Author Archives: Janaki

सोमासियाण्डान् (सोमयाजि स्वामीजी)

  श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

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रामानुजाचार्य

जन्म नक्षत्र – चैत्र मास आर्द्रा नक्षत्र

अवतार स्थल – काराञ्ची

आचार्यरामानुजाचार्य

रचना श्रीभाष्य-विवरण , गुरु-गुणावली (रामानुजाचार्य कि महिमा के बारे में वार्ता), संक्षेप-षडर्थ

सोमासियाण्डान् (सोमयाजि स्वामीजी) सोम यज्ञ की अनुष्ठान करने वाले परिवार में पैदा हुए. बचपन में उनका नाम श्री राममिश्र था |  वे ७४ सिंहासनाधिपति [ आचार्यों] में से एक थे | इन ७४ सिंहासनाधिपति को स्वयं रामानुजाचार्य ने, हमारे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की उन्नति के लिए नियमित किया था | वे सोमयाजियार के नाम से भी जाने जाते थे. श्री-भाष्य का विवरण पहले उन्ही ने लिखा था | सोमयाजि स्वामीजी का वंश आज भी श्रीरंगम पेरियकोविल में वाख्य पंचांग का संकलन करने का कैंकर्य कर रहे हैं | श्रुतप्रकाशिक भट्टर, नायनार आच्चान पिल्लै और वेदांताचार्यार स्वामी ने अपने ग्रंथों में सोमयाजि स्वामीजी के श्रीसूक्तियों को निर्दिष्ट किया है |

कृपामात्र प्रसन्नाचार्यों का महत्व समझाने के लिए नायनार आच्चान पिल्लै स्वामी अपने “चरमोपाय निर्णय” ग्रन्थ में सोमयाजि स्वामीजी के “गुरु-गुणावली” ग्रंथ से श्लोक उद्धृत है | उन आचार्यों को “कृपामात्र प्रसन्नाचार्य” कहते हैं जो सिर्फ अपने कृपा के माध्यम से, उन सभी का उत्थान करने की अभिलाषा लेते हैं जो संप्रदाय के तत्त्वज्ञान मे दिलचस्पी रखते हैं|

यस्सापराधान् स्वपधप्रपन्नान् स्वकीयकारुण्य गुणेन पाति
स एव मुख्यो गुरुरप्रमेयस् तदैव सद्भिः परिकीर्त्यदेहि || 

अर्थ : वो आचार्य जो अपने अत्यंत कृपा के कारण अपने शिष्यों की रक्षा और उद्धार करते हैं, वैसे आचार्य ही सबसे मुख्य होते हैं | यही हमारे संप्रदाय का अटल विश्वास है और सम्प्रदाय के अधिक से अधिक भरोसेमंद लोगों की भी यही विश्वास है |

चरमोपाय निर्णय में एक ऐसी घटना के बारे में लिखा गया है जो स्वामी रामानुजाचार्य की अकारण कृपा पर प्रकाश डालता है | इस अकारण और दिव्य कृपा के पात्र बनकर ही स्वामी सोमयाजि स्वामीजी के दिल में सांसारिक सुखों से अलगाव पैदा हुआ |

सोमयाजि स्वामीजी , स्वामी रामानुजाचार्य के चरणो में आत्मसमर्पण करके कैंकर्य में लगे थे और तदनंतर अपने जन्म स्थान [कारांची] को वापस लौटे और कुछ और समय तक वहाँ रहे | जन्म स्थान जाने के कुछ ही दिनों में उनका दिल स्वामी रामानुजाचार्य के चरण कमलों के प्रति और आकर्षित हुआ लेकिन उनके पत्नी उनके जाने से सहमत नहीं थी और इस लिए सोमयाजि स्वामीजी ने रामानुजाचार्य की एक मूर्ती बनवाकर उसकी पूजा करने का निर्णय लिया | लेकिन सोमयाजि स्वामीजी उस मूर्ती की बनावट से संतुष्ट नहीं थे | उन्होंने एक मूर्तिकार से पुराने मूर्ती को नष्ट करके एक नई मूर्ती बनाने को कहा | उस रात, स्वामी रामानुजाचार्य सोमयाजि स्वामीजी के स्वप्न में आकर पूछे, ” मेरे पुराने मूर्ती को नष्ट करने की क्या अवश्यकता है? तुम जहाँ भी हो, अगर तुम यह नहीं समज सकते कि मेरे अभिमत अर्थात् मेरे उद्धार मे पूर्ण विश्वास नहीं है, तो यह मूर्ति बने तो भी तुम इससे भला क्या पा सकते हो? मेरे उद्धार पर अविश्वास होते हुए क्या मेरे मूर्ति पर लगाव हो सकता है?” सोमयाजि स्वामीजी अनायास अपने स्वप्न से जाग ऊठे, उस मूर्ति को एक सुरक्षित जगह पर रखकर, तुरंत अपने सांसारिक सुखों को त्याग दिया और श्रीरंगम कि ओर निकल पड़े |

श्रीरंगम पहुंचते ही स्वामी रामानुजाचार्य के चरण कमल पर आ पड़े और स्वामी के चरणो को अपने आसुओं से भिगा दिया | रामानुजाचार्य उनसे कारण पूछने पर, सोमयाजि स्वामीजी अपने स्वप्न के बारे में बताते हैं | स्वामी रामानुजाचार्य की दिव्य मुकुट पर, हमेशा कि तरह, एक बँध-मुस्कान दिखाई दी |  रामानुजाचार्य सोमयाजि स्वामीजी से कहते हैं , ” हे अबोध, पधारो ! मैंने यह सारी नाटक तुम्हे इस सांसारिक समस्याओं के  भार से मुक्त करने के लिए किया था | तुम्हे मेरी सराहना न हो फिर भी मुझे हमेशा तुम्हारी ख़्याल रहती है | मैं कभी मेरे शिष्यों को त्यागता नहीं  | जहाँ भी तुम हो, मेरी अनुकूलता सदैव तुम्हारी ओर हमेशा होगी, अथार्थ तुम्हारी अंतिम लक्षय जरूर पूरी होगी | निश्चिंत और आनंद से रहो ” | पेरियावाच्चान पिल्लै ने इस कथा का व्याख्यान दिया है | इस कथा के दौरान स्वामी रामानुजाचार्य, सोमयाजि स्वामीजी को ही नहीं बल्कि हम सभी भद्धात्माओं को यह सत्य समझाया कि उनके  चरण कमल के संबद्ध से सारे श्री वैष्णव जन निश्चिंत और आनंद से रह सकते हैं |

तिरुनेडुन्ताण्डकम् 27पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – तिरुमंगै-आळ्वार (परकाल स्वामीजी – नायिका भाव में) एक सारस को अपने प्यार का दूत बनाकर तिरुकन्नपुरम के भगवान के पास, अपने दिल की बात व्यक्त करने हेतु भेंजी | पेरियावाच्चान पिल्लै स्थापित करते हैं कि तिरुमंगै-आळ्वार जब “तिरुकन्नपुरम ” का नाम लेते हैं तो उनमे एक अद्भुत और अनोखी मनोदशा होती है और वो मनोदशा बड़ी लाजवाब है | यह ऐसी एक अतुल्य और विशेष मनोदशा है जो स्वामी अनंताल्वान “तिरुवेंकटम“, भट्टर स्वामी “अलगिय मणवाल पेरुमाल” और सोमयाजि स्वामीजी “एम्पेरुमानारे चरणम् ” कहते समय प्राप्त होती है | हम जैसे साधारण जन ऐसे शब्द उच्चारण करने की इच्छा तो ज़रूर प्रकट कर सकते हैं मगर उन महापुरुषों की यह मनोदशा पाना असंभव और अकल्पनीय है |

तिरुवाय्मोळी 6.5.7नंपिल्लै ईडु व्याख्यान – पहले कही गयी उसी सिद्धांत को यहाँ दूसरी दृष्टिकोण  में दर्शाया गया है |  यहाँ नम्माल्वार [ परांकुश नायिका भाव में ] तुलैविल्लीमंगलम भगवान के संबन्ध को प्राप्त करने की लालसा-दशा को दर्शा रही थी | नम्पिल्लै यहाँ स्थापित करते हैं कि जब परांकुश नायकी एम्पेरुमान का नाम अपने होठों पे लेती है तो उन नामों की सुंदरता बढ़ती रहती है, बिलकुल वैसे जैसे अनंताल्वान, भट्टर और सोमयाजि स्वामीजी के महिमा से “तिरुवेंकटम” , “अलगिय मणवाल पेरुमाल” और “रामानुजाचार्य ” के नामों की सुंदरता बढ़ती है | यह अनोखी सुंदरता का रहस्य इन महानों का बेमिसाल प्यार और विशेष मनोदशा ही है |

वार्तामाला में कुछ कथाएँ हैं जो सोमयाजि स्वामीजी के यश और महिमा के बारे में प्रकाश डालते हैं | उनमे से कुछ अब हम देखेंगे:

  • 126 – यहाँ सोमयाजि स्वामीजी बहुत ही सुन्दर रूप से यह स्थापित करते हैं कि एक प्रपन्न [ जो शरणागति-मार्ग चुने हो] को केवल सर्वेश्वर श्रीमन नारायण ही उपाय होते हैं |  भगवान की कृपा का पात्र बनना हो तो स्वप्रयास त्यागे और भगवान की शरण कमल में आश्रय ले |  न भक्ति न प्रप्पति वास्तविक उपाय होते हैं, सिर्फ वो श्रियपति जिसपर हमारा सारा भोज होती है, वही सत्यसंकल्प, जो हमारे अंतिम लक्ष्य को प्रधान करते हैं, सत्य में हमारे उपाय होते हैं |
  • 279 – अप्पिळ्ळै [ सोमयाजि स्वामीजी से उम्र में छोटे तो थे लेकिन सुव्यवस्थित और महान श्रीवैष्णव थे] सोमयाजि स्वामीजी  को इस प्रकार सलाह दिया , “सोमयाजि स्वामीजी, आप तो बड़े पड़े- लिखे , सयान महापुरुष हैं जो हमारे पूर्वाचार्य के विश्वासों और रचनाओं को मानते हैं | आप को श्रीभाष्यम् और भगवद विषयों पर ज़्यादा से ज़्यादा अधिकार है | फिर भी, कृपया आप अपने धोती में एक पट्टी भांध लीजिये ताकी आप किसी भी तरह की भागवद-अपचार में न फँसें | ” उन दिनों में यह एक मामूली तरीका था जब किसी भी चीज़ या विषय की याद दिलाने के लिए कोई अपनी धोती में पट्टी भांध लेता है. जब वह उस पट्टी को देखे तो उसे उस विषय की याद आ जायेगी जिसे वह भूल गया हो. यहाँ अप्पिळ्ळै , सोमासियाण्डान्  को चेतावनी देते हैं ताकी आण्डान् किसी भी भागवत के खिलाफ अपराध या अपचार न करे क्योंकि वो हमारी स्वरुप-नष्ट कर देती है – बड़े से बड़े शिक्षित और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व भी इस जाल में गिर सकते हैं. इसीलिए स्वामी अप्पिळ्ळै ने स्वामी सोमासियाण्डान् को यह चेतावनी दी.
  • 304 – स्वामी सोमासियाण्डान् यह सलाह देते थे कि मनुष्य कभी भी सांसारिक आनन्दों में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. उनके बताये गए कुछ कारण :
    अगर हम समज सकते हैं कि जीवात्मा परमात्मा पर पराधीन है, तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि हमारी अस्तित्व का कारण भगवान की सेवा करना है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि सांसारिक संभंध अस्थायी है और सिर्फ भगवद संभंध स्थायी, शाश्वत और सत्य है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
    अगर हम समज सकते हैं कि ये जो शारीरिक सुखों और देहाभिमान से हम पीड़ित हैं वह भी अनित्य है तो हम सांसारिक आनन्दों से दूर रहेंगे.
  • 375 – जब स्वामी सोमासियाण्डान्  ने यह सुना कि किसी ने एक चरवाहे को दूध चुराने के कारण दंड दिया तो वे मूर्छित गिर पड़े. उन्हें तुरंत मैय्या यशोदा और कन्हैय्या की याद आ गयी. वे भावनाओं से अभिभूत हो गए यह सोचकर कि यशोदा मैय्या भी कृष्ण को इसी तरह मक्खन चुराने के लिए दंड दी होगी. स्वामी सोमासियाण्डान् की इस अद्बुत अनुभव, और सारे पूर्वाचार्यों के अनुभव की तरह, अवर्णनीय ही है|

इस प्रकार स्वामी सोमासियाण्डान् की शानदार जीवन की झलक हमें मिली है. वे पूरी तरह से भागवत कैंकर्य और निष्ठा में तल्लीन थे और स्वामी एम्बेरुमानार के प्रिय शिष्यों में से एक थे| आज हम सब स्वामी सोमाजि आण्डान् के शरण कमल में प्रार्थना करें कि हमारे इस जीवन काल में, उस कैंकर्य सागर की एक बूंद हम भी पी सके|

सोमासियाण्डान्  तनियन (ध्यान श्लोक ) :

नौमि लक्ष्मण योगीन्द्र पादसेवैक धारकम्
श्रीरामक्रतुनातार्याम श्रीभाष्यामृत सागरम्

अडियेन जानकी रामानुज दासी

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किडाम्बि आच्चान्

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

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जन्म नक्षत्र – चित्रा, हस्त

अवतार स्थल – कांचीपुरम

आचार्यरामानुजाचार्य

बचपन में उनका नाम “प्रणतार्तिहरर्” था. ( देवराज अष्टकम में स्वामी तिरुकच्ची नम्बि ने वरदराज स्वामी को बड़े सम्मान और प्यार से प्रणतार्तिहरर् कहके पुकारा.)

उनको श्री रामानुजाचार्य / एम्बेरुमानार के मुख्य रसोइया बनाया गया था. इस फैसले का निर्णय स्वामी तिरुकोष्टियुर नम्बि ने किया था. इस फैसले के पीछे एक दिलचस्प कहानी “६००० पड़ी गुरु परंपरा प्रभावम” और कुछ और पूर्वाचार्य ग्रंथों में लिखा गया है.

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रामानुजाचार्य गद्यत्रयम् का अध्ययन किये और नित्य ग्रन्थम (तिरुवाराधन क्रम) भी लिखे. इस तरह वे इस श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का पालन और पोषण करते आये. रामानुजाचार्य के काल में भी, आज की तरह,  कुछ एसे लोग थे जो खुद लाभकारी काम नहीं करते और दूसरों को करने भी नहीं देते. ऐसे कुछ लोग श्रीरंगम में थे जो श्री रामानुजाचार्य के विचारण से सहमत नहीं थे. वे व्याकुल पड़े और ऐसी एक अकल्पनीय और दुष्ट कार्य किया जिससे स्वामी रामानुजाचार्य की जान खतरे में पड़ी.

उन्होंने खाने में जहर मिलाकर उसे भीक्षा के रूप में स्वामी रामानुजाचार्य को देने की योजना बनाई. श्री रामानुजाचार्य हर एक घर में, हमेशा की तरह, उस दिन भी भीक्श मांगते आये और उस घर के सामने आ खड़े जिस घर की महिला के हाथ में वो दूषित आहार थी.  स्वामी उस आहार को स्वीकार करते निकल ही पड़े कि उस  औरत के आखों में आँसू आ भरे. वो स्वामी को सूक्ष्म रूप से यह संदेश देना चाहती थी कि वे उस दुष्ट आहार को न छूए. वो अपने पति की इस सादिश का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी. वो अपने भीक्श को स्वामी के अन्य भिक्षा से अलग किया और अपने चेहरे में अत्यंत दुख की भावना दिखाई. स्वामी को दण्डवत प्रणाम करने के बाद भारी मन से घर वापस लौटी. स्वामी रामानुजाचार्य को समज में आ गया कि उस भीक्श में कुछ गलत बात है. वे उसे कावेरी नदी में बहा दिया और उस दिन से कठिन व्रत का पालन करने लगे.

तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) , इस घटना के बारे में सुनते ही तुरंत श्रीरंगम आ पहुँचे. स्वामी एम्बेरुमानार भी अपने आचार्य को स्वागत करने गर्मी धूप में कावेरी नदी के किनारे शिष्य-सहित आए. अपने आचार्य को देखते ही स्वामी दंडवत प्रणाम करते हुए उस अत्याधिक गर्म रेत पर अपने आचार्य क़ी आज्ञा क़ी इंतज़ार करते लेटे थे. (हमारी संप्रदाय का एक और विशेष क्रम है कि एक शिष्य, अपने आचार्य को दंडवत प्रणाम करते समय, तभी उठे जब आचार्य कहे ). तिरुकोष्टियुर नम्बि कुछ समय कि देरी की, यह जानने के लिए कि कौन स्वामी रामानुज की इस दिव्यमंगलरूप की ओर तरसता है और इसी से स्वामी की शुभचिंतक की जानकारी भी हो जाएगी.

किडाम्बि आच्चान् तड़प ऊठे और स्वामी रामानुज को तुरंत उठाया और तिरुकोष्टियुर नम्बि से पुछा ” यह कैसा अजीब रिवाज़ है? स्वामी रामानुज को इस गर्मी धूप में इतनी देर लेटे रहने दिया आपने? इस कोमल फूल की यह क्या कठोर परीक्षा कर रहे हैं आप?” किडाम्बि आच्चान की इस फिकर और विनम्रता से प्रसन्न होकर नम्बि विज्ञापन किये ,” तुम ही हो जो स्वामी रामानुज से अत्याधिक प्रेम करते हो. तुम ही उसके शुभचिंतक हो. आज से तुम्हे रामानुज की भीक्षा की जिम्मेदारी सौंपा जाए!!” किडाम्बि आच्चान् खुद को सौभाग्यशाली मानकर उसी दिन से अपने कर्त्तव्य का पालन किया.

हमारे व्याख्यानों में ऐसे कुछ कथाएँ हैं जो स्वामी किडाम्बि आच्चान् के यश और महिमा के बारे में प्रकाश डालते हैं.  उनमे से कुछ उदहारण नीचे देखें :

  • तिरुप्पावै 23  : – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासुरम के द्वारा आंडाल,  गोपियों और कृष्ण परमात्मा के बीच हुयी सम्भाषण के बारे में बताती है| गोपिका स्त्री श्री कृष्ण से कहते हैं कि उनका कोई आश्रय नहीं है| यह साबित करने के लिए कि उनको श्री कृष्ण के चरण कमल ही एकमात्र शरणस्थान है, एक दिलचस्प कहानी सुनाया जाता है| एक बार स्वामी किडम्बि आच्चान तिरुमालिरुंचोलाई में भगवान अयगर की दर्शन करने निकल पड़े. भगवान अयगर उनको आदेश दिया कि वे कुछ पाठ सुनाये. स्वामी किडम्बि आच्चान “अपराध सहस्रा भाजनम् … अगतिम ..” (आळवन्दार स्तोत्र रत्नम ४८ ) सुनाने शुरू किये. तब भगवान अयगर, नम्बि से अनुशासन की ” जब एम्पेरुमानार के चरणो में आत्मसमर्पण किया है तो खुद को अगतिम कैसे पुकार सकते हो ?”
  • तिरुविरुत्तम 99  – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान  – इसमें एक कहानी के ज़रिये,कूरत्ताळ्वान् की महिमा प्रकाशित की जाती है. एक बार किडाम्बि आच्चान्, कूरत्ताळ्वान् की उपन्यास सुनकर देर से लौटे. एम्बेरुमानार ने पूछताछ की तो बताया कि कूरत्ताळ्वान् की कथा सुनकर देर हो गई. एम्बेरुमानार फिर प्रश्न की कि कालक्षेप किस बात ( पासुरम)  पे हो रहा था. आच्चान ने जवाब दी कि ” पिरन्दवारुं वलरंतवारुं (तिरुवाय्मोई 5.10) व्याख्यखण्ड ” में कालक्षेप हो रहा था. एम्बेरुमानार विवरण से पूछे तो आच्चान ने कहा “कूरत्ताळ्वान् पहले उस अनुच्छेद को पड़े , उस अनुच्छेद के तात्पर्य का विश्लेषण करने लगे और जैसे ही करते रहे उनका दिल पिगल्ने लगा और कूरत्ताळ्वान शोक में डूब गए. कूरत्ताळ्वान् कहने लगे कि नम्माल्वार  बड़े ही अनोखे थे, उनका अनुभव भी कितना अनोखा, अद्बुत और दिव्य था. भगवान से बिछडके, वे जो विरह-ताप में जल रहे थे, उसे ना कोई समज सकता है और ना ही कोई वर्णन कर सकता है. यह कहकर कूरत्ताळ्वान् कालक्षेप की अंत कर दी. इसे सुनकर एम्बेरुमानार अत्यंत खुश हुए और कूरत्ताळ्वान् की शुद्ध ह्रदय और उनकी भक्ति की प्रशंसा की.
  • तिरुवाय्मोळी  4.8.2 नंपिल्लै ईडु व्याख्यान  – नम्माल्वार हमेशा भगवान की सोच में ही डूबे रहते हैं. कैंकर्य प्राप्ति होते ही भगवान की करुण्यता से अभिभूत हो जाते हैं.  नम्माल्वार के दिव्य भावनाओं को स्थापित करते हुए एक कहानी है जिसे हम अब देखेंगे. एक बार ददियारादन के समय किडाम्बि आच्चान् सभी श्री वैष्णव जनों को पानी पिलाने का कैंकर्य कर रहे थे. ( उन दिनों, हर एक श्री वैष्णव के मुंह में सीधा पानी पिलाते थे , आज की तरह हर एक को अलग अलग गिलास दिया नहीं जाता था ) गोष्टी में से एक श्री वैष्णव जब पानी मांगे, तो आच्चान उस श्री वैष्णव के बगल से पानी पिला रहे थे. इसे देखकर एम्बेरुमानार ने आच्चान को समझाया कि सामने से पानी पिलाते हैं, बगल से नहीं ताकि उस श्री वैष्णव महान को तकलीफ ना पहुंचे. एम्बेरुमानार के काल में भागवत कैंकर्य को  इतनी महत्व दी जाती थी. इसे सुनकर आच्चान अति आनन्दित हुए और स्वामी एम्बेरुमानार को शुक्रिया अदा किया और नम्माल्वार के शब्दों से उनकी प्रशंसा करने लगे , “पणिमानम् पियैयामे अडियेनै पणी कोन्ड” अथार्थ ” मैं उस एम्बेरुमानार से कृतज्ञ हूँ जो मेरे जैसे अनुपयुक्त को भी भागवत कैंकर्य में उपयोग करे!”
  • तिरुवाय्मोळी 6.7.5नंपिल्लै ईडु व्याख्याननम्माल्वार हमेशा दिव्यदेशोँ की सौन्दर्यता की प्रशंसा करते रहते थे. उनका मानना था कि मनुष्य को आँख दिया गया है, एम्पेरुमान की इस सौंदर्य दिव्यदेशोँ  को देखने के लिए और इनकी सुंदरता में मोहित होने के लिए. किडाम्बि आच्चान् और मुदलियान्डान् (दाशरथि स्वामीजी) एक बार अप्पकुड़थ्थान मंदिर की सुंदरता में डूब गए थे.
  • तिरुवाय्मोळी 10.6.1 – किडाम्बि आच्चान्, श्री पराशर भट्टर् की ओर बहुत प्यार और विनम्रता दिखाई. इसे देखकर एक स्वामी उनसे पूछे कि उनकी इस व्यवहार का कारण क्या था. आच्चान ने समझाया , ” आप नहीं जानते उस दिन क्या हुआ और स्वामी एम्बेरुमानार ने हम सब से क्या कहा. एक दिन जब भट्टर अपने युव में थे , तब पेरिय पेरुमल ( श्रीरंगम ) की सन्निधि में आ पहुंचे. एम्बेरुमानार भट्टर को भीतरी मन्दिरगर्भ में ले चले और उनको पेरिय पेरुमल के सामने श्लोक पाठ करने को कहा. पाठ समाप्ति के बाद वे दोनों बाहर आये और एम्बेरुमानार अपने शिष्यों को ये आदेश दिया की सारे शिष्य भट्टर से ऐसे व्यवहार करे जैसे वे एम्बेरुमानार से करे. इसलिए मेरे मन में भट्टर की तरफ बहुत मर्यादा और प्यार है ” .

तिरुवेकका में किडाम्बि नायनार ( किडाम्बि आच्चान् वंश के संतति ) अळगिय मनवाळ मामुनि को श्री भाष्यम् सिखा रहे थे. किडाम्बि नायनार के अनुरोध पर स्वामी मनवाळ मामुनि अपने स्वाभाविक रूप ( आदि सेशन का रूप) को नायनार को दिखाते हैं. उस समय से किडाम्बि नायनार स्वामी मामुनि के ओर अधिक से अधिक लगाव महसूस करने लगे.

इस प्रकार स्वामी किडाम्बि आच्चान् की शानदार जीवन की झलक हमें मिली है. वे पूरी तरह से भागवत कैंकर्य और निष्ठा में तल्लीन थे और स्वामी एम्बेरुमानार के प्रिय शिष्यों में से एक थे. आज हम सब स्वामी किडाम्बि आच्चान् के शरण कमल में प्रार्थना करे कि हमारे इस जीवन काल में, उस कैंकर्य सागर की एक बूंद हम भी पी सके.

किडाम्बि आच्चान् तनियन (ध्यान श्लोक ) :

रामानुज पदाम्भोजयुगली यस्य धीमतः
प्राप्यम् च प्रापकम् वन्दे प्रनाथार्थीहरम गुरूम्

अडिएन जानकी रामानुज दासि

Source: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/03/31/kidambi-achan/

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