Author Archives: indumathiramanujadasi

कूरत्ताळ्वान्

श्री:

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवर मुनये नमः

श्री वानाचल महामुनये नमः

kurathazhwan

कूरत्ताळ्वान् – कूरम्

तिरुनक्षत्र : पुष्य मास – हस्त नक्षत्र

आवतार स्थल : कूरम्

आचार्यं : एम्पेरुमानार्

शिष्य : तिरुवरंगत्तमुदानार

परमपद प्रस्थान प्रदेश : श्रीरंगं

ग्रंथ रचना सूची : पञ्च स्तव (श्री वैकुण्ठ स्तव, अति मानुष स्तव, सुन्दर बाहु स्तव, वरदराज स्तव और श्री स्तव) , “यो नित्यम् अच्युत” और “लक्ष्मी नाथ” तनियन

  • कूरम् गाँव के सज्जन घराने में सन् १०१० (सौम्य वर्ष , पुष्य मास ,हस्ता नक्षत्र ) में कूरताळ्वार् और पेरुन्देवी अम्माळ को पैदा हुए थे । इन्हें “श्री वत्साङ्गन्” कहके नामकरन किया गया ।
  • बाल्य अवस्थ में ही इनकी माताजी आचार्य के श्री चरण कमल प्राप्त की थी (अर्थात् उनका परम् पदवास हुआ) |अगर शादी-शुदा व्यक्ति की पत्नी मर जाती है, तो शास्त्र के अनुसार, एक वर्ण-आश्रम में जीवन बिताने के लिए, उस व्यक्ति का पुनः विवाह करने का नियम है । लेकिन इनके पिताजी ने पुनः विवाह करने के लिए अनिष्ट प्रदर्शन किये और कहे कि “मेरी दूसरी शादी के बाद, अगर मेरी दूसरी पत्नी कूरत्ताळ्वान् के प्रति ठीक तरह से पेश नहीं आएगी, वह भागवत् अपचार ही होगा “। अति यौवन अवस्था में ही ऐसे महत्वपूर्ण गुण कूरत्ताळ्वान् मे विकसित हुए थे ।
  • देवपेरुमाळ की सेवा करने वाले तिरुक्कच्चि नम्बि से निर्देश प्राप्त करते थे ।
  • आण्डाळ से विवाह किया जो उनके समान उत्कृर्ष गुणों से परिपूर्ण थी ।
  • एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामी जी) का शरण पाकर, उनसे पञ्च संस्कार प्राप्त किये |
  • अपना सारा धन कूरम् में छोड़कर, अपनी धर्म पत्नी के साथ श्री रङ्गम् पहुँचकर, भिक्षा माँगकर अपना जीवन बिताने लगे ।
  • एम्पेरुमानार् के साथ बोधायन व्रुति ग्रन्थ प्राप्त करने कश्मीर को जाते हैं । वापस आते समय ग्रन्थ खो जाता है और परेशान एवं शोखाग्रस्त एम्पेरुमानार् को दिलासा देते हैं कि उन्होंने पूरा ग्रन्थ कंठस्थ कर लिया है । तत्पश्चात् श्री रङ्गम् पहुँचकर,एम्पेरुमानार् का अद्भुत ग्रन्थ “श्री भाष्यम् ” को ताड़ पत्र में ग्रन्थस्थ करने में सहायता किये ।
amudhanar-azhwan-emperumanar

अमुदनार                                                   कूरत्ताळ्वान्                                             एम्पेरुमानार्

  • नित्य तिरुवरङ्ग अमुदनार् को उपदेश करके उन्हें एम्पेरुमानार् का शिष्य बनाया | साथ ही एकाग-रीती के अनुसार अपने (तिरुवरङ्ग अमुदनार् के) आधीन मन्दिर एवं मन्दिर की चाबियों को तदनन्तर एम्पेरुमानार् को समर्पित किया | अत: कूरत्ताळ्वान् ने (तिरुवरङ्ग अमुदनार् के) हृदय परिवर्तन मे एहम पात्र का पोषण किया है ।
  • एम्पेरुमानार् के बदले शैव राजा के पास खुद जाकर, उनका दावा “परमात्म रुद्र ही है ” को तर्क से असत्य ठहराया और श्रीमन्नारायण के परत्त्वता कि स्थापना की, और अंत में श्री वैष्णव दर्शन (सम्प्रदाय) के लिए खुद अपने दर्शन (आँखों) खो दिया ।
  • श्री रङ्गम् छोड़कर, तदनन्तर तिरुमाळिरुम् शोलै मे १२ साल बिताते हैं । कळ्ळळगर् ( तिरुमाळिरुम् शोलै एम्पेरुमान् ) के प्रति सुन्दर बाहु स्तवम् (उनसे रचित पाँच स्तावोंमे से एक) का गान करते हैं ।
  • एम्पेरुमान् के आदेश के अनुसार, देव पेरुमाळ के प्रति वरदराज स्तव गाते हैं और अपने सभी सम्बंधी के लिए मोक्ष की माँग करते हैं – विशेष रूप से नालूरान् (जो उनके आँख खोने में प्रमुख पात्र थे) । कुल मिलकर, पाँच स्तव जो वेद-रस से पूर्ण हैं उनकी रचना करते हैं – श्री वैकुण्ठ स्तव , अति मानुष स्तव , सुन्दर बाहु स्तव , वरदराज स्तव और श्री स्तव ।
  • एम्पेरुमानर् इन्हें श्री रङ्गम् में पौराणिक कैङ्कर्य करने में नियुक्त करते हैं और उनके समय में अपने सम्प्रदाय के ग्रन्थ निर्वाही (कालक्षेपाचार्य) के रूप में सेवा करते थे ।

    azhwan_bhattars

    आळ्वान् अपने सुपुत्रों – पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर क साथ

  • श्री रङ्गनाथजी से महा प्रसाद प्राप्त करते हैं और प्रसाद पाने से उन्हें दो सुन्दर शिशु जन्म होते हैं । उन्हें पराशर और वेद व्यास भट्टर का नामकरण करते हैं ।
  • अरुळिचेयळ अनुभव में इतने मस्तमञ्जक होते थे कि जब कभी भी उपन्यास शुरू करते हैं, वह अनुभव से अपने आँखों में आसु भर देते थे या वह मूर्छित हो जाते थे ।
  • पेरिय पेरुमाळ इनसे वार्तालाप करते थे ।
  • आखिर में पेरिय पेरुमाळ से मोक्ष की प्रार्थना करते हैं और पेरिय पेरुमाळ उनकी विनती को स्वीकार करते हैं ।एम्पेरुमानार् उनसे पूछते हैं “कैसे आप मेरे से पहले जा सकते हैं ? ” उत्तर देते हुए कहते हैं “तिरुवाय्मोळि के शूळ विसुम्बणि मुगिळ के अनुसार जब एक जीवात्मा परम पद प्रस्थान होता हैं तब नित्य और मुक्त आत्मा स्वागत करते हुए उनकी पाद-पूजन करते हैं । आप मुझसे ऐसा पेश आना इससे मै असहमत हूँ । इसीलिए मैं आपसे पहले निकल रहा हूँ । “
  • कूरत्ताळ्वान् की वैभवता के बारे में और उनके जीवन के अनेक संघठन (ऐदिह्यम् ) व्याख्यन और गुरु परमपरा में विवर्णित है ।
  • क्या कूरत्ताळ्वान् की वैभवता को इस एक पृष्ठी में लिख सकते हैं ? बिल्कुल नहीं, अपितु यह हमारी अशक्तता है कि इनकी वैभवता जो असीमित है , इस एक पृष्ठी में लिख रहे हैं ।

कूरत्ताळ्वान् का तनियन

श्रीवत्स चिह्न मिश्रेभ्यो नम उक्तिम दीमहेः।
यदुक्तयः त्रयि कण्ठे यान्ति मङ्गल सूत्रताम् ।।

मैं श्री कूरत्ताळ्वान् का नमन करता हूँ, जिनके पाँच स्तव वेदों के मङ्गल सूत्र के समान है और जिनके ज्ञान के बिना परदेवता के बारे में स्पष्टता नहीं मिलती।

आळ्वान् की महत्त्वता (श्री उ. वे. वेळुक्कुड़ी कृष्णन् स्वामी आळ्वान् के १००० साल के उत्सव के अवसर पर प्रसङ्गित उपन्यास पर आधारित – मूल रूप http://koorathazhwan1000.webs.com/ में प्रचुरित किया गया है )

अर्वान्चो यत् पद सरसिज द्वन्द्वम् आस्रित्य पूर्वे ।
मूर्द्ना यस्यान्वयम् उपगता देसिका मुक्तिमापुः।।
सोयम् रामानुज मुनिर् अपि स्वीय मुक्तिम् करस्ताम्।
यत् सम्भन्दाद् अमनुत कटम् वर्नयते कूरनाथः।।

सीमित शब्दों से कैसे हम कूरत्ताळ्वान् की वैभवता के बारे में लिख सकते हैं (मोळिऐ कडक्कुम् पेरुम् पुघळान / वाचा मागोचर ) ? एम्पेरुमानार् सम्बन्धि होने के नाते सभी को मोक्ष प्राप्त होगी , कुछ लोगों को (जो एम्पेरुमानार् से भी बुज़ुर्ग हैं ) उनको तिरुमुडि (सिरस्) सम्बन्ध से और दूसरों को (जो एम्पेरुमानार् के बाद में पैदा हुए) उनके तिरुवडि (श्री पाद पद्म) सम्बन्ध से । ऐसे एम्पेरुमानार् खुद ऐलान करते हैं कि कूरत्ताळ्वान् के सम्बन्ध से ही उनको मोक्ष प्राप्त होगी ।

एम्पेरुमानार् के प्रधान शिष्यों में से कूरत्ताळ्वान् एक हैं । काञ्चीपुरम के कूरम् गाँव में एक सज्जन कुटुंब में इनका जन्म हुआ था। इन्हें श्री वैष्णव आचार्य के प्रतीक माना जाता है । आप श्री, तीन विषयों का घमंड न होने के कारण आप सुप्रसिद्ध एवं सर्वज्ञात हैं (अर्थात् अपने पढ़ाई यानि ज्ञान पे, एवं धन पे और कुल पे गर्व करना) । तिरुवरङ्गतु अमुदनार रामानुज नूट्रन्दादि में आप श्री की प्रशंसा करते हुए गाते हैं “मोळिइयै कडक्कुम् पेरुम् पुगळान् वन्झ मुक् कुरुम्बाम् कुळियै कडक्कुम् नम् कूरत्ताळ्वान् ” और यतिराज विंशति में मणवाळा मामुनि ने “वाचामगोचर महागुण देशिकाग्र्य कूराधिनाथ” कहके कीर्तन किया है अर्थात् यहाँ सूचित करते हैं कि उनकी वैभवता शब्दों के अतीत है । असल में एम्पेरुमानार् की कीर्तन करने के लिए रामानुज नूट्रन्दादि और यतिराज विंशति स्तोत्र हैं ।

श्री वैष्णव सम्प्रदाय में एम्पेरुमानार् प्रधान आचार्य हैं । यह श्री सम्प्रदाय, सनातन धर्म जो चित – आत्मा , अचित – द्रव्य पदार्थ और ईश्वर – परमात्मा तत्व का असीमित ज्ञान का भाण्डागार है, इसको यथारूप मे प्रतिनिधित्व करता है । एम्पेरुमानार् ने इस सार्वभौमिक धर्म को देश भर में प्रचार किया है । आप श्री दिव्य एवं अलौलिक असाध्य व्यक्तिगत स्वरूप वाले व्यक्ति है और आपने अनेक भूमिका निभाई जैसे – प्रचारक ,मन्दिर व्यवस्थापक, समाज सुधारक, मानवतावादी इत्यादि । वेद, वेदान्त, भगवत गीता, शरणागति शास्त्र (भगवान पे पूरी तरह से निर्भर होकर शरण पाना), वैदिक अनुष्ठान के अनेक अंश विवरण करते हुए ९ ग्रन्थ की रचना किया है ।

एम्पेरुमानार् श्री पार्थसारथी मंदिर से बहुत नज़दीकी तौर से झुड़े हुए थे । आप श्री के पिता श्री ने तिरुवळ्ळिकेनी के मूल मूर्ति श्री वेङ्कट कृष्णनन्/ श्री पार्ध सारथी के प्रार्थना के फल स्वरूप में एम्पेरुमानार् का जन्म हुआ । यह दिव्य देश १०८ दिव्य देशों में से एक है जिसका मङ्गलाशासन पेयाळ्वार , तिरुमळिसै आळ्वार और तिरुमँगै आळ्वार ने  किया है ।

गीताचार्य और आळ्वान् १ 

श्री पार्थ सारथी जो गीताचार्य हैं ने अर्जुन को भगवद् गीता प्रदान किया है । यह ग्रन्थ सनातन धर्म और विशेष तौर श्री कृष्ण की बोली होने के कारण श्री वैष्णवों के लिये सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है ।

श्री भगवद् गीता के १३ आध्याय में , क्षेत्र(शरीर) और क्षेत्रज (शरीर के ज्ञाता – आत्मा ) का अंतर समझाते हैं । उपदेश के अंतर्गत , भगवान के बारे में ज्ञात व्यक्ति के २० गुणों का वर्णन करते हैं । कूरत्ताळ्वान् के जीवन में यह सारे गुण अद्भुत रूप से प्रकाशित होते हैं । आईये एकेक करके कृष्ण भगवान से वर्णन किये गए इन गुणों को कूरत्ताळ्वान् के जीवन में से विशिष्ट उदहारण से देखें।

श्री भगवद् गीता – १३ अध्याय – ७-११ श्लोक

अमानित्वम् अडम्भित्वम् अहिंसा शान्तिर् आर्जवम् |
आचर्योपासनम् सौचम् स्थैर्यम् आत्म-विनिग्रहः ||

इन्द्रियार्तेशु वैराग्यम् अनहंकार एव च |
जन्म मृत्यु जरा व्याधि दुख दोशानुदर्शनम् ||

अशक्तिर् अनभिस्वङ्गः धार गृहादिषु |
नित्यम् च साम चित्तत्वम् इश्ठानिश्ठोपपत्तिसु ||

मयि चानन्य योगेन भक्तिर् अव्यभिचारिणि
विविक्त देश सेवित्वम् आरतिर् जन सम्सदि ||

अध्यात्म ग्यान नित्यत्वम् तत्त्व ग्यानार्थ् दर्शनम् |
एतत् ज्ञानानं इति प्रोक्तम् अज्ञानानम् यद् अतो अन्यथा ||

1. अमानित्वम् – विनम्रता

  • सज्जन और आलिशान घराने में पैदा होने के बावज़ूद श्री रङ्गम् में एम्पेरुमानार् की सेवा करने के लिए अपना सर्वस्व छोड़ दिया ।
  • श्री रङ्गम् में एकानक समय एम्पेरुमानार् पेरिय नम्बि से विनती करते हैं कि वे एक मुट्ठी भर रेत को मन्दिर के आस पास चारों ओर छिड़के ताकि दुष्ट शक्तियों से मन्दिर की रक्षा हो । पेरिय नम्बि किसीको अपने संगत ले जाने की सोचते हैं लेकिन एक शर्त लगाते हैं कि वह व्यक्ति बहुत ही विनम्र होना चाहिए – जो एक क्षण भी दूसरे व्यक्ति का अनुगमन के बारे में नहीं सोचेगा । कृपया आप कूरत्ताळ्वान् को भेजे क्यूँकि उनके अलावा और कोई भी दूसरा व्यक्ति विनम्र नहीं हो सकता ।

 2. अडम्भित्वम् – गर्वहीनता

  • बोधायन वृत्ति ग्रन्थ (ब्रह्म सूत्र का संक्षिप्त उपन्यास) हासिल करने के लिए श्री रामानुज के साथ कश्मीर जाते हैं और ग्रन्थ प्राप्त कर लौटते हैं । उस समय एम्पेरुमानार् के प्रति द्वेष भाव रहने वाले कुछ स्थानिक पण्डित उनसे ग्रन्थ छीन लेते हैं । एम्पेरुमानार् निराश होते हैं और सदमे में चले जाते हैं | तदनन्तर उन्हें आप श्री दिलासा देते हैं कि रात में उनकी सेवा करने के बाद ग्रन्थ को कण्ठस्थ किया है और चिन्ता करने की कोई बात नहीं है । इस संगठन में किञ्चित मात्र भी आप श्री ने गर्व नहीं दिखलाई ।

3. अहिंसा

  • एक बार साँप से शिकार हुयी एक मेंढक की ध्वनि को सुनते हैं । उस नादान प्राणी के बारे में सोचकर , रोते हैं और मूर्छित हो जाते हैं । इस दृष्टान्त से, वे सभी प्राणियों के प्रति अपने प्रेम-भावना को व्यक्त करते हैं। यह स्वयं श्री राम के अवतार माने जाते हैं जो वाल्मीकि रामायणं के अनुसार अयोध्या में अगर कुछ अशुभ सम्भव होता है , घटित व्यक्ति से पहले श्री राम रो पड़ते थे और अगर कुछ शुभ कार्य होता है , तब भी उस शुभ सम्भावित व्यक्ति से पहले श्री राम खुश होते थे ।

4. क्षान्ति – सहनशीलता

  • श्री तिरुकोष्ठियूर् नम्बि से एम्पेरुमानार् श्री भगवद् गीता चरम श्लोक का अर्थ सीखते हैं । श्री तिरु कोष्ठियूर् नम्बि सलाह देते हैं कि उनके शिष्य को सिखाने के लिए शिष्यों की कठिन परीक्ष करके ही शिक्षा दी जाय । जब कूरत्ताळ्वान् अर्थ सिखाने के लिए पूछते हैं तब एम्पेरुमानार् उनसे उनकी निष्टा का उदाहरण देने के लिए पूछते हैं और कूरत्ताळ्वान् उनके मठ के सामने पूरे एक महीने तक उपवास करते हैं । अंत में इनकी प्रतीक्षा का फल पाकर अर्थ प्राप्त करते हैं ।
  • शैव राजा के महल में आप श्री आँखों को खो जाने में मुख्य पात्र नालूरान् को क्षमा करते हैं और राजा को मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रार्थन करते हैं ।

5.  आर्जवम् – सच्चापन

  • कुछ समय तक भगवद् विषय पर तिरुवरङ्गत् अमुदनार् को उपन्यास करने के बाद , जब उन्होंने शिष्य बनने की इच्छा प्रकट किया, तब एम्पेरुमानार् के श्री चरण पाने के लिए सूचित किया।
  • पिळ्ळै पिळ्ळै आळ्वान् को उपदेश करने के बाद , सदा एम्पेरुमानार् पर निर्भर होने के लिए कहते हैं ।

6.  आचार्य उपासनम् – सदा आचार्य पर निर्भर रहना

  • जब श्री रङ्गम् में जीवन बिताने वाले एक गूँगे और बहरे व्यक्ति पर एम्पेरुमानार् अपना श्री चरण का स्पर्श कराते हैं , तब कूरत्ताळ्वान् रो पड़ते हैं और कहते हैं कि वेद सीखने से कुछ भी प्रयोजन नहीं हैं क्यूँकि एम्पेरुमानार् के श्री चरण पाना ही परम उपेय है । “त्रुणि क्रुत विरिन्चादि निरंकुश विभूतयः रामानुज पदाम्भोज समाश्रयण शालिन:” भी इसी अर्थ को सूचित करता है ।

7.  शौचम् – निर्मलता – बाहर की और अंदर की

यह ज़ाहिर है कि इतने महान व्यक्ति बाहर से स्वछ होंगे , नीचे दिया गया उदहारण आप श्री के ह्रदय की निर्मलता / शुद्धता को बताता है ।

  • जब शैव राजा के हरखतों के कारण एम्पेरुमानार् श्री रङ्गम् छोड़कर मेलकोटे निकल गए तब कूरत्ताळ्वान् श्री रङ्गम् में ही रहे । एक दिन , मन्दिर के अन्दर जाते समय , रक्षक भट उन्हें टोक कर कहता है “राजा ने आज्ञा दिया है कि एम्पेरुमानार् के सम्बन्धी को आलय में प्रवेश नहीं है ” । उसी समय दूसरा रक्षक भट कहता है की “कूरत्ताळ्वान् सद् गुणों के सम्पन्न हैं , इसीलिये हमें उन्हें जाने देना चाहिए ” यह सुनकर कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं “अगर मुझ में कुछ सद् गुण हैं वह केवल एम्पेरुमानार् के सम्बन्ध से ही है ” और आलय प्रवेश किये बिना वहाँ से निकल पड़ते हैं । इनका ह्रदय इतना निर्मल है की अगर कोई इन्हे स्वतः महान व्यक्ति माने , वे नहीं मानते हैं चाहे वह बात श्री रंगनाथ की दर्शन के लिए भी क्यों न कहा हो ।

8.  स्थैर्यम् – दृढ़ता

  • कुछ भक्त आप श्री से पूछते हैं कि क्यों श्री वैष्णव अन्य देवी-देवताओं का पूजन नहीं करते ? कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं कि यह इसलिए क्यूँकि हमारे पूर्वज (पूर्वाचार्य – महान वेद विद्वान ) नहीं करते थे, हम भी नहीं कर रहे हैं । इन्हे अपने पूर्वाचार्य के श्रीवचनों और अनुष्ठान मे ऐसी अटल दृढ़ता और अचञ्चल विश्वास था ।

9.  आत्मा विनिग्रहा – वैराग्य

  • जब आप श्री के पुत्र कल्याण प्राय में आते हैं तब आप श्री की पत्नी और कई और उन्हें वधु ढूढ़ने के लिए कहते हैं । कूरत्ताळ्वान् जवाब देते हैं की “ईश्वर कुटुम्बत्तुक्कू नम् यार् करैवतु ” माने “भगवान के कुटुम्ब के बारे में मैं क्यों आलोचना करूँ । यह श्री रंगनाथ की जिम्मेदारी है । “
  • जब एम्पेरुमानार् उनसे काँचीपुरम् के देव पेरुमाळ से प्रार्थना करके अपने आँखों की माँग करने के लिए कहते हैं तब कूरत्ताळ्वान् खुद को और नालूरान जो आप श्री के आँखों को खो देने में मुख्य पात्र थे उनको मोक्ष प्रदान करने की प्रार्थना की ।

10.  इन्द्रिय – अर्थेसु वैराग्य – इन्द्रियों के मामले में सन्यास

  • जब तिरुवरङ्गत् अमुदनार् कूरत्ताळ्वान् को अपना सारा धन देते हैं तब कूरत्ताळ्वान् उसे सड़क पर फ़ेंक देते हैं और एम्पेरुमानार् से कहते हैं कि अनावश्यक चीझों से छुटकारा पा लिया है ।

11.  अहँकार – झूठा अहंकार रहित

  • महान पंडित और धनवान होने के बावज़ूद , जब एम्पेरुमानार् उनसे श्री भाष्यम् लिखने के समय नाराज़ होते हैं , तब कूरत्ताळ्वान् कहते हैं “एम्पेरुमानार् मेरे स्वामी हैं और उनका मैं दास हूँ , इसी लिए मेरे साथ वह कुछ भी कर सकते हैं “

12.  जन्म-म्रुत्यु-जर-व्यधि-दुख-दोषानुदर्शनम् – निरंतर सँसार में दोष ढूंढना

  • एक बार एक शिशु के जन्म के बारे में सुनते हैं और कूरत्ताळ्वान् श्री रंगनाथ के पास जाकर रोते हैं । जब उनकी आसुँ का कारण पूछते हैं तो वे जवाब देते हैं कि “जब किसीको संसार के इस कैदखाना में डाल दिया जाय उन्ही के पास जाकर प्रार्थना करना चाहिए जो इस बन्दीखाने से छुटकारा दिला सके । क्यूंकि भगवान श्री रंगनाथ ही हैं जो हमें इस संसार से विमुक्त कर सकते हैं , इस शिशु के लिए मैंने उनके पास जाकर विनती की “।

13.  अशक्तिर् – अलगाव

  • जब एम्पेरुमानार् के शरण पाने के लिए श्री रङ्गम् निकलते हैं और जँगल के रास्ते चल रहे थे , कूरत्ताळ्वान् की देवी चिन्ताग्रस्त थी । उनकी चिंता का कारण पूछने पर बताती है कि नित्य कूरत्ताळ्वान् प्रसाद पाने का एक सोने का पात्र अपने साथ लेकर आई है । यह सुनते ही कूरत्ताळ्वान् उनसे पात्र छीनकर दूर फ़ेंक देते हैं और कहते हैं कि जब एम्पेरुमानार् और श्री रंगनाथ जी हैं तब इस पात्र की क्या आवश्यकता है । इससे यह पता चलता है कि इन में लेश मात्र भी लौकिक विषयों पे लगाव नहीं था ।

14.  पुत्र, धार, ग्रुह-आदिसु अनभिस्वन्गह् – पुत्र , धर्मपत्नी , ग्रुह से अलगाव

  • अपना सारा धन त्याग करके , श्री रङ्गम् पहुँचने के बाद बिक्षा वृत्ति स्वीकृत किया । अपना परिवार होने के बाद भी , शास्त्र के आचरण में बहुत अनुशासित थे ।
  • रहस्य त्रय (तिरुमंत्र , द्वय मन्त्र , चरम श्लोक ) के बारे में अपने शिष्यों को निर्देश देते समय , अपने संतान को उधर से निष्क्रम होने के लिए कहते हैं – लेकिन उन्हें वापस बुलाकर , रहस्य अर्थ का बोध करते हैं । किसीने इसके बारे में पुछा तो , आप श्री कहते हैं “भला कौन जानता है कि यह कितने दिन जीवित रहेंगे , घर पहुँचने से पहले ही इनकी मृत्यु हो सकती है , इसी कारण , मैं ने सुनिश्चित किया है कि रहस्य त्रय का अर्थ वे सीखे “। इस संघटना से पता चलता है कि , अपने संतान के प्रति आप शिर भावुक नहीं थे , लेकिन उन्हें भी आत्मा के रूप में देखते थे जो ज्ञान प्राप्त करके इस संसार से मुक्ति प्राप्त करें ।
  • यह भी कहा जाता है कि , अपनी पत्नी से कोई शारीरिक सम्बन्ध नहीं था और श्री रंगनाथ जी की प्रसाद से ही इन्हें सन्तान (वेद व्यास और पराशर भट्टर ) प्राप्त हुई ।

15.  इष्ठा अनिष्ठा उपपत्तिसु नित्यं सम चित्तत्वम् – सुख – दुःख में सम भावना

  • आप श्री ने अपने आँखों को त्यागने के बाद कुछ चिंता प्रकट नहीं किया । कहते हैं “जब भगवद् विरोधी के दर्शन करने के बाद यह आँखों क्या का प्रयोजन है ?” जब एम्पेरुमानार् श्री काँची वरद राजा से अपने आँखों को अनुग्रह करने की प्रार्थना करने के लिए कहते हैं , आप श्री खुश नहीं थे – कहते हैं “मैं एम्पेरुमानार् और एम्पेरुमान् को अपने अंतर दृष्टी से देख रहा हूँ | यह बाह्य आँखों की अब क्या ज़रूरत है? “

16.  मई अनन्य – योगेन भक्ति अव्यभिचारिनि – निरंतर श्री कृष्णा पे ध्यान करना

  • आँखों को खो देना, श्री रङ्गम् छोड़ना इत्यादि कई प्रतिकूल परिस्थितियों एवं अनुकूल सर्वावस्थितियों में भी निरंतर एम्पेरुमान् का सदैव ध्यान करने की प्रार्थना करते थे । कभी भी किसी और के पास नहीं गए न ही एम्पेरुमान् के अलावा किसी और चीज़ के लिए प्रार्थना किया ।

17.  विविक्त देश सेवित्वम् – विशेष स्थान में निवास करना

  • एक श्री वैष्णव के लिए विशेष स्थान में निवास करना मतलब उधर निवास करें जहाँ सिर्फ एम्पेरुमान् (भगवान) की सेवा होती है । कूरत्ताळ्वान् अपने आचार्य एम्पेरुमानार् के साथ रहते थे और सर्वदा एम्पेरुमान् और एम्पेरुमानार् की सेवा करने की ध्यान करते थे ।

18.  अरति: जना सम्सदी – सामान्य व्यक्तियों से अलगाव

  • महान भक्त सामान्य प्रजा से जुटने के बाद भी उनके प्रति अलगाव प्रदर्शन करते हैं । जब आप श्री को राजा जो इनसे उपदेश पाते थे और इत्यादि सामान्य जन से मिलना पड़ा तब भी किञ्चित मात्र भी लगाव का प्रदर्शन नहीं किया ।

19.  अध्यात्म ज्ञान नित्यत्वम् – अनन्त आत्मा ज्ञान के विषय में

  • बहुत कम उम्र से ही कूरत्ताळ्वान् आत्मा ज्ञान के प्रति आसक्त थे और आप श्री के चाल चलन में यह ज्ञान – सभी जीवात्मा परमात्मा के शेष भूत हैं – स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।

20.  तत्व – ज्ञान अर्थ चिन्तनम् – सच्चे ज्ञान की ध्यान करना

  • सभी जीवात्मा श्रीमन्नारायण के शेष भूत हैं इस सच्चे ज्ञान पे निरंतर ध्यान करते थे । इसी कारण जब आप श्री परम पद प्रस्थान हुए , तब एम्पेरुमानार् श्री वैष्णव को आज्ञा देते हैं कि कूरत्ताळ्वान् के कानों में द्व्य महा मन्त्र का उच्चारण करें क्यूँकि उसी मन्त्र के बारे में वे निरन्तर ध्यान करते थे ।

समापन
यह आश्चर्य का विषय है कि इतने सारे अद्भुत गुण एक ही व्यक्ति में समेटे गए हैं । इसी लिए पेरिय वाच्छान पिळ्ळै मणिक्क माला में कहते हैं “आचार्य और शिष्य के गुण कूरत्ताळ्वान् में प्रकाशित है “। आईये हम भी आप श्री से कुछ सीख पाकर अपने जीवन में लागू करके कूरत्ताळ्वान् और पूर्वाचार्य को प्रसन्न करें ।

source

अड़ियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

Advertisements

तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

thiruvarangaperumal-arayar

श्री रङ्गम -तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर्

तिरुनक्षत्र: वैशाख मास ज्येष्ठ नक्षत्र
अवतार स्थल: श्री रङ्गम
आचार्य: मणक्काळ नम्बि , आळवन्दार्
शिष्य: एम्पेरुमानार्(ग्रन्थ कालक्षेप शिष्य )
परमपद(वैकुण्ठ)प्राप्ति स्थल: श्री रङ्गम

तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् आळवन्दार् के सुपुत्र और उनके शिष्य गण में मुख्य थे । अरैयर् संगीत ,नृत्य और नाटक के महान कोविद थे । अध्ययन उत्सव के अरैयर् सेवा में, नम्पेरुमाळ के उपस्तिथि में, तिरुवायमोळि(१०.२) के “केडुमिडर् ” पदिग का गान कर रहे थे । उस समय में गोष्टी के नेता आळवन्दार् की ओर देखते हुए “नडमिनो नमर्गळउळ्ळिर् नामुमक्कु अरिय चोणोम्” का गान करते हैं अर्थात् “मेरे प्यारे भक्तों , इसी वक्त तिरुवनन्तपुरम जाईये “। आळवन्दार् इसे नम्पेरुमाळ का सन्देश मानते हैं और तिरुवनन्तपुरम के अनन्त शयन पेरुमाळ को मंगलाशासन करने के लिए निकल पड़ते हैं । आळवन्दार् के अन्तिम काल में बताई गई बातों से पता चलता है कि अरैयर् को तिरुप्पाणाळ्वार के प्रति बहुत लगाव था । तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् को पेरिय पेरुमाळ और तिरुप्पाणाळ्वार के प्रति अत्यन्त भक्ति थी और इसी कारण अपने आख़री समय आळवन्दार् सभी लोगों को उनके प्रति लगाव बढ़ाने की सलाह  देते हैं । इनकी ऐसी महानता है कि स्वयं आळवन्दार् ने सभी के समक्ष इनकी प्रशंसा की है । श्री रामानुज स्वामी जी का श्रीरङ्ग में आगमन के पीछे आप श्री ने एहम भूमिका निभाई है। आळवन्दार् के समय के बाद और एम्पेरुमानार् सन्यास आश्रम ग्रहण करने के बाद , श्रीरङ्गम के सभी श्री वैष्णव नम्पेरुमाळ से प्रार्थना किया करते थे कि श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीरङ्गम ले आये और तदनंतर इस क्षेत्र में उनके नित्य निवास की व्यवस्था करे । पेरिय पेरुमाळ तुरन्त देव पेरुमाळ से विनती करते हैं कि श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीरङ्गम भेजे । श्री रामानुज उनके बहुत प्रिय होने के कारण पेररुळाळन उनकी विनती इन्कार कर देते हैं । उस समय पेरिय पेरुमाळ एम्पेरुमानार् को श्रीरङ्गम लाने के लिए एक विशेष योजना बनाते हैं । अरैयर से कहते हैं की पेररुळाळन को संगीत और स्तोत्र बहुत पसन्द है और जब प्रसन्न होंगे तब कुछ भी देंगे । इस प्रकार अरैयर को आदेश देते हैं कि पेररुळाळन को प्रसन्न कर उनसे एम्पेरुमानार् को प्रसाद के रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना करें |

 varadhar-arayar-ramanujar

अरैयर् उसके बाद काँचीपुरम की ओर निकलते हैं । वहाँ वरम् तरुम् पेरुमाळ अरैयर् (स्थानीय अरैयर् ) उन्हें गौरव-मर्याद से स्वागत करके उन्हें अपने तिरुमालिगै को ले जाकर उनकी अच्छी देख-भाल करते हैं । उसके अगले दिन, अरैयर् का आगमन सुनकर तिरुकच्चि नम्बि उनसे मिलकर, प्रणाम समर्पण कर उनका सुःख-दुःख विचार करते हैं । अरैयर् नम्बि से उन्हें देव पेरुमाळ का मंगलाशासन करने की विनती करते हैं (यह परम्परां है कि जो कोई भी दिव्य देश दर्शन करने जाते हैं तो उस दिव्य-देश के स्थानीय श्री-वैष्णव के द्वारा ही दिव्य-देश के एम्पेरुमान् का दर्शन सेवा करते हैं ।) नम्बि उनकी विनती को स्वीकृत करते हैं और अरैयर् देव पेरुमाळ के दर्शन कर प्रणाम करते हुए कहा – “कधा पुनस् शङ्ख रथाङ्ग कल्पक ध्वज अरविन्द अङ्गुच वज्र लाञ्चनम् ; त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्भुज द्वयम् मदिया मूर्द्धनम् अलङ्करिष्यति ” मतलब “ओह त्रिविक्रम ! शंख , सुदर्शन चक्र ,कल्पक वृक्ष,कमल इत्यादि दिव्य चिन्हों से प्रकाशित चरण कमल कब मेरे सिर को अलंकृत करेंगे”। अपने अर्चक के द्वारा एम्पेरुमान् उन्हें तीर्थं, प्रसाद और श्री शठगोप इत्यादि प्रसाद करते हैं और उन्हें अपने सामने अरैयर सेवा करने का आदेश देते हैं। अरैयर् उत्कृष्ट भक्ति और  प्रेम से अनेकानेक श्लोक, आळ्वार् के श्री सूक्त से अभिनय पूर्वक गान करते हैं । एम्पेरुमान् बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और अनेक भेंट प्रसादित करते हैं । अरैयर् उन भेंट को निराकर करते हैं क्यूँकि देव पेरुमाळ ही हैं जो सभी के इच्छाओं की पूर्ति करते हैं , एम्पेरुमान् उनकी भी इच्छा पूर्ती करेंगे । एम्पेरुमान् राज़ी होते हैं और कहते हैं “मुझे और मेरी अर्धांगिनी के अलावा जो भी चाहो तुम पूछ सकते हो ।” अरैयर् श्री रामानुज की ओर इशारा करते हैं और उन्हें श्रीरङ्गम् ले जाने की प्रस्तावना करते हैं । देव पेरुमाळ कहते हैं “मैंने नहीं सोचा की आप उन्हें पूछने वाले हैं, कुछ और माँगीये”। अरैयर् जवाब देते हैं “आप दूसरे और नहीं हैं स्वयं श्रीराम के अवतार हैं – आप मेरे विनती को और टाल नहीं सकते हैं “।  देव पेरुमाळ आखिर में उनकी विनती स्वीकार करते हैं और श्री रामानुज को विदा करते हैं । अरैयर् श्री रामानुजर् का हाथ पकड़कर, श्रीरङ्गम् की ओर चल पड़ते हैं, श्री रामानुज आण्डान् और आळ्वान् के मठ जाकर , तिरुवाराधन पेरुमाळ (पेररुळाळन) और आराधन के वस्तु सामग्री लाने को कहते हैं और सब मिलकर देव पेरुमाळ से आज्ञा लेकर श्रीरङ्गम् निकल पड़ते हैं । इस तरह उन्होंने श्री वैष्णव सम्प्रदाय के सबसे प्रधान कैङ्कर्य यानि “श्री रामानुज को श्रीरङ्गम् लाकर, दृढता पूर्वक सम्प्रदाय की स्थापना करने एवं सम्प्रदाय नई ऊँचाईयों को छूने” मे एहम पात्र का पोषण किया । उडैयवर् को पाँच विविध अंश-बोध करने के लिए आळवन्दार् ने अपने पाँच शिष्यों को नियुक्त किया था । पेरिय नम्बि उडैवर् को पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं । पेरिय तिरुमलै नम्बि ने उन्हें श्री रामायण का बोध किया  । तिरुकोष्टियूर् नम्बि ने  तिरुमन्त्र और चरम श्लोक का ज्ञान प्रदान किया । तिरुमलै आण्डान् तिरुवाय्मोळि का अर्थ अनुग्रह किया । तिरुवरंगपेरुमाळ अरैयर् को अरुळिचेयळ और चरमोपायम्(उत्कृर्ष साधन  – आचार्य निष्ट ) का कुछ भाग शिक्ष देने का आदेश आळवन्दार् से प्राप्त हुआ । एम्पेरुमानार् तिरुवाय्मोळि का सारार्थ परिपूर्ण रूप से  तिरुमलै आण्डान् से ग्रहण करते हैं । तत्पश्चात् पेरिय नम्बि उन्हें अरैयर् से सम्प्रदाय का सार ग्रहण करने की आज्ञा देते हैं ।  एम्पेरुमानार् , शास्त्र से नियमित सिद्धान्त का अनुशीलन करते हुए , अरैयर् के पास अध्यायन करने से पहले उनकी शुश्रूषा ६ महीने तक करते हैं । प्रति दिन दूध को उचित उष्ण में प्रस्तुत करते थे और साथ ही आवश्यक अनुसार शरीर पर लगाने के लिए हल्दी का मिश्रण भी तैयार करके देते थे ।

namperumal-arayar-ramanujar

एकदा एम्पेरुमानार् से तैयार किया गया हल्दी का मिश्रण अरैयर् को पसन्द नहीं आया और उडैयवर् अरैयर् के मुखमण्डल को देखकर, जो असंतुष्टि प्रकट कर रहा था, नापसंदगी का कारण जान गए । उडैवर् तुरन्त हल्दी का दूसरा मिश्रण तैयार करते है जो अरैयर् के मन को अत्यन्त मोहित करता है और तदनन्तर अरैयर् उन्हे चरम उपाय और उपेय अर्थात् “आचार्य कैङ्कर्य” का बोध करते हैं । अरैयर् शिक्षा देते हैं की “आचार्य कोई और नहीं बल्कि एम्पेरुमान् जो क्षीर सागर में शयनित हैं उनका प्रत्यक्ष रूप हैं “।  हमने चर्मोपाय में इसके बारे में चर्चा की हैं ।

कई ऐधियम् (पूर्वाचार्य के निज़ी जीवन में घटित संघटन) में अरैयर् की महानता वर्णित हैं । आईये कुछ यहाँ देखे

१. ईडु व्याख्यान (१. ५. ११ ) “पालेय् तमिळर् इशैकारर्” के विवरण में – ” इशैकारर् ” अर्थात् संगीत विद्वान और नम्पिळ्ळै आळ्वान् को बताते समय तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् को इशैकारर् से सम्बोधित करते हैं ।

२. ईडु व्याख्यान(३.३.१) मे, नम्पिळ्ळै विवरण देते हुए बताते हैं जब अरैयर् “ओळिविळ कालमेलाम्” का गान करते समय, भावुक होकर कालमेलाम्, कालमेलाम्, कालमेलाम्, कालमेलाम् (सारा समय) यह कहते हुए ही पासुर की पूर्ती करते हैं । इस पदिग में, आळ्वार तिरुवेङ्कट अमुदायन् नित्य कैङ्कर्य के लिए प्रार्थना करते हैं और इस पदिग को द्वय मन्त्र के दूसरी पंक्ति (कैङ्कर्य प्रार्थना) का विवरण माना जाता हैं । आईये तिरुवरङ्ग पेरुमाळ अरैयर् के श्री चरण कमलों मे प्रार्थना करें कि हम भी उनकी तरह एम्पेरुमान् , आळ्वार  एवं आचार्य के प्रति भक्ति कैङ्कर्य भाव प्राप्त करें ।

तनियन

श्रीराममिश्र पदपंकज संचरीकम् श्रीयामुनार्यवरपुत्रमहंगुणाब्यम् |
स्रीरन्गराज करुणा परिणाम दत्तम् श्रीभाश्यकार शरणम् वररन्गमीडे ||

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

source

मारनेरि नम्बि

 

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

alavandhar-deivavariandan-maranerinambi

आळवन्दार्(बीच में) दैववारी आण्डान् और मारनेरि नम्बि के साथ – श्री रंगम् श्री रामानुजर् सन्निधि में मूर्ति

तिरुनक्षत्र – ज्येष्ठ मास , आश्ळेषा नक्षत्र

अवतार स्थल – पुरांतकम् (पाण्ड्य नाडु में एक गाँव )

आचार्य – आळवन्दार्

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंगम्

मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे ।

इन्हें मारनेर् नम्बि कहके भी सम्भोदित करते हैं – जो मारन (नम्माळ्वार्) की तरह गुणों से सम्पन्न हैं ।

यह आळवन्दार् के कालक्षेप सुनने में और पेरिय पेरुमाळ के गुणानुभव में पूरी तरह से जुट जाने के लिए मशूर थे । राग – अनुराग के अतीत, भव-बन्धनों से विमुक्त होकर श्री रंगम् मंदिर के प्रकाराम में ही अपना जीवन बिता रहे थे ।

अन्तिम दशा में पेरिय नम्बि (जो अपने प्रिय सखा ) से विनती करते हैं कि उनके अन्तिम सँस्कार का भार खुद स्वीकार करें और उनके देह सम्बन्धि रिश्तेदारों को उनकी तिरुमेनि (दिव्य रूप) को न सौंपें क्यूँकि वह श्री वैष्णव नहीं हैं । उनके शरीर की तुलना हविस (यज्ञ में समर्पण किया जाने वाला) से करते हुए बताते हैं कि वह वस्तु केवल भगवान को समर्पण करने लायक है और कोई अन्य लोग उसे छूना भी नहीं चाहिए । पेरिय नम्बि उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और मारनेरि नम्बि के परम पदम् प्रस्थान होने के बाद उनका चरम कैंकर्य विधिपूर्वक करते हैं । उनके वर्ण के कारण स्थानिक वैष्णव पेरिय नम्बि के इस कार्य को अस्वीकार करते हैं और उनसे चुनौती करते हैं । उनके इस कार्य के बारे में एम्पेरुमानार् से शिकायत करते हैं । एम्पेरुमानार् पेरिय नम्बि के ज़रिये मारनेरि नम्बि की महानता की स्थापना करना चाहते थे और इसी कारण से पेरिय नम्बि के पास जाकर उनसे प्रश्न करते हैं । एम्पेरुमानार् उनसे पूछते हैं कि “मैं एक तरफ सभी जनों के दिमाग़ में शास्त्र के प्रति भक्ति और विश्वास बढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ और आप दूसरी तरफ ऊपरी तौर से शास्त्रों के विरुद्ध काम क्यूँ कर रहें हैं ? (यहाँ शास्त्र का मतलब विशेष शास्त्र – भागवत कैंकर्य) “। पेरिय नम्बि जवाब देते हैं कि “भागवत कैंकर्य करने के लिए हम किसी और को नियमित नहीं कर सकते हैं । कैंकर्य खुद करना चाहिए । जटायु के अन्तिम सँस्कार श्री राम ने किया है । मैं श्री राम से बड़ा नहीं हूँ और वह जटायु से कम नहीं हैं – इसलिए उनके लिए कैंकर्य करना दोष रहित हैं । नम्माळ्वार् के पयलुम् शुडरोळि (तिरुवाय्मोळि ३.७ ) और नेडुमार्केडिमै (तिरुवाय्मोळि ८.१० ) भागवत शेषत्व को गौरवान्वित करना केवल सैद्धान्तिक नहीं हैं । उनके दिए गए दिव्य उपदेशों में से हमें कम से कम कुछ विषयों का पालन करने की कोशिश करना चाहिए ।” यह सुनकर एम्पेरुमानार्  बहुत प्रसन्न होते हैं और पेरिय नम्बि को दण्डवत प्रणाम करते हैं और घोषणा कर देते हैं कि पेरिय नम्बि ने वास्तव में एक महान कार्य ही किया हैं । यह सुन्दर संवाद को अति सुन्दरता से मणवाळ मामुनिगळ ने पिळ्ळै लोकाचार्यर् के श्री वचन भूषण २३४ सूत्र के व्याख्यान में लिखा है।

कैसे नम्बि जी का वैभव उपरोक्त व्याख्यान में कुछ जगह पर प्रकाश डाला गया हैं । आईये कुछ यहाँ देखे ।

  • तिरुप्पावै २९ – आई जनन्याचार्यर् व्याख्यान – इस पाशुर के व्याख्यान में पेरिय नम्बि और एम्पेरुमानार् के बीच में घटित सम्वाद का वर्णन किया गया है । मारनेरि नम्बि के अन्तिम दिनों में उन्होंने बहुत शारीरिक बाधायें झेलि । उस समय वह चिन्तित हो जाते हैं कि उनके अन्तिम क्षण में वह एम्पेरुमान् पे ध्यान नहीं कर सकेंगे । उनकी दशा देखकर पेरिय नम्बि एम्पेरुमानार् से पूछते हैं कि क्या मारनेरि नम्बि परम पद प्राप्त करेंगे। एम्पेरुमानार् जवाब देते हैं कि अवश्य उन्हें परम पद प्राप्त होगा क्यूँकि श्री वराह पेरुमाळ ने अपने वराह चरम श्लोक में बताया है कि जो कोई भी उन्हें आश्रय किये हैं वो उनके बारे में सोचेंगे और उनके अन्तिम समय में परम पद अनुग्रह करेंगे । पेरिय नम्बि कहते हैं कि ऐ शब्दों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं क्यूँकि यह हो सकता हैं कि केवल अपने दया(भू देवी के प्रति उनकी प्रेम) के कारण उन्होंने कहा होगा और वास्तव में अपने वचन की पूर्ती नहीं भी कर सकते हैं । एम्पेरुमानार् कहते हैं कि पिराट्टी हरदम एम्पेरुमान् के साथ रहते हैं और उन्हें उस समय संतुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं कहेंगे । पेरिय नम्बि उनसे प्रमाणं (सबूत) माँगते हैं जहाँ बतलाया गया है कि भगवद् विषय में संलग्न हुए भक्तों को मोक्ष मिला है। एम्पेरुमानार् कण्णन एम्पेरुमान् – गीता ४. १० ( श्रीमद् भगवद् गीता ) श्लोक बताते हैं – “जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवं यो वेत्ति तत्वत्: त्यक्त्वा देहम् पुनर् जन्म नैति मामेति सोर्जुना ” कहते हैं की जो भगवान के जन्म और कार्यकलाप जो सच्ची तौर से जानेंगे, वह अपने जीवन के आखिर में परम पद प्रस्थान जरूर होंगे । एम्पेरुमानार् के इन शब्दों को सुनकर पेरिय नम्बि संतुष्ट हो जाते हैं ।
  • पेरिय तिरुमोळि ७.४ – पेरिय वाच्चन पिळ्ळै के व्याख्यान के प्रस्तावन में – इस पदिग (कंसोरा वेंकुरुति ), तिरुमंगै आळ्वार् ने तिरुसेरै सारनाथ एम्पेरुमान् के आश्रित श्री वैष्णवों का कीर्तन करते हैं । यहाँ पेरिय नम्बि  मारनेरि नम्बि का अन्तिम सँस्कार पूर्ती करने का विषय सूचित किया जाता है ।
  • मुदल तिरुवन्दादि १ – नम्पिळ्ळै व्याख्यान – यहाँ बताया जाता है कि – अगर कोई मारनेरि नम्बि से यह पूछे कि कैसे एम्पेरुमान् को याद रखे , तब एम्पेरुमान् को भूलने का रास्ता बताने के लिए उत्तर देते हुए पूछते हैं (क्यूँकि उनका ध्यान एम्पेरुमान् पर निरंतर लग्न रहता हैं और उन्हें भूलना वह सोच भी नहीं सकते )।
  • श्री वचन भूषणम्(३२४) – पिळ्ळै लोकाचार्यर् ने इस अनुच्छेद में श्री वैष्णवों का कीर्तन किया हैं और स्थापित करते हैं कि एक खास वर्ण में पैदा होने के कारण श्री वैष्णव की महानता कम नहीं होती है । कई उदाहरणों में से उन्होंने पेरिय नम्बि एम्पेरुमानार् को मारिनेरि नम्बि के अन्तिम सँस्कार करने का विवरण देते हैं । मणवाळ मामुनिगळ अपने सुन्दर व्याख्यान में इस सम्वाद का सार बहुत अच्छी तौर से बताते हैं ।
  • आचार्य ह्रदय ८५ -अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार्, अपने बड़े भाई पिळ्ळै लोकाचार्यर् का अनुगमन करते हुए – इस चुरनिकै (श्लोक) में इसी घटना का प्रस्ताव करते हुए मारनेरि नम्बि की कीर्ति पे प्रकाश डालते हैं ।

इस प्रकार मारनेरि नम्बि के जीवन के कुछ झलक देखे हैं । आळवन्दार् के प्रति बहुत प्रीति रहने वाले मारनेरि नम्बि के श्री कमल चरणों को अपना प्रणाम समर्पण करें ।

टिप्पणी : मारनेरि नम्बि का तिरुनक्षत्र पेरिय तिरुमुडि अडैवु में आषाढ़ मास , आश्ळेषा नक्षत्र लिखा गया लेकिन वाळि तिरुनाम में ज्येष्ठ मास , आश्ळेषा नक्षत्र लिखा गया है ।

मारनेरि नम्बि तनियन

यामुनाचार्य सच्शिष्यम् रंगस्थलनिवासिनम् ।
ज्ञानभक्त्यादिजलधिम् मरनेरिगुरुम् भजे ।।

source

अड़ियेन् इन्दुमति रामानुज दासि

मुदल आळवार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अपने पूर्व अनुच्छेद में हमने पोन्नडिकाल जीयर् के जीवन के विषय में चर्चा की थी। इस क्रम को आगे बढ़ते हुए, अब हम अन्य आळवार और आचार्यों के विषय में जानेंगे। इस अनुच्छेद में मुदल आळवारों की वैभवता के बारे में चर्चा करेंगे।

पोइगै आळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , श्रवण नक्षत्र

अवतार स्थल – काँचीपुरम्

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना – मुदल तिरुवन्दादि

इनका जन्म तिरुवेखा यथोक्ताकारि मन्दिर के तालाब में हुआ था। इन्हें कासार योगी और सरो मुनीन्द्र भी कहते हैं ।

तनियन्

कांञ्चयाम् सरसि हेमाब्जे जातम् कासारा योगिनम् ।

कलये यः श्रियः पति रविम् दीपम् अकल्पयत् ।।

——————————————————————————————————————————————

भूदताळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , धनिष्ट नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुकडलमल्लै

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना – इरंडाम् तिरुवन्दादि

भूदताळवार का जन्म तिरुकडलमल्लै में शयन पेरुमाळ मन्दिर के तालाब में हुआ था। इन्हे भूतःवयर् और मल्लपुरवराधीशर के नामों से भी जाना जाता है।

तनियन्

मल्लापुर वराधीसम् माधवी कुसुमोधभवम् ।

भूतम् नमामि यो विष्णोर् ज्ञानदीपम् अकल्पयत् ।।

——————————————————————————————————————————————

पेयाळवार

तिरुनक्षत्र – अश्वयुज मास , शतभिषक नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुमयिलै

आचार्य – सेनै मुदलियार्

ग्रंथ रचना सूची – मून्राम तिरुवन्दादि

पेयाळवार का जन्म तिरुमयिलै केशव पेरुमाळ के तालाब में हुआ था। इन्हे महताह्वयर, मयिलापुराधिपर् से भी जाना जाता हैं ।https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2013/08/31/dhivya-dhampati/

तनियन

दृष्ट्वा हृष्टम् तधा विष्णुम् रमैया मयिलाधिपम् ।

कूपे रक्तोतपले जातम् महताह्वयं आश्रये ।।

—————————————————————————————————————————————–

मुदल आळ्वारों का वैभव

मुदल आळ्वारों (तीनो आलवारों) को साथ में गौरवान्वित किया जाता है, इसके निम्न कारण है-

  • द्वापर युग की समाप्ति और कलि-युग के प्रारंभ में (युग संधि – संक्रमण काल में) इन तीन आळ्वारों का जन्म क्रमानुसार हुआ – सरोयोगी आळ्वार, भूदताळ्वार, महदयोगी आळ्वार।  ।
  • ये तीनों आळ्वार अयोनिज थे – अयोनिज अर्थात वह जिनका जन्म माता के उदर से नहीं हुआ है। वे सभी भगवान के दिव्य अनुग्रह के द्वारा पुष्प से उत्पन्न हुए।
  • इन्हें जन्म से ही भगवान के प्रति अत्यंत प्रीति थी- भगवान का परिपूर्ण अनुग्रह उन्हें प्राप्त था और उन्होंने जीवन पर्यंत भगवत अनुभव का आनन्द प्राप्त किया।
  • एक समय, उनकी एक दूसरे से भेंट हुई और उस समय से वे साथ-साथ रहने लगे। उन्होंने साथ मिलकर कई दिव्य देशों /क्षेत्रों के दर्शन किये। इन्हें “ओडि तिरियुम योगीगळ” – निरन्तर तीर्थ यात्रा में रहने वाले योगि भी कहा जाता हैं ।

यह तीनों आळ्वार विभिन्न प्रदेशों में अवतरित होकर, भगवान का अनुभव कर रहे थे। भगवान, जो सदा अपने अडियार (भक्तों) को ही अपना जीवन मानते हैं (गीता -ज्ञानी तु आत्म एव मे मतम्) इन तीनों आलवारों को इकट्ठे देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने तिरुक्कोवलूर में तीन आळ्वारों के मिलन के लिए एक दिव्य व्यवस्था की।

एक दिन जोरदार बारिश में वे एक -एक करके एक छोटी सी कुटिया में आने लगे। कुटिया के अन्दर पहुँचने पर, उन्होंने देखा की वहाँ केवल तीन व्यक्तियों के खड़े रहने का स्थान है। भगवत भाव में पूर्णरूप से निमग्न होने के कारण, वे एक दूसरे के बारे में विचार करके एक दूसरे के बारे में जानना प्रारंभ करते है। जिस समय वे एक दूसरे के साथ अपने दिव्य भगवत अनुभव बाँट रहे थे, तब भगवान अपनी तिरुमामगळ के साथ अचानक उस अँधेरी कुटिया में पधारे। वहां कौन पधारे है, यह जानने हेतु –

  • सरोयोगी आळ्वार ने संसार रूपी दीपक, समुद्र रूपी तेल और सूरज रूपी रौशनी से दीप प्रज्वलित किया।
  • भूदताळ्वार ने अपने प्रेम रूपी दीपक, अपने प्रेम स्नेह रूपी तेल और मानस रूपी प्रकाश से दीप प्रज्वलित किया |
  • महद्योगि आळ्वार, अन्य दो अळ्वारों की सहायता द्वारा, पिराट्टि, शंख ,चक्र आदि आयुधों से सुशोभित आभायमान भगवान के अत्यंत सुन्दर रूप का दर्शन प्राप्त करते हैं और उनके उस सेर्ति (पिरट्टि ,शंख ,चक्र और भगवान साथ-साथ ) का मँगलाशासन करते हैं ।

इस प्रकार, ये तीनों आळ्वार, तिरुक्कोवलूर आयन और अन्य अर्चावतार भगवान के स्वरूपों का साथ-साथ अनुभव करते हुए इस लीला विभूति में अपना जीवन बिताये।

ईडु व्याख्यान में , नम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी), मुदल आळ्वारों के विषय में अति सुन्दरता से वर्णन करते हैं। आईये ऐसे कुछ उदहारण देखते है-

  • पैए तमिळर्(1.5.11) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, आळवन्दार् द्वारा दिए गए विवरण का उदहारण देकर बताते हैं। नम्माळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी), मुदल आळ्वारों को गौरवान्वित करते हुए कहते हैं कि भगवान की महानता/ प्रभुत्वता को प्रथम बार सुमधुर तमिल भाषा में इन्होने ही प्रकाशित किया हैं ।
  • इन्कवि पाडुम परमकविगळ (7.9.6 ) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, मुदल आळ्वारों को “सेन्तमिळ पाडुवार” (मधुर तमिल भाषा में गाने वाले) करके संबोधित करते हैं। वे बताते हैं कि तीनों आळ्वार तमिल भाषा के महान पण्डित थे – उदहारण देते हैं की जब सरोयोगी आळ्वार और महद्योगी आळ्वार ने भूदताळ्वार से भगवान के गुण कीर्ति को गाने के लिए पूछा, तब जिस प्रकार एक नर-हाथी अपनी मादा-हाथी के कहने पर तुरन्त मधु इकट्ठा करके देते है, उसी प्रकार उन्होंने अनायास ही भगवान के गुण गान प्रारंभ किये। ( भूदताळ्वार – “पेरुगु मधवेळम”- इरंडाम तिरुवन्दादि- 75 पाशुर)
  • पलरड़ियार मुन्बरुळिय (7.10.5) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी अति सुन्दरता से श्रीशठकोप स्वामीजी के मन की बात बताते है। श्रीशठकोप स्वामीजी बताते हैं की भगवान ने श्री वेद व्यास , श्री वाल्मीकि , श्री पराशर और तमिल विद्वान मुदल आळ्वारों आदि महऋषियों के बजाये उन्हें तिरुवाय् मोळि गाने के लिए अनुग्रहित किया।
  • शेङशोर कविकाल(10.7.1) – श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, मुदल आळ्वारों को “इन्कवि पाडुम परमकविगळ”, “सेन्तमिळ पाडुवार” इत्यादि शब्दों से पुकारते हैं और यह निर्धारण करते हैं कि वे अनन्य प्रयोजनर्गळ (बिना लाभ अपेक्षा के एम्पेरुमान् के गुण गाते) हैं ।

मामुनिगळ (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) अपनी उपदेश रत्न माला (७ पाशुर) में बताते है कि किस प्रकार ये तीन आळ्वार मुदल आळ्वारों के रूप में प्रसिद्ध हुए-

मत्तुल्ला आळ्वार्गल्लुक्कु मुन्ने वन्दुदित्त नळ तमिळाल् नूल सेयता नाट्टैयुत्त –

पेत्तिमैयोर् एंरु मुदल आळ्वार्गळ ऐन्नुम पेयरिवर्क्कु निंर्दुलगत्ते निघळन्दु

अनुवाद :

यह तीन आळ्वार अन्य 7 आळ्वारों से पहले उत्पन्न हुए और अपने दिव्य तमिल पाशुरों से इस जगत को प्रकाशित किया। इनके ऐसे महानतम कार्यों के फलस्वरूप ही, इन्हें मुदल आळ्वार, ऐसे नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

पिळ्ळै लोकम् जीयर् अपने व्याख्यान में कुछ रमणीय भाव बताते है-

  • वे बताते है कि मुदल आळ्वारों को संप्रदाय में उसी प्रकार माना जाता है, जिस प्रकार प्रणव (ॐ कार) को आरंभ के रूप में माना जाता है।
  • वे यह भी सूचित करते हैं ये आळ्वार द्वापर – कलि युग संधि (संक्रमण काल में ) प्रकट हुए थे और तिरुमळिशै आळ्वार (श्रीभक्तिसार स्वामीजी) भी उसी समय प्रकट हुए। तदन्तर, कलि युग के प्रारंभ में, अन्य आळ्वार एक के बाद एक प्रकट हुए।
  • मुदल आळ्वारों ने तमिळ भाषा में दिव्य प्रबन्ध की स्थापना की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि अश्वयुज मास – श्रवण, धनिष्ट और शतभिषक  नक्षत्रों  की महत्वता और वैभवता इन तीनों आलवारों के प्रकट होने से ही है।

पेरियावाच्चान पिल्लै के तिरुनेडुताणडगम व्याख्यान के अवतारिका (भूमिका खंड) में बताया है कि मुदल आळ्वार, भगवान की परतत्वता/ प्रभुत्वता पर अधिक केन्द्रित थे। इसी कारण, प्रायः वे भगवान के त्रिविक्रम अवतार की स्तुति किया करते थे। दूसरी और, बहुत से अर्चावतर भगवान का भी इन्होंने गान किया है, क्यूँकि सहज स्वभाव/ प्रकृति से ही सभी आलवारों को अर्चावतर भगवान के प्रति अत्यंत प्रीति है। उनके अर्चावतर भगवान अनुभव को http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-azhwars-1.html पर देखा जा सकता है।

युग संधि

हमारे सम्प्रदाय के बहुत से विशेष विषय “यतीन्द्र मत दीपिका” में समझाये गये है और श्रीवैष्णव सिद्धांत का यह अत्यंत प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है। यहाँ काल तत्व के बारे में विस्तृत विवरण और विविध युग एवं सन्धि काल के बारे में जानकारी प्रदान की गयी है।

देवताओं का एक दिन (स्वर्ग में) मनुष्य काल में (भूमि पर) एक वर्ष का है ।

  • एक चतुर युग 12000 देव वर्षों का होता हैं – (कृत युग – 4000, त्रेता युग – 3000, द्वापर युग – 2000, कलि युग – 1000 ) ब्रह्मा का एक दिन 1000 चतुर युग के बराबर है।
  • उनकी रात की अवधि भी दिन के बराबर होती है, परंतु उस समय सृष्टि नहीं होती। ब्रह्मा ऐसे 360 दिन से बने 100 साल जीवित रहते हैं ।
  • युगों के बीच का संधि काल अधिक अवधि होती हैं ।युगों के बीच के संधि काल निचे दिया गया हैं:
    • कृत युग और त्रेता युग के बीच का संधि काल 800 देव वर्ष है।
    • त्रेता युग और द्वापर युग के बीच का संधि काल 600 देव वर्ष है।
    • द्वापर युग और कलि युग के बीच का संधि काल 400 देव वर्ष है।
    • कलि युग और अगले कृत युग के बीच का संधि काल 200 देव वर्ष है।
    • और ब्रह्मा के एक दिन में , 14 मनु , 14 इन्द्र और 14 सप्त ऋषि (ये सब जीवात्मा के कर्मानुसार दिए गए पद्वी है)

-अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

आधार – http://guruparamparai.wordpress.com/2012/10/22/mudhalazhwargal/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

नम्पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “नन्जीयर” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य ( नम्पिळ्ळै) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवल्ळिकेणि

तिरुनक्षत्र : कार्तिक मास , कृत्तिका नक्षत्र

अवतार स्थाल : नम्बूर

आचार्य : नन्जीयर

शिष्य :वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि

परमपद प्रस्थान: श्री रंगम से

रचना : तिरुवाय्मोळि के ३६००० पडि ईडु व्याख्यान, कण्णिनुन् सिरुताम्बु व्याख्यान, तिरुवन्दादियों के व्याख्यान, तिरुविरुत्तम् व्याख्यान

नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

पेरिय तिरुमोळि ७.१०.१० में बतलाया जाता हैं की – तिरुकण्णमंगै एम्पेरुमान् तिरुमंगै आळवार् के पासुरों का अर्थ स्वयं उन्ही कि बोली में सुनना चाहते थे  – इसी कारण माना जाता हैं कि कलियन नम्पिळ्ळै हुए और एम्पेरुमान् पेरियवाच्चान पिळ्ळै के रूप में पुनरावतार लेकर अरुलिच्चेयल के सकल अर्थ उनसे सुने और सीखें।

नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बनाना चाहा । जब श्री वैष्णव गोष्टि में विचार किया  तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । वरदराजर कावेरी के उस पार स्थित अपने स्वग्राम को जाकर लिखने कि योचना किये ताकि वोह लिखने पे ध्यान देकर जल्दी से समाप्त कर सके । नदि पार करते समय अचानक से बाड़ आ जाती हैं और वरदराजर तैर कर अगले तट पहुँचते हैं । तैरते समय मूल प्रति जो उनकी हाथों में थी छूट जाती हैं और वे बर्बाद हो जाते हैं । स्वग्राम पहुँचकर अपने स्वग्राम पहुँचकर आचार्य के दिव्यमंगलस्वरूप और उनके द्वारा बतलाये गए दिव्यार्थों पर ध्यानकेंद्रित कर वापस ९००० पड़ी व्याख्यान लिखना शुरू कर देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ  बताते हैं और नन्जीयर सुनके प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं ।

जिस प्रकार भट्टर और नन्जीयर के बींच का रिश्ता और उनके संवाद ( संबन्ध ) थे , उसी प्रकार नन्जीयर और नम्पिळ्ळै के बींच का रिश्ता और संवाद अती आनन्ददायक और अत्युत्तम ज्ञानार्थों  से भर्पूर थे | इन्के बींच हुए संवाद आप भगवद्बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे प्रस्तुत है  :

  • नन्जीयर से नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि क्यूँ जब उपयान्तर (अनेक उपाय) के लिए बहुत सारे प्रमाण हैं लेकिन शरणागति को कोई प्रमाण नहीं हैं । नन्जीयर पहले बताते हैं कि जब कोई विषय प्रत्यक्ष से जान सकते हैं उसे प्रमाण कि जरूरत नहीं होती हैं – उदाहरण बताते हैं कि  डूबता हुआ मनुष्य किसी साधन लेकर पकड़ कर ठहरता हैं या उसे थाम लेता हैं जो नहीं डूब रहा हैं – ठीक उसी तरह हम संसार में डूब रहे हैं और एम्पेरुमान् वोह हैं जो डूब नहीं रहे हैं और एम्पेरुमान् कि शरण लेना बहुत उचित उपाय हैं । अनन्तर वे शरणागति शास्त्र कि मान्यता बताते हुए शास्त्र से कुछ प्रमाण दिखाते हैं । वे कहते हैं कि एक विषय कि मान्यता उस पर आधारित प्रमाणो कि गिनती से नहीं किया जाता – उदाहरण के लिए इस संसार में संसारि ज्यादा और संन्यासी कम हैं , इसका मतलब यह नहीं हैं कि संसारि होना उचित हैं । यह जवाब सुनकर नम्पिळ्ळै प्रसन्न हो जाते हैं ।
  • नम्पिळ्ळै नन्जीयर से पूछते हैं कि कब एक मानव स्वयं को श्रीवैष्णव मान सकता हैं ?नन्जीयर उत्तर देते हुए बताते हैं कि जब अर्चावतार में परतत्व पेहचान सकेंगे , जब अन्य श्री वैष्णव के संतान और धर्म पत्नी को स्वपरिवार के सभ्य कि तरह मानते हैं (उन का लगाव स्वपरिवार और अन्य श्री वैष्णव के परिवार पर सामान रहेगा ) और जब अन्य श्री वैष्णव बेइज्जात करें उसे खुशी के साथ स्वीकार कर सकते हैं तब हम खुद को श्री वैष्णव कह सकते हैं ।
  • जब नम्पिळ्ळै नन्जीयर के पास श्री भाष्यम् सुन रहे थे तब नन्जीयर उन्हें आदेश देते हैं कि वे उनके एम्पेरुमान् का तिरुवाराधन करें । नम्पिळ्ळै उनसे कहते हैं कि तिरुवाराधन का क्रम उन्हें पता नहीं हैं तब नन्जीयर उनसे कहते हैं कि द्वय महा मंत्र (मध्य में सर्व दिव्य मंगल विग्रहाय “जोड़कर करने से अर्चावातर में एम्पेरुमान् के सौलभ्य गुण प्रकाशित होती हैं जो मूर्ति में उनकी व्यापन सूचित करती हैं । ) जपते हुए करें | इससे हमे यह साबित होता हैं कि अपने पूर्वाचार्य सब विषयों के लिए द्व्य महा मन्त्र पर पूरी तरह से निर्भर थे ।
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि एम्पेरुमान् के अवतारों का प्रयोजन क्या हैं ? नन्जीयर उन्हें बताते हैं कि एम्पेरुमान् ने बड़े-बड़े कार्य अपने कंधे पे ले लिया हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कि जो कोई भी भागवत अपचार करेंगे उन्हें उचित तरह से दण्डित किया जा सके । ( उदाहरण के लिया कण्णन् एम्पेरुमान् (भगवान श्री कृष्ण ) ने खुद बहुत कष्ट सहन करके यह पक्का करते हैं कि दुर्योधन जो उनके भक्त के प्रति अपचार किया हैं उसे अंत में मरन दण्ड प्राप्त हो  )
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि भागवत अपचार का मतलब क्या होता हैं ? नन्जीयर बताते हैं कि अन्य श्री वैष्णव को खुद को समान मानना। वे आळ्वारों के कई पासुरों को उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत करते हुए दर्शाते है की भागवत ( भगवान के प्रपन्न भक्त ) कैसे सर्वश्रेष्ट उत्तम और महान है । इस विषय को ध्यान मे रखते हुए हमे सदैव यह मानना चाहिये की प्रत्येक श्रीवैष्णव (जो कोई भी जाति / वर्ण इत्यादि से हो) हमेशा हमारि तुलना मे उत्तम और सर्वश्रेष्ट है । । वे यह भी कहते हैं कि आळ्वार और पूर्वाचार्यों कि तरह हमें भी सदैव भागवतों कि स्तुति करनी चाहिए ।
  • नन्जीयर नम्पिळ्ळै से कहते हैं कि भगवत अनुभव में निमग्न हुए भक्तों को इतर लोक के विषय अनुभव जैसे ऐश्वर्य , अर्थ ,काम पूरी तरह से त्यजनीय हैं । इस विषय को आळ्वार के कई पासुरों को उदाहरण लेकर समझाते हैं । उदाहरणों के लिये – नन्जीयर तिरुमंगै आळ्वार की वार्ता को दोहराते है । वे कहते है – तिरुमंगै आळ्वार ने भौतिक जगत के प्रति अपने आसक्ति का त्याग कर दिया जब उनको भगवान के दिव्यगुणो और वैभव का एहसास हुआ और तुरन्त अपने दिव्यप्रबंध को शुरू करते हुए उन्होने कहा – ” वाडिनेन वाडि  .. नारायणा एन्नुम् नामम् ”  ( जिसका मतलब हैं कि एम्पेरुमान् ( भगवान ) भगवान का दिव्यनाम ( तिरुनामम् ) मिलने तक मैं संसार के हाथों में दुःख झेल रहा था ) । यह सुनने के बाद नम्पिळ्ळै तुष्ट हो जाते हैं और उसी क्षण से उनका कैंकर्य करते और कालक्षेपं सुनते नन्जीयर के साथ रह जाते हैं ।
  • नन्जीयर तिरुवाय्मोळि कालक्षेप १०० बार करते हैं और नम्पिळ्ळै उनके लिए सदाभिषेक महोत्सव का आयोजन करते हैं । नन्जीयर के इन कालाक्षेपों के द्वारा पूर्वाचार्यों से दिये गए सारे अर्थ विशेषों का लाभ पाते हैं ।

नम्पिळ्ळै कई अनोखे लक्षण के समाहार हैं और उनकी महानता नाप नहीं सकते हैं । नन्जीयर तमिल (द्राविद), संस्कृत भाषा और भाषासंबंधित साहित्य मे असामान्य तौर से निपुण थे । उनके उपदेशों में वे तिरुक्कुरळ , नन्नुळ , कम्ब रामायणम् इत्यादि द्राविड़ ग्रंथों से और वेदान्तम् , विष्णु पुराण , श्री वाल्मीकि रामायण इत्यादि ग्रन्थ से कई उदाहरण बिना कुछ संकोच के साथ बताते थे । नन्जीयर इतने सक्षम और माहिर थे की वे किसी की भी शंखा (जो आळ्वारों और उनके अरुलिच्चेयल् पर आधारित हो) को श्रीमद्वाल्मीकि रामायण (जिसे प्रत्येक वैदिक व्यक्ति सर्वोच्च मानते थे) के मूल सिद्धांतो पर आधारित तर वितर्क से संतोषजनक समाधान से संतुष्ट करते थे । आईये देखें कुछ घटनाये जो उनकी महानता और विनम्रता को दर्शाती हैं ।

  • नम्पिळ्ळै श्री रंगम पेरिय कोविल मूल स्थान में प्रदक्षिण करने कि पूर्व दिशा (पेरिय पेरुमाळ तिरुवडि कि ओर ) में नित्य अपना भाषण देते थे । इसी कारण आज भी हम सन्निधि में दर्शन होने के बाद उस प्रदेश में प्राणाम करते हैं । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी तोडा हैं ।

  • नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे ।
  • नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं , उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे । तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कियी होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं । इस संघटन को मामुनिगळ अपनी उपदेश रत्न माला में बताते हुए नम्पिळ्ळै और तोळप्पर को गौरवान्वित करते हैं । इसी से हम नम्पिळ्ळै कि निश्चलता/पवित्रता जान सकते हैं । हम यह भी जान सकते हैं इस घटना के बाद तोळप्पर भी नम्पिळ्ळै के सहवास से पवित्र होते हैं ।
  • नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावन देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

नम्पिळ्ळै के जीवन में ऐसे कई संघटन हैं जहाँ वे उनके शिष्यगण को अमूल्य पाठ और उपदेश देते है | आप भगवद्-बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे इसका उल्लेख है :

  • एक बार नम्पिळ्ळै अपने शिष्य गण के साथ तिरुवेळ्ळरै से वापस नाव मे आ रहे थे , उसी समय नाविक ( नौका चलाने वाला ) ने अपने दृष्टिकोण से कहा – कावेरी मे बाढ आया है और इस कारण उपस्थित गोष्टि मे किसी एक व्यक्ति को नदी के पानी मे कूदना होगा जिससे नाव संतुलित रहेगा और नम्पिळ्ळै बच जाए । यह सुनते ही एक बूढ़ी औरत बाढ के पानी में कूद पड़ती है और यह देखकर नम्पिळ्ळै दुःखित हो जाते हैं । जब वे तट पहुँचते हैं तब उस बूढ़ी औरत कि आवाज़ नजदीकि द्वीप से सुनायी देती हैं । बूढ़ी औरत बताती हैं कि नम्पिळ्ळै प्रत्यक्ष हो कर उनकी रक्षा किये । इस संघटन मे बूढी औरत यह स्पष्ट रूप से दर्शाति है की किस तरह उन्होने अपने प्राण-त्याग करके अपने आचार्य की सेवा की उसी प्रकार हमे भी करना चाहिये । नम्पिळ्ळै ने यह दर्शाया है की कैसे एक आचार्य विपरीत परिस्थितियों मे अपने निर्भर शिष्यों का संरक्षण कैसे करे ।
  • नम्पिळ्ळै के समीप एक घर मे एक श्री वैष्णव स्त्री रहती थी । एक दिन श्री वैष्णव उस औरत के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि अगर वे उनका घर नम्पिळ्ळै के घर से मिला दें तब उनका घर (तिरुमालिगै) बड़ा हो जायेगा और बहुत सारे श्रीवैष्णवों के लिये आश्रय होगा । पहले उनकी विनती को अस्वीकार कर देती हैं लेकिन बाद में नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि उनके घर के बदले में उन्हें परम पद में स्थान अनुग्रह करें । नम्पिळ्ळै एक पत्र लिख कर उसके हाथ में देते हैं । उस पत्र को लेकर थोड़े दिन के बाद अपना चरम शरीर छोड़कर औरत परमपद प्राप्त कर लेती हैं ।
  • नम्पिळ्ळै की दो पत्निया थी । एक बार उनकी पहली पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । उनकी दूसरी पत्नी से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । वे उत्तर देते हैं कि नम्पिळ्ळै उनके प्रिय पति हैं । नम्पिळ्ळै उनसे पहले पत्नी की सहायता करके श्री वैष्णव का प्रसाद पाने के लिए कहते हैं । वे कहते हैं श्री वैष्णवों का शेष प्रसाद पाने से उनका शुद्धिकरण होगा और उनके लौकिक विचार (पति-पत्नि) आध्यात्मिक (आचार्य-शिष्य) विचारों मे बदलेंगे ।
  • जब महा भाष्य भट्टर उनसे पूछते हैं कि जब अपनी निज स्वरुप (चैतन्य) एहसास होने के बाद श्री वैष्णव की सोच कैसी होनी चाहिए । नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि ऐसे श्री वैष्णव नित्य एम्पेरुमान् ही उपाय और उपेय मानना चाहिए , स्मरणातीत काल से सँसार के इस बिमारी के चिकित्सक आचार्य के प्रति कृतज्ञता से रहना चाहिए, एम्पेरुमानार के श्रीभाष्य द्वारा स्थापित सिद्धान्तों को सत्य मानना चाहिये , श्री रामायण के द्वारा भगवद् गुणानु भव करना चाहिए , अपना सारा समय आळ्वारों के अरुळिचेयल में बिताना चाहिए । अंत में कहते हैं कि यह दृढ़ विशवास होना चाहिये की इस जीवन के अंत में परमपद की प्राप्ति निश्चित हैं ।
  • कुछ श्री वैष्णव पाण्ड्य नाडु से नम्पिळ्ळै के पास आकर पूछते हैं की अपने साम्प्रदाय का मूल तत्व क्या हैं । नम्पिळ्ळै उनसे समुद्र तट के बारे में सोचने के लिए कहते हैं । चकित होक पूछते हैं कि समुद्र तट के बारे में क्या सोचने कि लिए हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि चक्रवर्ति तिरुमघन श्री राम रावण से युद्ध करने के पहले समुद्र तट पर शिविर में विश्रान्त ले रहे थे और वानर सेना उनकी रक्षा के लिए उस इलाके कि चौकीदारी कर रहे थे । ठकान के कारण वानर सेना सो जाती हैं और एम्पेरुमान् उनकी रक्षा करने उस इलाके कि चौकीदारी करने में झुट जाते हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि एम्पेरुमान् हमें सोने के वक्त भी रक्षा करते हैं और इसलिए उन पर अटूट विश्वास होना चाहिए कि वे ज़रूर हमें जागृत अवस्था में भी रक्षा करेंगे । यथा हमें स्व रक्षणे स्वान्वयम् ( खुद अपने आप कि रक्षा करने कि मनो दृष्टी ) को छोड़ देना चाहिए ।
  • अन्य देवि देवताओं के भजन के बारे में नम्पिळ्ळै ने अद्भुत रूप से विवरण दिया हैं । एक बार उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब स्मशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।
  • एक श्री वैष्णव उनसे मिलने आते हैं और बताते हैं कि वे पहले से भी बहुत दुबले हो गए हैं । नम्पिळ्ळै उत्तर देते है कि जब आत्मा उज्जीवन कि दिशा में बढ़ती हैं अपने आप शरीर घट जाता हैं ।
  • दूसरी बार एक श्री वैष्णव उन्हें देखकर कहते हैं कि वे बलवान नहीं लग रहे हैं तब नम्पिळ्ळै कहते हैं उनके पास एम्पेरुमान् कि सेवा करने के लिए शक्ति हैं जो खाफी हैं और बलवान होकर उन्हें कोई युद्ध लड़ने नहीं जाना हैं । इससे यह निरूपण होता हैं कि श्री वैष्णव को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने कि चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।
  • जब नम्पिळ्ळै अस्वस्थ्य हो जाते हैं तब एक श्री वैष्णव बहुत चिन्ति हो जाते हैं । उन्हें देखकर नम्पिळ्ळै बताते हैं कि किसी भी तरह कि कष्ट भुगतनेलायक हैं क्योंकि शास्त्र में बताया गया हैं कि एम्पेरुमान् के कमल चरणों में आत्मा समर्पण किये महान लोग मृत्यु देवता को ख़ुशी – ख़ुशी आमन्त्रित करते हैं ।
  • उस दौर नम्पिळ्ळै के प्रति प्रेम के कारण और उन्हें अस्वस्था से राहत दिलाने के आकाँक्षी कुछ श्री वैष्णव एक रक्षा कि डोर बाँधना चाहे और एङ्गलाळ्वान के आदेश के अनुसार नम्पिळ्ळै रक्षा बँधवाने के लिए ना करते हैं । इस नाकरात्मित्कित को कुछ श्री वैष्णव प्रश्न करते हुए कहते हैं “यह शायद ठीक हैं कि एक श्री वैष्णव अपने शरीर के बारे में चिंताक्रान्त ना हो लेकिन उनसे क्या भूल हुयी हैं जब वे अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था के बारे में चिन्ता करें । नम्पिळ्ळै विवरण देते हुए कहते हैं कि अगर अपने खुद कि अस्वस्था का इलाज़ करने कि कोशिश करें तो उससे यह पता लगता हैं कि हमें स्वस्वरूप ज्ञान जिससे यह प्राप्त होता हैं कि हम केवल एम्पेरुमान पे ही पूरी तरह से निर्भर हैं । अगर हम अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था का इलाज़ के बारे में सोच रहे हैं तब यह साबित होता हैं कि हमें एम्पेरुमान का ज्ञान और शक्ति के बारे में पूरी अवगाहन नहीं हुआ कि भक्तों कि बाधाएँ दूर करने के लिए एम्पेरुमान पे निर्भर होना चाहिए । नम्पिळ्ळै कि निष्ठा इस प्रकार कि थी और वोह अपनी पूरी जिंदगी उस के अनुसार थे । इसी समय हमें यह भी जान लेना चाहिए कि श्री वैष्णव के कष्ट देखकर उसके बारे में चिन्ता करना अपना कर्तव्य हैं जैसे मारिनेरी नम्बि ने आळवन्दार् के दुख को देखकर किया था ।
  • नम्पिळ्ळै के शिष्य कई आचार्य पुरुष के परिवारों से थे और श्री रंगम में सब उनके समय को नल्लड़िकाल्(सबसे अच्छा समय ) करके स्तुति करते हैं । इनके शिष्य नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् (१२५०० पड़ि ) और वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै (ईडु ३६००० पड़ि ) दोनों ने तिरुवाय्मळि का व्याख्यान किया था । लेकिन नम्पिळ्ळै ने पहल ग्रन्थ बहुत ही विस्तरणीय होने के कारण उसे नकार दिया और दूसरा व्याख्यान को स्वीकृत् करके ईयुण्णि माधव पेरुमाळ को दे दिया ताकि भविष्य काल में उसके निगूढ़ अर्थ अळगीय मणवाळ मामुनि के द्वारा सभी जान सकें । उन्होंने पेरियवाच्छान् पिळ्ळै को भी आदेश दिया कि तिरुवाय्मळि का व्याख्यान लिखे और आचार्य के आदेश अनुसार उनकी इच्छा पूर्ति करते हुए उन्होंने २४००० पड़ि व्यख्यान लिखें और नम्पिळ्ळै ने उस ग्रन्थ को बहुत प्रशंसा कि ।
  • नम्पिळ्ळै पेरिय कोविल वळ्ळलार् से “कुलं तरुं ” का अर्थ पूछते हैं तब वळ्ळलार् कहते हैं कि “जब मेरा कुल जन्म कुल से नम्बूर् कुल(नम्पिळ्ळै का कुल) में बदल गया हैं तो उसे कुलं तरुं कहते हैं ” । यह विषय ठीक पेरियाळ्वार् श्री सूक्ति पंडै कुल(जन्म कुल ) से तोंड़ा कुल ( आचार्य सम्बन्ध और कैंकर्य प्राप्त होता हैं ) । नम्पिळ्ळै इतने महान थे ।

आईये अंत में सामाप्त करते हुए देखे कि एळै एळलन पदिग् ओथु वाईमैयुम (पेरिय तिरु मोळि – ५.८. ७ ) में नम्पिळ्ळै के बारे में पेरियवाच्छान्  पिळ्ळै ने क्या बताया हैं । पेरियवाच्छान पिळ्ळै जब “अन्ताणं ओरुवन ” ( अनोखे विद्वान ) का अर्थ समझाने के समय पे मौके का लाभ उठाते हुए अपने आचार्य नम्पिळ्ळै कि कीर्ति के बारे में बताते हैं और अनुगामी शब्द प्रयोग करते हुए व्यक्त करते हैं कि उनके आचार्य सबसे अनोखे विद्वान हैं ” मुर्पड़ ढवायत्तिक् केट्टु , इत्तिहास पुराणांगलियुम अथिगारित्तु , परपक्ष प्रत्क्षेपत्तुक्कुडालग ,न्याय मीमामंसैकलुम अथिगारित्तु,पोतुपोक्कुम अरुलिचेयलीलेयमपडि पिळ्ळैप्पोले अथिगारिप्पिक्क वल्लवनायिरे ओरुवन एंबतु ”
(முற்பட த்வயத்தைக் கேட்டு, இதிஹாஸ புராணங்களையும் அதிகரித்து, பரபக்ஷ ப்ரத்க்ஷேபத்துக்குடலாக ந்யாயமீமாம்ஸைகளும் அதிகரித்து, போதுபோக்கும் அருளிசெயலிலேயாம்படி பிள்ளையைப்போலே அதிகரிப்பிக்க வல்லவனையிரே ஒருவன் என்பது). सुलभ तरह से भाषांतर करने से यह प्राप्त होता हैं कि जो पहले द्वयं सुनता हैं , उसके बाद पुराण और इतिहास सीखता हैं और बाह्य / कुदृष्टि लोगों को हराने के लिए न्याय और मीमांस अभ्यास करता हैं , अपना सारा समय आळ्वार् अरुळिचेयळ और उनके अर्थ विशेष सीखने और सीखाने में व्यतीत करते हैं उन्हें अनोखा विद्वान कहा जा सकता हैं और साक्षात उदाहरण नम्पिळ्ळै हैं । यहाँ पेरियवाच्छान सांदीपनि मुनि को कुछ अंश में नम्पिळ्ळै कि तरह मानते हैं ( वास्तव में नम्पिळ्ळै सांदीपनि मुनि से कई गुना बेहतर हैं क्यूंकि नम्पिळ्ळै पूरी तरह से भगवद् विषय में डूबे थे लेकिन सांदीपनि मुनि यह जानते हुए भी कण्णन एम्पेरुमान मुकुन्दन , मतलब मोक्ष प्रदाता हैं उनसे अपने मरे हुए संतान प्राप्त करने कि कामना करते हैं )

तमिल और संस्कृत के साहित्य पे इनके अपार ज्ञान के कारण व्यख्यान करते समय श्रोतगण को सम्मोहित करते थे । इन्हीं के बल तिरुवाय् मोळि को नई ऊँचाईयाँ प्राप्त हुई हैं और अरुळिचेयळ के अर्थ सभी को समझ आने लगे । तिरुवाय् मोळि के ६००० पडि व्याख्यान के आलावा अन्य ४ व्याख्यान में इनका कोई न कोई रिश्ता था

  • ९००० पड़ि मूल् ग्रन्थ नंजीयर् से रचित था लेकिन नम्पिळ्ळै ने सूक्ष्म दृष्टि और नए अर्थ विशेषों के साथ फिर से लिखा हैं ।
  • २४००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के आदेश और उपदेश अनुसार रचना कियी हैं ।
  • ३६००० पड़ि वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के व्याख्यान को सुनकर रचना कियी हैं ।
  • १२००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै के शिष्य वादि केसरि अळगीय मणवाळ जीयर् ने लिखा हैं और अर्थ विशेष पे गौर करने से कह सकते हैं कि यह ग्रन्थ नम्पिळ्ळै के ३६००० पड़ि को अनुगमन करता हैं ।

यही नहीं नम्पिळ्ळै ने अपनी अपार कारुण्य के साथ सम्प्रदाय के दो कीर्तिमान स्तम्बो की स्थापना की हैं – पिळ्ळै लोकाचार्यर् और अळगीय मणवाळ पेरुमाळ नायनार् जिन्होंने पूर्वाचार्य से प्रसादित ज्ञान से क्रमानुसार श्री वचन भूषण और आचार्य हृदय को प्रदान किया हैं । यह चरित्र अपने अगले अनुच्छेद में देखेंगे (वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै)।

nampillai-pinbhazakiya-perumal-jeer-srirangam

नम्पिळ्ळै – पिण्बळगिय् पेरुमाळ जीयर् – श्री रंगम

नम्पिळ्ळै अपने चरम तिरुमेनि को श्री रंगम में छोड़कर परम पद प्रस्थान हुए । उस अवसर पर नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् अपने पूरे सिर के केश मुण्डन करवाते हैं (शिष्य गण और पुत्र केश मुण्डन करते हैं जब पिता या आचार्य परम पद प्रस्थान होते हैं ) और जब उनके भाई नंपेरुमाळ से शिकायत करते हैं कि कूर कुल में पैदा होने के बावज़ूद उन्होंने ऐसा बर्ताव किया तब नंपेरुमाळ भट्टर् को उनके सामने उपस्थिति का आदेश देते हैं और भट्टर् विवरण से कहते हैं कि उनके कुटुम्ब सम्बन्ध से भी नम्पिळ्ळै से उनके सम्बन्ध को वे अधिक महत्व देते हैं । यह सुनकर नंपेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं ।

आईये नम्पिळ्ळै के चरण कमलो का आश्रय ( शरण ) लेते हुए प्रार्थना करे कि हम भी उन्ही कि तरह एम्पेरुमान और आचार्य के प्रति प्रेम प्राप्त हो ।

नम्पिळ्ळै तनियन्:

वेदान्त वेद्य अमृत वारिरासेर्वेदार्थ सारा अमृत पुरमाग्र्यम् |
आधायवर्षन्तमहं प्रपद्ये कारुण्य पूर्णम् कलिवैरिदासं ||

अपने अगले अनुच्छेद में वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै के बारे में जानेंगे ।

अडियेन् इन्दुमती रामानुज दासि

source

एम्बार्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “एम्पेरुमानार्” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य (एम्बार्) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

एम्बार् – मधुर मंगलम

तिरुनक्षत्र : पुष्य मास पुनर्वसु

अवतार स्थल : मधुर मंगलम

आचार्य : पेरिय तिरुमलै नम्बि

शिष्य : पराशर भट्टर , वेदव्यास भट्टर

स्थान जहाँ से परमपदम प्रस्थान हुए : श्री रंगम

रचना : विज्ञान स्तुति , एम्पेरुमानार वडि वळगु पासुर (पंक्ति )

गोविन्द पेरुमाळ कमल नयन भट्टर् और श्री देवी अम्माळ को मधुरमंगलम में पैदा हुए । ये गोविन्द भट्टर, गोविन्द दासर और रामानुज पदछायर के नामों से भी जाने जाते हैं । कालान्तर में ये एम्बार् के नाम से प्रसिध्द हुए । ये एम्पेरुमानार के चचेरे भाई थे । जब यादव प्रकाश एम्पेरुमानार को हत्या करने की कोशिश की तब ये साधक बनकर  उन्हें मरने से बचाया ।

एम्पेरुमानार की रक्षा करने के बाद अपनी यात्रा जारी रखते हैं और कालहस्ती पहुँचकर शिव भक्त बन जाते हैं । उन्हें सही मार्ग दर्शन करने के लिए एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि को उनके पास भेज देते हैं । जब गोविन्द पेरुमाळ अपने पूजा के निमित्त फूल तोड़ने के लिए नन्दनवन पहुँचते हैं तब पेरिय तिरुमलै नम्बि तिरुवाय्मोळि पाशुर् “देवन् एम्पेरुमानुक्कल्लाळ् पूवुम् पुसनैयुम् तगुम्” सुनाते हैं । जिसका मतलब हैं की केवल एम्पेरुमान् श्रीमन् नारायण ही फूलों से पूजा करने के अधिकारी हैं और अन्य कोई भी देवता इस के लायक नहीं हैं । इसे सुनकर गोविन्द पेरुमाळ को तुरंत अपनी गलती का एहसास होता हैं और शिव के प्रति भक्ति छोड़कर पेरिय तिरुमलै नम्बि के आश्रित हो जाते हैं । पेरिय तिरुमलै नम्बि उन्हें पंच संस्कार करके सम्प्रदाय के अर्थ विशेष प्रदान करते हैं। उसके पश्चात अपने आचार्य पेरिय तिरुमलै नम्बि की सेवा में कैंकर्य करते हुए रह जाते हैं ।

एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि से तिरुपति में मिलते हैं और उनसे श्री रामायण की शिक्षा प्राप्त करते हैं । उस समय की कुछ घटनाओ से हमें एम्बार् की महानता मालुम पड़ती हैं । आईये संक्षिप्त में उन संघटनाओं को देखे :

१.गोविन्द पेरुमाळ अपने आचार्य पेरिय तिरुमलै नम्बि की शय्यासन तयार करने के पश्चात वे आचार्य से पहले खुद उसके ऊपर लेट जाते हैं । एम्पेरुमानार् इस विषय को तिरुमलै नम्बि को बताते हैं । जब गोविन्द पेरुमाळ को इसके बारे में पूछते हैं तब वे जवाब देते हैं की ऐसे कार्य करने से उन्हें नरक प्राप्त होना निश्चय हैं परन्तु उसके बारे में उन्हें चिंता नहीं हैं । उनके आचार्य की तिरुमेनि (शारीर) की रक्षा करने में वे चिंतामग्न हैं । इसी का वर्णन मामुनिगळ श्री सूक्ति में करते हैं ( तेसारुम् सिच्चन् अवन् सीर् वडिवै आसैयुडन नोक्कुमवन् )

२.एक बार गोविन्दपेरुमाळ सांप के मुह मे हाथ दालकर कुछ निकालने की कोशिश कर रहे थे और उसके पश्चात वह भाह्यशरीर शुद्धिकरण (नहाने) हेतु चले गए । एम्पेरुमानार यह दृश्य दूर से देखकर अचंभित रह गए । जब एम्पेरुमानार उनसे इसके बारे में पूछते है तब वे बताते हैं की सांप के मुँह में काटा था और इसी लिए वह काटे को निलाने की कोशिश कर रहे थे और अन्त मे निकाल दिया । उनकी जीव कारुण्यता को देखकर अभिभूत हो गए ।

३.एम्पेरुमानार जब तिरुमलै नम्बि से आज्ञा माँगते हैं तब उन्हें कुछ भेंट समर्पण करने की इच्छा व्यक्त करते हैं । एम्पेरुमानार उन्हें गोविन्द पेरुमाळ प्रसाद करने को कहते हैं । तिरुमलै नम्बि आनंद से गोविन्द पेरुमाळ को सोंप देते हैं और उन्हें समझाते हैं की एम्पेरुमानार को उन्ही की तरह सम्मान करें और गौरव से व्यवहार करें । कांचिपुरम पहुँचने के पहले ही गोविन्द पेरुमाळ अपने आचार्य से जुदाई सहन नहीं कर पाते हैं और वापस आचार्य के पास पहुँच जाते हैं । लेकिन तिरुमलै नम्बि उन्हें घर के अन्दर आने की इझाजत नहीं देते हैं और कहते हैं की उन्हें एम्पेरुमानार को दे दिया हैं और उन्हें उन्ही के साथ रहना हैं । आचार्य की मन की बात जानकर एम्पेरुमानार के वापस चले जाते हैं ।

श्री रंगम पहुँचने के बाद गोविन्द पेरुमाळ के माता की प्रार्थन के अनुसार उनके शादि की व्यवस्था करते हैं । गोविन्द पेरुमाळ अनिच्छा पूर्वक शादि के लिए राज़ी होते हैं । लेकिन उनके पत्नी के साथ दाम्पत्य जीवन में भाग नहीं लेते हैं । एम्पेरुमानार विशेष रूप से गोविन्दपेरुमाळ को उनकी पत्नी के साथ एकान्त मे समय व्यतीत करने का उपदेश देते है परन्तु गोविन्दपेरुमाळ उनके पास निराशा से लौटकर कहते है की उन्होने ऐसा कोई  एकान्त जगह या स्थल नही देखा या मिला क्योंकि उन्हे सर्वत्र एम्पेरुमान दिखाई दे रहे है ।

तुरन्त एम्पेरुमानार उनकी मानसिक परिस्थिति जानकर उन्हें सन्याश्रम प्रादान करते हैं और एम्बार् का दास्यनाम देकर उनके साथ सदैव रहने के लिए कहते हैं ।

एक बार कुछ श्रीवैष्णव एम्बार् की स्तुति कर रहे थे और श्रीएम्बार् उस स्तुति का आनन्द लेते हुए श्रीएम्पेरुमानार की नज़र मे आए । श्रीएम्पेरुमानार ने गौर करते हुए श्रीएम्बार् को बताया की प्रत्येक श्रीवैष्णवों को स्वयम को एक घास के तिनके के समान तुच्छ मानना चाहिए और कदाचित प्रशंशा स्वीकार नही करनी चाहिए । प्रत्येक श्रीवैष्णव तभी प्रशंशा के योग्य होंगे जब उनमे विनम्रता का आभास उनके व्यवहार मे प्रतिबिम्बित हो ।

उत्तर देते हुए वे कहते हैं की अगर किसी ने उनकी स्तुति की तो वोह स्तुति उन्हें नहीं बल्कि एम्पेरुमानार को जाती हैं क्योंकि एम्पेरुमानार ही वह एक मात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने बहुत ही निचे स्तिथि में रहते उन्हें संस्कार किया हैं । एम्पेरुमानार उनके वचन स्वीकार करते हैं और उनकी आचार्य भक्ति की प्रशंसा करते हैं ।

एम्पेरुमान् के आपर कारुन्य और उनके दिए गए प्रसाद से आण्डाळ् को( कूरताल्वान् की पत्नी) दो शिशु पैदा हुए । एम्पेरुमानार् एम्बार् के साथ उनके नामकरण उत्सव को जाते हैं । एम्बार् से शिशुओ को लेकर आने का आदेश करते हैं । लेकर आते समय शिशुओ को रक्षा करने के लिए द्व्य महा मंत्र उन्हें सुनाते हैं । जब एम्पेरुमानार् उन्हें देखते हैं तब उन्हें तुरन्त एहसास होता हैं की एम्बार् ने उन शिशुओं को द्व्य महा मंत्र का उपदेश किया हैं ।एम्बार् को उनके आचार्य स्थान लेने का आदेश करते हैं । इस तरह वेद व्यास भट्टर् और पराशर भट्टर् एम्बार् के शिष्य बने ।

एम्बार् लौकिक विषय में इच्छा रहित थे । निरंतर केवल भगवद् विषय में जुटे रहते थे ।वे भगवद् विषय में महा रसिक ( आनंद / मनोरंजन चाहने वाले ) थे । कई व्याख्यान में एम्बार् के भगवद् विषय अनुभव के बारे में चर्चा की गयी हैं ।
कुछ इस प्रकार :

१. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि के अंतिम पाशुर में “छायै पोला पाडवल्लार् तामुम् अनुकर्गळे ” का अर्थ श्री वैष्णव एम्बार् से पूछते हैं तब वे व्यक्त करते हैं की उस पाशुर का अर्थ उन्होंने एम्पेरुमानार् से शिक्षा प्राप्त नहीं किया हैं । उस समय वे एम्पेरुमानार् के श्री पाद अपने सिर पे धारण करके उनका ध्यान करते हैं । उसी समय एम्पेरुमानार् “पाडवल्लार् – छायै पोला – तामुम् अनुकर्गळे ” करके उस पाशुर का अर्थ प्रकाशित करते हैं जिसका मतलब हैं की जो कोई भी यह पाशुर पठन करेंगे वे एम्पेरुमान् के करीब उनकी छाया जैसे रहेंगे।

२. पेरियाळ्वार् तिरुमोळि २.१ का अभिनय उय्न्था पिल्लै अरयर् कर रहे थे तब वे बताते हैं कण्णन् एम्पेरुमान् अपने आँख डरावनी करके गोप बालकों को डराते थे । पीछे से एम्बार् अभिनय पूर्वक बताते हैं की कण्णन् एम्पेरुमान् अपने शँख और चक्र से गोप बालकों को डराते हैं । इसे अरयर् ध्यान में रखकर अगली बार एम्बार् के बताये हुए क्रम में अभिनय करते हैं । इसे देखकर एम्पेरुमानार् पूछते हैं ” गोविन्द पेरुमाळे इरुन्थिरो “(आप गोष्टि के सदस्य थे क्या ) क्यूंकि केवल एम्बार् को ही ऐसे सुन्दर अर्थ गोचर हो सकता हैं ।

३. तिरुवाय्मोळि(मिन्निडै मडवार् पदिगम् – ६.२ ) में आळ्वार् के हृदय में कण्णन् एम्पेरुमान् से विश्लेश का दुःख सन्यासी होते बाकी उन्हें ही अच्छी तरह समझ आगई । और वे उस विशेष पदिगम् ( १० पाशुर ) का अर्थ अद्भुत रूप से बता रहे थे उन्हें सुनकर श्री वैष्णव आश्चर्य चकित हो गए । इससे यह स्पष्ट होता हैं की एम्पेरुमान् का किसी भी विषय आनंददायिक हैं और अन्य किसी भी तरह के विषय त्याग करने के लायक हैं ।
इसी विषय को “परमात्मनि रक्तः अपरात्मानी विरक्तः ” कहा जाता हैं ।

४. तिरुवाय्मोळि (१० -२ ) के व्याख्यान में एक दिलचस्प विषय बताई जाती हैं । एम्पेरुमानार् अपने मट में तिरुवाय्मोळि के अर्थ विशेष को स्मरण करते हुए टहल रहे थे और पीछे मुड़कर देखे तो उन्हें एम्बार् दिखाई दिए । एम्बार् उन्हें दरवाज़े के पीछे रहकर देख रहे थे और एम्पेरुमानार् से पूछते हैं की क्या वे मद्दित्हें पाशुर के बारे में ध्यान कर रहे थे और उस विषय को एम्पेरुमानार् मान लेते हैं इससे पता चल रहा हैं की एक छोटी सी काम करने से ही उन्हें एम्पेरुमानार् की सोच के बारे में जानकारी हो जाती हैं ।

अंतिम समय पर पराशर् भट्टर् को आदेश देते की श्री वैष्णव सम्प्रदाय का प्रशासन श्री रंगम से कियी जाय । और ये भी सूचित करते हैं की वे निरंतर “एम्पेरुमानार् तिरुवडिगळे तन्जम्” (एम्पेरुमानार् के श्री पाद ही सोने के बराबर हैं ) कहके आलोचना करे ।एम्पेरुमानार् पे ध्यान करते हुए अपनी चरम तिरुमेनि (शरीर ) छोड़कर एम्पेरुमानार् के साथ नित्य विभूति में रहने के लिए परम पदम् प्रस्थान करते हैं ।

आईये हम भी उन्ही की तरह एम्पेरुमानार् और आचार्य के प्रति प्रेम पाने के लिए उनके श्री चरणों पे प्रार्थन करें ।

तनियन :
रामानुज पद छाया गोविन्दह्वा अनपायिन्ल
तद यत्त स्वरुप सा जियान मद विश्रामस्थले

अगले भगा में पराशर् भट्टर् की वैभवता जानने की कोशिश करेंगे ।

source

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

श्री पोन्नडिक्काल जीयर

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमते वरवरमुनये नमः

श्रीमते वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे श्री अळगिय मणवाळ मामुनि के जीवन चरित्र की चर्चा की थी । आज हम आगे बढ़ते हुए श्री पोन्नडिक्काल जीयर के जीवन की चर्चा करेंगे जो अपने आचार्य मनवाल मामुनिगल के  प्राण सुकृत थे।

पोन्नडिक्काल जीयर – वानमामलै

पोन्नडिक्काल जीयर – तिरुवल्लिक्केनी

 

अवतार स्थल वानमामलै

आचार्य अळगिय मणवाळ मामुनि

शिष्य गण चोलसिंहपुरम्  महार्यर (दोड्डाचार्य), समरभुंगवाचार्य, शुद्द सत्त्वमण्णा, ज्ञानक्कण्णात्थान, रामानुजंपिळ्ळै, पळ्ळक्काल् सिध्दर, गोष्ठी पुरत्तैयर, अप्पाचियाराण्णा इत्यादि

स्थल जहाँ से वह परमपदम को प्रस्थान हुए वानमामलै

ग्रंथरचनासूची तिरुप्पावै स्वाभदेश व्याख्यान इत्यादि

पोन्नडिक्काल जीयर वानमामलै मे पैदा हुए और बचपन मे उनके मातापिता ने उनका नाम अळगिय वरदर रखा । वे बाद मे पोन्नडिक्काल जीयर के नाम से विख्यात / प्रसिध्द हुए । वह कई नामों से जाने गए थे जो कुछ इस प्रकार हैं वानमामलै जीयर्, वानाद्रि योगी, रामानुज जीयर्, रामानुज मुनि इत्यादि । वह श्री मणवाळ मामुनि के पेहले और महत्त्वपूर्ण शिष्य हुए ।

जब श्री मणवाळ मामुनि गृहस्थाश्रम मे भगवद्भागवतकैण्कर्य कर रहे थे तब पोन्नडिक्काल जीयर ने उनकी शरण ली और उनके शिष्य बने। उसी समय उन्होंने संयासाश्रम स्वीकार किये और श्री मणवालमामुनि के शेषकाल तक उनकी सेवा मे निमग्न हुए । पोन्नडिक्काल  का मतलब है वो जिसने ममुनिगल के शिष्य सम्पत की स्थापना की हो| उन्होंने पूरे भारत देश मे तोताद्रि मठों की स्थपना की और सत्साम्प्रदाय का प्रचार किया।

एक बार जब श्री मणवालमामुनि तिरुमलै यात्रा के लिये पहले बार जा रहे थे, उस समय पेरियप्पन्जीयर अपने स्वप्न में देखते हैं कि एक गृहस्थ व्यक्ति शय्यासन अवस्था मे हैं (यानि सो रहे हैं ) और उनके चरणकमलों के पास एक सन्यासी स्वामी उनकी सेवा कर रहे हैं। उसके पश्चात पेरियप्पन्जीयर आसपास के लोगों से पूछते हैं कि ये दोनो कौंन हैं और लोग कहते हैं कि एक व्यक्ति -“ईत्तु पेरुक्कर अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार” हैं और दूसरें पोन्नडिक्काळ जीयर हैं (जिनको स्वयम नायनार ने यह नाम दिया)

कहते हैं कि पोन्नडिक्काल जीयर के उत्कृष्ठ स्वभाव से सारे आचार्य उन्हें मणवाळमामुनि का उपागम (पुरुषाकार) समझते हैं और उन्ही के उपागम्यता से वे सारे, मणवाळमामुनि को पहुँच पाते थे । यतीन्द्रप्रभावम मे कहा गया है कि पोन्नडिक्काल जीयर की बदौलत बहुत सारे श्रीवैष्णव बने और उन सबको मामुनि का सम्भन्ध देकर उन सभी को भगवद्भागवतकैंकर्य मे संलग्न किये ।

जब कन्दादै और उनके रिश्तेदार मणवाळमामुनि के शिष्य बने तब श्री मणवाळमामुनि ने कहा कि पोन्नडिक्काल जीयर उनके प्राणों के सुहृत हैं और उन्हें वह सारा यश/कीर्ती इत्यादि प्राप्त होना चाहिए जो उनको स्वयम (श्रीमणवाळमामुनि) प्राप्त हुई । एक बार जब अप्पाचियाराण्णा, मामुनि को आचार्य के रूप मे स्वीकार कर उनके पास उनके शिष्य बनने की इच्छा से जाते हैं तब श्रीमामुनि, पोन्नडिक्काल जीयर को अपने आसन मे विराजमान करते हैं और उनके हाथ मे उनका शंख और चक्र सौंपकर उन्हें आदेश देते हैं कि अप्पाचियाराण्णा और कई सारे भक्तों का समाश्रयनम वह करें । हालांकि वे संकोच करते हैं कि वे इस कार्य को स्वीकार करें या ना करें परंतु उनके आचार्य (श्रीमणवाळमामुनि) के दृढ निश्चय को देखकर सभी भक्तों को अपने शिष्य के रूप मे स्वीकर करते हैं।

इसके पश्चात श्री मणवाळमामुनि आठ दिग्गज पोन्नडिक्काळजीयर के लिये नियुक्त करते हैं जो इस प्रकार हैं– – चोलसिंहपुरम्महार्यर (दोड्डाचार्य), समरभुंगवाचार्य, शुद्द सत्त्वमण्णा, ज्ञानक्कण्णात्थान, रामानुजंपिळ्ळै, पळ्ळक्काल् सिध्दर, गोष्ठी पुरत्तैयर, अप्पाचियाराण्णा |

जब अप्पाचियारण्णा को श्रीमणवाळमामुनि श्रीरंगम छोडकर कांचिपुरम जाने का आदेश देते हैं तब वे निराश हो जाते हैं। उस समय उनकी दुर्दशा देखकर श्रीमणवाळमामुनि कहते हैं कि उनका (श्रीमणवाळमामुनि का) रामनुजम् (तीर्थ सोम्बु लोटा) ले जाए (जिसकी पूजा पोन्नडिक्काल जीयर करते थे) और उसके धातु से श्रीमणवाळमामुनि की दो मूर्तियां बनाये एक अपने पास रखें और दूसरा अपने आचार्य (पोन्नडिक्काल जीयर) को दे । तो इस प्रकार अप्पाचियारण्णा श्रीमणवाळमामुनि की मूर्ती लेकर कांचिपुरम चले गए ।

उसके पश्चात दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) श्री मणवाळमामुनि को श्री सेनैमुदलियार के द्वारा एक संदेश भेजते हैं जिसमे कहते हैं कि वानामामलै दिव्यदेश मे पोन्नडिक्काल जीयर की सेवा ज़रूरत है । उसके अनन्तर मणवाळमामुनि उन्हें आदेश देते हैं कि वे तुरन्त वानमामलै जाए और वहाँ अपना कैंकर्य करें । इसी दौरान श्री मणवाळमामुनि अपने शिष्यों को आदेश देते हैं कि वे सारे चार हज़ार पासुरों का पाठ सौ पासुरों के क्रम मे हर रोज़ करें । पेरियतिरुमोळि के सात्तुमुरै के दौरान जब अणियार् पोळिल् सूळ् अरन्गनगरप्पाका पाठ हुआ तब भगवान बहुत खुश हुए और उन्होनें एक अरन्गनगरप्पा (लक्ष्मी नारायण) की मूर्ती अपने संनिधि से पोन्नडिक्कालजीयर को प्रसाद के रूप मे दिया और कहे कि वह इसे वानामामलै ले जाए । कुछ इस प्रकार खुशि खुशि पेरियपेरुमाळ भगवान पोन्नडिक्कालजीयर को विशेष प्रसाद और शठकोप देकर उनकी बिदाई बहुत धूम धाम से करते हैं। इसके बाद मामुनि पोन्नडिक्कालजीयर को अपने मठ ले जाकर उनका तदियाराधन धूम धाम से करते हैं और उनकी बिदाई करते हैं ।

फिर पोन्नडिक्कालजीयर वानमामलै मे रेहकर बहुत सारे कैंकर्यों मे संलग्न होते हैं । उसी दौरान वह आस पास के दिव्यदेशों (जैसे नवतिरुपति , तिरुक्कुरुन्गुडि) इत्यादि और बद्रीकाश्रम जैसे यात्रा दिव्यदेशों मे अपनी सेवा बर्करार रखते हैं । उसी दौरान उनके अनेक शिष्य हुए और उन सबको प्रवचन देकर वह आदेश देते हैं कि वह सारे अपनी अपनी सेवा उन दिव्यदेशों मे करते रहें ।

पोन्नडिक्काल जीयर एक लम्बी उत्तर दिशा की यात्रा के लिये निकल पडे । उसी दौरान श्री मणवाळमामुनि अपनी लीला इस भौतिक जगत मे समाप्त कर परमपदम को प्रस्थान हुए । जब पोन्नडिक्काल जीयर अपनी यात्रा समाप्त करके तिरुमलै पहुँचते हैं तभी उन्हें पता चलता है कि उनके आचार्य परमपदम को प्रस्थान हुए और यह सुनकर बहुत दुःखित हो जाते हैं और उसी दुःखद अवस्था मे कुछ और दिनों के लिये रुख गए ।

पोन्नडिक्काल जीयर अपने इकट्ठित धन राशि (यात्रा के दौरन हासिल) श्रीरंगम को आते हैं और अपने आचार्य के पोते (जीयर्नायनार) और कई सारे श्रीवैष्णवों से मिलकर अपने आचर्य को खोने का दुःख बाँटते हैं । उस समय श्रीमणवालमामुनि के निर्देशानुसार , श्रीमणवालमामुनि का उपडण्दम् (डण्दा), अंगूठी (तिरुवाळिमोदिरम्), पादुकाएं श्रीपोन्नडिक्कालजीयर को सौंपते हैं। कहा जाता है कि आज भी उपडण्द वानमामलैजीयरों के डण्दों के साथ बांधा जाता है और विशेष दिनों मे श्रीमणवालमामुनि की अंगूठी पहनते हैं । अतः कुछ इस प्रकार वह वानमामलै वापस आकर अपना कैंकर्य निभाते हैं।

उस समय वानमामलै मे श्रीवरमंगैनाचियार का उत्सव विग्रह नही था और उसी से परेशान थे पोन्नडिक्काल जीयर । एक बार भगवान (दैवनायकन) उनके स्वप्न मे आकर कहते हैं कि वे तिरुमलै से नाचियार का उत्सव विग्रह लाना चाहिए। भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु वे तिरुमलै जाते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें स्वप्न मे श्री नाचियार कहती है कि उन्हें वानमामलै तुरन्त ले जाए और उन्की शादी दैवपेरुमाळ से करवाई जाए । इसी दौरान तिरुमलै के जीयर्स्वामि के स्वप्न मे श्री नाचियार आती है और उन्हें भी यही उपदेश देती है । यह जानकर दोनों जीयर उनके आदेश को स्वीकर करते हैं और धूम धाम से नाचियार की बिदाई करवाते हैं । पोन्नडिक्काल जीयर श्री नाचियार को वानमामलै लाकर उनकी दैवनायकन पेरुमाळ भगवान से शादी धूम धाम अत्यन्त वैभव से करवाते हैं। पोन्नडिक्काल जीयर नाचियार के पिता स्वरूप बनकर उन्का कन्यादान दैवनायकन पेरुमाळ भगवान को करते हैं। दैवनायनक पेरुमाल कहते हैं कि जैसे भगवान् पेरियपेरुमाळ के ससुरजी पेरिआळ्वार हुए वैसे ही पोन्नडिक्काल जीयर उनके ससुरजी हुए और आज भी यह रीती रिवाज़ बहुत गर्व और सम्मान से किया जाता है और यही वानमामलै दिव्यदेश मे अनुसरण होता है ।

शिष्यों को कई सालों तक अपने महत्वपूर्ण निर्देशों की सूचना व्यक्त करने के पश्चात वह अपने आचार्य का ध्यान करते हुए अपने शरीर (चरम तिरुमेणि) का त्याग करते हैं और इस प्रकार उनको परमपदम की प्राप्ति होती है । वह अपने अगले उत्तराधिकारि (अगले जीयर वानमामलै मठ) को नियुक्त करते हैं और यह आचार्य परंपरा आज भी ज़ारी है ।

चलिये अब हम श्री पोन्नडिक्कालजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों में उनके जैसा आसक्ति, हमारे वर्तमानाऽचार्य पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) में हो ।

पोन्नडिक्कालजीयर का तनियन् (दोड्दाचार्य विरचित) –
रम्यजामात्रुयोगीन्द्रपादरेखामयम्सदा । तथा यत्तात्मसत्तादिम् रामानुजमुनिम् भजे ॥

दोड्दाचार्य ने पोन्नडिक्कालजीयर के महत्व/ श्रेष्ठता को संस्कृत श्लोकों से विरचित निम्नलिखित स्तोत्रों मे किया है जिसका भावार्थ अब हम सरल हिंदी में जानेंगे|

वानमामलै जीयर मंगलाशाशन

  1. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीय़र के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो श्री मणवाळमामुनि के कृपायुक्त हैं, जो स्वयम करुनासागर हैं, जो दिव्यहृदयी हैं, जिन्मे जन्म से ही दिव्यमंगल लक्षण है और जो स्वयमरूप से अळगीय वरदर हैं। 
  2. मेरी आराधना सिर्फ़ और सिर्फ़ श्री रामानुजजीयर के लिये है क्योंकि वह जीयर स्वामियों के और हमारे सांप्रदाय के अभिनेता हैं , और श्रीमणवाळमामुनि के कृपा से सारे सद्गुणों का समावेश हैं । 
  3. मैं ऐसे श्री ऱामानुज जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो स्वयम श्री मामुनि के चरणकमलों में मधुमक्खि के तरह हैं और जो पूर्ण चन्द्रमा की तरह मेरे मन को हर्षित करते हैं । 
  4. मैं ऐसे श्री रामानुज जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो वात्सल्य, शील / चरित्र और ज्ञान जैसे सद्गुणो के सागर हैं और जिनको श्री मणवाळमामुनि जीवन देने वाले सांस की तरह मानते हैं। 
  5. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होने ब्रह्मचर्य से सीधे संयास लिये और गृहस्थाश्रं और वानप्रस्थाश्रं को शर्मिन्दगि का एहसास दिलाये ।
  6. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो प्रथम हैं जिन्हे श्री मामुनिगल् के कृपा और आशीर्वाद की सम्प्राप्ति हुई और जो अपने कृपा से काम अथवा क्रोध जैसे कई दोशो से हमे विमुक्ति दिलाते हैं।
  7. मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो स्वयम अनन्त सद्गुणो के धारक हैं और जो भौतिक संसार के इच्छावों और अनिच्छवों से विमुक्त हैं और जो स्वयम अरविन्द दलयताक्ष हैं।
  8. मैं ऐसे रामानुज जीयर को देखकर बहुत आनंद महसूस करता हूँ क्योंकि वैराग्य की लता जो हनुमान में सबसे पहले विकसित हुआ , वही भीष्म पितामह में और भी विकसित होकर बढ़ा और पूर्ण तरह श्री रामानुज जीयर मे विकसित होकर प्रफुल्लित हुआ । 
  9. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके उभयवेदान्त उपंयास से बड़े अच्छे विदवानों आकर्शित होते हैं, जिनका स्वभाव और अनुशीलन सर्वोत्कृष्ट है और वही अनुशीलन संयासि करते हैं, जो दोष रहित हैं, जो संपूर्ण ज्ञान और सद्गुणो से भरपूर हैं और जिन्होने श्रीमणवालमामुनि के चरणकमलों का आश्रय लिया है । 
  10. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके उपंयास मे पशुपक्षि घोषणा करते हैं कि श्रीमन्नारायण प्रधान (सर्वोच्च) है और अन्य देवता उनकी शेषी है । 
  11. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनके नयन कटाक्ष से अर्थपञ्च के ज्ञान की प्राप्ति होती है, जिन्होने कई सारे कैंकर्य (सेवा) वानमामलै दिव्यदेश मे किया और जो शिष्यों के लिये एक कल्पवृक्ष थे । 
  12. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होने अपने शुध्द दिव्य कृपा से मुझे भगवद्भागवत कैंकर्य मे संलग्न किया (यानि परिवर्तन/सुधार किया जो इस भौतिक जगत के आनंद मे संलग्न था और जिसे श्रीवैष्णवों के प्रति कदाचित रूची नही थी) । 
  13. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो ज्ञान के भण्डार हैं , जिनकी वजह से वैराग्य शान्ति पूर्वक विश्राम ले रहा है , जो एक कीमती खज़ाना के पेटी की तरह हैं और जो सत्साम्प्रदाय के अगले उत्ताराधिकारि (जिसे श्री एम्पेरुमानार ने खुद स्थापित किया) के काबिल और सक्षम हैं । 
  14. मैं ऐसे रामानुजजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनमे श्रीमामुनि की कृपा का समावेश है , जो सद्गुणों के भण्डार हैं और दैवनायकन एम्पेरुमान के प्रति जिन्हे असीमित लगाव है। 

वानमामलै जीयर प्रपत्ति

1) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो एक खिले हुए फूल की तरह सुंदर हैं , जिन्हें देखर नयनानंद की प्रप्ति होती है , जो हमे इस भवसागर के जाल से बचा सकते हैं।

2) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें यश और कीर्ती श्री मणवाळमामुनि के दिव्यानुग्रह से प्राप्त की , जो हमारे कमियों को नष्ट करने मे सक्षम हैं, जो शिष्यों के लिये एक कल्पवृक्ष हैं और जो सद्गुणों के सागर हैं।

3) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें श्री मणवाळमामुनि के चरणकमलों का आश्रय लिया है और वह किसी भी कारण गृहस्थाश्रम मे नहीं पड़े क्योंकि गृहस्थाश्रम इस भौतिक जगत के भवसागर मे उन्हें बाँन्ध देगा ।

4) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनमे विरक्तिभावलता (जो हनूमान से शुरू हुई थी) परिपूर्ण होकर उन्में परिव्याप्त हुई ।

5) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें अपने आचार्य की सेवा मे बहुत सारे मण्डपों का निर्माण और उनका अभिनेतृत्व वानमामलै मे किया जैसे आदिशेष भगवान के लिये करते हैं।

6) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिन्होनें नम्माळ्वार के दिव्य पासुरों का गहरावेदान्तार्थ बहुत ही सरल भाषा मे प्रस्तुत किया ।

7) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका नाम इस भौतिक जगत के भवसागर सर्प को विनाश कर सकता है और बध्दजीवात्मावों को भगवान के समान उत्थापन होता है ।

8) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो हमे हमारे अंगिनत जन्मों मे किये गये पापों/दुष्कर्मो से विमुक्त करने मे सक्षम हैं, और जिन चरणों को साधुजन सदैव पूजा करते हैं।

9) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका श्री पादतीर्थ (चरणामृत) किसी को भी शुध्द कर सकती है और तापत्रय की ज्वाला को पूर्ण तरह से नष्ट करती है ।

10) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो शुध्द और सद्गुणों के सागर हैं और जिनका आश्रय श्री अप्पाचियाराण्णा ने लिया था |

11) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जो शुध्द और सद्गुणों की चोटी हैंऔर जिनका आश्रय समरभुन्गवाचार्यर ने लिया था और उनके चरण साधुजन सदैव पूजा करते हैं।

12 ) मैं ऐसे श्री वानमामलै जीयर के चरणकमलों का आश्रय लेता हूँ जिनका वैराग्य हनुमान , भीष्म पितामह इत्यादि से सर्वाधिक है , उनकी भक्ति ओराण्वळिआचार्यों के बराबर है , उनका ज्ञान श्रीनाथमुनि, यामुनमुनि के बराबर है और ऐसी तुलना मे कौन वानमामलै जीयर से सर्वोत्तम हो सकता है ।

13) उन्होनें श्रीदैवनायकन एम्पेरुमान की सेवा आदिशेष की तरह किया । उन्होनें भगवान के भक्तों का गुणगान कुळशेखराळ्वार की तरह किया । उन्होनें अपने आचार्य श्री मणवाळमामुनि कि पूजा किया जैसे श्री मधुरकविआळ्वार ने श्री नम्माळ्वार कि पूजा किया था। वे पूर्वाचार्यों के पदचाप के राह मे चले और सद्गुणों के धारक हुए |

14) बहुत पहले श्री एम्पेरुमान ने नरनारायण का अवतार लिया था अब वही एम्पेरुमान श्री मणवाळमामुनि और वानमामलै जीयर के रूप मे प्रकट हुए । कुछ इस प्रकार श्री वानमामलै जीयर का कीर्ती / यश था ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन् और अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ् रामानुज दासि

अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

Source