Author Archives: Karthik Sriharsha

आण्डाल

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र : आशड मास, पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र

अवतार स्थल : श्री विल्लिपुत्तूर

आचार्य : पेरियाल्वार

ग्रंथ रचना : नाच्चियार तिरुमोलि, तिरुप्पावै

तिरुप्पावै ६००० पड़ी व्याख्यान में, श्री पेरियवाच्चान पिल्लै सर्वप्रथम अन्य आल्वारों की तुलना में आण्डाल के वैभव और महत्व का प्रतिपादन करते है | वे विभिन्न प्रकारों के जीवो का उदहारण देते हुए अत्यंत सुन्दरता से इनका विभाग करते है और इनके बीच का फर्क समझाते है जो आगे प्रस्तुत है :

सर्वप्रथम : संसारियो ( देहात्म अभिमानी संसारिक जन ) और ऐसे ऋषि जिन्हें स्वरूप ज्ञान का साक्षात्कार हुआ है इनमे छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

दूसरा : पूर्वोक्त ऋषियों (जिन्हें अपने बल बूते पर आत्म साक्षात्कार हुआ है, जो कभी कभी अपने स्थर से नीचे गिर जाते थे) और आल्वारों (जिन्हें केवल भगवान के निर्हेतुक कृपा से आत्म साक्षात्कार हुआ है और जो अत्यंत शुद्ध है) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

तीसरा : पूर्वोक्त आल्वारों (जो कभी कभी स्वानुभव और मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) और पेरियाल्वार (जो सदैव मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

चौथा : पेरियाल्वार और आण्डाल में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है | इसके अनेनानेक कारन है जो निम्नलिखित है

) अन्य आल्वारों को सर्वप्रथम भगवान के निर्हेतुक कृपा के पात्र बनाकर सुसुप्त बद्ध जीवो को जगाया (दिव्य ज्ञान – भगवत विषय) | परन्तु श्री आण्डाल अम्मा ने (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) भगवान को अपनी नीदं से जगाया और उनके कर्तव्य का स्मरण कराया (सारे जीवो का संरक्षण) | नंपिल्लै ने तिरुविरुत्तम और तिरुवाय्मोलि के व्याख्या में यह प्रतिपादित किया है की आल्वार संसारी ही थे जिन पर भगवान का निर्हेतुक कृपा कटाक्ष हुआ है और अत: भगवान से दिव्य ज्ञान प्राप्त किये है | इसके विपरीत में आण्डाल अम्मा तो साक्षात् भू देवी का अवतार स्वरूप है, जो नित्यसूरी है, और भगवान की दिव्य महिषी है | इनके मार्गदर्शन में चलते श्री पेरिय वाच्चान पिल्लै ने भी यही निरूपण दिया है |

) आंडाल अम्मा एक स्त्री होने के नाते उनका भगवान के साथ पतिपत्नी का सम्बन्ध स्वाभाविक था | अत: इसी कैंकर्य का आश्रय लेकर उन्होंने कैंकर्य किया | इसके विपरीत देखा जाए तो अन्य आल्वार को पुरुष देह प्राप्त हुआ था | इसी कारण कहा जाता है की आण्डाल अम्मा और इन आल्वारों के भगवद प्रेम में बहुत अन्तर है | आण्डाल अम्मा का भगवद प्रेम आल्वारों के भगवद प्रेम से उत्कृष्ट और कई गुना श्रेष्ठ है |

पिल्लै लोकाचार्य स्वरचित श्रेष्ठ और उत्तम ग्रंथ श्री वचन भूषण में आण्डाल अम्मा के वैभव को इन निम्नलिखित सूत्रों से दर्शाते है जो इस प्रकार है :

सूत्र २३८ : ब्राह्मण उत्तम राणा पेरियाल्वारुम तिरुमगलारुम गोपजन्मत्तै अस्थानं पन्ननिण्णार्घळ

पिल्लै लोकाचार्य इस सूत्र में बिना जन्म, जाती, इत्यादी के भेदभाव से भागवतो की श्रेष्ठता को समझाते है | यहाँ वे यह समझाते है की ऐसे कई भागवत है जो स्वरुपनुरूप कैंकर्य और भगवद अनुभव हेतु विभिन्न योनियों में जन्म लेना चाहते है | वे आगे कहते है की हालाँकि पेरियाल्वार और आण्डाल अम्मा ने ब्राह्मण योनी में जन्म लिया परन्तु वे दोनों चाहते थे की वे वृन्दावन के गोपी बनकर भगवान की सेवा करे | आण्डाल अम्मा ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है की भगवान को प्रिय कैंकर्य ही सभी जीवो का लक्ष्य और उद्देश्य है | इसीलिए हम सभी को ऐसे कैंकर्य का गुन गान करना चाहिए और चाहे कैंकर्य किसी रूप में हो ऐसे कैंकर्य की चाहना करनी और होनी चाहिए |

सूत्र २८५ : कोडुत्तुक कोळ्ळाते कोण्डत्तुक्क कैकुलि कोडुक्कवेन्णुम

इस प्रकरण में, पिळ्ळै लोकाचार्य जी कहते है की कैंकर्य किस प्रकार करना चाहिए | यह सूत्र २३८ से संबंधित है जिसमे लोकाचार्य कहते है कि किस प्रकार एक जीव को चाहना होनी चाहिए की भगवान् को प्रिय सेवा में कैसे तत्पर रहे | पूर्वोक्त सूत्र (२८४) में कहते है की कैंकर्य निस्वार्थ और अन्याभिलाश रहित होनी चाहिए | कैंकर्य के बदले में किसी भी प्रकार की चाहना नहीं होनी चाहिए | यानि तुच्छ फल की प्राप्ति हेतु कैंकर्य नहीं करना चाहिए | लेकिन इस सूत्र में लोकाचार्य जी कहते है की प्रत्येक जीव को भगवान का कैंकर्य करना चाहिए और अगर भगवान हमारे कैंकर्य से प्रसन्न है तो उनके प्रति और कैंकर्य करना चाहिए | श्री वरवरमुनि इस भाव को अत्यंत स्पष्ट और सरल रूप में आण्डाल अम्मा की स्वरचना नाच्चियार तिरुमोळिके ९.७ पासुर इन्रु वाण्तु इत्तनैयुम चेय्दिप्पेरिल णान् ओन्रु नूरु आयिरमागक्कोडुत्तु पिन्नुं आळुम चेय्वान” से समझाते है | इस पासुर में गोदाअम्मा जी कहती है की पूर्वोक्त पासुर के अनुसार उनकी इच्छा थी की वे भगवान तिरुमालिरुन्सोलै अळगर को १०० घड़े माखन और १०० घड़े मिश्रान्न समर्पित करे और जब उन्होंने यह सेवा सम्पूर्ण किया तो उन्होंने देखा की किस प्रकार भगवान उनकी इस सेवा से संतुष्ट है और आनंदोत्फुल्ल चित्त भाव से समर्पित भोग्य आहार को ग्रहण किये | तदन्तर गोदा अम्मा भी और हर्षोत्त्फुल्ल भाव से कही मै आपके के लिए इसी प्रकार की सेवा आशारहित होकर मै तत्पर रहूंगी और आपकी सेवा का आनंद का रसास्वादन करूंगी | अत: कुछ इस प्रकार से गोदा अम्मा ने स्वरचित पासुरों में हमारे संप्रदाय के उच्च कोटि विषय तत्वों को अत्यंत सरल रूप में प्रकाशित किया है |

तिरुप्पावै के २०००पड़ी” और ४०००पड़ीके व्याख्यान कर्ता श्री आई जनन्याचार्य अपने व्याख्या की भूमिका में तिरुप्पावै के वैभव को अति सुंदर रूप में वर्णन करते है | इस भूमिका में वे श्री रामानुजाचार्य के समय हुई एक घटना का उदाहरण देते हुए कहते है की स्वयं गोदा देवी (जो आळ्वारों के उत्तम गुणों का समागम है) ही सर्वोत्कृष्ट और योग्य है जिनसे हम सभी उनकी स्वरचित भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के रस का आस्वदान कर सकते है | इसी में श्री रामानुजाचार्य से एक बार कई शिष्यों ने निवेदन किया की वे गोदा अम्मा जी के भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा करे | तब श्री रामानुजाचार्य ने कहा हे उपस्थित शिष्यों ! आप सभी भलीभाँती जानते है की तिरुप्पल्लाण्डु की कथा और श्रवण करने के लिए बहुत से वैष्णव होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै के नहीं | क्योंकि तिरुप्पल्लाण्डुनिम्न स्थर पर भगवद मंगलाशासन के लिए ही किया गया था और इसकी कथा और श्रवण करने के लिए बहुत सारे योग्य लोग होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की रचना श्री गोदा अम्मा जी ने भागवतो का मंगलाशासन के लिए किया है जो अत्यंत उच्च श्रेणी (चरमपर्व) की रचना है और जिसका रसास्वादन  कुछ महा रसिक भागवत ही कर सकते है | आगे रामानुजाचार्य कहते है की तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के लिए पुरुष कभी भी योग्य नहीं है क्योंकि गोदा अम्मा जी के कैंकर्योत्फुल्ल और भावुक हृदय और तिरुप्पावै के गोपनीय अर्थों को समझने के लिए हमें भी पतिव्रता स्त्री (जो पति पर पूर्ण रूप से निर्भर होती है) के अनुसार भगवान की अहैतुक और निर्हेतुक कृपा पर निर्भर होना चाहिए | आगे और भी कहते है की भगवान की पत्नियाँ (जो स्वानुभव की प्रतीक्षा से कैंकर्य में तत्पर है) भी भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण नहीं कर सकती है | इसका पूर्ण श्रेय केवल श्री गोदा अम्माजी का ही है |

श्री वरवरमुनि स्वरचित उपदेश रत्नमाला के २२, २३, २४ पासुर में गोदा अम्मा जी के वैभव का गुण गान करते है जो इस प्रकार है :
पासुर २२ : श्री वरवरमुनि किस प्रकार भावोत्फुल्ल होकर सोचते है, किस प्रकार माता गोदा ने अपने निज निवास परमपद को छोड़कर, उन्हें बचाने के लिए (बद्ध जीवो का उद्धार हेतु) इस भव सागर में श्री पेरियाल्वर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई | कहा जाता है की जिस प्रकार नदी में अपने शिशु को डूबते हुए  देखकर उसकी माता स्वयं नदी में कूदती है ठीक उसी प्रकार सभी जीवों की माता गोदा अम्मा भी इस भव सागर में कूदती (अवतार लेती)  है |

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पासुर २३ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा के तिरुनक्षत्र की भांति कोई और नक्षत्र नहीं हो सकता है क्योंकि उनका तिरुनक्षत्र सर्वश्रेष्ट और अत्योत्तम है |
पासुर २४ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा “अंजु कुडी” की बेटी है | उनके दिव्य कार्य अन्य आल्वारों के कार्यों से भिन्न और सर्वोत्कृष्ट है | और किस प्रकार से उन्होंने भगवान के प्रति अपने निष्क्रिय प्रेम भावना को छोटे उम्र में ही प्रकाशित किया | पिल्लै लोकम जीयर “अंजू कुडी” का मतलब समझाते हुए कहते है :
१) जिस प्रकार पांडवो के वंश का अंतिम उत्तराधिकारी परीक्षित महाराज थे उसी प्रकार हमारे आल्वारों के वंश की अंतिम उत्तराधिकारी गोदा अम्मा जी है |
२) वे आल्वारों के प्रपन्न कुल में अवतरित हुई |
३) वे पेरियाल्वार (जो सदैव भगवान के लिए भयभीत थे और मंगलाशसन किया करते थे) की उत्तराधिकारी थी |

कहा जाता है कि गोदाअम्माजी पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठावान थी | कहते हैं कि पेरिय आळ्वार की भगवान में रति के कारन ही श्री आण्डाल अम्माजी भी भगवान में रति से संपन्न हुई और तदन्तर उनका मंगलाशाशन कर गुणगान किया | निम्नलिखित स्व वचनों पर आधारित कुछ प्रस्तुत है :

१) आप श्री अपने नाच्चियार तिरुमोळि के १०.१० वे पासुर में कहती है : ” विल्लिपुदुवै विट्टूचित्तार तंगळ देवरै वल्ल परिचु वरुविप्परेल अदु कान्ण्दुमे ” अर्थात वे स्वत: अपनी ओर से भगवद आराधना नहीं करेंगी अपितु अगर उनके पिताश्री भगवान को स्वयं बुलाकर मनाएंगे तभी आप श्री भगवद आराधना करेंगे |

२) श्री वरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला में सुन्दर रूप से पहले १० आळ्वारों का परिचय देते हुए तदन्तर “श्री गोदा अम्माजी”, “मधुर कवि आळ्वार”, “श्री भाष्यकार – एम्पेरुमानार” का परिचय देते है क्योंकि ये तीन मुख्यत: आचार्य निष्ठावान है |

पूर्वोक्त वाक्यांशों को ध्यान में रखते हुए, श्री गोदाम्माजी के चरित्र का संक्षिप्त वर्णन का अनुभव अब करे :

आण्डाल जी श्री विल्लिपुत्तूर के तुलसी वन (जहा वर्तमान नाच्चियार मंदिर है) में अवतरित हुई थी | जिस प्रकार राजा जनक की भूमि में भू सिंचन के जयिरे प्राप्त शिशु का नाम (हल के नाम के अनुसार) सीता रखा गया, उसी प्रकार श्री पेरियाल्वार ने तुलसी वन में प्राप्त शिशु (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) का नाम कोदै (गोदा – अर्थात माला) रखा इत्यादी |

आप श्री को बचपन से ही भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन कराया गया था | इसी कारण आप विशेषत: भगवान से आकर्षित थी | आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार हर रोज़ वटपत्रशायी भगवान के लिए सुघंदित पुष्पों की माला बनाते थे | भगवान भावनामृत रति के कारन आप श्री भगवान को ही उचित वर मान लिया और यही सुनिश्चित किया | आप श्री के पिता के अनुपस्थिति में, आप ने भगवान की माला (जो हाल ही में भगवान को समर्पित की जाने वाली थी) को स्वयं पहनकर आईने के सामने खड़ी होकर सोचने लगी – अरे ! कितनी सुन्दर माला है | मै खुद इस माला के प्रति आकर्षित हो रही है | क्या यह माला पहनकर मै भगवान के साथ योग्य हूँ या अयोग्य हूँ ?  ऐसा सोचकर तदन्तर आप श्री ने माला को उक्त जगह पर रख दी | तन्दंतर आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार आये और यही माला भगवान को अर्पण किये | यह घटना क्रम कई दिनों तक चल रहा था | अचानक एक दिन आप श्री के पिता ने देखा – आप श्री भगवान के भोग्य वस्तु को (असमर्पित माला) स्वयं पहनकर उसका रसास्वादन कर रही थी | यह देखकर आप श्री के पिता बहुत व्याकुल और निराश हुए और तदन्तर उन्होंने यह माला भगवान को अर्पण नहीं किया | उस रात, भगवान स्वयं आप श्री के पिता जी के स्वप्न में आकर पेरियाल्वार से पूछे : श्रीमान, आप मेरे लिए फूलो की माला क्यों नहीं लाये ? आळ्वार ने कहा – आप सर्वज्ञाता है| मेरी बेटी ने असमर्पित माला को स्वयं पहन लिया | इसी कारण आप को यह उच्श्रिष्ट माला अर्पण नहीं किया | तदन्तर भगवान बोले – आपने ऐसा क्यों किया ? मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की आप की बेटी के पहनने के कारन एक विशेष भक्तिरस की सुगंध आई | इस कारन आप इस कर्म को अनुचित ना समझे | मुझे ऐसी मालाये बहुत पसंद है | ऐसा भगवान से सुनकर अत्यंत प्रसन्न और भावुक आळ्वार ने प्रतिदिन – माला बनाकर, फिर अपनी बेटी को यही माला पहनाकर,फिर भगवान को अर्पण करना शुरू किया | अत: इस प्रकार से अपनी बेटी के प्रति उनका सम्मान और बड़ गया |

श्री आण्डाल नाच्चियार, जन्म से ही अत्यंत भक्ति भाव (परम भक्ति) से संपन्न थी क्योंकि आप श्री भू देवी की अवतार है और स्वभावत: आप श्री को भगवान से अनुरक्ति है | कहा जाता है की : आप श्री की भगवदानुरक्ति आप श्री के पिता के भगवदानुरक्ति से अधिकाधिक और सर्वश्रेष्ठ है | इस भगवदानुरक्ति के कारन आपमें विरह भाव की व्युत्पत्ति हुई और इस कारणवश आप सदैव व्याकुलता, भगवान को तुरंत पाने की इच्छा से ग्रस्त थी (भगवान् से ब्याह रचाना करना चाहती थी) | इस भावमयी अवस्था में आप श्री ने भगवान को पति के रूप में पाने के लिए तरह तरह के उपायो का अवलम्ब शुरू किया| जिस प्रकार वृन्दावन की गोपिकाओं ने श्री कृष्ण की प्राप्ति की थी, उन्ही के अनुसार दर्शाये मार्ग में श्री गोदा अम्मा जी ने श्रीविल्लिपुत्तूर को तिरुवैप्पड़ी (वृन्दावन), वटपत्रशायी भगवान को श्री कृष्ण, भगवान के मंदिर को श्री नंद बाबा का घर, स्थानीय कन्याओं को गोपीस्वरूप इत्यादी मानकर तिरुप्पावै व्रत का शुभारम्भ किया |

आपश्री तिरुप्पावै में निम्नलिखत वेद वाक्यांशों को दर्शाती है :

१) प्राप्य और प्रापक ( उपाय और उपेय) स्वयं भगवान ही है |

२) वैष्णव शिष्ठाचार ( पूर्वाचार्य अनुष्ठान ) का प्रकाशन ( क्या सही और क्या गलत ) |

३) भगवद अनुभव सदैव भक्तों के सत्संग में करना है और अकेले (स्वार्थपर) होकर नहीं |

४) भगवान के दर्शनार्थ और शरण लेने से पूर्व, सर्वप्रथम उनके द्वारपालक, बलराम जी, यशोदा माता, नंद बाबा इत्यादियों का आश्रय लेना चाहिए |

५) हमे श्री लक्ष्मी जी के पुरुषकार से ही भगवद प्राप्ति होती है और इनका आश्रय लेना प्रपन्नों का कर्त्तव्य है |

६) हमें सदैव भगवान का मंगलाशासन करना चाहिए |

७) हमें भगवान से कैंकर्य मोक्ष की इच्छा व्यक्त करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए की भगवद-कैंकर्य का सौभाग्य प्रदान हो और हमारा कैंकर्य भगवान स्वीकार करे क्योंकि कि भगवद्कैंकर्य जीवात्मा का स्वस्वरूप है |

८) हमें पूर्ण रूप से समझना चाहिए की उपाय भगवान स्वयं है और एक क्षण के लिए यह नहीं सोचना चाहिए की स्वप्रयास भी उपाय है |

९) अन्याभिलाषी ना होते हुए,  केवल भगवदानुभव और भगवद्प्रीति हेतु भगवद्कैंकर्य करना चाहिए|

उपरोक्त व्रत के नियम पालन करने के बावजूद भी गोदा अम्माजी को भगवद-साक्षात्कार, भगवद्प्राप्ति नहीं हुई और भगवान ने उन्हें स्वीकार नहीं किया | यह जानकर, गोदा अम्माजी अत्यंत शोक ग्रस्त हुई | इसीलिए अपने असहनीय शोक और विरह भाव को स्वरचित “नाच्चियार तिरुमोलि” में व्यक्त करती है | हमारे सत्सम्प्रदाय के अनेकानेक विशेष तत्वों का निरूपण पूर्वोक्त ग्रन्थ में हुआ है | कहा जाता है कि नाच्चियार तिरुमोलि के श्रोताओं को वाकई में परिपक्व होना चाहिए वरना गलत भाव को समझेंगे | नाच्चियार तिरुमोलि में गोदा अम्मा जी कहती है ” मानिदवर्क्केंरु पेच्चुप्पदिल वाळगिन्रेन “: अगर कोई मेरे परिज्ञान के खिलाफ, बेईरादे से यह कह दे – आप श्री भगवान को छोड़कर किसी ओर से विवाहित है, मै तुरंत अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी | मै ऐसा सुनना हरकिस सहन नहीं कर सकती हूँ |

वारणमायिरम दशक पद्य में, गोदा अम्माजी स्वप्न में भगवान से ब्याह रचने की लीला का वर्णन करती है | तदन्तर भावनारसरत गोदा अम्माजी को  आप श्री के पिता ने आप श्री को श्रीरंग जी के अर्चावतार का वैभव दर्श कराया और इस कारण वश आप श्री श्रीरंग भगवान के प्रति आकर्षित हुई | परन्तु अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर पेरियाल्वार से रहा नहीं गया और वे भी शोक और व्याकुलता से ग्रस्त हुए | एक दिन, रात्री में, भगवान श्रीरंगनाथ उनके स्वप्न में आये और कहे – आप ज्यादा चिंतित ना हो श्रीमन ! आपको मै एक अच्छा शुभ दिन बतावूँगा और उस दिन आपको आपकी बेटी को मुझे सौपना होगा ताकि उनका उनकी प्रेमिका के मिलन हो | यह सुनकर हर्षित पेरियाल्वार ने भगवान को पुनः नमस्कार किया और बेटी की बारात की तय्यारी शुरी किया | भगवान के स्वयं उनके लिए अर्थात अपनी प्रेमिका भविष्य पत्नी के लिए पालकी, चामर, छत्री और उनके नित्य और वर्तमान कैंकर्यपरों को श्रीविल्लिपुत्तूर भेजा | आळ्वार अपने इष्टदेव श्री वतपत्रशायी भगवान से आज्ञा लेकर, बेटी को पालकी में बिठाकर, पूरे बरातीयों के साथ मंगल वाद्य यंत्रो के साथ श्रीरंग की ओर रवाना हुए |

सुसज्जित, अत्यंत सुन्दर, आभूषणों से अलंकृत गोदाम्माजी ने श्रीरंग में प्रवेश करते ही, पालकी से उतरी, मंदिर में प्रवेश करते हुए, तदन्तर मंदिर के गर्भ स्थान में प्रवेश की | तदन्तर आप श्री ने साक्षात श्रीरंग के चरण कमलों को छुआ और अंतर्धान हो गयी और इस प्रकार से अपने नित्य वास परमपद में प्रवेश किया|

 

यह दृष्टांत देखकर, उपस्थित अचंबित भक्तों ने भगवान के ससुर जी का अत्यंत आदर और सत्कार किया | भगवान ने तुरंत डंका घोषणा किये की पेरियाल्वार समुद्रराज की तरह उनके ससुर हो चुके है अत: उनका विशेष आदर और सत्कार हो | तदन्तर आप श्री के पिता, पेरियाल्वार श्रीविल्लिपुत्तूर को प्रस्थान हुए और वटपत्रशायी की सेवा में संलंग हुए |

श्री गोदा अम्माजी के जीवन वृत्तान्त की असीमित वैभव को सदैव या साल में मार्गशीष मॉस में अवश्य सुनते हुए मनन चिंतन करते है | परन्तु प्रत्येक बार हमें कुछ नया सा महसूस होता है जब भी इनकी कथा का श्रवण करे क्योंकि इनके स्वरचना और अन्य दिव्यप्रबंध में ऐसे असंख्य साम्प्रदायिक तत्त्व है  जिन्हें एक बार में जाना नहीं जा सकता है |

श्री गोदाम्माजी और उनकी स्वरचित तिरुप्पावै के असली वैभव के दृष्टांत को समझने के लिए, पराशरभट्टर जी के दिव्य वचन से समाप्त करेंगे | पराशर भट्टर कहते है – प्रत्येक प्रपन्न को तिरुप्पावै का पाठ और अनुसन्धान करना चाहिए | अगर यह संभव नहीं है तो मुख्य पासुर, अगर वों भी संभव नहीं हो तो अंत के दो पासुर (शित्तम शिरुघाले ..) का नित्य पाठ अवश्य करना चाहिए | अगर यह भी संभव नहीं है, तो याद करे श्री पराशर भट्टर को, जिन्हें तिरुप्पावै अत्यंत प्रिय है और जो तिरुप्पावैरत है | केवल यही सोच भगवान को संतुष्ट करती है | जैसे एक गाय, घास की पत्तियों और नकली चर्म से बने बछडे के स्पर्श मात्र से ही निसंकोच दूध देना शुरू करती है, उसी प्रकार भगवान जीवात्मा (जो नित्य तिरुप्पावै या तिरुप्पावैरत श्रीपराशर भट्टर का पाठ मनन चिंतन करता हो) के आचार्य सम्बन्ध को जानकर संकोच रहित अपनी कृपा वर्षा बरसाते है | श्री गोदाम्माजी ने अहैतुक कृपा से इस संसार में अवतार लिया और तिरुप्पावै का विशेष प्रसाद अनुगृहित किया ताकि बद्ध जीवात्माए भी भगवान के अहैतुक कृपा के पत्र बन सके और इस संसार के भव-बंधनों से विमुक्त होकर नित्य परमपद में भगवदनुभव और भगवद्कैंकर्य के आनंद का रसास्वादन करे |

श्री गोदाम्माजी का तनियन

नीळातुंगस्तनगिरितटी सुप्तमुद्बोध्य कृष्णम्
पारार्थ्यम् स्वम् श्रुतिशतशिरस्सिद्धमद्ध्यापयन्ती ।
स्वोचिष्ठायाम् श्रजनिगळितम् याबलात्कृत्य भुङ्ते
गोदा तस्यै नम इदं इदं भूय एवास्तु भूयः ॥

अडियेन सेत्तालूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तिक रामानुज दास
अडियेन सेत्तालुर वैजयंती आण्डाल रामानुज दासी

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पेरियाळ्वार

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

 

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पेरियाळ्वार

 

तिरुनक्षत्र – स्वाति नक्षत्र , ज्येष्ठ मास

अवतार स्थल – श्री विल्लिपुत्तूर

आचार्य – श्री विष्वकसेन

ग्रंथ रचना सूची – तिरुप्पल्लाण्डु, पेरियाळ्वार तिरुमोळि

पेरियवाच्चान पिळ्ळै श्री पेरियाळ्वार के तिरुप्पल्लाण्डु व्याखा की भूमिका मे अत्यन्त सुन्दरता से उनका गुणगान करते है । पेरियवाच्चान पिळ्ळै यहाँ तादात्म्य रूप से स्थापित करते है की बद्ध जीवात्माओं को इस भव सागर से उत्थान हेतु श्री पेरियाळ्वार का अवतार हुआ है । श्री पेरियाळ्वार भगवान श्रीमन्नारायण के निर्हेतुक कृपा से सहज रूप मे भगवान श्रीमन्नारायण के दास्य से अलंकृत है । कहते है की आप श्रीमान चाहते थे की आपका जीवन केवल भगवद्-कैंकर्य मे ही होना चाहिये और इसी कारण आप ने शास्त्रों का अध्ययन कर पता लगाया कि सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य क्या है । यह (सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य के बारें मे) आपने भगवान श्री कृष्ण अवतार से संबन्धित लीला (कहते है की कंस की सभा मे प्रवेश करने से पहले श्री कृष्ण भगवान मथुरा मे प्रस्थान कर एक मालाकार के घर मे ठहरे और जहाँ उन्होने अपने वस्त्र इत्यादि बदले । तत्पश्चात उन्होने मालाकार से निवेदन किया की उन्हे निर्मल नूतन माला भेंट के रूप मे दे । मालाकार श्री कृष्ण भगवान की सुन्दरता से मुग्ध होकर अत्यन्त प्रेमभावना से भगवान को माला दिया । और जिसे स्वयम भगवान ने हर्ष से माला को स्वीकार किया) को स्मरण कर यह प्रतिपादित किया की फूलों की माला ही सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य है । और इस प्रकार अपने शेष काल पर्यन्त तक वे भगवान के लिये स्वयम फूलों के बगीचे का निर्माण कर, फूलों के बीजों को बोकर, उसका संरक्षण कर, उत्पन्न फूलों से फूलों की माला बनाकर अत्यन्त प्रेमभावना से श्रीविल्लिपुत्तूर भगवान को अर्पण करते रहे ।

कहते है की अन्य आळ्वारों और आप श्रीमान मे आसमान और जमीन का फर्क है । अन्य आळ्वार अपने इच्छावों की पूर्ती की चाह रखते थे (भगवान की सेवा करना) । परन्तु आप श्रीमान इनके विपरीत थे । आप श्रीमान तो केवल भगवान की इच्छावों की परिपूर्णता की चाह रखते थे (यानि भव सागर मे त्रस्त सभी जीवात्माये भगवाद्-धाम जाकर नित्य कैंकर्य करे चाहे यह उनके चाहना के विपरीत क्यों ना हो) । अन्य आळ्वार सोचते थे की भगवान ही रक्षक है और इस कारण वे सभी संरक्षित है (यानी भगवान का धर्म है उनके शरणागत का संरक्षण करना) और इस प्रकार अपनी चिन्ता दूर करते थे । परन्तु आप श्रीमान तो यह सोचते थे की आप भगवान के संरक्षक है और भगवान की रक्षा, देखभाल इत्यादि करना आपका कर्तव्य है । यही बात श्री पिळ्ळै लोकाचार्य और श्री वरवरमुनि जी ने अती सुन्दरता से बताया है जिसका वर्णन अब आगे है ।

आप श्रीमान की रचना तिरुप्पल्लाण्डु भी अन्य दिव्यप्रबन्धों की तुलना मे पूर्वोक्त कारण से सर्वोत्तम माना जाता है और अत्यधिक रूप से इसीका गुणगान होता है । अन्य दिव्यप्रबन्ध हलांकि वेदान्त, अनेकानेक तत्वविषयों को प्रतिपादित करते है परन्तु इनकी गणना मे आप श्रीमान का तिरुप्पल्लाण्डु केवल भगवान का मंगलाशासन करता है । अन्य प्रबन्ध बहुत बडे है परन्तु आपकी यह रचना बहुट छोटी, सरल और स्पष्ट है । कहते है की आपने बारह पासुरों मे मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है ।

स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य अपने दिव्य ग्रंथ श्रीवचनभूषण मे कहते है – मंगलाशासन सिद्धोपाय निष्ठ भक्त का दैनिक कार्य है (यानि जो केवल भगवान ही उपाय और उपेय है मे आस्था रखता है) । श्रीवैष्णव दिनचर्य इस लिंक_1, लिंक_2 मे उपलब्ध है और इसका विवरण भी बताया जा चुका है जो की श्रीवैष्णव लक्षण के अन्तर्गत आने वाले अनुक्रम मे है ।

मंगलाशासन क्या है ? मंगलाशासन माने किसी के सुख, शान्ति, सम्वृद्धि के लिये प्रार्थना करना । सभी आळ्वार भगवान के हित के बारे मे नित्य सोचा करते थे । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य यह दर्शाते है की पेरियाळ्वार का भगवान के प्रति लगाव अन्यों से अधिकाधिक था । यह पूर्व ही आप श्रीमान के अर्चावतारनुभव मे बताया गया है ।

अब हम देखेंगे की श्री वचनभूषण के 255वा सूत्र कैसे आप श्रीमान और यतीराज जी के वैभव को दर्शाता है –

अल्लातवर्गळैप्पोळे केट्किरवर्गळ उडैयवुम्, चोल्लुकिरवरगळ उडैयवुम् तनिमैयैत् तविर्क्कैयन्रिक्के आळुमार एन्गिरवन् उडैय तनिमैयैत्तविर्क्कैकागवायित्तु भाष्यकाररुम् इवरुम् उपदेच्चिप्पतु ।

अन्य आचार्य/आळ्वारों की भान्ति, आप श्रीमान और श्री भाष्यकार ने शास्त्रों के अर्थों को उपदेश देकर सभी जीवात्वामों को सुधारकर और इन सभी को भगवान के नित्य कैंकर्य मे संलग्न किये । और इस प्रकार से आपने श्री भगवान के एकाकिपन को दूर किया क्योंकि भगवान अपने बेटों समान जीवात्मावों का नित्य हित चाहते है और सभी जीव उनका शरण पाकर उनका नित्य कैंकर्य करे । अगर कोई भी जीव इस भवसागर मे त्रस्त दिखाई पडता है तो भगवान एक दम से उदास और अप्रसन्न हो जाते है । जिस प्रकार एक पिता या माता को अपने स्वात्मज पर प्रेम भावना रहती (ज्योकि अगर उनके साथ उस वक्त नही है) है उसी प्रकार की भावना भगवान मे भी है । यहा शिक्षक-शिष्य का एकाकिपन और जीवों का उद्धार वास्तव मे महत्त्वपूर्ण उद्देष्य नहि अपितु भगवान की इच्छा की पूर्ती और जीवों का स्वभाविक रूप से कैंकर्य करना ।

श्री मणवाळमहामुनि पूर्वोक्त सूत्र की व्याख्या मे कहते है की पेरियाळ्वार को श्री एम्पेरुमान के सुशील और कोमल स्वभाव का ज्ञान था और स्पष्ठ रूप से दर्शाते है की ऐसे भगवान कभी भी जीवात्मावों के विरह मे नही रह सकते है । अतः भावनामुग्ध आळ्वार इसी भाव मे पूर्ण रूप से स्थित रहकर उनकी सेवा करना चाहते थे । श्री मणवाळमहामुनि इसके ज़रिये श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के कथन “भाष्यकार” शब्द के वैभव को भी दर्शाते है । वे कहते है – श्री भाष्यकार (स्वामि रामानुजाचार्य) ने वेदान्त के सार को अपने श्रीभाष्य मे दर्शाया है यह केवल पूर्ण रूप से भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु ही किया गया है अर्थात भगवद्-कैंकर्य है । और यह वेदान्त के मार्गदर्शन से अभिन्न है ।

श्री मणवाळमहामुनि अपने उपदेश रत्नमाला मे श्री पेरियाळ्वार के वैभव को क्रमानुसार पांच पासुरों मे वर्णन करते है जो इस प्रकार है –

पहला – सौलहवें पासुर मे, वह अपने हृदय से कहते है की ज्येष्ठ मास का स्वाति नक्षत्र अत्यन्त पावन और पवित्र है क्योंकि उसी दिन श्री पेरियाळ्वार का आविर्भाव हुआ है जिन्होने तिरुप्पल्लाण्डु का निर्माण किया । और यह पूरे विश्व के लिये शुभदायक कल्याणकारक और मंगलदायक प्रतीत हुआ है ।

दूसरा – सत्रहवें पासुर मे कहते है, हे मेरे हृदय तुम सुनो ! ऐसे महाजनों महाज्ञानीयों का कोई बराबर नही जो श्री पेरियाळ्वार के तिरुनक्षत्र का नाम सुनकर हर्ष से प्रफ़ुल्लित होते है ।

तीसरा – अठारहवें पासुर मे कहते है, भगवान का मंगलाशासन करने की उनकी इच्छा अन्य आळ्वारों की तुलना मे सर्वश्रेष्ठ है । और भगवान के प्रति वात्सल्य भाव की वजह से आप सदैव के लिये पेरियाळ्वार के नाम से जाने गए ।

चौथा – वरवरमुनि इस उन्नीवसें पासुर मे कहते है, अन्य दिव्य पासुरों की तुलना मे सर्वश्रेष्ठ और अग्रगण्य तिरुप्पल्लाण्डु है क्योंकि वह केवल भगवान के मंगलाशासन ही करता है । जिस प्रकार वेदों मे प्रणव शब्द ओम् कार है उसी प्रकार द्राविड वेद की शुरुवात तिरुप्पल्लाण्डु से होति है । हर एक आळ्वार द्वारा विरचित पासुर दिव्य अनोखा और निष्कलंक है ।

पांचवा – बीसवें पासुर मे वे अपने हृदय से कहते है तुम वेद, वेदांगो, और अन्य प्रमाणों मे ढूँधकर बतलावों की क्या तिरुप्पल्लाण्डु से बडकर कोई प्रबन्ध है और क्या पेरियाळ्वार से सर्वश्रेष्ठ और अग्रगण्य अन्य आळ्वारों मे कोई है ? अर्थात् कोई नही । उनके जैसा कोई नही ।

उनकी एक और खासियत है की वे साक्षात परब्रह्म श्री रंगनाथ जी के ससुर थे । अर्थात अपनी दत्तक पुत्री श्री आण्डाळ अम्माजी को उनको समर्पित कर और उन दोनों की विवाह करवाया ।

इस धारणा से अपने मन को एक चित्त करते हुए, उनके वैभवशाली चरित्र को आगे देखे ।

पेरियाळ्वार श्रीविल्लिपुत्तूर मे प्रकट हुए जहाँ कई सारे वेदों के तत्वज्ञ रहते थे । वे ज्येष्ठ मास के स्वाति नक्षत्र मे प्रकट हुए और उनके माता-पिता ने उनका विष्णुचित्त नाम रखा । कहते है की जैसे गरुड (जो वेदात्म से जाने जाते है – यानि जिनका शरीर ही वेद है) सदैव अपने स्वामी श्रीमन्नारायण के दिव्यचरण को पडके हुए रहकर परत्व का प्रतिपादन करते है ठीक उसी प्रकार पेरियाळ्वार ने परत्व का निरूपण दिया (अर्थात सकलगुणसंपन्न अखिल जगत के सृष्टि करता धरता भगवान श्रीमन्नारायण ही परवत्व है और यही वेदों मे प्रतिपादित है) । और इसी कारण उन्हे श्री गरुड का अंशावतार माना जाता है । हलांकि कहा जाता है की हमारे आळ्वार ऐसे जीव है जो भगवान के निर्हेतुक कृपा से चुने गए है | और जिन्होने दिव्य व्यक्तित्व तत्पश्चात प्राप्त किया ।

कहा जाता है की जिसप्रकार भगवान की कृपा से भक्त प्रह्लाद जन्म से ही भगवद्-भक्ति से संपन्न थे उसी प्रकार पेरियाळ्वार भी जन्म से श्री वटपत्रशायि भगवान की असीम कृपा से संपन्न थे ।

शास्त्र कहता है – “ना अकिंञ्चयचित्कुर्वतस्च शेषत्वम्” अर्थात् अगर जीव भगवान के लिये छोटे से छोटा कैंकर्य ना करे तो उस जीव का शेषत्व नष्ट (जीवित) नहि रहता ।

केवल भगवान की इच्छा हेतु वे सोचने लगे की अब उनको भी कुछ कैंकर्य करना चाहिये वरना उनका शेषत्व तो नष्ट हो जायेगा । इसी विचार से उन्होने अनेकानेक पुराणों, उपनिषद इत्यादि मे भगवद्-कैंकर्य के बारे मे दूंढने लगे । वे यह देखते है की सर्वेश्वर भगवान श्रीमन्नारयण मथुरा मे श्री कृष्ण के रूप मे अवतरित हुए है ज्योकि इस प्रकार से वर्णित है –

एष नारायण श्रीमान क्षीरार्णव निकेतनः ।
नाग पर्यंकम् उत्सृज्य ह्यागतो मथुरापुरीम् ॥

अर्थात् – यह श्रीमन्नारायण जिनका निज धाम श्री क्षीर सागर निकेतन है , वही अपने पर्यंक आदि शेष को छोडकर मथुरा पुरी मे श्री कृष्ण के रूप मे अवतरित हुए है ।

नम्माळ्वार कहते है – “मन्णणिन् भारम् णीकुतर्के वडमथुरैप्पिरन्तान्” अर्थात – आदि पुरुष भगवान श्रीमन्नारायण माने श्री कृष्ण भगवान धरती के भोज को कम करने हेतु अवतरित हुए है । महाभारत मे भी कुछ इस प्रकार से कहा गया है – वह नित्य भगवान श्री कृष्ण के रूप मे अवतार लेकर संत साधु योगियों इत्यादियों के समरक्षण, धर्म की स्थापना, और दुष्टों का विनाश हेतु अपने धाम द्वारका मे रहते है । ऐसे भगवान अत्यन्त सुन्दर श्री देवकी के गर्भ से जन्म लिये और उनका पालन पोषण अत्यन्त सुन्दर सुशील श्री यशोदा मय्या ने किया । ऐसे सुन्दर भगवान श्री कृष्ण जो सदैव नित्यसूरियों के भव्य मालावों से सुशोभित है, वे मालाकार (जो कंस के लिये सेवा करता था) के पास जाकर उन्से एक सुन्दर माला भेंट के रूप मे निवेदन करते है । स्वयम् भगवान ने मुझसे मेरी माला का निवेदन किया यह सोचकर मालाकार अत्यन्त प्रसन्नता से उन्हे ताज़ा और अत्योत्तम माला समर्पण करता है । यह वार्ता पुराणों, इतिहासों इत्यादि मे देखर, अचम्भित पेरियाळ्वार यह निर्धारण करते है की – भगवान को अति प्रिय सेवा है – ” माला बानाकर उनको समर्पित करना ” । और इस प्रकार से एक चित्त पेरियाळ्वार ने इस सेवा को आरंभ किया और श्रीविल्लिपुत्तूर के श्री वटपत्रशायि भगवान को यह मालायें समर्पित करने लगे ।

उस समय पाण्ड्य राज्य का राजा श्री वल्लभदेव (जिसने अपने दिव्य विजय मीन चिह्न को मेरु पर्वत पर स्थापित किया) अपने राज्य (दक्षिण मदुरै) का परिपालन अत्यन्त धार्मिकता से कर रहा था । एक रात्रि को राजा ने सोछा राज्य मे मेरा परिपालान किस प्रकार से हो रहा है ये मै अपने आखों से देखू । अतः वेश बदलकर वे अपने राज्य की नगरी मे प्रवेश किये । इसी दौरान राजा गौर करते है की एक ब्राह्मण किसी अन्य के घर के सामने बैठा हुआ था । उसके पास जाकर, राजा ने उस ब्राह्मण से पूछा – अरे ब्राह्मण ! अपना परिचय दो । ब्राह्मण तुरन्त बोला – मै हाल ही मै गंगा के किनारे गंगा स्नान करके लौटा हूँ । यह सुनकर प्रसन्न राजा ने ब्राह्मण से पूछा – अरे ब्राह्माण ! क्या तुम्हे कोई श्लोक पता है ? अगर पता है तो कृपया बतावो । तुरन्त ब्राह्मण ने कहा –

वर्षार्थमस्तौ प्रयतेत मासान् निचार्थामरत्तम् द्विशम् यतेथ ।
वार्द्दग्यहेतोर्वायास नवेण परत्र हेतोरिह जन्मनास्च ।

अर्थात् – प्रत्येक मनुष्य बारिश के चार महीने निश्चिंत रहने के लिये आठ महीने निरन्तर काम करते है, रात्री मे खुश होने के लिये दिन भर काम करते है, बुढापे मे आराम दायक ज़िन्दगी के लिए जवानि मे घोर परिश्रम करते है, अतः इस प्रकार हम सभी अगले अच्छे जन्म के लिये इस जन्म मे निरन्तर परिश्रम करते है ।

यह सुनकर राजा अपने भविष्य जन्म के बारें मे सोचने लगे । अरे ! इस जन्म मे मै तो राजा हूँ, मुझे सकल सम्पन्नों का सौभाग्य मिला है, कैसे आनन्ददायक सुख साधन है क्या ये सभी अगले जन्म मे भी मुझे प्राप्त होंगे ? अब मै क्या करू । मै अगले जन्म की तैय्यरी कैसे करू और इसका साधन क्या होगा ? किसके शरणागत होना चाहिये ? कौन परत्व को दर्शाता है ? और परत्व को किस माध्यम से प्राप्त कर सकेंगे ? इस प्रकार से विचलित राजा ने अपने राज पण्डित श्री शेल्वनम्बि से इसके बारे मे पूछा । श्री शेल्वनम्बि (जो भगवान श्रीमन्नारायण के प्रिय भक्त है) ने कहा – आप तुरन्त इस राज्य के सभी पण्डितों को बुलाये और वेदान्त दर्शन से इसका समाधान उनके माध्यम से करे । यह सुनकर प्रसन्न राजा ने (आपस्तम्भ सूत्र – “धर्मज्ञानसमयः प्रमाणम् वेदास्च अर्थात् – वेदज्ञात के कार्य ही प्राथमिक प्रमाण है और वेद द्वितीय प्रमाण है ” के अनुसार) तुरन्त पण्डितों की गोष्टि का आयोजन किया और कहे की जो कोई भी परत्व को दर्शायेगा उसे बहुमूल्य धनसम्पत्ति से भरा हुआ थैलि इनाम के रूप मे प्राप्त करेगा । इस थैलि को उन्होने अपने राज दरबार के छत से टांग दिया । इस प्रकार राजा का आमन्त्रण पाकार सभी पण्डित उनके राज दरबार मे तत्वनिरूपण के लिये उपस्थित हुए ।

वटपत्रशायि भगवान जीवों के उत्थापन के लिये, और अपना परत्व निरूपण पेरियाळ्वार के द्वारा दर्शाने के लिये, भगवान स्वयम् उनके स्वप्न मे आकर कहे – तुम उस सभा मे जाओ और मेरा परत्वनिरूपण कर अपने ईनाम को जीतके लाओ । बाकि मै सब संभालूंगा । आळ्वार यह सुनकर विनम्र होकर भगवान से कहते है – परत्व का निरूपण वेद वेदान्तों से करना है । मै तो मामूली सा ब्राह्मण मालाकार हूँ । मै भला यह कार्य कैसे सिध्द कर सकता हूँ ? भगवान आग्रह करते हुए कहते है – आप भला इन सब की चिन्ता ना करे । मै ये सब संभालूंगा । क्योंकि मै वेदों को प्रकट करता हूँ और उससे संबंधित अर्थ को भी यथा तथा दर्शाता हूँ । अतः आप निश्चिंत रहिये । भगवान का आश्वासन पाकर अगले ही दिन, ब्रह्म मुहुर्त मे उठकर (शास्त्र कहता है – ब्राह्मे मुहुर्ते च उत्थाय) अपना नित्य नैमित्य कार्य संपूर्ण कर, मदुरै की सभा के लिये रवाना हुए ।

सभा मे प्रवेश करते ही राजा और ब्राह्मनोत्तम शेल्वनम्बि ने उनको प्रणाम करते हुए स्वागत किया और उन्हे बैठने के लिये एक सिंहासन भी दिया । सभा मे उपस्थित स्थानीय पण्डितों ने राजा को बताया – आप किन्हे बुलाकार ले आए । ये तो एक तुच्छ मालाकर है । इन्हे वेद वेदान्त का परिज्ञान नही है । परन्तु राजा और शेल्वनम्बि भलिभान्ति इनके कैंकर्य और वटपत्रशायि भगवान के प्रति उनके लगाव को जानते थे । इसी लिये उन्होने उनको (पेरियाळ्वार को) परत्व निरूपण देने का मौका दिया । तदन्तर पेरियाळ्वार, भगवान की निर्हेतुक कृपा से प्राप्त दिव्य दृष्टि के आभास से वेद वेदान्त के सारतम ज्ञान को प्रस्तुत किये । जिस प्रकार श्री वल्मीकी भगवान ॠषि ने ब्रह्म के कृपाकटाक्ष से महत्त्वपूर्ण तत्वों को समझा, जैसे प्रह्लादाळ्वान भगवान के पांञ्चजन्य शंख के स्पर्श से सर्वज्ञ हुए, ठीक उसी प्रकार भगवान की निर्हेतुक कृपा से आप समझे की शास्त्रों का सार भगवान श्रीमन् नारायण ही है । इसका प्रमाण तार्किक अनुक्रम मे आगे देखेंगे ।

समस्त शब्दः मूलत्वादक्षरयो स्वभावतः समस्त वाच्य मूलत्वात् ब्रह्मणोपि स्वभावतः वाच्यवाचक संभन्धस्तयोरर्थात् प्रदीप्यते ॥

सारे अक्षर ‘अ’ अक्षर के माध्यम से ही उत्पन्न हुए है, सारे अक्षरों के अर्थ ब्रह्म से ही उत्पन्न है । अतः ‘अ’ शब्द और ब्रह्म भिन्न नही है और उनका संबन्ध स्वभाविक है ।

गीताचार्य श्री कृष्ण भगवान कहते है – “अक्षराणाम् अकारोऽस्मि” अर्थात् मै ही सारे अक्षरों के मूल ‘अ’ अक्षर हूँ ।

कहा गया है – “अकारो विष्णुवाचकम्” अर्थात् ‘अ’ अक्षर स्वयम् विष्णु यानि श्रीमन्नारायण ही है जो परमपुरुष और परमात्मा है ।

तैत्तिरिय उपनिषद् ऐसे परम पुरुष परमात्मा श्रीमन्नारायण के विशिष्ठ गुणों को इस प्रकार दर्शाता है – यता वा इमाणि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्ति अभिसम्विचन्ति, तत् विज्ञस्व ब्रह्मेति । अर्थात् – (वह) जिससे पूरा संसार और जीव की व्युत्पत्ति होती है, जिसपर पूरा विश्व निर्भर है, प्रलय् मे उस मे विलीन हो जाता है, जहा जीव मोक्ष को प्राप्त करते है, वह निश्चिंत रूप से ब्रह्म है । ऐसे परम पुरुष भगवान के तीन गुणों का प्रतिपादन हुआ है जो इस प्रकार है –

पहला – “जगत कारणत्व” – इस पूरे जगत का कारण है (वह)
दूसरा – “मुमुक्षु उपायस्त्व” – मोक्ष की चाहना रखने वालों के पूज्य देवता (वह)
तीसरा – “मोक्ष प्रदत्व” – (जो) मोक्ष दे सकता है (वह) ।

यह सरे लक्ष्ण या गुण श्रीमन्नारायण मे पूर्ण रूप मे देख सक्ते है जैसे विष्णु पुराण मे है –

विष्णोस्सकाचादुद्भूतम् जगत् तत्रैव च स्थितम् ।
स्थिति सम्यमकरर्थ्तासौ जगतोऽस्य जगच्छ सः ॥

विष्णु से ही जगत की व्युत्पत्ति होती है, प्रलय काल मे फिर से उन्मे ही लीन होता है, वही उसको संभालते है और वही विनाश भी करते है और उन्ही का शरीर ही यह पूरा जगत है ।

जैसे वराह पुराण मे ,

नारायणनाथपरो देवो ना भूतो ना भविष्यति ।
एतत् रहस्यं वेदानां पुराणां च सम्मतम् ॥

अर्थात् – श्रीमन्नारायण के जैसा परमपुरुष ना भूतकाल मे था, ना भविष्य मे होगा । यह वेदों का रहस्य है और पुराणों की भी यही संमति है ।

जैसे नारदीय पूराण मे,

सत्यम् सत्यम् पुणस्सत्यम् उद्धृत्य भुजमुञ्च्यते ।
वेदाः शास्त्रात् परम् नास्ति न दैवम् केशवात् परम् ॥

अर्थात् – मै पुनः पुनः अपनी भुजावों को उठाकर ज़ोर से बता रहा हूँ, वेद और शास्त्रों मे केशव से बडकर कोई देव परम नही है ।

अतः कुछ इस प्रकार वेद, पुराणों और इतिहासों से पेरियाळ्वार ने भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व का प्रतिपादन किया । तदन्तर, लटकी इनाम थैलि अपने आप नीचे गिर गई और तुरन्त पेरियाळ्वार उसे उठा लेते है । यह रमणीय दृष्य देखकर अचंभित स्थानीय पण्डितों के साथ राजा और शेल्वनम्बि इत्यादि सभी अत्यन्त हर्ष से उनको दण्डवत प्रणाम करते है । उपस्थित सभी कहते है – वेदों का सारतम सार उन्होने अत्यन्त सरल और सुगमता से प्रतिपादन किया है । और अत्यन्त प्रेमभाव मे, सभी उनके सत्कार मे उन्हे एक सुसज्जित हाथि पर बैठाकर, उनके चारों ओर अनेक पण्डित छत्रि और चामर पकडे हुए, धण्का घोषणा कर रहे थे – “ऐसे महनीय विश्वसनीय महात्मा जिन्होने वेदों का सार सारतम् तत्व का प्रतिबोधन किया उनका स्वागत किया जा रहा है और वही पधार रहे है” । श्री वल्लभ राजा उनका मान सत्कार कर उन्हे पट्टर्पिरान से संभोदित करते है अर्थात जिन्होने अनेकानेक भट्टरों को महान उपकार किया है । राजा भी इस सवारि मे हिस्सा लेकर अत्यन्त हर्षित होते है । और सभी जगह मे इनके आगमन का उत्सव मानाने की तय्यारि ज़ारी रही ।

जिस प्रकार एक माता/पिता अपने सन्तानों की अभिवृद्धि देखर हर्षित होते है, उसी प्रकार परमपदनाथ भगवान श्रीमन्नारायण भी हर्षित हुए । और तदन्तर स्वयम् भगवान चक्र गदा इत्यादि से सुशोभित श्री गरुड जी पर अपनी धर्मपत्नी श्री लक्ष्मी अम्मा जी के समेत विराजमान होकर उनकी सवारी के बींचों बींच प्रकट हुए । इनका सम्मान करने अन्य देवि – देवता अपने अपने परीवार सहित सभी भी प्रकट हुए । चक्र, गदा इत्यादि से सुशोभित भगवान को इस भौतिक जगत मे देखकर अपने सवारी की चिंता ना करते हुए केवल भगवान की खुशहालि हेतु हाथि पर लटके हुए घण्ठा को निकालकर उन्होने अहंकार रहित प्रेम और वात्सल्य भाव से घण्ठा बजाते हुए उनका मंगलाशाशन किया । यही दिव्यानुभूति ही तिरुपल्लाण्डु से जानी गई है ।

अनुवादक टिप्पणि – भगवान सर्वज्ञ, सर्वशक्त, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ इत्यादि है । परन्तु यहाँ आळ्वार वात्सल्य भाव की नदिया मे बह गए । आळ्वार अपने शेषत्व को भूलकर, शेषी मानकर भगवान के बारें मे सोचने लगे । वे सोचने लगे अरे – ऐसे परमपुरुष जो निर्मल स्वभाव के है, जिनका शरीर पञ्च उपनिषद् तत्वों (आध्यात्मिक) का है, जो ब्रह्म शिव इत्यादि देवि देवताओ के लिये पहुचने योग्य नहि, जो नित्य सूरी का सहवास करते है, वही अभी अपने नित्य धाम को छोडकर यहा मेरे समक्ष उपस्थित हुए है । शायद कृदुष्टों से इनको कोई हानी ना पहुचे इसिलिये आळ्वार सबों (ऐश्वर्यार्थि – धन की इच्छा करने वाले, कैवल्यार्थि – जो आत्मानुभव की चाहना रखता हो, भगवद् शरणार्थि – भगवान के शरण रहकर उन्की नित्य सेवा करना) को अमन्त्रित कर उन्स सभी से निवेदन करते है आप सभी भी भगवान का मंगलाशाशन करे और तदन्तर तुरन्त उनका मंगलाशाशन करते है ।

इसके पश्चात भगवान अन्तर्धान होकर अपने निज धम को लौट जाते है । तदन्तर, पेरियाळ्वार राजा को आशीर्वाद देते है और राजा उनका मान सम्मान अत्यन्त वैभव से करता है । आळ्वार अपने निज स्थान श्री विल्लिपुत्तूर पहुचकर ईनाम का सारा धन अपने प्रिय भगवान को समर्पित कर देते है ।

जैसे मनु स्मृति मे,

त्रयैवाधन राजन् भार्य दासस्तथा सुतः ।
यत्ते समदिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥

अर्थात् – पत्नी, पुत्र, दास इन सभी के पास कुछ भी नही हो, उनकी कमाई उनके निज संबंधि उत्तारिधिकारि को जायेंगे (पती, मालिक, पिता) ।

उपरोक्त तथ्य के अनुसार, श्री पेरियाळ्वार ने अपने स्वामि वटपत्रशायि को आर्जित धन सौंप दिया । अपना कर्तव्य निभारकर अपने नित्य कैंकर्य – फूलों की माला बनाना और उसी को भगवान को समर्पण फिर से करने लगे । अतः इस प्राकार मालाकार की सेवा का अत्यन्त लाभ उठाकार स्वयम् अती प्रसन्न उस मालाकार और भगवान श्री कृष्ण का गुणगान करने लगे । श्री कृष्ण भगवान के दिव्य चरित्र से अत्यन्त लगाव होने के कारण, याशोदा मय्या का भाव रूप धारण कर, भगवान के सौशील्य और सौलभ्य गुणो का रसास्वादन करते हुए वात्सल्यभाव के प्रवाह मे उन्होने दिव्य प्रबन्ध की रचना की जिसे हम सभी पेरियाळ्वार तिरुमोळि के नाम से जानते है । सदैव श्रियपति पर चिन्तन करते हुए, उन्होने हर एक शिष्य और उन पर आश्रित श्रेयोभिलाषियों और अन्यों सहित सबों को आशीर्वाद दिया ।

यह कथा अभी पूर्ण नही हुई है अपितु इसका शेष हम श्री गोदाअम्माजी के वैभव मे देखेंगे ।

श्री पेरियाळ्वार जी का तनियन् –

गुरुमुखमनधीत्य प्राहवेदानशेषान् नरपति परिक्लुप्तम् शुल्कमादातु कामः ।
स्वसुरममर वन्द्यम् रन्गनाथस्य साक्शात् द्विज कुल तिलकम् विष्णुचित्तम् नमामि ॥

पेरियाळ्वार का अर्चावातार अनुभव इस लिंक पर उपलब्ध है ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

Source: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/01/20/periyazhwar/

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

पेरियवाच्चान पिळ्ळै

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – सेंगनूर

तिरुनक्षत्र : श्रावण मास , रोहिणि नक्षत्र
अवतार स्थाल : सेंगनूर
आचार्य : नम्पिळ्ळै
शिष्य : नायनाराचान पिळ्ळै ,वादि केसरि अळगिय मणवाळ जीयर्, परकाल दास इत्यादि

पेरियवाच्छान पिळ्ळै, सेंगणूर मे, श्री यामुन स्वामीजी के पुत्र “श्री कृष्ण” के रूप मे अवतरित हुए और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के नाम से मशहूर हुए । नम्पिळ्ळै के प्रधान शिष्यों में से वे एक थे और उन्होंने सभी शास्त्रार्थों का अध्ययन किया । नम्पिळ्ळै के अनुग्रह से पेरियवाच्चान पिळ्ळै सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध आचार्य बने ।

periyiavachanpiLLai-nampillai

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – नम्पिळ्ळै

पेरिय तिरुमोळि ७. १०. १० कहता है कि – तिरुक्कण्णमंगै एम्पेरुमान की इच्छा थी कि वे तिरुमंगै आळ्वार के पाशुरों का अर्थ उन्हीं से सुने| अतः इसी कारण, कलियन नम्पिळ्ळै बनके अवतार लिए और एम्पेरुमान पेरियवाच्छान पिळ्ळै का अवतार लिए ताकि अरुलिचेयळ के अर्थ सीख सके । पेरियवाच्छान पिळ्ळै व्याख्यान चक्रवर्ति , अभय प्रदराजर  इत्यादि नामों से भी जाने जाते हैं । पूर्वाचार्यों के अनुसार, उन्होंने नायनाराचान पिळ्ळै को दत्तक लिया था।

इनके जीवित काल में, इन्होंने निम्न लिखित ग्रंथों की व्याख्या किया है :

  • ४००० दिव्य प्रबन्ध – आप श्रीमान ने हर एक अरुळिचेयळ की व्याख्या लिखी है| लेकिन पेरियाळ्वार तिरुमोळि के लग भग  ४०० पाशुर  नष्ट होने से , मामुनिगळ ने  सिर्फ उन पाशुरों की व्याख्या लिखे।
  • स्तोत्र ग्रन्थ – पूर्वाचार्य के श्री सूक्ति जैसे स्तोत्र रत्न , चतुः श्लोकी , गद्य त्रय इत्यादि और जितन्ते स्तोत्र पर व्याख्यान लिखा ।
  • श्री रामायण – श्री रामायण के कुछ मुख्य श्लोक चुन के उन श्लोकों का रामायण तनि श्लोकि में विस्तार से विवरण किया । विभीषण शरणागति के वृतान्त के विवरण के लिए इन्हे अभय प्रदराजर करके गौरवान्वित किया गया था।
  • इन्होंने कई रहस्य ग्रंथ जैसे माणिक्क मालै , परंत रहस्य , सकल प्रमाण तात्पर्य इत्यादि (जो रहस्य त्रय से प्रतिपादित विषयों को अद्भुत रूप से समझाती है) कि रचना की। रहस्य त्रय को लिखित प्रमाण करने में आप श्री सर्वप्रथम हैं| पिळ्ळै लोकाचार्य ने नम्पिळ्ळै और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के उपदेशों के अनुसार अपना अष्टादश रहस्य ग्रंथो की रचना किये है।

इनकी अरुळिचेयळ और श्री रामायण में निपुणता का प्रमाण इनसे लिखे गए पाशुरपड़ि रामायण ही है जिसमे वे केवल अरुळिचेयळ के शब्द उपयोग से पूरे श्री रामायण का विवरण सरल रूप मे प्रस्तुत किया है।

वादि केसरि अळगिय मणवाळ जीयर् के वृतांत से हमें इनकी अनुग्रह का महत्व जानने को मिलता है । अपने पूर्वाश्रम में जीयर् पेरियवाच्छान पिळ्ळै के रसोई (तिरु मडपळ्ळि) में सेवा करते थे । वे अनपढ़ थे लेकिन अपने आचार्य के प्रति अपार भक्ति था । वेदांत विषय के बारे में कुछ श्री वैष्णव चर्चा करते समय , चर्चा की विषय के बारे में इन्होंने पूछ – ताछ की । इन्हे अनपढ़ और गवार समझके उन्होंने घमंड से जवाब दिया की “मुसला किसलयम्” (नव खिला लोढ़ा) नामक ग्रंथ के बारे में चर्चा कर रहे हैं । अपने आचार्य के पास जाके घटित संघठन को सुनाते हैं और पेरियवाच्छान पिळ्ळै दया करते हुए निश्चित करते हैं कि उन्हें सब कुछ सिखायेंगे । थोड़े साल बाद , शास्त्र के विद्वान , वादि केसरि अळगिय मणवाळ जीयर् बनके सम्प्रदाय के कई ग्रंथों कि रचना की|

जैसे पेरिय पेरुमाळ , पेरिय पिरट्टि , पेरिय तिरुवडि , पेरियाळ्वार और पेरिय कोयिल, आच्चान पिळ्ळै भी अपनी महानता के कारण पेरियवाच्चान पिळ्ळै नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पेरियवाच्चान पिळ्ळै के लिए अपने उपदेश रत्न माला में मणवाळ मामुनि २ पाशुर समर्पित करते हुए कहते हैं –

पाशुर: ४३
नम्पिळ्ळै तम्मुडैय नल्लरुळाल् एवियिडप्
पिन् पेरियवाच्चान पिळ्ळै अतनाल्
इन्बा वरुबति माऱन् मऱैप् पोरुळै चोन्नतु
इरुपतु नालायिरम्

सरल अनुवाद :अपने कारुण्य से नम्पिळ्ळै ने पेरियवाच्चान पिळ्ळै को तिरुवाय मोळि का व्याख्यान लिखने का आदेश दिया । उसे ध्यान में रखते हुए वेद का सार तिरुवाय मोळि का अत्यन्त मनोरंजनीय व्याख्यान पेरियवाच्चान पिळ्ळै ने रचना किया। यह व्याख्यान श्री रामायण(२४००० श्लोक ) की तरह २४००० पड़ि से रची गई ।

पाशुर: ४६
पेरियवाच्चान पिळ्ळै पिन्बुळ्ळवैक्कुम्
तेरिय व्याकियैगळ् चेय्वाल्
अरिय अरुळिच्चेयल् पोरुळै आरियर्गट्किप्पोतु
अरुळिच्चेयलाय्त् तऱिण्तु

सरल अनुवाद: पेरियवाच्चान पिळ्ळै की अरुळिचेयळ व्याख्यान से ही , महान आचार्य पुरुष अरुळिचेयळ का अर्थ समझकर अरुळिचेयळ के सही अर्थों का प्रचार कर रहे हैं । इनके व्याख्यान के बिना , अरुळिचेयळ के निगूढ़ अर्थो की चर्चा भी नहीं कर सकेगा ।

मामुनिगळ , अपने पाशुर ३९ में आप श्रीमान की गणना तिरुवाय्मोळि के पांञ्च व्याख्यानकर्तावों मे करते हुए कहते हैं – आप श्रीमान ने स्वयं अपने ग्रंथ का सम्रक्षण किया और तत्पश्चात इसी का प्रचार और प्रसार भी किया । क्यूँकि इसके बिना अरुळिचेयळ के निगूढ़ अर्थो को समझना असम्भव है।

वार्थामाला ग्रन्थ और पूर्वाचार्य के ग्रंथों में इनके जीवन के अनेक घटनाओं के बारे में प्रस्ताव किया गया है| आईये इनमे से कुछ अब देखेंगे:

  • किसी ने इनसे पूछा “क्या हम एम्पेरुमान की कृपा के पात्र हैं या लीला के पात्र हैं?” – पेरियवाच्चान पिळ्ळै जवाब देते हैं – “अगर हम सोचेंगे कि हम इस सँसार में फसें हैं तो एम्पेरुमान की कृपा के पात्र हैं और अगर हम सोचेंगे कि हम इस सँसार में खुश हैं तो एम्पेरुमान की लीला के पात्र हैं । “
  • जब पारतंत्रिय का मतलब किसी ने पूछा तब पेरियवाच्चान पिळ्ळै जवाब देते हैं कि एम्पेरुमान की शक्ति पे निर्भर होकर , सभी उपायान्तर(स्वयं प्रयास के साथ ) को छोड़े और भगवत कैङ्कर्य मोक्ष के लिए तड़प रहे तो उसे पारतंत्रिय कहा जाता है।
  • किसी ने पूछा – स्वामी, उपाय क्या है  ? क्या उपाय मतलब सब कुछ छोड़ देना होता है या उन्हें पकड़ लेना होता है ? तब पेरियवाच्चान पिळ्ळै जवाब देते हैं कि उपरोक्त दोनों भी उपाय नहीं है। एम्पेरुमान ही हैं जो हमे सभी विषयों से छुड़ाके उन्हें ही पकड लेने का ज्ञान दे रहे हैं । इसलिए एम्पेरुमान ही उपाय हैं ।
  • पेरियवाच्चान पिळ्ळै के एक रिश्तेदार चिंतित थी और जब चिंता का कारण पूछा गया तो वह जवाब देती है कि न जाने कितने समय से इस सँसार में वास कर रही है और कर्म बहुत इक्कट्ठा कर चुकी है ऐसे में एम्पेरुमान कैसे मोक्ष प्रसाद करेंगे । इसके लिए पेरियवाच्चान पिळ्ळै जवाब देते हैं कि हम एम्पेरुमान के वस्तु हैं और बिना किसी कर्म का लिहाल किये वह हमें ले जायेंगे ।
  • जब एक श्री वैष्णव दूसरे श्री वैष्णव के दोषों को देख रहा है , तब पेरियवाच्चान पिळ्ळै कहते हैं कि यम राज अपने सेवक से श्री वैष्णव के दोषों को ना देखकर उनसे दूर जाने का आदेश देते हैं, पिरट्टी कहती हैं “न कश्चिन् न अपराध्यति ” – दूसरों के दोषों को ना देखो । पेरुमाळ कहते हैं अगर मेरे भक्त गलती करते हैं वह अच्छे के लिए ही है , आळ्वार कहते हैं जो कोई भी एम्पेरुमान के भक्त हैं , वह कीर्तनीय हैं । पेरियवाच्चान पिळ्ळै व्यंग्य रूप से कहते हैं कि अगर किसी को श्री वैष्णव के दोष की गिनती करनी ही है तो वह अनामक व्यक्ति यही (जो श्री वैष्णव दूसरे श्री वैष्णव के दोष गण रहा हैं) हो ।
  • भागवत (भगवत भक्त) चर्चा के दौरान, किसी ने एम्पेरुमान के बारे में स्तुति की , तब पेरियवाच्चान पिळ्ळै कहते हैं विशेष विषय के बारे में चर्चा करते समय क्यों सामान्य विषय की चर्चा करे । पेरियवाच्चान पिळ्ळै कहते हैं हर श्री वैष्णव को अरुळिचेयळ इत्यादि में भाग लेना चाहिए ।

पेरियवाच्चान पिळ्ळै तनियन

श्रीमत् कृष्ण समाह्वाय नमो यामुन सूनवे ।
यत् कटाक्षैक लक्ष्याणम् सुलभः श्रीधरस् सदा ।।

मैं पेरियवाच्चान पिळ्ळै को प्रार्थन कर रहा हूँ जो यामुनर के पुत्र हैं और जिनके कटाक्ष से एम्पेरुमान श्रीमन्नारायण का अनुग्रह सुलभ से मिल सकता है।

उनके श्री कमल चरणो पे प्रणाम करके , अपने संप्रदाय को उनका योगदान हमेशा याद रखे ।

source

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

कुलशेखर आळ्वार

श्रीः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

kulasekarazhwar

तिरुनक्षत्र: माघ मास, पुनर्वसु नक्षत्र

आवतार स्थल : तिरुवंजिक्कलम

आचार्यं: श्री विष्वक्सेनजी

रचना : मुकुंद माला , पेरुमाळ तिरुमोळि

परमपद प्रस्थान प्रदेश : मन्नार कोयिल (तिरुनेल्वेलि के पास)

श्रीकुलशेखराळ्वार् की महानता यह है कि क्षत्रिय कुल (जो स्वाभाविक हितकर अहँकार के लिए जाना जाता हैं) में पैदा होने के बाद भी वे एम्पेरुमान्/ भगवान और उनके भक्तों के प्रति अत्यंत विनम्र थे। पेरुमाळ (श्री राम) के प्रति इनकी भक्ति और लगाव के कारण इन्हें “कुलशेखर पेरुमाळ” नाम से भी जाना जाता है। अपनी पेरुमाळ तिरुमोळि के प्रथम पद (ईरुळिय चुडर् मणिगळ) में पेरिय पेरुमाळ का मँगलाशासन करने के पश्चात, दूसरे पद (तेट्टरुम तिरळ तेनिनै) में श्रीवैष्णवों का कीर्तन करते है। वे श्रीवैष्णवों के प्रति अपने प्रेम के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है, जिसे हम आगे देखेंगे।

शेषत्व ही जीवात्मा का सच्चा स्वरूप है, आळ्वार ने इस विषय में अपने पेरुमाळ तिरुमोळि के अंतिम पासुर (१०.७) “तिल्लैनगर् चित्तिरकूडम् तन्नुळ् अर्चमर्ण्तान् अडिचूडुम् अर्चै अल्लाल् अर्चाग एन्ऩेन् मत्तर्चु दाने” में बताया है – मैं चित्तिरकूडम के महाराजा (गोविन्दराजन एम्पेरुमान्) के श्री कमल चरणों को पकड़े रहने के अलावा किसी अन्य विषय को शाही नहीं मानता हुँ। इन शब्दों के द्वारा, देवतान्तर/ विषयान्तर से जीवात्मा के सम्बन्ध की सोच मात्र का आळ्वार जड़ से उन्मूलन करते हैं।

वे बताते है कि जीवात्मा का सच्चा स्वरूप “अच्चिद्वद् पारतंत्र्य” है। अपने तिरुवेंकट पद (४.९) में इस तरह से समझाते है-

चेडियाय वल्विनैगळ् तीर्क्कुम् तिरुमाले
नेडियाने वेन्ङटवा ! निन् कोयिलिन् वासल्
अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडण्तियन्ङ्गुम्
पडियाय्क् किडण्तु उन् पवळ वाय्क् कान्ण्बेने

हे श्रीवेंकटेशा ! आपने मेरे प्रबल कर्मों को नष्ट किया। मैं आपके सन्निधि के द्वार के पत्थर की सीढ़ी बनकर रहना चाहता हुँ, जहाँ आपके महान भक्त और लौकिक कामना की पूर्ती हेतु देवजन और उनके आभारी लोग आपके दर्शन पाने के लिए तड़प रहे होंगे।

पेरिय वाच्चान पिळ्ळै के अनुसार जीवात्मा को निम्न प्रकार होना चाहिए-
1.  (पड़ियै कीडन्तु) अचित (असंवेद्य) – के समान रहना चाहिए अर्थात जीवात्मा को सम्पूर्ण रूप से भगवान के आश्रित रहना चाहिए। जिस प्रकार बिना किसी स्वार्थ के चन्दन और कुमकुम केवल अपने उपभोग करने वाले के आनंद के लिए ही होते है।
2.  (उन पवळवाय काँबेने ) चित (संवेद्य) – चेतन इस संदर्भ में कि हमें ज्ञात रहना चाहिए कि भगवान हमारी सेवा स्वीकार करके आनंदित होते है। यदि हम इसे स्वीकार न करके कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे, तब हम अचित वस्तु से कुछ भी भिन्न नहीं होंगे।

इस सिद्धान्त को अचितवद् पारतंत्रयं कहते है। जिसका मतलब है जीवात्मा परिपूर्ण रूप से एम्पेरुमान् के अधीन है, परंतु फिर भी उन्हें आनंदपूर्वक प्रतिक्रिया देते है – यही श्री वैष्णव सिद्धान्त का अत्युत्तम तत्व हैं ।

हमने “श्री कुळशेखराळ्वार का अर्चावतारानुभव” में देखा हैं की कैसे श्री वरवरमुनि स्वामीजी/ मामुनिगळ, अर्चावतार अनुभव कालक्षेप में कुलशेखराळवार का कीर्तन करते है ।

नायनार अपनी प्रसिद्ध रचना आचार्य ह्रदय में अनेक चूर्णिकाओं के द्वारा समझाते हैं की भक्तों का उनके जन्म के आधार पर भेद नहीं करना चाहिए और वे नम्माळ्वार/श्री शठकोप स्वामीजी इत्यादि महानुभावों की महानता की स्थापना करते हैं। उस अनुभाग में भगवत् कैंकर्य करने के लिए अनुकूल जन्म के बारे में विचार – विमर्श करते समय नायनार उदाहरण के साथ बताते हैं कैसे महान व्यक्ति निम्न वर्ग में जन्म लेने के लिए आकांक्षित थे क्यूँकि यह वर्ग कैंकर्य करने के लिए सुविधाजनक होता है। आईये देखे ८७ चूर्णिका का सार और कैसे यह कुलशेखर आल्वार से सम्बंधित हैं ।

अण्णैय ऊर पुनैय अडियुम् पोडियुम् पडप् पर्वत भवणन्ङ्गळिले एतेनुमाग जणिक्कप् पेऱुगिऱ तिर्यक् स्तावर जन्मन्ङ्गळै पेरुमक्कळुम् पेरियोरुम् परिग्रहित्तुप् प्रार्त्तिप्पर्गळ्

अनन्त, गरुड़, इत्यादि नित्यसूरी भगवान की शय्या (आदिशेष), पक्षी (गरुडाल्वार) इत्यादि जन्म लेने की अभिलाषा करते है। नम्माल्वार दर्शाते हैं की एम्पेरुमान को तिरुतुळाय (तुलसी) अत्यंत प्रिय है और इस कारण एम्पेरुमान सभी स्थानों पर तिरुतुळाय धारण करते हैं (सर, कन्धों, छाती इत्यादि पर)। पराशर, व्यास, शुक आदि जैसे महाऋषि वृन्दावन की धूल बनकर पैदा होने के इच्छुक थे ताकि कृष्ण और गोपियों के श्रीचरण कमलों का स्पर्श प्राप्त कर सके। कुलशेखर आल्वार तिरुवेंकटाचल पर्वत पर कुछ भी होने का मनोरथ करते है। आळवन्दार श्रीवैष्णव के घरों में एक कीड़े की तरह पैदा होने की इच्छुक थे। आईये कुलशेखर आल्वार की मनोरथ को विस्तार से मामुनिगळ के इस चूर्णिका की व्याख्यान के विवरण में देखते है।

पेरुमाळ तिरुमोळि ४ पधिग् में, आळ्वार तिरुवेंकटाचल पर्वत से किसी भी तरह का संबंध रखने के लिए इच्छुक थे ताकि वह उस प्रदेश से नित्य निकट रह सके ।
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आळ्वार कुछ इस प्रकार से मनोरथ करते हैं :

  1. पर्वत के तालाब में पक्षी बनने का
  2. तालाब में मछली बनना, क्यूँकि पक्षी तो उड़ सकता है
  3. एम्पेरुमान की सेवा में सोने की पात्र पकड़ने वाले एक सेवक होने के लिए मनोरथ करते है क्यूँकि मछली तैर कर तालाब से दूर जा सकती है।
  4. एक वृक्ष का फूल क्यूँकि सोने की पात्र पकड़ने से मन में अहँकार उत्पन्न हो सकता हैं और अतः उन्हें दूर कर देगा।
  5. एक निरुपयोगी वृक्ष – क्यूँकि तोड़े और उपयोग किये फूलों को फेक दिया जाता है।
  6. तिरुवेंकटाचल पर्वत पर एक नदी – क्यूँकि निरुपयोगी पेड़ को एक दिन उखाड़ सकते है।
  7. मंदिर सन्निधि के मार्ग की सीढ़ी होने के लिए मनोरथ करते है क्यूँकि नदी कभी भी सूख सकती है।
  8. सन्निधि के सामने की चौखट होने के लिए क्यूँकि सीढ़ियों का रास्ता बदला जा सकता है (इसी कारण चौखट को कुलशेखर प्पडि कहते है)।

जो भी तिरुवेंकटाचल पर्वत पर निरन्तर रह सके – पेरियवाच्चान पिळ्ळै अपने व्याख्यान में विवरण देते हैं की आळ्वार हमेशा के लिए पर्वत से जुड़ जाने के लिए ख़ुद तिरुवेंकटमुडैयन बनने के लिए भी पीछे नहीं जायेंगे और वे भट्टर के कथन के विषय में भी बताते है यहाँ भट्टर कहते है ” मैं यहाँ रह रहा हुँ, इस विषय की स्मृति की मुझे आवश्यकता नहीं है, न ही तिरूवेंकटमुडैयान को यह जानने की आवश्यकता है और किसी को भी मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं यहाँ हूँ। सिर्फ यहाँ किसी भी रूप में नित्य वास करने मात्र से ही मैं ख़ुश हुँ “।

कुलशेखराळ्वार की महानता यह हैं की वह बिना कुछ व्यक्तिगत लाभ के भगवत् / भागवत् कैङ्कर्य करने को तरस रहे थे। यह ध्यान में रखते हुए, आईये उनका चरित्र देखे:-

गरुड़ वाहन पण्डित द्वारा रचित दिव्य सूरी चरित्र के अनुसार, कोळ्ळिनगर (तिरुवंजिक्कळम) के राज्य में, क्षत्रिय वंश में, श्री कौस्तुभ अंश (हालांकि आळ्वार सँसार से भगवान द्वारा चुने गए थे और अनुग्रह पात्र थे) से इनका जन्म हुआ। इन्हें कोळ्ळि कावलन्, कोळियर कोन, कूडल नायकन इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।

जैसे तनियन में विवरण दिया गया हैं “मात्तलरै, वीरन्ङ्केडुत्त चेन्ङ्कोल् कोल्लि कावलन् विल्लवर्कोन्, चेरन् कुलशेकरन् मुडिवेण्तर् शिकामणी” मतलब अपने शत्रु को नाश करने वाले और चेरा राज्य के राजा, अनेक रथ, घोडे और हाथियों की युद्ध सेना के महा बल के साथ अपने शत्रुओं को भगा देने वाले, वे महान शक्तिशाली थे। शास्त्रानुसार धर्म पालन करते थे और यह सुनिश्चित करते थे की बलवान कमज़ोर को कष्ट नहीं दे और श्री राम की तरह ही, उदारचित्त और विनम्रता पूर्वक राज्य परिपालन करते थे।

महान राजा होने के कारण , वे स्वयं को स्वतन्त्र और राज्य का नियंत्रक मानते थे। परमपद और सँसार के नियंत्रक भगवान ने उन्हें अपनी निर्हेतुक दया से शुद्ध दिव्य ज्ञान प्रदान किया, उनके रजो /तमो गुणों को हटा करके उन्हें परिपूर्ण सत्व गुण में स्थित करके, अपना दिव्य स्वरूप, रूप, गुण, विभूति ( अपना ऐश्वर्य / नियंतृत्व) और अपनी लीलाओं का विवरण दिया। यह विषय समझने के बाद, वे संसारी, जो भगवत् विषय में अरुचि और अपने शरीर के भोगों में निमग्न रहनेवालों के बीच रहने में असहज महसूस करने लगे। जैसे नम्माळ्वार घोषित करते है कि अधिक भौतिक सम्पत्ति एक जलते हुई आग की तरह हैं, जो अपने मालिक को भौतिक विषयों में लिप्त करके अंत में उसे जला देती है। यद्यपि कुलशेखर आळ्वार को अपने राज्यशासन में कोई रूचि नहीं थी और वे स्वयं को विषयान्तर से दूर रखते थे जैसे श्री विभीषणाळ्वान ने अपना सर्वस्व छोड़ के श्री राम की शरण ली थी ।

श्री रङ्गम् , श्री रङ्गनाथजी और श्री रङ्गनायकीजी के सेवक जो भौतिक विषयों से असंलग्न और अपना सारा समय श्री रङ्गनाथ की कीर्तन में बिताते हैं उनके प्रति अत्यंत प्रेम बड़ा चुके थे । ऐसे श्री वैष्णव जो साधु (वैष्णव अग्रेस: – श्री वैष्णव के नेता) कहलाते हैं और जिन्हें “अण्णियरन्ङ्गन् तिरुमुत्ततु अडियार्” कहकर पहचाना जाता हैं मतलब जो भक्त अपना सारा जीवन श्री रङ्गम् मन्दिर में बिताते हैं उनके बीचों बीच रहने की चेष्ठा दिखा रहे थे । श्री रङ्ग यात्र और श्री रङ्ग जाने की आशा ही एक मनुष्य को परमपद प्राप्त करा सकता हैं और श्री रङ्ग में नित्य निवास करे तब उसके बारे में क्या कहे ऐसे प्रति दिन श्री रङ्ग जाने की सोच में बिता रहे थे ।

जहाँ की स्वामि पुष्करणी को गँगा, यमुना से भी पवित्र मानकर कीर्तन किया जाता हैं ऐसे तिरुवेंकटम के प्रति भी आळ्वार बहुत लगाव बड़ा लेते हैं । जैसे आण्डाळ् कहते हैं “वेन्ङ्कटत्तैप् पतियाग वाळ्वीर्गाळ्” मतलब हमें तिरुवेंकटम में जीवन बिताना चाहिए और नित्य निवास बनाना चाहिए जहाँ महात्मा और ऋषि नित्य वास कर रहे हैं , इन्हें भी ऐसी ही मनोरथ थी । हम ने पहले देखा की कैसे आळ्वार एक पक्षी , एक पौधा और इस दिव्य देश में एक पत्थर बनने के लिए भी तैयार थे । इसके अतिरिक्त आळ्वार कई दिव्य देशों में रहके , उधर के अर्चावतार के एम्पेरुमान और उनके भक्तों की सेवा करने के लिए इछुक थे ।

कई पुराण और इतिहास को विश्लेषण करके , एक महान संस्कृत श्लोक ग्रन्थ मुकुन्द माला नाम से अनुग्रह करते हैं । श्री मन्नारायण की वैभवता अगले श्लोक में विवरण करते हैं ।

वेद वेद्ये परे पुम्सि जाते दशरतात्मजे
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्शात् रामायणत्मना

श्री मन्नारायण जिन्हें वेद के द्वारा समझ सकते हैं श्री राम के रूप में रूढि हुए । वेद स्वयं वाल्मीकिजी से श्री रामायण के रूप में प्रकट हुआ हैं ।

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श्री रामायण सुनना और चर्चा करना अपने दैनिक दिनचर्य का भाग बना लिया था । श्री रामायण की कथा में अपने आप को भुलाकर निमग्न हो जाते थे । एक बार उपन्यास में कर/दूषण के नेतृत्व में १४००० राक्षस श्री राम जिन्होंने गुफा में इळया पेरुमाळ(लक्ष्मण) के भरोसे सीता देवी को छोड़ दिया उनके प्रति युद्ध करने की तैयारी करने का दृश्य विवरण दिया जा रहा था । यह दृश्य में श्री राम अकेले १४००० रक्षोसों का सामना करना था और यह देखकर ऋषि लोग डर जाते है । आळ्वार भावुक हो जाते हैं और अपनी सेना को तैयारकर श्री राम की सहायता करने के लिए युद्ध भूमि पहुँचने का आदेश करते हैं । यह देखकर उनके कुछ मंत्री , थोड़े लोगों का इंतज़ाम करते हैं जो सामने की दिशा में आकर बताते हैं की श्री राम ने युद्ध में विजय प्राप्त किया हैं और सीता देवी उनकी देखबाल कर रही हैं और उनके आनेकी जरूरत नहीं हैं । आळ्वार संतुष्ट होकर अपने राज्य को लौट जाते हैं ।

इनके मंत्री गण सोचने लगे की श्री वैष्णव से इनके सम्बन्धों के कारण आळ्वार का बर्ताव बदल गया हैं । निश्चित करते हैं की श्री वैष्णव दूर रहे और इसके लिए एक योजना बनाते हैं । वह एक वज्र माला को आळ्वार के तिरुवराधन के (पूजा) कमरे से चुरा कर घोषित करते हैं की उनके करीबी श्री वैष्णव ने उसे चुराया होगा । यह सुनने के बाद आळ्वार एक ज़हरीले नाग से भरा घड़े को लाने के लिए आदेश करते हैं और आने के बाद , अपना हाथ घड़े में रखकर ऐलान करते हैं “श्री वैष्णव ऐसे कार्यों में जुटते नहीं हैं ” – ज़हरीला सांप उनकी ईमानदारी के लिए उन्हें काँटता नहीं और यह देखकर मंत्रियों को शर्म आजाति हैं और माला को वापस देकर आळ्वार और श्री वैष्णव से क्षमा प्रार्थना करते हैं ।

सौनक सँहिता में बताया जाता हैं की “एक प्रपन्न के लिए भगवान का कीर्तन नहीं करने वालों के बीच में रहने से बेहतर आग के गोले में रहना अच्छा लगता हैं ” और ठीक इसी तरह आळ्वार संसारि के बीचों बीच रहने में महसूस कर रहे थे । अपने सुपुत्र को राजा बनाकर राज्य के सभी जिम्मेदारियाँ सौंप देते हैं और ऐलान करते हैं “आनात शेल्वत्तु अरम्बैयर्गळ् तर्चूळ वानाळुम् शेल्वमुम् मन्ऩरचुम् यान् वेण्डेन्” मतलब इन्हें कामकरने वाले , मनोरंजन करने वालों , भोग भोगने वालों के साथ राज्य करने में दिलचस्पी नहीं हैं । अपने श्री वैष्णव साथियों के साथ श्री रङ्गम निकल जाते हैं और श्री रङ्गनाथ जो सोने के थाली (आदिशेष पे सोते हुए ) पे एक वज्र की तरह हैं और हर समय सब के कल्याण के बारे में सोचते हैं उनका मँगलशासन करते हैं । हर पल भगवद्-भागवत्नाम संकीर्तन करने लगे । उनके मनोभावनावों के प्रवाह का साक्षात निरूपण उनका पेरुमाळ तिरुमोळि है । इसकी रचना करके सभी को अपना अनुग्रह प्रसाद किया । थोड़े समय के बाद , सँसार छोड़ के , परमपदनाथ की सेवा करने हेतु परम पद को प्रस्थान हुए ।

तनियन्

घुष्यते यस्य नगरे रंङ्गयात्रा दिने दिने |
तमहम् सिरसा वन्दे राजानम् कुलशेकरम् ||

source

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

 

मधुरकवि आळ्वार्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

madhurakavi

मधुरकवि आळ्वार्

तिरुनक्षत्र – चैत्र मास , चित्रा नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुक्कोळूर्

आचार्य – नम्माळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार् तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – कण्णिनुण् शिरूताम्बु

नम्पिळ्ळै (श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी) ने व्याख्यान अवतरिका में मधुरकवि आळ्वार की वैभवता के बारे में अति सुन्दरता से वर्णन किया है। आईये कुछ झलक यहाँ देखेते है।

ऋषियों का ध्यान सामान्य शास्त्र पर होता है जो ऐश्वर्य, कैवल्य और भगवत कैंकर्य को पुरुषार्थ (आत्म का लक्ष्य) मानते है। आळ्वारों का ध्यान उत्तम पुरुषार्थ (परम लक्ष्य) पर होता है, अर्थात श्रीमन्नारायण भगवान की प्रेम पूर्ण सेवा कैंकर्य। मधुरकवि आळ्वार का ध्यान अति उत्तम (परमोत्तम) पुरुषार्थ- भागवत कैंकर्य पर है। भागवत कैंकर्य – भगवत भक्तों की सेवा करना है, जो निश्चित रूप से एम्पेरुमान् को अत्यंत प्रिय हैं ।

यह विषय हम श्रीरामायण में भी देख सकते है। श्रीरामायण वेद उपबृह्मणम (वेद शास्त्र के निगूढ़ अर्थ को समझाता है) और इसी कारण वह वेद के मुख्य विषयों का अति सुलभता से विवरण करता है।

  • श्रीराम भगवान स्वयं धर्म के साक्षात स्वरूप है – इसलिए उन्होंने “पितृ वचन पालन” (बुज़ुर्ग लोगों के आदेश मानना इत्यादि) जैसे सामान्य धर्म की स्थापाना की।
  • इळया पेरुमाळ (श्रीलक्ष्मणजी) ने विशेष धर्म – शेषत्वम् की स्थापना की जिसके अनुसार शेष (दास) को हमेशा अपने शेषि (मालिक) का अनुगमन करना चाहिए और उनकी सेवा करना चाहिए। उन्होंने श्रीराम से कहा की “अहम् सर्वं करिष्यामि” (आपके लिए मैं सब कुछ करूँगा) और उस विषय का आचरण भी किया है।
  • श्री भरताल्वान् (भरत) ने पारतन्त्रियम् की स्थापना की है, जो जीवात्मा का स्वाभाविक स्वरूप है। बिना कुछ स्वपेक्षा किये अपने मालिक की इच्छा अनुसार आज्ञा का पालन करना पारतन्त्रियम् कहा जाता है। पेरुमाळ की इच्छा थी की भरताल्वान् अयोध्या में रहे और राज्य का परिपालन करे, भरताल्वान् उनकी आज्ञा पालन करते है और उसे परम आदेश मानकर अयोध्या के बाहर १४ साल श्री राम के समान वस्त्र धारणकर और अनुष्ठान से बिताते है।
  • श्री शत्रुघ्नाळ्वान (शत्रुघ्न) अपने स्वरूप का प्रतीक भागवत् शेषत्वम् की स्थापना करते हैं। अन्य विषयों के प्रति मोह त्याग केवल भरताल्वान् का अनुगमन करते हुए उनकी सेवा में जुट गए।

श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी यहाँ श्री भाष्यकार् (रामानुजर्) द्वारा बताये गए कथन का उल्लेख करते है कि श्रीशत्रुघ्नाळ्वान, भरताल्वान के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण के कारण, अपने अन्य भाईयों – इळया पेरुमाळ और भरताल्वान की अपेक्षा, श्री राम के अत्यंत प्रिय थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्री शत्रुघ्न आळ्वान् के समान थे, जो भागवत् निष्ठा में पूरी तरह से डूबे हुए थे। मधुरकवि आळ्वार्, श्रीशठकोप स्वामीजी के श्री चरणों की शरण मे थे और पूर्णत: उनकी सेवा में थे। उनके लिए नम्माळ्वार् ही लक्ष्य (उपेय) है और वे ही लक्ष्य साधन के प्रक्रिया (उपाय) भी है। मधुरकवि आळ्वार ने अपने दिव्य प्रबन्ध में इसी विषय को सूचित किया है।

पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी अपनी प्रसिद्ध रचना, श्रीवचन भूषण के अन्तिम प्रकरण में आचार्य अभिमान निष्ठा (पूरी तरह से आचार्य पर निर्भर/आश्रित रहना) की महत्ता को मधुरकवि आळ्वार के जीवन और नम्माळ्वार् के प्रति उनके स्नेह और प्रेम का उदाहरण देते हुए समझाते है। 8वे प्रकरण में, भगवान की निर्हेतुक कृपा (अकारण ही कृपा करते है) का विवरण किया गया है। इसी के साथ, जीवात्मा को कर्मानुसार प्रतिफल देना भी उन्हीं पर निर्भर है। इस कारण हमें भगवान द्वारा हमारी स्वीकृति पर शंका हो सकती है। 9वे (अन्तिम) प्रकरण में पिळ्ळै लोकाचार्य, चरम उपाय (अन्तिम उपाय -आचार्यं पर निर्भर/आश्रित रहना) की महानता को स्थापित करते है और यह बताते है कि किस प्रकार से यह उपाय जीवात्मा को सुगमता से मुक्त कर देता है। आईये इसके बारे में देखे।

407 सूत्र में वे बताते है कि हमें यह भ्रम हो सकता है कि क्यूंकि भगवान स्वतन्त्र है, और इस हेतु वे हमें अपने कारुण्य (कृपा) द्वारा स्वीकार भी कर सकते है और शास्त्रों के विषयानुसार (जिसमें कर्मानुसार फल प्राप्ति होती है) अस्वीकार भी कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में बताते हैं की इस सूत्र की पूर्ती के लिए निम्न विषय का योग आवश्यक है- “जब हम आचार्य, जो परतन्त्र है (भगवान पर पूर्णरूप से निर्भर है) के श्रीचरणों में आश्रित होते हैं, तब कोई शंका नहीं रहती, क्यूंकि वे यह सुनिश्चित करते है कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य (परमपद) प्राप्त करें, क्यूँकि आचार्य कारुण्य रूप है और केवल जीवात्मा की उन्नति के बारे में ही देखते हैं । “

408 सूत्र में बताते है की यह विषय, अन्य 10 आळ्वारों (मधुरकवि आलवार और आण्डाल के अतिरिक्त), जो पुर्णतः भगवान के आश्रित है, के पाशुरों के माध्यम से स्थापित नहीं हो सकता है। एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से यह आळ्वार दोष रहित ज्ञान से प्रासादित थे। जब वे भगवत अनुभव में डुबे हुए होते है, तब वे भागवतों का गुणगान करते है। परंतु एम्पेरुमान् के वियोग में, असहनीय परिस्तिथि के कारण व्याकुल होकर, वे भागवतों से उदास हो जाते है (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यान में कई जगह इस विषय का उदहारण देते हैं)। अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी संक्षिप्त में कहते है कि अन्य 10 आळ्वारों के पाशुरों के द्वारा आचार्य वैभव के महत्त्व का निरूपण करना संभव नहीं है परंतु मधुरकवि आळ्वार के पशुरों के द्वारा हम आचार्य वैभव निर्धारित कर सकते हैं ।

409 सूत्र, यह प्रतिपादित करता है कि मधुरकवि आळ्वार अन्य आळ्वारों से महत्तर है क्यूँकि अन्य आळ्वार कुछ समय भागवतों की वैभवता का गुणगान करते है और कुछ समय उनकी उपेक्षा करते हैं लेकिन मधुरकवि आळ्वार का ध्यान केवल आचार्य (नम्माळ्वार्) वैभव पर केंद्रित था। केवल इन्हीं के शब्दों से हम आचार्य वैभव को स्थापित कर सकते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, मधुरकवि आळ्वार की वैभवता को अपने उपदेश रत्न माला के 25वे और 26वे पाशुर में समझाते है।

25वे पाशुर् में वे कहते है कि मधुरकवि आळ्वार का अति पावन अवतार दिवस – चैत्र मास, चित्रा नक्षत्र, अन्य आळ्वारों के अपेक्षा, प्रपन्न जनों के स्वरूप के लिए सबसे उपयुक्त है।

26वे पाशुर् में वे आळ्वार और उनके प्रबन्ध का अत्यन्त वैभव युक्त वर्णन करते है-

वायत्त तिरुमॅतिऱत्तिं मत्तिममाम् पदम् पोल् ।
सीर्त्त मधुरकवि शेय कलैयै ॥
आर्त्त पुघळ आरियरगळ ताङ्गळ अरुळिचेयल नडुवे ।
सेरवित्तार् तार्परियम् तेर्न्दु ॥

पिळ्ळै लोकम् जीयर इस पाशुर् का सुन्दर विवरण देते है। कण्णिनुण् शिरूताम्बु के लिए तिरुमन्त्र के नमः पद का उदहारण देते है। तिरुमन्त्र की प्रसिद्धि यह है कि वह वाचक को संसारिक बंधनों से मुक्त कर देता है। तिरुमन्त्र में नमः पद एक मुख्य पद है – जो स्पष्ट रूप से यह स्थापित करता है कि स्वयं का संरक्षण करने में हमारी कोई भूमिका नहीं है और अपने संरक्षण के लिए हमें अपने नाथ भगवान पर पूरी तरह से निर्भर होना चाहिए। इसी सिद्धांत का वर्णन मधुरकवि आळ्वार (जो स्वयं अपने आचार्य निष्ठा के लिए महान है) ने अपने दिव्य प्रबंध में किया है। वे बताते है कि हमें स्वयं के संरक्षण के लिए संपूर्णतः आचार्य पर निर्भर रहना चाहिए। शास्त्र के सार को वास्तविकता में दर्शाने के कारण ही, हमारे पूर्वाचार्यों ने इस प्रबंध को 4000 पाशुरों के दिव्य प्रबंध में जोड़ा है। जिस प्रकार मधुरकवि आळ्वार का तिरुनक्षत्र – चित्रा नक्षत्र , 27 नक्षत्रों के मध्य में हैं, उसी प्रकार उनके प्रबंध को भी दिव्य प्रबंध रत्न माला का केंद्र माना जाता है।

इस प्रकार हम देख सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी, पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इस समान विषय का वर्णन पृथक दृष्टिकोणों से किया है।

इस विषय के साथ, आईये उनके चरित्र को देखे-

मधुरकवि आळ्वार ने चैत्र मास -चित्रा नक्षत्र में तिरुकोळूर् में अवतार लिया। जैसे सूरज के पहले सूरज की किरणे/ रौशनी आती है, उसी तरह श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य अवतार के पूर्व इन्होंने अवतार लिया है। इनकी महानता देखते हुए, गरुड़ वाहन पण्डित अपने दिव्य सूरी चरित्र में इन्हे “कुमुद गणेश” या “गरुडाळ्वार्” के अंश मानते हुए गौरवान्वित करते है (वास्तव में आळ्वारों को एम्पेरुमान् ने सँसार से चुनकर उन्हें दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया)।

साम वेद के पण्डित और पूर्व शिखा ब्राह्मण के परिवार में इनका जन्म हुआ। उचित समय में उनके जात कर्म, नाम कर्म, अन्न-प्रासन, चौळा, उपनयनम् इत्यादि कार्य पूर्ति हुए और उन्होंने वेद, वेदान्तम्, पुराण, इतिहास इत्यादि का अध्ययन भी किया। भगवान के अतिरिक्त अन्य विषयों से वे विरक्त थे और उत्तर भारत के कुछ दिव्य क्षेत्र जैसे अयोध्या, मधुरा इत्यादि के यात्रा पर निकले।

nammazhwar-madhurakavi-nathamuni

मधुरकवि आळ्वार,नम्माळ्वार,नाथमुनि-श्री कांचीपुरम

मधुरकवि आळ्वार के पश्चाद अवतार लिए नम्माळ्वार को किसी विषय में रूचि नहीं थी यहाँ तक की माता के दूध में भी नहीं और वे बिना कुछ कहे संसार में रह रहे थे। इनके माता -पिता कारी और उदयनंगै, उनके जन्म के 12 दिन बाद, शिशु के इस प्रकार के लक्ष्ण से उद्विग्न थे, और उन्हें पोलिन्द निण्र पिरान एम्पेरुमान् के समक्ष प्रस्तुत करते है। यह एम्पेरुमान् ताम्रपर्णी नदी के दक्षिण में स्थित एक सुन्दर मंदिर में, शंख और चक्र आयुधों से अलंकृत, पद्म के समान सुन्दर नेत्रों से, अभय हस्त प्रदान करते हुए (एक हाथ की मुद्रा जिससे भगवान अभय प्रदान कर रहे है कि वे अवश्य हमारा रक्षण करेंगे) और अपनी दिव्य महिषी – श्रीदेवि , भूदेवि ,नीळा देवि के साथ विराजमान है। भगवान के समक्ष, उनके माता-पिता उनका “मारण” (अर्थात जो सबसे अलग है) कहकर नामकरण करते है और उन्हें दिव्य इमली के वृक्ष के निचे रख, उन्हें दिव्य व्यक्तित्व मानकर आराधन करते है। परमपदनाथ भगवान तब श्रीविष्वक्सेनजी से उन्हें पञ्चसंस्कार करके उन्हें द्राविड़ वेद (नायनार अपनी रचना आचार्य ह्रदय में बताते है कि द्राविड़ वेद सनातन है) और सभी रहस्य मंत्र और मंत्रार्थ की शिक्षा प्रदान का आदेश देते हैं और श्री विष्वक्सेनजी भगवान के निर्देश का पालन करते है।

तिरुप्पुळि आळ्वार् के निचे (दिव्य इमली के पेड़ ) नम्माळ्वार् 16 साल बिताते है। इनकी महानता को इनके माता – पिता समझ चुके थे लेकिन किसी से भी बात नहीं कर रहें थे क्यूँकि आळ्वार् की उत्कर्षत सभी जन नहीं पा सक रहें थे  और वे तिरुक्कुरुंगुडि नम्बि एम्पेरुमान् को ही निरंतर प्रार्थना कर रहे थे । इस विषय के बारे में मधुरकवि आळ्वार् भी सुन चुके थे और एक दिन रात में नदि के तट जा पहुँचते हैं और दक्षिण की ओर से एक उज्ज्वल प्रकाश दिखायी दिया। वे सोच बैठते हैं की वह प्रकाश किसी गाँव से या जँगल के आग से उत्पन्न हुई होगी । लेकिन , लगातार उसी प्रकाश २-३ दिन दिखने लगी । वे ठान लेते हैं की उसके बारे में जानेंगे और सुबह सोके उस दिन रात को उस प्रकाश का पीछा करते हैं । मार्ग में कई दिव्य देशों की यात्रा करते हुए श्री रंगम् पहुँचते हैं । दक्षिण दिशा से वह प्रकाश उन्हें और भी दिखाई दे रहा था और अपनी ख़ोज जारी रखते हुए अंत में तिरुक्कुरुगूर् (आळ्वार् तिरुनगरी )पहुँचते हैं । वहाँ पहुँचने के बाद , रौशनी नहीं दिख रही थी और वे निश्चित करते हैं की प्रकाश उधर से ही उत्पन्न हो रहा हैं । वे मन्दिर प्रवेश करते हैं और तिरुप्पुळिआळ्वार् के निचे निश्चल और परिपूर्ण ज्ञान युक्त , सुन्दर से आँखों वाले , केवल १६ वर्ष के बालक , पूर्णिमा के चन्द्रम के तरह प्रकाशित , पद्मासन में आसीन , एम्पेरुमान् के बारे में अनुदेश देते हुए उपदेश मुद्रा में विराजमान और प्रपन्न जन के आचार्य नम्माळ्वार् को पाते हैं । भगवत अनुभव में डुबे हुए उन्हें देखकर , वे एक छोटा सा पत्थर उनकी ओर फेंकते हैं । आळ्वार् अति सुन्दर तरह से जाग जाते हैं और मधुरकवि आळ्वार् को देखते हैं । उन्होंने उनकी बोलने की शक्ति को परखना चाहा और उनसे ” सत्ततिन् वैतिल् सिरियदु पिरन्दाल् एत्तैतिनृ एन्गे किडक्कुम्” करके प्रश्न पुछा मतलब जब एक चेतन आत्म ( संवेदन शील – जीवात्म ) अचेतन वस्तु (असंवेद्य ) में प्रवेश करता हैं , वह जीवात्म कहाँ रहता हैं और किसका आनंद लेता हैं । आळ्वार् उत्तर देते हैं “अत्तैतिनृ अंगे किडक्कुम् ” जिसका अर्थ हैं भौतिक और संसारिक सुख – दुख को अनुभव करते हुए उस असंवेद्य  वस्तु में नित्य स्थिरता प्राप्त करता हैं । यह सुनने के बाद मधुरकवि आळ्वार् जान लेते हैं की वे सर्वज्ञ हैं और इनकी सुश्रुत करके उन्नति पानी चाहिए । यह सोचकर वे नम्माळ्वार् के श्री पाद पद्मों केआश्रित हो जाते हैं । उस समय से वे आळ्वार् के साथ निरंतर उनकी सेवा करते हुए और उनकी कीर्ति गान करते बिता देते हैं ।

तत्पश्चात् , श्री वैकुण्ठ नाथ (परमपदनाथ ) को जो सभी बीजों के बीज हैं , जो सबके मालिक हैं , जो सब के नियंत्रक हैं , जो चेतन और अचेतन वस्तुओं में परमात्म बनकर स्थित हैं, जिनका शरीर(तिरुमेनि) काला / नील रंग का हैं ,आळ्वार् से मिलना की अभिलाष हुई । पेरिया तिरुवडि (गरुडाळ्वार् ) तुरन्त एम्पेरुमान् के सामने हाज़र होते हैं और एम्पेरुमान् श्री महा लक्ष्मी के साथ उन पे आसीन हो जाते हैं और तिरुक्कुरुगूर् पहुँच के आळ्वार् को अपना दिव्य दर्शन प्रदान करके , उन्हें दिव्य ज्ञान से अनुग्रह करते हैं । एम्पेरुमान् के अनुग्रह प्राप्त होने के कारण नम्माळ्वार् भगवत अनुभव में डूब जाते हैं और उस अनुभव आनंद की सीमायें पार किये तिरुविरुत्तम् , तिरुवासीरियम्, पेरिय तिरुवंदादि और तिरुवाय्मोळि (चार वेदों का सार ) के दिव्य पाशुरों के रूप में एम्पेरुमान् का दिव्य स्वरूप , दिव्य आकृति और दिव्य गुणों का कीर्तन करते हैं । नम्माळ्वार् इसे मधुरकवि आळ्वार् और उनके आश्रित लोगों को शिक्षा देते हैं । नम्माळ्वार् को आशीर्वाद करके उनसे मंगलाशासन पाके अपने आप का पोषण करने के लिए सभी दिव्य देश के एम्पेरुमान् तिरुप्पुळिआळ्वार् के सामने आते हैं । नम्माळ्वार् हम सभी को उनकी तरह बनने और उन्हीं के जैसे एम्पेरुमान् के प्रति प्रेम होने का आशीर्वाद करते हैं । परमपद से नित्य सूरी और क्षीर समुद्र से श्वेत दीप वासी नम्माळ्वार् की कीर्तन करने के लिए आते हैं और उन्हें देखे आळ्वार् उनका मँगलाशासन करते हैं । नित्य सूरी और श्वेत दीप वासी उनके लिए आकर उनकी स्तुति करने से नम्माळ्वार् प्रसन्न हो जाते हैं और ऐलान करते हैं की ब्रह्माण्ड में इनसे बड़कर कोई नहीं हैं (एम्पेरुमान् के दिव्य अनुग्रह से उत्पन्न हुआ सात्विक अहँकार ), वे सीमा रहित कीर्ति से जीवन बितायेंगे और हमेश कण्णन् एम्पेरुमान् ( कृष्ण) के प्रति ध्यान करते हुए खुद को बनाये रखेंगे ।वे अर्थ-पंचक का ज्ञान (पाँच तत्वों का ज्ञान – परमात्म स्वरुप , जीवात्म स्वरुप, उपाय स्वरुप, उपेय स्वरुप और विरोधि स्वरुप ) और एम्पेरुमान् के भक्तों का दिव्य मधु तिरुवाय्मोळि द्वारा द्वय महा मंत्र का अर्थ पूरी तरह से प्रकाशित करते हैं । ३२ वर्ष की उम्र में इस सँसार को छोड़ के एम्पेरुमान् की दिव्य मनोरथ से परमपद पहुँचते हैं ।

नम्माळ्वार्(जो प्रपन्न जन कूटस्थर् – प्रपन्न कुल नायक मूलपुरुष ) के प्रधान शिष्य मधुरकवि आळ्वार् अपने आचार्य की स्तुति करते हुए कण्णिनुण् शिरुताम्बु की रचना करके पञ्चोपाय निष्ठा का पालन(पाँचवा उपाय – आचार्य निष्ट और कर्म , ज्ञान , भक्ति और प्रपत्ति बाकी चार उपाय हैं ) करने वाले मुमुक्षुओं को प्रदान करते हैं । आळ्वार् तिरुनगरि में नम्माळ्वार् की अर्चा विग्रह की स्थापना करके , नित्य(प्रति दिन ) , पक्ष , मास , अयन (अर्धवार्षिक ), सम्वत्सर् ( सालाना ) भव्य उत्सव आयोजन करके खुद भी भाग लेते हैं । वे नम्माळ्वार् को “वेदम् तमिळ सेयद पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवाय्मोळि पेरुमाळ वन्दार् , तिरुनगरि पेरुमाळ वन्दार् ,तिरुवळुतिवळणाडर् वन्दार् ,तिरुक्कुरुगूर नगर नम्बि वन्दार्, कारिमारर् वन्दार्, शटगोपर् वन्दार् , पराकुंशर वन्दार् ” कहके स्तुति करते हैं जिसका अर्थ हैं वेद सार देने वाले पेरुमाळ पधारे हैं , तिरुवाय्मोळि के महान कवि आये हैं , तिरुनगरि के नायक आये हैं , आळ्वार् तिरुनगरि के आस-पास (तिरुवळुतिवळणाडर्) रहने वाले आये हैं ,अतिमानुष गुणों से पूर्ण तिरुक्कुरुगूर नगर में निवास करने वाले आये हैं , कारी के पुत्र आये हैं , शटगोपर् आये हैं और सभी प्रत्यर्थ को अंकुश लगाने वाले पधारे हैं ।उस समय मधुरै (दक्षिण) तमिळ संघ से तमिळ पण्डित आते हैं और इनकी यह प्रशंसनीय शब्दों को टोक देते हैं और कहते हैं कि जब तक नम्माळ्वार् की महानता साबित न हो जाए और जब तब संघ पीठं(साहित्य की परख़ करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक दिव्य फलक पीठं ) उनकी साहित्य को अंगीकार नहीं कर लेता , वे नहीं मानेंगे की नम्माळ्वार् ने अपने साहित्य में वेद के सार को दिया हैं । मधुरकवि आळ्वार् कहते हैं की नम्माळ्वार् कहीं भी नहीं आयेंगे और एक खजूर भोज के पत्ते पर नम्माळ्वार् के तिरुवाय्मोळि (१०. ५. १ ) पाशुर का प्रथम दो शब्द “कण्णन् कळळिनै” लिखकर तमिळ संघ से आये उन कवियों को सौंप देते हैं । कहते हैं की अगर संघ पीठं आळ्वार् के इन दो शब्दों को मंज़ूर कर लेता हैं तो नम्माळ्वार् की महानत साबित हो जाएगी । मधुरकवि आळ्वार् के वचन को कवि जन मान लेते हैं और मधुरै लौटकर तमिळ संघ के उनके नेता को घटित संघटन के बारे में बताते हैं । नेता मानकर संघ पीठं पर उन दिनों के ३०० अन्य महान कवि के कविताएँ के साथ खजूर भोज के पत्ते पर आळ्वार् से लिखे गए शब्दों को रखते हैं । उस जादुई फलक नम्माळ्वार् की महानता को स्पष्ट करने के लिए केवल आळ्वार् के शब्दों को स्वीकार करके बाकी रचनों को ठुकरा देती हैं । संग के नेता तुरन्त नम्माळ्वार् के प्रति एक कविता लिखते हैं जो इस प्रकार हैं :

इयाडुवतो गरूडर्केतिरे
इरविक्केतिर् मिंमिनियाडुवतो
नायोडुवतो उरुमिप्पलिमुन्
नरिकेशरीमुन् नडैयाडुवतो
पेयडुवतो एळिळ्उर्वचिमुन्
पेरुमानडि शेर वकुलाभरणन् ओरायिरमामरैयिन् तमिळिळ् ओरु षोल पोरुमो उलक़िल् कवियै

संसारिक जीवन बिताने वाले कवियों की अनगिनित कविताओं की नम्माळ्वार् (जो श्री मन्नारायण के शरणागत और वेद सार अपने १०००+ पाशुरों से दिये हैं ) के एक शब्द से भी तुलना नहीं कर सकते

  • जैसे गरुड़ की उड़ान कौशल की मक्खी के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे सूरज की चमक की जुगनू के साथ तुलना नहीं कर सकते
  • जैसे बाघ के गर्जन की कुत्ते की भौंकने से तुलना नहीं कर सकते
  • सिंह के राजसी चाल की लोमड़ी की साधारण चाल से तुलना नहीं कर सकते
  • ऊर्वशि (देव लोक में नर्तकि) के सुन्दर नृत्य की शैतान के नाच से तुलना नहीं कर सकते

यह देखकर, सभी कवि नम्माळ्वार् के गुण गाना शुरु करके उनसे क्षमा प्रार्थन करते है। इस तरह मधुर कवि आळ्वार् ने “गुरुम् प्रक़रशयेत् धीमान् ” ( आचार्य की स्तुति निरंतर करनी चाहिए) के अनुसार अपना समय आचार्य की स्तुति करने में बिताया और उनकी प्रभुता का विस्तार किया। सभी का अपने उपदेशों से सुधार किया। कुछ ही समय के बाद सँसार छोड़कर नम्माळ्वार् को नित्य कैंकर्य करने के लिए आचार्य तिरुवडि (श्रीपाद पद्म) पहुँच जाते हैं ।

तानियन :
अविदित विषयांतर शठारे उपनिशदाम् उपगाना मात्र भोगः ।
अपि च गुण वशात् तदैक शेषि मधुर कविर् हृदये ममा विरस्तु ॥

source

अड़ियेन् इन्दुमति रामानुज दासि

अऴगिय मणवाळ मामुनि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै की चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाऴि के अगले आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें मे चर्चा करेंगे ।

 

श्री वरवरमुनि

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र

अवतार स्थल – आऴ्वारतिरुनगरि

आचार्य – तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

शिष्यगण

  • अष्ट दिक गज – 1) पोन्नडिक्काल जीयर 2) कोइल अण्णन 3) पतंगि परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर 4) तिरुवेंकट जीयर 5) एऱुम्बियप्पा 6) प्रतिवादि भयन्करमण्णन 7) अप्पिळ्ळै 8) अप्पिळार
  • नव रत्नगळ – 1) सेनै मुडलियाण्डान नायनार 2) शठगोप दासर (नालूर सिट्रात्तान) 3) कन्दाडै पोरेट्रु नायन 4) येट्टूर सिंगराचार्य 5) कन्दाडै तिरुक्कोपुरन्तु नायनार 6) कन्दाडै नारणप्पै 7) कन्दाडै तोऴप्परैप्पै 8) कन्दाडै अऴैत्तु वाऴवित्त पेरुमाळ | इसके अलावा उनके कई अन्य शिष्य थे जो अनेक तिरुवंश, तिरुमाळिगै, दिव्यदेश इत्यादि के सदस्य थे ।

 स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंग / तिरुवरंगम

ग्रंथ रचना सूची – श्री देवराज मंगलम्, यतिराज विंशति, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि, आर्ति प्रबंधम्

व्याख्यान सूची – मुम्मुक्षुप्पाडि, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्, आचार्यहॄदयम्,  पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि [पेरियवाच्चान पिळ्ळै का व्याख्यान जो नष्ट हो गया], रामानुज नूट्ट्रन्दादि

प्रमाण तिरट्टु [श्लोक संग्रह, शास्त्र टिप्पणि विशेषतः] – ईदु छत्तीस हज़ार पाडि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम्, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्

अऴगियमणवाळ पेरुमाळनायनार आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री अनैतुलगुम् वाऴप्पिरन्त यतिराज के अवतार के रूप मे प्रकट हुए । वे कई अन्य नामों के भी जाने गये है जो इस प्रकार है – अऴगियमणवाळमामुनि, सुन्दरजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुयोगी, वरवरमुनि, यतीन्द्रप्रणवर, कान्तोपयन्त, रामानुजपोन्नडि, सौम्यजामात्रुयोगीन्द्र, कोइल शेल्वमणवाळमामुनिगल् इत्यादि । वे पेरियजीयर, वेळ्ळैजीयर, विश्तवाकशिखामणि, पोइल्लादमणवाळमामुनि इत्यादि उपाधियों से भी प्रसिद्ध है ।

मणवाळमामुनि के जीवन का संक्षिप्त वर्णन –

  • श्रीपेरियपेरुमाळ के विशेषनुग्रह से आदिशेष के अवतार के रूप मे आऴ्वार तिरुनगरि मे प्रकट हुए ।
  • अपने माताश्री के जन्मस्थान मे वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है । समयानुसार उनका विवाह भी सम्पन्न होता है ।
  • श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के वैभव को सुनकर, वे आऴ्वारतिरुनगरि जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लेते है और यह हमने पूर्वलेख मे प्रस्तुत किया है ।
  • उनकी पत्नी एक नवजातशिशु को जन्म देती है जिनका नामकरण स्वयम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै उस शिशु का नाम एम्मैयनिरामानुशन् रखते है । रामानुजनूट्ट्रन्दादि मे श्री रामानुज शब्द अष्टोत्तरशत बार प्रयोग किया गया है जिसके आधारपर वे इस शिशु का नामकरण करते है ।
  • तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के परमपद को प्रस्थान होने के बाद श्री वरवरमुनि अगले दर्शनप्रवर्तक हुए ।
  • श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखते है ।
  • श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानकर श्री अऴगियवरद दास ( वानमामलै नाम के जगह से थे ) उनके प्रथम शिष्य हुए और उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर संयासाश्रम स्वीकार किये और उनकी सेवा मे संलग्न हुए । श्री अऴगियवरद दास को उनके जन्मस्थान के आदारपर वानमामलै जीयर और पोन्नडिक्कालजीयर का दास्यनाम दिया गया । पोन्नडिक्कालजीयर मायने सुवर्णनिर्माण – जिन्होने आने वाले कल मे बहुतों को पथप्रदर्शन कराया ।
  • उनके आचार्य के दिव्यौपदेश का स्मरण करके वे नम्माऴ्वार से निवेदन किये और फिर श्रीरंग की ओर रवाना हुए और जहाँ से उन्होने इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार किया ।
  • श्रीरंग की ओर जाते समय बींच मे श्रीविल्लिपुत्तूर आण्डाळ रंगमन्नार और तिरुमालिरुन्चोलैयऴगर का मंगलाशासन करते है ।
  • श्रीरंग पहुँचकर उन्होने कावेरी तट पर अपना नित्यकर्मानुष्टान सम्पूर्ण किया । उसके पश्चात श्रीरंग के सारे श्रीवैष्णव सामूहिक रूप से उनका स्वागत दिव्यभव्य रूप से करते है और स्थानीय श्रीवैष्णवों के घरों से प्राप्त पुष्कर जल से विधिपूर्वक और क्रम मे एम्पेरुमानार, नम्माऴ्वार, पेरिय पिराट्टि, सेनै मुदलियार, पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ इत्यादियों का मंगलाशासन करते है । श्री पेरुमाळ उनका स्वागत उसी प्रकार से करते है जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य का स्वागत हुआ था और अपना शेष प्रसाद और शठगोप से अपना अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के घर जाकर सत्सांप्रदाय के प्रति उनका और उनके छोटे भाई श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार का योगदान को गौरान्वित करते है ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने उन्हे उपदेश दिया की वे अपने निवास समय को स्थाई करे अर्थात वे अपना शेष काल श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय पर आधारित विषयतत्वों का बोध करते हुए भगवद्-भागवत्कैंकर्य करें । वे इस कैंकर्योपदेश को स्वीकार करते है और मुसलमानों के आक्रमण मे लुप्त ग्रंथों को खोजने के प्रयास मे जुट जाते है ।
  • एक बार श्री पोन्नडिक्काल जीयर एक वैष्णव उत्तमनम्बि के कैंकर्य के बारें मे श्री वरवरमुनि से शिकायत करते है और इससे उन्हे उपदेश मिलता है की वे इस वैष्णव को पूर्ण रूप से भगवद्-भागवत्कैंकर्य मे संलग्न करे ।
  • उसके पश्चात वे श्री तिरुवेंकटम् जाने की इच्छा व्यक्त करते है और पोन्नडिक्काल जीयर के साथ रवाना होते है । बींच मे श्री तिरुक्कोवलूर और तिर्क्कडिगै दिव्यदेशों का मंगलाशासन भी करते है ।
  • श्री तिरुमल (तिरुवेंकटम्) मे श्री रामानुजाचार्य द्वारा नियुक्त श्रीवैष्णव पेरियकेळ्वियप्पन्जीयर एक स्वप्न देखते है जिसमे व्यक्ति जो साक्षत पेरियपेरुमाळ जैसे प्रतीत होते है उनके साथ एक संयासि उनके चरणकमलों पर आश्रित उनकी सेवा मे जुटे है । स्वप्न से बाह्य दुनिया मे आकर वे स्थानीय श्रीवैष्णवों से इन दोनो महपुरुषों के बारे मे जानने की कोशिश करते है । उन्हे यह पता चलता है की एक व्यक्ति श्री वरवरमुनि और दूसरे पोन्नडिक्कालजीयर (तिरुवाय्मोऴि ईट्टु पेरुक्कर आऴ्गिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार और उनके प्राण सुक्रुत) । आश्चर्य की बात यह ती की वे दोनो तिरुमल की ओर ही आ रहे थे । यह जानकर अती प्रसन्न होकर उन्होने इन दोनो के लिये व्ययस्था करते है । श्री वरवरमुनि और पोन्नडिक्कालजीयर श्री तिरुवेंकटमलै, गोविन्दराज और नरसिंह इत्यादियों और अंत मे तिरुवेंकटमुदायन् का मंगलाशासन करते है । तिरुवेंकटमुदायन् बहुत प्रसन्न होकर अपना प्रसाद और श्री शठगोप का अनुग्रह देते है और अन्ततः वे दोनो वहाँ से कांचिपुरम की ओर रवाना होते है ।
  • उसके पश्चात श्री कांचिपुरम पहुँचकर वे दोनो श्री देवराजपेरुमाळ का मंगलाशासन करते है और सक्षात श्री देवराजभगवान कहते है की श्री वरवरमुनि स्वयम श्री रामानुजस्वामि है और अन्ततः अपना प्रसाद और शठारी का अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद मे श्री रामानुजाचार्य के जन्मस्थान श्रीपेरुम्बुदूर पहुँचकर उनके अनुभवों का स्मरण करते हुए वहाँ उन्होने मंगलाशासन करते है ।
  • फिर श्रीपेरुम्बुदूर से कांचिपुरम लौटकर वे श्रीभाष्य का बोध किडाम्बिनायनार (जो किडाम्बि आच्चान के वंशज थे) के आध्वर्य मे करने लगे । जब कुछ श्रीवैष्णव उनसे कुछ तत्वविषयों पर तर्क करने आते है तो वे अपने आचार्य के सदुपदेश का स्मरण करके कहते है की उनके आचार्य ने कहा की वे केवल भगवद्विषय के बारें मे ही चर्चा, प्रसार और प्रचार इत्यादि करें । परन्तु स्थानीय श्रीवैष्णव हितैषी के निरन्तर निवेदन से उन्होने उन सभी को तर्क मे पराजित किया और अन्ततः वे सारे उनके चरणकमलों का आश्रय लिये ।
  • किडाम्बिनायनार श्री वरवरमुनि के प्रतिभा को देखकर उनसे विनती किये की वे उन्हे उनको उनका मौलिक रूप दिखाये । श्री वरवरमुनि ने तुरन्त आदिशेष का मौलिक रूप का दर्शन दिया । यह मौलिक रूप देखकर अचम्भित किडाम्बिनायनार उनके प्रती आकर्शित हुए और उस समय से वे उनके प्रती अनुरक्त हुए । श्रीभाष्य का बोध सम्पूर्ण करने के पश्चात श्री वरवरमुनि वहाँ से विदा होकर श्रीरंग लौट गए ।
  • उनको वापस श्रीरंग मे देखकर श्री पेरियपेरुमाळ बहुत खुश होते है और उनसे दर्ख़्वास्त करते है की वे अभी भविष्य यात्रा स्थगित करें और इधर ही रह जाए ।
  • उसी समय, श्री वरवरमुनि के रिश्तेदारों से समाचार प्राप्त होता है की कुछ अपवित्रता है और इसके कारण उनकी सेवा मे बाधा होती है । तत्पश्चात उन्होने संयासाश्रम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के संयासिशिष्य श्री शठगोपजीयर से लिया और यही समाचार देने वे श्री पेरियपेरुमाळ से मिलने जाते है । यह जानकर श्रीपेरियपेरुमळ अत्यन्त खुश होकर उनका स्वागत बहुत भव्यरूप से करते है और कहते है की वे संयासाश्रम का दास्यनाम वही रखे जो उनका वर्तमान नाम था (क्योंकि वे चाहते थे की उनके आचार्य का नाम वही हो) और उनको पल्लविरायन मठ दिये जहाँ वे दिव्यप्रबंधों और अन्यशास्त्रों का बोध करें । कुछ इस प्रकार से वे श्रीअऴगियमणवाळपेरुमाळनायनार से श्रीअऴगियमणवाळमामुनि हुए । श्रीरंग के सारे हितैषी श्रीवैष्णवो श्री उत्तमनम्बि के आध्वर्य मे उनके मठ जाकर खुशी खुशी “मणवाळमामुनिये इन्नुमोरु नूट्ट्रान्डिरुम्” गाने लगे ।
  • वे अपने शिष्यों को श्रीपोन्नडिक्कालजीयर के आध्वर्य मे मठ का पुरने मठ का पुनर्निर्माण करने का आदेश देते है । उनके अनुग्रह से शिष्य एक नया मठ का निरमाण करते है और तो और इसी प्रकार पिळ्ळैलोकाचार्य के घर को नवीनीकरण कर दिव्यभव्य मण्डप का निर्माण करते है । तत्पश्चात वे अपना सार दिन केवल ईडु ग्रंथ, अन्य दिव्यप्रबंध, श्री रामानुजाचार्य के वैभव, श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र इत्यादि के कालक्षेप के माध्यम से बिताने लगे ।
  • कहते ही जंगल मे लगी आग जिस प्रकार फैलता है उसी प्रकार श्री वरवरमुनि का विख्यात चारों ओर फैलता गया । इसी कारण कई श्रीवैष्णवों मुख्यतर तिरुमंजनमप्पा (जो पेरियपेरुमाळ के नित्यकैंकर्यपर थे), उनकी बेटी (आय्चियार), पट्टर्पिरान इत्यादियों के उनके चरणमकमलों का आश्रय लिया ।
  • सिंगरैयर नामक गाँव से वळ्ळुवराजेन्द्र नाम के एक प्रपन्नभक्त प्रत्येक दिन श्री वरवरमुनि के आश्रम को सब्जियाँ भेजा करते थे । एक दिन उनके स्वप्न मे श्री भगवान ने स्वयम आकर कहा की उन्हे तुरन्त श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये जो साक्षात आदिशेष के अवतार है । वळ्ळुवराजेन्द्र जी तुरन्त श्रीरंग गए और वहाँ उन्होने कोईलकन्दादै-अण्णन के घर मे आश्रय लिया और तत्पश्चात इस स्वप्न का वर्णन किया । अण्णन यह सुनकर अचम्भित रह गए और फिर सोने चले गए । सोते वक्त उन्हे यह एहसास हुआ की साक्षात एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य) और श्री मुडलियाण्डान प्रकट हुए और श्रीरामानुजाचार्य ने कहा की वे ही श्री वरवरमुनि है और कोई अन्य नही और मुडलियाण्डान ने कहा की उन्हे तुरन्त उनका शरण लेना चाहिये । उसके अगले दिन कोईलकन्दादै-अण्णन अपने सभी बन्धुवों के साथ जाकर श्री पोन्नडिक्कालजीयर के पुरुशाकार के माध्यम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त किये । श्री वरवरमुनि ने उन सभी को स्वीकार किया और उनको पंञ्चसंस्कार प्रदान किये ।
  • तत्पश्चात श्री आचियार के सुपुत्र ( तिरुमंजनमप्पा के पोते ) श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेने की इच्छा व्यक्त किये । हलांकि श्री वरवरमुनि स्वीकार तो करते है परन्तु अपने प्रिय शिष्य श्री पोन्नडिक्कालजीयर के द्वारा उनका पंञ्चसंस्कार सम्पन्न होता है । यहाँ श्री पोन्नडिक्कालजीयर पहले इनकार करते है परन्तु अपने आचार्य के मनोभावना को समझते हुए उनके आसन मे बैठकर उनका तिरुच्चक्र और तिरुवाऴि स्वीकार कर अप्पाचियारण्णा को पंञ्चसंस्कार प्रदान करते है ।
  • एम्मैयन इरामानुशनन् ( श्रीवरवरमुनि के पूर्वाश्रम मे पूत्र ) दो दिव्य पुत्रों अऴगियमणवळ पेरुमाळनायनार (जो वरवरमुनि के प्रती उनकी अनुरक्ति और कैंकर्य से अन्ततः जीयरनायनार से जाने गए ) और पेरियाऴ्वारैयन को जन्म देते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपनी इच्छानुसार श्री पेरियपेरुमाळ की आज्ञा लेकर नम्माऴ्वर का मंगलशासन हेतु आऴ्वारतिरुनगरि निकल पडे । वहाँ पहुँचकर उन्होने तामिरभरणि नदी के तट पर अपना नित्यकर्मानुष्ठान सम्पूर्ण कियाऔर तत्पश्चात भविष्यदाचार्य (श्री रामानुजाचार्य), तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, तिरुवाराधन पेरुमाळ् इनवायर् तलैवन, नम्माऴ्वर और पोलिन्दु निन्ऱ पिरान् इन सभी का मंगलशासन किया ।
  • एक बार उन्हे आचार्य हृदय के कुछ सूत्रों मे संदेह होता है और उस समय वह अपने सब्रह्मचारि दोस्त तिरुनारायणपुरतु आयि के बारे मे सोचते है । यह सोचते हुए श्री वरवरमुनि अपने दोस्त से मिलने हेतु रवाना हुए । परन्तु आऴ्वार तिरुनगरि के सर्हद मे वरवरमुनि उन्से मिलते है जो तिरुनारायणपुरम् से खुद चलके आये । एक दूसरे को देखकर अती प्रसन्न हुए और गले लगाये । इस मिलन की खुशी मे श्री वरवरमुनि आयि पर एक तनियन की रचना करते है और उसी प्रकार श्री आयि भी एक पासुर की रचना करते है जिसमे वह उनसे पूछते है की क्या आप श्रीमान स्वयम एम्पेरुमानार है या नम्माऴ्वार है या भगवान है । कुछ दिनो के पश्चात श्री आयि तिरुनारायणपुरम लौटते है और श्री वरवरमुनि आऴ्वार तिरुनगरि मे रह जाते है ।
  • कहा जाता है कि ऐसे कृदृष्टि लोग थे जो श्री वरवरमुनि के वैभव से जलते थे । एक बार उन सभी ने श्री वरवरमुनि के मट्ट को चुपके से आग लगा दिया । श्री वरवरमुनि अपने स्वस्वरूप आदिशेष का रूप धारण कर आग से घिरा हुए मट्ट से बचकर स्थानीय श्रीवैष्णवों के समूह के मध्य मे खडे हुए । उसके पश्चात स्थानिय राजा को मालूम पडा की यह नीच कार्य किन लोगों ने किया और उन्हे दण्ड देना उचित समझा । श्री वरवरमुनि अपने कारुण्यता को प्रकाशित करते हुए कहे – उन सभी को माफ़ करे और उन्हे दण्ड ना दे । उनके करुणाभाव को देखकर उन सभी का हृदय परिवर्तन हुआ और उन सभी ने उनके चरणकमलों का आश्रय लिया । स्थानीय राजा श्री वरवरमुनि के इस वैभव को देखकर उनसे पंञ्चसंस्कार प्राप्त किया और इसके पश्चात राजा ने आऴ्वारतिरुनगरि और तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्यदेशों मे बहुत साराकैंकर्य किया ।
  • श्री वरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्य कैंकर्य जारी किये । उसी समय एरुम्बि गाँव के श्री एरुम्बिअप्पा श्री वरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे । श्रीवरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्यकैंकर्य जारी किये। उसी समय एरुम्बि गाँव  के श्रीएरुम्बिअप्पा श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे। अपने गाँव पहुँचकर जब वह श्रीएम्पेरुमान चक्रवर्ति-तिरुमगन सन्निधि का द्वार खोलने का प्रयास किये तो द्वार नही खोल पाये । चकाचौन्द एरुम्बिर्यप्पा भगवान कहते है – हेएरुम्बियप्पा ! तुम ने बहुत ही बडा भागवतापचार किया है क्योंकि तुमने श्री आदिशेष के स्वरूप श्रीवरवरमुनि के शेषप्रसाद ग्रहण नही किया अतःतुम तुरन्त जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लो और प्रसाद ग्रहण करो और उन की सेवा करो । पछतावा महसूस कर एरुम्बियप्पा तुरन्त श्रीरंग लौटकर श्रीवरवर मुनि के चरणकमलों का आश्रय लेते है । श्रीवरवरमुनि के प्रातःकाल और सन्ध्याकाल दिनचर्या वैभव को एक बहुत खूबसूरत ग्रंथ मे संग्रहित किये जिसे हम पूर्वदिनचर्या और उत्तरदिनचर्या से नाम से जानते है ।
  • जीयर श्रीकन्डाडै अण्णन जिन्होने अपने बाल्य अवस्था मे उत्तमप्रतिभा दर्शाया है उनका प्रशंसा करते है।
  • अप्पिळ्ळै और अप्पिळार श्रीपोन्नडिकाल जीयार के पुरुषाकार के माध्यम सेश् रीवरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लिये। एरुम्बियप्पा श्रीवरवरमुनि का व्यक्तिगत समीपता छोडकर अपने गाँव चले गये जहाँ उन्होने श्रीवरवरमुनि के वैभव का प्रचार प्रसार किया ।
  • एक बार उत्तमनम्बि जो श्रीवैष्नवों मे प्रख्यात हैव ह पेरियपेरुमाळ का तिरुवालवट्टम्कैंकर्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवरवरमुनि श्रीपेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करने हेतु प्रवेश किये। उन्हे प्रवेश करते हुए देखकर श्रीउत्तमनम्बि उन से कहे – कृपयाकर आप यहाँ से प्रस्थान करे क्योंकि भगवान का आन्तरिक सेवा हो रही है। यह सुनकर वरवरमुनि वहाँ से चले गये। सेवा के पश्चात थके नम्बि थोडि देर विश्राम लेते है । उस समय उनके सपने मे श्री पेरियपेरुमाळ आकर अपने निजसेवक श्रीआदिशेष की ओर इशारा करतुए हुए कहते हैहे नम्बि ! श्री मामुनि स्वयम श्रीआदिशेष है । उठने के तत्पश्चात अपने अपचार को जानकर मामुनि के मट्ट की ओर दौडे । मामुनि से मिलकर उनसे अपने अपराध की क्षमा मांगे और उनके चरनकमलों का आश्रय लिया और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने लगे ।
  • एक श्रीवैष्णवी शठगोप कोत्ति आय्चियार से अरुळिचेयल सीख रही थी । दोपहर के समय जब श्री वरवरमुनि एकान्त मे विश्राम ले रहे थे तब यह अम्माजी मुख्य प्रवेश द्वार के रंध्र से झाँकती है तो यह देकती है की श्री वरवरमुनि का असली स्वरूप श्री आदिशेषजी का है । परन्तु उसी समय एक आवाज़ से श्री वरवरमुनि उठते है और श्री वैष्णव अम्माजी से पूचते है की आपने क्या देखा  ? श्री अम्मजी ने साफ़ साफ़ बता दिया उन्होने क्या देखा । यह जानकर श्री वरवरमुनि कहे आप श्री यह बात गुप्त रखना और फिर वहा से चले गए ।
  • श्री वरवरमुनि निर्णय लेते है की अब उन्हे रहस्यग्रंथों पर टिप्पणि लिखनी चाहिये । पहले वह रहस्यग्रंथों जैसे मुम्मुक्षुप्पडि तत्वत्रय श्रीवचनभूषण पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणि लिखते है जिसमे वेद इतिहास पुराण वेदान्त दिव्यप्रबंधों इत्यादि संदर्भों से सिद्धान्तनिरूपण व्यक्त किये है । तत्पश्चात रामानुजनूत्रन्दादि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम् (जो चरमोपाय – श्रीआचार्यनिष्ठा को दर्शाता है यानि आचार्य ही सब कुछ) की टिप्पणि भी लिखे ।
  • स्थानीय श्रीवैषणवों श्री वरवरमुनि से निवेदन् करते है कि वह तिरुवाय्मोऴि दिव्यप्रबंध पर व्याख्या करे । श्री वरवरमुनि भगवान की निर्हेतुक कृपा और आचार्य कृपा से तिरुवाय्मोऴि नूत्तन्दादि ग्रंथ की रचना करते है । यह अद्वितीय ग्रंथ जो वेन्पा भाषा शैली मे लिखी गई है । यह याद करने मे सरल होता है परन्तु लिखने मे अति कठिन होता है । इस ग्रंथ मे वरवरमुनि श्री तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक पदिगम् (दस पासुर) के शुरुवात और अन्त के शब्दों का प्रयोग एक एक पासुर मे किये है । प्रत्येक पासुर के शुरुवात के दो वाक्य श्री तिरुवाय्मोऴि के पदिगम् का सार बतलाता है और अन्त के दो वाक्य श्री नम्माऴ्वार की प्रशंसा करता है ।
  • पूर्वोक्त श्रीवैष्णव श्री वरवरमुनि से निवेदन करते है कि वह पूर्वाचार्य के मूल सिद्धन्तों और उपदेशों का वर्णन करते हुए एक ग्रंथ प्रस्तुत करे । श्री वरवरमुनि तुरन्त  उपदेशरत्तिनमालै ग्रंथ की रचना करते है जिसमे वह पूर्वाचार्यों के जन्म-नक्षत्र, जन्मस्थल, उनके वैभव, श्री रामानुजाचार्य के अपार कारुण्य ( करुणा ), तिरुवाय्मोऴि के व्याखायन, ईडु महाग्रंथ की रचना, उसका प्रचार प्रसार, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के अवतार का वर्णन, उनकी श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव । इसी ग्रंथ वह कहते है कि श्री तिरुवाय्मोऴि का सार श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र ही है और अन्ततः इन सभी के अर्थों का स्पष्टीकरण करते है ।
  • एक बार कुछ मायावादि उनसे तर्क-वितर्क करने हेतु उनके समक्ष जाते है, परन्तु श्री वरवरमुनि यह तिरस्कार करते है क्योंकि वह अपना उसूल “तर्क-वितर्क नहि करेंगे केवल् भगवद्-विषय पर ही चर्चा प्रसार प्रचार करेंगे” का उल्लंघन नही करना चाहते थे । इसके विपरीत वह अपने शिष्य वेदलप्पै को उन मायावादियों से तर्क-वितर्क करने के लिये कहते है । श्री वेदलप्पै बहुत आसानी से उन सभी को पराजित करते है । उसके पश्चात वेदलप्पै अपने मूल निवास स्थान को त्यागते है ।
  • इसी दौरान श्री प्रतिवादि भयंकर अण्णन (जो कांचिपुरम के एक प्रख्यात विद्वान थे) अपनी पत्नी के साथ श्री श्रीनिवास भगवान की तिरुमंजन सेवा तिरुमला मे कर रहे थे । एक बार श्रीरंग से आए एक श्रीवैष्णव भगवान के तिरुमंजन सेवा के समय उनसे मिलते है और वह श्री वरवरमुनि के वैभव का वर्णन करते है । श्री वरवरमुनि के वैभव को सुनने के बाद, अण्णाजी अति प्रसन्न होते है जिसकी वजह से वरवरमुनि से मिलने की आकांक्षा व्यक्त किये । परन्तु इस प्रसन्न अवस्था मे वह यह भूल जाते है कि भगवान के श्रीपादतीर्थ मे परिमल (इलायचि) नही डाले और अर्चकस्वामि को श्रीपादतीर्थ देते है । जब उन्हे यह एहसास होता है तो वह दौडते हुए इलायचि लेकर आते है और अर्चकस्वामि के यह कहते है । अर्चकस्वामि कहते है कि बिना इलायचि के यह श्रीपादतीर्थ बहुत सुगंधित और मीठा हो गया है । यह सुनकर अण्णाजी समझ गए कि यह श्री वरवरमुनि के वैभव से यह संभव हुआ है और तुरन्त श्रीरंग की ओर निकल पडे । वह श्रीरंग पहुँचने के तदंतर श्री वरवरमुनि के मठ्ठ पहुँचे और चुपके से वरवरमुनि के कालक्षेप को सुनने लगे । श्री वरवरमुनि उस समय तिरुवाय्मोऴि के चौथे शतक के दसवाँ पासुर (ओन्रुम् देवुम् .. 4.10) कई शास्त्रों के आधारपर समखा रहे थे ।  यह पासुर भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को दर्शाता है । श्री अण्णाजी वरवरमुनि के ज्ञान और प्रस्तुतिकरण को देखर दंग रह गए । इसी दौरान श्री वरवरमुनि तीसरे पासुर समझाते हुए रुक गए और गम्भीर आवाज़ मे कहे – अगर अण्णजी का आऴ्वार से संबंध होगा तो ही आगे सुने वरना नही सुने यानि ओराण्वळि गुरुपरंपरा संबंध । तत्पश्चात अण्णाजी ने श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशशन किया । श्री पेरियपेरुमाळ अपने अर्चक स्वामि से उन्हे उपदेश देते है की आप श्रीमान को वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये और इस प्रकार विलक्षण संबन्ध प्राप्त करे ।  अण्णाजी श्री पोन्नडिक्काल जीयर के पुरुषाकार के माध्याम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त करते है और कुछ समय तक श्रीरंग मे निवास करते है ।
  • तदन्तर फिर से श्रीवरवमुनि तिरुमला की यात्रा मे जाते है । यात्रा के बींच मे श्री कांञ्चिपुर पेररुळाळ का मंगलाशासन करते है और कुछ दिनो तक कांञ्चिपुरम् मे निवास करते है ताकि अन्य श्रीवैष्णवों का उद्धार हो । वह अपने शिष्य अप्पाचियारण्णा को उपदेश देते है कि वह कांञ्चिपुरम् मे उनके प्रतिनिधि बनकर निवास करे । यह सदुपदेश देकर वरवरमुनि तिरुमला की ओर तिरुकडिगै, एरुम्बि, तिरुप्पुट्कुऴि इत्यादि के रास्तों से तिरुमला पहुँचे । मंगलाशासन करने तत्पश्चात अपने एक और शिष्य सिरिय केल्वियप्पन् जीयर को नियुत्क्त करते है जो अब से श्री पेरियप्पन् जीयार ( श्रीरामानुजाचार्य ने स्वयम इन्हे नियुत किया था ) के कैंकर्यों मे सहायता करे यानि अपना हाथ बटाये । उनकी वापसी मे वरवरमुनि तिरुएव्वुळ वीरयराघव , तिरुवल्लिक्केणि के वेंकटकृष्ण और अन्य दिव्यदेशों के पेरुमाळों ( अर्चमूर्तियों ) का मंगलाशासन किये ।  वे श्री मधुरान्तकम् दिव्यदेश पहुँचकर उस स्थान का अपने सिर से अभिवन्दन करते है जहाँ हमारे जगदाचार्य श्री रामानुजाचार्य श्री पेरियनम्बि के हाथों से पंञ्चसंस्कार से प्राप्त किये । उसके बाद वे तिरुवालि तिरुनगरि दिव्यदेश पहुँचकर श्री तिरुमंगयाऴ्वार के वैभव का आनन्द अनुभव कर, वदिवऴगु पासुर का समर्पण कर, आस-पास मे स्थित सारे अर्चमूर्तियों का मंगलाशासन करते है । तत्पश्चात तिरुक्कण्णपुरम् दिव्यदेश पहुँचकर श्रि सर्वांगसुन्दर ( सौरिराज ) अर्चा-विग्रह और उस दिव्यदेश मे श्री तिरुमंगैयाऴ्वार के समाधि का निर्माण करते है ।  इस प्रकार कई सारे दिव्यदेशों का भ्रमण कर अन्ततः श्रीरंग पहुँचे और वही निवास किये ।
  • उपरोक्त कहा गया है कि – श्री वरवरमुनि ने आदेश दिया कि अप्पाचियारण्णा कांञ्चिपुरम् जाए और उनके प्रतिनिधि बने । उस समय श्री अण्णाजी बहुत दुःखित होकर कहते है – यहाँ इतनी शुद्ध घोष्टि है जिसे छोडकर मुझे जाना पड रहा है । उन्हे दुःखित देखकर श्री वरवरमुनि ने कहा – उनके प्रयुक्त पात्र के धातु से उनके दो विग्रह बनाये जिसकी श्री पोन्नडिक्काल जीयर पूजा किया करते थे । एक विग्रह उन्होने श्री पोन्नडिक्काल जीयर को दिया और दूसरा श्री अण्णजी को दिया । ये दिव्य विग्रह हम श्री वानमामलै मट्ट, सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित वानमामलै और मुदलियाण्डान के वंशज के घरों मे यह अभी भी देख सकते है । वरवरमुनि ने अपने पूजनीय भगवान ( तिरुवाराधन भगवान – जिनका नाम एन्नै तीमनम् केदुत्ताइ) को भेट के रूप मे अण्णाजी को दिया जिन्हे हम सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित मुदलियाण्डान के वंशज के घर मे देख सकते है ।
  • श्री वरवरमुनि प्रतिवादिभयंकरमण्णा को श्रीभाष्य के अगले आचार्य और श्री कन्दादै अण्णन् शुद्धसत्त्वमण्णन् को भगवद्-विषयाचार्य के रूप मे नियुक्त करते है । वह श्री कन्दादै नायन् को ईडु 3600 पाडि पर आधारित अरुमपदम् की रचना करने का उपदेश दिये । इस ग्रंथ की रचना अन्ततः हुई और प्रसिद्ध भी है ।
  •  अब विस्तार मे कैसे श्री पेरिय पेरुमाळ श्री ववरमुनि के शिष्य हुए का वर्णन आप सभी के लिये प्रस्तुत है ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ बिना रुकावट के श्री वरवमुनि के श्रीमुख से अपने विषय (भगवद्-विषय) को सुनना चाहते थे । और अपने इच्छानुसार उनको (वरवरमुनि) को अपना आचार्य मान लिया । जब श्रीरंग मे पवित्रोत्रसव मनाया जा रहा था उस पवित्रोत्रसव साट्ट्रुमरै के दौरान, श्री नम्पेरुमाळ तिरुप्पवित्रोत्सव मण्डप को ले जाया गया और भगवान फिर वही रहने लगे । उस समय श्री वरवरमुनि भगवान का मंगलाशासन हेतु उसी मण्डप मे पहुँचे । उस समय भगवान ने स्वयम सबके यानि कैंकर्यपर, आचार्य पुरुष, जीयर, श्रीवैष्णवों समक्ष श्री वरवरमुनि को यह आदेश दिया – “आप श्रीमान तुरन्त श्री नम्माऴ्वार के तिरुवाय्मोऴि का ईडु व्याखायन का कालक्षेप करे” । भगवान यह भी कहा कि यह कालक्षेप निर्विराम होना चाहिए । भगवान ने इन्हे यह कार्य सौंपा यह जानकर वे अत्यन्त खुश हुए और विनम्रतापूर्वक भगवान के इस आदेश का पालन करना उचित समझा ।
  • इसके अगले दिन जब श्री वरवरमुनि पेरिय तिरुमण्डप (जो पेरियपेरुमाळ के द्वार-पालकों कि सन्निधि के भीतर पडता है) पहुँचते है, वे यह देखकर दंग होते है कि भगवान अपने समस्त परिवार सहित (उभयनाच्चियार – दोनो पत्नियों) , तिरुवनन्ताऴ्वान्, पेरिय तिरुवडि, सेनै मुदलियार, अन्य आऴ्वार, आचार्य इत्यादियों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब ये आये और कालक्षेप आरंभ हो । श्री वरवरमुनि अपने आपको भाग्यवान मानते है और कालक्षेप अन्य व्याख्यानों जैसे छे हज़ार पाडि, नौ हज़ार पाडि, बारह हज़ार पाडि और चौबीस हज़ार पाडि इत्याडि के माध्यम से आरंभ करते है । कालक्षेप के अन्तर्गत सत्-साम्प्रदाय के गोपनीयरहस्यों का विवरण वे अन्य ग्रंथ जैसे श्रुति, स्मृति, श्रीभाष्य, श्रुतप्रकाशिक, श्रीगीताभाष्य, श्रीपंञ्चरात्र, श्री विष्णुपुराण इत्यादि के माध्यम से दिये । वे ईडु व्याख्यान का वर्णन शब्दार्थ सहित, आन्तरिक-अर्थ इत्यादि से समझाये । यह निर्विराम दस महीनो तक चलता रहा । और अन्ततः भगवान की आज्ञा से साट्ट्रुमुरै के समाप्ति तिथि आनिमूल (आवणि मूल नक्षत्र) के दिन यह सम्पूर्ण हुआ । साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये ।  हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कहकर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक तीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्रीवैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया । इसी समय यह घटना एक विशाल दावाग्नि की तरह फैल गया और इस प्रकार यह गौरवनीय श्लोक अन्य दिव्यदेशों मे भगवान के द्वारा प्रचार हुआ । उसी समय अन्य श्रीवैष्णवों के आग्रह से अप्पिळ्ळै ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि का वाळितिरुनाम को प्रस्तुत कर उनकी गौरव की प्रशंसा की ।
  • कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।
  • श्री वरवरमुनि तत्पश्चात वडनाट्टुदिव्यदेश यात्रा के बारे मे सोचते है । वरवरमुनि इस यात्रा का आयोजन करते है और अपने शिष्यों के साथ यात्रा के लिये निकल पडते है ।
  • एरुम्बियप्पा को अपने दिव्यचरणों के पादुकों को प्रदान करते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान (अरंगनगरप्पन्) को पोन्नडिक्काल जीयर को सौंपते है । और उन्हे उपदेश देते है कि वह वानमामलै जाकर एक मट्ट का निर्माण करे और अविराम भगवान का कैंकर्य करे ।
  • वरवरमुनि फिर से पाण्दियनाट्टुदिव्यदेश यात्रा मे जाते है । यात्रा के दौरान, वे उस राज्य के राजा (महाबलि वण नाथ रायन्) को अपना शिष्य बनाकार उनसी बहुत सारे कैंकर्य करवाये ।
  • कहते है कि जब वरवरमुनि मदुरै के निकट यात्र कर रहे थे तो एक दिन वे एक इमली के पेड के नीचे विश्राम लिये । विश्राम लेने के पश्चात, जब वह उठे तो उनके दिव्यचरणों ने उस वृक्ष को स्पर्श किया तो तुरन्त इस वृक्ष को मोक्ष की प्राप्ति हुई । तत्पश्चात वे अन्य दिव्यदेशों के अर्चामूर्तियों का मंगलाशासन किये और अन्ततः श्रीरंग पहुँचे ।
  • कहते है – अपने शिष्यों द्वारा उन्होने बहुत सारे कैंकर्य सम्पूर्ण किये । उनके आदेशानुसार जीयर तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर की सेवा करने लगे ।
  • श्री वरवरमुनि पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि का व्याख्यान लिखते है जो उस समय लुप्त हो गई थी । पेरियवाच्चान पिळ्ळै ने पूर्व ही इस पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर चुके थे परन्तु अन्ततः यह लुप्ट् हो गई । इसका पुणर्निर्माण श्री वरवरमुनि के शब्दार्थ सहित किया ।
  • श्रीवरवरमुनि के अपार कारुण्य की भावना गौरवनीय और प्रशंसनीय है । वरवरमुनि का स्वास्थ्य रोगग्रस्त हो गया परन्तु अविराम वह पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की व्याख्या कर रहे थे । उनके बिगडते स्वास्थ्य को देखकर उनके शिष्य उनसे पूछे – स्वामि आप इतना कष्ट क्यों उठा रहे है ? वरवरमुनि ने हसते हुए कहा – यह कार्य मै हमारे भविष्य के पीढी के लिये कर रहा हूँ यानि पुत्र, पौत्र इत्यादि ।
  • वह अपना शरीर त्यागकर परमपद जाने की इच्छा व्यक्त करते है । उस समय वे अपने भावनावों को आर्ति प्रबंध नामक ग्रंथ मे प्रस्तुत करते है । इस ग्रंथ मे वे श्री रामानुजाचार्य से रोते हुए प्रार्थना कर रहे है कि उन्हे स्वीकार करे और उन्हे इस भवबंधन से मुक्त करे यानि इस भौतिक शरीर से मुक्त करे । इस ग्रंथ के माध्यम से वह दर्शाये है की कैसे रामानुजाचार्य से प्रार्थना करे, किस प्रकार आर्त दृप्त होकर प्रपन्न इस भव-बंधन से विमुक्त हो सकता है । क्योंकि वह स्वयम रामानुजाचार्य थे ।
  • उन्होने अन्त मे अपना भौतिक शरीर त्यागकर ( यानि अपनी सेवा इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण कर ), श्री वैकुण्ठ धाम पधारे और भगवत्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न हुए । वह सारे अरुळिचेयल सुनने की इच्छा व्यक्त करते है । उनके इच्छानुसार उनके शिष्य अत्यन्त प्रेम भावना से इसका आयोजन करते है । मामुनि इतने प्रसन्न होते है कि उन्होने सभी श्रीवैष्णवों के लिये तदियाराधन का आयोजन किया । और इन सभी से विनम्र्तापूर्वक अनजाने मे किये अपराधों की क्षमा याचना करते है । इसके उत्तर मे प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव कहते है – आप श्रीमान निष्काम, दोषरहित, अकलंकित थे । अतः आप को क्षमा याचना शोभा नही देता । तत्पश्चात श्री वरवरमुनि सभी श्रीवैष्णवों ने निवेदन करते है की श्री पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ के कैंकर्य संपूर्ण प्रेम से और केवल उन पर केंद्रित करते हुए करे ।
  • फिर वह “पिळ्ळै तिरुवडिगळे शरणम्, वाऴि उलगासिरियन् और श्री एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम्” कहकर अपनी लीला को इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण करते है । इस भौतिक जगट से जाने के पहले श्री भगवान को देखने की इच्छा से अपने कमल जैसे नयनों को खोले, तो साक्षत परम ब्रह्म श्रीमन्नारायण गरुड पर बैठकर पधारे और स्वयम उनको अपने साथ परम धाम ले गए । इस प्रकार अपनी लीला को अत्यन्त शानदार तरीके से सम्पूर्ण किये ।
  • श्री वरवरमुनि के जाने बाद, सारे श्रीवैष्णव बहुत रोते है । भगवान स्वयम बहुत शून्य महसूस करते है और किसि प्रकार के भोग को स्वीकार नही करते है । अन्ततः सारे श्रीवैष्णव खुड को दिलासा देते है और अन्तिम चरम कैंकर्य का आयोजन करते है । तिरुवध्यायन महामहोत्सव का आयोजन श्रेष्ठता, दिव्य-भव्य रूप से होता है । यह महामहोत्सव भगवान के ब्रह्मोत्सव से भी श्रेष्ठ था क्योंकि यह भगवान ने आदेशानुसार इसका आयोजन हुआ ।
  • पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

श्री वरवरमुनि (मामुनि) के दिव्य उपदेशों का संक्षिप्त वर्णन :

  • एक बार दो श्रीवैष्णवों के बींच मे गलतफ़हमि के कारण लड रहे थे । उसी समय रास्ते मे दो कुत्ते भी लड रहे थे । श्रीवरवरमुनि कुत्तों की ओर देखते हुए कहे – क्या आप कुत्तों ने श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र, तिरुमंत्र इत्यादि का अनुसंधान किया है ? तो क्यों इन श्रीवैष्णवों को अपने आप मे इतना घमण्ड क्यों है ? यह सुनकर वे दोनों परिवर्तित हुए और विशुद्ध सत्व से भगवद्-भागवत् कैंकर्य किये । कहने का तात्पर्य यह था – अगर कोई पूर्वाचार्य के ग्रंथों का अनुसंधान, कालक्षेप करे तो उसके मन मे क्लेश घमण्ड, इत्यादि दोष होना नहि चाहिये ।
  • एक बार वड देश से कोई व्यक्ति वरवरमुनि को अर्जित धन का समर्पण करता है । वरवरमुनि को यह जानकारी प्राप्त हुआ कि यह धन तीख तरीके से अर्जित नही है । अतः तुरन्त उन्होने इस धन का तिरसकार कर दिया और वापस भेज दिया । श्री वरवरमुनि धन दौलत मे कदाचित भी इच्छा नही रखते थे । कैंकर्य के लिये आवश्यक धन की इच्छा भी वे केवल सुनिश्चित श्रीवैष्णवों से रखते थे ।
  • एक बार एक वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे अचानक प्रवेश करती है । और श्री वरवरमुनि से एक रात के निवास के लिये निवेदन करती है । वरवरमुनि कहते है – “एक वृद्ध चिखुर भी पेड़ चडने के काबिल है” यानि आप कही और अपने निवास की व्यवस्था करे । अगर यह वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे रहती तो उनके वैराग्य के विरुद्ध भावना जागरुक हो सकती थी । अतः इस प्रकार वह ऐसे गलत फ़हमियों को बढावा नही देते थे जो लोगों के मन मे शंखा पैदा कर सके ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव अम्माजी बिना भक्ति-भाव के खाने की सब्जिया काटने मे मदद कर रही थी । यह जानकर श्री वरवरमुनि तुरन्त उनका बहिष्कार किया और सजा मे छे महीनो तक अन्य प्रदेश मे रहने का आदेश दिया । उनका उद्धेश्य साफ़ था – कैंकर्य करने वाले श्री वैष्णव सदैव भगवद्-भागवत निष्टा मे रहने चाहिये ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव “वरम् तरुम् पिळ्ळै” अकेले अकेले श्रीवरवरमुनि के मिलने हेतु चले गए । श्रीवरवरमुनि के उन्हे टोकते हुए कहे – कदाचित भी किसी भी व्यक्ति को आचार्य और भगवान के समक्ष अकेला नही जाना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति का धर्म और कर्तव्य है कि वह श्रीवैष्णवों के साथ भगवान और आचार्य के समक्ष जाये ।
  • उन्होने बहुत बार भागवतापचार के बारें मे समझाया और उसकी निर्दयी कठोर स्वभाव का वर्णन भी किया है और इससे कैसे प्रपन्न भक्तों का नाश हो सकता है ।
  • एक बार एक अर्चक स्वामि श्री वरवरमुनि ने निवेदन करते है कि उनके शिष्य उनका अभिनन्दन नहि कर रहे है और उनका उनको सम्मान नहि दे रहे है । श्री वरवरमुनि के उनके शिष्यों को समझाया अर्चक स्वामि को सदैव सम्मान दे क्योंकि उनमे श्रीमन्नारायण और श्रीदेवि सदैव बिराजमान है ।
  • एक बार वडुनाट्टुदिव्यदेश से एक धनी श्रीवैष्णव श्रीवरवरमुनि के समक्ष आकर एक श्रीवैष्णव के लक्षण के बारें मे पूछते है । श्रीवरवरमुनि उत्तर मे कहते है –
    • केवल भगवान के चरणकमलों का आश्रय लेने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भगवान का संबन्ध (यानि तप्त मुद्र – संख चक्र ) पाकर कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल तिरुवाराधन करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल आचार्याभिमान (परतंत्र) होने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भागवतों की सेवा करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता ।
    • हलांकि यह करना अत्यन्त आवश्यक है परन्तु निम्नलिखित बिन्दु और भी महत्वपूर्ण है –
    • हमे ऐसे कैंकर्य समयानुसार करना चाहिये जो श्री भगवान को सन्तुष्ट या प्रसन्न करे ।
    • श्रीवैष्णवों के लिये सदैव अपने घरों के द्वार खुले रहना चाहिये । और साथ ही उनके लिये जब चाहे जो चाहे सेवा करने के लिये सदैव तैय्यार रहना चाहिये ।
    • पेरियाऴ्वार के कथन के अनुसार “एन् तम्मै विर्कवुम् पेरुवार्गळे” हमे सदैव अन्य श्रीवैष्णवों के लिये बिक जाने के लिये भी तैय्यार रहना चाहिये ।
  • जब हम भगवद्-शेषत्वम् (भगवान के सेवक है यह भावना) को विकसित करेंगे तो हमे साम्प्रदाय के अर्थ, श्री भगवान और आऴ्वार आचार्य के अनुग्रह से सीख सकते है । एक श्रीवैष्णव जो पहले से ही निष्ठावान है उसके लिये यह आवश्यक नही की वह कुछ और व्यक्त-अव्यक्त रूप से सीखने की ज़रूरत नही क्योंकि पहले से ही वह चरम निष्ठा मे स्थित है |
  • कहते है अगर हम किसी भी व्यवहार-तत्व का प्रचार प्रसार करेंगे जिसका पालन हम नही कर रहे है तो यह केवल एक वेश्या का स्वभाव दर्शा रहे है । क्या वेश्या यह कह सकती है की कैसे शुद्ध आचरण करना चाहिये ? नही ना । इसीलिये जो भी प्रचार प्रसार करे उसका पालन अवश्य करे ।
  • कहा जाता है कि श्रीवैष्णवों की आराधना से श्रेष्ठ कोई कैंकर्य नही और श्रीवैष्णवों कि निन्दा से बड़कर महाप्राध कुछ भी नही है ।

ये दिव्य उपदेश सुनकर प्रफ़ुल्लित श्रीवैष्णव मामुनि के प्रति प्राणर्पित निष्ठावान हुआ । उनका चिन्तन मनन करते हुए अपने गाँव लौट गया ।

हमारे सत्-सांप्रदाय मे श्रीवरवरमुनि का विषेश स्थान –

  • कहते है कि किसी भी अन्य आचार्य के वैभव के बारें मे बोलना/बात करना और संक्षेप मे इसका विवरण कर सकते है परन्तु श्रीवरवरमुनि का वैभव असीमित है । वे खुद अपने हज़ार जबानों से अपने वैभव का वर्णन नही कर सकते है । तो हम सभी क्या चीज़ है । हम तो कदाचित पूर्णसन्तुष्टिकरण के लिये भी नहि कर सकते । हमे तो केवल उनके बारें मे पढकर, उनकी चर्चा करते हुए अपने आप को सन्तुष्ट करना चाहिये ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने स्वयम उन्हे अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार किया और इस प्रकार आचार्य रत्नहार और ओराण्वळि गुरुपरम्परा को सम्पूर्ण किया ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ उनके शिष्य होने के नाते, अपना शेषपर्यन्क (शेष सिंहासन) अपने आचार्य को भेंट मे दे दिया जो हम अभी भी सारे दिव्यदेशों मे देख सकते है । केवल श्रीमणवाळमामुनि के अलावा अन्य आऴ्वार और आचार्य को यह शेषपर्यन्क उपलब्ध नही है ।
  • आऴ्वार तिरुनगरि मे, इप्पासि तिरुमूलम (मणवाळमामुनि के आविर्भाव दिवस पर) आऴ्वार अपने तिरुमंजनसेवा के बाद अपनी पल्लकु (पालकी), कुडै, चामार, वाद्य इत्यादि मामुनि के सन्निधि को भेजकर उनक आगमन का स्वागत करते है । मामुनि के आगमन के बाद वे तिरुमान्काप्पु (तिलक से) सुसज्जित होकर मामुनि को अपना प्रसाद प्रदान करते है ।
  • मामुनि केवल एकमात्र ऐसे आचार्य है जिनका तिरुवध्यनम् (तिरोभावदिवस) दिव्यभव्य रूप से मनाया जाता है । तिरोभावदिवस केवल पुत्र और शिष्य ही करते है । लेकिन इस विषय मे, साक्षात श्रीरंग पेरुमाळ उनके शिष्य है जो अभी भी प्रचलित है । वही उनका यह दिन दिव्य भव्य रूप से मनाते है । इस दिन वह अपने अचर्क स्वामि, परिचारक, निज़ि सामग्री इत्यादि उनके लिये भेजते है । इस महामहोत्सव की जानकारी इस लिंक पर उपलब्ध है |
  • श्रीरंग और आऴ्वार तिरुनगरि मे मामुनि कदाचित भी अपने वैभव और कीर्ती के उत्सव पर ज़्यादा ध्यान नही दिया करते थे । उनके अनुसार उनका अर्च-तिरुमेनि (विग्रह) बहुत ही छोटा होना चाहिये और पुरपाड्डु बिलकुल भी नहि होना चाहिये क्योंकि वहाँ पे केवल आऴ्वार और नम्पेरुमाळ पर पूरे कैंकर्य केंद्रित है । इसी कारण उनका विग्रह बहुत छोटा और अत्यन्त सुन्दर है ऐसा प्रतीत होता है ।
  • मामुनि इतने विनयशील और अभिमानरहित थे की कभी भी किसी का बुरा नहि लिखते और चाहते थे । अगर पूर्वाचार्य के व्याख्यानो मे भी अगर परस्पर विरोधि प्रतीत होता है फिर भी ऐसे संदर्भ मे भी वह इसका ज़िक्र या इसकी वीणा नही करते और अपक्षपात रहते है । (किसी का भी पक्ष नही लेते और एक दूसरे पक्ष का विरोध और निन्दा कदाचित भी नहि करते) ।
  • श्री मामुनि ने केवल अरुळिचेयल पर अपना ध्यान केंद्रित किया और वेदान्त का विवरण इन्ही अरुळिचेयल से ही समझाया । अगर वह प्रकट नही होते तो निश्चित है कि तिरुवाय्मोऴि और उसके अर्थ भिगोया गया इमली की तरह होगा (माने पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता) ।
  • मामुनि से स्वयम पूर्वाचार्यों के ग्रंथों को सम्मिलित कर उन पर अपनी व्याख्या लिखे और भविष्य मे हम सभी के उद्धार हेतु उनका संरक्षण किये ।
  • उनकी अपार कारुण्य भावना प्रशंसनीय है । जिस किसि ने भी उनका विरोध, अपमान, परेशान किया उन सभी के प्रती वह अपना कारुण्य भाव दिखाते थे । वे हमेशा उनका आदर और उनके साथ अच्छा बर्ताव करते थे ।
  • कहा जाता है कि अगर हम उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर उनके चरण कमल अपने मस्तिष्क पर धारण करने के लिये तैय्यार है, तो यह अवश्य मानो कि अमानवम् (जो विरजा नदी पार करवाने मे सक्षम) याने स्वयम मामुनि हमारे हाथ पकडकर इस भव सागर से पार करवायेंगे ।
  • श्री रामानुजाचार्य के प्रती उनका उत्सर्ग अपूर्व है और अपने जीवन चरित्र से कैसे उनकी पूजा कैसे करे यह दर्शाया है ।
  • उनका जीवन चरित्र हमारे पूर्वाचार्यों के कथानुसार एक साक्षात उदाहरण है की कैसे एक श्रीवैष्णव को व्यवहार करना चाहिये । यह पूर्व ही श्री आचार्यनिष्ठावान कैंकर्यपर भागवतोत्तम श्री सारथितोताद्रि के असीम कृपा से इस लिंक (श्रीवैष्णव के लक्षण) पर अन्ग्रेज़ि मे उपलब्ध है । कृपया इस लिंक पर क्लिक करे और सारे लेख और ई-पुस्तकें का लाभ उठायिये ।

मामुनि का तनियन् – (ध्येय नित्य अनुस्मरण श्लोक)

श्रीशैलेश दयापात्रम् धीभक्त्यादिगुणार्णवम् । यतीन्द्र प्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम् ॥

संक्षिप्त अनुवाद – मै (श्रीरंगनाथ) श्रीमणवाळमामुनि का नमन करता हूँ जो श्री तिरुवाय्मोऴि के दया के पात्र है, जो ज्ञान भक्ति वैराग्य इत्यादि गुणों से सम्पन्न एक विशाल सागर है और जिनको श्री रामानुजाचार्य के प्रति अत्यन्त रुचि रति और आस्था है ।

इस लेख से हमने ओराण्वळिगुरुपरंपरा के अन्तर्गत सारे आचार्यों के वैभव और उनके जीवन का संक्षित वर्णन प्रस्तुत कर सम्पूर्ण किया है । कहा जाता है कि सदैव प्रत्येक कार्य का अन्त मीठा होना चाहिये । इसीलिये हमरी यह ओराण्वळिगुरुपरंपरा श्री मणवाळमामुनि के जीवन चरित्र से सम्पूर्ण होती है और जिनकी लीला इस लीला विभूति और नित्य विभूति (दोनों) मे रसाननन्द से भरपूर है अतः रसमयी और मीठी है ।

उनका आविर्भाव दिवस का महामहोत्सव (नक्षात्रानुसार) दिव्य भव्य रूप से कई दिव्य देशों मे होती है जैसे आऴ्वार तिरुनगरि, श्रीरंगम्, कांञ्चिपुरम्, श्रीविल्लिपुत्तूर, तिरुवहिद्रपुरम्, वानमामलै, तिरुनारायण इत्यादि । हम सभी इस महामहोत्सव का भरपूर लाभ उठा सकते है और इस उत्सव मे भाग लेकर, उनके समक्ष रहकर, अपने आप को परिष्कृत करना चाहिये जो स्वयम श्रीरंगनाथ भगवान के प्रिय आचार्य हुए ।

हम आगे यानि भविष्य मे अन्य श्रेष्ठ आचार्यों के जीवन चरित्र के बारे मे चर्चा अवश्य इन्ही लेखों द्वारा करेंगे । अन्य आचार्यों के अन्तर्गत सबसे पहले श्री पोन्नडिक्काळ जीयर के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे जो श्री मामुनि के तिरुवडि (चरणकमलों के सेवक) है और जिसे स्वयम मामुनि अपना श्वास और जीवन मानते थे ।  अगले लेख मे आप सभी पोन्नडिक्काल जीयर के वैभव के बारें मे अवश्य पढे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानचल महामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वालि के अन्तर्गत पिळ्ळै लोकाचार्य के जीवन के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वालि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के बारें मे चर्चा करेंगे ।

thiruvAymozhi piLLai

तिरुनक्षत्र – वैशाख मास , विशाखा नक्षत्र

अवतार स्थल – कुन्तिनगरम् ( कोन्तगै )

आचार्य – पिळ्ळै लोकाचार्य

शिष्य गण – अऴगिय मणवाळ मामुनि , शठगोप जीयर ( भविष्यदाचार्य सन्निधि ) , तत्वेष जीयार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि स्वापदेशम्

वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए ।

तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये । कूरकुलोत्त्मदास ने यूँही उनके पीठ पर थपकी मारते हुए कहे की वे उन्हे यह नही सिखायेंगे । तिरुमलै आऴ्वार सात्विक होने के कारण उन्होने अपने अनुचरों को इशारा करते हुए कहा की कूरकुलोत्त्मदास के प्रतिक्रिया को भूल जाए और इस तरह तिरुमलै आऴ्वार उस स्थान से प्रस्थान हुए । तिरुमलै आऴ्वार ने अपने पालक माता श्री से इस घटना का वर्णन किया तो उन्होने उनको पिळ्ळैलोकाचार्य से उनके सम्बंध को याद करया और उसके पश्चात यह सोचने लगे की उन्होने क्या खोया और यही सोचते रह गए । कई दिनो बाद फिर से तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है जब वे एक हाथी पर बैठकर भ्रमण कर रहे थे ।  इस समय तिरुमलै आऴ्वार तुरन्त उतरकर उनके समक्ष दण्डवत प्रनाम करते हुए उनसे विनम्रतापूर्वक सीखने की इच्छा व्यक्त किये । यह देखकर कूरकुलोत्तमदास ने उनको स्वीकार किया और सिखाने का कार्य स्वीकृत किया । तिरुमलैयाऴ्वार अपने आचार्य कूरकुलोत्तम दास के लिये एक अग्रहार (यानि ऐसा विशेष भूमि जिसे एक उपयुक्त और सक्षम ब्राह्मण को दिया जाता था ) का व्यवस्था कर उनसे प्रतिदिन सीखने लगे और यहाँ श्री कूरकुलोत्तम दासजी अपना नित्यकैंकर्य करने लगे जैसे तिरुवाराधन इत्यादि । तिरुमलैयाऴ्वार प्रशानिककार्यों मे व्यस्त होने की वजह से उन्होने श्री कूरकुलोत्तम दासजी को विनम्र होकर निवेदन किये की जब वे जिस समय तिरुमान्काप्पु (तिलक) को लगाते है उस समय उनसे मिलने हर रोज़ आए । श्री दासजी ने यह स्वीकार किया और उनसे मिलने हर रोज़ आने लगे । पहले दिन उन्होने देखा की –  श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के तनियन् का पाठ करते हुए तिरुमलैयाऴ्वार तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रभंधो का सारांश ज्ञान देने लगे । इसि दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशानिककार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपन शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशानिककार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरणकमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये ।

अनुवादक टिप्पणि – नम्पिळ्ळै ने ईडुव्याख्यान ईयुण्णिमाधवपेरुमाळ को सौंपा उसके बाद जिन्होने अपने सुपुत्र ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ को यह ग्रंथ सिखाया । नलूरपिळ्ळै श्री ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ के प्रत्यक्ष शिष्य थे जिन्होने पूर्णरूप से इस दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सीखा और बाद मे जिन्होने अपने पुत्र श्री नालूराच्चानपिळ्ळै को सिखाया ।  इसी दौरान श्री देवपेरुमाळ नालुरपिळ्ळै को ज्ञात कराते है की वे श्री तिरुमलैयाऴ्वार को शेष तिरुवाय्मोऴि शब्दार्थ सहित सिखाये । श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने कहा – कोई अन्य क्यों अपने सुपुत्र को हम यह कार्य सौंपते है क्योंकि अगर वह सिखाये तो वह आपके सिखाने के बराबर होगा और फिर भगवान अन्तर्धान होए गये । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को स्वीकार किये और उन्होने श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे ।

नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मुल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै ।

तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है । वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया ) । इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरि लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरि के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरित चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुत कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए ।

इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै तिरुवन्तपुरम् जाकर श्री विळान्चोलैपिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखने हेतु रवाना हुए । विळान्चोलैपिळ्ळै श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के प्रसिद्ध और करीबी शिष्य माने गये है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै का आगमन जानकर अपने आचार्य पर एक चित्त और एकाग्र होकर और श्री पिळ्ळैलोकाचार्य पर ध्यान करते हुए श्री विळान्चोलैपिळ्ळै ने पूर्णरूप से तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को रहस्य ग्रंथ सिखाये और अपने कृपा के पात्र बनाकर उन्हे वरदान दिये । इसके बाद श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै फिर आऴ्वार तिरुनगरि को लौट जाते है । कुछ समय बाद श्री विळान्चोलैपिळ्ळै अपन देह त्यागने की इच्छा व्यक्त करते है और तुरन्त ही परमपद को प्रस्थान होकर अपने आचार्य के दिव्यचरणकमलों की सेवा मे संलग्न होते है । श्री विळान्चोलैपिळ्ळै के चरमकैंकर्य श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै स्वयम दिव्यभव्य रूप से करते है ।

कुछ समय बाद श्री पेरियपेरुमाळ ( भगवान श्रीमन्नारायण ) अपने नित्यसुरी सेवक श्री आदिशेष को आज्ञा देते है की वे फिर से इस भौतिक जगत मे अवतार ले और उनका कर्तव्य यह है की वे बहुत सारे बद्ध जीवात्माओं को परमपद लाये । श्रीमन्नारायण के वचन सुनकर श्री तिरुवनन्ताऴ्वान ने यह सेवा स्वीकृत किया और इस भौतिक जगत मे तिगऴकिडन्तान् तिरुनाविरुडयपिरान और श्रीरंगनाच्चियार के पुत्र (श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार) के रूप मे इप्पासि तिरुनक्षत्र मे प्रकट हुए जो चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों मे से गोमदाऴ्वान के वंशज थे । उनका पालन पोशन उनकी माताश्री ने स्वयम सिक्किल्किदारम् मे किया था जहाँ उन्होने सामान्य शास्त्र और वेदाध्ययन अपने पिताश्री से सीखा था । तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि  के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्णप्रेमभक्तिभाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है ।

अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य ने पेरियनम्बि (परांकुश दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया उसी प्रकार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै (शठगोप दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया । श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ के विशेष अनुग्रह और दिव्यकैंकर्य कोशिशें से वर्तमान आऴ्वारतिरुनगरि प्रचलित रूप मे है । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अपना जीवन केवल नम्माऴ्वार और तिरुवाय्मोऴि का प्रचार प्रसार करने के लिये समर्पित किया जो केवल श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के दिव्यवचनों पर आधारित है और इस प्रकार से प्राप्त शिष्यों को श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ को सौंपकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के दिव्यकैंकर्य की बदौलत ईडु व्याख्यान हमारे लिये उपलब्ध है जिसका प्रसार प्रचार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने सर्वोच्च शिखर पर किया ।

चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

तनियन

नमः श्रीशैलनाथाय कुन्ती नगर जन्मने । प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैंकर्यशालिने ॥

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य अऴगियमणवाळपेरुमाळ के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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