम्

आचार्य: वेदव्यास् भट्टर् और् नडादूरम्माळ्

लेखन् :  श्रुत प्रकाशिकै, श्रुत प्रदीपिकै, (तात्पर्य दीपिका) वेदार्थ् सन्ग्रह् की व्याख्यान्, शरनागति गद्य और् शुभाल उपनिशद् की व्याख्यान् , शुख पक्शीयम्

ये वेद् व्यास् भट्टर् के पोते थे. इनका नामकरण सुदर्शन सूरी (सुदर्शन भट्टर्) किया गया. ये हमारे सम्प्रदाय् के महान विद्वान बने. इन्होने ही श्री भाश्य के महत्वपूर्ण और गहरे टिप्पणियां श्रुत प्रकाशिकै तथा श्रुत प्रदीपिकै लिखे. इन ग्रंथों के नाम् इन्होने ऐसे रखा ताकी उपाधि से ही पता चले कि ये स्वामि रामानुज् से प्रकटित नडादूरम्माळ् द्वारा मिले विषय हैं|

अम्माळ् से श्री भाश्य सीख्ने के लिये भट्टर् कान्चीपुरम् पधारे. भट्टर् के अक्लमन्द् और् प्रतिभा से प्रभावित अम्माळ् अपना कालक्शेप् की शुरुवात भट्टर् की पहुँचने के बाद् ही करते थे. अम्माळ् के अन्य शिष्यों की सोच थी कि भट्टर् के उच्च परिवार की पृष्ठभूमि के कारण अम्माळ् भट्टर् के प्रति पक्शपात थे. भट्टर् की यश समझाने के लिये अम्माळ् एक बार कालक्शेप् के बीच रुखे और पिछले दिन की प्रसन्ग समझाने को वहा उपस्थित शिष्यों को आदेश दिया| इस पर उनके सारे शिष्य हैरान हुये और् मौन हो गये| उस समय भट्टर एक अक्षर भी बिना छोडे पिछले दिन की प्रसन्ग की परिपूर्ण सूचना दिया| इस सम्भव से वहाँ उपस्थित अम्माळ् के अन्य शिष्यों को भट्टर् की महानता की ज्ञान हुयी|

नम्पिळ्ळै तथा पेरियवाच्चान्पिळ्ळै के जैसे भट्टर् भी दिव्यप्रभन्धों के गहरे अर्थ स्थापित करने वाले टिप्पणियाँ लिखे| श्रीभाश्य अथवा वेदार्थ् सन्ग्रह् की टिप्पणियाँ लिखकर संस्कृत वेदान्त के गहरे अर्थो कि स्थाप्ना की|

इस प्रकार हम श्रुत प्रकाशिका भट्टर् के यशश्वी जीवन के कुछ झलक देखे. वे एक सम्पूर्ण महान विद्वान थे और नडदूरम्माळ् के अत्यन्त प्रीय शिष्य थे. हम उनकी चरण कमलो मे प्रर्थना करें कि हमे भी उनकी भागवत निश्ठा में से किन्चित प्राप्त् हो.

श्रुत प्राकसिका भट्टर् कि तनियन् :

यथीन्द्र क्रुत भाश्यार्था यद् व्याख्यानेन दर्शिताः |
वरम् सुदर्शनार्यम् तम् वन्दे कूर कुलादिपम् ||

अडियेन् प्रीति रामानुज दासी

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एन्गळाळ्वान्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

engaLazhwanएन्गळाळ्वान् सहित नडादूरम्माळ् (उत्तरवर्ती पूर्ववर्ती के चरणकमलों मे)

जन्म नक्षत्र – चैत्र मास, रोहिणि नक्षत्र

अवतार स्तल् – तिरुवेळ्ळरै

आचार्य   –  श्रीरामानुजाचार्य स्वामी तथा तिरुक्कुरुगैपिरान् पिळ्ळान्

शिष्य    –  नडादूरम्माळ्

परम्पद प्राप्त स्थल – कोल्लन्कोन्डान् (मदुरै के निकट)

लेखन (ग्रन्थ सूची) – सारार्थ चतुष्टयम् ( वार्तामाला का ) , विष्णु चित्तीयम् ( विष्णु पुराण की व्याख्या )

इन्का जन्म तिरुवेळ्ळरै मे हुआ और इन्के माता पिता ने इन्का नामकरण विष्णुचित्त नाम रखा|  आपश्री स्वामी रामानुजाचार्य के शिष्य बने और तिरुक्कुरुगैपिरान्पिळ्ळान् से भगवत विषय एवम् श्रीभाष्य सीखा | कहा जाता है कि स्वयं स्वामी रामानुजाचार्य ने “एन्गळाळ्वान्” का पद् पेश कर इन्को सम्मानित किया | (कारण भक्ति, ज्ञान तथा आचार्य निष्ठा मे ये कूरताळ्वान् के जैसे थे) | नडादूरम्माळ् (वात्स्य वरदाचार्य) इन्के प्रथम शिष्यों मे से एक थे और नडादूराळ्वान् ( स्वामी रामानुजाचार्य के शिष्य) के पोते थे | जब अम्माळ को अपने दादाजी से श्रीभाष्य सीखने कि इच्छा हुई तो नडादूराळ्वान् ने अपनी बडती उमर के कारण अपने पोते को एन्गळाळ्वान् के चरणो मे सीखने के लिये भेजा |

अम्माळ् एन्गळाळ्वान् के गृह पहुंचे और द्वार खट्खटाये |  भीतर से अळ्वान् ने प्रश्न किया, “कौन है ?” इसके जवाब मे अम्माळ् ने उत्तर दिया, “मैँ वरदाचार्य हूँ” | अळ्वान् कि आवाज़ आयी, “मैँ” कि मृत्यु होने पर लौटो” |  स्व-घर लौटने पर अम्माळ् ने अपने दादाजी नडादूराळ्वान् को यह घटना सुनाई | एन्गळाळ्वान् के जवाब का अर्थ आपश्री ने आपश्री के दादाजी से पूछा | नडादूराळ्वान् ने सम्झाया कि, खुद् को हमेशा “अडियेन्”, याने “दास” कह कर ही परिचय करना है | इससे अहंकार मिटता है | यह अर्थ समझने के पश्चात् आपश्री एन्गळाळ्वान् के घर पधारे और इस बार परिचय देते हुए खुद् को “अडियेन्” से संबोधित किया | इस उत्तर से प्रसन्न होकर एन्गलाळ्वान् ने नडादूरम्माळ् को अपने शिष्य के रूप मे स्वीकार किया | भविष्य मे अम्माळ् एक प्रसिद्द् ज्ञानी बनने के कारण एन्गळाळ्वान् “अम्माळ् आचार्य” के नाम से भी जाने गये | अपने चरम स्तिथी में, स्वामी रामानुजाचार्य ने एन्गलाळ्वान् को तिरुक्कुरुगैपिरान्पिळ्ळान् के चरणों मे आश्रय लेने का आदेश दिया |

हमारे व्यख्यानो मे एन्गळाळ्वान् कि महिमा जो घटनायें प्रकट करते हैं, उनमे से कुछ् निम्नलिखित प्रस्तुत हैं:

  1. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि -2.9.10- तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै व्याख्यान् – इस पासुर मे पेरियाळ्वार् भगवान् कृष्ण का जामून फलों के प्रति प्रेम का झलक दिखाते हैं| इस संबन्ध मे एन्गळाळ्वान् और नन्जीयर् के मध्य एक सम्वाद सुनाते हैं| एन्गळाळ्वान् ने निद्र के पहले जागृत अवस्था मे एक स्वप्न देखा | उसमे एक बालक ने आळ्वान् से जामून् माँगा | और आळ्वान् के पूछने पर अपना नाम “आयर् तेवु, नन्जीयर् का पुत्र” बताया | (आयर् तेवु नन्जीयर् का तिरुवारधन मूर्ती है | एन्गळाळ्वान् नन्जीयर् से मिलकर उनको बताये कि आपके मूर्ती हमे सोने नही देते |  फिर नन्जीयर् ने अपने पूजा-मन्दिर मे जाके, अपने भगवान से एन्गळाळ्वान् को तंग न करने की प्रार्तना की|
  2. मुदल् तिरुवन्दादि 44 – नम्पिळ्ळै/पेरियवाच्चान् पिळ्ळै की व्याख्या के अनुसार – इस पासुर मे पोइगैआळ्वार् स्थापित् करते हैं कि जो नाम और रूप भक्त को प्रिय है उनको भगवान् स्वीकार करते हैं| आगे देखे उसी विषय को यहा दूसरी दृष्टिकोण मे फिर दोहराते हैं| भगवान एन्गळाळ्वान् से अपना परिचय देते समय नन्जीयर् के दिया हुआ नाम देते हैं| एन्गळाळ्वान् के द्वारा यह सुनकर, नन्जीयर् अति प्रसन्न हुये |

एन्गळाळ्वान् के चरित्र से वार्तामाला मे लिखित कुछ विषयः

जब अम्मङ्गि अम्माळ् एन्गळाळ्वान् से हमारे सम्प्रदाय ज्ञान सीखने की प्रार्थना करते हैं, एन्गळाळ्वान् उनको सारार्थ- चतुष्ठयम् से  साम्प्रदायिक दर्शन के चार महत्वपूर्ण सिद्धान्त सम्झाते हैं|

  • स्वरूप ज्ञान (आत्मा के सच्चे स्वभाव का ज्ञान) – जीवात्मा परमात्मा का दास है और उनके अधीन  मे है |
  • स्वरूप यातात्म्य ज्ञान (आत्मा के सच्चे स्वभाव का विकसित ज्ञान) – जीवत्मा भागवतो का दास है और उनके अधीन में है |
  • विरोधी ज्ञान (बाधाओं का ज्ञान) – भागवतो से संबन्ध विच्छेद होने पर भी सामान्य कार्यो मे ध्यान देना | (अर्थात् भागवतो से दास का वियोग असहनीय होना चाहिये |
  • विरोधी यातात्म्य ज्ञान (विरोधी कि विकसित ज्ञान) – भागवत् संबन्ध मिलने के पश्चात्, उनमे अवगुण ढूँढना (अर्थात् भागवतो मे कभी अवगुण नहीं ढूँढना चाहिये |
  • फल ज्ञान (उद्देश्य का ज्ञान) – भागवतो के निर्देशों को बिना हिचकिचाहट पालन करना.
  • फल यातात्म्य ज्ञान (उद्देश्य से विकसित ज्ञान) – भूलोक के भागवतो की सेवा मे परमपद् भी त्याग करने केलिये तैयार रहना |
  • उपाय ज्ञान (विधि का ज्ञान) – जीवात्मा और परमात्मा के संबन्ध को निस्संदेह समझना और उसीके अनुसार पेश आना | (इसका विस्तृत स्पष्टीकरण है) |
  • उपाय यातात्म्य ज्ञान (विधि कि विकसित ज्ञान) –  परमात्मा रूपी भगवान शरीर रूपी चित (आत्मा) का शरीरी (आत्मा) है, जो सारे कार्य अपने प्रसन्नता के लिये ही करते हैं और भगवान् को छोड़कर (भगवान् को साध्य-साधन मानकर) अन्य सभी विधियों एवं साधनों के प्रती अनासक्त होना ही उपाय यातात्म्य ज्ञान है |

११८ – नडादूरम्माळ् को एन्गळाळ्वान् चरमश्लोक समझा रहे थे | “सर्व धर्मान् परित्यज्य” का विवरण सुनते समय, नडादूरम्माळ् को यह संकोच आता है कि भगवान् स्वतंत्रा (स्वातंत्रय) से शास्त्रो मे विवरित सारे धर्मो (उपायो) की उपेक्शा करने के बारे मे क्यो बात करते हैं| इसका उत्तर देते हुये एन्गलाळ्वान् कहते हैं कि यह भगवान का सच्चा स्वरूप है, वह सम्पूर्ण भाव से स्वतन्त्र हैं और भगवान जीवात्मा को, अपने स्वरूप के विरुध कोई और उपाय अपनाने के दोष से छुटकारा दिला रहे हैं – भगवान पर निर्भर होने के कारण, जीवात्मा को भगवान को अपना उपाय बनाना ही सही है | इस प्रकार एन्गळाळ्वान् स्पष्ट रूप मे स्थापित करते हैं कि यहाँ भगवान् के शब्द सर्वथा उचित है |

१५३ – इसमे एन्गळाळ्वान् एक आचार्य के सद्गुणों को बहु-सुन्दरता से प्रकट करते हैं| आचार्य वह है जो आत्मा को शारीरिक संबंधो से मुक्त करे, जिनको भगवान के प्रति स्वाभाविक दास्यता का ज्ञान है | अन्य देवातान्तारो के संबंधरहित एवं उनके प्रति अनासक्त हो , जिसको भगवान के सर्वज्ञता का ज्ञान हो , जो इस लोक मे सारा समय अर्चावतार भगवान के ध्यान मे हो और जो अन्त मे परमपद प्राप्त करता हो | केवल नामात्मक अन्य आचार्य जन खुद को संसार का नेता घोषित कर, अपने शिष्यों का धन समेटने मे ध्यान देते हैं और उनकी सेवा मे लगे रह्ते है |

१७३ – जब पिन्भळघराम पेरुमाळ् जीयर् ( नम्पिळ्ळै के खास शिष्य) बीमार पडे तो वे श्रीवैष्णवों को अपना स्वास्थ्य अभिवॄद्धि के लिये भगवान से प्रार्थना करने के लिये कहते हैं- यह श्रीवैष्णव शिष्टाचार के अनुसार अनुचित माना जाता है -भगवान् से किसी भी वस्तु की प्रार्थना नही करना चाहिये, स्वास्त्य भी नही ( तो चिकित्सक के पास जाने के बारे मे क्या कहे? ) | नम्पिळ्ळै के शिष्य उनसे जीयर के इस व्यवहार के बारे मे पूछे |  नम्पिळ्ळै बोलते हैं, आप पहले शास्त्र-निपुण एनगळाळ्वान् से इसका अर्थ पूछिए| इसके उत्तर मे एन्गळाळ्वान् बोलते हैं कि “शायद् जीयर् की श्रीरङ्गदिव्यदेश के प्रति आसक्ति के कारण कुछ दिन और यही निवास करना चह्ते हैं| इसके पश्चात् नम्पिल्लै अपने शिष्यों को तिरुनारायणपुरत्तु अरयर् के पास भेजते हैं | अरयर् स्वामी का जवाब था, “सम्भवतः जीयर् का कोई अपूर्ण कार्य रह गया हो जिसके कारण वे अपने जीवन को बढ़ाना चाहते हैं” | नम्पिल्लै की आज्ञा का पालन कर, इसके बाद उनके शिष्य अम्मङ्गि अम्माळ् से यही सवाल् पूछे | उनक उत्तर था, ” नम्पिल्लै कि घोष्ठी कौन छोडना चाहेगा ? शायद नम्पिल्लै कि कालक्षेप सुनने की इच्छा से जीयर् यहा और दिन बिताना चाहते हैं|” नम्पिल्लै फिर अपने शिष्यों को पेरिय मुदलियार् के पास भेजते हैं | उनका ख्याल था कि “जीयर् शायद् भगवान श्री रङ्गनाथ के प्रति उनके प्रेम के कारण यहा से निकलना नही चाह्ते हैं | ” नम्पिल्लै अन्त मे जीयर् से ही पूछे कि यदि इनमे से कोई दृष्टिकोण उनके विचार से मिलती है | जीयर् कहे, “नही | आप सर्वज्ञ है, आपकी कृपा के कारण यह मेरे मुख से प्रकट करना चाहते हैं | मै अपना जीवन इस लिये ज़ारी रखना चाहता हूँ क्योकि, प्रति दिन आपको स्नान के बाद आपके रूप का दिव्य दर्शन प्राप्त होती है और आपके लिये पंखा चलाने इत्यादि का कैङ्कर्य प्राप्त होता है | ये सब कैङ्कर्य त्याग कर कैसे परमपद् चलू ?” इस प्रकार पिन्भळघ पेरुमाळ् जीयर्, एक शिष्य के सर्व श्रेष्ठ सिद्दान्त को प्रकट करते हैं – अपने आचार्य के दिव्य स्वरूप के प्रति अत्यन्त प्रेमाभक्ति | नम्पिळ्ळै के प्रति जीयर् कि भक्ति के बरे मे सुनके सब आश्चर्यचकित हुये | इस सिद्दान्त के विवरण को पिळ्ळैलोकाचार्य ने अपने श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र मे (सूत्र ३३३) और मणवाळमामुनि ने अपने उपदेशरत्नमाला मे (पासुर ६५,६६) किया है|

इस प्रकार एन्गळाळ्वान् के यशस्वी जीवन का कुछ झलक हमने देखा | वह भागवत् निष्ठा मे सम्पूर्ण भावसे स्थित थे और स्वामी रामानुजाचार्य के भी प्रिय थे |

इनके चरण कमलों मे हमारी प्रार्थना यह है कि इनके जैसे भागवत् निष्ठा हममे भी थोड़ा आये |

एन्गळाळ्वान् जी का तनियन्

श्री विष्णुचित्त पद पङ्कज संश्रयाय चेतो मम स्पृहयते किमतः परेण |
नोचेन् ममापि यतिशेकरभारतीनाम् भावः कथम् भवितुमर्हति वाग्विधेयः ||

अडियेन् प्रीति रामानुज दासी

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