Category Archives: आऴ्वार (AzhwArs)

तिरुमंगै आळ्वार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

thirumangai-azhwar

तिरुनक्षत्र: कार्तिक मास- कृत्तिका नक्षत्र

आवतार स्थल: तिरुक्कुरैयलूर्

आचार्यं: श्री विष्वक्सेन, तिरुनरयूर नम्बी, तिरुकण्णपुरं शौरिराज पेरुमाळ

ग्रंथ रचना सूची: पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकूत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम

परमपद प्रस्थान प्रदेश: तिरुक्कुरुंगुडि

शिष्यगण: अपने साले इळयाल्वार , परकाल शिष्यर , नीर्मेळ नडप्पान(पानी पर चलने वाले ),तालूदुवान(ताला को मुँह से फूँक के खोलने वाले ), तोळा वळक्कन (झगड़कर धन को हासिल करने वाले), निललिळ ओदुन्गुवान(परछाई मे सिमट जाने वाले ),निळलिल मरैवान, उयरत तोंगुवान(सीमा रहित ऊंचाईयों को भी चडने वाले)

पेरियवाच्छान पिळ्ळै अपने ग्रंथ के अवतारिका मे तिरुमंगै आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए कहते हैं , एम्पेरुमान(भगवान) अपने निर्हेतुक कृपा से आळ्वार को संस्करण किए हैं और उनके द्वारा अनेक जीवात्म उज्जीवित हुए , आईये इसके बारे में ग़ौर करें ।

तिरुमंगै आळ्वार अपने शरीर को सुखद छाया में रखकर अपने आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखे थे । आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखने का मतलब यह हुआ की ख़ुद को भगवद् विषयों(अध्यात्मिक) में नहीं लगाना और शरीर को सुखद छाया में रखने का मतलब हैं की अनादि काल से भौतिक विषयों के प्रति आकर्षित होना और केवल उन विषयों का भोग लेना ही एक मात्र लक्ष्य होना। जैसे कहा गया हैं ‘ वासुदेव तरुच्छाय ’- अर्थात वासुदेव (श्रीकृष्ण) ही असली छाया देने वाले वृक्ष हैं और इससे यह सिद्ध होता हैं की केवल भगवद् विषय ही असली सुखद छाया हैं । वे ही हैं जो एक मनोज्ञ वृक्ष हैं जो सर्व काल और सर्वदा आनन्ददायक हैं । इस वृक्ष की छाया किसी भी तरह की वेदना को दूर कर देती हैं और अतन्त सौम्य हैं और ना ही यह बहुत गर्म और ना ही ठंडी हैं । तिरुमंगै आळ्वार आँखों को आह्लाद करने  विषयानन्तरों मे बहुत ही दिलचस्पि  रखते थे , भगवान ने उन सभी विषयों से उनका ध्यान हटाकर , कई  दिव्य देशों पे और आँखों को लुभाने वाली अपनी अर्चावतार एम्पेरुमान् की ओर मोड़ देते हैं और उन्हीं पे ध्यान मग्न कर  देते हैं और इतना परिपूर्ण अनुभव प्रदान करते हैं की आळ्वार को  भगवान से पल भर की जुदाई भी असहनीय हो जाती हैं।तद्नन्तर श्री भगवान आळ्वार को इस भौतिक संसार में रहने के बावज़ूद उन्हें  नित्यमुक्तों के बराबर की स्थिति को पहुँचा देते हैं और परमपद प्राप्त करने की चाह प्रवृद्ध करते हैं और अन्त में परमपद प्रदान करते हैं ।

आळ्वार मानते थे की भगवान ने इनकी अद्वेषत  (भगवान जीवात्मा की सहायता करने के लिए हर एक समय उपस्थित हैं , लेकिन जीवात्मा इस सहायता लेने के लिए अनादि काल से विमुख हैं और भगवान जीवात्मा के  उज्जीवन करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक जीवात्मा उनकी सहायता लेने के लिए सुमुख नहीं  हो जाते  – इस अद्वेषत को अधिकारी विशेषण में  गिनती की जाती हैं यानी अद्वेषत जीवात्मा का सहज स्वभाव हैं ), भौतिक विषयों की सीमाएँ , इनकी इन विषयों को अनुभव करने की चाह को आधार भूत बनाकर  (और उस चाह को एम्पेरुमान की ओर मोड़ते हैं ) और अनादि काल से किये गए पापों को अपनी करुणा का पात्र बना के , उन्हें तिरुमंत्र  और स्वरूप (प्राकृतिक स्वभाव ), रूप (अनेक रूप ), गुण (दिव्य गुण ) और विभूति (सम्पत्ति ) का ज्ञान प्रदान करते हैं । भगवान के करुणा समुद्र में डूबे हुए आळ्वार , एहसानमन्द होकर पेरिय तिरुमोळि में भगवान का कीर्तन करना शुरू करते हैं । यह जीवात्मा/चित्त(बोध – क्षम रखने वाले पदार्थ ) का स्वरूप हैं की वह ज्ञान का व्यक्तिकरण करें और अचित्त वस्तु(बोध – क्षम न रखने वाले पदार्थ ) ज्ञान रहित होने के कारण किसी विषय का अनुभव नहीं कर सकते हैं । इस तरह आळ्वार कृतज्ञता को दर्शाने के लिए और एम्पेरुमान् की अर्चावतार का कीर्तन करने के लिए , कई दिव्य प्रबंधों की रचना करते हैं।

अपने व्याकरण के अवतारिका में पेरियवाच्छान पिल्लै ने एम्पेरुमान की निर्हेतुक कृपा( कारण रहित कृपा ) और आल्वार की उपाय शून्यता (एमपेरुमान के दया पात्र होने के लिए स्वयं अनुकूल कार्य ,उपाय बुद्धि से नहीं करना) स्थापित करते हैं  | लेकिन एक समय जब एम्पेरुमान से परिपूर्ण रूप से आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् , एम्पेरुमान के प्रति आळ्वार का लगाव असामान्य और असीम हो जाता हैं इस विषय को वे स्वयं ही अपने पेरिय तिरुमोलि ४.९.६ में घोषित करते हैं “ नुम्मडियारोडुम ओक्क एण्णियिरुत्तीर अडियेनै  “अर्थात मुझे अपने दूसरे अडियारों (सेवक , दास) में गिनती नहीं करना ।

आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए पेरियवाच्छान पिल्लै और मामुनिगळ की विशेष स्तुति यहाँ पढ़ सकते हैं |

रामानुज नूतन्दादी (२ रा पाशुर ) में अमुदनार ने एमपेरुमानार( श्री रामानुज स्वामी ) को “कुरैयल पिरान अडिक्कीळ विळ्ळात अन्बन” कहके संबोधित करते हैं अर्थात श्री रामानुज स्वामी वोह हैं जिन्हें तिरुमंगै आळवार के श्री चरण कमल पे अचंचल प्रेम हैं |

मामुनिगळ तिरुवाली तिरुनगरी दिव्यदेशों की पर्यटन करते समय , आळ्वार की दिव्य मंगल तिरुमेनी(शरीर) के सौंदर्य पर इतने आकर्षित हुए की उसी वक्त आळवार के रमणीय रूप को अपने आँखों के सामने दर्शाते हुए एक पाशुर रचते हैं | आईये उस पाशुर का आनंद ले :

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अनैत्त वेलुम्, तोळुतकैयुम्, अळुन्तिय तिरुनाममुम्,
ओमेन्ऱ वायुम्, उयर्न्त मूक्कुम्, कुळिर्न्त मुकमुम्,
परन्त विळियुम्, इरुन्ड कुळलुम्, चुरुन्ड वळैयमुम्,
वडित्त कातुम्, मलर्न्त कातु काप्पुम्, ताळ्न्त चेवियुम्,
चेऱिन्त कळुत्तुम्, अगन्ऱ मार्बुम्, तिरन्ड तोळुम्,
नेळित्त मुतुगुम्, कुविन्त इडैयुम्, अल्लिक्कयिऱुम्,
अळुन्दिय चीरावुम्, तूक्किय करुन्ङ्कोवैयुम्,
तोन्ङ्गलुम्, तनि मालैयुम्, चात्तिय तिरुत्तन्डैयुम्,
चतिरान वीरक्कळलुम्, कुन्तियिट्ट कनैक्कालुम्,
कुळिर वैत्त तिरुवडि मलरुम्, मरुवलर्तम् उडल् तुनिय
वाळ्वीशुम् परकालन् मन्ङ्गैमन्नरान वडिवे एन्ऱुम्

परकालन / मंगै मन्नन का दिव्य मंगल विग्रह हमेशा मेरे ह्रदय में हैं | यह दिव्य रूप को दर्शाते हैं की एक भाला कंधों के बल , एमपेरुमान को अंजलि समर्पित करते हुए श्री हाथ, अति सुन्दर उर्ध्व पुण्ड्र, प्रणव उच्चारण करते होट, सीधी और थोड़ी सी ऊपर उठी नासिकाग्र , शीतल मुखमण्डल, विशाल नेत्र, घुन्ग्राते सुन्दर काले बाल, थोड़े से झुके हुए कान ( एम्पेरुमान से अष्ट अक्षरी महा मंत्र सुनने के लिए ), गोलाकार गर्दन, विशाल वक्षस्थल, बलिष्ट बाहु, सुंदर सी पीट की ऊपर भाग, पतली कटी प्रदेश, मनमोहक पुष्पमाला, अद्भुत नूपुर, आळ्वार के पराक्रम को सूचित करने वाले घुटने, थोडे से मुड़े हुई श्री चरण कमल और शत्रुओं का नाश करने वाली कद्ग|हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं की  तिरुवाली – तिरुनगरी के कलियन की अर्चा विग्रह यह श्रुष्टि में सबसे सुन्दर हैं ।

आळ्वार निम्न लिखित तिरु नामों से भी जाने जाते हैं – परकालन(अन्य मत को काल (यम) के समान खण्डन करने वाले ), कलियन (काल के बराबर), नील (नील वर्ण का देह ) कली ध्वंस (कली को ध्वंस करने वाले) कविं लोक दिवाकर (कवि लोक के सूर्य ) चतुष् कवि शिका मणि (चार तरह की कविता मे विद्वान), शट प्रबंध कवि (छह प्रबंधों के कृपा कारक), नालु कवि पेरुमाळ , तिरुवाविरुडय पेरुमान (महान कद्ग धारण), मंगैयर कोन (मंगै राष्ट्र के राजा), अरुळ मारी (वर्षा काल की वर्ष के समान कृपा बरसाने वाले ), मंगै वेन्दन (मंगै राष्ट्र के अधिकारी),आलीनाडॉन (आडल मा नामक अश्व अधिकारी), अरट्ट्मुक्की, अडयार सीयम (अन्य मतो को निकट पहुँचने न देने वाले सिंह), कोंगु मालार्क कुळलियर वेळ, कोर्चा वेन्दन (महान राजा), कोरवेळ मंगै वेन्दन( कुछ भी कमी न रहने वाले महा राजा) ।

इन विषयों को ध्यान मे रखते हुए ,आईये आळवार को जानेंगें

आळ्वार कार्मुक(कुमुद गण) अंश से तिरुक्कुरैयलूर् मैं (तिरुवालि- तिरुनगरि के समीप) चतुर्थ वर्ण में अवतरित हुए । जैसे दिव्यसूरि चरित में गरुड़ वाह पंडित बताते हैं उन्हें नीलन (श्याम देह वर्ण) कहके नामकरण किया गया हैं।

आपकी बाल्य अवस्था बिना कुछ भगवत सम्बन्ध से ही बीत गई। यौवन अवस्था प्राप्त करने पर, भौतिक विषयों में उलझ गए । बलिष्ट शरीर और अनेकानेक आयुध प्रयोग करने में कुशलता सहित युद्ध विद्य में नैपुण्यता होने के कारण चोल देश के राजा के पास जाते हैं और अपनि सेना में उन्हें स्थान देने की माँग करते हैं । चोल देश राजा उनकी सामर्थ्य देखकर उन्हें सैंयाध्यक्ष के स्थान पर नियुक्त करते हैं और एक छोटी प्रान्त का पालन आभार सौंप देते हैं ।

एकानक समय मे तिरवाली दिव्य देश मे स्थित सुन्दर सरोवर मे अप्सराएँ (देव लोक के  नृत्यांगनाएं) जल विहार करने के  लिये आते हैं । उनमे से तिरुमामगल (कुमुदवल्ली) नामक एक  कन्या पुष्प संचयन (फूलों की संग्रह) करने के लिए निकलती हैं और उनकी साखियाँ उन्हें भूलकर चली जाती हैं । जब वह कन्या मनुष्य शरीर लेकर सहायता  के लिए ढूँढती हैं , उस समय उस ओर से गुजरते  एक श्री वैष्णव वैद्य  कन्या को देखकर  अपना अता पता पूछते हैं और कन्या अपने सहेलियों से बिछड़ने और  इत्यादि घटित विषय बताती हैं । वैद्य निसंतान होने के कारण अपने साथ उस कन्या को ख़ुशी से घर ले आते हैं और  अपने पत्नी से परिचित करते हैं और निसंतान दम्पति बहुत प्रसन्न होकर कन्या को अपना लेते हैं और प्यार से पर्वरिश करते हैं । उनकी सुन्दरता देखकर कुछ लोग नीलन को इस कन्या के बारे में बताते हैं और नीलन उनके सौंदर्य पर मुग्ध होते हैं और तुरन्त वैद्य के पास जाकर बात चीत करना आरम्भ करते हैं । उस समय कुमुदवल्लि उस ओर से गुजरती हैं और वैद्य नीलन से बताते हैं की कन्या का कुल , गोत्र पता न होने के कारण उनकी विवाह के बारे में वे बहुत चिन्ता ग्रस्त हैं । नीलन तुरन्त उनसे अपनी विवाह का प्रस्ताव रखते हैं और ढ़ेर सारा धन उन्हें देते हैं । वैद्य दम्पति प्रस्ताव को मंजूर करते हैं लेकिन कुमुदवल्ली शर्त रखती हैं की वे  एक श्री वैष्णव जो आचार्य से पञ्च संस्कार प्रदित हो केवल उन्ही से विवाह रचेंगी । जैसे बताते हैं एक होशियार व्यक्ति अच्छे काम करने में देरी नहीं करता हैं , उसी तरह वे तिरुनरैयूर नम्बि के पास पहुँचकर , पञ्च संस्कार करने की विनती करते हैं।  एम्पेरुमान अपने दिव्य करुणा से उन्हें शंख , चक्र प्रदान करके , तिरुमंत्र उपदेश करते हैं ।

पद्म पुराण मे ऐसा कहा गया,

सर्वाश्च स्वेतामृथ्य धारयम ऊर्ध्व पुन्द्रम यधाविधि  ।
ऋजुवै साँथरालानी अङ्गेषु द्वादशस्वपि. ।।

दिव्य देशो मे प्राप्त श्वेत मृत्तिका से शरीर के द्वादश भागोमे निर्धारित उचित अंतराल के साथ द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करना आवश्यक हैं ।

ततपश्चात आळवार द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करते हैं और  कुमुदवल्ली से अपने  विवाह का प्रस्ताव रखते  है । कुमुदवल्ली विवाह के लिए सहमत होती  हैं परन्तु कहती हैं की उन्हें पति तब ही मानेंगी जब आप श्री एक साल प्रति दिन 1008 श्री वैष्णवों का तदियारधान करेंगे ।  कलुमुदवल्ली के प्रति अनुराग के  कारण आळवार उनका कहना मान लेते हैं और अति वैभव से कुमुदवल्ली से विवाह समारोह आयोजित होता हैं ।

पद्म पुराण सूचित किया गया है .

आराधनानाम सर्वेषाम विश्नोआराधनम् परम ।
तस्मात परतरं प्रोक्तं तदीयाराधनम नृपा 

हे राजन अन्य देवता आराधन से श्री विष्णु आराधन श्रेष्ठ हैं और विष्णु भक्तों की आराधन स्वयं श्री महा विष्णु से भी अधिक हैं ।

इस प्रमाण के अनुगमन करते हुए आळवार अपनि पूरी संपत्ति लगाकर तदीयाराधन (दिव्य प्रसाद से  श्री वैष्ण्वों की आराधना करना)करते हैं ।  यह देखकर कुछ लोग,राजा के पास शिकायत करते हैं की नीलन  (परकाल) प्रजा धन श्री वैष्णवों की तदीयाराधन करने में  दुरुपयोग कर रहा है ।लोगों की बात सुनकर  राजा परकालन को पेश होने का आदेश देते हैं और अपने सेना को उनके पास भेजते हैं । परकालन उनसे सौम्य रूप से पेश आते हैं और प्रतीक्षा करने के लिए कहते हैं । सैनिक राजा के आदेश अनुसार  शुल्क (लगान) देने के लिए निर्बंध करते  है । आळवार क्रोधित हो उठते हैं और  उन सैनिकों को बाहर घसीट देते  है। सैनिक राजा को पूरा वृतांत सुनाते है। राजा सैन्याद्यक्ष को आदेश देते हैं की पूरी सेना के साथ  परकालन को निर्बंध करें ।  वह सैन्याद्यक्ष पूरी सेना के साथ एक बड़ी सेना लाता है और आळ्वार पर हमला करता है।  तब परकालन  धैर्य और शक्ति के साथ सामना करके वह सैन्याद्यक्ष और पूरी सेना को वापस जाने पर मज़बूर करते है।  सैन्याद्यक्ष आळ्वार की विजय प्राप्ति का समाचार राजा को देता है ।  तब राजा स्वयं युद्ध लड़ने का निर्णय करके अपनी पूरी सेना के साथ आळ्वार पर हमला बोलते  है। आळ्वार फिर एक बार पराक्रम बताते हुए लड़कर पूरी सेना को परास्त कर देते  है। आळ्वार की पराक्रमता पर राजा बहुत प्रसन्न हो जाते हैं शान्ति घोषित करते हैं और उनकी जयजयकार करते हैं । राजा की कुयुक्ति से बेख़बर आळ्वार , उनके पास चल पड़ते हैं और राजा अपने मंत्री की सहायता से  उन्हें बंधी बनाकर बकाया शुल्क देने का निर्बंध करते है। मंत्री उन्हें एम्पेरुमान के  सन्निधि के अन्दर कैद कर देते हैं और आळ्वार 3 दिन तक बिना कुछ प्रसाद पाये रहते  हैं ।  कहा जाता हैं की उस समय तिरुनरयूर  नाच्चियार  अपने तिरुनरयूर नम्बि को बताती हैं की आळ्वार को भुखे देख उन्हें सहन नहीं हो रहा  हैं और स्वयं  प्रसाद लेकर आळ्वार को प्रदान करती हैं । आळ्वार उस समय पेरिया पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ जी) और तिरुवेन्गडमुडैयान (श्री निवास) के ध्यान मे निमग्न हो जाते  है।  काँची  देवपेरुमाळ आळ्वार के स्वप्न मे आकर बताते हैं की काँचीपुरम  मे बहुत बड़ा निधि का भाण्डागार हैं  और उनके आगमन पर उन्हें वह प्राप्त होगी । उस स्वप्न वृतांत राजा को बताने पर राजा अपनि सेना के साथ कड़ी निग्रनि से आळ्वार को काँचीपुरम भेजते है। वहाँ पहुँचने पर निधि का पता जान नहीं सके । तब अपने भक्तोंको सब कुछ देने वाले देवपेरुमाळ आळ्वार को पुनः स्वप्न में  साक्षात्कार होके,  वेगवती नदी के किनारे निक्षिप्त निधि का पता बताते हैं । आळ्वार निधि को लेकर राजा का बकाया शुल्क भर देते है और बाकि निधि से तदीयराधन जारी रखने के लिये तिरुक्कुरैयलूर् चले जाते हैं ।पुनः वह राजा अपने सैनिक को शुल्क वसूल करने  के लिए भेजने पर आळ्वार चिंता घ्रस्त होते हैं ।  पुनः देवपेरुमल स्वप्न में साक्षात्कार होते हैं और  वेगवती नदी तट पे स्थित रेती लेकर सैनिको को देने का आदेश देते  है । आळ्वार ठीक उसी तरह सैनिकों को रेती देते हैं । सैनिकों को रेती अणु अमुल्य रत्न जैसे दिखाई देते हैं ।  रेती के अणु लेकर ख़ुशी से सैनिक राजा के पास लौट जाते हैं और राजा को घटित विषय विस्तार रूप से निवेदन करते है। आळ्वार की महानता उन्हें समझ आती हैं उन्हें राज दरबार आने का निमंत्रण देते हैं सादर से उन्हें स्वागत करते हैं  अपने दोषों के  लिये  क्षमा प्रार्थना करते हैं और ढ़ेर सारा धन देते हैं ।अपने पापों का प्राय्श्चित्त करते हुए अपनी पूरी सम्पत्ति देवालयों और ब्राह्मणों में दान करते है।

आळ्वार अपना तदीयराधन ज़ारी रखते हैं  और इस कारण उनकी संपत्ति शून्य हो जाती हैं  । आळ्वार ठान लेते हैं की वे तदीयराधन  किसी भी तरह ज़ारी रखेंगे चाहे उन्हें राह में आने – जाने वाले लोगों की चोरी ही क्यूँ न करना हों । धनी लोगों से चोरी करके, भक्ति से  तदीयराधन में जुट जाते हैं । सर्वेश्वर सोचते हैं की आळ्वार चोरी करके भी उस संपत्ति को श्री वैष्णवों की तदीयाराधना में लगा रहे हैं यानि आळ्वार चरम पुरुषार्थ (चरमोपाय) में स्थित  है और आळ्वार को दिव्य निःसंकोच ज्ञान प्रदान करके उन्हें इस सँसार सागर से उन्नति की ओर मार्ग दर्शन करने का निर्णय लेते हैं । कहा जाता हैं की श्रीमन्नारायण स्वयं नर (आचार्य) के रूप मे अवतरित होके शास्त्र की सहायता से संसार में लीन दुःखी जीवत्मा को उज्जीवित करते हैं ठीक उसी तरह एम्पेरुमान अपने देवियों के साथ आळ्वार को अनुग्रहित करने के लिये उनकी राह में  नए दूल्हा दुल्हन की तरह , सुन्दर आभूषणों से सज़-दज़ बारात में वायळालिमणवालन के रूप मे निकल पडे ।बड़ी मात्रा मे लूटने का मौका देखकर आळ्वार जोश में आ जाते हैं और एम्पेरुमान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और सब कुछ लूट लेते हैं । आखिर में आळ्वार एम्पेरुमान के श्री पाद में लगी हुई बिछिया को क़तर देते हैं ।उनकी शूरता  पे  एम्पेरुमान आश्चर्य चकित हो जाते हैं और  “नम् कलियनो ” कहकर सम्बोधित करते  है, अर्थात क्या आप हमारे कलियन हो ? (महान शौर्यवान को कलियन कहा जाता हैं)।

तदनन्तर आळ्वार पूरे आभूषणों को और संपत्ति को एक पोटली में बांध कर उठाने का प्रयत्न करेते हैं लेकिन उठा नहीं सकते । आळ्वार दूल्हे राजा(एम्पेरुमान) की ओर देखकर गरजते हैं की उन्होंने ही कुछ मंत्र का प्रयोग किया हैं जिसके कारण वह पोटली उठाने में असफल हो रहे हैं । एम्पेरुमान उनके इंजाम को कबूल करते हैं और मान लेते हैं की वास्तव में ही एक मंत्र हैं और अगर आळ्वार सुनना चाहे तो वह उन्हें बता सकते हैं ।आळ्वार अपने छुरे को दिखाकर  शीघ्र से  उस मंत्र का उपदेश करने के लिए कहते  है । वह मंत्र जो सबसे सुमधुर हैं , जिसमे सभी शस्त्ररार्थ निहित हैं ,   अंतिम लक्ष्य को स्थापित करता हैं ,सकल वेद सार हैं , दुःख भरे संसार से विमुक्त करने वाला हैं, जप करने वाले वक्ता को ऐश्वर्य (भौतिक सम्पत्ति ) , कैवल्यं(स्वानुभवं), भगवत कैंकर्य से अनुग्रहित करती हैं , ऐसे तिरुमंत्र का उपदेश करते हैं ।  शास्त्रो में तिरुमंत्र की वैभवता के बारे में ऐसा वर्णन किया गया हैं

वृद्द हारीत स्मृति मे

रुचो याजस्मी सामानि ततैव अधर्वरार्णि च ।
सर्वं अष्टाक्षाराणान्तस्थम् यच्चचार्णयदपि वगमयम् ।।

रिग, यजुर, साम और अथर्वण वेदों का सर और आप श्री के उपब्रह्मणो का पूरा सार अष्टाक्षर मंत्र मे स्थित है।

नारदिय पुराण

सर्व वेदांत सारार्थस: संसारार्णव तारक: ।
गति: अस्ताक्षरो नॄणाम् अपुनर्बावकांक्षिणाम ।।

मुमुक्षु (मोक्ष कामी )को अष्ठाक्षरी मंत्र का आश्रयण करना आवष्यक है क्यूँकि इसी में सकल वेदांतों का सार हैं और केवल यही मंत्र संसार सागर से पार करवा सकता हैं । .

नारायणोपनिषद् मे

ओमित्यग्रे व्याहरेत नाम इति पश्चात नारायणायेति उपरिष्टात ।
ओमित्येकाक्षरम् नम इति द्वे अक्षरे नारायणायेति पञ्चाक्षराणी ।।

ओम का उच्चारण पहले ,नमः और नारायणाय अनुसरित उच्चारण किया जाता हैं ; ओम एकाक्षर से ,नमः दो अक्षरोंसे, नारायण शब्द पाँच अक्षरोंसे (1+2+5=8 से यह मंत्र अष्ठाक्षरी कहलाती है) । इस तरह शास्त्र वाक्य से अष्ठाक्षरी मंत्र का निर्माण और निसंकोच रूप से मंत्र की उच्चारण रीती हमें पता चलती हैं ।

नारदीय पुराण मे

मन्त्राणाम् परमो मंत्रो गुयाणाम् गुह्यमूत्तत्तम । 
पवित्रण्याच पवित्राणाम् मूलमन्त्रासनातनह: ।।

अष्ठाक्षरी महामंत्र सारे मंत्रों मे से महत्तम हैं, सारे रहस्य मंत्रों से भी रहस्य, सारे पवित्र मंत्रों से पवित्र और आनादी /सनातन मंत्र है।

इन सब से परे , महा ज्ञानी पूर्वाचार्यों की स्वीकृति यह अष्ठाक्षरी मंत्र को प्राप्त है । यह विषय हमें तिरुवाय्मोळि मे 7.4.4 से ” पिराळन पिरोधूम पेरियोर” पता चलता हैं अर्थात महान लोग जो एम्पेरुमान (भगवान)के नामों का उच्चारण करते हैं तथा आळवार स्वयं अपने पेरिय तिरुमोळि के पहले पदिग मे (पहले 10 पाशुरों मे) प्रकट करते हैं “पेत्त तायिनम आयिन सेयुम नलंतरुम सोल्लै नान कण्डु कोंडें” अर्थात मैं ने ऐसा मंत्र खोज लिया हैं जो स्वयं अपनी मय्या से भी ज्यादा उपकारक है ।

तिरुमंत्र स्वयं एम्पेरुमान से श्रवण करने के बाद   , करुणा स्वरूपी श्री महा लक्ष्मी और सुन्दर स्वर्णमय शरीर से प्रकाशित दिव्य गरुड़ आळ्वार के साथ अपना दिव्या मंगल रूप प्रकट करते हैं । भगवान अपनी निरहेतुक कृपा (कारण रहित कृपा )से आळ्वार को दोष रहित ज्ञान प्रदान करते हैं ।यह सब देखने के बाद , आळ्वार श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषाकार के द्वारा जनित एम्पेरुमान के  अनुग्रह समझ गए, तत्पश्चात छः दिव्य प्रबंधों को हम सबके लिए प्रदान करते हैं जो  नम्माल्वार के चार दिव्य प्रबंधों के छः अंगों की तरह माने जाते हैं – पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकुत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम हैं । आप श्री की  छः प्रबन्ध अलग-अलग काव्य रूप के ढ़ंग हैं -आसु , मधुरं, चित्रम, और विस्तार और येही एक वज़ह हैं की आप श्री “नालु कवि पेरुमाळ”  ख़िताब से प्रसिद्ध हुए ।

आखिर में एम्पेरुमान आळ्वार को आज्ञा देते हैं  की वे अपने शिष्य सहित अनेकानेक दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करे । आळ्वार अपने मंत्रि और शिष्यगण के साथ दिव्य देश की यात्रा पर निकलते हैं  और कई दिव्य नदियों में स्नानाचरण करते हुए , क्रमानुसार श्री  भद्राचलम, सिंहाचलम, श्रीकूर्मम, श्रीपुरुषोतमम्(पूरीजगन्नाधम), गया, गोकुलम, बृन्दावनम्, मधुरम्, द्वारका, अयोध्या, श्री बद्रिकाश्रमम्, काँचीपुरम, तिरुवेंगडम् इत्यादि दिव्य देश के एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करते हैं । आळ्वार चोळमण्डल पहुंचते हैं और आप श्री के  शिष्य  “चतुष्कवी पधार रहे है”, “कलियन पधार रहे है”, “परकालन  पधार रहे है”, “पर मतङ्को को परास्त करने वाले पधार रहे है” कहके जय जय कार करते हैं । उस प्रांत में तिरु ज्ञान सम्बन्धर नामक शिव भक्त उधर वास करते थे और उनके शिष्य गण आळ्वार के कीर्तन का खण्डन करते हैं । आळ्वार उन्हें चुनौती देते हैं की सम्बन्धर् से वाद प्रतिवाद करके नारायण परतत्व (आधिपत्य) स्थापित करेंगे । आळ्वार को तिरु ज्ञान सम्बन्धर के वास स्थान ले आते हैं और घटित विषय को विस्तार से अवगत कराते हैं और सुनने के बाद  उनसे वाद विवाद करने के लिए संहद हो जाते हैं । वह नगर अवैष्णवों से भरा हुआ था और कम से कम एक जगह पे भी एम्पेरुमान(भगवान) का विग्रह न होने के कारण आळ्वार बात शुरू नहीं कर पाते और संदिग्ध मे पड जाते  हैं । उस समय एक श्री वैष्णव माता जी को देखकर, उनसे उनकी तिरुवराधन मूर्ति को लाने की विनती करते हैं  और आप श्री  उनकी तिरुवराधना मूर्ति जो  श्री कृष्ण की मूर्ति हैं सम्बन्धर् के यहाँ लाने पर,आळवार वाद -विवाद शुरू करते हैं ।  सम्बन्धर् एक श्लोक प्रस्तुत करते हैं और आळ्वार उनमे स्थित दोषों को अवगत कराते हैं । सम्बन्धर् आळ्वार को चुनौती देते हैं की काव्य सुनाये , तब आळवार ने “ओरुकुरले” पदिग  (पेरिय तिरुमोळि 7.4) मे ताडाळन एम्पेरुमान (काळिच्चिरामविणगरम-शीरगाली) के प्रति पाशुर का वर्णन करते हैं । बख़ूबी और सुन्दरता से रची गई पदिग सुनने के बाद  सम्बन्धर प्रति युत्तर नहीं दे पाये और अंतः आळ्वार की महानता पर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और उनका गौरव स्वीकार करके, उनका पूजन करते हैं ।

आळ्वार श्री रंगम दर्शन करके , श्री रंगनाथ जी का मंगलशासन और कैंकर्य करने के इच्छुक थे । ब्रह्मांड पुराण मे कहा गया हैं :

विमानम् प्रणवाकाराम वेदश्रुन्गम महाद्भुतम् श्री रंगशायी भगवान प्रण वारर्थ प्रकाशकः ।

महत्तर श्री रंग विमानम्(गोपुर) ओम कार का आविर्भाव हैं । विमान की चोटी  एक वेद सामान हैं ।  भगवान श्री रंगनाथ स्वयं ही प्रणवार्थ को अभिव्यक्त (तिरु मंत्र सार को) कर रहे है।

आळ्वार श्री रंगम मंदिर के चारों ओर दुर्ग बनाने के आकांक्षित , निर्माण करने में धन के बारे में अपने शिष्यों के साथ सलाह – मशोहरा करते हैं । शिष्य बताते हैं की श्री नागपट्टनम मे अवैदिक संप्रदाय  सम्बंधित एक सुवर्ण प्रतिम है, यदि उसे हासिल करने में क़ामयाब हो साके तो  बहुत कैंकर्य कर सकते है ।  यह विषय सुनने के पश्चात , तुरन्त आळ्वार नागपट्टनम निकल पड़ते हैं ।  उस नगर की विशेषता के बारे में जानने के लिए एक स्त्री से पूछ-ताछ करते हैं ।वे बताती हैं की उनकी सॉस कहा करती थी की उस प्रदेश में एक स्वर्ण विग्रह है । वास्तुकार जिसने, उस मूर्ति को और उसे निक्षिप्त करने के लिए रक्षात्मक विमान को निर्माण किया हैं , एक असामान्य द्वीप में निवास  कर रहा हैं ।यह विषय जानने के बाद आळ्वार , उस द्वीप की ओर शिष्य गण के साथ प्रस्थान करते हैं और विश्वकर्मा (देवताओं का मुख्य वास्तुकार) से तुलनीय उस वास्तुकार के बारे मे पूछ-ताछ करते हैं । वास्तुकार के विशाल और सुन्दर महल का पता बताने पर आळ्वार वहाँ पहुँचते हैं । महल के बाहर आळ्वार अपने शिष्यों के साथ वार्तालाप करना शुरू करते हैं और उस समय स्नान पान समाप्त करके वास्तुकार बाहर आते हैं । उन्हें पाहकर  तब आळ्वार उद्देश  पूर्वक अफ़सोस जताते हुए कहते हैं की ” हो । कुछ घुसपैठों ने नागपट्टनम के मंदिर को ध्वंस करके स्वर्ण विग्रह को लूट लिया हैं । इस सँसार में अब हम किस कारण जीवित रहें “। यह सुनकर वास्तुकार क्लेश से बताते हैं की ” विमान चोटी को खोलकर ,भीतर प्रवेश करने का रहस्य किसी छिछोरा शिल्पी ने ही बहिर्गत कीई होगा। में ने जटील चाबी बनाई – एक पत्थर के अंदर फ़ेरी गई लोहे का ज़ंजीर और उसे झरने के निचे स्थित फलक के निचे रखा और न जाने कैसे उसे तोड़ पाये?” ऐसे कहकर अन्जाने में पोल ख़ोल देते हैं ।

रहस्य पता चलने पर आळ्वार खुशी-ख़ुशी अपने शिष्यों के  साथ निकल पड़ते हैं  नागपट्टनम जाने के लिए समुद्र तट पहुँचते हैं । उस समय, देखते हैं की  एक नेक व्यापारी अपने  बहु मूल्य सुपारी को नाव मे चढ़ा रहे थे, आळ्वार उनके पास जाकर , आशीर्वाद देते हैं और उन्हें उस पार छोड़ने के लिए कहते हैं । व्यापारी मान लेता हैं और सभी लोग नाव पे अपना प्रयाण आरम्भ करते हैं । उस समय आळ्वार सुपारी की राशि में से एक सुपारी को निकाल कर दो टुकड़े कर के एक टुकड़े को व्यापारी को देते  हैं और कहते हैं की प्रयाण के अंत में वापस लेंगे और उनसे एक कागज़ह पर अपने हस्ताक्षरों से “में आळ्वार को मेरी नाव की आधी सुपारी का आभारी हुँ ” कर लिखने की गुज़ारिश करते हैं ।व्यापारी आळ्वार का कहना मान लेता हैं । नागपट्टनम पहुँचने पर उस कीमती सुपारी का आधा भाग देने की  माँग करते  हैं (श्री रंगा मंदिर निर्माण कैंकर्य) व्यापारी हैरान हो जाता हैं और देने के लिए इन्कार कर देता हैं । दोनों लोग बहस करना शुरू करते हैं और फ़ैसला लेते हैं इंसाफ़ तब ही मिलेगा जब सारे व्यापारियों से सलाह मशोहरा ले । सारे व्यापारी एलान करते हैं की आधी सुपारी आळ्वार को दिजाए । उस व्यापारी के पास और कोई चारा नहीं रहा और आधी सुपारी का मूल्य आळ्वार को चूका कर , अपने रास्ते निकल पड़ते हैं ।

आळ्वार ,शिष्यों के साथ मिलकर मन्दिर पहुँचते हैं और रात होने का इंतज़ार करते हैं । रात मे उस फ़लक को निकाल कर चाबी हासील करके ,विमान की चोटी पे पहुँचते हैं और दोनों तरफ घुमा कर, ख़ोल देते हैं और अंदर स्थित चमकिलि मूर्ति का दर्शन पाते हैं । आळवार को देखकर ,मूर्ति से आवाज़ निकलती हैं “ईयत्ताल आगतो इरुम्बिनाल आगतो, भूयत्ताल मिक्कोतोरु, भूत्तत्ताल आगतो, तेयत्ते पित्तलै ,नरचेमबुगलै आगतो, मायप्पोन वेंनुमो मतित्तेनै पन्नुगैक्के ” अर्थात आप लोहा, पीतल, ताम्बा जैसे पदार्थ को  उपयोग नहीं कर सकते थे क्या,आप की माँग थी की  मैं स्वर्ण से बनु ताकि आप आकर भगवान की  सेवा मे मुझे उपयोग कर सके “। आळ्वार अपने साले की सहायता से उस मूर्ति को लेकर ,उधर से निकलते हैं ।

अगले दिन , एक छोटे नगर पहुँचते हैं और आळ्वार मूर्ति हाली ही में जोति हुई खेत  में हिफ़ाजत करके आराम करते हैं। किसान उस ज़मीन की जुताई शुरू करते हैं , मूर्ति पाहकर एलान करते हैं की मूर्ति उनकी हैं । जब आळ्वार कहते हैं की मूर्ति उनकी आनुवंशिकोने खेत में दफ़नाया है ।  एक बहस चल पड़ती हैं , अंत में आळ्वार मूर्ति के मालिक होने का गवाह बताने के लिए तैयार होते हैं और  किसान उनकी बात मानकर चले जाते हैं । सूर्यास्त होने के बाद , आळ्वार मूर्ति लेकर अपने शिष्यों के साथ  उत्तमर् कोइल नामक दिव्य देश पहुँच कर ,उस मूर्ति को हिफ़ाजत करते हैं । उसी दौरान  नागपट्टिनम मंदिर के कार्य निर्वाहणाधिकारी  स्थानिक नेता के साथ मूर्ति की चोरी होने का समाचार पाकर , पीछा करते हुए छुपाये गए खेत तक पहुँचते हैं और अंत में उत्तमर् कोइल पहुँचते हैं । विग्रह के बारे में आळ्वार से पूछने पर पहले बात को टाल देते हैं की उन्हें कुछ भी मालूम नहीं हैं तद्नन्तर वर्ष ऋतु के बाद  पंघुनी(फाल्गुन मास) में मूर्ति की छोटी ऊँगली तक लौटाने के लीए सहमत होते हैं । इस समझौते का एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करके उन्हें देने के पश्चात , वह लोग उधर से निकल पड़ते हैं । आळ्वार मूर्ति को पिगलाकर बेचते हैं और उस धन से श्री रंगम् मंदिर के दुर्ग का निर्माण करते हैं । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार  से निर्मित नंदनवन से गुज़रते हैं और  बिना कुछ ठेस पहुँचाये, श्रद्धा पूर्वक चारों ओर प्राकार का निर्माण करते । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार संतुष्ट होकर प्यार से अपने कतरनी को तिरुमंगै आळवार का नाम “अरुल मारी” कहके अनुग्रह करते हैं । इस तरह  तिरुमंगै आळ्वार अनेकानेक कैंकर्य/सेवा करते हुए  एम्पेरुमान के प्रति अपनि भक्ति प्रदर्शित करते हैं ।

वर्षा ऋतु के पश्चात ,  कार्यनिर्वाहणाधिकरी स्वर्ण विग्रह ले जाने के लिए आए ।उनसे पहले दस्ताविज़ पढने के लिए कहते है और उसके मुताबिक़ स्वर्ण मूर्ति की एक छोटी  ऊँगली देते हैं । इसी विषय पर बहस शुरू होती हैं और सब लोग एक मध्यस्त व्यक्ति के पास जाते हैं और मध्यस्त फैसला सुनाते हैं की  दस्ताविज़ के मुताबिक़ वे छोटी ऊँगली का स्वीकार करें ।कार्यनिर्वाहणाधिकारी आळ्वार की युक्ति समझ , बिना कुछ लिए उधर से निकल जाते हैं ।अनन्तर आळ्वार वास्तुकारों को निमंत्रण देते हैं की वह उन्हें कुछ भेंट देना चाहते हैं लेकिन वह भेंट एक द्वीप में निक्षिप्त हैं ।सभी वास्तुकारों से एक ही कश्ती मे बैठकर निकलते हैं और कुछ दूर जाने पर आळ्वार केवट को इशारा करके, उनके साथ एक छोटी नाव मे कूद जाते हैं और कश्ती को उलटकर सभी वास्तुकारों को डुबो देते हैं । आळ्वार अपने स्थान लौटते हैं और वास्तुकारों के पौते उनके दादा के तलाश में पूछ-ताछ करने वहाँ पहुँचते हैं । आळ्वार उन लोगों को बताते हैं की वे उनके पूर्वजों को धन के निक्षिप्त स्थान द्वीप का पता बता दिया हैं और वह सारी सम्पदा इकट्टा करके आएंगे। आळ्वार के उत्तर से असंतुष्ट वे आळ्वार पर शक करते  हैं और जिद्द करते हैं की वे आळ्वार को तब तक नहीं निकालेंगे जब तक उनके पूर्वज सही सलामत उनके हाथों में न सौंपे जाय ।आळ्वार चिंता ग्रस्त होते हैं और  श्री रंगनाथर उनके स्वप्न मे साक्षात्कार होकर  “निर्भय होने का आश्वासन देते हैं ” और सभी पौत्र लोगों को कावेरी मे स्नान करके उर्ध्व पुण्ड्र धारण करके ,उनकी मूल मंडप में आकर ,अपने-अपने दादो के नाम पुकारने के लिए कहते हैं । श्री रंगनाथ भगवान की आज्ञा के अनुसार, सभी अपने अपने पूर्वजों को बुलाना शुरू करते हैं । अचम्बित , सभी पूर्वज श्री रंगनाथ भगवान के मूर्ती  के पीछे से  प्रकटित होकर अपने पौत्र से कहते है की “हम आळ्वार की दिव्य कृपा के कारण , हम श्री रंगनाथ  भगवान की श्रीपद पदमों के पास पहुंच गये हैं । आप भी आळ्वार के आश्रण  पाकर , यह संसार मे कुछ समय तक बिता कर खुद को उज्जीवित करें  “। उनके पूर्वज के आदेश सुनकर आळ्वार को आचार्य के रूप में  स्वीकृत करके अपने अपने स्वस्थल लौट जाते है।

पेरिय पेरुमाळ आळ्वार से उनकी इच्छा के बारे में पूछते हैं । आळ्वार बताते हैं की एम्पेरुमान(भगवान) के दशावतार की सेवा करने के उत्सुक हैं । एम्पेरुमान अर्चा विग्रहों की स्थापना करके पूजा करने की आज्ञा देते हैं और आळ्वार श्री रंगम मे दशावतार सन्निधि का निर्माण करते हैं ।

तत पश्चात पेरिय पेरुमाळ आळ्वार के साले को बुलाकर, उनसे आळ्वार की अर्चा मूर्ति तैयार करके (क्योंकि आळ्वार उनके साले के आचार्य हैं ) तिरुक्कुरैयलूर् मे स्थापित करने की , विशाल मन्दिर का निर्माण करने की और अनेक महोत्सवों का आयोजन करने की आज्ञा देते हैं । आळ्वार के साले आळ्वार और उनकी धर्मपत्नि कुमुदवल्ली नाच्चियार् की अर्चा विग्रह तैयार करके , तिरुक्कुरैयलूर् में स्थापना करके , अनेक उत्सव मनाते हैं ।आळ्वार अपने शिष्यों को उज्जीवित करते हुए ,निरंतर उपेय और उपाय के रूप मे पेरिय पेरुमाळ पे ध्यान करते रहे ।

आप श्री की तानियन:

कलयामी कलिध्वंसम कविंलोक दिवाकरम ।
यस्यागोभी: प्रकाशभी:आविद्यम निहतं तम:

आपकी अर्चावतार अनुभव पूर्व यहाँ वर्णन किया गया हैं ।

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अड़ियेन नल्ला शशिधर रामानुज दास
अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार

श्री:

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचल महामुनये नमः

thondaradipodi-azhwar-mandangudi

तिरुनक्षत्र : मार्गशीर्ष मास – ज्येष्ठा नक्षत्र

आवतार स्थल : तिरुमण्डंगुडि

आचार्यं : श्रीविष्वक्सेन स्वामीजी

ग्रंथ रचना सूची : तुरुमालै, तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि

परमपद प्रस्थान प्रदेश : श्रीरंगम

आचार्य नन्जीयर/वेदांती स्वामीजी, अपने  तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि के व्याख्यान की अवतारिका में “अनादि मायया सुप्तः” प्रमाण से साबित करते है कि आळ्वार संसारी (बद्धजीव) थे (अनादि काल से अज्ञान के कारण सँसार में निद्रावस्था में थे) और एम्पेरुमान (भगवान श्रीमान्नारायण) ने उन्हें जागृत किया (उन्हें परिपूर्ण ज्ञान से अनुग्रह किया) है। उसके बाद पेरियपेरुमाळ (श्रीरंगनाथ) योगनिद्रा में चले जाते है और आळ्वार उन्हें उठाने की चेष्ठा करते है और भगवान से प्रार्थना करते है कि उन्हें कैंकर्य प्रदान करे।

आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै, तिरुपळ्ळियेळ्ळुच्चि के व्याख्यान की अवतारिका में आळ्वार के पाशुरों द्वारा ही उनकी वैभवता को प्रकाशित करते है। भगवान के दिव्य परिपूर्ण कृपा से जागृत आळ्वार, स्वरूप ज्ञान प्राप्त कर, पेरियपेरुमाळ के पास जाते है| आपश्री यह पाते है कि भगवान आपश्री का स्वागत, कुशल क्षेम नहीं पूछते है, अपितु आँख बन्द किये लेटे हुए है। इससे यह नहीं समझना चाहिए की भगवान को आळ्वार के ऊपर श्रद्धा नही है (संबंध रहित) क्यूँकि आळ्वार और भगवान को एक दूजे के प्रति बहुत लगाव है। हम यह भी नहीं कह सकते की भगवान अस्वस्थता के कारण शयन किये हुए है क्यूँकि इस प्रकार के दोष केवल भौतिक तत्व के अंग है, जो तमो गुण से परिपूर्ण है, लेकिन पेरियपेरुमाळ भौतिक तत्व से परे आलौकिक शुद्धसत्व है और इसमें कोई संशय नहीं है। पेरियपेरुमाळ शयन अवस्था में सोच रहे है की जैसे उन्होंने आळ्वार को सुधार कर निम्न गुणों से अनुग्रहित किया, उसी प्रकार कैसे सँसारियों को सुधार कर अनुग्रह करें।

  • आळ्वार कहते हैं “आदलाल् पिरवि वेन्डेन्” मतलब इस सँसार में मैं पैदा होना नहीं चाहता हुँ – इससे यह साबित होता हैं की उन्हें यह ज्ञात हैं की प्रकृति सम्बन्ध एक जीवात्मा के लिए सही नहीं हैं ।
  • आळ्वार को स्वरूप यथात्म्य ज्ञान (आत्मा का निजस्वरुप) अर्थात भागवत शेषत्व का परिपूर्णज्ञान है क्यूँकि वे कहते हैं “ पोनगम शेयद सेशम् तरुवरेल पुनिदम” जिसका मतलब हैं श्रीवैष्णव का शेषप्रसाद (झूठा किया गया प्रसाद ) ही श्रेष्ठमहाप्रसाद है।
  • इन्हें साँसरिक विषय भोग और आध्यात्मिक विषयों का भेद ज्ञान स्पष्ठ रूप से है क्यूँकि वे कहते हैं “ इच्चुवै तविर अच्चुवै पेरिनुम वेण्डेन” – मतलब हैं मेरे लिए पेरिय पेरुमाळ (भगवान) के सिवा कोई भी चीज़ अनुभव के योग्य नहीं हैं।
  • आळ्वार कहते हैं “ कावलिल पुलनै वैत्तु ” मतलब अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना, इससे यह पता चलता हैं की वे इन्द्रियों को जीत कर अपने वश में उन्हें रखा हैं ।
  • आळ्वार कहते हैं “ मून्नु अनलै ओम्बुम कुरिकोल अणदंण्णमै तन्नै ओलित्तिट्टेन” – अर्थात मै कर्म योगादि मार्गो कों त्याग दिया हुँ । इससे यह साबित होता हैं की आळ्वार ने (भगवान को पाने के लिए) सँसार के अन्य उपायों(रास्ते) का परित्याग किया हैं ।
  • आळ्वार को उपाय यथात्म्य ज्ञान संपूर्ण रूप से है। यह विषय हमें उनकी कहावत “ उन अरुल एन्नुम आचै तन्नाल पोय्यनेन वन्दुणिंदेन ” अर्थात मै यहाँ केवल आपके दया को उपाय मानकर ,पूरी तरह से निर्भर होकर आया हूँ ।

अन्तिम मे आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै कहते हैं आळ्वार के इन विशेष गुणों के कारण वे पेरियपेरुमाल को अत्यन्तप्रिय है जैसे बताते हैं “ वालुम शोम्बरै उगत्ति पोलुम” अर्थात जो भगवान को पूरि तरह शरणागति करते है वे भगवान के अत्यन्त प्रीति का पात्र है।

वेद सार के परिपूर्ण ज्ञानि और आळ्वार से किये गए शास्त्रानुसार कार्यों के गुण गाने वेद विद्वान से कीर्तित आळ्वार का कीर्तन मामुनिगळ करते हैं । आळ्वार  के अर्चानुभव को हम यहाँ पढ़ सकते हैं ।

आळ्वार की वैभवता को जानने के बाद आईये अब हम उनका दिव्य चरित्र जानने के लिए प्रयत्न करेगेँ।

उनके जन्म काल में नम्पेरुमाळ के दिव्य आशीर्वाद से आळ्वार शुद्धसत्व गुणों से ‘विप्रनारयण’ नाम से जन्म लेते हैं । कालाणुगुन किये जाने वाले पूरे संस्कार (चौलम् , उपनयनादि) प्राप्त करते हैं और सारे वेद वेदांग का अर्थ सहित अध्यायन करते हैं । ज्ञानवैराग्य संपन्न विप्रनारायण श्रीरंगं पहुँचकर पेरियपेरुमाळ की पूजा करते हैं । उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पेरियपेरुमाळ अपना दिव्य मँगल सौन्दर्य दर्शन का अनुग्रह करके उनकी भक्ति को बढ़ाते हैं और श्रीरङ्गम् में ही आपश्री के नित्यनिवास की व्यवस्था करते हैं ।

कैंकर्य पण्डित जैसे पुण्डरीक (उत्तम भक्त), मालाकार (मथुरा मे श्रीकृष्ण और बलराम को पुष्पमाला बनाकर समर्पित करते थे), गजेन्द्र और अपने विष्णुचित्त (पेरियाळ्वार आठ फूलों से सुन्दर माला बनाकर एम्पेरुमान को अलंकरण करते थे ) के पद छाया को अनुसरित विप्रनारायण एक सुन्दर नन्दनवन का निर्माण करते हैं और प्रतिदिन पुष्पमाला बनाकर पेरिय पेरुमाळ को समर्पित करते थे ।

एक दिन तिरुकरम्बनूर गाँव वाली देवदेवि नामक वेश्या उरैयूर से अपने गाँव को लौटते समय सुन्दर पुष्पों से और पक्षियों से भरे हुए उस बगीचे को देखकर आश्चर्यचकित होकर नन्दनवन आ पहुँचती हैं ।

उस समय मे देवदेवि, सुन्दर मुखी, सर पे लंबे सुन्दर केश, सुन्दर वस्त्र पहने, तुलसि और पद्ममाला अलंकृत , द्वादश उर्ध्वपुण्ड्र से तेजोमय, पौधों को पानी देने वाले उपकरण को हाथों में लिए हुए विप्रनारयण को देखती हैं । विप्रनारायण कैंकर्य मे निमग्न रहते हैं और उनकी दृष्ठि उस वेश्या पे नही आती हैं । तब देवदेवि अपनि सहेलियों से पूछती हैं की “यह मनुष्य पागल हैं या अपुरुष है जो अपने सामने खडि सौन्दर्यराशी को देख नही रहा हैं ” ।
सहेलियाँ जवाब देती हैं की वे विप्रनारायण हैं , भगवान श्रीरंगनाथ का कैंकर्यं करते हैं और उनकी सुन्दरता की ओर नही देखेंगे । सहेलियाँ देवदेवि को चुनौती देते हैं की यदि विप्रनारायण को छः महीनों मे देवदेवी अपनी तरफ मोड लेती हैं तब वे मानेंगेँ की वह लोकत्तर सौन्दर्य राशी है और छः महीन उनकी दासि बन जाएँगी। उस चुनौती को स्वीकार करके देवदेवि अपने आभरण सहेलियों को देकर एक सात्विक रूप ले लेती हैं ।

देवदेवि विप्रनारायण के पास जाकर उन्हें प्रणाम करते हुए भगवान के अत्यन्त आंतरांगिक सेवा में निमग्न हुए भागवत की शरण में अपने आप को पाने की इच्छा प्रकट करती हैं । आळ्वार से देवदेवि कहती हैं की वह आळ्वार भिक्षाटन पूर्ती करके लौट आने तक निरीक्षण करेँगी । विप्रनारायण उनकी विनती स्वीकार कर लेते हैं । तब से देवदेवि विप्रनारायण की सेवा करते हुए उनका शेषप्रसाद पाते कुछ समय बिताती हैं ।

एक दिन देवदेवि बगीचे मे काम करते समय बहुत बारिश/बरसात होती हैं । तब देवदेवि गीले कपडों से विप्रनारायण के आश्रम में प्रवेश करती हैं । विप्रनारायण पोंछ ने के लिए अपनी ऊपर की वस्त्र को देते हैं । उस समय दोनों अग्नि और घी की तरह नजदीख हो जाते हैं । अगले दिन देवदेवि अपने आभरणों से अलंकृत होकर विप्रनारायण के सामने पेश आती हैं । उनकी सौंदर्य देखकर विप्रनारायण उस दिन से उनका दास/सेवक बन जाते हैं और भगवान का कैंकर्य को भूल जाते हैं और पूरी तरह से छोड देते हैं । देवदेवि विप्रनारायण के ऊपर कुछ समय तक अपना कपट प्रेम दिखाती हैं । उस प्यार को देख कर विप्रनारायण पूरी तरह से सेवक बन जाते हैं । देवदेवि विप्रनारायण की धन धौलत को हडप कर उन्हें बाहर धकेल देती हैं। विप्रनारायण उस दिन से देवदेवि की अनुमति के लिये उनकी आँगन मे प्रतीक्षा करते हुए समय बिताने लगे। एक दिन भगवान श्रीरंगनाथ(पेरियपेरुमाळ) और माता श्रीरंगनायकि(पेरियपिराट्टि) टहल रहे थे और उस समय विप्रनारायण को देख कर श्रीरंगनायकि अपने स्वामि से विचार करती हैं की वेश्या गृह इन्तज़ार करने वाला ये व्यक्ति कौन है। तब भगवान श्रीरंगनाथजी उत्तर देते हैं की ये उनका कैंकर्य करने वाला भक्त था लेकिन अब वेश्यालोल होकर एसे तडप रहा है। तब पुरुषाकार रूपिणि माता श्रीरंगनायकि श्रीरंगनाथजी से पूछते हैं ” एक अंतरङ्गिक कैंकर्य करने वाला भक्त विषयभोगों में डूब रहा हैं और वे उसे कैसे छोड रहे हैं । इनकी माया को दूर करके फिर से इन्हें अपने कैंकर्य मे लगा दीजिये”। भगवान श्रीरंगनाथ श्रीरंगनायकि की बात मान लेते हैं और उन्हें सूधारने के लिये अपने तिरुवाराधना(पूजा) से एक स्वर्ण पात्र को लेकर अपना रूप बदल कर देवदेवि के घर जाकर उनके दरवाज़ा पे कटखटाते हैं । तब देवदेवि उनसे अपने बारे में पूछने से बताते हैं की वे विप्रनारायण के दास अळगिय मणवाळन हैं । विप्रनारायण ने आप के लिए ये स्वर्ण पात्र (कटोरा) भेजा हैं । ये सुनकर देवदेवि आनन्द से विप्रनारायण को अन्दर आने के लिए आज्ञा दे देती हैं अळगिय मणवाळन विप्रनारायण के पास जाकर देवदेवि की मंज़ूरी बताते हैं । विप्रनारायण देवदेवि के घर पहुँच कर फिर से विषयभोगों में डूब जाता हैं । पेरियपेरुमाळ अपने सन्निधि को लौट कर आदिशेष पे आनंद से लेट जाते हैं ।

अगले दिन सन्निधि पूजारियोने पूजा करने के द्रव्य में एक पात्र कम पाया और इस विषय को महाराज तक पहुँचाते हैं । महाराजा पूजारियों की अश्रद्धता पे आग्रह करते हैं ।एकनक सेविका कुएँ से पानी लाते समय , सुनती हैं की उनके रिश्तेदारों में एक रिश्तेदार को राजा के आग्रह का पात्र होना पड़ा हैं और इस कारण वह उन्हें बता देती हैं की विप्रनारायण ने देवदेवि को उपहार के रूप मे एक स्वर्ण पात्र दिया हैं जिसे देवदेवि ने अपनी तकिया के नीछे रखा हैं । पूजारी ने महाराजा के सैनिकयों को विषय की सूचना कि और तुरन्त कर्मचारियों ने देवदेवि के घर पहुँचकर पात्र खोज निकालते हैं । देवदेवि के साथ विप्रनारायण को निर्भन्ध (गिरफ्तार)‌ कर देते हैं । राजा ने देवदेवि से पूछा ‘ कोई देता भी हैं तब भी भगवान का पात्र कैसे ले सकती हो’।देवदेवि ने राजा से कहा ’मुझे यह नही मालूम की यह पात्र भगवान का है, विप्रनारायण ने इसे अपना पात्र कहकर अपने दास अळगिय मणवाळन के द्वारा भेजा हैं और इस कारण निसंकोच से स्वीकार किया हैं ’। ये सुनकर विप्रनारायण चोक कर कहते हैं ‘न ही उनके कोई दास हैं और न ही कोई स्वर्ण पात्र उनके पास हैं ’ । यह वाद-विवाद सुनकर राजा देवदेवि को जुरमाना डाल कर छोड देते हैं । पात्र को भगवान के सन्निधि मे वापस कर देते हैं और विचारण पूरी होने तक विप्रनारायण को कारागृह(जैल) मे रखने के लिए आज्ञा दिया।

घटित संघटनों को देख कर माता श्रीरंगनायकि ने भगवान श्रीरंगनाथ से विप्रनारायण को अपने लीला की नहीं अपनी कृपा का पात्र बनाने की  विनती करती हैं । भगवान श्रीरंगनाथ उनकी बात मान लेते हैं और  उस दिन रात को महाराजा के सपने मे साक्षात्कार होकर  कहते हैं  की विप्रनारायण  मेरा अत्यंत अन्तरङ्गिक कैंकर्य करने वाले  भक्त है।  विप्रनारायण के प्रारब्द कर्म को मिटाने के लिए  मुझ से रचि हुई यह  रचना है। भगवान श्रीरंगनाथ  महाराजा को आदेश करते हैं की विप्रनारयण को तुरन्त छोड़ दे और  उन्हें उनकी पूर्व कैंकर्य(भगवान को पुष्पमाला बनाने की सेवा )में जुटाने की आज्ञा देते हैं । महाराज नीन्द से जाग उठते हैं  और  विप्रनारयण का वैभव जानकर उन्हें  आज़ाद कर देते हैं और सपने का वृतान्त सभी को बता देते हैं ।  विप्रनारयण को  धन दौलत से गौरवान्वित करते हैं और घर भेज देते हैं ।तब विप्रनारयण भगवान की महानता और उन्हें सुधार ने के लिए भगवान के प्रयास को महसूस करते हैं । इस साँसारिक भोगों को छोड देते हैं और  भागवतों का श्रीपाद तीर्थं स्वीकार करते हैं ।( भागवतों का श्रीपाद तीर्थं समस्त पापों का प्रायश्चित करता  है)

तत्पश्चात विप्रनारयण तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार एवं भक्तांघ्रिरेणु के नामों से मशूर हुए । तोण्डर = भक्त , अडि/ अंघ्रि = पाद पद्म , पोडि/ रेणु = धूल। पूरा अर्थ है- भगवत भक्तों का पाद धूल।अन्य आळ्वार से अद्वितीय वैभवता इन आळ्वार की हैं – केवल इन्हीं के नाम में भागवत शेषत्व का प्रकाश होता हैं ।जैसे तिरुवडि(हनुमान/गरुड़ ) ,इळय पेरुमाळ (लक्षमण) एवं नम्माळ्वार (शठगोप) ने भगवान के अलाव किसी भी अन्य विषय को मूल्यवान नहीं माना वैसे ही तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार भी कहते हैं “ इन्दिर लोकं आलुं अच्चुवै पेरिनुं वेंडेन” – अर्थात मुझे श्री वैकुण्ठ के बारे मे सोचने की भी इच्छा नहीं हैं मुझे केवल श्रीरंग क्षेत्र मे पेरिय पेरुमाळ का अनुभव चाहिए। पेरियपेरुमाळ के कृपा से ही उनमे बद्लाव आने के कारण ,आळ्वार उन पे बेहद आभारी हो चुके थे और इसी कारण अन्य आळ्वारों की तरह दिव्यदेशो मैं विराजमान अर्चामूर्तियों के बारे मे प्रबन्ध गाने से भिन्न केवल पेरियपेरुमाळ को ही अपना प्रबन्ध समर्पित किया हैं । आळ्वार के अटूट विश्वास और पेरुमाळ पे वास्तल्य को देखकर पेरियपेरुमाळ भी उस प्यार का प्रति फल चुकाते हुए उन्हें परिपूर्ण ज्ञान से अनुग्रह करते हैं और अपना पर्वतादिपञ्चक(एम्पेरुमान के पाँच निवास क्षेत्र – विवरण यहाँ पढ़ सकते हैं ) मे स्थित विविध नाम, रूप, दिव्य लीलाओं को श्रीरंगम से ही आळ्वार को दर्शन कराते हैं । देवदेवि भी आळ्वार की भक्ति और ज्ञान को देख कर अपना सार धन भगवदर्पित करके सेवा निरत हो जाती हैं ।

पर भक्ति , पर ज्ञान और परम भक्ति में डुबे और अपना सर्वस्व पेरिय पेरुमाळ को मान आळ्वार तिरुमंत्र अनुसन्दान और नाम संकीर्तन से पेरिय पेरुमाळ को निरन्तर अनुभव करते थे । अपने दिव्य अवस्था का अनुभव करते हुए , आळ्वार घोषित करते हैं की यम राज को देखकर श्री वैष्णव को कम्पित होने की आवश्यकत नहीं हैं । आळ्वार कहते हैं की यमराज के दूत श्री वैष्णव के तिरुवडि पाने के लिए काँक्षित होते हैं और एक श्री वैष्णव दूसरे श्री वैष्णव के श्री पाद पद्मों को पूजनीय मानते हैं । जैसे सौनका ऋषि ने सदानन्दर को एम्पेरुमान के दिव्य नामों की वैभवता समझाई हैं उसी तरह आळ्वार पेरिय पेरुमाळ के सामने तिरुमालै गान करते हैं । जैसे नम्माळ्वार अचित तत्व के दोषों को पहचानते हैं (२४ तत्व – मूल प्रकृति ;महान ; अहँकाराम ; मनस ; पाँच ज्ञान-इन्द्रिय ,पाँच कर्म-इन्द्रिय, पाँच तनमात्र , पाँच भूत ), आळ्वार भी अचित तत्व स्पस्ट रूप से पहचानते हैं जैसे “पुरम सुवर ओट्टै माडम” मतलब यह शरीर केवल बहार का दीवार हैं और आत्मा ही अन्दर निवास करता हैं और नियंत्रक हैं । आळ्वार प्रतिपादित करते हैं की जीवात्मा का स्वरूप एम्पेरुमान के भक्तों का सेवक होना हैं और यह विषय “अड़ियारोरक्कु” में बताते हैं मतलब जीवात्म भागवतों का सेवक हैं । तिरुमन्त्र के निष्ठा से परिपूर्ण आळ्वार “मेम्पोरुळ ” पाशुर में प्रकट करते हैं की केवल एम्पेरुमान ही उपाय हैं जो तिरुमालै प्रबन्ध का सार हैं । “मेम्पोरुळ ” पाशुर के अगले पाशुरों में ऐलान करते हैं की भागवत सेवा ही श्री वैष्णव का अंतिम लक्ष्य हैं और उनके तिरुपळ्ळियेळ्ळुचि के अन्तिम पाशुर में एम्पेरुमान को विनती करते हैं “उंनडियार्क्काटपडुताय” जिसका मतलब हैं मुझे आपके भक्तों का अनुसेवी बना दीजिये । इस तरह ,आळ्वार इन महान सिद्धान्तों को पूरे दुनिया की उन्नती की आकांक्षा से अपने दो दिव्य प्रबन्ध तिरुमालै और तिरुपळ्ळियेळ्ळुचि से समर्पण किया हैं ।

तनियन:

तमेव मत्वा परवासुदेवम् रन्गेसयम् राजवदर्हणियम् |

प्राभोद्कीम् योक्रुत सूक्तिमालाम् भक्तान्ग्रिरेणुम् भगवन्तमीडे ||

source

-अडियेन शशिधर रामानुज दासन

आण्डाल

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र : आशड मास, पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र

अवतार स्थल : श्री विल्लिपुत्तूर

आचार्य : पेरियाल्वार

ग्रंथ रचना : नाच्चियार तिरुमोलि, तिरुप्पावै

तिरुप्पावै ६००० पड़ी व्याख्यान में, श्री पेरियवाच्चान पिल्लै सर्वप्रथम अन्य आल्वारों की तुलना में आण्डाल के वैभव और महत्व का प्रतिपादन करते है | वे विभिन्न प्रकारों के जीवो का उदहारण देते हुए अत्यंत सुन्दरता से इनका विभाग करते है और इनके बीच का फर्क समझाते है जो आगे प्रस्तुत है :

सर्वप्रथम : संसारियो ( देहात्म अभिमानी संसारिक जन ) और ऐसे ऋषि जिन्हें स्वरूप ज्ञान का साक्षात्कार हुआ है इनमे छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

दूसरा : पूर्वोक्त ऋषियों (जिन्हें अपने बल बूते पर आत्म साक्षात्कार हुआ है, जो कभी कभी अपने स्थर से नीचे गिर जाते थे) और आल्वारों (जिन्हें केवल भगवान के निर्हेतुक कृपा से आत्म साक्षात्कार हुआ है और जो अत्यंत शुद्ध है) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

तीसरा : पूर्वोक्त आल्वारों (जो कभी कभी स्वानुभव और मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) और पेरियाल्वार (जो सदैव मंगलाशाशन पर केन्द्रित थे) में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है |

चौथा : पेरियाल्वार और आण्डाल में भी छोटे पत्थर और बड़े पर्वत का फर्क है | इसके अनेनानेक कारन है जो निम्नलिखित है

) अन्य आल्वारों को सर्वप्रथम भगवान के निर्हेतुक कृपा के पात्र बनाकर सुसुप्त बद्ध जीवो को जगाया (दिव्य ज्ञान – भगवत विषय) | परन्तु श्री आण्डाल अम्मा ने (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) भगवान को अपनी नीदं से जगाया और उनके कर्तव्य का स्मरण कराया (सारे जीवो का संरक्षण) | नंपिल्लै ने तिरुविरुत्तम और तिरुवाय्मोलि के व्याख्या में यह प्रतिपादित किया है की आल्वार संसारी ही थे जिन पर भगवान का निर्हेतुक कृपा कटाक्ष हुआ है और अत: भगवान से दिव्य ज्ञान प्राप्त किये है | इसके विपरीत में आण्डाल अम्मा तो साक्षात् भू देवी का अवतार स्वरूप है, जो नित्यसूरी है, और भगवान की दिव्य महिषी है | इनके मार्गदर्शन में चलते श्री पेरिय वाच्चान पिल्लै ने भी यही निरूपण दिया है |

) आंडाल अम्मा एक स्त्री होने के नाते उनका भगवान के साथ पतिपत्नी का सम्बन्ध स्वाभाविक था | अत: इसी कैंकर्य का आश्रय लेकर उन्होंने कैंकर्य किया | इसके विपरीत देखा जाए तो अन्य आल्वार को पुरुष देह प्राप्त हुआ था | इसी कारण कहा जाता है की आण्डाल अम्मा और इन आल्वारों के भगवद प्रेम में बहुत अन्तर है | आण्डाल अम्मा का भगवद प्रेम आल्वारों के भगवद प्रेम से उत्कृष्ट और कई गुना श्रेष्ठ है |

पिल्लै लोकाचार्य स्वरचित श्रेष्ठ और उत्तम ग्रंथ श्री वचन भूषण में आण्डाल अम्मा के वैभव को इन निम्नलिखित सूत्रों से दर्शाते है जो इस प्रकार है :

सूत्र २३८ : ब्राह्मण उत्तम राणा पेरियाल्वारुम तिरुमगलारुम गोपजन्मत्तै अस्थानं पन्ननिण्णार्घळ

पिल्लै लोकाचार्य इस सूत्र में बिना जन्म, जाती, इत्यादी के भेदभाव से भागवतो की श्रेष्ठता को समझाते है | यहाँ वे यह समझाते है की ऐसे कई भागवत है जो स्वरुपनुरूप कैंकर्य और भगवद अनुभव हेतु विभिन्न योनियों में जन्म लेना चाहते है | वे आगे कहते है की हालाँकि पेरियाल्वार और आण्डाल अम्मा ने ब्राह्मण योनी में जन्म लिया परन्तु वे दोनों चाहते थे की वे वृन्दावन के गोपी बनकर भगवान की सेवा करे | आण्डाल अम्मा ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है की भगवान को प्रिय कैंकर्य ही सभी जीवो का लक्ष्य और उद्देश्य है | इसीलिए हम सभी को ऐसे कैंकर्य का गुन गान करना चाहिए और चाहे कैंकर्य किसी रूप में हो ऐसे कैंकर्य की चाहना करनी और होनी चाहिए |

सूत्र २८५ : कोडुत्तुक कोळ्ळाते कोण्डत्तुक्क कैकुलि कोडुक्कवेन्णुम

इस प्रकरण में, पिळ्ळै लोकाचार्य जी कहते है की कैंकर्य किस प्रकार करना चाहिए | यह सूत्र २३८ से संबंधित है जिसमे लोकाचार्य कहते है कि किस प्रकार एक जीव को चाहना होनी चाहिए की भगवान् को प्रिय सेवा में कैसे तत्पर रहे | पूर्वोक्त सूत्र (२८४) में कहते है की कैंकर्य निस्वार्थ और अन्याभिलाश रहित होनी चाहिए | कैंकर्य के बदले में किसी भी प्रकार की चाहना नहीं होनी चाहिए | यानि तुच्छ फल की प्राप्ति हेतु कैंकर्य नहीं करना चाहिए | लेकिन इस सूत्र में लोकाचार्य जी कहते है की प्रत्येक जीव को भगवान का कैंकर्य करना चाहिए और अगर भगवान हमारे कैंकर्य से प्रसन्न है तो उनके प्रति और कैंकर्य करना चाहिए | श्री वरवरमुनि इस भाव को अत्यंत स्पष्ट और सरल रूप में आण्डाल अम्मा की स्वरचना नाच्चियार तिरुमोळिके ९.७ पासुर इन्रु वाण्तु इत्तनैयुम चेय्दिप्पेरिल णान् ओन्रु नूरु आयिरमागक्कोडुत्तु पिन्नुं आळुम चेय्वान” से समझाते है | इस पासुर में गोदाअम्मा जी कहती है की पूर्वोक्त पासुर के अनुसार उनकी इच्छा थी की वे भगवान तिरुमालिरुन्सोलै अळगर को १०० घड़े माखन और १०० घड़े मिश्रान्न समर्पित करे और जब उन्होंने यह सेवा सम्पूर्ण किया तो उन्होंने देखा की किस प्रकार भगवान उनकी इस सेवा से संतुष्ट है और आनंदोत्फुल्ल चित्त भाव से समर्पित भोग्य आहार को ग्रहण किये | तदन्तर गोदा अम्मा भी और हर्षोत्त्फुल्ल भाव से कही मै आपके के लिए इसी प्रकार की सेवा आशारहित होकर मै तत्पर रहूंगी और आपकी सेवा का आनंद का रसास्वादन करूंगी | अत: कुछ इस प्रकार से गोदा अम्मा ने स्वरचित पासुरों में हमारे संप्रदाय के उच्च कोटि विषय तत्वों को अत्यंत सरल रूप में प्रकाशित किया है |

तिरुप्पावै के २०००पड़ी” और ४०००पड़ीके व्याख्यान कर्ता श्री आई जनन्याचार्य अपने व्याख्या की भूमिका में तिरुप्पावै के वैभव को अति सुंदर रूप में वर्णन करते है | इस भूमिका में वे श्री रामानुजाचार्य के समय हुई एक घटना का उदाहरण देते हुए कहते है की स्वयं गोदा देवी (जो आळ्वारों के उत्तम गुणों का समागम है) ही सर्वोत्कृष्ट और योग्य है जिनसे हम सभी उनकी स्वरचित भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के रस का आस्वदान कर सकते है | इसी में श्री रामानुजाचार्य से एक बार कई शिष्यों ने निवेदन किया की वे गोदा अम्मा जी के भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा करे | तब श्री रामानुजाचार्य ने कहा हे उपस्थित शिष्यों ! आप सभी भलीभाँती जानते है की तिरुप्पल्लाण्डु की कथा और श्रवण करने के लिए बहुत से वैष्णव होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै के नहीं | क्योंकि तिरुप्पल्लाण्डुनिम्न स्थर पर भगवद मंगलाशासन के लिए ही किया गया था और इसकी कथा और श्रवण करने के लिए बहुत सारे योग्य लोग होंगे परन्तु भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की रचना श्री गोदा अम्मा जी ने भागवतो का मंगलाशासन के लिए किया है जो अत्यंत उच्च श्रेणी (चरमपर्व) की रचना है और जिसका रसास्वादन  कुछ महा रसिक भागवत ही कर सकते है | आगे रामानुजाचार्य कहते है की तिरुप्पावै की कथा और श्रवण के लिए पुरुष कभी भी योग्य नहीं है क्योंकि गोदा अम्मा जी के कैंकर्योत्फुल्ल और भावुक हृदय और तिरुप्पावै के गोपनीय अर्थों को समझने के लिए हमें भी पतिव्रता स्त्री (जो पति पर पूर्ण रूप से निर्भर होती है) के अनुसार भगवान की अहैतुक और निर्हेतुक कृपा पर निर्भर होना चाहिए | आगे और भी कहते है की भगवान की पत्नियाँ (जो स्वानुभव की प्रतीक्षा से कैंकर्य में तत्पर है) भी भावमुग्ध भावनामृत तिरुप्पावै की कथा और श्रवण नहीं कर सकती है | इसका पूर्ण श्रेय केवल श्री गोदा अम्माजी का ही है |

श्री वरवरमुनि स्वरचित उपदेश रत्नमाला के २२, २३, २४ पासुर में गोदा अम्मा जी के वैभव का गुण गान करते है जो इस प्रकार है :
पासुर २२ : श्री वरवरमुनि किस प्रकार भावोत्फुल्ल होकर सोचते है, किस प्रकार माता गोदा ने अपने निज निवास परमपद को छोड़कर, उन्हें बचाने के लिए (बद्ध जीवो का उद्धार हेतु) इस भव सागर में श्री पेरियाल्वर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई | कहा जाता है की जिस प्रकार नदी में अपने शिशु को डूबते हुए  देखकर उसकी माता स्वयं नदी में कूदती है ठीक उसी प्रकार सभी जीवों की माता गोदा अम्मा भी इस भव सागर में कूदती (अवतार लेती)  है |

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पासुर २३ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा के तिरुनक्षत्र की भांति कोई और नक्षत्र नहीं हो सकता है क्योंकि उनका तिरुनक्षत्र सर्वश्रेष्ट और अत्योत्तम है |
पासुर २४ : इस पासुर में श्री वरवरमुनि कहते है की गोदा अम्मा “अंजु कुडी” की बेटी है | उनके दिव्य कार्य अन्य आल्वारों के कार्यों से भिन्न और सर्वोत्कृष्ट है | और किस प्रकार से उन्होंने भगवान के प्रति अपने निष्क्रिय प्रेम भावना को छोटे उम्र में ही प्रकाशित किया | पिल्लै लोकम जीयर “अंजू कुडी” का मतलब समझाते हुए कहते है :
१) जिस प्रकार पांडवो के वंश का अंतिम उत्तराधिकारी परीक्षित महाराज थे उसी प्रकार हमारे आल्वारों के वंश की अंतिम उत्तराधिकारी गोदा अम्मा जी है |
२) वे आल्वारों के प्रपन्न कुल में अवतरित हुई |
३) वे पेरियाल्वार (जो सदैव भगवान के लिए भयभीत थे और मंगलाशसन किया करते थे) की उत्तराधिकारी थी |

कहा जाता है कि गोदाअम्माजी पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठावान थी | कहते हैं कि पेरिय आळ्वार की भगवान में रति के कारन ही श्री आण्डाल अम्माजी भी भगवान में रति से संपन्न हुई और तदन्तर उनका मंगलाशाशन कर गुणगान किया | निम्नलिखित स्व वचनों पर आधारित कुछ प्रस्तुत है :

१) आप श्री अपने नाच्चियार तिरुमोळि के १०.१० वे पासुर में कहती है : ” विल्लिपुदुवै विट्टूचित्तार तंगळ देवरै वल्ल परिचु वरुविप्परेल अदु कान्ण्दुमे ” अर्थात वे स्वत: अपनी ओर से भगवद आराधना नहीं करेंगी अपितु अगर उनके पिताश्री भगवान को स्वयं बुलाकर मनाएंगे तभी आप श्री भगवद आराधना करेंगे |

२) श्री वरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला में सुन्दर रूप से पहले १० आळ्वारों का परिचय देते हुए तदन्तर “श्री गोदा अम्माजी”, “मधुर कवि आळ्वार”, “श्री भाष्यकार – एम्पेरुमानार” का परिचय देते है क्योंकि ये तीन मुख्यत: आचार्य निष्ठावान है |

पूर्वोक्त वाक्यांशों को ध्यान में रखते हुए, श्री गोदाम्माजी के चरित्र का संक्षिप्त वर्णन का अनुभव अब करे :

आण्डाल जी श्री विल्लिपुत्तूर के तुलसी वन (जहा वर्तमान नाच्चियार मंदिर है) में अवतरित हुई थी | जिस प्रकार राजा जनक की भूमि में भू सिंचन के जयिरे प्राप्त शिशु का नाम (हल के नाम के अनुसार) सीता रखा गया, उसी प्रकार श्री पेरियाल्वार ने तुलसी वन में प्राप्त शिशु (जो साक्षात् भू देवी की अवतार है) का नाम कोदै (गोदा – अर्थात माला) रखा इत्यादी |

आप श्री को बचपन से ही भगवान की दिव्य लीलाओं का रसास्वादन कराया गया था | इसी कारण आप विशेषत: भगवान से आकर्षित थी | आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार हर रोज़ वटपत्रशायी भगवान के लिए सुघंदित पुष्पों की माला बनाते थे | भगवान भावनामृत रति के कारन आप श्री भगवान को ही उचित वर मान लिया और यही सुनिश्चित किया | आप श्री के पिता के अनुपस्थिति में, आप ने भगवान की माला (जो हाल ही में भगवान को समर्पित की जाने वाली थी) को स्वयं पहनकर आईने के सामने खड़ी होकर सोचने लगी – अरे ! कितनी सुन्दर माला है | मै खुद इस माला के प्रति आकर्षित हो रही है | क्या यह माला पहनकर मै भगवान के साथ योग्य हूँ या अयोग्य हूँ ?  ऐसा सोचकर तदन्तर आप श्री ने माला को उक्त जगह पर रख दी | तन्दंतर आप श्री के पिता, श्री पेरियाल्वार आये और यही माला भगवान को अर्पण किये | यह घटना क्रम कई दिनों तक चल रहा था | अचानक एक दिन आप श्री के पिता ने देखा – आप श्री भगवान के भोग्य वस्तु को (असमर्पित माला) स्वयं पहनकर उसका रसास्वादन कर रही थी | यह देखकर आप श्री के पिता बहुत व्याकुल और निराश हुए और तदन्तर उन्होंने यह माला भगवान को अर्पण नहीं किया | उस रात, भगवान स्वयं आप श्री के पिता जी के स्वप्न में आकर पेरियाल्वार से पूछे : श्रीमान, आप मेरे लिए फूलो की माला क्यों नहीं लाये ? आळ्वार ने कहा – आप सर्वज्ञाता है| मेरी बेटी ने असमर्पित माला को स्वयं पहन लिया | इसी कारण आप को यह उच्श्रिष्ट माला अर्पण नहीं किया | तदन्तर भगवान बोले – आपने ऐसा क्यों किया ? मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की आप की बेटी के पहनने के कारन एक विशेष भक्तिरस की सुगंध आई | इस कारन आप इस कर्म को अनुचित ना समझे | मुझे ऐसी मालाये बहुत पसंद है | ऐसा भगवान से सुनकर अत्यंत प्रसन्न और भावुक आळ्वार ने प्रतिदिन – माला बनाकर, फिर अपनी बेटी को यही माला पहनाकर,फिर भगवान को अर्पण करना शुरू किया | अत: इस प्रकार से अपनी बेटी के प्रति उनका सम्मान और बड़ गया |

श्री आण्डाल नाच्चियार, जन्म से ही अत्यंत भक्ति भाव (परम भक्ति) से संपन्न थी क्योंकि आप श्री भू देवी की अवतार है और स्वभावत: आप श्री को भगवान से अनुरक्ति है | कहा जाता है की : आप श्री की भगवदानुरक्ति आप श्री के पिता के भगवदानुरक्ति से अधिकाधिक और सर्वश्रेष्ठ है | इस भगवदानुरक्ति के कारन आपमें विरह भाव की व्युत्पत्ति हुई और इस कारणवश आप सदैव व्याकुलता, भगवान को तुरंत पाने की इच्छा से ग्रस्त थी (भगवान् से ब्याह रचाना करना चाहती थी) | इस भावमयी अवस्था में आप श्री ने भगवान को पति के रूप में पाने के लिए तरह तरह के उपायो का अवलम्ब शुरू किया| जिस प्रकार वृन्दावन की गोपिकाओं ने श्री कृष्ण की प्राप्ति की थी, उन्ही के अनुसार दर्शाये मार्ग में श्री गोदा अम्मा जी ने श्रीविल्लिपुत्तूर को तिरुवैप्पड़ी (वृन्दावन), वटपत्रशायी भगवान को श्री कृष्ण, भगवान के मंदिर को श्री नंद बाबा का घर, स्थानीय कन्याओं को गोपीस्वरूप इत्यादी मानकर तिरुप्पावै व्रत का शुभारम्भ किया |

आपश्री तिरुप्पावै में निम्नलिखत वेद वाक्यांशों को दर्शाती है :

१) प्राप्य और प्रापक ( उपाय और उपेय) स्वयं भगवान ही है |

२) वैष्णव शिष्ठाचार ( पूर्वाचार्य अनुष्ठान ) का प्रकाशन ( क्या सही और क्या गलत ) |

३) भगवद अनुभव सदैव भक्तों के सत्संग में करना है और अकेले (स्वार्थपर) होकर नहीं |

४) भगवान के दर्शनार्थ और शरण लेने से पूर्व, सर्वप्रथम उनके द्वारपालक, बलराम जी, यशोदा माता, नंद बाबा इत्यादियों का आश्रय लेना चाहिए |

५) हमे श्री लक्ष्मी जी के पुरुषकार से ही भगवद प्राप्ति होती है और इनका आश्रय लेना प्रपन्नों का कर्त्तव्य है |

६) हमें सदैव भगवान का मंगलाशासन करना चाहिए |

७) हमें भगवान से कैंकर्य मोक्ष की इच्छा व्यक्त करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए की भगवद-कैंकर्य का सौभाग्य प्रदान हो और हमारा कैंकर्य भगवान स्वीकार करे क्योंकि कि भगवद्कैंकर्य जीवात्मा का स्वस्वरूप है |

८) हमें पूर्ण रूप से समझना चाहिए की उपाय भगवान स्वयं है और एक क्षण के लिए यह नहीं सोचना चाहिए की स्वप्रयास भी उपाय है |

९) अन्याभिलाषी ना होते हुए,  केवल भगवदानुभव और भगवद्प्रीति हेतु भगवद्कैंकर्य करना चाहिए|

उपरोक्त व्रत के नियम पालन करने के बावजूद भी गोदा अम्माजी को भगवद-साक्षात्कार, भगवद्प्राप्ति नहीं हुई और भगवान ने उन्हें स्वीकार नहीं किया | यह जानकर, गोदा अम्माजी अत्यंत शोक ग्रस्त हुई | इसीलिए अपने असहनीय शोक और विरह भाव को स्वरचित “नाच्चियार तिरुमोलि” में व्यक्त करती है | हमारे सत्सम्प्रदाय के अनेकानेक विशेष तत्वों का निरूपण पूर्वोक्त ग्रन्थ में हुआ है | कहा जाता है कि नाच्चियार तिरुमोलि के श्रोताओं को वाकई में परिपक्व होना चाहिए वरना गलत भाव को समझेंगे | नाच्चियार तिरुमोलि में गोदा अम्मा जी कहती है ” मानिदवर्क्केंरु पेच्चुप्पदिल वाळगिन्रेन “: अगर कोई मेरे परिज्ञान के खिलाफ, बेईरादे से यह कह दे – आप श्री भगवान को छोड़कर किसी ओर से विवाहित है, मै तुरंत अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी | मै ऐसा सुनना हरकिस सहन नहीं कर सकती हूँ |

वारणमायिरम दशक पद्य में, गोदा अम्माजी स्वप्न में भगवान से ब्याह रचने की लीला का वर्णन करती है | तदन्तर भावनारसरत गोदा अम्माजी को  आप श्री के पिता ने आप श्री को श्रीरंग जी के अर्चावतार का वैभव दर्श कराया और इस कारण वश आप श्री श्रीरंग भगवान के प्रति आकर्षित हुई | परन्तु अपनी बेटी की दुर्दशा देखकर पेरियाल्वार से रहा नहीं गया और वे भी शोक और व्याकुलता से ग्रस्त हुए | एक दिन, रात्री में, भगवान श्रीरंगनाथ उनके स्वप्न में आये और कहे – आप ज्यादा चिंतित ना हो श्रीमन ! आपको मै एक अच्छा शुभ दिन बतावूँगा और उस दिन आपको आपकी बेटी को मुझे सौपना होगा ताकि उनका उनकी प्रेमिका के मिलन हो | यह सुनकर हर्षित पेरियाल्वार ने भगवान को पुनः नमस्कार किया और बेटी की बारात की तय्यारी शुरी किया | भगवान के स्वयं उनके लिए अर्थात अपनी प्रेमिका भविष्य पत्नी के लिए पालकी, चामर, छत्री और उनके नित्य और वर्तमान कैंकर्यपरों को श्रीविल्लिपुत्तूर भेजा | आळ्वार अपने इष्टदेव श्री वतपत्रशायी भगवान से आज्ञा लेकर, बेटी को पालकी में बिठाकर, पूरे बरातीयों के साथ मंगल वाद्य यंत्रो के साथ श्रीरंग की ओर रवाना हुए |

सुसज्जित, अत्यंत सुन्दर, आभूषणों से अलंकृत गोदाम्माजी ने श्रीरंग में प्रवेश करते ही, पालकी से उतरी, मंदिर में प्रवेश करते हुए, तदन्तर मंदिर के गर्भ स्थान में प्रवेश की | तदन्तर आप श्री ने साक्षात श्रीरंग के चरण कमलों को छुआ और अंतर्धान हो गयी और इस प्रकार से अपने नित्य वास परमपद में प्रवेश किया|

 

यह दृष्टांत देखकर, उपस्थित अचंबित भक्तों ने भगवान के ससुर जी का अत्यंत आदर और सत्कार किया | भगवान ने तुरंत डंका घोषणा किये की पेरियाल्वार समुद्रराज की तरह उनके ससुर हो चुके है अत: उनका विशेष आदर और सत्कार हो | तदन्तर आप श्री के पिता, पेरियाल्वार श्रीविल्लिपुत्तूर को प्रस्थान हुए और वटपत्रशायी की सेवा में संलंग हुए |

श्री गोदा अम्माजी के जीवन वृत्तान्त की असीमित वैभव को सदैव या साल में मार्गशीष मॉस में अवश्य सुनते हुए मनन चिंतन करते है | परन्तु प्रत्येक बार हमें कुछ नया सा महसूस होता है जब भी इनकी कथा का श्रवण करे क्योंकि इनके स्वरचना और अन्य दिव्यप्रबंध में ऐसे असंख्य साम्प्रदायिक तत्त्व है  जिन्हें एक बार में जाना नहीं जा सकता है |

श्री गोदाम्माजी और उनकी स्वरचित तिरुप्पावै के असली वैभव के दृष्टांत को समझने के लिए, पराशरभट्टर जी के दिव्य वचन से समाप्त करेंगे | पराशर भट्टर कहते है – प्रत्येक प्रपन्न को तिरुप्पावै का पाठ और अनुसन्धान करना चाहिए | अगर यह संभव नहीं है तो मुख्य पासुर, अगर वों भी संभव नहीं हो तो अंत के दो पासुर (शित्तम शिरुघाले ..) का नित्य पाठ अवश्य करना चाहिए | अगर यह भी संभव नहीं है, तो याद करे श्री पराशर भट्टर को, जिन्हें तिरुप्पावै अत्यंत प्रिय है और जो तिरुप्पावैरत है | केवल यही सोच भगवान को संतुष्ट करती है | जैसे एक गाय, घास की पत्तियों और नकली चर्म से बने बछडे के स्पर्श मात्र से ही निसंकोच दूध देना शुरू करती है, उसी प्रकार भगवान जीवात्मा (जो नित्य तिरुप्पावै या तिरुप्पावैरत श्रीपराशर भट्टर का पाठ मनन चिंतन करता हो) के आचार्य सम्बन्ध को जानकर संकोच रहित अपनी कृपा वर्षा बरसाते है | श्री गोदाम्माजी ने अहैतुक कृपा से इस संसार में अवतार लिया और तिरुप्पावै का विशेष प्रसाद अनुगृहित किया ताकि बद्ध जीवात्माए भी भगवान के अहैतुक कृपा के पत्र बन सके और इस संसार के भव-बंधनों से विमुक्त होकर नित्य परमपद में भगवदनुभव और भगवद्कैंकर्य के आनंद का रसास्वादन करे |

श्री गोदाम्माजी का तनियन

नीळातुंगस्तनगिरितटी सुप्तमुद्बोध्य कृष्णम्
पारार्थ्यम् स्वम् श्रुतिशतशिरस्सिद्धमद्ध्यापयन्ती ।
स्वोचिष्ठायाम् श्रजनिगळितम् याबलात्कृत्य भुङ्ते
गोदा तस्यै नम इदं इदं भूय एवास्तु भूयः ॥

अडियेन सेत्तालूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तिक रामानुज दास
अडियेन सेत्तालुर वैजयंती आण्डाल रामानुज दासी

Source

पेरियाळ्वार

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद्वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

 

periyazhwar

पेरियाळ्वार

 

तिरुनक्षत्र – स्वाति नक्षत्र , ज्येष्ठ मास

अवतार स्थल – श्री विल्लिपुत्तूर

आचार्य – श्री विष्वकसेन

ग्रंथ रचना सूची – तिरुप्पल्लाण्डु, पेरियाळ्वार तिरुमोळि

पेरियवाच्चान पिळ्ळै श्री पेरियाळ्वार के तिरुप्पल्लाण्डु व्याखा की भूमिका मे अत्यन्त सुन्दरता से उनका गुणगान करते है । पेरियवाच्चान पिळ्ळै यहाँ तादात्म्य रूप से स्थापित करते है की बद्ध जीवात्माओं को इस भव सागर से उत्थान हेतु श्री पेरियाळ्वार का अवतार हुआ है । श्री पेरियाळ्वार भगवान श्रीमन्नारायण के निर्हेतुक कृपा से सहज रूप मे भगवान श्रीमन्नारायण के दास्य से अलंकृत है । कहते है की आप श्रीमान चाहते थे की आपका जीवन केवल भगवद्-कैंकर्य मे ही होना चाहिये और इसी कारण आप ने शास्त्रों का अध्ययन कर पता लगाया कि सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य क्या है । यह (सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य के बारें मे) आपने भगवान श्री कृष्ण अवतार से संबन्धित लीला (कहते है की कंस की सभा मे प्रवेश करने से पहले श्री कृष्ण भगवान मथुरा मे प्रस्थान कर एक मालाकार के घर मे ठहरे और जहाँ उन्होने अपने वस्त्र इत्यादि बदले । तत्पश्चात उन्होने मालाकार से निवेदन किया की उन्हे निर्मल नूतन माला भेंट के रूप मे दे । मालाकार श्री कृष्ण भगवान की सुन्दरता से मुग्ध होकर अत्यन्त प्रेमभावना से भगवान को माला दिया । और जिसे स्वयम भगवान ने हर्ष से माला को स्वीकार किया) को स्मरण कर यह प्रतिपादित किया की फूलों की माला ही सर्वश्रेष्ठ कैंकर्य है । और इस प्रकार अपने शेष काल पर्यन्त तक वे भगवान के लिये स्वयम फूलों के बगीचे का निर्माण कर, फूलों के बीजों को बोकर, उसका संरक्षण कर, उत्पन्न फूलों से फूलों की माला बनाकर अत्यन्त प्रेमभावना से श्रीविल्लिपुत्तूर भगवान को अर्पण करते रहे ।

कहते है की अन्य आळ्वारों और आप श्रीमान मे आसमान और जमीन का फर्क है । अन्य आळ्वार अपने इच्छावों की पूर्ती की चाह रखते थे (भगवान की सेवा करना) । परन्तु आप श्रीमान इनके विपरीत थे । आप श्रीमान तो केवल भगवान की इच्छावों की परिपूर्णता की चाह रखते थे (यानि भव सागर मे त्रस्त सभी जीवात्माये भगवाद्-धाम जाकर नित्य कैंकर्य करे चाहे यह उनके चाहना के विपरीत क्यों ना हो) । अन्य आळ्वार सोचते थे की भगवान ही रक्षक है और इस कारण वे सभी संरक्षित है (यानी भगवान का धर्म है उनके शरणागत का संरक्षण करना) और इस प्रकार अपनी चिन्ता दूर करते थे । परन्तु आप श्रीमान तो यह सोचते थे की आप भगवान के संरक्षक है और भगवान की रक्षा, देखभाल इत्यादि करना आपका कर्तव्य है । यही बात श्री पिळ्ळै लोकाचार्य और श्री वरवरमुनि जी ने अती सुन्दरता से बताया है जिसका वर्णन अब आगे है ।

आप श्रीमान की रचना तिरुप्पल्लाण्डु भी अन्य दिव्यप्रबन्धों की तुलना मे पूर्वोक्त कारण से सर्वोत्तम माना जाता है और अत्यधिक रूप से इसीका गुणगान होता है । अन्य दिव्यप्रबन्ध हलांकि वेदान्त, अनेकानेक तत्वविषयों को प्रतिपादित करते है परन्तु इनकी गणना मे आप श्रीमान का तिरुप्पल्लाण्डु केवल भगवान का मंगलाशासन करता है । अन्य प्रबन्ध बहुत बडे है परन्तु आपकी यह रचना बहुट छोटी, सरल और स्पष्ट है । कहते है की आपने बारह पासुरों मे मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है ।

स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य अपने दिव्य ग्रंथ श्रीवचनभूषण मे कहते है – मंगलाशासन सिद्धोपाय निष्ठ भक्त का दैनिक कार्य है (यानि जो केवल भगवान ही उपाय और उपेय है मे आस्था रखता है) । श्रीवैष्णव दिनचर्य इस लिंक_1, लिंक_2 मे उपलब्ध है और इसका विवरण भी बताया जा चुका है जो की श्रीवैष्णव लक्षण के अन्तर्गत आने वाले अनुक्रम मे है ।

मंगलाशासन क्या है ? मंगलाशासन माने किसी के सुख, शान्ति, सम्वृद्धि के लिये प्रार्थना करना । सभी आळ्वार भगवान के हित के बारे मे नित्य सोचा करते थे । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य यह दर्शाते है की पेरियाळ्वार का भगवान के प्रति लगाव अन्यों से अधिकाधिक था । यह पूर्व ही आप श्रीमान के अर्चावतारनुभव मे बताया गया है ।

अब हम देखेंगे की श्री वचनभूषण के 255वा सूत्र कैसे आप श्रीमान और यतीराज जी के वैभव को दर्शाता है –

अल्लातवर्गळैप्पोळे केट्किरवर्गळ उडैयवुम्, चोल्लुकिरवरगळ उडैयवुम् तनिमैयैत् तविर्क्कैयन्रिक्के आळुमार एन्गिरवन् उडैय तनिमैयैत्तविर्क्कैकागवायित्तु भाष्यकाररुम् इवरुम् उपदेच्चिप्पतु ।

अन्य आचार्य/आळ्वारों की भान्ति, आप श्रीमान और श्री भाष्यकार ने शास्त्रों के अर्थों को उपदेश देकर सभी जीवात्वामों को सुधारकर और इन सभी को भगवान के नित्य कैंकर्य मे संलग्न किये । और इस प्रकार से आपने श्री भगवान के एकाकिपन को दूर किया क्योंकि भगवान अपने बेटों समान जीवात्मावों का नित्य हित चाहते है और सभी जीव उनका शरण पाकर उनका नित्य कैंकर्य करे । अगर कोई भी जीव इस भवसागर मे त्रस्त दिखाई पडता है तो भगवान एक दम से उदास और अप्रसन्न हो जाते है । जिस प्रकार एक पिता या माता को अपने स्वात्मज पर प्रेम भावना रहती (ज्योकि अगर उनके साथ उस वक्त नही है) है उसी प्रकार की भावना भगवान मे भी है । यहा शिक्षक-शिष्य का एकाकिपन और जीवों का उद्धार वास्तव मे महत्त्वपूर्ण उद्देष्य नहि अपितु भगवान की इच्छा की पूर्ती और जीवों का स्वभाविक रूप से कैंकर्य करना ।

श्री मणवाळमहामुनि पूर्वोक्त सूत्र की व्याख्या मे कहते है की पेरियाळ्वार को श्री एम्पेरुमान के सुशील और कोमल स्वभाव का ज्ञान था और स्पष्ठ रूप से दर्शाते है की ऐसे भगवान कभी भी जीवात्मावों के विरह मे नही रह सकते है । अतः भावनामुग्ध आळ्वार इसी भाव मे पूर्ण रूप से स्थित रहकर उनकी सेवा करना चाहते थे । श्री मणवाळमहामुनि इसके ज़रिये श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के कथन “भाष्यकार” शब्द के वैभव को भी दर्शाते है । वे कहते है – श्री भाष्यकार (स्वामि रामानुजाचार्य) ने वेदान्त के सार को अपने श्रीभाष्य मे दर्शाया है यह केवल पूर्ण रूप से भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु ही किया गया है अर्थात भगवद्-कैंकर्य है । और यह वेदान्त के मार्गदर्शन से अभिन्न है ।

श्री मणवाळमहामुनि अपने उपदेश रत्नमाला मे श्री पेरियाळ्वार के वैभव को क्रमानुसार पांच पासुरों मे वर्णन करते है जो इस प्रकार है –

पहला – सौलहवें पासुर मे, वह अपने हृदय से कहते है की ज्येष्ठ मास का स्वाति नक्षत्र अत्यन्त पावन और पवित्र है क्योंकि उसी दिन श्री पेरियाळ्वार का आविर्भाव हुआ है जिन्होने तिरुप्पल्लाण्डु का निर्माण किया । और यह पूरे विश्व के लिये शुभदायक कल्याणकारक और मंगलदायक प्रतीत हुआ है ।

दूसरा – सत्रहवें पासुर मे कहते है, हे मेरे हृदय तुम सुनो ! ऐसे महाजनों महाज्ञानीयों का कोई बराबर नही जो श्री पेरियाळ्वार के तिरुनक्षत्र का नाम सुनकर हर्ष से प्रफ़ुल्लित होते है ।

तीसरा – अठारहवें पासुर मे कहते है, भगवान का मंगलाशासन करने की उनकी इच्छा अन्य आळ्वारों की तुलना मे सर्वश्रेष्ठ है । और भगवान के प्रति वात्सल्य भाव की वजह से आप सदैव के लिये पेरियाळ्वार के नाम से जाने गए ।

चौथा – वरवरमुनि इस उन्नीवसें पासुर मे कहते है, अन्य दिव्य पासुरों की तुलना मे सर्वश्रेष्ठ और अग्रगण्य तिरुप्पल्लाण्डु है क्योंकि वह केवल भगवान के मंगलाशासन ही करता है । जिस प्रकार वेदों मे प्रणव शब्द ओम् कार है उसी प्रकार द्राविड वेद की शुरुवात तिरुप्पल्लाण्डु से होति है । हर एक आळ्वार द्वारा विरचित पासुर दिव्य अनोखा और निष्कलंक है ।

पांचवा – बीसवें पासुर मे वे अपने हृदय से कहते है तुम वेद, वेदांगो, और अन्य प्रमाणों मे ढूँधकर बतलावों की क्या तिरुप्पल्लाण्डु से बडकर कोई प्रबन्ध है और क्या पेरियाळ्वार से सर्वश्रेष्ठ और अग्रगण्य अन्य आळ्वारों मे कोई है ? अर्थात् कोई नही । उनके जैसा कोई नही ।

उनकी एक और खासियत है की वे साक्षात परब्रह्म श्री रंगनाथ जी के ससुर थे । अर्थात अपनी दत्तक पुत्री श्री आण्डाळ अम्माजी को उनको समर्पित कर और उन दोनों की विवाह करवाया ।

इस धारणा से अपने मन को एक चित्त करते हुए, उनके वैभवशाली चरित्र को आगे देखे ।

पेरियाळ्वार श्रीविल्लिपुत्तूर मे प्रकट हुए जहाँ कई सारे वेदों के तत्वज्ञ रहते थे । वे ज्येष्ठ मास के स्वाति नक्षत्र मे प्रकट हुए और उनके माता-पिता ने उनका विष्णुचित्त नाम रखा । कहते है की जैसे गरुड (जो वेदात्म से जाने जाते है – यानि जिनका शरीर ही वेद है) सदैव अपने स्वामी श्रीमन्नारायण के दिव्यचरण को पडके हुए रहकर परत्व का प्रतिपादन करते है ठीक उसी प्रकार पेरियाळ्वार ने परत्व का निरूपण दिया (अर्थात सकलगुणसंपन्न अखिल जगत के सृष्टि करता धरता भगवान श्रीमन्नारायण ही परवत्व है और यही वेदों मे प्रतिपादित है) । और इसी कारण उन्हे श्री गरुड का अंशावतार माना जाता है । हलांकि कहा जाता है की हमारे आळ्वार ऐसे जीव है जो भगवान के निर्हेतुक कृपा से चुने गए है | और जिन्होने दिव्य व्यक्तित्व तत्पश्चात प्राप्त किया ।

कहा जाता है की जिसप्रकार भगवान की कृपा से भक्त प्रह्लाद जन्म से ही भगवद्-भक्ति से संपन्न थे उसी प्रकार पेरियाळ्वार भी जन्म से श्री वटपत्रशायि भगवान की असीम कृपा से संपन्न थे ।

शास्त्र कहता है – “ना अकिंञ्चयचित्कुर्वतस्च शेषत्वम्” अर्थात् अगर जीव भगवान के लिये छोटे से छोटा कैंकर्य ना करे तो उस जीव का शेषत्व नष्ट (जीवित) नहि रहता ।

केवल भगवान की इच्छा हेतु वे सोचने लगे की अब उनको भी कुछ कैंकर्य करना चाहिये वरना उनका शेषत्व तो नष्ट हो जायेगा । इसी विचार से उन्होने अनेकानेक पुराणों, उपनिषद इत्यादि मे भगवद्-कैंकर्य के बारे मे दूंढने लगे । वे यह देखते है की सर्वेश्वर भगवान श्रीमन्नारयण मथुरा मे श्री कृष्ण के रूप मे अवतरित हुए है ज्योकि इस प्रकार से वर्णित है –

एष नारायण श्रीमान क्षीरार्णव निकेतनः ।
नाग पर्यंकम् उत्सृज्य ह्यागतो मथुरापुरीम् ॥

अर्थात् – यह श्रीमन्नारायण जिनका निज धाम श्री क्षीर सागर निकेतन है , वही अपने पर्यंक आदि शेष को छोडकर मथुरा पुरी मे श्री कृष्ण के रूप मे अवतरित हुए है ।

नम्माळ्वार कहते है – “मन्णणिन् भारम् णीकुतर्के वडमथुरैप्पिरन्तान्” अर्थात – आदि पुरुष भगवान श्रीमन्नारायण माने श्री कृष्ण भगवान धरती के भोज को कम करने हेतु अवतरित हुए है । महाभारत मे भी कुछ इस प्रकार से कहा गया है – वह नित्य भगवान श्री कृष्ण के रूप मे अवतार लेकर संत साधु योगियों इत्यादियों के समरक्षण, धर्म की स्थापना, और दुष्टों का विनाश हेतु अपने धाम द्वारका मे रहते है । ऐसे भगवान अत्यन्त सुन्दर श्री देवकी के गर्भ से जन्म लिये और उनका पालन पोषण अत्यन्त सुन्दर सुशील श्री यशोदा मय्या ने किया । ऐसे सुन्दर भगवान श्री कृष्ण जो सदैव नित्यसूरियों के भव्य मालावों से सुशोभित है, वे मालाकार (जो कंस के लिये सेवा करता था) के पास जाकर उन्से एक सुन्दर माला भेंट के रूप मे निवेदन करते है । स्वयम् भगवान ने मुझसे मेरी माला का निवेदन किया यह सोचकर मालाकार अत्यन्त प्रसन्नता से उन्हे ताज़ा और अत्योत्तम माला समर्पण करता है । यह वार्ता पुराणों, इतिहासों इत्यादि मे देखर, अचम्भित पेरियाळ्वार यह निर्धारण करते है की – भगवान को अति प्रिय सेवा है – ” माला बानाकर उनको समर्पित करना ” । और इस प्रकार से एक चित्त पेरियाळ्वार ने इस सेवा को आरंभ किया और श्रीविल्लिपुत्तूर के श्री वटपत्रशायि भगवान को यह मालायें समर्पित करने लगे ।

उस समय पाण्ड्य राज्य का राजा श्री वल्लभदेव (जिसने अपने दिव्य विजय मीन चिह्न को मेरु पर्वत पर स्थापित किया) अपने राज्य (दक्षिण मदुरै) का परिपालन अत्यन्त धार्मिकता से कर रहा था । एक रात्रि को राजा ने सोछा राज्य मे मेरा परिपालान किस प्रकार से हो रहा है ये मै अपने आखों से देखू । अतः वेश बदलकर वे अपने राज्य की नगरी मे प्रवेश किये । इसी दौरान राजा गौर करते है की एक ब्राह्मण किसी अन्य के घर के सामने बैठा हुआ था । उसके पास जाकर, राजा ने उस ब्राह्मण से पूछा – अरे ब्राह्मण ! अपना परिचय दो । ब्राह्मण तुरन्त बोला – मै हाल ही मै गंगा के किनारे गंगा स्नान करके लौटा हूँ । यह सुनकर प्रसन्न राजा ने ब्राह्मण से पूछा – अरे ब्राह्माण ! क्या तुम्हे कोई श्लोक पता है ? अगर पता है तो कृपया बतावो । तुरन्त ब्राह्मण ने कहा –

वर्षार्थमस्तौ प्रयतेत मासान् निचार्थामरत्तम् द्विशम् यतेथ ।
वार्द्दग्यहेतोर्वायास नवेण परत्र हेतोरिह जन्मनास्च ।

अर्थात् – प्रत्येक मनुष्य बारिश के चार महीने निश्चिंत रहने के लिये आठ महीने निरन्तर काम करते है, रात्री मे खुश होने के लिये दिन भर काम करते है, बुढापे मे आराम दायक ज़िन्दगी के लिए जवानि मे घोर परिश्रम करते है, अतः इस प्रकार हम सभी अगले अच्छे जन्म के लिये इस जन्म मे निरन्तर परिश्रम करते है ।

यह सुनकर राजा अपने भविष्य जन्म के बारें मे सोचने लगे । अरे ! इस जन्म मे मै तो राजा हूँ, मुझे सकल सम्पन्नों का सौभाग्य मिला है, कैसे आनन्ददायक सुख साधन है क्या ये सभी अगले जन्म मे भी मुझे प्राप्त होंगे ? अब मै क्या करू । मै अगले जन्म की तैय्यरी कैसे करू और इसका साधन क्या होगा ? किसके शरणागत होना चाहिये ? कौन परत्व को दर्शाता है ? और परत्व को किस माध्यम से प्राप्त कर सकेंगे ? इस प्रकार से विचलित राजा ने अपने राज पण्डित श्री शेल्वनम्बि से इसके बारे मे पूछा । श्री शेल्वनम्बि (जो भगवान श्रीमन्नारायण के प्रिय भक्त है) ने कहा – आप तुरन्त इस राज्य के सभी पण्डितों को बुलाये और वेदान्त दर्शन से इसका समाधान उनके माध्यम से करे । यह सुनकर प्रसन्न राजा ने (आपस्तम्भ सूत्र – “धर्मज्ञानसमयः प्रमाणम् वेदास्च अर्थात् – वेदज्ञात के कार्य ही प्राथमिक प्रमाण है और वेद द्वितीय प्रमाण है ” के अनुसार) तुरन्त पण्डितों की गोष्टि का आयोजन किया और कहे की जो कोई भी परत्व को दर्शायेगा उसे बहुमूल्य धनसम्पत्ति से भरा हुआ थैलि इनाम के रूप मे प्राप्त करेगा । इस थैलि को उन्होने अपने राज दरबार के छत से टांग दिया । इस प्रकार राजा का आमन्त्रण पाकार सभी पण्डित उनके राज दरबार मे तत्वनिरूपण के लिये उपस्थित हुए ।

वटपत्रशायि भगवान जीवों के उत्थापन के लिये, और अपना परत्व निरूपण पेरियाळ्वार के द्वारा दर्शाने के लिये, भगवान स्वयम् उनके स्वप्न मे आकर कहे – तुम उस सभा मे जाओ और मेरा परत्वनिरूपण कर अपने ईनाम को जीतके लाओ । बाकि मै सब संभालूंगा । आळ्वार यह सुनकर विनम्र होकर भगवान से कहते है – परत्व का निरूपण वेद वेदान्तों से करना है । मै तो मामूली सा ब्राह्मण मालाकार हूँ । मै भला यह कार्य कैसे सिध्द कर सकता हूँ ? भगवान आग्रह करते हुए कहते है – आप भला इन सब की चिन्ता ना करे । मै ये सब संभालूंगा । क्योंकि मै वेदों को प्रकट करता हूँ और उससे संबंधित अर्थ को भी यथा तथा दर्शाता हूँ । अतः आप निश्चिंत रहिये । भगवान का आश्वासन पाकर अगले ही दिन, ब्रह्म मुहुर्त मे उठकर (शास्त्र कहता है – ब्राह्मे मुहुर्ते च उत्थाय) अपना नित्य नैमित्य कार्य संपूर्ण कर, मदुरै की सभा के लिये रवाना हुए ।

सभा मे प्रवेश करते ही राजा और ब्राह्मनोत्तम शेल्वनम्बि ने उनको प्रणाम करते हुए स्वागत किया और उन्हे बैठने के लिये एक सिंहासन भी दिया । सभा मे उपस्थित स्थानीय पण्डितों ने राजा को बताया – आप किन्हे बुलाकार ले आए । ये तो एक तुच्छ मालाकर है । इन्हे वेद वेदान्त का परिज्ञान नही है । परन्तु राजा और शेल्वनम्बि भलिभान्ति इनके कैंकर्य और वटपत्रशायि भगवान के प्रति उनके लगाव को जानते थे । इसी लिये उन्होने उनको (पेरियाळ्वार को) परत्व निरूपण देने का मौका दिया । तदन्तर पेरियाळ्वार, भगवान की निर्हेतुक कृपा से प्राप्त दिव्य दृष्टि के आभास से वेद वेदान्त के सारतम ज्ञान को प्रस्तुत किये । जिस प्रकार श्री वल्मीकी भगवान ॠषि ने ब्रह्म के कृपाकटाक्ष से महत्त्वपूर्ण तत्वों को समझा, जैसे प्रह्लादाळ्वान भगवान के पांञ्चजन्य शंख के स्पर्श से सर्वज्ञ हुए, ठीक उसी प्रकार भगवान की निर्हेतुक कृपा से आप समझे की शास्त्रों का सार भगवान श्रीमन् नारायण ही है । इसका प्रमाण तार्किक अनुक्रम मे आगे देखेंगे ।

समस्त शब्दः मूलत्वादक्षरयो स्वभावतः समस्त वाच्य मूलत्वात् ब्रह्मणोपि स्वभावतः वाच्यवाचक संभन्धस्तयोरर्थात् प्रदीप्यते ॥

सारे अक्षर ‘अ’ अक्षर के माध्यम से ही उत्पन्न हुए है, सारे अक्षरों के अर्थ ब्रह्म से ही उत्पन्न है । अतः ‘अ’ शब्द और ब्रह्म भिन्न नही है और उनका संबन्ध स्वभाविक है ।

गीताचार्य श्री कृष्ण भगवान कहते है – “अक्षराणाम् अकारोऽस्मि” अर्थात् मै ही सारे अक्षरों के मूल ‘अ’ अक्षर हूँ ।

कहा गया है – “अकारो विष्णुवाचकम्” अर्थात् ‘अ’ अक्षर स्वयम् विष्णु यानि श्रीमन्नारायण ही है जो परमपुरुष और परमात्मा है ।

तैत्तिरिय उपनिषद् ऐसे परम पुरुष परमात्मा श्रीमन्नारायण के विशिष्ठ गुणों को इस प्रकार दर्शाता है – यता वा इमाणि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्ति अभिसम्विचन्ति, तत् विज्ञस्व ब्रह्मेति । अर्थात् – (वह) जिससे पूरा संसार और जीव की व्युत्पत्ति होती है, जिसपर पूरा विश्व निर्भर है, प्रलय् मे उस मे विलीन हो जाता है, जहा जीव मोक्ष को प्राप्त करते है, वह निश्चिंत रूप से ब्रह्म है । ऐसे परम पुरुष भगवान के तीन गुणों का प्रतिपादन हुआ है जो इस प्रकार है –

पहला – “जगत कारणत्व” – इस पूरे जगत का कारण है (वह)
दूसरा – “मुमुक्षु उपायस्त्व” – मोक्ष की चाहना रखने वालों के पूज्य देवता (वह)
तीसरा – “मोक्ष प्रदत्व” – (जो) मोक्ष दे सकता है (वह) ।

यह सरे लक्ष्ण या गुण श्रीमन्नारायण मे पूर्ण रूप मे देख सक्ते है जैसे विष्णु पुराण मे है –

विष्णोस्सकाचादुद्भूतम् जगत् तत्रैव च स्थितम् ।
स्थिति सम्यमकरर्थ्तासौ जगतोऽस्य जगच्छ सः ॥

विष्णु से ही जगत की व्युत्पत्ति होती है, प्रलय काल मे फिर से उन्मे ही लीन होता है, वही उसको संभालते है और वही विनाश भी करते है और उन्ही का शरीर ही यह पूरा जगत है ।

जैसे वराह पुराण मे ,

नारायणनाथपरो देवो ना भूतो ना भविष्यति ।
एतत् रहस्यं वेदानां पुराणां च सम्मतम् ॥

अर्थात् – श्रीमन्नारायण के जैसा परमपुरुष ना भूतकाल मे था, ना भविष्य मे होगा । यह वेदों का रहस्य है और पुराणों की भी यही संमति है ।

जैसे नारदीय पूराण मे,

सत्यम् सत्यम् पुणस्सत्यम् उद्धृत्य भुजमुञ्च्यते ।
वेदाः शास्त्रात् परम् नास्ति न दैवम् केशवात् परम् ॥

अर्थात् – मै पुनः पुनः अपनी भुजावों को उठाकर ज़ोर से बता रहा हूँ, वेद और शास्त्रों मे केशव से बडकर कोई देव परम नही है ।

अतः कुछ इस प्रकार वेद, पुराणों और इतिहासों से पेरियाळ्वार ने भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व का प्रतिपादन किया । तदन्तर, लटकी इनाम थैलि अपने आप नीचे गिर गई और तुरन्त पेरियाळ्वार उसे उठा लेते है । यह रमणीय दृष्य देखकर अचंभित स्थानीय पण्डितों के साथ राजा और शेल्वनम्बि इत्यादि सभी अत्यन्त हर्ष से उनको दण्डवत प्रणाम करते है । उपस्थित सभी कहते है – वेदों का सारतम सार उन्होने अत्यन्त सरल और सुगमता से प्रतिपादन किया है । और अत्यन्त प्रेमभाव मे, सभी उनके सत्कार मे उन्हे एक सुसज्जित हाथि पर बैठाकर, उनके चारों ओर अनेक पण्डित छत्रि और चामर पकडे हुए, धण्का घोषणा कर रहे थे – “ऐसे महनीय विश्वसनीय महात्मा जिन्होने वेदों का सार सारतम् तत्व का प्रतिबोधन किया उनका स्वागत किया जा रहा है और वही पधार रहे है” । श्री वल्लभ राजा उनका मान सत्कार कर उन्हे पट्टर्पिरान से संभोदित करते है अर्थात जिन्होने अनेकानेक भट्टरों को महान उपकार किया है । राजा भी इस सवारि मे हिस्सा लेकर अत्यन्त हर्षित होते है । और सभी जगह मे इनके आगमन का उत्सव मानाने की तय्यारि ज़ारी रही ।

जिस प्रकार एक माता/पिता अपने सन्तानों की अभिवृद्धि देखर हर्षित होते है, उसी प्रकार परमपदनाथ भगवान श्रीमन्नारायण भी हर्षित हुए । और तदन्तर स्वयम् भगवान चक्र गदा इत्यादि से सुशोभित श्री गरुड जी पर अपनी धर्मपत्नी श्री लक्ष्मी अम्मा जी के समेत विराजमान होकर उनकी सवारी के बींचों बींच प्रकट हुए । इनका सम्मान करने अन्य देवि – देवता अपने अपने परीवार सहित सभी भी प्रकट हुए । चक्र, गदा इत्यादि से सुशोभित भगवान को इस भौतिक जगत मे देखकर अपने सवारी की चिंता ना करते हुए केवल भगवान की खुशहालि हेतु हाथि पर लटके हुए घण्ठा को निकालकर उन्होने अहंकार रहित प्रेम और वात्सल्य भाव से घण्ठा बजाते हुए उनका मंगलाशाशन किया । यही दिव्यानुभूति ही तिरुपल्लाण्डु से जानी गई है ।

अनुवादक टिप्पणि – भगवान सर्वज्ञ, सर्वशक्त, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ इत्यादि है । परन्तु यहाँ आळ्वार वात्सल्य भाव की नदिया मे बह गए । आळ्वार अपने शेषत्व को भूलकर, शेषी मानकर भगवान के बारें मे सोचने लगे । वे सोचने लगे अरे – ऐसे परमपुरुष जो निर्मल स्वभाव के है, जिनका शरीर पञ्च उपनिषद् तत्वों (आध्यात्मिक) का है, जो ब्रह्म शिव इत्यादि देवि देवताओ के लिये पहुचने योग्य नहि, जो नित्य सूरी का सहवास करते है, वही अभी अपने नित्य धाम को छोडकर यहा मेरे समक्ष उपस्थित हुए है । शायद कृदुष्टों से इनको कोई हानी ना पहुचे इसिलिये आळ्वार सबों (ऐश्वर्यार्थि – धन की इच्छा करने वाले, कैवल्यार्थि – जो आत्मानुभव की चाहना रखता हो, भगवद् शरणार्थि – भगवान के शरण रहकर उन्की नित्य सेवा करना) को अमन्त्रित कर उन्स सभी से निवेदन करते है आप सभी भी भगवान का मंगलाशाशन करे और तदन्तर तुरन्त उनका मंगलाशाशन करते है ।

इसके पश्चात भगवान अन्तर्धान होकर अपने निज धम को लौट जाते है । तदन्तर, पेरियाळ्वार राजा को आशीर्वाद देते है और राजा उनका मान सम्मान अत्यन्त वैभव से करता है । आळ्वार अपने निज स्थान श्री विल्लिपुत्तूर पहुचकर ईनाम का सारा धन अपने प्रिय भगवान को समर्पित कर देते है ।

जैसे मनु स्मृति मे,

त्रयैवाधन राजन् भार्य दासस्तथा सुतः ।
यत्ते समदिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥

अर्थात् – पत्नी, पुत्र, दास इन सभी के पास कुछ भी नही हो, उनकी कमाई उनके निज संबंधि उत्तारिधिकारि को जायेंगे (पती, मालिक, पिता) ।

उपरोक्त तथ्य के अनुसार, श्री पेरियाळ्वार ने अपने स्वामि वटपत्रशायि को आर्जित धन सौंप दिया । अपना कर्तव्य निभारकर अपने नित्य कैंकर्य – फूलों की माला बनाना और उसी को भगवान को समर्पण फिर से करने लगे । अतः इस प्राकार मालाकार की सेवा का अत्यन्त लाभ उठाकार स्वयम् अती प्रसन्न उस मालाकार और भगवान श्री कृष्ण का गुणगान करने लगे । श्री कृष्ण भगवान के दिव्य चरित्र से अत्यन्त लगाव होने के कारण, याशोदा मय्या का भाव रूप धारण कर, भगवान के सौशील्य और सौलभ्य गुणो का रसास्वादन करते हुए वात्सल्यभाव के प्रवाह मे उन्होने दिव्य प्रबन्ध की रचना की जिसे हम सभी पेरियाळ्वार तिरुमोळि के नाम से जानते है । सदैव श्रियपति पर चिन्तन करते हुए, उन्होने हर एक शिष्य और उन पर आश्रित श्रेयोभिलाषियों और अन्यों सहित सबों को आशीर्वाद दिया ।

यह कथा अभी पूर्ण नही हुई है अपितु इसका शेष हम श्री गोदाअम्माजी के वैभव मे देखेंगे ।

श्री पेरियाळ्वार जी का तनियन् –

गुरुमुखमनधीत्य प्राहवेदानशेषान् नरपति परिक्लुप्तम् शुल्कमादातु कामः ।
स्वसुरममर वन्द्यम् रन्गनाथस्य साक्शात् द्विज कुल तिलकम् विष्णुचित्तम् नमामि ॥

पेरियाळ्वार का अर्चावातार अनुभव इस लिंक पर उपलब्ध है ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

Source: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/01/20/periyazhwar/

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

कुलशेखर आळ्वार

श्रीः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

kulasekarazhwar

तिरुनक्षत्र: माघ मास, पुनर्वसु नक्षत्र

आवतार स्थल : तिरुवंजिक्कलम

आचार्यं: श्री विष्वक्सेनजी

रचना : मुकुंद माला , पेरुमाळ तिरुमोळि

परमपद प्रस्थान प्रदेश : मन्नार कोयिल (तिरुनेल्वेलि के पास)

श्रीकुलशेखराळ्वार् की महानता यह है कि क्षत्रिय कुल (जो स्वाभाविक हितकर अहँकार के लिए जाना जाता हैं) में पैदा होने के बाद भी वे एम्पेरुमान्/ भगवान और उनके भक्तों के प्रति अत्यंत विनम्र थे। पेरुमाळ (श्री राम) के प्रति इनकी भक्ति और लगाव के कारण इन्हें “कुलशेखर पेरुमाळ” नाम से भी जाना जाता है। अपनी पेरुमाळ तिरुमोळि के प्रथम पद (ईरुळिय चुडर् मणिगळ) में पेरिय पेरुमाळ का मँगलाशासन करने के पश्चात, दूसरे पद (तेट्टरुम तिरळ तेनिनै) में श्रीवैष्णवों का कीर्तन करते है। वे श्रीवैष्णवों के प्रति अपने प्रेम के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है, जिसे हम आगे देखेंगे।

शेषत्व ही जीवात्मा का सच्चा स्वरूप है, आळ्वार ने इस विषय में अपने पेरुमाळ तिरुमोळि के अंतिम पासुर (१०.७) “तिल्लैनगर् चित्तिरकूडम् तन्नुळ् अर्चमर्ण्तान् अडिचूडुम् अर्चै अल्लाल् अर्चाग एन्ऩेन् मत्तर्चु दाने” में बताया है – मैं चित्तिरकूडम के महाराजा (गोविन्दराजन एम्पेरुमान्) के श्री कमल चरणों को पकड़े रहने के अलावा किसी अन्य विषय को शाही नहीं मानता हुँ। इन शब्दों के द्वारा, देवतान्तर/ विषयान्तर से जीवात्मा के सम्बन्ध की सोच मात्र का आळ्वार जड़ से उन्मूलन करते हैं।

वे बताते है कि जीवात्मा का सच्चा स्वरूप “अच्चिद्वद् पारतंत्र्य” है। अपने तिरुवेंकट पद (४.९) में इस तरह से समझाते है-

चेडियाय वल्विनैगळ् तीर्क्कुम् तिरुमाले
नेडियाने वेन्ङटवा ! निन् कोयिलिन् वासल्
अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडण्तियन्ङ्गुम्
पडियाय्क् किडण्तु उन् पवळ वाय्क् कान्ण्बेने

हे श्रीवेंकटेशा ! आपने मेरे प्रबल कर्मों को नष्ट किया। मैं आपके सन्निधि के द्वार के पत्थर की सीढ़ी बनकर रहना चाहता हुँ, जहाँ आपके महान भक्त और लौकिक कामना की पूर्ती हेतु देवजन और उनके आभारी लोग आपके दर्शन पाने के लिए तड़प रहे होंगे।

पेरिय वाच्चान पिळ्ळै के अनुसार जीवात्मा को निम्न प्रकार होना चाहिए-
1.  (पड़ियै कीडन्तु) अचित (असंवेद्य) – के समान रहना चाहिए अर्थात जीवात्मा को सम्पूर्ण रूप से भगवान के आश्रित रहना चाहिए। जिस प्रकार बिना किसी स्वार्थ के चन्दन और कुमकुम केवल अपने उपभोग करने वाले के आनंद के लिए ही होते है।
2.  (उन पवळवाय काँबेने ) चित (संवेद्य) – चेतन इस संदर्भ में कि हमें ज्ञात रहना चाहिए कि भगवान हमारी सेवा स्वीकार करके आनंदित होते है। यदि हम इसे स्वीकार न करके कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे, तब हम अचित वस्तु से कुछ भी भिन्न नहीं होंगे।

इस सिद्धान्त को अचितवद् पारतंत्रयं कहते है। जिसका मतलब है जीवात्मा परिपूर्ण रूप से एम्पेरुमान् के अधीन है, परंतु फिर भी उन्हें आनंदपूर्वक प्रतिक्रिया देते है – यही श्री वैष्णव सिद्धान्त का अत्युत्तम तत्व हैं ।

हमने “श्री कुळशेखराळ्वार का अर्चावतारानुभव” में देखा हैं की कैसे श्री वरवरमुनि स्वामीजी/ मामुनिगळ, अर्चावतार अनुभव कालक्षेप में कुलशेखराळवार का कीर्तन करते है ।

नायनार अपनी प्रसिद्ध रचना आचार्य ह्रदय में अनेक चूर्णिकाओं के द्वारा समझाते हैं की भक्तों का उनके जन्म के आधार पर भेद नहीं करना चाहिए और वे नम्माळ्वार/श्री शठकोप स्वामीजी इत्यादि महानुभावों की महानता की स्थापना करते हैं। उस अनुभाग में भगवत् कैंकर्य करने के लिए अनुकूल जन्म के बारे में विचार – विमर्श करते समय नायनार उदाहरण के साथ बताते हैं कैसे महान व्यक्ति निम्न वर्ग में जन्म लेने के लिए आकांक्षित थे क्यूँकि यह वर्ग कैंकर्य करने के लिए सुविधाजनक होता है। आईये देखे ८७ चूर्णिका का सार और कैसे यह कुलशेखर आल्वार से सम्बंधित हैं ।

अण्णैय ऊर पुनैय अडियुम् पोडियुम् पडप् पर्वत भवणन्ङ्गळिले एतेनुमाग जणिक्कप् पेऱुगिऱ तिर्यक् स्तावर जन्मन्ङ्गळै पेरुमक्कळुम् पेरियोरुम् परिग्रहित्तुप् प्रार्त्तिप्पर्गळ्

अनन्त, गरुड़, इत्यादि नित्यसूरी भगवान की शय्या (आदिशेष), पक्षी (गरुडाल्वार) इत्यादि जन्म लेने की अभिलाषा करते है। नम्माल्वार दर्शाते हैं की एम्पेरुमान को तिरुतुळाय (तुलसी) अत्यंत प्रिय है और इस कारण एम्पेरुमान सभी स्थानों पर तिरुतुळाय धारण करते हैं (सर, कन्धों, छाती इत्यादि पर)। पराशर, व्यास, शुक आदि जैसे महाऋषि वृन्दावन की धूल बनकर पैदा होने के इच्छुक थे ताकि कृष्ण और गोपियों के श्रीचरण कमलों का स्पर्श प्राप्त कर सके। कुलशेखर आल्वार तिरुवेंकटाचल पर्वत पर कुछ भी होने का मनोरथ करते है। आळवन्दार श्रीवैष्णव के घरों में एक कीड़े की तरह पैदा होने की इच्छुक थे। आईये कुलशेखर आल्वार की मनोरथ को विस्तार से मामुनिगळ के इस चूर्णिका की व्याख्यान के विवरण में देखते है।

पेरुमाळ तिरुमोळि ४ पधिग् में, आळ्वार तिरुवेंकटाचल पर्वत से किसी भी तरह का संबंध रखने के लिए इच्छुक थे ताकि वह उस प्रदेश से नित्य निकट रह सके ।
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आळ्वार कुछ इस प्रकार से मनोरथ करते हैं :

  1. पर्वत के तालाब में पक्षी बनने का
  2. तालाब में मछली बनना, क्यूँकि पक्षी तो उड़ सकता है
  3. एम्पेरुमान की सेवा में सोने की पात्र पकड़ने वाले एक सेवक होने के लिए मनोरथ करते है क्यूँकि मछली तैर कर तालाब से दूर जा सकती है।
  4. एक वृक्ष का फूल क्यूँकि सोने की पात्र पकड़ने से मन में अहँकार उत्पन्न हो सकता हैं और अतः उन्हें दूर कर देगा।
  5. एक निरुपयोगी वृक्ष – क्यूँकि तोड़े और उपयोग किये फूलों को फेक दिया जाता है।
  6. तिरुवेंकटाचल पर्वत पर एक नदी – क्यूँकि निरुपयोगी पेड़ को एक दिन उखाड़ सकते है।
  7. मंदिर सन्निधि के मार्ग की सीढ़ी होने के लिए मनोरथ करते है क्यूँकि नदी कभी भी सूख सकती है।
  8. सन्निधि के सामने की चौखट होने के लिए क्यूँकि सीढ़ियों का रास्ता बदला जा सकता है (इसी कारण चौखट को कुलशेखर प्पडि कहते है)।

जो भी तिरुवेंकटाचल पर्वत पर निरन्तर रह सके – पेरियवाच्चान पिळ्ळै अपने व्याख्यान में विवरण देते हैं की आळ्वार हमेशा के लिए पर्वत से जुड़ जाने के लिए ख़ुद तिरुवेंकटमुडैयन बनने के लिए भी पीछे नहीं जायेंगे और वे भट्टर के कथन के विषय में भी बताते है यहाँ भट्टर कहते है ” मैं यहाँ रह रहा हुँ, इस विषय की स्मृति की मुझे आवश्यकता नहीं है, न ही तिरूवेंकटमुडैयान को यह जानने की आवश्यकता है और किसी को भी मेरी स्तुति करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं यहाँ हूँ। सिर्फ यहाँ किसी भी रूप में नित्य वास करने मात्र से ही मैं ख़ुश हुँ “।

कुलशेखराळ्वार की महानता यह हैं की वह बिना कुछ व्यक्तिगत लाभ के भगवत् / भागवत् कैङ्कर्य करने को तरस रहे थे। यह ध्यान में रखते हुए, आईये उनका चरित्र देखे:-

गरुड़ वाहन पण्डित द्वारा रचित दिव्य सूरी चरित्र के अनुसार, कोळ्ळिनगर (तिरुवंजिक्कळम) के राज्य में, क्षत्रिय वंश में, श्री कौस्तुभ अंश (हालांकि आळ्वार सँसार से भगवान द्वारा चुने गए थे और अनुग्रह पात्र थे) से इनका जन्म हुआ। इन्हें कोळ्ळि कावलन्, कोळियर कोन, कूडल नायकन इत्यादि नामों से भी जाना जाता है।

जैसे तनियन में विवरण दिया गया हैं “मात्तलरै, वीरन्ङ्केडुत्त चेन्ङ्कोल् कोल्लि कावलन् विल्लवर्कोन्, चेरन् कुलशेकरन् मुडिवेण्तर् शिकामणी” मतलब अपने शत्रु को नाश करने वाले और चेरा राज्य के राजा, अनेक रथ, घोडे और हाथियों की युद्ध सेना के महा बल के साथ अपने शत्रुओं को भगा देने वाले, वे महान शक्तिशाली थे। शास्त्रानुसार धर्म पालन करते थे और यह सुनिश्चित करते थे की बलवान कमज़ोर को कष्ट नहीं दे और श्री राम की तरह ही, उदारचित्त और विनम्रता पूर्वक राज्य परिपालन करते थे।

महान राजा होने के कारण , वे स्वयं को स्वतन्त्र और राज्य का नियंत्रक मानते थे। परमपद और सँसार के नियंत्रक भगवान ने उन्हें अपनी निर्हेतुक दया से शुद्ध दिव्य ज्ञान प्रदान किया, उनके रजो /तमो गुणों को हटा करके उन्हें परिपूर्ण सत्व गुण में स्थित करके, अपना दिव्य स्वरूप, रूप, गुण, विभूति ( अपना ऐश्वर्य / नियंतृत्व) और अपनी लीलाओं का विवरण दिया। यह विषय समझने के बाद, वे संसारी, जो भगवत् विषय में अरुचि और अपने शरीर के भोगों में निमग्न रहनेवालों के बीच रहने में असहज महसूस करने लगे। जैसे नम्माळ्वार घोषित करते है कि अधिक भौतिक सम्पत्ति एक जलते हुई आग की तरह हैं, जो अपने मालिक को भौतिक विषयों में लिप्त करके अंत में उसे जला देती है। यद्यपि कुलशेखर आळ्वार को अपने राज्यशासन में कोई रूचि नहीं थी और वे स्वयं को विषयान्तर से दूर रखते थे जैसे श्री विभीषणाळ्वान ने अपना सर्वस्व छोड़ के श्री राम की शरण ली थी ।

श्री रङ्गम् , श्री रङ्गनाथजी और श्री रङ्गनायकीजी के सेवक जो भौतिक विषयों से असंलग्न और अपना सारा समय श्री रङ्गनाथ की कीर्तन में बिताते हैं उनके प्रति अत्यंत प्रेम बड़ा चुके थे । ऐसे श्री वैष्णव जो साधु (वैष्णव अग्रेस: – श्री वैष्णव के नेता) कहलाते हैं और जिन्हें “अण्णियरन्ङ्गन् तिरुमुत्ततु अडियार्” कहकर पहचाना जाता हैं मतलब जो भक्त अपना सारा जीवन श्री रङ्गम् मन्दिर में बिताते हैं उनके बीचों बीच रहने की चेष्ठा दिखा रहे थे । श्री रङ्ग यात्र और श्री रङ्ग जाने की आशा ही एक मनुष्य को परमपद प्राप्त करा सकता हैं और श्री रङ्ग में नित्य निवास करे तब उसके बारे में क्या कहे ऐसे प्रति दिन श्री रङ्ग जाने की सोच में बिता रहे थे ।

जहाँ की स्वामि पुष्करणी को गँगा, यमुना से भी पवित्र मानकर कीर्तन किया जाता हैं ऐसे तिरुवेंकटम के प्रति भी आळ्वार बहुत लगाव बड़ा लेते हैं । जैसे आण्डाळ् कहते हैं “वेन्ङ्कटत्तैप् पतियाग वाळ्वीर्गाळ्” मतलब हमें तिरुवेंकटम में जीवन बिताना चाहिए और नित्य निवास बनाना चाहिए जहाँ महात्मा और ऋषि नित्य वास कर रहे हैं , इन्हें भी ऐसी ही मनोरथ थी । हम ने पहले देखा की कैसे आळ्वार एक पक्षी , एक पौधा और इस दिव्य देश में एक पत्थर बनने के लिए भी तैयार थे । इसके अतिरिक्त आळ्वार कई दिव्य देशों में रहके , उधर के अर्चावतार के एम्पेरुमान और उनके भक्तों की सेवा करने के लिए इछुक थे ।

कई पुराण और इतिहास को विश्लेषण करके , एक महान संस्कृत श्लोक ग्रन्थ मुकुन्द माला नाम से अनुग्रह करते हैं । श्री मन्नारायण की वैभवता अगले श्लोक में विवरण करते हैं ।

वेद वेद्ये परे पुम्सि जाते दशरतात्मजे
वेदः प्राचेतसादासीत् साक्शात् रामायणत्मना

श्री मन्नारायण जिन्हें वेद के द्वारा समझ सकते हैं श्री राम के रूप में रूढि हुए । वेद स्वयं वाल्मीकिजी से श्री रामायण के रूप में प्रकट हुआ हैं ।

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श्री रामायण सुनना और चर्चा करना अपने दैनिक दिनचर्य का भाग बना लिया था । श्री रामायण की कथा में अपने आप को भुलाकर निमग्न हो जाते थे । एक बार उपन्यास में कर/दूषण के नेतृत्व में १४००० राक्षस श्री राम जिन्होंने गुफा में इळया पेरुमाळ(लक्ष्मण) के भरोसे सीता देवी को छोड़ दिया उनके प्रति युद्ध करने की तैयारी करने का दृश्य विवरण दिया जा रहा था । यह दृश्य में श्री राम अकेले १४००० रक्षोसों का सामना करना था और यह देखकर ऋषि लोग डर जाते है । आळ्वार भावुक हो जाते हैं और अपनी सेना को तैयारकर श्री राम की सहायता करने के लिए युद्ध भूमि पहुँचने का आदेश करते हैं । यह देखकर उनके कुछ मंत्री , थोड़े लोगों का इंतज़ाम करते हैं जो सामने की दिशा में आकर बताते हैं की श्री राम ने युद्ध में विजय प्राप्त किया हैं और सीता देवी उनकी देखबाल कर रही हैं और उनके आनेकी जरूरत नहीं हैं । आळ्वार संतुष्ट होकर अपने राज्य को लौट जाते हैं ।

इनके मंत्री गण सोचने लगे की श्री वैष्णव से इनके सम्बन्धों के कारण आळ्वार का बर्ताव बदल गया हैं । निश्चित करते हैं की श्री वैष्णव दूर रहे और इसके लिए एक योजना बनाते हैं । वह एक वज्र माला को आळ्वार के तिरुवराधन के (पूजा) कमरे से चुरा कर घोषित करते हैं की उनके करीबी श्री वैष्णव ने उसे चुराया होगा । यह सुनने के बाद आळ्वार एक ज़हरीले नाग से भरा घड़े को लाने के लिए आदेश करते हैं और आने के बाद , अपना हाथ घड़े में रखकर ऐलान करते हैं “श्री वैष्णव ऐसे कार्यों में जुटते नहीं हैं ” – ज़हरीला सांप उनकी ईमानदारी के लिए उन्हें काँटता नहीं और यह देखकर मंत्रियों को शर्म आजाति हैं और माला को वापस देकर आळ्वार और श्री वैष्णव से क्षमा प्रार्थना करते हैं ।

सौनक सँहिता में बताया जाता हैं की “एक प्रपन्न के लिए भगवान का कीर्तन नहीं करने वालों के बीच में रहने से बेहतर आग के गोले में रहना अच्छा लगता हैं ” और ठीक इसी तरह आळ्वार संसारि के बीचों बीच रहने में महसूस कर रहे थे । अपने सुपुत्र को राजा बनाकर राज्य के सभी जिम्मेदारियाँ सौंप देते हैं और ऐलान करते हैं “आनात शेल्वत्तु अरम्बैयर्गळ् तर्चूळ वानाळुम् शेल्वमुम् मन्ऩरचुम् यान् वेण्डेन्” मतलब इन्हें कामकरने वाले , मनोरंजन करने वालों , भोग भोगने वालों के साथ राज्य करने में दिलचस्पी नहीं हैं । अपने श्री वैष्णव साथियों के साथ श्री रङ्गम निकल जाते हैं और श्री रङ्गनाथ जो सोने के थाली (आदिशेष पे सोते हुए ) पे एक वज्र की तरह हैं और हर समय सब के कल्याण के बारे में सोचते हैं उनका मँगलशासन करते हैं । हर पल भगवद्-भागवत्नाम संकीर्तन करने लगे । उनके मनोभावनावों के प्रवाह का साक्षात निरूपण उनका पेरुमाळ तिरुमोळि है । इसकी रचना करके सभी को अपना अनुग्रह प्रसाद किया । थोड़े समय के बाद , सँसार छोड़ के , परमपदनाथ की सेवा करने हेतु परम पद को प्रस्थान हुए ।

तनियन्

घुष्यते यस्य नगरे रंङ्गयात्रा दिने दिने |
तमहम् सिरसा वन्दे राजानम् कुलशेकरम् ||

source

अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

 

तिरुमळिशै आळ्वार (भक्तिसारमुनि)

श्री
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्री मद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमुनये नमः

thirumazhisaiazhwar

तिरुनक्षत्र – माघ मास मघा नक्षत्र

अवतार स्थल – तिरुमळिशै (महीसारपुरम)

आचार्यविष्वक्सेन,(भगवान नारायणा के मुख्य सेनाधिपति),पेयालवार (महदयोगि)

शिष्य: कणिकण्णन, धृढव्रत

ग्रन्ध: नान्मुगन तिरुवन्दादि, तिरुचन्द विरुत्तम

परमपद(वैकुण्ठ) प्राप्ति स्थल: तिरुकुडन्दै (कुम्बकोणं)

मामुनिगळ, आळ्वार के गुणगान करते हुए बताते हैं कि इन्हें शास्त्रार्थ का सुस्पष्ठ ज्ञान है। शास्त्र से हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही हमारे आराध्य है और हमारा लेष मात्र भी अन्य देवताओं से सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। इन्हें “तुय्या मदि” अर्थात निर्मल चित्त कहकर सम्बोधित करते है। पिळ्ळै लोकम् जीयर् के अनुसार यहाँ निर्मलता का अर्थ है की अन्य देवताओं के परतत्व पर किञ्चित मात्र भी विश्वास नहीं करना और दूसरों के मन में इस के बारे में जो शंका हो उसे दूर कर देना। अन्य देवताओं के प्रति श्रीवैष्णव के व्यवहार के बारे में कई पाशुरों से समझाया है।

उदाहरण –

नान्मुगन तिरुवन्दादि- 53 वे पाशुरं (गीत) ; “ तिरुविल्लात तेवरैत तेरेल्मिन तेवु ” (திருவில்லாத் தேவரைத் தேறேல்மின் தேவு) –जो मनुष्य श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ संबंध रखने (पति) वाले को आराधनीय नहीं मानते है , ऐसे लोगों को महत्त्व नहीं देना चाहिए ।

नान्मुगन तिरुवन्दादि- 68 वे पाशुरं : “ तिरुवडि तन नामम मरण्दुम पुरण्तोजा माण्दर”(திருவடி தன் நாமம் மறந்தும் புறந்தொழா மாந்தர்) – सर्व स्वामि श्रीमन्नारायण भगवान को भी अगर भूल भी जाये परंतु अन्य देवता की पूजा, श्रीवैष्णव नहीं करेंगे।

नान्मुगन तिरुवन्दादि के व्याख्यान की अवतारिका में आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै (श्रीकृष्णदास) और आचार्य नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदासजी), दोनों ने ही सबके मन की शंका दूर करते हुए भगवान श्रीमन्नारायण के परतत्व और अन्य देवताओ की सिमितता के विषय में अनुग्रह किया है।

आचार्य पेरियवाच्छान पिळ्ळै (श्रीकृष्णदास) का विवरण :मुदलाळ्वार (प्रथम तीन आल्वार – भूतयोगी, सरोयोगी, महदयोगी स्वामीजी) स्थापित करते है कि केवल -भगवान श्रीमन्नारायण ही जानने और अनुभव योग्य है। भक्तिसारमुनि ने इस रास्ते के काँटों को निकाल दिया है। जो लोग अन्य देवताओं को ईश्वर (सर्वाधिकारि – नियन्ता) मानते है, वे उन्हें समझाते हैं की वह देवता भी क्षेत्रज्ञ है (जीवात्मा – शरीर के प्राप्त) और नियमों के अधीन है। वे समझाते है की केवल भगवान श्रीमन्नारायण ही इस संसार के नियन्ता है।

आचार्य नम्पिळ्ळै(कलिवैरिदासजी) का व्याख्यान :मुदलाळ्वार, भगवान श्रीमन्नारायण को साँसारिक दृष्टि से, शास्त्र से, भक्ति से तथा भगवान श्रीमन्नारायण कि निर्हेतुक कृपा से जानते हैं । भक्तिसारमुनि भी इसी तरह भगवान श्रीमन्नारायण को जानते है और अनुभव करते है। परंतु आस -पास के सँसार को देखकर दुःखी होते है कि शास्त्रों में विदित होने पर जीवात्मा समझ नहीं पाते कि श्रीमन्नारायण भगवान ही परतत्व और सभी जगत के पालक है और उन्होंने ही अपनी अपार कृपा से वेद के रहस्य को प्रकट किया है। कहते है की ब्रह्मदेव (जो प्रथम सृष्टि कर्ता) स्वयं एक जीवात्मा है और सृष्टि के समय श्रीमन्नारायण भगवान द्वारा नियुक्त हुए है और क्यूँकि वेद में सुस्पष्ट रूप से समझाया गया है की सभी चेतन और अचेतन वस्तुओं को श्रीमन्नारायण अन्तर्यामि है, श्रीमन्नरायण ही परम पुरुष है। इस सिद्धान्त को सदा सर्वदा बिना चुक के याद रखना चाहिए।

इस तरह आचार्य श्रीवरवरमुनि तथा आचार्य नम्पिळ्ळै अपनी श्रीसूक्तियों में भक्तिसारमुनि के विशेष वैभव की प्रस्तुति करते है।

इसके अतिरिक्त तिरुचन्दविरुत्तम तनियन (वैभव बताने वाले श्लोक) में यह बहुत सुन्दरता से बताया गया है कि एक बार महा ऋषियों ने तप करने के लिए अनुकूल प्रदेश को जानने के लिए सारे भूप्रपंच की तुलना तिरुमळिशै (भक्तिसारपुरं, जो भक्तिसारमुनि का अवतार स्थल है) से किया और तिरुमळिशै को उस तुलना में सर्वोत्तम माना। आळ्वार और आचार्य के अवतार स्थलों को दिव्य देशों से भी उंचा स्थान प्राप्त है क्यूँकि आळ्वार और आचार्य ने ही हमें एम्पेरुमान् के बारे में बताया है और उनके बिना एम्पेरुमान् का विशेष अनुभव हम नहीं कर पाते।

इस को ध्यान में रखते हुये हम भक्तिसारमुनि के चरित्र को जानेंगेँ।

आळ्वार श्रीकृष्ण भगवान की तरह है। जैसे श्रीकृष्ण भगवान- देवकि/वसुदेव के यहाँ जन्म लेकर, नन्दगोप/यशोदा माई के पुत्र बनकर बड़े हुए उसी तरह भक्तिसारमुनि – भार्गवऋषि/कनकाँगि के यहाँ जन्म लेकर, तिरुवाळन/पँगयचेल्वि (लकडी काटनेवाला और उनकी पत्नि) के पुत्र बनकर बड़े हुए। भक्तिसारमुनि के अन्य नाम – महीसारपुराधीश, भार्गवात्मज, तिरुमळिशैयार/ तिरुमळिशै आळ्वार तथा विशेष रूप से तिरुमळिशै पिरान भी है। जो महान उपकारक होते हैं उन्हें ‘पिरान’ कहते है। भक्तिसारमुनि ने भगवान श्रीमन्नारायण की परतत्वता स्थापित करके ‘पिरान’ का नाम प्राप्त किया।

एक समय अत्रि, भृगु, वशिष्ठ, भार्गव और अँगीरस आदि ऋषियों ने चतुर्मुख ब्रह्मा के पास उपस्थित होकर उनसे विनती की ‘हे भगवान! हम पर कृपा करके भूलोक मे ऐसा प्रदेश दिखायिए जहाँ तप और अनुष्ठान करने के लिए अनुकूलता हो। चतुर्मुख ब्रह्माजी, विश्वकर्मा की सहायता से सारे सँसार को एक तरफ रखकर और तिरुमळिशै को दूसरी तरफ रखकर तुलना करते है। इस तुलना में तिरुमळिशै देश विजय प्राप्त करता है। इस प्रदेश को ‘महीसार क्षेत्र’ भी कहते है। कुछ दिन अपना जीवन यहाँ बिताने के लिए ,ऋषि लोग यहाँ अपना निवास स्थान कायम कर लेते है।

उस समय, भार्गव महर्षि श्रीमन्नारायण की प्रसन्नता के लिए धीर्ग सत्र याग नामक यज्ञ कर रहे थे और उनकी पत्नि गर्भवती होती है और १२ महीनों के बाद ,एक पिण्ड को जन्म देती हैं (मांस का टुकड़ा – प्रारंभिक चरण भ्रूण) जो तिरुमळिशै आळ्वार है। भक्तिसारमुनि, श्री सुदर्शन भगवान के अंश के समान प्रतीत होते थे ।(इनकी वैभवता देखकर  कुछ आचार्य पुरुष इन्हें नित्यसूरि अंश भी कहते है, लेकिन हमारे पूर्वाचार्यो ने दृढ़ता से कायम किया है कि आळ्वार इस सँसार में अगिणत काल से रहते आ रहे थे और अचानक से एम्पेरुमान का आशीर्वाद प्राप्त किये है)। अशरीर पिण्ड को पालने के लिए भार्गव महर्षि और उनकी पत्नि तैयार नहीं थे और उस पिण्ड को झाड़ी के निचे छोड़ देते है। भूदेवि ने श्रीदेवि के दिव्य आदेशानुसार पिण्ड का संरक्षण किया और उनके स्पर्श से उस पिण्ड ने सुन्दर शरीर प्राप्त किया। तुरन्त वह बालक भुख से रोने लगा। तब भगवान श्री जगन्नाथ (महीसारपुराधीश) ने इस बालक को कुंभकोणम के भगवान “आरावमुदन” के रूप मे दर्शन देकर, संपूर्ण ज्ञान प्रदान किया और जब एम्पेरुमान अदृश्य हुए तो वह बालक फिर उनके वियोग में रोने लगा।

उस समय, तिरुवालन नामक एक लकडी काटने वाला वही रास्ते से जा रहा था। वे उस रोते हुए बालक को देखते है और ख़ुशी से गोद में लेकर अपनी पत्नी के पास घर ले आते है। सन्तानहीन होने के कारण धर्मपत्नी उस बच्चे को स्वीकार कर लेती है और उसका पालन-पोषण शुरू कर देती है। पुत्रवास्तल्य से बालक को अपना दूध देने का प्रयत्न करती है। परंतु क्यूंकि वह बालक भगवान के कल्याण गुण के अनुभव और भक्ति में लीन था, उसने खाना, पीना, रोना आदि के प्रति अनासक्ति प्रदर्शित की, फिर भी भगवान कि कृपा से वे प्रवर्थमान हो रहे थे।

चतुर्थ वर्ण के एक वृद्ध दम्पति इस आश्चर्यपूर्वक वृतांत को सुनकर एक दिन सुबह गरम दूध लेकर उस बालक को देखने के लिए आते है। तेजस्वी बालक के दर्शन करके दूध स्वीकार करके पीने की प्रार्थना करते है। आळ्वार उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर थोड़ा दूध पीकर बचा हुआ शेष उनको देते है। उसे पीने की आज्ञा देते है और शीघ्र सुपुत्र प्राप्ति का आशिर्वाद देते है। आळ्वार की कृपासे वृद्ध दम्पति पुनः यौवनत प्राप्त करते है और वह स्त्री गर्भवती होती हैं। दस महीने के बाद श्री विदुरजी (जिन्हें श्रीकृष्ण के प्रति बहुत प्रेम था) की तरह एक बालक को जन्म देती है। उनका नाम ‘कणिकण्णन’ रखकर उन्हें भगवान के बारे में सब कुछ सीखाते है।

भगवान श्रीमन्नारायण के कृपा पात्र और भार्गव ऋषि के सुपुत्र होने के कारण, ७ साल के होने पर  भक्तिसारमुनि ने अष्टाङ्गयोग का अभ्यास करना चाहा। उसे सम्पन्न करने के लिए उन्होंने पहले परब्रह्म को अच्छी तरह से जानना चाहा और यह स्थापित करने के लिए कि अन्य सारे मत दोषपूर्ण है,वे अनेक मत – भाह्य मत  (सांख्य, उलूक्य, अक्षपाद, कृपण, कपिल और पातंजल) और कुदृष्टि मत (शैव, मायावाद, न्याय, वैशेषिक, भाट्ट और प्रभाकर) में अपनी ख़ोज प्रारंभ करते है और सुस्पष्टता से घोषित करते है कि सारे मत सच की स्थापना नहीं करते है। सनातन धर्म श्रीवैष्णव सिद्धान्त में ही स्थित है। इस प्रकार सात सौ साल बीत जाते हैं ।

भगवान श्रीमन्नारायण सर्वेश्वर उन्हें दिव्य और पूर्ण ज्ञान का आशीर्वाद प्रदान करते है और उन्हें दिखाते है-

  •  अपना दिव्यस्वरूप।
  • अपने कल्याण गुण।
  • अपने दिव्य अवतार (उनके स्वरूप गुणो को बताती है)।
  • दिव्य अवतारों मे अपने आभूषण।
  • अपने दिव्य आयुधों को, जो भक्तों को अनुकूल और सौन्दर्य भारित आभूषण के समान दिखते है।
  • अपनी दिव्य महिषियो को (श्रीदेवी,भूदेवी, नीलादेवि) तथा नित्यसूरियो को दर्शाते है, ये नित्यसूरि सदा भगवान श्रीमन्नारायण के कल्याण गुणों (स्वरूप, गुण, अवतार, सौन्दर्य गहण, दिव्य आयुध) का कीर्तन करते है।
  • परमपद- अपना दिव्य नित्य निवास स्थल, अंत मे
  • सँसार सागर – इस सँसार, प्रकृति, पुरुष, काल, तत्वों को तथा भगवान श्रीमन्नारायण के प्रत्यक्ष या अन्य देवताओ से परोक्ष निरंतर चलनेवाला सृष्टि, स्थिति और लय विध्यमान होता है।

कल्याण गुणों से परिपूर्ण भगवान श्रीमन्नारायण, अळ्वार को दर्शन कराते है कि कैसे वह अपनी नाभि कमल (नाभि में कमल) से चतुर्मुख ब्रह्मा की सृष्टि करते है। श्वेतश्वतारोपनिषद के अनुसार “यो ब्रह्मणाम् विदधाति पूर्वम” अर्थात परब्रह्म (भगवान श्रीमन्नारायण) ने चतुर्मुख ब्रह्मा की रचना की। छांन्दोग्य ब्राह्मण के अनुसार “ ब्रह्मणः पुत्राया जेष्ठाय श्रेष्ठाय” इसका अर्थ है कि रुद्र, चतुर्मुख ब्रह्मा के प्रथम और श्रेष्ठ सन्तान है। ये देखकर भक्तिसारमुनि तुरन्त अपनी ‘नान्मुगन तिरुवन्दादि’ में इस भावना की इस प्रकार से पुनरुक्ति करते है “नान्मुगनै नारायणन पडैत्तान नान्मुगनुम तान्मुगमाय शंकरनैत्तानपडैत्तान” अर्थात- भगवान श्रीमन्नारायण ने चतुर्मुखब्रह्मा की सृष्टि की। और चतुर्मुखब्रह्मा ने रुद्र की रचना की। इस विषय से सँसारियों के मन में भगवान के परतत्वता के प्रति सभी शंकाओं को आळ्वार ने समाप्त किया। आळ्वार घोषित करते हैं की उन्होंने स्वयं बहुत से मतों के बारे में सीखकर अंत में एम्पेरुमान की कृपा से उनके श्री चरण कमलों को प्राप्त किया है। उसके बाद तिरुवळ्ळिकेनि (बृन्दारण्य क्षेत्र) में कैरवैनि पुष्कर के तट पर श्रीपति (श्री महालक्ष्मी के पति) के कल्याण गुणों पर ध्यान करते रहे।

एक दिन शिवजी अपनी पत्नि के साथ वृषभ वाहन पर आकाश में भ्रमण कर रहे थे। तब जैसे ही उनकी छाया आळ्वार को छूने वाली थी तब आळ्वार वहां से हट गए। यह देखकर उमा, शिवजी से कहती है की उन्हें आळ्वार से मिलना चाहिए। तब शिवजी समझाते है कि आलवार भगवान श्रीमन्नारायण के महान भक्त है और वे उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देगें। लेकिन पार्वती नहीं मानी और उनसे मिलने की ज़िद्द करती रही तब अंत में शिवजी मिलने के लिए राज़ी हो जाते है। भक्तिसारमुनि ने उन्हें आँख उठाके भी नहीं देखा। तब रुद्र आळ्वार से पूछते हैं की “हम आपके समक्ष है फिर भी आप हमारी उपेक्षा कैसे कर सकते है ? भक्तिसारमुनि जवाब देते हैं “हमें आपसे कुछ काम नहीं हैं”। शिवजी कहते है कि – हम आपको वरदान देना चाहते है”। भक्तिसारमुनि उत्तर देते है की – “मुझे आपसे कुछ भी नही चाहिए”। शिवजी कहते है- “मेरा इधर आना असफ़ल रह जायेगा, आपकी मनोकामना जो भी है आप मुझसे माँग सकते हैं”। भक्तिसारमुनि हँसते हुए कहते है – ” क्या आप मुझे मोक्ष दे सकेंगे”? शिवजी -“मोक्ष प्रदान करने का अधिकार केवल भगवान श्रीमन्नारायण को ही है”। भक्तिसारमुनि फिर कहते है- “क्या आप मृत्यु को रोक सकेंगे?” शिवजी- “मृत्यु अपने-अपने कर्माणुगत है उसके ऊपर मेरा अधिकार नहीं है”। भक्तिसारमुनि व्यंग्यात्मकता से कहते है “क्या आप ये सूई मे धागा चढ़ा सकेंगे?” शिवजी क्रोधित हो जाते हैं और उन्हें कामदेव की तरह भस्म करने की धमकी देते है। अपने तीसरे नेत्र खोलकर अग्नि प्रसारित करना शुरू कर देते है। भक्तिसारमुनि भी अपने बाये पैर की अंगुष्ट से अपना तीसरा नेत्र खोलकर अग्नि ज्वाला की धारा प्रगट करते है। रुद्र, आळ्वार के श्री चरण कमलों से निकले अग्नि सहन नहीं कर पाते और भगवान श्रीमन्नारायण की शरण कर लेते है। सभी देवी देवता, ऋषिगण भी भगवान के पास पहुँचकर विशृंखलता को नष्ट करने की विनती करते है। भगवान श्रीमन्नारायण जल से भरे प्रलय मेघों को अग्निप्रलय को शान्त करने का आज्ञा देते है। जब मेघ भगवान से पूछते है कि क्या उनमें आळ्वार से प्रगटित अग्निप्रलय को बुझाने की शक्ति है? तब एम्पेरुमान उन्हें आश्वासन देते है की वह उन्हें वह शक्ति प्रदान करेंगे। अग्नि बुझाने के पश्चाद बाढ़ सी स्थिति आ जाती है। परंतु आळ्वार का ध्यान भगवान में अचल था और बिना कुछ दुविधा के ज़ारी था। यह देखकर शिवजी आश्चर्यचकित होते है और उन्हें ‘भक्तिसार’ कहके गौरवान्वित करते है। पार्वती को समझाते है कि अम्बरीषजी के प्रति किये गए अपचारों के लिए दुर्वास ऋषि को भी दंड भुगतना पड़ा था। “भगवत भक्तों की कभी हार नही होती” ऐसा कहकर वह कैलाश लौट जाते है।

भक्तिसारमुनि ध्यान मे निमग्न हो गये। उस समय एक ‘केचर’ (आकाश मे फिरने वाला) अपने  वाहन शेर/बाघ पर विराजमान होकर भ्रमण कर रहा था। आळ्वार को देखकर और उनकी योग शक्ति के कारण उन्हें पार करके आगे नहीं बढ पा रहा था। वे केचर अपनी माया से एक दिव्य शाल बनाता है और आळ्वार से “हे ! महापुरुष , आप अपनी पुरानी फ़टी हुई शाल को निकालकर यह नई शाल को स्वीकार करें” कहके प्रार्थना करता हैं। भक्तिसारमुनि मणि मानिक्य युक्त उनके दिए गए शाल से भी बेहतरीन और सुन्दर शाल की रचना करते है। उसे देखकर केचर शर्मिंदा हो जाता है। तब केचर अपने गले में पहना हुआ मणि युक्त हार भक्तिसारमुनि को समर्पित करता है। भक्तिसारमुनि अपने कण्ठ की तुलसी माला को रत्न हार बनाके केचर को दिखाते है। इस तरह केचर भक्तिसारमुनि की योगशक्ति को जान लेते है और  उन्हें गौरवान्वित करके, उनको प्रणाम कर लौट जाते है।

भक्तिसारमुनि की वैभवता के विषय में सुनकर एक कोण्कणसिद्ध नामक ज़ादुगर उन्हें प्रणाम करके उनके समक्ष एक रसविज्ञान पत्थर समर्पित करता है (ये पत्थर लोहे को सोना बना देता है)। आळ्वार उसकी उपेक्षा करते है। अपने दिव्य शरीर (कान के भाग से) से थोडा मैल निकाल कर उनको देते है और कहते है कि उस मैल से पत्थर भी सोना बन जाता है। ज़ादुगर उसकी झाँच करके खुश होता है और भक्तिसारमुनि को प्रणाम करके लौट जाता है।

आळ्वार ने कुछ समय एक गुफ़ा में ध्यान करते हुए बिताया। मुदलाळ्वार (प्रथम तीन आळ्वार- भूतयोगि, सरोयोगि तथा महदयोगि) जो भगवान श्रीमन्नारायण के कीर्तन करके अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, उन्होंने देखा की गुफ़ा से एक दिव्य तेज प्रसरित हो रहा था। मुदलाळ्वारों की मुलाक़ात भक्तिसारमुनि से हुई। एक दूजे के विषय में जानकर परस्पर क्षेम विचार पूछकर सब मिलकर भगवद् गुणानुभव में कुछ समय व्यतीत करते है। बाद में उधर से निकलकर पेयाल्वार(महदयोगि) के अवतार स्थाल ‘तिरुमयिलै (प्रस्तुतकालमे मैलापूर) को पहुँचते है। वहां ‘कैरविणि’ तीर्थ के तटपर वे लोग कुछ समय व्यतीत करते है। मुदलाळ्वार अपनी दिव्य यात्रा को ज़ारी रखते है और भक्तिसारमुनि अपने अवतार स्थल तिरुमळिशै पहुँच जाते है।

भक्तिसारमुनि शरीर में धारण करने वाला तिरुमणकाप्पु (श्वेतमृत्तिका) ढूंढ़ते है लेकिन तलाश नहीं कर पाते है। वह उदास होकर सो जाते है। भगवान श्रीनिवास (तिरुवेंकट मुदैयाँ) स्वप्न में साक्षात होकर तिरुमणकाप्पु का पता बताते है। वे उस पते पर छान -बीन करते है और तिरुमणकाप्पु प्राप्त करके ख़ुशी से द्वदशा उर्ध्व पुण्ड्र (शास्त्र के अनुसार शरीर पर १२ प्रदेशों में तिरुमणकाप्पु  लगाया जाता है) लगाकर अपना भगवत अनुभव ज़ारी रखते है। पोइगै आळ्वार के अवतार स्थल जाने के अभिलाषा से वे कांचीपुर -तिरुवेक्का क्षेत्र में पहुँचते है जिसे सभी पुण्य क्षेत्रों में श्रेष्ठ कहा जाता है। श्रीदेवी और भूदेवि की सेवा स्वीकार करते हुये आदिशेष पर अति सुन्दरता से शयनित एम्पेरुमान की सेवा करते हुए 700 साल बिताते है। भूतयोगि का अवतार जिस पुष्करिणी के तट पर हुआ, वहाँ भक्तिसारमुनि भूतयोगि स्वामीजी का ध्यान करते हुए कुछ समय व्यतीत करते है।

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उभय देवेरियों से युक्त यथोक्तकारि भगवान,तिरुवेक्का

उस समय, कणिकण्णन उनके पास आकार उनके श्री चरणों की शरण लेते है। एक वृद्ध नारी प्रति दिन आळ्वार के पास आकर उनकी सेवा करती थी। भक्तिसारमुनि उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उनसे उनकी मनोकामना पूछते है। वृद्ध नारी अपनी यौवन अवस्था को पुनः प्राप्त करने का वरदान माँगती है। भक्तिसारमुनि उनकी मनोकामना की पूर्ति करते है और वह वृद्ध नारी अति सुन्दर युवती बन जाती है। युवती की सुन्दरता पर स्थानिक महाराज पल्लवराय आकर्षित हो जाते है और उनसे विवाह करने की विनती करते है। एक बार पल्लवराय ने देखा कि वे तो दिन प्रतिदिन बूढ़े हो रहे थे और बुढ़ापा उनकी पत्नी के आस -पास भी नहीं था। यह देखकर उनकी दिव्य यौवनता का रहस्य पूछते है। पत्नी भक्तिसारमुनि से प्राप्त आशिर्वाद के विषय में बताती है और उन्हें सलाह देती है की आळ्वार को प्रसन्न करके यौवनता का वरदान माँगे और कहती है कि इसके लिए उनके शिष्य कणिकण्णन (जो अपनी कैंकर्य सामाग्रि के लिए पल्लवराय के पास आते थे ) की सिफ़ारिश का उपयोग करे। पल्लवराय, कणिकण्णन से पूजार्थ भक्तिसारमुनि को राज दरबार में पेश करने की आज्ञा देते हैं । कणिकण्णन राजा से कहते हैं की भक्तिसारमुनि भगवान के द्वार (एम्पेरुमान) को छोडकर कहीं नहीं आएँगे। पल्लवराय उन्हें कीर्तन करने के लिए आदेश करते है परंतु वे आदेश को यह कहते हुए ठुकरा देते है की शिष्टाचार (जो पूर्विक के सिद्धान्त और अनुष्ठान के प्रकार) के अनुसार भगवान श्रीमन्नारायण और उनके भक्तो के सिवा किसी का भी वे कीर्तन नही करेंगे। यह सुनकर पल्लवराय बहुत क्रोधित होते हैं और कणिकण्णन को देश से बहिष्कृत कर देते है। राजा का महल छोड़कर कणिकण्णन अपने गुरु भक्तिसारमुनि के पास पहुँचकर घटित क्रम बताकर, देश से जाने के लिए अनुमति माँगते है। भक्तिसारमुनि कणिकण्णन से कहते है कि “आप नहीं रहेंगे तो हम भी यहाँ नहीं रहेंगे, अगर हम नहीं रहेंगे तब भगवान भी यहाँ नहीं रहेंगे। अगर एम्पेरुमान चले जायेंगे तब सभी देवी देवता इधर से निकल जायेंगे। “मैं अभी मन्दिर जाकर भगवान को अपने साथ लेकर आता हूँ “और मंदिर तक पहुँचते है। आलवार भगवान तिरुवेक्का के द्वार पर यह गान करते हैं  

‘कणिकण्णन पोगिन्नान

कामरुपू कच्चि मणिवण्न नी किडक्का वेण्डा

तुण्णि वुडया चेण्णाप्पुलवनुम पोगिन्नेन

नीयुम उन्नन पैण्णागप्पाय चिरुट्टिक्कोळ ’

हे! अति सौन्दर्य रूपी तिरुवेक्का के निवासि ! कणिकण्णन यह राज्य छोड कर जा रहे है। दास भी उनके साथ जा रहा है। आप भी अपना आसन आदिशेष को बाँधकर हमारे साथ चलिए!

भगवान भक्तिसार मुनि की बात मानकर उनके और कणिकण्नन के पीछे पीछे चल देते है। इसलिए उन्हें यदोक्तकारी तिरुनाम प्राप्त है (कारी – करने वाला ,यध – जैसे , उक्त – कहे)। सब देवगण भगवान यधोक्तकारि के पीछे चल पड़े। मँगलता नष्ट हो गयी और काञ्चीपुरम जीव रहित हो गया। काञ्चीपुरम मे सूर्य का उदय नहीं हुआ और सम्पूर्ण और अन्धकार छा गया। पल्लवराय इसका कारण समझ चुके थे। अपने राज परिवार के साथ उनके पीछे जाकर, कणिकण्णन के श्रीचरणों पर अपना मस्तक रखकर क्षमा याचना करते है। कणिकण्णन, भक्तिसारमुनि को और भक्तिसारमुनि, भगवान यधोक्तकारि से अपने यथा स्थान लौटने के लिए प्रार्थना करते है।

कणिकण्णन पोक्कोजिण्तान

कामरुपू कच्चि मणिवण्णा नी किडक्का वेण्डुम

तुनि वुडया चेण्णाप्पुलवनुम पोक्कोजिण्तेन

नीयुम उन्नन पैण्णागप्पाय पडुत्तक्कोळ ’

हे। अति सुन्दर तिरुवेक्का के निवासि! कणिकण्णन लौट रहा हैं, मैं (आप के बारे में गान करने वाला कवि) भी लौट रहा हूँ, आप भी बंधे हुए आदिशेष की शय्या को बिछाकर यथा स्थान विराजियें।

ये भगवान श्रीमन्नारायण की सौलभ्यता- सादगी के गुण का प्रत्यक्ष उदहारण है और भगवान श्रीमन्नारायण के इसी गुणानुभव में आल्वार निमग्न थे और उन पर व्यामोह से गाते है- वेक्कानै क्किडंद तेन्न नीर्मैयै- अर्थात एम्पेरुमान कितने दयालु हैं जो मेरी विनती को स्वीकार करके ‘तिरुवेक्का’ में विराजे है।

उसके बाद भक्तिसारमुनि अत्यन्त आशा से तिरुक्कुडंदै (कुम्भकोणम) भगवान “आरावमुदाळ्वार” का मँगलाशासन करने के लिए निकल पड़ते हैं। तिरुक्कुडंदै महात्म्य में कहा जाता है की “जो यहाँ (तिरुक्कुडंदै) क्षण मात्र समय भी व्यतीत करते है उनको वैकुण्ठ में स्थान प्राप्त है और लौकिक सँसार की संपदा के विषय में कहने की क्या आवश्यकता हैं”। ऐसी इस दिव्यदेश की महानता है। एक बार भक्तिसारमुनि अपनी यात्रा के दौरान ‘पेरुम्पुलियूर’ नामक गाँव पहुँचते है। एक गृह के आँगन में  बैठे हुये कुछ ब्राह्मण लोग वेद का पाठ कर रहे थे। उस समय वे लोग भक्तिसारमुनि के फटे और पुराने पहनावट को देखकर अपने वेद अध्यन को रोक देते है। इस विषय को ग्रहण करते हुए भक्तिसारमुनि विनम्रता से वहाँ से निकल पडे। ब्राह्मण गण अपने वेदपाठ को फिर से आरम्भ करने की कोशिश करते हैं परंतु जिस स्थान पर उन्होंने वेद पाठ रोका था उसे भूल जाने के कारण आरम्भ नहीं कर पा रहें थे। भक्तिसारमुनि यह जानकर एक चावल का धान/बीज लेकर अपना नखोँ से धान्य को चीरते है। ये दृश्य देखने के बाद उन ब्राह्मण लोगों को अपने वेदपाठ की पंक्ति स्मरण आ गई। “कृष्णाणाम व्रिहिणाम नखनिर्भिन्नम” -ये यजुरवेद का खण्ड है। वे सब भक्तिसारमुनि की वैभव को जान लेते हैं और अपनी भूल और बुरे बर्ताव के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए भक्ति से उनकी वन्दना करते है।

भक्तिसारमुनि अपनी पूजा सामाग्रि की तलाश कर रहे थे तब उस गाँव में स्थित एम्पेरुमान उन्हीं की ओर मुड़ रहे थे। पूजारी लोग उस आश्चार्यपूर्वक दृश्य को देखकर उसके बारे में कुछ ब्राह्मण लोगों को बताते है, जो उस गाँव मे याग करने वाले पेरुम्पुळियूर अडिगळ को भक्तिसारमुनि की वैभवता के बारे में और इस विशेष वृतांत के विषय में बताते है। पेरुम्पुळियूर अडिगळ तुरन्त यागशाला (यज्ञ भूमि ) को छोडकर भक्तिसारमुनि के पास जाते है और उनकी दिव्य देह को देखकर विनम्रता से प्रणाम करते है और उनको यागशाला आने के लिए निमंत्रित करते है। भक्तिसारमुनि उनका निमंत्रण स्वीकार करते है और यागशाला पहुँच जाते है। पेरुम्पुळियूर अडिगळ आल्वार को प्रथम स्थान देते हुए उनको मर्यादा करते हैं (अग्र पूजा)। राजसूय यज्ञ में जब धर्मराज ने श्री कृष्ण भगवान को प्रथम स्थान देकर उनकी अग्र पूजा की तब शिशुपालन आदि लोगों ने विरोध किया था और ठीक उसी तरह भक्तिसारमुनि की अग्र पूजा करने का कुछ लोग तिरस्कार कर रहे थे। पेरुम्पुळियूर अडिगळ उनकी बातों से उदास हो जाते है और आलवार से कहते है कि वे आलवार के विषय में ऐसे कठोर शब्दों को नहीं सुन सकते। भक्तिसारमुनि अपनी वैभवता प्रकट करने का निर्णय करते है और अन्तर्यामि एम्पेरुमान (भगवान श्रीमन्नारायण) को एक पाशुर से विनति करते है की उनके ह्रदय में स्थित दिव्य मूर्ति का दर्शन सभी लोगों को कराया जाय। उनकी प्रार्थना  सुनकर भगवान श्रीमन्नारायण अपने  देवियों से, आदिशेष, गरुड़ इत्यादि परिवार के साथ भक्तिसारमुनि के हृदय में सब को दर्शन देते है। यह देखकर जिन लोगों ने भक्तिसारमुनि की अग्र पूजा का विरोध किया था वे ही उनकी वैभवता को देखकर क्षमा माँगकर शाषटाङ्ग प्रणाम करते है। भक्तिसारमुनि को सब लोग मिलकर ब्रह्मरथ में विराजित करते हैं (पालकी मे बैठाना) और आळ्वार की दया के पात्र बनते है। भक्तिसारमुनि ने उन लोगो को शास्त्र के सार उपदेश प्रदान किया। उसके बाद आळ्वार आरावमुदन एम्पेरमान को मिलने तिरुकुडंदै पहुँचते हैं ।

तिरुकुडंदै पहुँचने के बाद भक्तिसारमुनि उनके द्वारा रचित सारे ग्रंथ कावेरी नदी के पानी में फ़ेंक देते है। भगवान आरावमुदन की  कृपा से नान्मुगन तिरुवन्दादि और तिरुचन्द विरुत्तम दो ग्रंथ लहरों के विपरीत दिशा में तैरते हुए भक्तिसारमुनि के पास वापस आ जाते है। भक्तिसारमुनि उन ग्रंथों को लेकर भगवान आरावमुदन की सन्निधि में पहुँचकर आपादमस्तक पर्यन्तं दर्शन करके उनका मंगलाशासन करते है। भक्तिसारमुनि अत्यन्त प्रीति से भगवान आरावमुदन को कहते है “ काविरिक्कारैक कुडंदयुल किडंद वार एलुंदिरुन्दु पेच्चु”। अर्थात –“ हे ! कावेरी तट पे तिरुकुडंदै में शयन मूर्ति एक बार उठ के मुझ से बात कीजिये”। उनकी बोली मानकर तिरुकुडंदै आरावमुदन उठने के लिए प्रयत्न करते है  तब उन्हें देखकर आळ्वार खुश हो जाते है और उन्हें “वाळि केशने” कहकर उनका  मँगलाशासन करते है अर्थात “हे सुन्दर केशवाले ! आपका सदा मँगल हो”। इस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हुऐ भक्तिसारमुनि ने 2300 साल तक तिरुकुडंदै क्षेत्र मे केवल दूध पीकर समय बिताया। एसे भक्तिसारमुनि ने 4700 साल भूलोक में जीवित रहकर अपने दिव्य प्रबंधो से सँसारियों के उज्जीवन के लिए शास्त्र का सार दया के साथ अनुग्रह किया।

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कोमलवल्लि तायार समेत श्री आरावमुदन भगवान ,तिरुकुडंदै (कुम्भकोणम)

भक्तिसारमुनि को ‘तिरुमळिशैपिरान’ नाम से जाना जाता है। (पिरान- महान उपकारक होते है -साधारण में ये वाचक शब्द केवल भगवान को संबोधन करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं) – भक्तिसारमुनि ने भगवान के परतत्व को बताकर महान उपकार किया है इसलिए वह पिरान हुए। उस दिन से तिरुमलिशै आळ्वार ‘तिरुमळिशै पिरान’ हुए और तिरुकुडंदै आरावमुदन, आरावमुदाळ्वार के रूप में प्रसिद्धि हुए। (आळ्वार उन्हें कहा जाता हैं जो  भगवान के कल्याण गुणो में तथा उनके दिव्य सौन्दर्य मे डूबे रहते है और ये वाचक शब्द भगवान के भक्तों को संबोधन करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं) क्यूँकि तिरुमलिशै आळ्वार के नाम, रूप और गुणों में आरावमुदन डूबे हुए थे, उन्हें आरावमुदाळ्वार कहकर संबोधन किया जाता है।

आळ्वार की दिव्य कृपा के लिए प्रार्थना करें ताकि हमें भी उन्हीँ की तरह एम्पेरुमान और उनके सेवकों के प्रति भक्ति भाव और लगाव प्राप्त हो।

तनियन

शक्ति पंचमय विग्रहात्मने शुक्तिकारजात चित्त हारिणे।

मुक्ति दायक मुरारि पादयोः भक्तिसार मुनये नमो नमः॥

-अडियेन नल्ला शशिधर रामानुजदास

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