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An Introduction of shrI vaiShNava guruparamparA

अऴगिय मणवाळ मामुनि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै की चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाऴि के अगले आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें मे चर्चा करेंगे ।

 

श्री वरवरमुनि

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र

अवतार स्थल – आऴ्वारतिरुनगरि

आचार्य – तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

शिष्यगण

  • अष्ट दिक गज – 1) पोन्नडिक्काल जीयर 2) कोइल अण्णन 3) पतंगि परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर 4) तिरुवेंकट जीयर 5) एऱुम्बियप्पा 6) प्रतिवादि भयन्करमण्णन 7) अप्पिळ्ळै 8) अप्पिळार
  • नव रत्नगळ – 1) सेनै मुडलियाण्डान नायनार 2) शठगोप दासर (नालूर सिट्रात्तान) 3) कन्दाडै पोरेट्रु नायन 4) येट्टूर सिंगराचार्य 5) कन्दाडै तिरुक्कोपुरन्तु नायनार 6) कन्दाडै नारणप्पै 7) कन्दाडै तोऴप्परैप्पै 8) कन्दाडै अऴैत्तु वाऴवित्त पेरुमाळ | इसके अलावा उनके कई अन्य शिष्य थे जो अनेक तिरुवंश, तिरुमाळिगै, दिव्यदेश इत्यादि के सदस्य थे ।

 स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंग / तिरुवरंगम

ग्रंथ रचना सूची – श्री देवराज मंगलम्, यतिराज विंशति, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि, आर्ति प्रबंधम्

व्याख्यान सूची – मुम्मुक्षुप्पाडि, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्, आचार्यहॄदयम्,  पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि [पेरियवाच्चान पिळ्ळै का व्याख्यान जो नष्ट हो गया], रामानुज नूट्ट्रन्दादि

प्रमाण तिरट्टु [श्लोक संग्रह, शास्त्र टिप्पणि विशेषतः] – ईदु छत्तीस हज़ार पाडि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम्, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्

अऴगियमणवाळ पेरुमाळनायनार आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री अनैतुलगुम् वाऴप्पिरन्त यतिराज के अवतार के रूप मे प्रकट हुए । वे कई अन्य नामों के भी जाने गये है जो इस प्रकार है – अऴगियमणवाळमामुनि, सुन्दरजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुयोगी, वरवरमुनि, यतीन्द्रप्रणवर, कान्तोपयन्त, रामानुजपोन्नडि, सौम्यजामात्रुयोगीन्द्र, कोइल शेल्वमणवाळमामुनिगल् इत्यादि । वे पेरियजीयर, वेळ्ळैजीयर, विश्तवाकशिखामणि, पोइल्लादमणवाळमामुनि इत्यादि उपाधियों से भी प्रसिद्ध है ।

मणवाळमामुनि के जीवन का संक्षिप्त वर्णन –

  • श्रीपेरियपेरुमाळ के विशेषनुग्रह से आदिशेष के अवतार के रूप मे आऴ्वार तिरुनगरि मे प्रकट हुए ।
  • अपने माताश्री के जन्मस्थान मे वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है । समयानुसार उनका विवाह भी सम्पन्न होता है ।
  • श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के वैभव को सुनकर, वे आऴ्वारतिरुनगरि जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लेते है और यह हमने पूर्वलेख मे प्रस्तुत किया है ।
  • उनकी पत्नी एक नवजातशिशु को जन्म देती है जिनका नामकरण स्वयम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै उस शिशु का नाम एम्मैयनिरामानुशन् रखते है । रामानुजनूट्ट्रन्दादि मे श्री रामानुज शब्द अष्टोत्तरशत बार प्रयोग किया गया है जिसके आधारपर वे इस शिशु का नामकरण करते है ।
  • तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के परमपद को प्रस्थान होने के बाद श्री वरवरमुनि अगले दर्शनप्रवर्तक हुए ।
  • श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखते है ।
  • श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानकर श्री अऴगियवरद दास ( वानमामलै नाम के जगह से थे ) उनके प्रथम शिष्य हुए और उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर संयासाश्रम स्वीकार किये और उनकी सेवा मे संलग्न हुए । श्री अऴगियवरद दास को उनके जन्मस्थान के आदारपर वानमामलै जीयर और पोन्नडिक्कालजीयर का दास्यनाम दिया गया । पोन्नडिक्कालजीयर मायने सुवर्णनिर्माण – जिन्होने आने वाले कल मे बहुतों को पथप्रदर्शन कराया ।
  • उनके आचार्य के दिव्यौपदेश का स्मरण करके वे नम्माऴ्वार से निवेदन किये और फिर श्रीरंग की ओर रवाना हुए और जहाँ से उन्होने इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार किया ।
  • श्रीरंग की ओर जाते समय बींच मे श्रीविल्लिपुत्तूर आण्डाळ रंगमन्नार और तिरुमालिरुन्चोलैयऴगर का मंगलाशासन करते है ।
  • श्रीरंग पहुँचकर उन्होने कावेरी तट पर अपना नित्यकर्मानुष्टान सम्पूर्ण किया । उसके पश्चात श्रीरंग के सारे श्रीवैष्णव सामूहिक रूप से उनका स्वागत दिव्यभव्य रूप से करते है और स्थानीय श्रीवैष्णवों के घरों से प्राप्त पुष्कर जल से विधिपूर्वक और क्रम मे एम्पेरुमानार, नम्माऴ्वार, पेरिय पिराट्टि, सेनै मुदलियार, पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ इत्यादियों का मंगलाशासन करते है । श्री पेरुमाळ उनका स्वागत उसी प्रकार से करते है जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य का स्वागत हुआ था और अपना शेष प्रसाद और शठगोप से अपना अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के घर जाकर सत्सांप्रदाय के प्रति उनका और उनके छोटे भाई श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार का योगदान को गौरान्वित करते है ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने उन्हे उपदेश दिया की वे अपने निवास समय को स्थाई करे अर्थात वे अपना शेष काल श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय पर आधारित विषयतत्वों का बोध करते हुए भगवद्-भागवत्कैंकर्य करें । वे इस कैंकर्योपदेश को स्वीकार करते है और मुसलमानों के आक्रमण मे लुप्त ग्रंथों को खोजने के प्रयास मे जुट जाते है ।
  • एक बार श्री पोन्नडिक्काल जीयर एक वैष्णव उत्तमनम्बि के कैंकर्य के बारें मे श्री वरवरमुनि से शिकायत करते है और इससे उन्हे उपदेश मिलता है की वे इस वैष्णव को पूर्ण रूप से भगवद्-भागवत्कैंकर्य मे संलग्न करे ।
  • उसके पश्चात वे श्री तिरुवेंकटम् जाने की इच्छा व्यक्त करते है और पोन्नडिक्काल जीयर के साथ रवाना होते है । बींच मे श्री तिरुक्कोवलूर और तिर्क्कडिगै दिव्यदेशों का मंगलाशासन भी करते है ।
  • श्री तिरुमल (तिरुवेंकटम्) मे श्री रामानुजाचार्य द्वारा नियुक्त श्रीवैष्णव पेरियकेळ्वियप्पन्जीयर एक स्वप्न देखते है जिसमे व्यक्ति जो साक्षत पेरियपेरुमाळ जैसे प्रतीत होते है उनके साथ एक संयासि उनके चरणकमलों पर आश्रित उनकी सेवा मे जुटे है । स्वप्न से बाह्य दुनिया मे आकर वे स्थानीय श्रीवैष्णवों से इन दोनो महपुरुषों के बारे मे जानने की कोशिश करते है । उन्हे यह पता चलता है की एक व्यक्ति श्री वरवरमुनि और दूसरे पोन्नडिक्कालजीयर (तिरुवाय्मोऴि ईट्टु पेरुक्कर आऴ्गिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार और उनके प्राण सुक्रुत) । आश्चर्य की बात यह ती की वे दोनो तिरुमल की ओर ही आ रहे थे । यह जानकर अती प्रसन्न होकर उन्होने इन दोनो के लिये व्ययस्था करते है । श्री वरवरमुनि और पोन्नडिक्कालजीयर श्री तिरुवेंकटमलै, गोविन्दराज और नरसिंह इत्यादियों और अंत मे तिरुवेंकटमुदायन् का मंगलाशासन करते है । तिरुवेंकटमुदायन् बहुत प्रसन्न होकर अपना प्रसाद और श्री शठगोप का अनुग्रह देते है और अन्ततः वे दोनो वहाँ से कांचिपुरम की ओर रवाना होते है ।
  • उसके पश्चात श्री कांचिपुरम पहुँचकर वे दोनो श्री देवराजपेरुमाळ का मंगलाशासन करते है और सक्षात श्री देवराजभगवान कहते है की श्री वरवरमुनि स्वयम श्री रामानुजस्वामि है और अन्ततः अपना प्रसाद और शठारी का अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद मे श्री रामानुजाचार्य के जन्मस्थान श्रीपेरुम्बुदूर पहुँचकर उनके अनुभवों का स्मरण करते हुए वहाँ उन्होने मंगलाशासन करते है ।
  • फिर श्रीपेरुम्बुदूर से कांचिपुरम लौटकर वे श्रीभाष्य का बोध किडाम्बिनायनार (जो किडाम्बि आच्चान के वंशज थे) के आध्वर्य मे करने लगे । जब कुछ श्रीवैष्णव उनसे कुछ तत्वविषयों पर तर्क करने आते है तो वे अपने आचार्य के सदुपदेश का स्मरण करके कहते है की उनके आचार्य ने कहा की वे केवल भगवद्विषय के बारें मे ही चर्चा, प्रसार और प्रचार इत्यादि करें । परन्तु स्थानीय श्रीवैष्णव हितैषी के निरन्तर निवेदन से उन्होने उन सभी को तर्क मे पराजित किया और अन्ततः वे सारे उनके चरणकमलों का आश्रय लिये ।
  • किडाम्बिनायनार श्री वरवरमुनि के प्रतिभा को देखकर उनसे विनती किये की वे उन्हे उनको उनका मौलिक रूप दिखाये । श्री वरवरमुनि ने तुरन्त आदिशेष का मौलिक रूप का दर्शन दिया । यह मौलिक रूप देखकर अचम्भित किडाम्बिनायनार उनके प्रती आकर्शित हुए और उस समय से वे उनके प्रती अनुरक्त हुए । श्रीभाष्य का बोध सम्पूर्ण करने के पश्चात श्री वरवरमुनि वहाँ से विदा होकर श्रीरंग लौट गए ।
  • उनको वापस श्रीरंग मे देखकर श्री पेरियपेरुमाळ बहुत खुश होते है और उनसे दर्ख़्वास्त करते है की वे अभी भविष्य यात्रा स्थगित करें और इधर ही रह जाए ।
  • उसी समय, श्री वरवरमुनि के रिश्तेदारों से समाचार प्राप्त होता है की कुछ अपवित्रता है और इसके कारण उनकी सेवा मे बाधा होती है । तत्पश्चात उन्होने संयासाश्रम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के संयासिशिष्य श्री शठगोपजीयर से लिया और यही समाचार देने वे श्री पेरियपेरुमाळ से मिलने जाते है । यह जानकर श्रीपेरियपेरुमळ अत्यन्त खुश होकर उनका स्वागत बहुत भव्यरूप से करते है और कहते है की वे संयासाश्रम का दास्यनाम वही रखे जो उनका वर्तमान नाम था (क्योंकि वे चाहते थे की उनके आचार्य का नाम वही हो) और उनको पल्लविरायन मठ दिये जहाँ वे दिव्यप्रबंधों और अन्यशास्त्रों का बोध करें । कुछ इस प्रकार से वे श्रीअऴगियमणवाळपेरुमाळनायनार से श्रीअऴगियमणवाळमामुनि हुए । श्रीरंग के सारे हितैषी श्रीवैष्णवो श्री उत्तमनम्बि के आध्वर्य मे उनके मठ जाकर खुशी खुशी “मणवाळमामुनिये इन्नुमोरु नूट्ट्रान्डिरुम्” गाने लगे ।
  • वे अपने शिष्यों को श्रीपोन्नडिक्कालजीयर के आध्वर्य मे मठ का पुरने मठ का पुनर्निर्माण करने का आदेश देते है । उनके अनुग्रह से शिष्य एक नया मठ का निरमाण करते है और तो और इसी प्रकार पिळ्ळैलोकाचार्य के घर को नवीनीकरण कर दिव्यभव्य मण्डप का निर्माण करते है । तत्पश्चात वे अपना सार दिन केवल ईडु ग्रंथ, अन्य दिव्यप्रबंध, श्री रामानुजाचार्य के वैभव, श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र इत्यादि के कालक्षेप के माध्यम से बिताने लगे ।
  • कहते ही जंगल मे लगी आग जिस प्रकार फैलता है उसी प्रकार श्री वरवरमुनि का विख्यात चारों ओर फैलता गया । इसी कारण कई श्रीवैष्णवों मुख्यतर तिरुमंजनमप्पा (जो पेरियपेरुमाळ के नित्यकैंकर्यपर थे), उनकी बेटी (आय्चियार), पट्टर्पिरान इत्यादियों के उनके चरणमकमलों का आश्रय लिया ।
  • सिंगरैयर नामक गाँव से वळ्ळुवराजेन्द्र नाम के एक प्रपन्नभक्त प्रत्येक दिन श्री वरवरमुनि के आश्रम को सब्जियाँ भेजा करते थे । एक दिन उनके स्वप्न मे श्री भगवान ने स्वयम आकर कहा की उन्हे तुरन्त श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये जो साक्षात आदिशेष के अवतार है । वळ्ळुवराजेन्द्र जी तुरन्त श्रीरंग गए और वहाँ उन्होने कोईलकन्दादै-अण्णन के घर मे आश्रय लिया और तत्पश्चात इस स्वप्न का वर्णन किया । अण्णन यह सुनकर अचम्भित रह गए और फिर सोने चले गए । सोते वक्त उन्हे यह एहसास हुआ की साक्षात एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य) और श्री मुडलियाण्डान प्रकट हुए और श्रीरामानुजाचार्य ने कहा की वे ही श्री वरवरमुनि है और कोई अन्य नही और मुडलियाण्डान ने कहा की उन्हे तुरन्त उनका शरण लेना चाहिये । उसके अगले दिन कोईलकन्दादै-अण्णन अपने सभी बन्धुवों के साथ जाकर श्री पोन्नडिक्कालजीयर के पुरुशाकार के माध्यम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त किये । श्री वरवरमुनि ने उन सभी को स्वीकार किया और उनको पंञ्चसंस्कार प्रदान किये ।
  • तत्पश्चात श्री आचियार के सुपुत्र ( तिरुमंजनमप्पा के पोते ) श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेने की इच्छा व्यक्त किये । हलांकि श्री वरवरमुनि स्वीकार तो करते है परन्तु अपने प्रिय शिष्य श्री पोन्नडिक्कालजीयर के द्वारा उनका पंञ्चसंस्कार सम्पन्न होता है । यहाँ श्री पोन्नडिक्कालजीयर पहले इनकार करते है परन्तु अपने आचार्य के मनोभावना को समझते हुए उनके आसन मे बैठकर उनका तिरुच्चक्र और तिरुवाऴि स्वीकार कर अप्पाचियारण्णा को पंञ्चसंस्कार प्रदान करते है ।
  • एम्मैयन इरामानुशनन् ( श्रीवरवरमुनि के पूर्वाश्रम मे पूत्र ) दो दिव्य पुत्रों अऴगियमणवळ पेरुमाळनायनार (जो वरवरमुनि के प्रती उनकी अनुरक्ति और कैंकर्य से अन्ततः जीयरनायनार से जाने गए ) और पेरियाऴ्वारैयन को जन्म देते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपनी इच्छानुसार श्री पेरियपेरुमाळ की आज्ञा लेकर नम्माऴ्वर का मंगलशासन हेतु आऴ्वारतिरुनगरि निकल पडे । वहाँ पहुँचकर उन्होने तामिरभरणि नदी के तट पर अपना नित्यकर्मानुष्ठान सम्पूर्ण कियाऔर तत्पश्चात भविष्यदाचार्य (श्री रामानुजाचार्य), तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, तिरुवाराधन पेरुमाळ् इनवायर् तलैवन, नम्माऴ्वर और पोलिन्दु निन्ऱ पिरान् इन सभी का मंगलशासन किया ।
  • एक बार उन्हे आचार्य हृदय के कुछ सूत्रों मे संदेह होता है और उस समय वह अपने सब्रह्मचारि दोस्त तिरुनारायणपुरतु आयि के बारे मे सोचते है । यह सोचते हुए श्री वरवरमुनि अपने दोस्त से मिलने हेतु रवाना हुए । परन्तु आऴ्वार तिरुनगरि के सर्हद मे वरवरमुनि उन्से मिलते है जो तिरुनारायणपुरम् से खुद चलके आये । एक दूसरे को देखकर अती प्रसन्न हुए और गले लगाये । इस मिलन की खुशी मे श्री वरवरमुनि आयि पर एक तनियन की रचना करते है और उसी प्रकार श्री आयि भी एक पासुर की रचना करते है जिसमे वह उनसे पूछते है की क्या आप श्रीमान स्वयम एम्पेरुमानार है या नम्माऴ्वार है या भगवान है । कुछ दिनो के पश्चात श्री आयि तिरुनारायणपुरम लौटते है और श्री वरवरमुनि आऴ्वार तिरुनगरि मे रह जाते है ।
  • कहा जाता है कि ऐसे कृदृष्टि लोग थे जो श्री वरवरमुनि के वैभव से जलते थे । एक बार उन सभी ने श्री वरवरमुनि के मट्ट को चुपके से आग लगा दिया । श्री वरवरमुनि अपने स्वस्वरूप आदिशेष का रूप धारण कर आग से घिरा हुए मट्ट से बचकर स्थानीय श्रीवैष्णवों के समूह के मध्य मे खडे हुए । उसके पश्चात स्थानिय राजा को मालूम पडा की यह नीच कार्य किन लोगों ने किया और उन्हे दण्ड देना उचित समझा । श्री वरवरमुनि अपने कारुण्यता को प्रकाशित करते हुए कहे – उन सभी को माफ़ करे और उन्हे दण्ड ना दे । उनके करुणाभाव को देखकर उन सभी का हृदय परिवर्तन हुआ और उन सभी ने उनके चरणकमलों का आश्रय लिया । स्थानीय राजा श्री वरवरमुनि के इस वैभव को देखकर उनसे पंञ्चसंस्कार प्राप्त किया और इसके पश्चात राजा ने आऴ्वारतिरुनगरि और तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्यदेशों मे बहुत साराकैंकर्य किया ।
  • श्री वरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्य कैंकर्य जारी किये । उसी समय एरुम्बि गाँव के श्री एरुम्बिअप्पा श्री वरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे । श्रीवरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्यकैंकर्य जारी किये। उसी समय एरुम्बि गाँव  के श्रीएरुम्बिअप्पा श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे। अपने गाँव पहुँचकर जब वह श्रीएम्पेरुमान चक्रवर्ति-तिरुमगन सन्निधि का द्वार खोलने का प्रयास किये तो द्वार नही खोल पाये । चकाचौन्द एरुम्बिर्यप्पा भगवान कहते है – हेएरुम्बियप्पा ! तुम ने बहुत ही बडा भागवतापचार किया है क्योंकि तुमने श्री आदिशेष के स्वरूप श्रीवरवरमुनि के शेषप्रसाद ग्रहण नही किया अतःतुम तुरन्त जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लो और प्रसाद ग्रहण करो और उन की सेवा करो । पछतावा महसूस कर एरुम्बियप्पा तुरन्त श्रीरंग लौटकर श्रीवरवर मुनि के चरणकमलों का आश्रय लेते है । श्रीवरवरमुनि के प्रातःकाल और सन्ध्याकाल दिनचर्या वैभव को एक बहुत खूबसूरत ग्रंथ मे संग्रहित किये जिसे हम पूर्वदिनचर्या और उत्तरदिनचर्या से नाम से जानते है ।
  • जीयर श्रीकन्डाडै अण्णन जिन्होने अपने बाल्य अवस्था मे उत्तमप्रतिभा दर्शाया है उनका प्रशंसा करते है।
  • अप्पिळ्ळै और अप्पिळार श्रीपोन्नडिकाल जीयार के पुरुषाकार के माध्यम सेश् रीवरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लिये। एरुम्बियप्पा श्रीवरवरमुनि का व्यक्तिगत समीपता छोडकर अपने गाँव चले गये जहाँ उन्होने श्रीवरवरमुनि के वैभव का प्रचार प्रसार किया ।
  • एक बार उत्तमनम्बि जो श्रीवैष्नवों मे प्रख्यात हैव ह पेरियपेरुमाळ का तिरुवालवट्टम्कैंकर्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवरवरमुनि श्रीपेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करने हेतु प्रवेश किये। उन्हे प्रवेश करते हुए देखकर श्रीउत्तमनम्बि उन से कहे – कृपयाकर आप यहाँ से प्रस्थान करे क्योंकि भगवान का आन्तरिक सेवा हो रही है। यह सुनकर वरवरमुनि वहाँ से चले गये। सेवा के पश्चात थके नम्बि थोडि देर विश्राम लेते है । उस समय उनके सपने मे श्री पेरियपेरुमाळ आकर अपने निजसेवक श्रीआदिशेष की ओर इशारा करतुए हुए कहते हैहे नम्बि ! श्री मामुनि स्वयम श्रीआदिशेष है । उठने के तत्पश्चात अपने अपचार को जानकर मामुनि के मट्ट की ओर दौडे । मामुनि से मिलकर उनसे अपने अपराध की क्षमा मांगे और उनके चरनकमलों का आश्रय लिया और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने लगे ।
  • एक श्रीवैष्णवी शठगोप कोत्ति आय्चियार से अरुळिचेयल सीख रही थी । दोपहर के समय जब श्री वरवरमुनि एकान्त मे विश्राम ले रहे थे तब यह अम्माजी मुख्य प्रवेश द्वार के रंध्र से झाँकती है तो यह देकती है की श्री वरवरमुनि का असली स्वरूप श्री आदिशेषजी का है । परन्तु उसी समय एक आवाज़ से श्री वरवरमुनि उठते है और श्री वैष्णव अम्माजी से पूचते है की आपने क्या देखा  ? श्री अम्मजी ने साफ़ साफ़ बता दिया उन्होने क्या देखा । यह जानकर श्री वरवरमुनि कहे आप श्री यह बात गुप्त रखना और फिर वहा से चले गए ।
  • श्री वरवरमुनि निर्णय लेते है की अब उन्हे रहस्यग्रंथों पर टिप्पणि लिखनी चाहिये । पहले वह रहस्यग्रंथों जैसे मुम्मुक्षुप्पडि तत्वत्रय श्रीवचनभूषण पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणि लिखते है जिसमे वेद इतिहास पुराण वेदान्त दिव्यप्रबंधों इत्यादि संदर्भों से सिद्धान्तनिरूपण व्यक्त किये है । तत्पश्चात रामानुजनूत्रन्दादि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम् (जो चरमोपाय – श्रीआचार्यनिष्ठा को दर्शाता है यानि आचार्य ही सब कुछ) की टिप्पणि भी लिखे ।
  • स्थानीय श्रीवैषणवों श्री वरवरमुनि से निवेदन् करते है कि वह तिरुवाय्मोऴि दिव्यप्रबंध पर व्याख्या करे । श्री वरवरमुनि भगवान की निर्हेतुक कृपा और आचार्य कृपा से तिरुवाय्मोऴि नूत्तन्दादि ग्रंथ की रचना करते है । यह अद्वितीय ग्रंथ जो वेन्पा भाषा शैली मे लिखी गई है । यह याद करने मे सरल होता है परन्तु लिखने मे अति कठिन होता है । इस ग्रंथ मे वरवरमुनि श्री तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक पदिगम् (दस पासुर) के शुरुवात और अन्त के शब्दों का प्रयोग एक एक पासुर मे किये है । प्रत्येक पासुर के शुरुवात के दो वाक्य श्री तिरुवाय्मोऴि के पदिगम् का सार बतलाता है और अन्त के दो वाक्य श्री नम्माऴ्वार की प्रशंसा करता है ।
  • पूर्वोक्त श्रीवैष्णव श्री वरवरमुनि से निवेदन करते है कि वह पूर्वाचार्य के मूल सिद्धन्तों और उपदेशों का वर्णन करते हुए एक ग्रंथ प्रस्तुत करे । श्री वरवरमुनि तुरन्त  उपदेशरत्तिनमालै ग्रंथ की रचना करते है जिसमे वह पूर्वाचार्यों के जन्म-नक्षत्र, जन्मस्थल, उनके वैभव, श्री रामानुजाचार्य के अपार कारुण्य ( करुणा ), तिरुवाय्मोऴि के व्याखायन, ईडु महाग्रंथ की रचना, उसका प्रचार प्रसार, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के अवतार का वर्णन, उनकी श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव । इसी ग्रंथ वह कहते है कि श्री तिरुवाय्मोऴि का सार श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र ही है और अन्ततः इन सभी के अर्थों का स्पष्टीकरण करते है ।
  • एक बार कुछ मायावादि उनसे तर्क-वितर्क करने हेतु उनके समक्ष जाते है, परन्तु श्री वरवरमुनि यह तिरस्कार करते है क्योंकि वह अपना उसूल “तर्क-वितर्क नहि करेंगे केवल् भगवद्-विषय पर ही चर्चा प्रसार प्रचार करेंगे” का उल्लंघन नही करना चाहते थे । इसके विपरीत वह अपने शिष्य वेदलप्पै को उन मायावादियों से तर्क-वितर्क करने के लिये कहते है । श्री वेदलप्पै बहुत आसानी से उन सभी को पराजित करते है । उसके पश्चात वेदलप्पै अपने मूल निवास स्थान को त्यागते है ।
  • इसी दौरान श्री प्रतिवादि भयंकर अण्णन (जो कांचिपुरम के एक प्रख्यात विद्वान थे) अपनी पत्नी के साथ श्री श्रीनिवास भगवान की तिरुमंजन सेवा तिरुमला मे कर रहे थे । एक बार श्रीरंग से आए एक श्रीवैष्णव भगवान के तिरुमंजन सेवा के समय उनसे मिलते है और वह श्री वरवरमुनि के वैभव का वर्णन करते है । श्री वरवरमुनि के वैभव को सुनने के बाद, अण्णाजी अति प्रसन्न होते है जिसकी वजह से वरवरमुनि से मिलने की आकांक्षा व्यक्त किये । परन्तु इस प्रसन्न अवस्था मे वह यह भूल जाते है कि भगवान के श्रीपादतीर्थ मे परिमल (इलायचि) नही डाले और अर्चकस्वामि को श्रीपादतीर्थ देते है । जब उन्हे यह एहसास होता है तो वह दौडते हुए इलायचि लेकर आते है और अर्चकस्वामि के यह कहते है । अर्चकस्वामि कहते है कि बिना इलायचि के यह श्रीपादतीर्थ बहुत सुगंधित और मीठा हो गया है । यह सुनकर अण्णाजी समझ गए कि यह श्री वरवरमुनि के वैभव से यह संभव हुआ है और तुरन्त श्रीरंग की ओर निकल पडे । वह श्रीरंग पहुँचने के तदंतर श्री वरवरमुनि के मठ्ठ पहुँचे और चुपके से वरवरमुनि के कालक्षेप को सुनने लगे । श्री वरवरमुनि उस समय तिरुवाय्मोऴि के चौथे शतक के दसवाँ पासुर (ओन्रुम् देवुम् .. 4.10) कई शास्त्रों के आधारपर समखा रहे थे ।  यह पासुर भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को दर्शाता है । श्री अण्णाजी वरवरमुनि के ज्ञान और प्रस्तुतिकरण को देखर दंग रह गए । इसी दौरान श्री वरवरमुनि तीसरे पासुर समझाते हुए रुक गए और गम्भीर आवाज़ मे कहे – अगर अण्णजी का आऴ्वार से संबंध होगा तो ही आगे सुने वरना नही सुने यानि ओराण्वळि गुरुपरंपरा संबंध । तत्पश्चात अण्णाजी ने श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशशन किया । श्री पेरियपेरुमाळ अपने अर्चक स्वामि से उन्हे उपदेश देते है की आप श्रीमान को वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये और इस प्रकार विलक्षण संबन्ध प्राप्त करे ।  अण्णाजी श्री पोन्नडिक्काल जीयर के पुरुषाकार के माध्याम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त करते है और कुछ समय तक श्रीरंग मे निवास करते है ।
  • तदन्तर फिर से श्रीवरवमुनि तिरुमला की यात्रा मे जाते है । यात्रा के बींच मे श्री कांञ्चिपुर पेररुळाळ का मंगलाशासन करते है और कुछ दिनो तक कांञ्चिपुरम् मे निवास करते है ताकि अन्य श्रीवैष्णवों का उद्धार हो । वह अपने शिष्य अप्पाचियारण्णा को उपदेश देते है कि वह कांञ्चिपुरम् मे उनके प्रतिनिधि बनकर निवास करे । यह सदुपदेश देकर वरवरमुनि तिरुमला की ओर तिरुकडिगै, एरुम्बि, तिरुप्पुट्कुऴि इत्यादि के रास्तों से तिरुमला पहुँचे । मंगलाशासन करने तत्पश्चात अपने एक और शिष्य सिरिय केल्वियप्पन् जीयर को नियुत्क्त करते है जो अब से श्री पेरियप्पन् जीयार ( श्रीरामानुजाचार्य ने स्वयम इन्हे नियुत किया था ) के कैंकर्यों मे सहायता करे यानि अपना हाथ बटाये । उनकी वापसी मे वरवरमुनि तिरुएव्वुळ वीरयराघव , तिरुवल्लिक्केणि के वेंकटकृष्ण और अन्य दिव्यदेशों के पेरुमाळों ( अर्चमूर्तियों ) का मंगलाशासन किये ।  वे श्री मधुरान्तकम् दिव्यदेश पहुँचकर उस स्थान का अपने सिर से अभिवन्दन करते है जहाँ हमारे जगदाचार्य श्री रामानुजाचार्य श्री पेरियनम्बि के हाथों से पंञ्चसंस्कार से प्राप्त किये । उसके बाद वे तिरुवालि तिरुनगरि दिव्यदेश पहुँचकर श्री तिरुमंगयाऴ्वार के वैभव का आनन्द अनुभव कर, वदिवऴगु पासुर का समर्पण कर, आस-पास मे स्थित सारे अर्चमूर्तियों का मंगलाशासन करते है । तत्पश्चात तिरुक्कण्णपुरम् दिव्यदेश पहुँचकर श्रि सर्वांगसुन्दर ( सौरिराज ) अर्चा-विग्रह और उस दिव्यदेश मे श्री तिरुमंगैयाऴ्वार के समाधि का निर्माण करते है ।  इस प्रकार कई सारे दिव्यदेशों का भ्रमण कर अन्ततः श्रीरंग पहुँचे और वही निवास किये ।
  • उपरोक्त कहा गया है कि – श्री वरवरमुनि ने आदेश दिया कि अप्पाचियारण्णा कांञ्चिपुरम् जाए और उनके प्रतिनिधि बने । उस समय श्री अण्णाजी बहुत दुःखित होकर कहते है – यहाँ इतनी शुद्ध घोष्टि है जिसे छोडकर मुझे जाना पड रहा है । उन्हे दुःखित देखकर श्री वरवरमुनि ने कहा – उनके प्रयुक्त पात्र के धातु से उनके दो विग्रह बनाये जिसकी श्री पोन्नडिक्काल जीयर पूजा किया करते थे । एक विग्रह उन्होने श्री पोन्नडिक्काल जीयर को दिया और दूसरा श्री अण्णजी को दिया । ये दिव्य विग्रह हम श्री वानमामलै मट्ट, सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित वानमामलै और मुदलियाण्डान के वंशज के घरों मे यह अभी भी देख सकते है । वरवरमुनि ने अपने पूजनीय भगवान ( तिरुवाराधन भगवान – जिनका नाम एन्नै तीमनम् केदुत्ताइ) को भेट के रूप मे अण्णाजी को दिया जिन्हे हम सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित मुदलियाण्डान के वंशज के घर मे देख सकते है ।
  • श्री वरवरमुनि प्रतिवादिभयंकरमण्णा को श्रीभाष्य के अगले आचार्य और श्री कन्दादै अण्णन् शुद्धसत्त्वमण्णन् को भगवद्-विषयाचार्य के रूप मे नियुक्त करते है । वह श्री कन्दादै नायन् को ईडु 3600 पाडि पर आधारित अरुमपदम् की रचना करने का उपदेश दिये । इस ग्रंथ की रचना अन्ततः हुई और प्रसिद्ध भी है ।
  •  अब विस्तार मे कैसे श्री पेरिय पेरुमाळ श्री ववरमुनि के शिष्य हुए का वर्णन आप सभी के लिये प्रस्तुत है ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ बिना रुकावट के श्री वरवमुनि के श्रीमुख से अपने विषय (भगवद्-विषय) को सुनना चाहते थे । और अपने इच्छानुसार उनको (वरवरमुनि) को अपना आचार्य मान लिया । जब श्रीरंग मे पवित्रोत्रसव मनाया जा रहा था उस पवित्रोत्रसव साट्ट्रुमरै के दौरान, श्री नम्पेरुमाळ तिरुप्पवित्रोत्सव मण्डप को ले जाया गया और भगवान फिर वही रहने लगे । उस समय श्री वरवरमुनि भगवान का मंगलाशासन हेतु उसी मण्डप मे पहुँचे । उस समय भगवान ने स्वयम सबके यानि कैंकर्यपर, आचार्य पुरुष, जीयर, श्रीवैष्णवों समक्ष श्री वरवरमुनि को यह आदेश दिया – “आप श्रीमान तुरन्त श्री नम्माऴ्वार के तिरुवाय्मोऴि का ईडु व्याखायन का कालक्षेप करे” । भगवान यह भी कहा कि यह कालक्षेप निर्विराम होना चाहिए । भगवान ने इन्हे यह कार्य सौंपा यह जानकर वे अत्यन्त खुश हुए और विनम्रतापूर्वक भगवान के इस आदेश का पालन करना उचित समझा ।
  • इसके अगले दिन जब श्री वरवरमुनि पेरिय तिरुमण्डप (जो पेरियपेरुमाळ के द्वार-पालकों कि सन्निधि के भीतर पडता है) पहुँचते है, वे यह देखकर दंग होते है कि भगवान अपने समस्त परिवार सहित (उभयनाच्चियार – दोनो पत्नियों) , तिरुवनन्ताऴ्वान्, पेरिय तिरुवडि, सेनै मुदलियार, अन्य आऴ्वार, आचार्य इत्यादियों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब ये आये और कालक्षेप आरंभ हो । श्री वरवरमुनि अपने आपको भाग्यवान मानते है और कालक्षेप अन्य व्याख्यानों जैसे छे हज़ार पाडि, नौ हज़ार पाडि, बारह हज़ार पाडि और चौबीस हज़ार पाडि इत्याडि के माध्यम से आरंभ करते है । कालक्षेप के अन्तर्गत सत्-साम्प्रदाय के गोपनीयरहस्यों का विवरण वे अन्य ग्रंथ जैसे श्रुति, स्मृति, श्रीभाष्य, श्रुतप्रकाशिक, श्रीगीताभाष्य, श्रीपंञ्चरात्र, श्री विष्णुपुराण इत्यादि के माध्यम से दिये । वे ईडु व्याख्यान का वर्णन शब्दार्थ सहित, आन्तरिक-अर्थ इत्यादि से समझाये । यह निर्विराम दस महीनो तक चलता रहा । और अन्ततः भगवान की आज्ञा से साट्ट्रुमुरै के समाप्ति तिथि आनिमूल (आवणि मूल नक्षत्र) के दिन यह सम्पूर्ण हुआ । साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये ।  हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कहकर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक तीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्रीवैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया । इसी समय यह घटना एक विशाल दावाग्नि की तरह फैल गया और इस प्रकार यह गौरवनीय श्लोक अन्य दिव्यदेशों मे भगवान के द्वारा प्रचार हुआ । उसी समय अन्य श्रीवैष्णवों के आग्रह से अप्पिळ्ळै ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि का वाळितिरुनाम को प्रस्तुत कर उनकी गौरव की प्रशंसा की ।
  • कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।
  • श्री वरवरमुनि तत्पश्चात वडनाट्टुदिव्यदेश यात्रा के बारे मे सोचते है । वरवरमुनि इस यात्रा का आयोजन करते है और अपने शिष्यों के साथ यात्रा के लिये निकल पडते है ।
  • एरुम्बियप्पा को अपने दिव्यचरणों के पादुकों को प्रदान करते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान (अरंगनगरप्पन्) को पोन्नडिक्काल जीयर को सौंपते है । और उन्हे उपदेश देते है कि वह वानमामलै जाकर एक मट्ट का निर्माण करे और अविराम भगवान का कैंकर्य करे ।
  • वरवरमुनि फिर से पाण्दियनाट्टुदिव्यदेश यात्रा मे जाते है । यात्रा के दौरान, वे उस राज्य के राजा (महाबलि वण नाथ रायन्) को अपना शिष्य बनाकार उनसी बहुत सारे कैंकर्य करवाये ।
  • कहते है कि जब वरवरमुनि मदुरै के निकट यात्र कर रहे थे तो एक दिन वे एक इमली के पेड के नीचे विश्राम लिये । विश्राम लेने के पश्चात, जब वह उठे तो उनके दिव्यचरणों ने उस वृक्ष को स्पर्श किया तो तुरन्त इस वृक्ष को मोक्ष की प्राप्ति हुई । तत्पश्चात वे अन्य दिव्यदेशों के अर्चामूर्तियों का मंगलाशासन किये और अन्ततः श्रीरंग पहुँचे ।
  • कहते है – अपने शिष्यों द्वारा उन्होने बहुत सारे कैंकर्य सम्पूर्ण किये । उनके आदेशानुसार जीयर तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर की सेवा करने लगे ।
  • श्री वरवरमुनि पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि का व्याख्यान लिखते है जो उस समय लुप्त हो गई थी । पेरियवाच्चान पिळ्ळै ने पूर्व ही इस पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर चुके थे परन्तु अन्ततः यह लुप्ट् हो गई । इसका पुणर्निर्माण श्री वरवरमुनि के शब्दार्थ सहित किया ।
  • श्रीवरवरमुनि के अपार कारुण्य की भावना गौरवनीय और प्रशंसनीय है । वरवरमुनि का स्वास्थ्य रोगग्रस्त हो गया परन्तु अविराम वह पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की व्याख्या कर रहे थे । उनके बिगडते स्वास्थ्य को देखकर उनके शिष्य उनसे पूछे – स्वामि आप इतना कष्ट क्यों उठा रहे है ? वरवरमुनि ने हसते हुए कहा – यह कार्य मै हमारे भविष्य के पीढी के लिये कर रहा हूँ यानि पुत्र, पौत्र इत्यादि ।
  • वह अपना शरीर त्यागकर परमपद जाने की इच्छा व्यक्त करते है । उस समय वे अपने भावनावों को आर्ति प्रबंध नामक ग्रंथ मे प्रस्तुत करते है । इस ग्रंथ मे वे श्री रामानुजाचार्य से रोते हुए प्रार्थना कर रहे है कि उन्हे स्वीकार करे और उन्हे इस भवबंधन से मुक्त करे यानि इस भौतिक शरीर से मुक्त करे । इस ग्रंथ के माध्यम से वह दर्शाये है की कैसे रामानुजाचार्य से प्रार्थना करे, किस प्रकार आर्त दृप्त होकर प्रपन्न इस भव-बंधन से विमुक्त हो सकता है । क्योंकि वह स्वयम रामानुजाचार्य थे ।
  • उन्होने अन्त मे अपना भौतिक शरीर त्यागकर ( यानि अपनी सेवा इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण कर ), श्री वैकुण्ठ धाम पधारे और भगवत्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न हुए । वह सारे अरुळिचेयल सुनने की इच्छा व्यक्त करते है । उनके इच्छानुसार उनके शिष्य अत्यन्त प्रेम भावना से इसका आयोजन करते है । मामुनि इतने प्रसन्न होते है कि उन्होने सभी श्रीवैष्णवों के लिये तदियाराधन का आयोजन किया । और इन सभी से विनम्र्तापूर्वक अनजाने मे किये अपराधों की क्षमा याचना करते है । इसके उत्तर मे प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव कहते है – आप श्रीमान निष्काम, दोषरहित, अकलंकित थे । अतः आप को क्षमा याचना शोभा नही देता । तत्पश्चात श्री वरवरमुनि सभी श्रीवैष्णवों ने निवेदन करते है की श्री पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ के कैंकर्य संपूर्ण प्रेम से और केवल उन पर केंद्रित करते हुए करे ।
  • फिर वह “पिळ्ळै तिरुवडिगळे शरणम्, वाऴि उलगासिरियन् और श्री एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम्” कहकर अपनी लीला को इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण करते है । इस भौतिक जगट से जाने के पहले श्री भगवान को देखने की इच्छा से अपने कमल जैसे नयनों को खोले, तो साक्षत परम ब्रह्म श्रीमन्नारायण गरुड पर बैठकर पधारे और स्वयम उनको अपने साथ परम धाम ले गए । इस प्रकार अपनी लीला को अत्यन्त शानदार तरीके से सम्पूर्ण किये ।
  • श्री वरवरमुनि के जाने बाद, सारे श्रीवैष्णव बहुत रोते है । भगवान स्वयम बहुत शून्य महसूस करते है और किसि प्रकार के भोग को स्वीकार नही करते है । अन्ततः सारे श्रीवैष्णव खुड को दिलासा देते है और अन्तिम चरम कैंकर्य का आयोजन करते है । तिरुवध्यायन महामहोत्सव का आयोजन श्रेष्ठता, दिव्य-भव्य रूप से होता है । यह महामहोत्सव भगवान के ब्रह्मोत्सव से भी श्रेष्ठ था क्योंकि यह भगवान ने आदेशानुसार इसका आयोजन हुआ ।
  • पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

श्री वरवरमुनि (मामुनि) के दिव्य उपदेशों का संक्षिप्त वर्णन :

  • एक बार दो श्रीवैष्णवों के बींच मे गलतफ़हमि के कारण लड रहे थे । उसी समय रास्ते मे दो कुत्ते भी लड रहे थे । श्रीवरवरमुनि कुत्तों की ओर देखते हुए कहे – क्या आप कुत्तों ने श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र, तिरुमंत्र इत्यादि का अनुसंधान किया है ? तो क्यों इन श्रीवैष्णवों को अपने आप मे इतना घमण्ड क्यों है ? यह सुनकर वे दोनों परिवर्तित हुए और विशुद्ध सत्व से भगवद्-भागवत् कैंकर्य किये । कहने का तात्पर्य यह था – अगर कोई पूर्वाचार्य के ग्रंथों का अनुसंधान, कालक्षेप करे तो उसके मन मे क्लेश घमण्ड, इत्यादि दोष होना नहि चाहिये ।
  • एक बार वड देश से कोई व्यक्ति वरवरमुनि को अर्जित धन का समर्पण करता है । वरवरमुनि को यह जानकारी प्राप्त हुआ कि यह धन तीख तरीके से अर्जित नही है । अतः तुरन्त उन्होने इस धन का तिरसकार कर दिया और वापस भेज दिया । श्री वरवरमुनि धन दौलत मे कदाचित भी इच्छा नही रखते थे । कैंकर्य के लिये आवश्यक धन की इच्छा भी वे केवल सुनिश्चित श्रीवैष्णवों से रखते थे ।
  • एक बार एक वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे अचानक प्रवेश करती है । और श्री वरवरमुनि से एक रात के निवास के लिये निवेदन करती है । वरवरमुनि कहते है – “एक वृद्ध चिखुर भी पेड़ चडने के काबिल है” यानि आप कही और अपने निवास की व्यवस्था करे । अगर यह वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे रहती तो उनके वैराग्य के विरुद्ध भावना जागरुक हो सकती थी । अतः इस प्रकार वह ऐसे गलत फ़हमियों को बढावा नही देते थे जो लोगों के मन मे शंखा पैदा कर सके ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव अम्माजी बिना भक्ति-भाव के खाने की सब्जिया काटने मे मदद कर रही थी । यह जानकर श्री वरवरमुनि तुरन्त उनका बहिष्कार किया और सजा मे छे महीनो तक अन्य प्रदेश मे रहने का आदेश दिया । उनका उद्धेश्य साफ़ था – कैंकर्य करने वाले श्री वैष्णव सदैव भगवद्-भागवत निष्टा मे रहने चाहिये ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव “वरम् तरुम् पिळ्ळै” अकेले अकेले श्रीवरवरमुनि के मिलने हेतु चले गए । श्रीवरवरमुनि के उन्हे टोकते हुए कहे – कदाचित भी किसी भी व्यक्ति को आचार्य और भगवान के समक्ष अकेला नही जाना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति का धर्म और कर्तव्य है कि वह श्रीवैष्णवों के साथ भगवान और आचार्य के समक्ष जाये ।
  • उन्होने बहुत बार भागवतापचार के बारें मे समझाया और उसकी निर्दयी कठोर स्वभाव का वर्णन भी किया है और इससे कैसे प्रपन्न भक्तों का नाश हो सकता है ।
  • एक बार एक अर्चक स्वामि श्री वरवरमुनि ने निवेदन करते है कि उनके शिष्य उनका अभिनन्दन नहि कर रहे है और उनका उनको सम्मान नहि दे रहे है । श्री वरवरमुनि के उनके शिष्यों को समझाया अर्चक स्वामि को सदैव सम्मान दे क्योंकि उनमे श्रीमन्नारायण और श्रीदेवि सदैव बिराजमान है ।
  • एक बार वडुनाट्टुदिव्यदेश से एक धनी श्रीवैष्णव श्रीवरवरमुनि के समक्ष आकर एक श्रीवैष्णव के लक्षण के बारें मे पूछते है । श्रीवरवरमुनि उत्तर मे कहते है –
    • केवल भगवान के चरणकमलों का आश्रय लेने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भगवान का संबन्ध (यानि तप्त मुद्र – संख चक्र ) पाकर कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल तिरुवाराधन करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल आचार्याभिमान (परतंत्र) होने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भागवतों की सेवा करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता ।
    • हलांकि यह करना अत्यन्त आवश्यक है परन्तु निम्नलिखित बिन्दु और भी महत्वपूर्ण है –
    • हमे ऐसे कैंकर्य समयानुसार करना चाहिये जो श्री भगवान को सन्तुष्ट या प्रसन्न करे ।
    • श्रीवैष्णवों के लिये सदैव अपने घरों के द्वार खुले रहना चाहिये । और साथ ही उनके लिये जब चाहे जो चाहे सेवा करने के लिये सदैव तैय्यार रहना चाहिये ।
    • पेरियाऴ्वार के कथन के अनुसार “एन् तम्मै विर्कवुम् पेरुवार्गळे” हमे सदैव अन्य श्रीवैष्णवों के लिये बिक जाने के लिये भी तैय्यार रहना चाहिये ।
  • जब हम भगवद्-शेषत्वम् (भगवान के सेवक है यह भावना) को विकसित करेंगे तो हमे साम्प्रदाय के अर्थ, श्री भगवान और आऴ्वार आचार्य के अनुग्रह से सीख सकते है । एक श्रीवैष्णव जो पहले से ही निष्ठावान है उसके लिये यह आवश्यक नही की वह कुछ और व्यक्त-अव्यक्त रूप से सीखने की ज़रूरत नही क्योंकि पहले से ही वह चरम निष्ठा मे स्थित है |
  • कहते है अगर हम किसी भी व्यवहार-तत्व का प्रचार प्रसार करेंगे जिसका पालन हम नही कर रहे है तो यह केवल एक वेश्या का स्वभाव दर्शा रहे है । क्या वेश्या यह कह सकती है की कैसे शुद्ध आचरण करना चाहिये ? नही ना । इसीलिये जो भी प्रचार प्रसार करे उसका पालन अवश्य करे ।
  • कहा जाता है कि श्रीवैष्णवों की आराधना से श्रेष्ठ कोई कैंकर्य नही और श्रीवैष्णवों कि निन्दा से बड़कर महाप्राध कुछ भी नही है ।

ये दिव्य उपदेश सुनकर प्रफ़ुल्लित श्रीवैष्णव मामुनि के प्रति प्राणर्पित निष्ठावान हुआ । उनका चिन्तन मनन करते हुए अपने गाँव लौट गया ।

हमारे सत्-सांप्रदाय मे श्रीवरवरमुनि का विषेश स्थान –

  • कहते है कि किसी भी अन्य आचार्य के वैभव के बारें मे बोलना/बात करना और संक्षेप मे इसका विवरण कर सकते है परन्तु श्रीवरवरमुनि का वैभव असीमित है । वे खुद अपने हज़ार जबानों से अपने वैभव का वर्णन नही कर सकते है । तो हम सभी क्या चीज़ है । हम तो कदाचित पूर्णसन्तुष्टिकरण के लिये भी नहि कर सकते । हमे तो केवल उनके बारें मे पढकर, उनकी चर्चा करते हुए अपने आप को सन्तुष्ट करना चाहिये ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने स्वयम उन्हे अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार किया और इस प्रकार आचार्य रत्नहार और ओराण्वळि गुरुपरम्परा को सम्पूर्ण किया ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ उनके शिष्य होने के नाते, अपना शेषपर्यन्क (शेष सिंहासन) अपने आचार्य को भेंट मे दे दिया जो हम अभी भी सारे दिव्यदेशों मे देख सकते है । केवल श्रीमणवाळमामुनि के अलावा अन्य आऴ्वार और आचार्य को यह शेषपर्यन्क उपलब्ध नही है ।
  • आऴ्वार तिरुनगरि मे, इप्पासि तिरुमूलम (मणवाळमामुनि के आविर्भाव दिवस पर) आऴ्वार अपने तिरुमंजनसेवा के बाद अपनी पल्लकु (पालकी), कुडै, चामार, वाद्य इत्यादि मामुनि के सन्निधि को भेजकर उनक आगमन का स्वागत करते है । मामुनि के आगमन के बाद वे तिरुमान्काप्पु (तिलक से) सुसज्जित होकर मामुनि को अपना प्रसाद प्रदान करते है ।
  • मामुनि केवल एकमात्र ऐसे आचार्य है जिनका तिरुवध्यनम् (तिरोभावदिवस) दिव्यभव्य रूप से मनाया जाता है । तिरोभावदिवस केवल पुत्र और शिष्य ही करते है । लेकिन इस विषय मे, साक्षात श्रीरंग पेरुमाळ उनके शिष्य है जो अभी भी प्रचलित है । वही उनका यह दिन दिव्य भव्य रूप से मनाते है । इस दिन वह अपने अचर्क स्वामि, परिचारक, निज़ि सामग्री इत्यादि उनके लिये भेजते है । इस महामहोत्सव की जानकारी इस लिंक पर उपलब्ध है |
  • श्रीरंग और आऴ्वार तिरुनगरि मे मामुनि कदाचित भी अपने वैभव और कीर्ती के उत्सव पर ज़्यादा ध्यान नही दिया करते थे । उनके अनुसार उनका अर्च-तिरुमेनि (विग्रह) बहुत ही छोटा होना चाहिये और पुरपाड्डु बिलकुल भी नहि होना चाहिये क्योंकि वहाँ पे केवल आऴ्वार और नम्पेरुमाळ पर पूरे कैंकर्य केंद्रित है । इसी कारण उनका विग्रह बहुत छोटा और अत्यन्त सुन्दर है ऐसा प्रतीत होता है ।
  • मामुनि इतने विनयशील और अभिमानरहित थे की कभी भी किसी का बुरा नहि लिखते और चाहते थे । अगर पूर्वाचार्य के व्याख्यानो मे भी अगर परस्पर विरोधि प्रतीत होता है फिर भी ऐसे संदर्भ मे भी वह इसका ज़िक्र या इसकी वीणा नही करते और अपक्षपात रहते है । (किसी का भी पक्ष नही लेते और एक दूसरे पक्ष का विरोध और निन्दा कदाचित भी नहि करते) ।
  • श्री मामुनि ने केवल अरुळिचेयल पर अपना ध्यान केंद्रित किया और वेदान्त का विवरण इन्ही अरुळिचेयल से ही समझाया । अगर वह प्रकट नही होते तो निश्चित है कि तिरुवाय्मोऴि और उसके अर्थ भिगोया गया इमली की तरह होगा (माने पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता) ।
  • मामुनि से स्वयम पूर्वाचार्यों के ग्रंथों को सम्मिलित कर उन पर अपनी व्याख्या लिखे और भविष्य मे हम सभी के उद्धार हेतु उनका संरक्षण किये ।
  • उनकी अपार कारुण्य भावना प्रशंसनीय है । जिस किसि ने भी उनका विरोध, अपमान, परेशान किया उन सभी के प्रती वह अपना कारुण्य भाव दिखाते थे । वे हमेशा उनका आदर और उनके साथ अच्छा बर्ताव करते थे ।
  • कहा जाता है कि अगर हम उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर उनके चरण कमल अपने मस्तिष्क पर धारण करने के लिये तैय्यार है, तो यह अवश्य मानो कि अमानवम् (जो विरजा नदी पार करवाने मे सक्षम) याने स्वयम मामुनि हमारे हाथ पकडकर इस भव सागर से पार करवायेंगे ।
  • श्री रामानुजाचार्य के प्रती उनका उत्सर्ग अपूर्व है और अपने जीवन चरित्र से कैसे उनकी पूजा कैसे करे यह दर्शाया है ।
  • उनका जीवन चरित्र हमारे पूर्वाचार्यों के कथानुसार एक साक्षात उदाहरण है की कैसे एक श्रीवैष्णव को व्यवहार करना चाहिये । यह पूर्व ही श्री आचार्यनिष्ठावान कैंकर्यपर भागवतोत्तम श्री सारथितोताद्रि के असीम कृपा से इस लिंक (श्रीवैष्णव के लक्षण) पर अन्ग्रेज़ि मे उपलब्ध है । कृपया इस लिंक पर क्लिक करे और सारे लेख और ई-पुस्तकें का लाभ उठायिये ।

मामुनि का तनियन् – (ध्येय नित्य अनुस्मरण श्लोक)

श्रीशैलेश दयापात्रम् धीभक्त्यादिगुणार्णवम् । यतीन्द्र प्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम् ॥

संक्षिप्त अनुवाद – मै (श्रीरंगनाथ) श्रीमणवाळमामुनि का नमन करता हूँ जो श्री तिरुवाय्मोऴि के दया के पात्र है, जो ज्ञान भक्ति वैराग्य इत्यादि गुणों से सम्पन्न एक विशाल सागर है और जिनको श्री रामानुजाचार्य के प्रति अत्यन्त रुचि रति और आस्था है ।

इस लेख से हमने ओराण्वळिगुरुपरंपरा के अन्तर्गत सारे आचार्यों के वैभव और उनके जीवन का संक्षित वर्णन प्रस्तुत कर सम्पूर्ण किया है । कहा जाता है कि सदैव प्रत्येक कार्य का अन्त मीठा होना चाहिये । इसीलिये हमरी यह ओराण्वळिगुरुपरंपरा श्री मणवाळमामुनि के जीवन चरित्र से सम्पूर्ण होती है और जिनकी लीला इस लीला विभूति और नित्य विभूति (दोनों) मे रसाननन्द से भरपूर है अतः रसमयी और मीठी है ।

उनका आविर्भाव दिवस का महामहोत्सव (नक्षात्रानुसार) दिव्य भव्य रूप से कई दिव्य देशों मे होती है जैसे आऴ्वार तिरुनगरि, श्रीरंगम्, कांञ्चिपुरम्, श्रीविल्लिपुत्तूर, तिरुवहिद्रपुरम्, वानमामलै, तिरुनारायण इत्यादि । हम सभी इस महामहोत्सव का भरपूर लाभ उठा सकते है और इस उत्सव मे भाग लेकर, उनके समक्ष रहकर, अपने आप को परिष्कृत करना चाहिये जो स्वयम श्रीरंगनाथ भगवान के प्रिय आचार्य हुए ।

हम आगे यानि भविष्य मे अन्य श्रेष्ठ आचार्यों के जीवन चरित्र के बारे मे चर्चा अवश्य इन्ही लेखों द्वारा करेंगे । अन्य आचार्यों के अन्तर्गत सबसे पहले श्री पोन्नडिक्काळ जीयर के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे जो श्री मामुनि के तिरुवडि (चरणकमलों के सेवक) है और जिसे स्वयम मामुनि अपना श्वास और जीवन मानते थे ।  अगले लेख मे आप सभी पोन्नडिक्काल जीयर के वैभव के बारें मे अवश्य पढे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानचल महामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण्वालि के अन्तर्गत पिळ्ळै लोकाचार्य के जीवन के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण्वालि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के बारें मे चर्चा करेंगे ।

thiruvAymozhi piLLai

तिरुनक्षत्र – वैशाख मास , विशाखा नक्षत्र

अवतार स्थल – कुन्तिनगरम् ( कोन्तगै )

आचार्य – पिळ्ळै लोकाचार्य

शिष्य गण – अऴगिय मणवाळ मामुनि , शठगोप जीयर ( भविष्यदाचार्य सन्निधि ) , तत्वेष जीयार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – आऴ्वार तिरुनगरि

ग्रंथ रचना सूची – पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि स्वापदेशम्

वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए ।

तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये । कूरकुलोत्त्मदास ने यूँही उनके पीठ पर थपकी मारते हुए कहे की वे उन्हे यह नही सिखायेंगे । तिरुमलै आऴ्वार सात्विक होने के कारण उन्होने अपने अनुचरों को इशारा करते हुए कहा की कूरकुलोत्त्मदास के प्रतिक्रिया को भूल जाए और इस तरह तिरुमलै आऴ्वार उस स्थान से प्रस्थान हुए । तिरुमलै आऴ्वार ने अपने पालक माता श्री से इस घटना का वर्णन किया तो उन्होने उनको पिळ्ळैलोकाचार्य से उनके सम्बंध को याद करया और उसके पश्चात यह सोचने लगे की उन्होने क्या खोया और यही सोचते रह गए । कई दिनो बाद फिर से तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है जब वे एक हाथी पर बैठकर भ्रमण कर रहे थे ।  इस समय तिरुमलै आऴ्वार तुरन्त उतरकर उनके समक्ष दण्डवत प्रनाम करते हुए उनसे विनम्रतापूर्वक सीखने की इच्छा व्यक्त किये । यह देखकर कूरकुलोत्तमदास ने उनको स्वीकार किया और सिखाने का कार्य स्वीकृत किया । तिरुमलैयाऴ्वार अपने आचार्य कूरकुलोत्तम दास के लिये एक अग्रहार (यानि ऐसा विशेष भूमि जिसे एक उपयुक्त और सक्षम ब्राह्मण को दिया जाता था ) का व्यवस्था कर उनसे प्रतिदिन सीखने लगे और यहाँ श्री कूरकुलोत्तम दासजी अपना नित्यकैंकर्य करने लगे जैसे तिरुवाराधन इत्यादि । तिरुमलैयाऴ्वार प्रशानिककार्यों मे व्यस्त होने की वजह से उन्होने श्री कूरकुलोत्तम दासजी को विनम्र होकर निवेदन किये की जब वे जिस समय तिरुमान्काप्पु (तिलक) को लगाते है उस समय उनसे मिलने हर रोज़ आए । श्री दासजी ने यह स्वीकार किया और उनसे मिलने हर रोज़ आने लगे । पहले दिन उन्होने देखा की –  श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के तनियन् का पाठ करते हुए तिरुमलैयाऴ्वार तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रभंधो का सारांश ज्ञान देने लगे । इसि दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशानिककार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपन शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशानिककार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरणकमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये ।

अनुवादक टिप्पणि – नम्पिळ्ळै ने ईडुव्याख्यान ईयुण्णिमाधवपेरुमाळ को सौंपा उसके बाद जिन्होने अपने सुपुत्र ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ को यह ग्रंथ सिखाया । नलूरपिळ्ळै श्री ईयुण्णिपद्मनाभपेरुमाळ के प्रत्यक्ष शिष्य थे जिन्होने पूर्णरूप से इस दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सीखा और बाद मे जिन्होने अपने पुत्र श्री नालूराच्चानपिळ्ळै को सिखाया ।  इसी दौरान श्री देवपेरुमाळ नालुरपिळ्ळै को ज्ञात कराते है की वे श्री तिरुमलैयाऴ्वार को शेष तिरुवाय्मोऴि शब्दार्थ सहित सिखाये । श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने कहा – कोई अन्य क्यों अपने सुपुत्र को हम यह कार्य सौंपते है क्योंकि अगर वह सिखाये तो वह आपके सिखाने के बराबर होगा और फिर भगवान अन्तर्धान होए गये । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को स्वीकार किये और उन्होने श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे ।

नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मुल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै ।

तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है । वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया ) । इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरि लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरि के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरित चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुत कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए ।

इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै तिरुवन्तपुरम् जाकर श्री विळान्चोलैपिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखने हेतु रवाना हुए । विळान्चोलैपिळ्ळै श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के प्रसिद्ध और करीबी शिष्य माने गये है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै का आगमन जानकर अपने आचार्य पर एक चित्त और एकाग्र होकर और श्री पिळ्ळैलोकाचार्य पर ध्यान करते हुए श्री विळान्चोलैपिळ्ळै ने पूर्णरूप से तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को रहस्य ग्रंथ सिखाये और अपने कृपा के पात्र बनाकर उन्हे वरदान दिये । इसके बाद श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै फिर आऴ्वार तिरुनगरि को लौट जाते है । कुछ समय बाद श्री विळान्चोलैपिळ्ळै अपन देह त्यागने की इच्छा व्यक्त करते है और तुरन्त ही परमपद को प्रस्थान होकर अपने आचार्य के दिव्यचरणकमलों की सेवा मे संलग्न होते है । श्री विळान्चोलैपिळ्ळै के चरमकैंकर्य श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै स्वयम दिव्यभव्य रूप से करते है ।

कुछ समय बाद श्री पेरियपेरुमाळ ( भगवान श्रीमन्नारायण ) अपने नित्यसुरी सेवक श्री आदिशेष को आज्ञा देते है की वे फिर से इस भौतिक जगत मे अवतार ले और उनका कर्तव्य यह है की वे बहुत सारे बद्ध जीवात्माओं को परमपद लाये । श्रीमन्नारायण के वचन सुनकर श्री तिरुवनन्ताऴ्वान ने यह सेवा स्वीकृत किया और इस भौतिक जगत मे तिगऴकिडन्तान् तिरुनाविरुडयपिरान और श्रीरंगनाच्चियार के पुत्र (श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार) के रूप मे इप्पासि तिरुनक्षत्र मे प्रकट हुए जो चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों मे से गोमदाऴ्वान के वंशज थे । उनका पालन पोशन उनकी माताश्री ने स्वयम सिक्किल्किदारम् मे किया था जहाँ उन्होने सामान्य शास्त्र और वेदाध्ययन अपने पिताश्री से सीखा था । तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि  के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्णप्रेमभक्तिभाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है ।

अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य ने पेरियनम्बि (परांकुश दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया उसी प्रकार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै (शठगोप दास) के चरनकमलों का आश्रय लिया । श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ के विशेष अनुग्रह और दिव्यकैंकर्य कोशिशें से वर्तमान आऴ्वारतिरुनगरि प्रचलित रूप मे है । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अपना जीवन केवल नम्माऴ्वार और तिरुवाय्मोऴि का प्रचार प्रसार करने के लिये समर्पित किया जो केवल श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के दिव्यवचनों पर आधारित है और इस प्रकार से प्राप्त शिष्यों को श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ को सौंपकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के दिव्यकैंकर्य की बदौलत ईडु व्याख्यान हमारे लिये उपलब्ध है जिसका प्रसार प्रचार श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ ने सर्वोच्च शिखर पर किया ।

चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

तनियन

नमः श्रीशैलनाथाय कुन्ती नगर जन्मने । प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैंकर्यशालिने ॥

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य अऴगियमणवाळपेरुमाळ के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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पिळ्ळै लोकाचार्य

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे ओराण वाळि के अंतर्गत श्री वडुक्कुतिरुवीधिपिळ्ळै के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाळि के अंतर्गत अगले आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के बारें मे चर्चा करेंगे ।

piLLai lokAchArya

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास , श्रावण नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

शिष्यगण – कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – ज्योतिष्कुडि ( मधुरै के पास)

ग्रंथरचनासूचि – याद्रिचिक पडि, मुमुक्षुपाडि, श्रियःपति, परंत पडि, तनि प्रणवम्, तनि द्वयम्, तनि चरमम्, अर्थ पंचकम्, तत्वत्रयम्, तत्वशेखरम्, सारसंग्रहम्, अर्चिरादि, प्रमेयशेखरम्, संसारसाम्राज्यम्, प्रपन्नपरित्राणम्, नवरत्तिनमालै, नवविधासंबंधम्, श्रीवचनभूषणम् इत्यादि

श्रीरंग मे पिळ्ळै लोकाचार्य नम्पिळ्ळै के विशेष अनुग्रह से वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को पुत्र के रूप मे प्रकट हुए ( यह हमने पूर्व अनुच्छेद मे बताया ) । जिस प्रकार अयोध्या मे श्री राम पेरुमाळ और [लक्ष्मण] इळय पेरुमाळ, गोकुल मे श्री कृष्ण भगवान और नम्बि मूतपिरान [बलराम] बडे हुए उसी प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य और उनके छोटे भाई अळगिय मणवाळ नायनार श्रीरंग मे बडे हुए । दोनो भाई हमारे सत्सांप्रदाय के कई आचार्य – नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चानपिळ्ळै, वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै इत्यादि के विशेष अनुग्रह के पात्र हुए । उन्होने अपने पिता के चरण कमलों का आश्रय लेकर सत्सांप्रदाय के बारें मे सीखा । इन दोनों भाईयों ने उनके जीवन काल मे नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करने का शपथ लिया और यह उन दोनो आचार्यसिंहों का विशेष गुण था ।

इस भौतिक जगत मे शोषित जिवात्माओं के प्रति अत्यन्त कारुण्य भावना रखते हुए श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने भगवान श्रीमन्नारायण की असीम कृपा से कई सारे ग्रंथों की रचना किये जो केवल हमारे सत्सांप्रदाय के बहुमूल्य अर्थों को सरल संस्कृत-तमिल भाषा मे दर्शाता है और यह केवल एक आचार्य से शिष्य को व्यक्तिगत आधार पर प्राप्त होता था ।

पिळ्ळै लोकाचार्य अन्ततः हमारे सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक हुए और वे अपने शिष्यों को श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय के विषयों पर आधारित ज्ञान का शिक्षण दे रहे थे । एक बार मणप्पाक्कतु नम्बि देवपेरुमाळ के पास जाकर उनसे शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करते है । देवपेरुमाळ यह स्वीकार कर उन्हे शिक्षण देने लगे । परंतु श्री देवपेरुमाळ बींच मे प्रशिक्षण स्थगित कर मणप्पाक्कतु नम्बि को आदेश देते है कि वह श्री रंग जाये जहाँ इनका स्थगित प्रशिक्षण पुनः आरंभ करेंगे । यह जानकर मणप्पाक्कतु नम्बि खुशी खुशी श्री रंग की ओर निकल पडे । श्री रंग मे स्थित काट्टऴ्गिय सिंगर मंदिर पहुँच कर वह श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के कालक्षेप घोष्टि को देखते है । एक स्तंभ के पीछे छुपकर वह प्रवचन को सुनते हुए उन्हे आश्चर्य होता है कि वह अपने स्थगित प्रशिक्षण को पुनः सुन रहे थे । यह जानकर वह उनके समक्ष प्रत्यक्ष हुए और उनसे पूछा –  अवरो नीर ( क्या आप देव पेरुमाळ है ? ) और पिळ्ळै लोकाचार्य ने कहा – अवतु , येतु ( जी हाँ , अब क्या करुँ) .. यह घटना से स्पष्ट है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है और इसे हमारे पूर्वाचायों ने स्वीकार किया है ।

एक और घटना घटी जिसका विवरण यतीन्द्रप्रणवप्रभावम् मे है जो यह साबित करता है कि पिळ्ळैलोकाचार्य स्वयम देवपेरुमाळ ही है । पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अन्तिम काल के दौरान, ज्योतिष्कुडि मे अपने शिष्य नालुर पिळ्ळै को उपदेश देते है की वह तिरुमलै आऴवार को सत्संप्रदाय के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दे । उसके बाद जब नालुरपिळ्ळै और तिरुमलै आऴवार देव पेरुमाळ के दर्शन हेतु गए तब श्री देव पेरुमाळ ने स्वयम नालुर पिळ्ळै को संबोधित करते हुए कहा – मैने जिस प्रकार ज्योतिष्कुडि मे तुम्हे उपदेश दिया की तुम्हे जरूर तिरुमलै आऴवार को अरुलिच्चेयल् के व्याख्यानों मे प्रशिक्षण दो — अब तक आपने क्यों मेरे आदेशों का पालन नहि किया ?

पिळ्ळै लोकाचार्य ने मुमुक्षुवों (यानि जो जीवात्मा भगवद्-कैंकर्य मोक्ष के प्रति आसक्त है) के उत्थापन हेतु भगवान कि असीम कृपा से कई ग्रंथों की रचना किये । उन मे से अठारह ग्रंथ केवल हमारे सत्-सांप्रदाय के विशेष दृष्टिकोण को दर्शाता है (यानि सांप्रदाय के गुडार्थों) [जैसे – रहस्य त्रयम्, तत्व त्रयम्, अर्थ पंचकम्, इत्यादि] जो नम्माऴ्वार के तिरुवामोऴि पर आधारित है । इन मे से निम्नलिखित श्री वैष्णवों के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण है  –

1) मुम्मुक्षुप्पडि – यह एक रहस्य ग्रंथ है जिसमे श्री पिळ्ळैलोकाचार्य ने रहस्य त्रय – {तिरुमंत्र (अष्टाक्षरी मंत्र), द्वयमहामंत्र, चरमश्लोक} का विवरण बहुत ही उत्कृष्ट और सरल सूत्रों मे दिया है । इसी ग्रंथ पर श्री मनवाळ मामुनि ने टिप्पणि लिखे । यह एक ऐसा मूल ग्रंथ है जिसके बिना प्रत्येक श्रीवैष्णव रहस्य त्रय की महिमा और वैभव कभी नही जान सकता ।

2) तत्व त्रय – यह ग्रंथ कुट्टि भाष्य ( छोटा श्री भाष्य ) के नाम से प्रसिध्द है । यह ग्रंथ श्री भाष्य पर आधारित है जिसमे स्वामि पिळ्ळै लोकाचार्य ने तीन तत्वों (चित, अचित, ईश्वर) का सारांश सरल सूत्रों मे बतलाया है । और फिर श्री मामुनि के व्याख्यान के बिना हम इस ग्रंथ के वैभव और महिमा कदाचित नहि जान पायेंगे ।

3) श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र – यह ग्रंथ की रचना केवल और केवल पूर्वाचार्य और आऴ्वारों के दिव्य कथन पर आधारित है । यह ग्रंथ श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का महान काम है जिसमे हमारे सत्-सांप्रदाय के गूडार्थों का स्पष्टीकरण है । यह ग्रंथ सत्सांप्रदाय के गोपनीय अर्थों को दर्शाता है और श्री मामुनि इस ग्रंथ पर आधारित अपनी टिप्पणि मे इसका स्पष्टीकरण देते है । तिरुनारायणपुरत्तु आयि ने इस ग्रंथ पर टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

अनुवादक टिप्पणि – प्रत्येक श्रीवैष्णव का कर्तव्य है की अपने जीवन काल मे एक बार इन ग्रंथों पर आधारित कालक्षेप ज़रूर सुने ।

श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए ।  श्री पिळ्ळै लोकाचार्य की महानता यह थी की उन्होने अपने ग्रंथों की रचना सरल तमिल भाषा मे किये और इन ग्रंथों को कोई भी समझने के सक्षम है अगर वह जानने के इच्छुक हो । मुम्मुक्षुवों के बाधावों का निष्काशन हेतु और सत्सांप्रदाय के दिव्यार्थों के विषयों को समझने की बाधा का निष्काशन हेतु उन्होने हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों को [जो ईडु इत्यादि ग्रंथो से सम्मिलित है] सौभाग्य से लिखित रूप मे अपने ग्रंथों मे प्रस्तुत किये । वह सबसे पहले ऐसे आचार्य है जिन्होने हमारे पूर्वार्चार्यों के प्रमाण वचनों का संरक्षण किये । इसी लिये वह प्रमाणरक्षक आचार्य के नाम से भी जाने गए । हलांकि प्रमाणरक्षक के होने के बावज़ूद वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] । कहते है जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे ।

वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परम पद को प्रस्थान हुए ।

मणवाळ मामुनि अपने उपदेशरत्तिनमालै मे श्री पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित करते हुए उनके दिव्य शास्त्रों मे श्री वचनभूषण को और भी अत्यधिक गौरन्वित किये । इस दिव्य ग्रंथ मे मामुनि आळ्वारो के अवतारों , पूर्वाचार्यों के अवतारों , श्री रामानुजाचार्य की कृपा ( जिन्होने इस सत्सांप्रदाय का आरंभ किया और जिसमे सभी लोग आमंत्रित है और जहा योग्य/अयोग्य नहि देखा जाता है ) तिरुवाय्मोळि पर आधारित टिप्पणियों का उल्लेख इत्यादि और श्री पिळ्ळै लोकाचार्य का असीमित वैभव और अन्ततः श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव और इस ग्रंथ मे लिखित सूत्रों के अर्थों का सार हम सब के लिए प्रस्तुत किये । श्री मामुनि कहते है – प्रत्येक श्री वैष्णव को श्री वचनभूषण मे प्रस्तुत सूत्रार्थों का पालन हमारे जीवन मे अत्यावश्यक है और इस प्रकार पालन करने से हम सभी निश्चित रूप से एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) के कृपा के पात्र होंगे । श्री मामुनि कहते है – अगर हमे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों के ज्ञान और अनुष्ठान (सदुपदेश और सात्विक जीवन) पर विश्वास नहि है और अपने बुद्धि से खुद के अर्थ , ज्ञान , व्याख्या , तर्क इत्यादि की रचना करें तो केवल वह हमारे अज्ञान को दर्शाता है । मामुनि जो कभी भी अपने व्याख्यानों मे या कालक्षेपों मे अपशब्दों का प्रयोग नहि करते परन्तु उन्होने कई बार मूर्ख शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि वे यहाँ उन लोगों का निर्दयता को दर्शाते है जिन्हे पूर्वाचार्यों के श्री सूक्तियों पर विश्वास नहि है और इस विश्वास के बिना वे लोग श्री वैष्णव होने का अभिनय करते है ।  इस प्रकार श्री वचनभूषण पर आधारित तत्वसार को श्री मामुनि ने अपने उपदेश रत्तिनमालै मे प्रस्तुत किया है ।

वेदान्ताचार्य ( श्री निगमान्त महा देशिकन् ) ने एक बहुत हि सुन्दर अनोखे प्रभंध की रचना किये जिसे हम लोकाचार्य पंचाशत के नाम से जानते है जिसमे केवल और केवल पिळ्ळै लोकाचार्य को गौरन्वित किया गया है । हलांकि वेदान्ताचार्य  पिळ्ळै लोकाचार्य के उम्र के तुलना मे पच्चास वर्ष छोटे थे परन्तु पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति उनकी श्रद्धा और प्रशंसा गौरवनीय है और इस ग्रंथ का पाठ तिरुनारायणपुरम के हर रोज़ होता है । अंग्रेज़ी भाषा मे इस ग्रंथ का सरल अनुवाद श्री ऊ.वे टी सी ए वेंकटेशन स्वामि द्वारा प्रस्तुत है – http://acharya.org/books/eBooks/vyakhyanam/LokacharyaPanchasatVyakhyanaSaram-English.pdf.

इस प्रकार हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के असीमित विशेष वैभव और महिमा को समझने मे सक्षम हुए है जिन्होने हमारे सत्साम्प्रदाय के संरक्षण हेतु अपना जीवन समर्पित किया । प्रत्येक व्यक्ति जो अपने आप को श्रीवैष्णव से संभोधित करता है उसे पिळ्ळै लोकाचार्य के प्रति असीमित श्रद्धा और कृतज्ञता [उपाकार स्मृति] होनी चाहिये क्योंकि उनके बिना ना हम नम्पेरुमाळ को देख पायेंगे और ना हि एम्पेरुमानार दर्शन के गूडार्थों को समझ पायेंगे ।

हम श्री पिळ्ळै लोकाचार्य के चरण कमलों का आश्रय लेकर प्रार्थना करे की हम सभी को भगवान और अपने आचार्य के प्रती सत्भावना हो  ।

पिळ्ळै लोकाचार्य का तनियन् –

लोकाचार्य गुरवे कृष्ण पादस्य सूनवे । संसार भोगि संतष्ठ जीव जीवातवे नमः ॥

पिळ्ळै लोकाचार्य और उनकी घोष्टि का मंगलाशासन –

वाळि उलगासिरियन् वाळि अवन् मन्नु कुलम् | वाळि मुडुम्बै एन्नु मानगरम् ||

वाळि मनम् चूळ्न्त पेरिन्ब मल्गुमिगु नल्लार् | इनम् चूळ्न्तु इरुक्कुम् इरुप्पु ||

अगले अनुच्छेद मे ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद (लेख) मे ओराणवाळि के अन्तर्गत श्री नम्पिळ्ळै के जीवन के बारे मे चर्चा की थी । आगे बढते हुए ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के बारे मे चर्चा करेंगे ।

vadakkuthiruveedhipillai

तिरुनक्षत्र – ज्येष्ट मास स्वाति नक्षत्र

अवतार स्थल – श्रीरंग

आचार्य – नम्पिळ्ळै

शिष्यगण – पिळ्ळैलोकाचार्य, अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार इत्यादि

स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – तिर्वरुंगम

ग्रन्थ सूची – ईडु 3000 पाडि

श्री कृष्णपादर के रूप मे जन्म लेकर, वे वडुक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै के नाम से प्रसिध हुए । वे नम्पिळ्ळै के शिष्यगण मे से उनके प्रधान महत्वपूर्ण  शिष्य हुए ।

हलांकि गृहस्थाश्रम मे होने के बावज़ूद वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै शुरू से ही आचार्य निष्ठा मे सदैव स्तिथ थे और उनहे संतान पैदा करने के विषय मे संबन्धरहित इच्छा व्यक्त किया करते थे । यह जानकर उनकी माँ उनके गुरू श्री नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे अपने सुपुत्र के विरुद्ध शिकायत करती है । श्री नम्पिळ्ळै यह जानकर उनके शिष्य वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी सत्पत्नी को अपने घर आने का आमंत्रण देते है । आमंत्रण पाकर खुशी से आचार्य के घर जाकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै और उनकी पत्नी आचार्य के कृपा के पात्र बने और फिर आचार्य नम्पिळ्ळै ने वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै को सन्तान पैदा करने के कार्य मे संलग्न होने का उपदेश दिया । आचार्य के सदुपदेश पाकर स्वामि पिळ्ळै उस कार्य को आचार्य प्रीति के लिये संपूर्ण करते है । आचार्य का विशेष अनुग्रह पाकर श्री पिळ्ळै को एक सत्पुत्र की प्रप्ति होति है और स्वमि पिळ्ळै अपने सत्पुत्र का नाम – श्री पिळ्ळै लोकाचर्य रखते है [जो लोकाचार्य {नम्पिळ्ळै} के विशेष अनुग्रह से प्राप्त हुआ] । श्री पिळ्ळै अपने आचार्य को यह बताते है तब उन्हे पता चलता है कि आचार्य नम्पिळ्ळै की सोच कुछ और ही थी । नम्पिळ्ळै नवजात शिशु का नाम अळगिय मनवाळन  रखना चाहते थे । अपने आचार्य का विचार जानकर स्वामि पिळ्ळै को भगवान [अळगिय मणवाळन – नम्पेरुमाळ] और आचार्य की असीम कृपा से फिर से एक नव जात शिशु को जन्म देते है जिनका नाम अळगिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार रखा गया । तो कुछ इस प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दो विशेष रत्नों को जन्म देकर हमारे सत्सांप्रदाय को गौरान्वित और वैभवशालि ख्याति दिये । हमारे पूर्वाचार्यों  वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै की तुलना पेरियाळ्वार से करते है और इसी तुलना मे कुछ विशेष उल्लेख प्रस्तुत है –

पेरियाळ्वार और वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै दोनो ही ज्येष्ठ मास स्वाति नक्षत्र मे अवतरित हुए ।

पेरियाळ्वार ने भगवान की असीम कृपा से तिरुप्पळ्ळाण्डु , पेरियतिरुमोळि नामल दिव्यप्रबंधो की रचना किये । स्वामि वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने ईडु (छत्तीस हज़ार) पाडि नामक टिप्पणि प्रस्तुत किये ।

जिस प्रकार पेरियाळ्वार ने आण्डाळ को हमारे सत्सांप्रदाय को सौंपा और उनका पालन पोषण कृष्णानुभव मे हुआ उसी प्रकार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने अपने दो दिव्यरत्नों जैसे सत्पुत्रों का पालन पोषण भगवद्-विषय मे किया ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै नम्पिळ्ळै के तिरुवाय्मोळि पर आधरित प्रसंगो को हर रोज़ सुनते थे और अपने आचार्य के संबन्ध मे अपना समय व्यतीत करते थे । उसी दौरान वो हर रोज़ रात को इन प्रसंगो को ताम्र पत्रों मे लिखने का कार्य किया करते थे । अतः इस प्रकार श्री नम्पिळ्ळै के प्रसंगो को लिखकर ईडु (छत्तीस हज़ार) नामक ग्रंथ श्री नम्पिळ्ळै के ज्ञान के बिना अवतरित हुआ ।

एक बार वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै अपने आचार्य को अपने तिरुमालिगै ( घर ) मे तदियाराधन के लिये आमंत्रित करते है और आमंत्रण स्वीकार कर खुशी से श्री नम्पिळ्ळै उनके तिरुमालिगै जाते है । नम्पिळ्ळै खुद आराध्य पेरुमाळ का तिरुवाराधन शुरू करते है और उसी दौरान उनकी दृष्टि वहाँ पडे ताम्रपत्रों की ओर जाति है । स्वभावतः आकृष्ट स्वामि नम्पिळ्ळै उन ताम्रपत्रों को पढने लगे और फिर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे – पिळ्ळै ये क्या है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने कहा – स्वामि , प्रिय आचार्य – यह आपके प्रसंग है जो तिरुवाय्मोळि पर आधारित है जिनको मैने सुरक्षित यथारूप ताम्रपत्रों पर बिना आपके ज्ञान के लिखा और इसका खेद मुझे है इसीलिये कृपया कर मुझे माफ़ करे । स्वामि नम्पिळ्ळै पेरिवाच्चानपिळ्ळै और ईयुन्निमाधवपेरुमाळ को इस ग्रंथ को पढने का आदेश देते है । वे दोनो यह ग्रंथ पढकर इस ग्रंथ की प्रसंशा अत्यन्त हर्ष से करते है । स्वामि नम्पिळ्ळै यह जानकर वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै से पूछे –  क्यो तुमने अपने बलबूते स्वतंत्र निर्णय लेकर यह कार्य किया ? क्या यह पेरियवाच्चानपिळ्ळै के व्याख्यान के बराबरि  मे किया गया कार्य है ? वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै यह सुनकर शर्मिन्दा हो गये और फिर अपनी गलती मानकर अपने आचार्य की शरण लेकर कहा – मैने यह इसी लिये किया ताकि मै भविष्य मे वापस पढकर इसका उपयोग मेरे जीवन मे कर सकूँ ।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दृढ़ विश्वस्वनीय कथन को सुनकर अती प्रसन्न नम्पिळ्ळै ने कहा – निश्चित है की तुम एक विशेष अवतार हो जिसने नष्टरहित यह ग्रंथ प्रस्तुत किया और इसीलिये यह ग्रंथ वह श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ को सौपेंगे जो अपने वंश के उत्तराधिकारियों समझायेंगे और कुछ इस तरह यह ग्रंथ अन्ततः श्री मणवाळमुनि को बतलाया गया और मणवाळमुनि ने यह ग्रंथ हम सब लोगों के लिये प्रस्तुत किया । भगवान की असीम कृपा से नम्पिळ्ळै पूर्वानुमान लगा सके की यह ग्रंथ श्री मणवाळमुनि के द्वारा पूरे विष्व मे इस ग्रंथ का खुलासा होगा और यह तभी हो सकेगा जब यह ग्रंथ श्री ईयुन्नि माधव पेरुमाळ के वंश के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होकार मणवाळमुनि को अन्ततः प्राप्त होगा ।

नन्जीयार परमपद को प्रस्थान होने पश्चात वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै हमारे सत्सांप्रदाय के अगले दर्शनप्रवर्तकाचार्य हुए । वे अपने पुत्रों [पिळ्ळै लोकाचार्य, अळगियमणवाळनायनारपेरुमाळ] को दिव्य गूडार्थों का सार समझाये । अपने अन्तिम काळ अपने आचार्य के दिव्यमंगल गुणों का विचार करते हुए वे अपना भौतिक शरीर त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए ।

अनुवादक टिप्पणि –

पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्री वचनभूषण दिव्यशास्त्र मे वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के दिव्य उपदेशों को दर्शाते है जिसके उदाहरण निम्नलिखित है –

सूत्र 77 – कहा गया है जब अहंकार का ताग पूर्ण तरह होता है , तभी एक जीवात्मा “अडियेन” कहलायेगा । यह दिव्य उपदेश का विवरण वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै ने दिया जो “यतीन्द्रप्रणवम” नामक ग्रंथ मे लिखित है ।

सूत्र 43 – पिळ्ळैलोकाचार्य इस सूत्र मे दर्शाते है की प्रत्येक जीवात्मा अपने स्वातंत्र से इस भौतिक जगत मे अंगिनत असंखेय चिरकाल से बद्ध है और इन जिवात्मावों का उद्धार तभी होगा जब वे एक सदाचार्य श्रीवैष्णव का शरण लेंगे ।

हम सब श्री वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए यह प्रार्थना करें की हम सब भी उनकी तरह श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती प्रेम,आसक्ती,अनुरक्ति भावना जाग्रुक करें।

वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै तनियन –

श्री कृष्ण पाद पादाब्जे नमामि सिरसा सदा । यत्प्रसाद प्रभावेन सर्व सिद्धिरभून्मम ॥

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दासन्

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

Source

नम्पिळ्ळै

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “नन्जीयर” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य ( नम्पिळ्ळै) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवल्ळिकेणि

तिरुनक्षत्र : कार्तिक मास , कृत्तिका नक्षत्र

अवतार स्थाल : नम्बूर

आचार्य : नन्जीयर

शिष्य :वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि

परमपद प्रस्थान: श्री रंगम से

रचना : तिरुवाय्मोळि के ३६००० पडि ईडु व्याख्यान, कण्णिनुन् सिरुताम्बु व्याख्यान, तिरुवन्दादियों के व्याख्यान, तिरुविरुत्तम् व्याख्यान

नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

पेरिय तिरुमोळि ७.१०.१० में बतलाया जाता हैं की – तिरुकण्णमंगै एम्पेरुमान् तिरुमंगै आळवार् के पासुरों का अर्थ स्वयं उन्ही कि बोली में सुनना चाहते थे  – इसी कारण माना जाता हैं कि कलियन नम्पिळ्ळै हुए और एम्पेरुमान् पेरियवाच्चान पिळ्ळै के रूप में पुनरावतार लेकर अरुलिच्चेयल के सकल अर्थ उनसे सुने और सीखें।

नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बनाना चाहा । जब श्री वैष्णव गोष्टि में विचार किया  तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । वरदराजर कावेरी के उस पार स्थित अपने स्वग्राम को जाकर लिखने कि योचना किये ताकि वोह लिखने पे ध्यान देकर जल्दी से समाप्त कर सके । नदि पार करते समय अचानक से बाड़ आ जाती हैं और वरदराजर तैर कर अगले तट पहुँचते हैं । तैरते समय मूल प्रति जो उनकी हाथों में थी छूट जाती हैं और वे बर्बाद हो जाते हैं । स्वग्राम पहुँचकर अपने स्वग्राम पहुँचकर आचार्य के दिव्यमंगलस्वरूप और उनके द्वारा बतलाये गए दिव्यार्थों पर ध्यानकेंद्रित कर वापस ९००० पड़ी व्याख्यान लिखना शुरू कर देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ  बताते हैं और नन्जीयर सुनके प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं ।

जिस प्रकार भट्टर और नन्जीयर के बींच का रिश्ता और उनके संवाद ( संबन्ध ) थे , उसी प्रकार नन्जीयर और नम्पिळ्ळै के बींच का रिश्ता और संवाद अती आनन्ददायक और अत्युत्तम ज्ञानार्थों  से भर्पूर थे | इन्के बींच हुए संवाद आप भगवद्बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे प्रस्तुत है  :

  • नन्जीयर से नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि क्यूँ जब उपयान्तर (अनेक उपाय) के लिए बहुत सारे प्रमाण हैं लेकिन शरणागति को कोई प्रमाण नहीं हैं । नन्जीयर पहले बताते हैं कि जब कोई विषय प्रत्यक्ष से जान सकते हैं उसे प्रमाण कि जरूरत नहीं होती हैं – उदाहरण बताते हैं कि  डूबता हुआ मनुष्य किसी साधन लेकर पकड़ कर ठहरता हैं या उसे थाम लेता हैं जो नहीं डूब रहा हैं – ठीक उसी तरह हम संसार में डूब रहे हैं और एम्पेरुमान् वोह हैं जो डूब नहीं रहे हैं और एम्पेरुमान् कि शरण लेना बहुत उचित उपाय हैं । अनन्तर वे शरणागति शास्त्र कि मान्यता बताते हुए शास्त्र से कुछ प्रमाण दिखाते हैं । वे कहते हैं कि एक विषय कि मान्यता उस पर आधारित प्रमाणो कि गिनती से नहीं किया जाता – उदाहरण के लिए इस संसार में संसारि ज्यादा और संन्यासी कम हैं , इसका मतलब यह नहीं हैं कि संसारि होना उचित हैं । यह जवाब सुनकर नम्पिळ्ळै प्रसन्न हो जाते हैं ।
  • नम्पिळ्ळै नन्जीयर से पूछते हैं कि कब एक मानव स्वयं को श्रीवैष्णव मान सकता हैं ?नन्जीयर उत्तर देते हुए बताते हैं कि जब अर्चावतार में परतत्व पेहचान सकेंगे , जब अन्य श्री वैष्णव के संतान और धर्म पत्नी को स्वपरिवार के सभ्य कि तरह मानते हैं (उन का लगाव स्वपरिवार और अन्य श्री वैष्णव के परिवार पर सामान रहेगा ) और जब अन्य श्री वैष्णव बेइज्जात करें उसे खुशी के साथ स्वीकार कर सकते हैं तब हम खुद को श्री वैष्णव कह सकते हैं ।
  • जब नम्पिळ्ळै नन्जीयर के पास श्री भाष्यम् सुन रहे थे तब नन्जीयर उन्हें आदेश देते हैं कि वे उनके एम्पेरुमान् का तिरुवाराधन करें । नम्पिळ्ळै उनसे कहते हैं कि तिरुवाराधन का क्रम उन्हें पता नहीं हैं तब नन्जीयर उनसे कहते हैं कि द्वय महा मंत्र (मध्य में सर्व दिव्य मंगल विग्रहाय “जोड़कर करने से अर्चावातर में एम्पेरुमान् के सौलभ्य गुण प्रकाशित होती हैं जो मूर्ति में उनकी व्यापन सूचित करती हैं । ) जपते हुए करें | इससे हमे यह साबित होता हैं कि अपने पूर्वाचार्य सब विषयों के लिए द्व्य महा मन्त्र पर पूरी तरह से निर्भर थे ।
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि एम्पेरुमान् के अवतारों का प्रयोजन क्या हैं ? नन्जीयर उन्हें बताते हैं कि एम्पेरुमान् ने बड़े-बड़े कार्य अपने कंधे पे ले लिया हैं यह सुनिश्चित करने के लिए कि जो कोई भी भागवत अपचार करेंगे उन्हें उचित तरह से दण्डित किया जा सके । ( उदाहरण के लिया कण्णन् एम्पेरुमान् (भगवान श्री कृष्ण ) ने खुद बहुत कष्ट सहन करके यह पक्का करते हैं कि दुर्योधन जो उनके भक्त के प्रति अपचार किया हैं उसे अंत में मरन दण्ड प्राप्त हो  )
  • नम्पिळ्ळै पूछते हैं कि भागवत अपचार का मतलब क्या होता हैं ? नन्जीयर बताते हैं कि अन्य श्री वैष्णव को खुद को समान मानना। वे आळ्वारों के कई पासुरों को उदाहरण के रूप मे प्रस्तुत करते हुए दर्शाते है की भागवत ( भगवान के प्रपन्न भक्त ) कैसे सर्वश्रेष्ट उत्तम और महान है । इस विषय को ध्यान मे रखते हुए हमे सदैव यह मानना चाहिये की प्रत्येक श्रीवैष्णव (जो कोई भी जाति / वर्ण इत्यादि से हो) हमेशा हमारि तुलना मे उत्तम और सर्वश्रेष्ट है । । वे यह भी कहते हैं कि आळ्वार और पूर्वाचार्यों कि तरह हमें भी सदैव भागवतों कि स्तुति करनी चाहिए ।
  • नन्जीयर नम्पिळ्ळै से कहते हैं कि भगवत अनुभव में निमग्न हुए भक्तों को इतर लोक के विषय अनुभव जैसे ऐश्वर्य , अर्थ ,काम पूरी तरह से त्यजनीय हैं । इस विषय को आळ्वार के कई पासुरों को उदाहरण लेकर समझाते हैं । उदाहरणों के लिये – नन्जीयर तिरुमंगै आळ्वार की वार्ता को दोहराते है । वे कहते है – तिरुमंगै आळ्वार ने भौतिक जगत के प्रति अपने आसक्ति का त्याग कर दिया जब उनको भगवान के दिव्यगुणो और वैभव का एहसास हुआ और तुरन्त अपने दिव्यप्रबंध को शुरू करते हुए उन्होने कहा – ” वाडिनेन वाडि  .. नारायणा एन्नुम् नामम् ”  ( जिसका मतलब हैं कि एम्पेरुमान् ( भगवान ) भगवान का दिव्यनाम ( तिरुनामम् ) मिलने तक मैं संसार के हाथों में दुःख झेल रहा था ) । यह सुनने के बाद नम्पिळ्ळै तुष्ट हो जाते हैं और उसी क्षण से उनका कैंकर्य करते और कालक्षेपं सुनते नन्जीयर के साथ रह जाते हैं ।
  • नन्जीयर तिरुवाय्मोळि कालक्षेप १०० बार करते हैं और नम्पिळ्ळै उनके लिए सदाभिषेक महोत्सव का आयोजन करते हैं । नन्जीयर के इन कालाक्षेपों के द्वारा पूर्वाचार्यों से दिये गए सारे अर्थ विशेषों का लाभ पाते हैं ।

नम्पिळ्ळै कई अनोखे लक्षण के समाहार हैं और उनकी महानता नाप नहीं सकते हैं । नन्जीयर तमिल (द्राविद), संस्कृत भाषा और भाषासंबंधित साहित्य मे असामान्य तौर से निपुण थे । उनके उपदेशों में वे तिरुक्कुरळ , नन्नुळ , कम्ब रामायणम् इत्यादि द्राविड़ ग्रंथों से और वेदान्तम् , विष्णु पुराण , श्री वाल्मीकि रामायण इत्यादि ग्रन्थ से कई उदाहरण बिना कुछ संकोच के साथ बताते थे । नन्जीयर इतने सक्षम और माहिर थे की वे किसी की भी शंखा (जो आळ्वारों और उनके अरुलिच्चेयल् पर आधारित हो) को श्रीमद्वाल्मीकि रामायण (जिसे प्रत्येक वैदिक व्यक्ति सर्वोच्च मानते थे) के मूल सिद्धांतो पर आधारित तर वितर्क से संतोषजनक समाधान से संतुष्ट करते थे । आईये देखें कुछ घटनाये जो उनकी महानता और विनम्रता को दर्शाती हैं ।

  • नम्पिळ्ळै श्री रंगम पेरिय कोविल मूल स्थान में प्रदक्षिण करने कि पूर्व दिशा (पेरिय पेरुमाळ तिरुवडि कि ओर ) में नित्य अपना भाषण देते थे । इसी कारण आज भी हम सन्निधि में दर्शन होने के बाद उस प्रदेश में प्राणाम करते हैं । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी तोडा हैं ।

  • नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे ।
  • नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं , उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे । तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कियी होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं । इस संघटन को मामुनिगळ अपनी उपदेश रत्न माला में बताते हुए नम्पिळ्ळै और तोळप्पर को गौरवान्वित करते हैं । इसी से हम नम्पिळ्ळै कि निश्चलता/पवित्रता जान सकते हैं । हम यह भी जान सकते हैं इस घटना के बाद तोळप्पर भी नम्पिळ्ळै के सहवास से पवित्र होते हैं ।
  • नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावन देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

नम्पिळ्ळै के जीवन में ऐसे कई संघटन हैं जहाँ वे उनके शिष्यगण को अमूल्य पाठ और उपदेश देते है | आप भगवद्-बन्धुवों के लिये निम्नलिखित इक्कों मे इसका उल्लेख है :

  • एक बार नम्पिळ्ळै अपने शिष्य गण के साथ तिरुवेळ्ळरै से वापस नाव मे आ रहे थे , उसी समय नाविक ( नौका चलाने वाला ) ने अपने दृष्टिकोण से कहा – कावेरी मे बाढ आया है और इस कारण उपस्थित गोष्टि मे किसी एक व्यक्ति को नदी के पानी मे कूदना होगा जिससे नाव संतुलित रहेगा और नम्पिळ्ळै बच जाए । यह सुनते ही एक बूढ़ी औरत बाढ के पानी में कूद पड़ती है और यह देखकर नम्पिळ्ळै दुःखित हो जाते हैं । जब वे तट पहुँचते हैं तब उस बूढ़ी औरत कि आवाज़ नजदीकि द्वीप से सुनायी देती हैं । बूढ़ी औरत बताती हैं कि नम्पिळ्ळै प्रत्यक्ष हो कर उनकी रक्षा किये । इस संघटन मे बूढी औरत यह स्पष्ट रूप से दर्शाति है की किस तरह उन्होने अपने प्राण-त्याग करके अपने आचार्य की सेवा की उसी प्रकार हमे भी करना चाहिये । नम्पिळ्ळै ने यह दर्शाया है की कैसे एक आचार्य विपरीत परिस्थितियों मे अपने निर्भर शिष्यों का संरक्षण कैसे करे ।
  • नम्पिळ्ळै के समीप एक घर मे एक श्री वैष्णव स्त्री रहती थी । एक दिन श्री वैष्णव उस औरत के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि अगर वे उनका घर नम्पिळ्ळै के घर से मिला दें तब उनका घर (तिरुमालिगै) बड़ा हो जायेगा और बहुत सारे श्रीवैष्णवों के लिये आश्रय होगा । पहले उनकी विनती को अस्वीकार कर देती हैं लेकिन बाद में नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि उनके घर के बदले में उन्हें परम पद में स्थान अनुग्रह करें । नम्पिळ्ळै एक पत्र लिख कर उसके हाथ में देते हैं । उस पत्र को लेकर थोड़े दिन के बाद अपना चरम शरीर छोड़कर औरत परमपद प्राप्त कर लेती हैं ।
  • नम्पिळ्ळै की दो पत्निया थी । एक बार उनकी पहली पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । उनकी दूसरी पत्नी से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । वे उत्तर देते हैं कि नम्पिळ्ळै उनके प्रिय पति हैं । नम्पिळ्ळै उनसे पहले पत्नी की सहायता करके श्री वैष्णव का प्रसाद पाने के लिए कहते हैं । वे कहते हैं श्री वैष्णवों का शेष प्रसाद पाने से उनका शुद्धिकरण होगा और उनके लौकिक विचार (पति-पत्नि) आध्यात्मिक (आचार्य-शिष्य) विचारों मे बदलेंगे ।
  • जब महा भाष्य भट्टर उनसे पूछते हैं कि जब अपनी निज स्वरुप (चैतन्य) एहसास होने के बाद श्री वैष्णव की सोच कैसी होनी चाहिए । नम्पिळ्ळै उत्तर देते हैं कि ऐसे श्री वैष्णव नित्य एम्पेरुमान् ही उपाय और उपेय मानना चाहिए , स्मरणातीत काल से सँसार के इस बिमारी के चिकित्सक आचार्य के प्रति कृतज्ञता से रहना चाहिए, एम्पेरुमानार के श्रीभाष्य द्वारा स्थापित सिद्धान्तों को सत्य मानना चाहिये , श्री रामायण के द्वारा भगवद् गुणानु भव करना चाहिए , अपना सारा समय आळ्वारों के अरुळिचेयल में बिताना चाहिए । अंत में कहते हैं कि यह दृढ़ विशवास होना चाहिये की इस जीवन के अंत में परमपद की प्राप्ति निश्चित हैं ।
  • कुछ श्री वैष्णव पाण्ड्य नाडु से नम्पिळ्ळै के पास आकर पूछते हैं की अपने साम्प्रदाय का मूल तत्व क्या हैं । नम्पिळ्ळै उनसे समुद्र तट के बारे में सोचने के लिए कहते हैं । चकित होक पूछते हैं कि समुद्र तट के बारे में क्या सोचने कि लिए हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि चक्रवर्ति तिरुमघन श्री राम रावण से युद्ध करने के पहले समुद्र तट पर शिविर में विश्रान्त ले रहे थे और वानर सेना उनकी रक्षा के लिए उस इलाके कि चौकीदारी कर रहे थे । ठकान के कारण वानर सेना सो जाती हैं और एम्पेरुमान् उनकी रक्षा करने उस इलाके कि चौकीदारी करने में झुट जाते हैं । नम्पिळ्ळै समझाते हैं कि एम्पेरुमान् हमें सोने के वक्त भी रक्षा करते हैं और इसलिए उन पर अटूट विश्वास होना चाहिए कि वे ज़रूर हमें जागृत अवस्था में भी रक्षा करेंगे । यथा हमें स्व रक्षणे स्वान्वयम् ( खुद अपने आप कि रक्षा करने कि मनो दृष्टी ) को छोड़ देना चाहिए ।
  • अन्य देवि देवताओं के भजन के बारे में नम्पिळ्ळै ने अद्भुत रूप से विवरण दिया हैं । एक बार उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब स्मशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।
  • एक श्री वैष्णव उनसे मिलने आते हैं और बताते हैं कि वे पहले से भी बहुत दुबले हो गए हैं । नम्पिळ्ळै उत्तर देते है कि जब आत्मा उज्जीवन कि दिशा में बढ़ती हैं अपने आप शरीर घट जाता हैं ।
  • दूसरी बार एक श्री वैष्णव उन्हें देखकर कहते हैं कि वे बलवान नहीं लग रहे हैं तब नम्पिळ्ळै कहते हैं उनके पास एम्पेरुमान् कि सेवा करने के लिए शक्ति हैं जो खाफी हैं और बलवान होकर उन्हें कोई युद्ध लड़ने नहीं जाना हैं । इससे यह निरूपण होता हैं कि श्री वैष्णव को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने कि चिन्ता नहीं करनी चाहिए ।
  • जब नम्पिळ्ळै अस्वस्थ्य हो जाते हैं तब एक श्री वैष्णव बहुत चिन्ति हो जाते हैं । उन्हें देखकर नम्पिळ्ळै बताते हैं कि किसी भी तरह कि कष्ट भुगतनेलायक हैं क्योंकि शास्त्र में बताया गया हैं कि एम्पेरुमान् के कमल चरणों में आत्मा समर्पण किये महान लोग मृत्यु देवता को ख़ुशी – ख़ुशी आमन्त्रित करते हैं ।
  • उस दौर नम्पिळ्ळै के प्रति प्रेम के कारण और उन्हें अस्वस्था से राहत दिलाने के आकाँक्षी कुछ श्री वैष्णव एक रक्षा कि डोर बाँधना चाहे और एङ्गलाळ्वान के आदेश के अनुसार नम्पिळ्ळै रक्षा बँधवाने के लिए ना करते हैं । इस नाकरात्मित्कित को कुछ श्री वैष्णव प्रश्न करते हुए कहते हैं “यह शायद ठीक हैं कि एक श्री वैष्णव अपने शरीर के बारे में चिंताक्रान्त ना हो लेकिन उनसे क्या भूल हुयी हैं जब वे अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था के बारे में चिन्ता करें । नम्पिळ्ळै विवरण देते हुए कहते हैं कि अगर अपने खुद कि अस्वस्था का इलाज़ करने कि कोशिश करें तो उससे यह पता लगता हैं कि हमें स्वस्वरूप ज्ञान जिससे यह प्राप्त होता हैं कि हम केवल एम्पेरुमान पे ही पूरी तरह से निर्भर हैं । अगर हम अन्य श्री वैष्णव कि अस्वस्था का इलाज़ के बारे में सोच रहे हैं तब यह साबित होता हैं कि हमें एम्पेरुमान का ज्ञान और शक्ति के बारे में पूरी अवगाहन नहीं हुआ कि भक्तों कि बाधाएँ दूर करने के लिए एम्पेरुमान पे निर्भर होना चाहिए । नम्पिळ्ळै कि निष्ठा इस प्रकार कि थी और वोह अपनी पूरी जिंदगी उस के अनुसार थे । इसी समय हमें यह भी जान लेना चाहिए कि श्री वैष्णव के कष्ट देखकर उसके बारे में चिन्ता करना अपना कर्तव्य हैं जैसे मारिनेरी नम्बि ने आळवन्दार् के दुख को देखकर किया था ।
  • नम्पिळ्ळै के शिष्य कई आचार्य पुरुष के परिवारों से थे और श्री रंगम में सब उनके समय को नल्लड़िकाल्(सबसे अच्छा समय ) करके स्तुति करते हैं । इनके शिष्य नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् (१२५०० पड़ि ) और वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै (ईडु ३६००० पड़ि ) दोनों ने तिरुवाय्मळि का व्याख्यान किया था । लेकिन नम्पिळ्ळै ने पहल ग्रन्थ बहुत ही विस्तरणीय होने के कारण उसे नकार दिया और दूसरा व्याख्यान को स्वीकृत् करके ईयुण्णि माधव पेरुमाळ को दे दिया ताकि भविष्य काल में उसके निगूढ़ अर्थ अळगीय मणवाळ मामुनि के द्वारा सभी जान सकें । उन्होंने पेरियवाच्छान् पिळ्ळै को भी आदेश दिया कि तिरुवाय्मळि का व्याख्यान लिखे और आचार्य के आदेश अनुसार उनकी इच्छा पूर्ति करते हुए उन्होंने २४००० पड़ि व्यख्यान लिखें और नम्पिळ्ळै ने उस ग्रन्थ को बहुत प्रशंसा कि ।
  • नम्पिळ्ळै पेरिय कोविल वळ्ळलार् से “कुलं तरुं ” का अर्थ पूछते हैं तब वळ्ळलार् कहते हैं कि “जब मेरा कुल जन्म कुल से नम्बूर् कुल(नम्पिळ्ळै का कुल) में बदल गया हैं तो उसे कुलं तरुं कहते हैं ” । यह विषय ठीक पेरियाळ्वार् श्री सूक्ति पंडै कुल(जन्म कुल ) से तोंड़ा कुल ( आचार्य सम्बन्ध और कैंकर्य प्राप्त होता हैं ) । नम्पिळ्ळै इतने महान थे ।

आईये अंत में सामाप्त करते हुए देखे कि एळै एळलन पदिग् ओथु वाईमैयुम (पेरिय तिरु मोळि – ५.८. ७ ) में नम्पिळ्ळै के बारे में पेरियवाच्छान्  पिळ्ळै ने क्या बताया हैं । पेरियवाच्छान पिळ्ळै जब “अन्ताणं ओरुवन ” ( अनोखे विद्वान ) का अर्थ समझाने के समय पे मौके का लाभ उठाते हुए अपने आचार्य नम्पिळ्ळै कि कीर्ति के बारे में बताते हैं और अनुगामी शब्द प्रयोग करते हुए व्यक्त करते हैं कि उनके आचार्य सबसे अनोखे विद्वान हैं ” मुर्पड़ ढवायत्तिक् केट्टु , इत्तिहास पुराणांगलियुम अथिगारित्तु , परपक्ष प्रत्क्षेपत्तुक्कुडालग ,न्याय मीमामंसैकलुम अथिगारित्तु,पोतुपोक्कुम अरुलिचेयलीलेयमपडि पिळ्ळैप्पोले अथिगारिप्पिक्क वल्लवनायिरे ओरुवन एंबतु ”
(முற்பட த்வயத்தைக் கேட்டு, இதிஹாஸ புராணங்களையும் அதிகரித்து, பரபக்ஷ ப்ரத்க்ஷேபத்துக்குடலாக ந்யாயமீமாம்ஸைகளும் அதிகரித்து, போதுபோக்கும் அருளிசெயலிலேயாம்படி பிள்ளையைப்போலே அதிகரிப்பிக்க வல்லவனையிரே ஒருவன் என்பது). सुलभ तरह से भाषांतर करने से यह प्राप्त होता हैं कि जो पहले द्वयं सुनता हैं , उसके बाद पुराण और इतिहास सीखता हैं और बाह्य / कुदृष्टि लोगों को हराने के लिए न्याय और मीमांस अभ्यास करता हैं , अपना सारा समय आळ्वार् अरुळिचेयळ और उनके अर्थ विशेष सीखने और सीखाने में व्यतीत करते हैं उन्हें अनोखा विद्वान कहा जा सकता हैं और साक्षात उदाहरण नम्पिळ्ळै हैं । यहाँ पेरियवाच्छान सांदीपनि मुनि को कुछ अंश में नम्पिळ्ळै कि तरह मानते हैं ( वास्तव में नम्पिळ्ळै सांदीपनि मुनि से कई गुना बेहतर हैं क्यूंकि नम्पिळ्ळै पूरी तरह से भगवद् विषय में डूबे थे लेकिन सांदीपनि मुनि यह जानते हुए भी कण्णन एम्पेरुमान मुकुन्दन , मतलब मोक्ष प्रदाता हैं उनसे अपने मरे हुए संतान प्राप्त करने कि कामना करते हैं )

तमिल और संस्कृत के साहित्य पे इनके अपार ज्ञान के कारण व्यख्यान करते समय श्रोतगण को सम्मोहित करते थे । इन्हीं के बल तिरुवाय् मोळि को नई ऊँचाईयाँ प्राप्त हुई हैं और अरुळिचेयळ के अर्थ सभी को समझ आने लगे । तिरुवाय् मोळि के ६००० पडि व्याख्यान के आलावा अन्य ४ व्याख्यान में इनका कोई न कोई रिश्ता था

  • ९००० पड़ि मूल् ग्रन्थ नंजीयर् से रचित था लेकिन नम्पिळ्ळै ने सूक्ष्म दृष्टि और नए अर्थ विशेषों के साथ फिर से लिखा हैं ।
  • २४००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के आदेश और उपदेश अनुसार रचना कियी हैं ।
  • ३६००० पड़ि वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै ने नम्पिळ्ळै के व्याख्यान को सुनकर रचना कियी हैं ।
  • १२००० पड़ि पेरियवाच्छान् पिळ्ळै के शिष्य वादि केसरि अळगीय मणवाळ जीयर् ने लिखा हैं और अर्थ विशेष पे गौर करने से कह सकते हैं कि यह ग्रन्थ नम्पिळ्ळै के ३६००० पड़ि को अनुगमन करता हैं ।

यही नहीं नम्पिळ्ळै ने अपनी अपार कारुण्य के साथ सम्प्रदाय के दो कीर्तिमान स्तम्बो की स्थापना की हैं – पिळ्ळै लोकाचार्यर् और अळगीय मणवाळ पेरुमाळ नायनार् जिन्होंने पूर्वाचार्य से प्रसादित ज्ञान से क्रमानुसार श्री वचन भूषण और आचार्य हृदय को प्रदान किया हैं । यह चरित्र अपने अगले अनुच्छेद में देखेंगे (वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै)।

nampillai-pinbhazakiya-perumal-jeer-srirangam

नम्पिळ्ळै – पिण्बळगिय् पेरुमाळ जीयर् – श्री रंगम

नम्पिळ्ळै अपने चरम तिरुमेनि को श्री रंगम में छोड़कर परम पद प्रस्थान हुए । उस अवसर पर नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर् अपने पूरे सिर के केश मुण्डन करवाते हैं (शिष्य गण और पुत्र केश मुण्डन करते हैं जब पिता या आचार्य परम पद प्रस्थान होते हैं ) और जब उनके भाई नंपेरुमाळ से शिकायत करते हैं कि कूर कुल में पैदा होने के बावज़ूद उन्होंने ऐसा बर्ताव किया तब नंपेरुमाळ भट्टर् को उनके सामने उपस्थिति का आदेश देते हैं और भट्टर् विवरण से कहते हैं कि उनके कुटुम्ब सम्बन्ध से भी नम्पिळ्ळै से उनके सम्बन्ध को वे अधिक महत्व देते हैं । यह सुनकर नंपेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं ।

आईये नम्पिळ्ळै के चरण कमलो का आश्रय ( शरण ) लेते हुए प्रार्थना करे कि हम भी उन्ही कि तरह एम्पेरुमान और आचार्य के प्रति प्रेम प्राप्त हो ।

नम्पिळ्ळै तनियन्:

वेदान्त वेद्य अमृत वारिरासेर्वेदार्थ सारा अमृत पुरमाग्र्यम् |
आधायवर्षन्तमहं प्रपद्ये कारुण्य पूर्णम् कलिवैरिदासं ||

अपने अगले अनुच्छेद में वडक्कु तिरुविधि पिळ्ळै के बारे में जानेंगे ।

अडियेन् इन्दुमती रामानुज दासि

source

नन्जीयर

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “पराशर भट्टरर्” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य ( नन्जीयार ) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

तिरुनक्षत्र : फालगुनि मास उत्तर फालगुनि नक्षत्र

अवतार स्थाल : तिरुनारायण पुरम् ( मेलुकोटे )

आचार्य : पराशर भट्टर

शिष्य : नम्पिळ्ळै, श्री सेनाधिपति जीयर इत्यादि

परमपद प्रस्थान : श्रीरंग

रचना : तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान , कन्निनुन् शिरुत्ताम्बु व्याख्यान , तिरुप्पावै व्याख्यान , तिरुवन्दादि व्याख्यान, शरणगति गद्य व्याक्यान , तिरुप्पल्लाण्डु व्याख्यान, रहस्य त्रय विवरण ( नूट्ट्टेट्टु नामक ग्रन्थ ) इत्यादि

नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए और वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

श्रीमाधवर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान थे जिन्का निवास स्थान तिरुनारायणपुरम (मेलुकोटे) था । एम्पेरुमानार ( श्री रामानुजाचार्य ) की इच्छा थी की माधवर का परिवर्तन/सुधार हो और अद्वैततत्वज्ञान का त्याग कर श्रीविशिष्टाद्वैत को स्वीकार कर भगवान श्रीमन्नारायण की सेवा मे संलग्न हो । इसी सदिच्छा से श्री पराशरभट्टर को तिरुनारायणपुरम जाकर माधवर को सुधारने का आदेश देते है । श्रीगुरुपरम्परा के आधार पर यह स्पष्ट है की माधवर अद्वैतिन होने के बावज़ूद भी श्री रामानुजाचार्य को उनके प्रती सम्मान/आदर था ।

माधवर ने भी भट्टर के कई किस्से सुने और भट्टर से मिलने मे बहुत उत्सुक थे । भगवान की असीम कृपा से उन दोनो का सम्मेलन वादविवाद से शुरू हुआ और अन्ततः माधवर पराजित होकर भट्टर के शिष्य बन गए । वादविवाद के पश्चात , माधवर के घर आसपास के अन्य श्रीवैष्णव पहुँचते है और माधवर को परिवर्तित देखर आश्चर्यचकित हो जाते है । उसी दौरान भट्टर से वादविवाद मे पराजित पाकर , भट्टर से विनम्र भावना से माधवर कहते है आप श्रीमान श्रीरंगम से अपने आचार्य के आदेशानुसार, अपने निज वैभव को छोड़कर, सामान्य पोशाक पेहनकर मुझे परिवर्तन करने हेतु मुझसे आप श्रीमान ने वादविवाद किया .. इसी कारण मै आपका शुक्रगुज़ार/आभारि हूँ और आप श्रीमान बताएँ की अब मै क्या करूँ । श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए ।

श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धनसंपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । उनके यात्रा के दौरान, उनकी भेंट श्री अनन्ताळ्वान से हुई । श्री अनन्ताळ्वान ने उनसे संयासाश्रम लेने का कारण जाना और माधवर से कहा वह तिरुमंत्र मे पैदा हो (आत्मस्वरूपज्ञान को समझे), द्वयमंत्र मे फलेफूले (एम्पेरुमानपिराट्टि) की सेवा मे संलग्न हो और भट्टर की सेवा करे तो अवश्य एम्पेरुमान उनको मोक्ष प्रदान करेंगे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्यभक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर नम्जीयरसे सम्भोधित करते है और तबसे नम्जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए ।

भट्टर और नन्जीयर आचार्यशिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । भट्टर अपने शिष्य नन्जीयर को तिरुक्कुरुगै पिरान्पिळ्ळान् के 6000 पाडि व्याख्यान ( जो तिरुवाय्मोळि पर आधारित है ) सिखाए । भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

नन्जीयर का आचार्यभक्ति असीमित थी । उनके जीवन मे संघटित कुछ संघटनों पर विशेष दर्शन प्रस्तुत है ।

एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर से कहे – “जीया, यह व्यवहार तुम्हारे संयासाश्रम के लिए शोभदायक नही है और तुम्हे मुझे इस प्रकार सहारा नही देना चाहिए। यह सुनकर नन्जीयर कहते है अगर मेरा त्रिदण्ड आपकी सेवा मे बाधा है तो मै अभी इसी वक्त इस दण्ड को तोडकर अपने संयास का त्याग कर दूंगा ।

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर से शिकायत किए । नन्जीयर ने कहा यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

नन्जीयर बहुत जल्दि अरुळिच्चेयल् सीखकर अरुळिच्चेयल् मे निपुण हो गए । हर रोज़ भट्टर नन्जीयर से अरुळिच्चेयल् पाशुरों को सुनकर उनका गूढ़ार्थ सुस्पष्ट अप्रत्यक्ष सुन्दर तौर से प्रस्तुत किया करते थे । एक बार नन्जीयर तिरुवाय्मोळि के 7.2.9 पाशुर को एक बार मे ही सुना दिया । यह सुनकर भट्टर मूर्छित हो गए और जब भट्टर मूर्छित अवस्था से उठे, उन्होने कहा की यह वाक्य पूर्ण तरह से पढ़कर सुनाना चाहिए और इसे पढ़ते वक्त इसका विच्छेद कदाचित नही करना चाहिए क्योंकि विच्छेद से वाक्य तात्पर्य

नन्जीयर के अरुळिच्चेयल् निपुणता को भट्टर हमेशा प्रसंशनीय मानते थे क्योंकि नन्जीयर तो संस्कृत के विद्वान थे जिन्की मातृभाषा तमिळ नहीं थी ।

भट्टर और नन्जीयर के बींच मे चित्ताकर्षक दिलचस्प वार्तालाप होते रहते थे । हलांकि संस्कृत विद्वान होने के बावज़ूद नन्जीयर हमेशा निश्चित रूप से अपने संदेहो का स्पष्टीकरण समाधान अपने आचार्य भट्टर से पाते थे । अब वही वार्तालाप का संक्षिप्त वर्णन भगवद्बन्धो के लिए प्रस्तुत है

  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है क्यों सारे आळ्वार भगवान श्रीकृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभीअभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।
  • भट्टर समझाते हुए नन्जीयर से कहते है भगवान श्री कृष्ण गोप कुल ( नन्द कुल ) मे पैदा हुए । भगवान श्री कृष्ण जहा भी गए उनका सामना मामा कंस ने असुरनुचरों से हुआ और कई तो उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कब श्री कृष्ण आए और कब वह उनका संहार करें । हलांकि स्वाभिक रूप से श्री कृष्ण उतने सक्षम नही की वह असुरों का संहार करे (यानि श्री कृष्ण तब शिशोरवस्था/बाल्यवस्था मे थे) परन्तु इसके विपरीत मे देखे तो भगवान के भूतपूर्वअवतार श्री रामावतार मे भगवान श्रीराम अस्त्रशस्त्र विद्या सीखें, उनके पिता राजा दशरथ भी अस्त्रशास्त्र मे निपुण थे और यही निपुणता उन्होने इन्द्र को सहायता देकर साबित किए, भगवान श्री राम के भाई लक्ष्मण, भरत, शऋघ्न भी भलिभाँन्ति अस्त्रशस्त्र विद्या से परिचित और निपुण थे यह सब सोचकर श्री पेरियाळ्वार सदैव श्री कृष्ण भगवान के लिए चिन्ताग्रस्त और व्याकुल रहते थे .. इसी कारण वह भगवान के खुशहालि के लिए प्रार्थना किया करते थे और यह स्पष्ट रूप से उनके तिरुमोळि मे उन्होने दर्शाया है ।
  • कलियन् (तिरुमंगैयाळ्वार) अपने तिरुमोळि के अन्त पाशुरों के इस ओरु नाल् शुट्ट्रम्पाशुर मे कई दिव्यदेशों का मंगलशाशन करते है । नन्जीयर भट्टर से इस पाशुर मे कलियन् द्वारा किए गए मंगलशाशन के विषय पर संदेह प्रकट करते है । भट्टर तब कहते है जैसे एक विवाहित स्त्री अपने सखासखीयों, रिश्तेदारों से मिलकर बिदा लेती है उसी प्रकार कलियन् इस भौतिक जगत मे स्थित दिव्यदेशों के एम्पेरुमानों का दर्शन पाकर उनका मंगलाशाशन करके श्रीधाम की ओर प्रस्थान हुए ।
  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है क्यों भक्त प्रह्लाद जो धनसंपत्ति मे कदाचित भी रुचि नही रखते थे उन्होने अपने पोते महाबलि को यह श्राप दिया – “तुम्हारा सारा धनसंपत्ति का विनाश होगा अगर तुम भगवान का निरादर करोगे। इस पर भट्टर ने कहा जिस प्रकार एक कुत्ते को अगर दंड देना हो तो उसका मैला/गंदा खाना उससे दूर कर दिया जाता है उसी प्रकार का दंड प्रह्लाद ने अपने पोते को दिया ।
  • नन्जीयर भट्टर से वामन चरित्र के संदर्भ मे कुछ इस प्रकार पूछते है क्यों महाबलि पाताल लोक गए ? क्यों शुक्राचार्य की एक आँख चली गई ? भट्टर इसके उत्तर मे कहते है शुक्राचार्य ने महाबलि को उनके धर्म कार्य करने से रोका और अपना आँख गवाए । श्री बलि महाराज ने अपने आचार्य की बात / सदुपदेश नही माने और अतः उन्हे दंड के रूप मे पाताल लोक जाना पडा ।
  • नन्जीयर पूछते है प्रिय भट्टर कृपया बताएँ क्यों श्री रामचन्द्र के पिताजी श्री दशरथ जो भगवान का वियोग सह नही पाऐ और प्राण त्यागने पर उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई ? भट्टर इसके उत्तर मे कहते है श्री दशरथ को केवल सामान्यधर्म (सच बोलने का धर्म) के प्रती लगाव था और पिता होने के बावज़ूद उन्होने उन्के संरक्षण का धर्म त्याग दिया इस कारण उन्हे तो नरक प्राप्त होना चाहिए परन्तु भगवान के पिता का भूमिका निभाने के कारण उन्हे स्वर्ग की प्राप्ति हुई ।
  • नन्जीयर पूछते है भट्टर कृपया कर बताएँ क्यों वानर राजा सुग्रीव, विभीषण को स्वीकार करने मे संकोच कर रहे थे हलांकि विभीषण तो श्री रामचन्द्र के भक्त थे । इसके उत्तर मे भट्टर कहते है जिस प्रकार भगवान श्री राम अपने शरणागत भक्त श्री विभीषण को स्वीकार करने और उनके संरक्षण के इच्छुक थे उसी प्रकार राजा सुग्रीव के शरणागत मे आए हुए भगवान को संरक्षण दे रहे थे और उन्हे चिंता थी की विभीषण कहीं भगवान को हानि न पहुँचाए ।
  • नन्जीयर भट्टर से पूछते है जब भगवान श्रीकृष्ण अपने दुष्ट मामा कंस का उद्धार करके अपने मातापिता (देवकिवसुदेव) से मिले, तब अत्यन्त वात्सल्य भाव मे मग्न होने से उनकी माता देवकि के स्तन भर गए । भगवान श्रीकृष्ण ने यह कैसे स्वीकार किया ? इस पर श्री भट्टर ने गम्भीरतारहित बताया यह एक माँ और बेटे के बींच का संबन्ध है । इसके विषय मे आगे भट्टर ने कहा जिस प्रकार भगवान ने पूतना ( जो भगवान को विषपूरित स्तन दूध से मारना चाहती थी ) को माँ स्वरूप स्वीकार किया उसी प्रकार भगवान ने माँ देवकि के इस वात्सल्य भाव को स्वीकार किया ।
  • भट्टर ययाति के जीवन चरित्र को अपने उपन्यास के दौरान समझाते है । यह उदाहरण के तौर पर समझाने के पश्चात नन्जीयर भट्टर से पूछते है यह चरित्र का उद्देश्य क्या है स्वामि ? भट्टर यह चरित्र के उदाहरण से भगवान श्रीमन्नारायण (एम्पेरुमान) के विशेष स्थान और महत्ता/श्रेष्ठता को दर्शाते हुए समझाते है कि भगवान अपने प्रपन्न भक्तों को कम से कम साम्याप्ति मोक्ष देने मे सक्षम है और इसके विपरीत मे अन्य देवता अन्य प्राणि (जिसने सौ अश्वमेध यज्ञ पूरा किया हो) को अपने योग्य कदाचित भी स्वीकार नही कर सकते और किसी ना किसी तरह के षडयंत्र से अन्य देवता जीव को स्वर्ग के प्रति असक्षम बनाकर उसे इस भौतिक जगत मे ढकेलते है ।

अनुवादक टिप्पणि ययाति सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पूर्ण करने के पश्चात स्वर्ग मे प्रवेश करने का अधिकार पाकर स्वर्ग के अधिपति इन्द्र के सिंहासन के सहभागी हुए । परन्तु इन्द्र और अन्य देवता यह सहन नही कर पाए और एक षडयंत्र के माध्यम से ययाति को वापस इस भौतिक जगत के प्रति उकसाकर ययाति को भव सागर मे ढकेल दिया ।

कहते है ऐसे कई चिरस्स्मरणीय वार्तालाप है जिन्मे दिव्यप्रबंध (अरुळिच्चेयळ्) और शास्त्रों के गुप्त गूडार्थों का संक्षिप्त निरूपण है । यही वार्तालाप के आधार पर नन्जीयर ने दिव्यप्रबंधो पर अपनी निपुणता से विशेष टिप्पणि प्रस्तुत की और इसी का स्पस्टीकरण उन्होने उनके शिष्यों के लिये प्रस्तुत किया ।

नन्जीयार दिव्यप्रबंधो पर आधारित अपनी टिप्पणि के (जो नौ हज़ार पाडि व्याख्यान से प्रसिद्ध है) प्रतिलिपि को हस्तलिपि (पाण्डुलिपि) के रूप मे प्रस्तुत करना चाहते थे । इस कार्य के योग्य सक्षम व्यक्ति श्री नम्बूर वरदाचार्य हुए और वरदाचार्य ने यह कार्य सम्पूर्ण किया । कार्य संपूर्ण होने के पश्चात नन्जीयर ने उन्हे श्री नम्पिळ्ळै का नाम दिया और यही नम्पिळ्ळै हमारे सत्साम्प्रदाय के अगले दर्शन प्रवर्त हुए । वरदाचार्य की व्याख्यान को नन्जीयार अत्यधिक प्रसंशा करते थे जब वो नन्जीयार से भी अति उत्तम रूप मे गुप्तगुडार्थों को प्रस्तुत किया करते थे । यह नन्जीयर के उदारशीलता को दर्शाता है ।

नन्जीयार कहते थे वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयार को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर अपने अन्त काल के दौरान रोगग्रस्त हुए । उस अवस्था मे उनकी भेंट पेत्त्रि नामक स्वामि हुई । अरयर स्वामि (पेत्त्रि) ने नन्जीयार से पूछा स्वामि मै आप की क्या सेवा कर सकता हूँ ? नन्जीयार ने व्यक्त किया वह श्री तिरुमंगै आळ्वार द्वारा विरचित पेरियतिरुमोळि के तीसरे दशम का छटा पासुर सुनना चाहता हूँ । नन्जियर कहते है कि वह इस पदिगम को सुन्ने की इच्छा व्यक्त करते है जो तिरुमन्गै आळ्वाऱ का एम्पेरुमान के लिये संदेश है (आळ्वाऱ ने उन प्रथम ४ (4) पासुरो द्वारा अपने संदेश  एम्पेरुमान् को व्यक्त किये परन्तु उसके पश्चात  उनके कमज़ोरी के कारण उस संदेश को पूर्ण तरह से व्यक्त नही  कर सके) –  अरयर स्वामी नम्पेरुमाल के सामने इस प्रसंग का ज़िक्र करते है जिसे सुनकर नन्जीयर भावुक हो जाते है । नन्जीयर उनके अन्तकाल मे एम्पेरुमान से निवेदन करते है कि वह उनके स्वयम तिरुमेनि मे प्रकट हो और नम्पेरुमाल उन्की यह इच्छा को सम्पूर्ण करते है। नन्जीयर उस घटना से संतृष्ट होकर अपने शिष्यो को कई अन्तिम उपदेश देते है और अपने चरम तिरुमेनि को त्याग कर परमपदम को प्रस्थान हुए।

पराशर भट्टर्

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

पूर्व अनुच्छेद मे हमने ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य “एम्बार” के बारें मे चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए अब हम ओराण्वळि के अन्तर्गत आचार्य ( पराशर भट्टरर्) के बारें मे चर्चा करेंगे ।

तिरुनक्षत्र : वैशाख मास , अनुराध नक्षत्र

अवतार स्थाल : श्री रंगम

आचार्य : एम्बार

शिष्य :नन्जीयर

परमपद प्रस्थान: श्री रंगम से

रचना : अष्ट स्लोकि , श्री रंग राजा स्तव , श्री गुण रत्न कोष , भगवद गुण दर्पण( श्री विष्णु सहस्रा व्याख्यान ), श्री रंग राजा स्तोत्र

पराशर भट्टर् कूरत्ताळ्वान् और आण्डाळ के सुपुत्र हैं । श्री पराशर भट्टर् और श्री वेदव्यास भट्टर् (दोनो भाई) श्री पेरिय पेरुमाळ और श्री पेरिय पिराट्टि की विशेष अनुग्रह से और उनके द्वारा प्रदान किया गया महा प्रसाद से इस भौतिक जगत मे प्रकट हुए।

एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

जब  वेदव्यास भट्टर् और पराशर भट्टर् ११ दिन के थे तब एम्बार् से उन्हें  दिव्य महामंत्र का उपदेश मिलता हैं और एम्पेरुमानार् उन्हें आदेश देते हैं की वे उन बालको का आचार्य स्थान ले । एम्पेरुमानार् के आदेशानुसार आळ्वान् अपने सुपुत्र पराशरभट्टर् को भगवान [श्री पेरियपेरुमाळ और श्री पेरियपिराट्टि] के दत्तत पुत्र के रूप मे सौंपते है | श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनकी  पालन- पोषण करती थी |

जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरियपेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे |

भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे । इनके जीवन के कुछ संघटन इस विषय को प्रमानित करते हैं I

  • एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नामसे जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगम में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं।भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं ।सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |
  • यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।
  • एक दिन जब आळ्वान् उन्हें तिरुवाय्मोळि के नेडुमार्कडिमै पदिग़ पढ़ा रहे थे तब “सिरुमा-मनिसर” पद प्रयोग का सामना करते हैं | उस समय भट्टर् पूछते हैं – क्या यह परस्पर विरोध नहीं हैं कि एक हि मनुष्य बड़े और छोटे हैं। आळ्वान् समझाते हैं कि कुछ श्री वैष्णव जैसे मुदलियाण्डान, अरुलाळ पेरुमाळ एम्पेरुमानार इत्यादि शारीरिक तौर से छोटे हैं लेकिन उनका मन और ज्ञान बहुत ही विशाल हैं । यह जवाब सुनकर भट्टर् प्रसन्न हो जाते हैं ।

बड़े होने के बाद भट्टर् संप्रदाय के दर्शन प्रवर्तक बने। भट्टर विनम्रता और उदारता जैसे विशिष्ट गुणो से परिपूर्ण थे और अरुळिचेयल के अर्थ विशेष के महा रसिक थे । कई व्याख्यानो में नंपिल्लै इत्यादि आचार्य महा पुरुष उद्धरण करते हैं कि भट्टर् का दृष्टिकोण सबसे विशेष हैं ।

आळ्वान् के जैसे ही भट्टर् तिरुवाय्मोळि के अर्थ विशेष में निमग्न होते थे । व्याख्यान में ऐसे कई घटनाये दर्शायि गई हैं । कई बार जब आळवार् परांकुश नायिका के भाव में गाते हैं तब भट्टर् बतलाते हैं कि उस समय आळवार् के मन की भावनाओं को कोई भी समझ नहीं सकते हैं ।

ऐसे कई घटनाये हैं जिससे भट्टर् कि विनम्रता , उदारता , प्रतिभा इत्यादि गुण दर्शायि गयी हैं ।मणवाळ मामुनिजी अपने यतिराज: विंशति में भट्टर कि विनम्रता का प्रशंसा करते हुए आळ्वान और आळवन्दार् से तुलना करते हैं । वास्तव में सब व्याख्यान ग्रन्थ भट्टर् के चरित्र के संघटनो से और उनके अनुदेशों से परिपूर्ण हैं ।

  • श्री रंग राज: स्तवं में ,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में  एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि कोविल को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं ।इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं ।
  • उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।
  • एक बार नंपेरुमाळ के सामने कुछ कैंकर्यपर (कार्यकर्ता ) भट्टर् की उपस्थिति न जानते हुए ईर्ष्या से उन्हें डाँट रहे थे । उनकी बाते सुनकर ,भट्टर् उन्हें अपनी शाल और आभरण से सम्मानित किये । उन्हें धन्यवाद करके बतलाते कि हर एक श्री वैष्णव को दो काम जरूर करनी चाहिए – एम्पेरुमान् के गुणो की कीर्तन करना , खुद के दोषों और अपराधो से चिन्तित होना [पर शोक / विलाप / रञ्ज व्यक्त करना] । मैं एम्पेरुमान् के गुणानुभव में मग्न हो गया था और मेरे दोषों के बारे में बिलकुल भी सोच नहीं रहा था अतः आप लोगों ने मेरा काम करके मुझे आपका आभारी बना दिया । इसी कारण आप को सम्मान करना मेरा धर्मं हैं । ” भट्टर् कि उदारता इतनी उच्च स्थिति कि थी ।
  • कई श्री वैष्णव भट्टर् के कालक्षेप गोष्टी में भाग लेते थे । एक दिन भट्टर् एक श्री वैष्णव की प्रतीक्षा कर रहे थे जिन्हे शास्त्र का ज्ञान बिलकुल भी नहीं था । कालक्षेप गोष्टि के अन्य विद्वान उनसे प्रतीक्षा करने का कारण पूछते है और भट्टर् कहते है – हलाकि यह श्रीवैष्णव को शास्त्रों का ज्ञान नही है परन्तु वह परम सत्यज्ञान से भलि-भांति परिचित है और उन्हे इसका आभास भी है । अपनी बात साबित करने के लिए ,वे एक विद्वान को बुलाकर उनसे पूछते हैं कि उपाय क्या हैं ? विद्वान उत्तर देते हुए कहते हैं कि शास्त्र में कई उपाय जैसे कर्म , ज्ञान, भक्ति योग के बारे में चर्चा की गयी हैं । बाद में पूछते हैं कि उपेय क्या हैं ? विद्वान जवाब देते हैं कि ऐसे कई उपेय हैं जैसे ऐश्वर्य , कैवल्य ,कैंकर्य इत्यादि । विद्वान का उत्तर सुनकर भट्टर कहते हैं कि विद्वान होने के बावजूद आपको स्पष्टता नहीं हैं । श्री वैष्णव के आगमन के पश्चात् भट्टर् उन्हें भी वही सवाल पूछते हैं तब श्री वैष्णव उत्तर देते हैं कि एम्पेरुमान् ही उपाय और उपेय हैं । भट्टर् कहते हैं यही हैं एक श्री वैष्णव का विशिष्ट निष्ठा और इसी कारण इनके लिए प्रतीक्षा की गई है ।
  • श्री सोमाजी आणडान् भट्टर् से तिरुवाराधन करने की विधि पूछते हैं । भट्टर उन्हें विश्लेष रूप से बताते हैं । एक बार वे भट्टर् के पास पहुँचते हैं । उस समय भट्टर् प्रसाद पाने के लिए तैयार हो रहे थे तब उन्हें याद आता हैं कि उन्होंने उस दिन का तिरुवाराधन प्रक्रिया पूर्ति नहीं किया हैं । उनके शिष्य से अपने तिरुवाराधन पेरुमाळ को लाने के लिए कहते हैं । अपने पेरुमाळ को भोग चढ़ाकर , प्रसाद पाना शुरू करते हैं । सोमाजी आणडान् उनसे प्रस्न करते हैं कि उन्हें क्यूँ एक विश्लेष् तिरुवाराधन का क्रम बताई गई हैं जब वे एक छोटी सी तिरुवाराधन प्रक्रिया से पूर्ति करते हैं । भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि उनसे एक छोटी तिरुवाराधन प्रक्रिया भी सहन करने कि क्षमता नहीं हैं क्यूंकि जब वे तिरुवाराधन कर रहे होते हैं तब ख़ुशी से भावुक हो कर मूर्छ हो जाते हैं लेकिन सोमाजी आणडान् को विश्लेष् तिरुवाराधन की प्रक्रिया भी पर्याप्त नहीं हो सकती क्यूंकि उन्हें सोम याग जैसे बड़े बड़े याग करने की आदत हैं |
  • एक समय श्री रंगम में उरियड़ी उत्सव मनाया जा रहा था । उस समय अचानक से वेद पारायण गोष्टी में रहने वाले भट्टर् ग्वालों के गोष्टी में मिल जाते हैं । किसीने इसका कारण पूछा तब वे बताने लगे की उस दिन एम्पेरुमान् का विशेष अनुग्रह ग्वालो पर होगा (क्यूंकि यह पुरपाड़ उन्ही के लिए मनाया जा रहा था )। और यह उचित होगा कि हम वहाँ रहे जहाँ एम्पेरुमान् का अनुग्रह प्रसारित हो रहा हैं ।
  • एक बार अनन्ताळवान् भट्टर् से पूछते हैं कि परमपदनाथन् को दो हाथ होंगे या चार? भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि कुछ भी सम्भव हो सकता हैं । अगर दो हाथ होंगे तो पेरिय पेरुमाळ की तरह और यादि चार हाथ हो तो नंपेरुमाळ की तरह सेवा देंगे ।
  • अम्माणि आळवान् बहुत दूर का रास्ता काटकर उनके दर्शन पाने के लिए आते हैं । उनसे विनती करते हैं कि कुछ अच्छे विषय उन्हें अनुग्रह कर । भट्टर् तिरुवायमोळि के नेडुमार्केडिमै पडिघम(१० पाशुर का समूह ) उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि भगवान को जानना थोडा सा प्रसाद पाने की बराबर हैं और भगवान के भक्त भागवतों को जानना भर पूर पेट भर प्रसाद पाने की बराबर हैं ।
  • एक राजा भट्टर् की ख्याति जानकर उनके पास आते हैं और उनसे कहते हैं कि आर्धिक रूप से सहायता के लिए उन्हें मिले। भट्टर् कहते हैं चाहे नंपेरुमाळ का अभय हस्त दूसरी ओर मुड़ क्यूँ न जाए तब भी वे किसी के पास सहायता के लिए नहीं जायेंगे ।
  • अमुदनार स्वयं को भट्टर् से भी महान मान रहे थे । (क्यूंकि उन्हें कूरताळवान से गुरु -शिष्य का सम्बंध हैं बल्कि भट्टर् को कूरताळवान से पिता -पुत्र का सम्बंध हैं ) । भट्टर् उनसे कहते हैं वास्तव में यह सच हैं लेकिन वे खुद इस विषय को सूचित करना उचित नहीं हैं ।
  • एक समय किसी ने भट्टर् से प्रश्न किया कि दूसरे देवी और देवताओं के प्रति एक श्री वैष्णव को कैसे पेश आना चाहिए । इसे सुनकर भट्टर् कहते हैं कि प्रश्न ही गलत हैं । यह पूछो की श्री वैष्णव के प्रति देवी और देवताओं को कैसे पेश आना चाहिए । देवी और देवता रजो और तमो गुण से भरे हुए रहते हैं और श्री वैष्णव सत्व गुण से रहते हैं और इसी कारण यह सहज सिद्ध हैं कि वे श्री वैष्णव के अनु सेवी हैं । (यह दृष्टान्त कूरताळवान् के जीवित चरित्र में भी बताया जाता हैं )
  • भट्टर् सीमा रहित यश के प्राप्त थे । उनकी माताजी जो स्वयं महान विद्वान थी पुत्र का श्री पाद तीर्थ सेवन करती थी । इस के बारे में प्रश्न किया गया तो वे बताते थे कि एक मूर्तिकार मूर्ति बनाता हैं और जब उस मूर्ती एम्पेरुमान् की तिरुमेनी बन जाती हैं तब वो मूर्ति मूर्तिकार से भी आराधनीय हो जाती हैं । इसी तरह भट्टर् उनके गोद से जन्म क्यूँ न लिए हो वे एक महान आत्मा हैं और पूजनिय हैं ।
  • एक समय दूसरे देवी और देवताओ के भक्त की धोती आकस्मिक तौर से भट्टर् को छू जाती हैं । एक बड़े विद्वान होने के बावजूद दूसरे देवताओ के भक्त की एक छोटी सी स्पर्श उन्हें बेचैन कर गयी । वे दौड़ कर उनकी माता के पास पहुंचकर उनसे तक्षण कर्तव्य के बारे में पूछा । उनकी माताजी ने बताया की केवल एक अब्राह्मण श्री वैष्णव की श्री पाद का तीर्थ लेने से ही इसका प्रायश्चित किया जा सकता हैं । ऐसे एक श्री वैष्णव की पताकर कर उनसे श्री पाद तीर्थ विनती करते हैं । भट्टर् की स्थाई जानकार वे निराकार कर देते हैं । भट्टर् उनपे ज़ोर डालकर तीर्थ सम्पादित कर लेते हैं ।
  • एक बार कावेरी नदि के किनारे मंडप में तिरुआळवट्ट( फाँका ) कैंकर्य कर रहे थे । सूर्यास्त के समय आने पर शिष्य गण उन्हें याद दिलाते हैं कि संध्या वंदन करने का समय आ गया हैं । तब भट्टर् समझाते हैं कि वे नंपेरुमाळ के आंतरंगिक कैंकर्य( गुप्त सेवा ) में रहने के कारण चित्र गुप्त(यम राज के सहायक )इस छूटे हुए संध्या वंदन को गिनती में नहीं लेंगे । अळगीय पेरुमाळ नायनार इसी सिद्धांत को अपने आचार्य ह्रदय में समझाते हैं कि ” अत्तानि चेवगत्तिल पोतुवानतु नळुवुम “। इसे उदहारण बताते हुए नित्य कर्मा के आचरण न करते दूरदर्शन एवं अन्य विषय में समय वेतित नहीं करना चाहिए ।
  • अध्ययन उत्सव के समय में आण्डाळ अपने पुत्र भट्टर् को द्वादशि के दिन पारना करने की याद दिलाती हैं । भट्टर् कहते हैं कि पेरिया उत्सव के समय हमे आखिर कैसे याद आएगा कि यह एकादशि हैं या द्वादशि ? इसका मतलब यह हुआ कि भगवद अनुभव करते समय भोजन के बारे में आलोचन नहीं करना चाहिए । कई लोग इसका अर्थ गलत तरीके से समझते हैं और कहते हैं कि एकादशी के दिन उपवास रखना जरूरी नहीं हैं लेकिन वास्तव में एकादशी उपवास अपना कर्तव्य हैं ।
  • एक दिन भट्टर् अपने शिष्य गण को उपदेश देते हैं कि हमें अपने शरीर पे अलगाव और शारीरिक अलंकरण पे अनिष्ट बढ़ाना चाहिए । लेकिन दुसरे हि दिन वे रेशम का कपडा पहनकर सज़-धज लेते हैं । उनकी शिक्षा और आचरण का अंतर का कारण शिष्य पूछते हैं तब भट्टर् बतलाते हैं कि वे अपने शरीर को एम्पेरुमान् का वास स्थल – कोविल आळ्वार मानते हैं । जिस तरह मंडप – जिस में एम्पेरुमान् केवल थोड़ी ही देर आसीन होते हैं को अलंकरण किया जाता हैं , उसी तरह उन्होंने अपने शरीर को अलंकरण किया हैं । उनकी तरह अगर हम भी ऐसा दृढ़ विश्वास / निष्टा बना ले तब हम भी अपने शरीर को अनेक रूप में अलंकरण कर सकते हैं ।
  • वीर सुन्दर ब्रह्म रायन जो उस प्रांत के राजा और आळवान् के शिष्य थे एक दीवार बनाना चाही तब पिळ्ळै पिळ्ळै आळवान् की तिरुमालिगै (घर ) को नष्ट / आकुल करना चाहा क्यूंकि उनका घर दीवार निर्माण करने में बाधा डाल रही थी । भट्टर् राजा को आदेश करते हैं कि आळवान् के घर को कुछ भी न किया जाए लेकिन राजा उनकी आदेशों का निरादर कर देते हैं । भट्टर् श्री रंगम छोड़कर तिरुकोष्टियूर् जा पहुँचते हैं और कुछ समय बिताते हैं । श्री रंगनाथन से जुदाई उन्हें सहन नहीं हो रही थी और दुःख सागर में डूब गए थे । राजा के चल पड़ने पर भट्टर् श्री रंगम लौट गए और लौटने के रास्ते में श्री रंगा राजा स्तव की रचना की ।
  • तर्क-वितर्क में भट्टर् थोड़े विद्वानो को हरा देते हैं । विद्वान भट्टर् के खिलाफ चाल चलना चाहा । शर्प को एक घड़े में रखकर उनसे पूछ घड़े में क्या हो सकता हैं । भट्टर् समझ जाते हैं और कहते हैं की घड़े में एक छत्री हैं । उनकी जवाब सुनकर विद्वान आस्चर्य हो जाते हैं । भट्टर् समझाते हैं कि पाईगै आळ्वार ने कहा हैं कि “चेनड्राल कुडयाम… ” शर्प (आदि सेशन) एम्पेरुमान् की छत्री हैं ।

उनके जीवित चरित्र में ऐसे कई मनोरंजनीय चिरस्मरणीय घटनाये हैं जिन्हे याद करने से हर पल आनंदमय हो जाता हैं ।

भट्टर् को अपनी माता श्री रंगा नाचियार से बहुत लगाव था । पेरिया पेरुमाळ से भी अधिक प्रेम उन पर था । एक बार श्री रंगनाथजी ने नाचियार के जैसे श्रृंगार हो कर भट्टर से पूछने लगे यदि वोह नाचियार की तरह लग रहे हैं । भट्टर् उन्हें गौर से देखकर कहने लगे सब कुछ ठीक हैं लेकिन नाचियार के आँखों में जो दय दिखती हैं वोह उनकी आँखों में नहीं हैं ।यह घटना हमें रामायण में हनुमानजी ने श्री रामजी और सीता मय्या के आँखों की तुलना करने की याद दिलाती हैं । वर्णन करते हुए वे बताते हैं कि सीता मय्या के आँखा श्री रामा एम्पेरुमान् से भी सुन्दर हैं और उन्हें असितेक्षणा (सुन्दर आँख) कहके सम्बोध करते हैं । न्

अर्थ समझने के लिए मुश्किल पशुरों को भट्टर ने अद्भुत रूप से विवरण दिया हैं । जिनमे से कुछ हम इधर देखेंगे
१. पेरिया तिरूमोळि ७. १. १. करवा मदणगु पशुर में पिळ्ळै अमुदनार विवरण देते हैं कि एम्पेरुमान् एक बछडे की तरह और आळ्वार् गाय की तरह हैं । जिस तरह माता पशु अपने संतान के लिए तरसति हैं उसी तरह एम्पेरुमान् के लिए आळ्वार् तरस रहे हैं । भट्टर इसका अर्थ अलग दृष्टिकोण में बताते हैं जो पूर्वाचार्या ने बहुत सराय हैं । भट्टर् कहते हैं कि “करवा मादा नागु तान कन्ड्रु ” मिलकर पढ़ना चाहिए जिससे यह अर्थ प्राप्त होती हैं कि जैसे एक बछड़ा अपनी माता के लिए तरसता हैं उसी तरह आळ्वार् एम्पेरुमान् के लिए तरस रहे हैं ।
२ पेरिया तिरूमोळि ४.४.६ व्याख्यान में बताया जाता हैं कि अप्पन तिरुवळुंतूर अरयर और अन्य श्री वैष्णव भट्टर् से प्रार्थना करते हैं कि इस पाशुर् का अर्थ उन्हें समझाए । भट्टर् उन्हें पाशुर् पढने के लिए कहते हैं और फौरन बताते हैं कि यह पाशुर् आळ्वार् ने रावण के रूप में गाया हैं । यहाँ भट्टर् बताते हैं कि रावण (अपने अहंकार से ) कह रहा हैं कि “मैं तीनो लोकों का सम्राट हुँ और एक सामान्य राजा समझ रहा हैं कि वह एक महान योद्धा हैं और मुझे युद्ध में हरा देगा “- लेकिन आखिर में श्री राम एम्पेरुमान् के हाथो में हार जाता हैं ।

तिरुनारायणपुरम जा कर नंजीयर् को तर्क-वितर्क में हराना भट्टर् के जीवित चरित्र में एक मुख्य विषय मानी जाती हैं ।यह एम्पेरुमानार् की दिव्या आज्ञा थी कि वे नंजीयर् को सुधार कर उन्हें अपने संप्रदाय में स्वीकार करे । माधवाचार्यर् (नंजीयर का असली नाम ) से सिद्धान्त पे वाद करने के लिए भट्टर् अपने पालकी में बैठकर बहुत सारी श्री वैष्णव गोष्टी लेकर तिरुनारायणपुरम पहुँचते हैं । लेकिन उन्हें सलाह दिया किया के वे उस तरह शानदारी तौर से जाने पे माधवाचार्यर् के शिष्य उन्हें टोकेंगे और माधवाचार्यर् से उनकी मुलाकात विलम्ब करेंगे या हमेश के लिए नहीं मिलने देंगे और वोह लाभदायक नहीं होगा । सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर् रहस्य ग्रन्थ को कागज़ाद करने में पहले व्यक्ति हैं । इनसे रचित अष्टस्लोकी सर्वोत्कृष्ट रचना हैं जिसमे तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक केवल आठ स्लोकों में विशेष रूप से समझाई गई हैं । इनके श्री रंग राजा स्तव में अति क्लिष्ट शास्त्रार्थ अति सुलभ रीति से छोटे छोटे स्लोकों से समझाई गई हैं । श्री विष्णु सहस्रा नाम के व्याख्यान में बताते हैं कि हर एक तिरु नाम श्री महा विष्णु के प्रत्येक गुण को दर्शाता हैं । इसका विवरण अत्यंत सुन्दर रीति से कीया हैं । श्री गुण रत्न कोश श्री रांग नाचियार को अंकित हैं और इसके मुकाबले किसी भी ग्रन्थ सामान नहीं हैं ।

कई पूर्वाचार्य सौ से भी अधिक साल इस समसार में जीवन बिताये लेकिन  भट्टर् अति यौवन अवस्था में इस समसार को छोड़ दिए । कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । अपने माताजी के पास जाकर इस विषय के बारे में बताते हैं । पुत्र की मोक्ष प्राप्ति के बारे में सुनकर बहुत खुश हो जाती हैं ।(सच में अपने पूर्वाचार्यों की ऐसी निष्टा थी – वे जीवन के निज उद्देश को  पूरी तरह से जान चुके थे ) कुछ श्रीवैष्णव भट्टर् से पूछने लगे अगर पेरिया पेरुमाळ ने आपको ख़ुशी से मोक्ष प्रदान करना चाहा आपने क्यूँ नहीं इंकार किया?हम यहाँ क्या कर सकते हैं ? संसार में और कई जीवात्मों को सुधारन हैं। कौन उन्हें सुधारेंगे ?भट्टर् उत्तर देते हुए कहते हैं कि मैं इस संसार में बस नहीं पाउँगा जिस तरह उत्तम गुणवत्ता का घी एक कुत्ते के पेट में हज़म नहीं हो सकती हैं उसी तरह इस समसार में रहने के लिए मैं ठीक नहीं हैं ।

भट्टर् अपने तिरुमालिगै को कई श्री वैष्णव को आमंत्रण करके शानदार सा तदियाराधन आयोजन करते हैं । पद्मासन में बैठकर तिरनेडुंदांडकम् को गाते एक बड़ी सी मुस्कान तिरुमुख में बनायीं रखे अपने चरम शरीर को छोड़कर परमपद प्रस्थान करते हैं । सभी लोग अश्रु मय हो जाते हैं और उनके चरम कैंकर्य करना शुरू कर देते हैं । आण्डाळ अम्मंगार अपनी पुत्र के चरम तिरुमेनी को ख़ुशी से गले लगाकर उन्हें विदा कर देती हैं । भट्टर् के जीवित चरित्र को पत्थर को भी पिगला देने की शक्ति हैं ।
हमें भी एम्पेरुमान् और आचार्यं के प्रति इन्ही की तरह लगाव प्राप्त करने के लिए भट्टर के श्री पाद पद्मों से प्रार्थना करे ।

तनियन :
श्री पराशर भट्टरया श्री रंगेस पुरोहिथ: ।
श्री वत्साण्क सुत: श्री मान श्रेयसे मेस्तु भूयसे ॥

अगले अनुच्छेद में नंजीयर के बारे में जानने की कोशिश करेंगे ।

अडियेंन इन्दुमति रामानुज दासि

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