आळ्वार

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

भुतम् सरश्च महदाह्वय भट्टनाथ
श्री भक्तिसार कुलशेखर योगिवाहान्
भक्तांघ्रिरेणु परकाल यतीन्द्र मिश्रान्
श्रीमत्परान्कुशमुनिम् प्रणतोस्मि नित्यम्
 
मैं निरंतर श्रीभूतयोगि आळ्वार, श्री सरोयोगि आळ्वार, श्री महदाह्वययोगि आळ्वार, श्री विष्णुचित्त आळ्वार, श्री गोदाम्माजी, श्री भक्तिसार आळ्वार, श्री कुलशेखर आळ्वार, श्री योगिवाहान् आळ्वार, श्री भक्तांघ्रिरेणु आळ्वार, श्री परकाल आळ्वार, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री मधुरकवि आळ्वार और श्री शठकोप आळ्वार के कमल चरणों की पूजा करता हूँ |

Alwars-10

madhuravaki-andal-emperumanar

 
यह दिव्य श्लोक श्री पराशर भट्टर स्वामीजी द्वारा गाया गया था जब वे श्री वेदांती स्वामीजी के साथ श्री गोष्टिपुरम(तिरुकोट्टीयुर) मैं बिराजमान थे | स्थानीय राजा वीर सुंदर ब्रह्म रायन् के उपद्रव के कारण स्वामीजी ने श्रीरंगम छोड़ दिया था | उस समय श्री रंगनाथ भगवान से असहनीय वियोग के कारण, अपने आप को भगवद् भागवत अनुभव मैं डुबो ने के लिए श्री पराशर भट्टर स्वामीजी ने यह श्लोक और श्री तिरुप्पावै का तनियन रचा |
 
इस श्लोक मैं १० आळ्वरों(श्रीभूतयोगि आळ्वार,श्री सरोयोगि आळ्वार,श्री महदाह्वययोगि आळ्वार,श्री विष्णुचित्त आळ्वार,श्री भक्तिसार आळ्वार,श्री कुलशेखर आळ्वार,श्री योगिवाहान् आळ्वार,श्री भक्तांघ्रिरेणु आळ्वार, श्री परकाल आळ्वार,श्री शठकोप आळ्वार ) को संबोधित करने के साथ ही स्वामीजी ‘”श्री” कहकर श्री गोदाम्माजी को, “मिश्र”(विद्वान / सम्माननीय) कहकर श्री मधुरकवि आळ्वार को और “यतीन्द्र” कहकर श्री रामानुज स्वामीजी को भी संबोधित करते हैं | 

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