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About sarathyt

Disciple of SrImath paramahamsa ithyAdhi pattarpirAn vAnamAmalai jIyar (29th pattam of thOthAdhri mutt). Descendant of komANdUr iLaiyavilli AchchAn (bAladhanvi swamy, a cousin of SrI ramAnuja). Born in AzhwArthirungari, grew up in thiruvallikkENi (chennai), presently living under the shade of the lotus feet of jagathAchArya SrI rAmAnuja, SrIperumbUthUr. Learned sampradhAyam principles from vELukkudi krishNan swamy, gOmatam sampathkumArAchArya swamy and many others. Full time sEvaka/servitor of SrIvaishNava sampradhAyam. Taking care of koyil.org portal, which is a humble offering to our pUrvAchAryas. koyil.org is part of SrI varavaramuni sambandhi Trust (varavaramuni.com) initiatives.

नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

nampillai-goshti1श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी- श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी बायें से तीसरे

तिरुनक्षत्र: अश्विनी, धनिष्ठा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: उनके पिता (भट्टर स्वामीजी), श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी

शिष्य: वलमझगियार

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी, पिष्टपसु निर्णयम, अष्टाक्षर दीपिकै,   रहस्य त्रय, द्वय पीतक्कट्टु, तत्त्व विवरणम, श्रीवत्स विंशति, आदि।

वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र या पोते हैं। उनका नाम उत्तण्दा भट्टर रखा गया और तत्पश्चात वे नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर स्वामीजी नाम से प्रसिद्ध हुए। ध्यान देना: पेरिय तिरुमुडी अडैवु में यह लिखा गया है कि वे श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र हैं और ६००० पड़ी गुरु परम्परा प्रभावं में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का पोता कहा गया है। पट्टोलै में उन्हें श्रीवेदव्यास भट्टर का परपोता कहा गया है। उनकी पहचान के बारें में बहुत सही जानकारी कहीं भी नहीं है परंतु वें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के अति प्रिय शिष्य हुये।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का समय श्रारंगम में श्रीवैष्णवों के लिये बहुत आनंदमय और सुनहरा समय कहा गया है निरन्तर भगवद् अनुभव के कारण बिना कोई बाधा के, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के बहुत शिष्य और अनुयायी थे जो उनके कालक्षेप में नियमित से उपस्थित होते थे। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति ज्यादा अच्छा भाव नहीं था। अमीर परिवार से होने के कारण उनमे अभिमान आ गया था और प्रारम्भ में वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का आदर भी नहीं करते थे।

एक बार श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी राजा के दरबार में जा रहे थे। राह में वे श्रीपिन्बळगिय पेरुमाल जीयर से मिलते हैं और उन्हें भी राजा के दरबार में चलने के लिये न्योता देते हैं। क्योंकि उनके पारिवारिक परम्परा के कारण जीयर स्वामीजी को भट्टर स्वामीजी के परिवार के प्रति आदर था इसलिये वह उनके साथ चले गए। राजा ने उनको सम्मान देकर उनके हिसाब से आसन दिया। क्योंकि राजा अच्छा शिक्षित था भट्टर की समझधारी परखना चाहते थे और उन्हें श्रीरामायण से एक प्रश्न पूछा। वे कहते हैं “श्रीराम स्वयं कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। परन्तु श्रीजटायुजी के अंतिम समय में श्रीराम यह मंगल कामना करते हैं कि वह श्रीवैकुंठ पहुँच जाये। यह अंतर्विरोधी है?”। भट्टर शान्त हो गये और कुछ भी अच्छा अर्थ सहित न समझा सके। कुछ कार्य के कारण राजा का ध्यान दूसरी तरफ चला गया। उस समय भट्टर ने जीयर स्वामीजी के पास जा कर पूछा “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इसे कैसे समझाते थे?”। जीयर उत्तर देते हैं “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी” इसे ‘सत्येना लोकान जयति’ श्लोक से समझाते हैं| इसका अर्थ है, एक पूर्ण सत्यवादि मनुष्य सभी संसार का नियंत्रण कर सकता है – इसलिये केवल उनके सच्चाई के ही कारण वह संसार पर विजयी हो सकते हैं। जब राजा पुन: इधर ध्यान करते हैं ,भट्टर जो समझदार थे , राजा को यह बात समझाते हैं और राजा उसी क्षण उस तत्व को स्वीकृत कर भट्टर का बहुत धन के साथ सम्मान करते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति कृतज्ञ होकर भट्टर , जीयर को उन्हें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से जोड़ने के लिये कहते हैं और उसी क्षण श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर वह राजा द्वारा प्रदान सारा धन श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। भट्टर, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “मैंने यह सारा धन आपके केवल १ वर्णन से प्राप्त किया है” और सारा धन उन्हें अर्पण कर देते हैं। इसके पश्चात वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “इतने समय तक मैं आपका अमूल्य साथ / संचालन से वंचित रहा। अभी से मैं आपकी ही सेवा करूँगा और आपसे सम्प्रदाय के तत्त्वों को सीखूँगा”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को गले लगाते हैं और सम्प्रदाय के तत्वों को सिखाते हैं।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को पूरी तरह श्रीसहस्त्रगीति का पाठ सिखाते हैं। भट्टर उसे सुबह सुनते अर्थ पर विचार कर हर रात में विस्तार से दस्तावेज बनाते। एक बार उपदेश समाप्त हो जाने के बाद वे उस व्याख्यान को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी को अच्छी तरह से देखते हैं (जो श्रीमहाभारत की तरह लम्बी है)। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी घबरा जाते हैं कि अगर इतने विस्तार से व्याख्या है तो लोग गुरु शिष्य के सीखने / सिखाने के तरीके को भूलकर , ग्रन्थ वाचन कर स्वयं ही किसी अंतिम निर्णय पर आ जायेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को समझाते हैं कि जब पिल्लान ६००० पड़ी व्याख्यान किये (विष्णुपुराण जितना बड़ा) तब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी से आज्ञा ली थी। परन्तु यहाँ भट्टर ने श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से व्याख्यान लिखने के लिये आज्ञा नहीं ली। हालाकि भट्टर ने कहा उन्होंने केवल दस्तावेज बनाया है जो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने कहा है|उन्होंने स्वयं अपने मन से कुछ नहीं लिखा। अन्त में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ग्रन्थ के प्रकाशन को न माने, इसको नष्ट कर दिया।

(ध्यान देना: यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में इस घटना को पहचाना गया कि जब आचार्य का परमपद होता है तो शिष्य / पुत्र को उनका सर मुंड़ाना होता है और बाकि और जो शिष्य नहीं हैं उन्हें मुख और शरीर के केश निकालना होता है। जब श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी परमपद को प्रस्थान करते हैं, श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी अपना सर मुंड़ाते हैं जैसे उनके बाकि शिष्य को करना चाहिये। भट्टर के एक भाई यह देखकर दु:खी होते हैं और उनसे शिकायत करते हैं यह कहकर कि श्रीकुरेश स्वामीजी के परिवार में जन्म लेकर क्यों कोई श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के लिये सर मुंड़ाता है। भट्टर अपने भाई को व्यंग्यात्मक ढंग से उत्थर देते हैं “ओ! मैंने श्रीकुरेश स्वामीजी के परम्परा का अपमान किया है। अब आप इसे कैसे सुधारेंगे?”। भट्टर के भाई ऐसे व्यंग्यात्मक शब्द ग्रहण नहीं कर सके और श्रीरंगनाथ भगवान के पास जाकर उनकी इस कार्य के लिये शिकायत करते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान भट्टर को बुलाकर अर्चक के जरिये पूछते हैं कि “जब मैं जीवित हूँ तुमने ऐसा क्यों किया?” (श्रीरंगनाथ भगवान अपने आप को पराशर भट्टर और उनके वंश के पिता मानते हैं)। भट्टर उत्थर देते हैं कि “कृपया मेरे इस अपचार को क्षमा करें”। और आगे कहते हैं “असल में मुझे तो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति सम्पूर्ण समर्पण होना चाहिये था क्योंकि यह प्राकृतिक है जो भी श्रीकुरेश स्वामीजी (श्रीवैष्णव के प्रति समर्पण) के वंश से आता है वह मुख और शरीर के केश निकालता है। बल्कि मैंने केवल अपना सर मुंडाया जो यह दिखाता है कि मैंने एक शिष्य / पुत्र के नाते बहुत कम अनुष्ठान किया है । क्या मेरे थोड़ा सा आदर के कारण आप नाराज हैं?” भट्टर का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति समर्पण देखकर श्रीरंगनाथ भगवान बहुत खुश होते हैं और भट्टर को तीर्थ, पुष्प माला और वस्त्र के साथ सम्मान करते हैं। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी की ऐसी महिमा थी।

इन व्याख्यानों में श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी शामिल घटना बतायी गयी है। इसे हम अब देखेंगे:

श्रीसहस्त्रगीति – ९.३ – श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ईडु प्रवेसं (प्रस्तावना) – इस पद में श्रीशठकोप स्वामीजी नारायण नम: (और मन्त्र) कि महिमा बताते हैं। मुख्य ३ व्यापक मन्त्र है (वह मन्त्र जो भगवान कि सर्व उपस्थिती दर्शाता है) वह है अष्टाक्षर (ॐ नम: नारायणाय), शदक्षरम (ॐ नम: विष्णवे) और ध्वाधसाक्षारम(ॐ नम: भगवते वासुदेवाय)। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि प्रणवम का अर्थ, नम: का अर्थ, भगवान का सर्व उपस्थिती आदि सभी ३ व्यापक मंत्रों में बताया गया है परन्तु आल्वारों के समीप तो नारायण मन्त्र हीं है। ध्यान: नारायण कि महत्वता मुमुक्षुप्पड़ी के शुरुवात में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बोलते हैं।

वार्ता माला में भी श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी से संबन्धित कुछ घटनाये हैं।

२१६ – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी एक बहुत सुन्दर वार्तालाप श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी और श्रीपश्चात् सुन्दर देशिक स्वामीजी के बीच अवतरण किया। देशिक स्वामीजी यह प्रश्न पूछते हैं कि “सभी मुमुक्षु आल्वार जैसे होने चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और भगवान के अनुभव में हीं रहना)। परन्तु फिर भी हममे में सांसारिक इच्छा होती है। हमें इसका परिणाम (परमपद में कैंकर्य प्राप्ति) कैसे प्राप्त होगा जो आल्वारों को प्राप्त हुआ?” श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते हैं “हालाँकी हमें वहीं उन्नति प्राप्त नहीं होगी जो आल्वारों को प्राप्त हुयी परन्तु अपने आचार्य कृपा से जो पवित्र है, भगवान हमारे मरने और परमपद पहूंचने से पहिले वही भाव (आल्वारों जैसी) हमारे में भी प्रगट करेंगे । इसलिये हमारे परमपद पहूंचने से पूर्व हम पवित्र हो जाएँगे और निरंतर भगवान का कैंकर्य करने की चाह रहेगी”।.

४१० – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी यह समझाते हैं कि एक श्रीवैष्णव को कैसे होना चाहिये:

संसारियों का दोष देखते समय उनको सुधारने के लिये हम भगवान की तरह उतने सक्षम नहीं हैं इसीलिए उन्हें अनदेखा रहना चाहिये।

सात्विक जनों (श्रीवैष्णवों) में दोष देखते समय, क्योंकि वे पूरी तरह भगवान पर निर्भर हैं वे भगवान की कृपा से अपने को दोष मुक्त करने की क्षमता रखते हैं। हमे उन्हें उनदेखा रहना चाहिये।

जैसे कोई व्यक्ति अपने शरीर पर रसायनिक पदार्थ लगा लेता है तब अग्नि लगने पर भी उसे चोट नहीं लग सकती है वैसे ही हमें भगवद् ज्ञान से ढके हुए रहना चाहिये ताकि सांसारिक इच्छा और मुद्दों से हम प्रभावित नहीं हो सके।

हममें ज्ञान के दो पहलु होनी चाहिये- १) हमे परमपद पहुँचने की बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये जो पूर्णत: अध्यात्मिक है और २) हमे इस संसार बन्धन से छूटने की भी बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये (जो अज्ञानता का स्थान है)। अभी तक, इस संसार के बारे मे हमारा ज्ञान नादानी की अवस्था जैसे रहना बहुत जरूरी है, परंतु अगर हमे इस संसार से थोडासा भी लगाव रहा तो वह हमे नीचे खींच लेगा और हमे इस संसार मे ही रख लेगा।

अत: हमने श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी के जीवन के सुन्दर अंश देखे। वे बहुत बड़े विद्वान और श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। हम भगवान के चरण कमलों में यह प्रार्थना करते हैं कि हममें भी थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी तनियन :

लोकाचार्य पदासक्तं मध्यवीधि निवासिनं ।
श्रीवत्सचिन्नवंशाब्दिसोमम् भट्टारार्यम् आश्रये ।।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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तिरुवरङ्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमदवरवरमुनयेनम:
श्री वानाचलमहामुनयेनमः

Thiruvarangathu-Amudhanarतिरुनक्षत्र: हस्त , फाल्गुन

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: श्रीकुरेश स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

श्रीरंगामृत स्वामीजी पहले पेरिय कोइल नम्बी (श्रीरंग पूर्ण) के नाम से जाने जाते थे। वह श्रीरंगम मंदिर के अधिकारिक अभिभावक थे और पुरोहित (पुराण, वेद आदि पढते थे) का कार्य करते थे। शुरू में वह मंदिर का कार्य करने के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति अनुकूल नहीं थे जो मंदिर के कार्य में सुधार लाना चाहते थे। परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण की निर्हेतुक कृपा से उनके सम्बन्ध में सुधार हुआ और मंगल मनाया।

जब श्रीरंगनाथ भगवान (पेरिय पेरूमाल) ने श्रीरामानुज स्वामीजी को उडयवर घोषित किया और मंदिर के गतिविधि की व्यवस्था बहुत सही तरीके से करने को कहा तब श्रीरंगामृत स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को सरलता से मंदिर में प्रवेश नहीं दिया। श्रीरामानुज स्वामीजी असंतुष्ट हो गये और पहले उन्हें उस स्थान से निलम्बित करने का निर्णय किया। परन्तु एक दिन जब श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु के लिये इंतजार कर रहे थे तब भगवान उनके स्वप्न में आकर उन्हें यह बताया कि पेरिय कोइल नम्बी उन्हें बहुत प्रिय हैं क्योंकि उन्होंने उनकी बहुत समय तक सेवा की है।

फिर पेरिय कोइल नम्बी को शिक्षा और मार्गदर्शक देने के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी को नियुक्त करते हैं ताकि वह उनकी सेवा कर सके और उनकी सुधार के लिये अनुमति दे सके। श्रीकुरेश स्वामीजी की कृपा धीरे धीरे उन पर असर करना प्रारम्भ करती है और अन्त में पेरिय कोइल नम्बी श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य होने के लिये तैयार होते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी पेरिय कोइल नम्बी को सलाह देते हैं कि आप श्रीकुरेश स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार करें क्योंकि उन्होंने हीं आपको सुधारा है। पेरिय कोइल नम्बी को बाद मे श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा रंगामृत नाम प्रदान किया गया क्योंकि उनमे रस भरे तमिल पद्य लिखने की उत्तम क्षमता थी। बाद मे श्रीरंगामृत स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव हुआ।

श्रीरंगामृत स्वामीजी द्वारा पेरिय कोइल (श्रीरंगम) का अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी को सौंपना

जब श्रीरंगामृत स्वामीजी के माता का परमपद हुआ, ११वें दिन एक धार्मिक विधि एकोतिष्टम मनाया जाता है जहाँ एक मनुष्य को उस मृतक के देह समझा जाता है और भोजन अर्पण किया जाता है। भोजन के अन्त में पाने वाले से यह पूछा जाता है कि क्या वह संतुष्ट है और जब तक वह यह न कहे कि वह संतुष्ट है तब तक वह विधि सपन्न नहीं होती। इस विधि का मुख्य पहलू यह है कि जो यह प्रसाद पाता है उन दिनों में मंदिर के कैंकर्य में वह एक साल भाग नहीं ले सकता। श्रीरंगामृत स्वामीजी उच्च श्रीवैष्णव चाहते थे, इसलिये वें श्रीरामानुज स्वामीजी के पास गये और कहा ऐसा कोई व्यक्ति पहचानीये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसी पल श्रीकुरेश स्वामीजी को कहा कि इस उत्सव में भाग ले और श्रीकुरेश स्वामीजी ने भी खुश होकर इसे स्वीकार कर लिया। जब भोज समाप्त हुआ तो श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी से पूछे कि क्या वह संतुष्ट हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी कहे कि वह तभी संतुष्ट होंगे जब मंदिर का अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी के हाथों में सौंपा जायेगा। श्रीरंगामृत स्वामीजी ने एक ही पल में उसे स्वीकार कर लिया और अपनी वचनबद्धता पूर्ण करने के लिये मंदिर कि चाबी और अधिकार श्रीकुरेश स्वामीजी के जरिये श्रीरामानुज स्वामीजी के हाथों में दे दिये। उस समय श्रीरंगामृत स्वामीजी ने पुरोहित का कैंकर्य भी श्रीकुरेश स्वामीजी को दे दिया (अत: आज भी हम यह देख सकते हैं कि श्रीकुरेश स्वामीजी के वंशज श्रीरंगम में यह कैंकर्य कर रहे हैं)। क्योंकि श्रीरंगामृत स्वामीजी ने मंदिर का सारा कैंकर्य दे दिया था इसीलिए वें मंदिर के प्रति कम लगाव रखने लगे। यह देखकर श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुवरंगप्पेरूमाल अरयर के पास जाकर उन्हें इयर्पा का अधिकार देने के लिये विनती करते हैं। अरयर आभार प्रगट करते हैं और यह अधिकार श्रीरामानुज स्वामीजी को प्रदान करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी फिर बाद में इयर्पा श्रीरंगामृत स्वामीजी को सिखाते हैं और उन्हें इयर्पा का गायन हमेशा के लिये श्रीरंगम के मंदिर में प्रदर्शित करने के लिये कहते हैं और ऐसे श्रीरंगामृत स्वामीजी को भी भगवान के कैंकर्य में लगाया।

श्रीरामानुज नृत्तंदादि की उपस्थिति और बढाई

serthi-amudhanar-azhwan-emperumanarकुछ समय पश्चात श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी पर श्रीरामानुजनूत्तंदादि (१०८ पाशुर) लिखते हैं और उसे रंगनाथ भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्पण करते हैं। एक बार ब्रम्होत्सव के अंतिम दिन श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी को आज्ञा किये कि वह सवारी में उनके साथ न आये और सभी श्रीवैष्णव को सवारी में श्रीरामानुजनृत्तंदादि गाने के लिये कहते हैं – जो बाद में हर उत्सव में पालन करने की दिनचर्या बन गया।   भगवान कि इच्छा जानकर श्रीरामानुज स्वामीजी भी स्वयं श्रीरंगामृत स्वामीजी कि इस उच्च कार्य को अंगीकार किये और जिस तरह श्रीमधुरकवि स्वामीजी का कण्णिनुणशीरुताम्बू (जो श्रीशठकोप स्वामीजी कि बढाई करता है) को मुधलायिरं में शामिल किया गया है वैसे ही इसे इयर्पा के एक भाग में शामिल किया गया। यह प्रबन्ध प्रपन्न गायत्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ और श्रीरामानुज स्वामीजी सभी श्रीवैष्णवों को आज्ञा करते हैं कि इस प्रबन्ध को दिन में कम से कम एक बार गाना चाहिये उसी तरह जैसे ब्रम्होपदेश (वह जिसने यज्ञोपवित धारण किया है) लेनेवाले को गायत्री जप करना अनिवार्य है।

श्रीरामानुजनृत्तंदादि में श्रीरामानुज स्वामीजी का नाम सभी पाशुर में दिखाई देता है। इसलिये इसे श्रीरामानुजनूत्तंदादि भी कहते हैं । यह वह सब कुछ समझाता है जो एक आचार्य अभिमान निष्ठावाले (जो आचार्य कृपा पर हीं निर्भर रहते हैं) को समझना जरूरी है। यह प्रबन्ध यह स्थापित करता है कि जो आचार्य पर हमेशा केन्द्रित रहेगा उसे भगवद् सम्बन्ध सहज ही मिल जाता है और कोई विशेष प्रयत्न करने की कोई जरूरत नहीं होती है। इसीलिये हमारे सभी पूर्वाचार्य घोषित करते हैं कि हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों पर ही हमेशा निर्भर रहना चाहिये।

नदातूर अम्माल जो बहुत बड़े पंडितो में पंडित थे श्रीरामानुजनूत्तंदादि के दिव्य प्रबन्ध के पाशुर पेरोनृ मररिललाई (४५) और निंर वण् कीर्तियुम् (७६) से यह घोषणा किये कि श्रीरामानुज स्वामीजी ही उपाय और उपेय है।

पेरियवाच्चान पिल्लै के पुत्र नायनाराच्चान पिल्लै ने अपने कार्य चरमोपाय निर्णय में श्रीरामानुज स्वामीजी कि दिव्य महिमा बताने के लिये बहुत सुन्दर तरीके से श्रीरामानुजनूत्तंदादि का उपयोग किया।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुजनूत्तंदादि पर एक छोटी और बहुत सुन्दर व्याख्या लिखी है। शुरूवात के खण्ड मे उन्होंने श्रीरंगामृत स्वामीजी और श्रीरामानुजनूत्तंदादि पर  बहुत सुन्दर स्तुति लिखी है। जिसका भाव अब हम देखेंगे।

चरम पर्व निष्ठा (पूर्ण:त आचार्य पर निर्भर) मे तिरुमंत्र और सभी आल्वारों के पाशुरों का सार है। जो श्रीमधुरकवि स्वामीजी ने श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति बताई है। श्रीरंगामृत स्वामीजी ने भी श्रीमधुरकवि स्वामीजी जैसे ही अपने प्रबन्ध में श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति पूर्ण विश्वास प्रदर्शित किया। वह पुरी तरह श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा उनकी निर्हेतुक कृपा से और श्रीकुरेश स्वामीजी के अथक और निर्हेतुक कोशिश से ही सुधारे गये। जैसे श्रीमधुरकवि स्वामीजी ने अपनी आचार्य निष्ठा १० पाशुरों से बताई उसी तरह श्रीरंगामृत स्वामीजी ने अपनी आचार्य निष्ठा १०८ पाशुर द्वारा पूरे विवरण के साथ इस जगत के सभी लोगो के उद्धार के लिये और आचार्य निष्ठा जैसे मुख्य तत्व को समझाने के लिये, पालन करने के लिये और स्वयं के उद्धार के लिये लिखे।  श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह भी पहचाने कि जैसे यज्ञोपवित धारण किये हुए को गायत्री मंत्र उच्चारण करना चाहिये उसी तरह इसे प्रपन्न गायत्री कहा जाता है और उसे सभी श्रीवैष्णवों को प्रतिदिन गाना चाहिये।

श्रीरंगामृत स्वामीजी की दक्षता

श्रीरंगामृत स्वामीजी तमिल और संस्कृत में निपुण थे। इसका उन्हें दिव्य प्रबन्ध के पाशुर को प्रस्तुत करने के लिये बहुत उपयोग हुआ। हम एक उदाहरण देखेंगे:

तिरुविरुत्तं के ७२वें पाशुर में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीरंगामृत स्वामीजी का सुन्दर वर्णन लिखते हैं। इस पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी अंधेरी रात में भगवान के विरह में परांकुश नायिका के भाव में बहुत व्याकुल अनुभव करते हैं। सामान्यत: प्रेमी विरह दशा में रात में ज्यादा व्याकुल होते हैं । उस समय एक छोटा अर्धचंद्राकार चाँद दिखाई पड़ता है और अंधेरे को थोड़ा सा तोड़ देता है। जब प्रेमी मिलते हैं तो चाँद कि थंडी छाव आनंददायक होती है विरह में बहुत दु:ख दायक होती है। फिर परांकुश नायिका सोचती है कि अंधेरा ही अच्छा था और अब ठंडे अर्धचंद्राकार चाँद के साथ उनको भगवान के प्रति सोचते हुए अपने भाव को नियंत्रण में करना मुश्किल हो रहा है। यह समझाने के लिये श्रीरंगामृत स्वामीजी बड़ी सुंदरता से एक कथा प्रस्तुत करते हैं। एक बार एक नाजुक हृदय वाले ब्राम्हण रात्री में जंगल से गुजर रहे थे। उनके पीछे एक जंगली मनुष्य लग गया और किसी तरह वे उससे बचकर एक पेड़ पर चढ गये। उस जंगली मनुष्य ने ब्राम्हण का इंतजार किया कि वो नीचे आयेगा और भोजन बनेगा पर वह ब्राम्हण डरा हुआ था। उस समय एक बाघ उस जंगली मनुष्य के पीछे लगकर उसे मार कर खा लेता है। उसे मारने के पश्चात वह बाघ उपर उस ब्राह्मण को देखता है और उसके नीचे आने का और उसे खाने का इंतजार करता है। अब वह ब्राह्मण इस डर के साथ कि बाघ उसे खा लेगा पहले से भी ज्यादा घबरा जाता है और कांपने लगता है। उसी तरह परांकुश नायिका पहले अंधेरे से डर रही थी और बाद में थंडी अर्धचंद्राकार चाँद से ज्यादा घबरा गयी ऐसा श्रीरंगामृत स्वामीजी समझाते हैं।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीरंगामृत स्वामीजी

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को श्रीरीकुरेश स्वामीजी का पुत्र होने में बहुत अभिमान था। वह स्वयं अपने सहस्त्रनाम में यह घोषणा करते है कि वह श्रीकुरेश स्वामीजी के कुल मे जन्म लिए हुए हैं जिनके पास श्रीरामानुज स्वामीजी के सम्बन्ध का बहुत बड़ा धन था। श्रीरंगामृत स्वामीजी का भी श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ सम्बन्ध था जिसे उन्होंने श्रीरामानुजनूत्तंदादि के ७वें पाशुर मे बताया। एक बार श्रीरंगामृत स्वामीजी बहुत उत्साह से श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को दूसरे श्रीवैष्णव के साथ यह सन्देश देते हैं कि “आपका श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ केवल देह सम्बन्ध है परन्तु मेरा तो उनके साथ बौद्धिक सम्बन्ध है”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी “बहुत अच्छा है! परन्तु तुम इसकी बढाई स्वयं न करो” ऐसा उत्तर देते हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी का सम्बन्ध ऐसा महान है कि वह श्रीरंगामृत स्वामीजी को गर्व से ऊंचा कर देता है। परन्तु इस विषय में एक बड़ी अच्छी बात हमारे पूर्वाचार्यों है कि वों कभी इन विषयों को चर्चा से आगे नहीं बढ़ाते थे और दूसरे के प्रति दुर्भावना नहीं रखते थे। मुद्दों को सुलझाते थे और बहुत उदार तरीके से यही बात हमे इन घटनाओं से समझना चाहिये। हमें अपने पूर्वाचार्यों के प्रति अभिमान होना चाहिये कि उन्होंने ऐसी बात भी सच्चाई के साथ हमें बताई नाकी हमसे छुपाई जो वे आसानी से कर सकते थे।

अन्त में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने सुन्दर आर्ति प्रबन्ध के ४०वें पाशुर में यह पहचानते हैं कि संसार बन्धन के खारे समुद्र में डूबने से अच्छा श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल के शरण होना, उनके प्रिय भक्तों के साथ हमेशा समय बिताना और निरंतर श्रीरामानुजनूत्तंदादि को गाना / ध्यान करना।

अत: हमने श्रीरंगामृत स्वामीजी के सुन्दर जीवन के कुछ झलक देखी है। वह पूरी तरह भागवत निष्ठा में रहते थे और श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी को बहुत प्रिय थे। हम उनके चरण कमल में यह विनंती करते हैं कि हम में थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीरंगामृत स्वामीजी कि तनियन :

मूंगिलकुडि अमुदन् प्रपन्नगायत्रीकवि:

श्रीवत्साङ्गुरोश्शिष्यं रामानुज – पदाश्रितम् |
मीनहस्ता – समुभ्दूतं श्रीरंगामृतमाश्रये ||

अदियेन् गोदा रामानुजदासी

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कोयिल् कोमाण्डूर् इळैयविल्लि आच्चान् (श्रीबालधन्वी गुरु)

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

komandur-ilayavilli-achanश्रीबालधन्वी गुरु– सेम्पोंसे कोइल, तिरुनांगूर

तिरुनक्षत्र: अश्लेषा नक्षत्र, चैत्र मास

अवतार स्थल: कोमाण्डूर

आचार्यश्री रामानुज स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: तिरूप्पेरूर

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई (श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के जैसे) थे। उन्हें श्रीबालधन्वी गुरु के नाम से बुलाते थे। इळैयविल्लि / बालधन्वी का अर्थ श्री लक्ष्मणजी है – उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि सेवा की, उसी तरह जैसे श्री लक्ष्मणजी ने श्रीरामजी कि सेवा की। वह श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा स्थापित ७४ सिंहासनाधिपति में एक हैं।

आपकी तनियन और वाली तिरुनामं से यह सिखा जाता है कि आप श्री शैलपूर्णा स्वामीजी से जुड़े हुए थे और आपने उनकी बहुत सेवा भी की थी।

चरमोपाय निर्णय में श्री नायनाराच्चान् पिल्लै ने श्रीबालधन्वी गुरु (श्री इळैयविल्लि) के महिमा को दर्शाया है। इसे हम अब देखेंगे।

जब श्री रामानुज स्वामीजी परमपद के लिये प्रस्थान किया उनके अनेक शिष्यों ने उनके वियोग में अपने प्राण त्याग दिया। श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान रामानुज स्वामीजी के शिष्य थे, कुछ समय के लिये कैंकर्य हेतु अपने गाँव कणीयनूर में विराजमान थे। कुछ दिनों बाद श्रीरंगम की ओर श्री रामानुज स्वामीजी के पास उनकी सेवा के लिये जा रहे थे। जाते समय रास्ते में किसी श्रीवैष्णव से उन्होंने अपने आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी के स्वास्थ के बारे में पूछा। तब श्रीवैष्णव ने श्री रामानुज स्वामीजी के परमपद गमन का समाचार सुनाया। यह सुनते ही उसी क्षण श्रीकनीयनूर सीरियाच्चान ने “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” (श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविंदोंकि शरण ग्रहण करता हूँ) कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया।

श्री इळैयविल्लि तिरुप्पेरूर में विराजमान थे। एक दिन उनके स्वप्न में श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर आकाश की ओर बढ़ रहे थे। परमपदनाथ भगवान हजारों नित्यसूरीगण, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीनाथमुनी स्वामीजी और अनेक आचार्यागण वाद्य गान करते हुये श्री रामानुज स्वामीजी का परमपद में स्वागत कर रहे हैं। वह यह देख रहे थे श्री रामानुज स्वामीजी का विमान परमपद की ओर प्रस्थान कर रहें हैं और सब उनके पीछे जा रहे हैं। वे  निद्रा से उठे और उनको पता चल गया कि क्या हुआ है। वह अपने पड़ोसी को बताते हैं “वळ्ळल् मणिवण्णं” कि “हमारे आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी दिव्य विमान में विराजमान होकर परमपद कि ओर प्रस्थान कर रहे हैं और उनके साथ परमपदनाथ और नित्यसुरी भी हैं”। मैं उनकी अनुपस्थिति में यहाँ नहीं रह सकता। “एम्पुरुमानार तिरुवडिगले शरणम” कहकर परमपद के लिये प्रस्थान किया। ऐसे अनेक शिष्य थे जो श्री रामानुज स्वामीजी का वियोग सहन नहीं कर सके ओर अपना शरीर त्याग दिया। जो शिष्य श्री रामानुज स्वामीजी के अंतिम समय में उनके साथ थे उनको स्वामीजी ने आज्ञा दिया कि मेरे वियोग में शरीर त्यागना नहीं, आगे तुम लोगों को ही सम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करना है। स्वामीजी की आज्ञा का पालन करते हुये अनेक शिष्यजन कैंकर्य मे लग गये। यहाँ आचार्य के वियोग में शिष्यजन अपना शरीर त्यागते है, यह श्री रामानुज स्वामीजी के वैभव को प्रकाशित करता है।

हमने यहाँ पर श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि) के जीवन के कुछ सुन्दर बातें देखी। वह पूरी तरह भागवत निष्ठा में अटल थे ओर स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी को प्रिय थे। हम उनके चरणारविन्द में यह प्रार्थना करते हैं कि हम में भी कुछ भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीबालधन्वी गुरु (इळैयविल्लि ) की तनियन:

श्री कौसिकान्वया महाभूथि पूर्णचन्ध्रम
श्री भाष्यकार जननी सहजा तनुजम
श्री शैलपूर्ण पद पंकज़ सक्त चित्तम
श्री बालधन्वी गुरुवर्यम अहं भजामी

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

Source: https://guruparamparai.wordpress.com/2013/04/03/koil-komandur-ilayavilli-achan/

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मुदलियाण्डान् (दाशरथि स्वामीजी)

श्री:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद् वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

mudhaliyandan

तिरुनक्षत्र: पुनर्वसु, मेष मास

अवतार स्थल: पेट्टै

आचार्य: श्री रामानुज स्वामीजी

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: धाटी पंचकम, रहस्य त्रयं (अब उपलब्ध नहीं हैं)

आनन्द दीक्षितर और नाचियारम्मा के पुत्र के रूप में जन्में आपश्री का नाम दाशरथि रखा गया । ये श्री रामानुज स्वामीजी के सम्बन्धीक हैं। आप रामानुजन पोण्णदि, यतिराज पादुका, श्रीवैष्णव दासर, तिरुमरुमार्भन और मुदलियाण्दान (यानि श्रीवैष्णवों में मार्ग दर्शक) के नाम से अधिक विख्यात हुए। आप श्री रामानुज स्वामीजी के चरण पादुका और त्रिदण्ड के नाम से भी जाने जाते हैं।

नोट : श्री कुरेश स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी को इतने प्रिय थे कि वह उनसे कभी अलग हो ही नहीं सकते थे – श्री कुरेश स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के जल पवित्रं (श्री रामानुज स्वामीजी के त्रिदण्ड पर जो झण्डा लगा हैं) से जाने जाते हैं।

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श्री कुरेश स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री दाशरथि स्वामीजी – अपने अपने जन्म स्थान से

श्री रामानुज स्वामीजी श्री दाशरथि स्वामीजी को उनके भगवद् / भागवत निष्ठा (भगवान और उनके भक्तों के प्रति स्नेह) के कारण बहुत पसन्द करते थे। जब श्री रामानुज स्वामीजी ने सन्यास लिया तब उन्होंने यह घोषणा की कि उन्होंने सब कुछ त्याग किया, सिवाय दाशरथि ऐसी श्री दाशरथि स्वामीजी की महिमा थी। श्री रामानुज स्वामीजी के सन्यास ग्रहण करते ही श्री कुरेश स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी उनके पहले शिष्य बने। दोनों ने शास्त्र (उभय वेदान्त – संस्कृत और अरूलिच्चेयल) और उसके तत्व को श्री रामानुज स्वामीजी से ही सीखा। जब श्री रामानुज स्वामीजी कांचीपुरम से श्रीरंगम के लिये प्रस्थान किया तो वह दोनों भी उनके साथ निकल गये। श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञानुसार श्री दाशरथि स्वामीजी ने मंदिर के देख रेख का शासन पूर्णत: अपने हाथों में लिया और यह सुनिश्चित किया कि मंदिर का सभी कार्य सही तरीके से हो रहा है।

जब श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी को चरम श्लोक का अर्थ समझाया तब श्री दाशरथि स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी से यह उन्हें भी सिखाने के लिये प्रार्थना की। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के पास जाकर उनसे प्रार्थना करने के लिये कहा। श्री दाशरथि स्वामीजी श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के तिरुमाली में ६ महीने रहकर उनकी विनम्रता पूर्वक सेवा की। ६ महिने के पश्चात् जब श्री दाशरथि स्वामीजी ने श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को चरम श्लोक का अर्थ सिखाने के लिये प्रार्थना कीया तो स्वामीजी ने कहा कि श्री रामानुज स्वामीजी ही स्वयं उन्हें सिखायेंगे एक बार उनमें पूर्णत आत्म गुण आ जाये। श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने अपने चरण कमल श्री दाशरथि स्वामीजी के मस्तक पर रखा और जाने के लिये कहा। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को आते देख उनके भाव से बहुत खुश हुये और एक ही बार में उन्हें चरम श्लोक का श्रेष्ठ अर्थ समझाया।

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श्री दाशरथि स्वामीजी का श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति पूर्णत: समर्पण इस चरित्र के द्वारा समझा जा सकता है। एक बार श्री महापूर्ण स्वामीजी की बेटी श्री अतुलांबाजी अपने सास के पास जाती है और कहती है कि नदी में स्नान करने के लिये जाते समय उनके साथ कोई आए सुरक्षा / सहयोग के हिसाब से। उनकी सास कहती है “तुम्हें स्वयं अपने साथ सहायक को लाना होगा”। श्री अतुलांबाजी अपने पिताजी के पास जाकर उनसे एक सहायक का प्रबन्ध करने के लिये कहती है। श्री महापूर्ण स्वामीजी कहते हैं क्योंकि वे पूर्णत: श्री रामानुज स्वामीजी पर निर्भर हैं, उन्हें उनके पास जाकर ही विनती करनी होगी। श्री रामानुज स्वामीजी इधर उधर देखते हैं और श्री दाशरथि स्वामीजी को देखकर उन्हें श्री अतुलांबाजी के साथ सहायक के तौर पर जाने के लिये कहते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी आनंदित होकर अपने आचार्य की आज्ञा का पालन करते हुए श्री अतुलांबाजी के साथ चले गये। वह निरन्तर उनकी मदद करते थे। श्री अतुलांबाजी के ससुरालवाले श्री दाशरथि स्वामीजी (जो बड़े विद्वान और श्री रामानुज स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों मे से एक) को उनके तिरुमाली में इतना नीच काम करते देख दु:खी होने लगे और उन्हें यह बन्द करने के लिये कहा। श्री दाशरथि स्वामीजी ने तुरन्त कहा कि यह श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञा है और वह इसका पालन करेंगे। वह तुरन्त श्री महापूर्ण स्वामीजी के पास जाते हैं जो उन्हें श्री रामानुज स्वामीजी के पास भेजते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी ने कहा “आपको एक सहायक की जरूरत थी और मैंने एक भेज दिया अगर आपको वह नहीं चाहिये तो उसे वापस भेज दीजिये”। उनको अपनी गलती का एहसास हो गया और श्री दाशरथि स्वामीजी को उनके यहाँ काम करने से रोक दिया। उनको श्री महापूर्ण स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री दाशरथि स्वामीजी और श्री अतुलांबाजी की महिमा का पता चला और फिर उन्होंने श्री अतुलांबाजी का अच्छा ध्यान रखा। यह घटना श्री दाशरथि स्वामीजी की बढाई को दर्शाता है जहाँ वह अपने आचार्य के शब्दों का पूरी तरह पालन करते हैं। हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि अगर कोई श्री रामानुज स्वामीजी के चरण पादुका घोषित हैं तो उसमे यह सब अच्छे गुण होना चाहिये और श्री दाशरथि स्वामीजी इन सब अच्छे गुणों के सारसंग्रह थे।

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शैव राजा के अत्याचार से श्री दाशरथि स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी के साथ मेलकोटे (तिरुनारायणपुरम) का भ्रमण किया। मितुलापुरी सालग्राम नामक एक जगह में बहुत लोग रहते थे जो वैदिक धर्म के खिलाफ थे। श्री रामानुज स्वामीजी ने श्री दाशरथि स्वामीजी को कहा नदी के उस स्थान को अपने चरणों से स्पर्श करें जहाँ से नदि उस गाँव में आती है और लोग वहाँ स्नान करते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी कृपा करते हैं और जब उस नदी में स्नान करते हैं जो अब श्री दाशरथि स्वामीजी के श्रीपाद का सम्बन्ध हैं सभी पवित्र हो जाते हैं। अगले दिन सभी श्री रामानुज स्वामीजी के पास आकार उनके शरण हो जाते हैं। अत: हम यह समझ सकते हैं कि पवित्र श्रीवैष्णव के श्रीपाद तीर्थ से सब लोग पवित्र हो जाते हैं।

कंडादै आण्डान् जो श्री दाशरथि स्वामीजी के पुत्र हैं श्री रामानुज स्वामीजी की आज्ञा लेकर उनके लिये एक अर्चा विग्रह बनाते हैं। श्री रामानुज स्वामीजी इस विग्रह को गले से लगाते हैं और इस पर बहुत प्रेम आता है। यह विग्रह बाद में उनके अवतार स्थल श्रीपेरुंबूतूर में तै पुष्यम (यह दिन आज भी श्रीपेरुंबूतुर में गुरु पुष्यम नाम से मनाया जाता है) के दिन रखते हैं। यह विग्रह स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी को पसन्द थी।

श्री दाशरथि स्वामीजी के उपदेशों और कीर्ति व्याख्यानों के बहुत जगह में प्राप्त हैं। हम उनमे से कुछ अब देखेंगे।

  • सहस्त्रगीति २.९.२ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- श्री दाशरथि स्वामीजी की उदारता को यहाँ इस घटना में बहुत सुन्दरता से प्रकट किया है। एक बार श्री दाशरथि स्वामीजी के एक शिष्य श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी के पास जाता है उस समय श्री दाशरथि स्वामीजी नगर से बाहर गये हुये थे। श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी उस श्रीवैष्णव से कैंकर्य लेना स्वीकार करते हैं और यह सोचकर कि उसे आचार्य सम्बन्ध प्राप्त नहीं हुआ है उसे पञ्च संस्कार की दीक्षा देते हैं और उसे अच्छा ज्ञान भी देना शुरू कर देते हैं। जब श्री दाशरथि स्वामीजी लौट कर आते हैं वह श्रीवैष्णव भी लौट कर उनकी सेवा करने लगता है। जब श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी को यह पता चलता है तो वह दौड़ कर जाकर श्री दाशरथि स्वामीजी से कहते हैं “मुझे यह नहीं पता था कि वह आपका शिष्य है और मुझे इस अपचार के लिये क्षमा कीजिए”। श्री दाशरथि स्वामीजी शान्त रीति से उत्तर देते हैं “अगर कोई कुवें में गिरता है और उसे दो लोग बाहर निकालते हैं तो वह बहुत आसानी से बाहर आजायेगा। उसी तरह यह व्यक्ति संसार में है अगर हम दोनों इसे बाहर निकाले तो यह फायदा ही है”। इस तरह का पवित्र हृदय देखना बहुत मुश्किल है जो हमें श्री दाशरथि स्वामीजी में निरन्तर देखने को मिलता है।
  • सहस्त्रगीति ३.६.९ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- इस पदिगा में भगवान के अर्चावतार के कीर्ति को दर्शाया गया है। श्री दाशरथि स्वामीजी यह समझाते हैं कि “यह मत सोचो कि परमपदनाथ अर्चावतार का रूप यहाँ अपने भक्तों को खुश करने के लिये लेते हैं बल्कि यह सोचो कि यह भगवान का अर्चावतार बहुत महत्त्व का है और वह स्पष्ट है कि वो ही परमपद में परवासुदेव है”।
  • सहस्त्रगीति ५.६.७ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- इस पादिगा में भगवान का सर्व व्यापकत्व समझाया गया है। यहाँ परांकुश नायकी (श्री शठकोप स्वामीजी एक कन्या के भाव में) कहते हैं कि भगवान अपने संबंधियों का भी नाश कर देते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी इसकी एक सुन्दर व्याख्या करते हैं “भगवान अपनी पवित्र सुन्दरता दिखा कर” (जो उनकी तरफ आकर्षित होते हैं) उन्हें पूरी तरह पिगला देते हैं- नाश करते हैं।
  • सहस्त्रगीति ६.४.१० – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- यहाँ श्री दाशरथि स्वामीजी का अर्चावतार के प्रति लगाव और चिन्ता श्री कलिवैरिदास स्वामीजी समझाते हैं। श्री कलिवैरिदास स्वामीजी श्री वेदान्त स्वामीजी का वर्णन बताते हैं जिसमे श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी हैं। इस संसार में बहुत से लोग हैं जो भगवान को पसन्द नहीं हैं। अर्चावतार भगवान बहुत मृदु स्वभाव के हैं और अपने आप इन भक्तों पर ही पूर्णत: निर्भर रखते हैं। ब्रह्मोत्सव के सामापन के बाद श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी और श्री दाशरथि स्वामीजी मिलते हैं, एक दूसरे को आदर देते हैं, गले लगाते हैं और खुशी प्रकट करते हैं कि श्रीरंगनाथ भगवान उत्सव के बाद अपने आस्थान में सुरक्षित पहुँच गये हैं। वह अपने पूर्वाचार्यों के स्वभाव को, जो हमेशा भगवान के मंगलाशासन के तरफ ध्यान देते थे, सच मानते थे।
  • सहस्त्रगीति ६.४.१० – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- जब पराशर भट्टर स्वामीजी श्री कुरेश स्वामीजी से “सिरुमामनिसर” (सिरु यानि छोटा और मा यानि बड़ा – कैसे एक हीं व्यक्ति में छोटा और बड़ा आता है) के बारें पूछते हैं तब श्री कुरेश स्वामीजी कहते हैं श्री दाशरथि स्वामीजी, श्री देवराजमुनि स्वामीजी और श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी अवस्था में छोटे हैं (और हमारे जैसे ही हैं भोजन पर निर्भर अपना जीवन चलाने के लिये) परन्तु भगवान के प्रति भक्ति में वें नित्य सुरियों से भी बड़े हैं- इस तरह छोटा और बड़ा दोनों गुण एक हीं व्यक्ति में हैं।
  • सहस्त्रगीति ९.२.८ – श्री कलिवैरिदास ईडु व्याख्यान- श्रीरंगम में श्रीजयन्ती पुरप्पादु के समय वंगीप्पुरतु नम्बी अहीर गोप कन्याओं के समुह में मिलकर वहाँ भगवान की पुजा करते हैं। श्री दाशरथि स्वामीजी उनसे पूछते हैं कि उन्होंने क्या कहा जब वह उस समुह में थे। नम्बी कहते हैं “मैंने कहा विजयस्व”। श्री दाशरथि स्वामीजी कहते हैं जब आप उन गोप कन्याओं के समुह में हैं तब आप उन्हें उनकी भाषा में बढाई करना था नाकि कठिन संस्कृत में।

इस तरह हमने श्री दाशरथि स्वामीजी के सुन्दर जीवन के बारें में कुछ देखा। वह पूर्णत: भागवत निष्ठावाले थे और स्वयं श्री रामानुज स्वामीजी के करीब थे। हम उनके चरण कमलों में प्रार्थना करते हैं कि थोड़ी सी हम में भी भागवत निष्ठा आ जायें।

श्री दाशरथि स्वामीजी कि तनियन

पादुके यतिराजस्य कथयन्ति यदाख्यया
तस्य दाशरथे: पादौ शिरसा धारयाम्यहम्

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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