अप्पिळ्ळार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: ज्ञात नहीं

अवतार स्थल: ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

रचनायें: संप्रदाय चन्द्रिका, काल प्रकाशिका

appiLLArअप्पिळ्ळार – चित्रपट

अप्पिळ्ळान नाम से भी पहचाने जाने वाले, अप्पिळ्ळार एक महान विद्वान् थे. ऐसा कहा जाता है कि वे श्री रामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य किदाम्बी अच्चान के वंशज थे| वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे और अष्ठ दिग्गजों में एक थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पेरिय पेरुमाल के निर्देशानुसार श्रीरंगम में निवास करते थे और हमारे सत-संप्रदाय की कीर्ति का प्रचार करते हुए अपना समय व्यतित करते थे। उनकी महानता को जानकर बहुत से आचार्य पुरुष और विद्वान उनके शिष्य हुए।

अप्पिळ्ळार एक महान विद्वान् थे जिन्होंने उत्तर भारत के बहुत से विद्वानों पर विजय प्राप्त किया। वे अपने ज्ञान के विषय में गर्व से भर गए और एरुम्बी अप्पा से वाद विवाद करने एरुम्बी पहुंचे। परंतु एरुम्बी अप्पा की महानता को जानकार, उन्होंने उनके समक्ष स्वयं को समर्पित किया और उनसे आवश्यक सिद्धांतों की शिक्षा प्राप्त की। कुछ दिनों बाद वे वहां से प्रस्थान करने का निर्णय लेते हैं। उन्हें विदा करते हुए, एरुम्बी अप्पा उनसे पूछते हैं कि वे कहाँ जायेंगे। अप्पिळ्ळार कहते हैं, वे श्रीरंगम जाकर जीयर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) से वाद विवाद करने की सोच में हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें अच्छी राय देते हुए कहते हैं “आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं जीयर की कीर्ति के बारे में जनता हूँ। उन्होंने कांचीपुरम में किदाम्बी नायनार के सानिध्य में श्रीभाष्य की शिक्षा ली है। उस समय किदाम्बी नायनार ने जीयर की स्मरण शक्ति की परीक्षा लेने के लिए मुझसे कहा कि मैं उनसे पिछले पथों के विषय में जानकारी लूँ और मैं उनकी कुशाग्र बुद्धि देखकर चकित था। वे सभी सिद्धांतों से भलीभांति अवगत हैं। उनसे कोई तर्क नहीं कर सकता। और अधिक वे सन्यासियों में अग्रणी हैं जिन्होंने श्रीवैष्णव संप्रदाय को तरुण रूप प्रदान किया। हमें केवल उनके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। उनके बारे में अधिक मैं आपको भविष्य में बताऊंगा”। ऐसा सुनकर अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में थोडा कुछ जानकर वहाँ से चले जाते हैं।

एरुम्बी अप्पा भी श्रीरंगम पहुंचे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्होंने कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मार्गदर्शन में बिताया और फिर श्रीरंगम से प्रस्थान करने का विचार किया। कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा करके, वे एरुम्बी (अपने पैतृक गाँव) लौटना चाहते थे। परंतु कुछ अशुभ संकेतों को देखकर, वे वहां से प्रस्थान नहीं करते। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं “आप प्रतीक्षा कीजिये और देखिए कि कुछ शुभ प्रकट होने वाला है। हम आपको उसके पश्चाद यहाँ से जाने की अनुमति देंगे”। इसे सुनने वाले सभी अति आनंदित होते हैं और उस शुभ घटना की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

उस समय, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार अपने परिवार और अन्य सहयोगियों के साथ श्रीरंगम पधारे और भगवान रंगनाथ की स्तुति की। हालाँकि उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना था, परंतु उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति कोई विशेष अनुराग नहीं था। वे महान विद्वान् थे, और अपने शिष्यों और अपार संपत्ति (वाद-विवाद जीतने पर अर्जित की गयी) के साथ कावेरी नदी के तट पर कुछ दिनों के लिए ठहरे। वहां रहते हुए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना और सुना की बहुत से महानुभावों जैसे कन्दाडै अण्णन्, एरुम्बी अप्पा आदि ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। उन्हें यह जानकार बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसे महान आचार्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। शास्त्रों में एरुम्बी अप्पा की दक्षता को जानते हुए, अप्पिळ्ळार विचार करते हैं कि यदि ऐसे शास्त्र में प्रवीण एरुम्बी अप्पा ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लिया है तो उनमें कुछ विशेष बात तो अवश्य होगी। अप्पिळ्ळार अपने एक निकट सहयोगी, जो बहुत बुद्धिमान थे, के साथ श्रीरंगम में जीयर मठ के समीप जाते हैं। बाहर ठहरकर, वे अपने सहयोगी को अंदर भेजते हैं और उनसे कहते हैं कि वे ऐसी घोषणा करे कि “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और अगर एरुम्बी अप्पा गोष्ठी में उपस्थित होंगे तों वे उन्हें पहचान कर उनका स्वागत करेंगे। उनके सहयोगी अंदर जाते हैं और एरुम्बी अप्पा को पहचान कर कहते हैं “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और यह सुनकर एरुम्बी अप्पा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और विचार करते हैं कि “यह अप्पिळ्ळार के लिए एक नई भौर है”। एरुम्बी अप्पा तुरंत अप्पिळ्ळार से भेंट करने हेतु बाहर आते हैं। अप्पिळ्ळार एरुम्बी अप्पा के बाजुओं में शंख चक्र अंकित देखते हैं और समझ जाते हैं कि वे हाल ही में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए हैं। अप्पिळ्ळार, एरुम्बी अप्पा को दंडवत प्रणाम करते हैं और एक दूसरे का कुशल मंगल पूछते हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें सभी घटना क्रमों के विषय में बताते हैं जिनके माध्यम से भगवान ने उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य होने का निर्देश दिया। अप्पिळ्ळार धीरे धीरे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति का अनुभव करते हैं और एरुम्बी अप्पा से कहते हैं कि अप्पिळ्ळै और कई अन्य भी यहाँ पहुंचे हैं और वे कावेरी के तीर पर ठहरे हुए हैं। वे एरुम्बी अप्पा से वहां पधारने का अनुरोध करते हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा बताने के लिए और सभी को सुधारने के लिए)। एरुम्बी अप्पा, अप्पिळ्ळार के आशय को जानकर प्रसन्न होते हैं, और वानमामलै जीयर के समक्ष जाकर उन्हें इस बात की सूचना देते हैं। वे वानमामलै जीयर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें आशीर्वाद प्रदान करे कि सभी का सुधार हो और सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार करें। फिर वे कावेरी तट पर पहुँचते हैं और सभी को संप्रदाय के मूलभूत सिद्धांत समझाते हैं।

उस समय वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष जाकर उन्हें बताते हैं कि अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै नाम के महान विद्वान् कावेरी के तट पर आये हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। यह दर्शाया गया है कि आचार्य संबंध के पूर्व 6 बातों का विचार होना चाहिए और इस सिद्धांत को निम्न श्लोक में बताया गया है।

ईश्वरस्य च सौहाद्रम् यतरुच्चा सुह्रुदं तथा विष्णो: कटाक्षम् अद्वेषम अभिमुख्यम च सात्विकै: संभाषणं शदेठानी

  • सर्व प्रथम, क्यूंकि भगवान कोमल ह्रदय है, वे सभी जीवों के भलाई के विषय में ही सोचते है।
  • द्वितीय, अच्छाई के लिए प्रासंगिक इच्छा/ क्रिया है।
  • तृतीय, भगवान की कृपामई दृष्टि जीवात्मा पर पड़ती है।
  • चतुर्थ, जीवात्मा अद्वेषम् प्रकट करता है– वह भगवान की कृपा को नहीं रोक सकता।
  • पंचम, जीवात्मा अभिमुख्यम् प्रकट करता है – वह भगवान की और झुकता है।
  • छठा, वह भागवतों के साथ भागवत विषय की चर्चाओं में संलग्न होगा जो उसका तुरंत सुधार करेंगे और उसे आचार्य के पास भेज देंगे।

वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहते हैं कि एरुम्बी अप्पा के साथ विचार विमर्श करके उनका कल्याण हुआ है और उन सभी में उनके शिष्य होने की पात्रता है। इसलिए, आप भी, जो सदा जीवात्माओं के कल्याण के विषय में सोचते हैं उन सभी को स्वीकार करें और एरुम्बी अप्पा और मेरी मनोकामना को पूर्ण कर उन सभी पर कृपा करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और कहते हैं “श्री रामानुज स्वामीजी ने अपना दिव्य मनोरथ मुझे दर्शाया है” । वे वानमामलै जीयर से कहते हैं कि उनमें से एक का दास्य नाम (पञ्च संस्कार के पश्चाद) रामानुज होगा। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की आज्ञा लेकर जाते हैं और उनका स्वागत करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे स्वीकार करते हैं। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पधारने की जानकारी देने के लिए  एक श्रीवैष्णव को अप्पिळ्ळार के पास भेजते हैं।

वानमामलै जीयर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अन्य शिष्यों के आने का समाचार सुनकर, अप्पिळ्ळार अति आनंदित हो जाते हैं और अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनकी प्रिय हरी शॉल लाये और उसे जमीन पर बिछा दे, जिससे वानमामलै जीयर और अन्य सभी उस पर अपने चरण रखे। वे अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनके चरण कमलों की रज को एकत्रित करें और उनके पास लाये, जिससे वे उसे अपने मस्तक पर सजा सके। फिर वे फल और ताम्बुल लेकर आये और वानमामलै जीयर का स्तुति के साथ स्वागत किया। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया और उनकी चरण कमल की रज को अपने मस्तक पर स्वीकार किया। एक दुसरे का कुशल मंगल जानने के पश्चाद, वानमामलै जीयर सभी को कोयिल अण्णन् के निवास पर ले जाते हैं। कोयिल अण्णन् विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश और महिमा का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के पुनरावतार हैं। यह सब सुनकर, अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेने का निर्णय करते हैं और वे सभी, फलों, ताम्बूल और अन्य भेंट के साथ जीयर मठ पहुँचते हैं। वे तिरुमलै आलवार मण्डप में पहुँचते हैं जहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दीप्तिमान होकर विराजे हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अद्वितीय प्रसन्न स्वरुप में दिखाई दिए जिनके सुंदर व व्यापक कंधे, वक्षस्थल, नेत्र आदि हैं। उन्होंने स्वच्छ केसरिया वस्त्र और त्रिदंड धारण किया है। अपने मुख पर सुंदर मुस्कान के साथ, वे सभी का स्वागत करते हैं। उनका अत्यंत सुंदर स्वरुप देखकर, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार उनके चरण कमलों में दंडवत प्रणाम करते हैं और उनकी स्वीकृति तक प्रतीक्षा करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अति स्नेह से उनकी भेंट स्वीकार करते हैं और उन्हें दिव्य आवश्यक सिद्धांत समझाते हैं जिसे सुनकर दोनों विद्वान् अचंभित रह जाते हैं। वे तुरंत श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी पञ्च संस्कार की विधि संपन्न करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, उन्हें पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं और उन्हें अपने शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं। फिर वे उन्हें क्रमानुसार पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में लेकर आते हैं (यह वह क्रम है जिसका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम मंदिर में मंगलाशासन करते हुए अनुसरण करते थे, जैसा की पूर्व दिनचर्या में दर्शाया गया है – आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, सेनै मुदलियार, गरुडालवार,श्री रंगनाथ, श्री रंगनाच्चियार, परमपदनाथन्) और उन महान विद्वानों को भगवान को समर्पित करते हैं। भगवान के मंगलाशासन के पश्चाद, वे मठ में लौटते हैं और जैसा शास्त्र सन्मत है कि एक शिष्य को अपने आचार्य का शेष प्रसाद ग्रहण करना चाहिए, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद स्वीकार करते हैं।

अप्पिळ्ळार को जीयर मठ के दैनिक गतिविधियों जैसे तदियाराधन आदि के देखरेख का उत्तरदायित्व दिया गया था। जैसे किदम्बी अच्चान ने श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के लिए मठ की देखरेख का उत्तरदायित्व लिया था, अप्पिळ्ळार ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अप्पिळ्ळार और जीयर नारायण (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पुर्वाश्रम से उनके पौत्र) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे उनकी दैनिक आराधना के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अर्चा विग्रह प्रदान करने की कृपा करे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें एक सोम्बू (पात्र) प्रदान करते हैं जो वे नित्य उपयोग किया करते थे और उन्होंने उसके उपयोग से दो विग्रहों का निर्माण किया और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का एक-एक विग्रह अपने दैनिक पूजा के लिए रख लिया।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळार के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

अप्पिळ्ळार की तनियन:

कांतोपयन्तृ योगीन्द्र सर्व कैंकर्यदुर्वहं ।

तदेक दैवतं सौम्यं रामानुज गुरुं भजे ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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अप्पिळ्ळै

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

अप्पिळ्ळै – चित्रपट

तिरुनक्षत्र: ज्ञात नहीं

अवतार स्थल: ज्ञात नहीं

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

रचनायें: इयरपा के सभी तिरुवंतादी पर व्याख्यान, तिरुविरुत्तम् के लिए व्याख्यान (प्रथम 15 पासूरों), यतिराज विंशति के लिए व्याख्यान, वाळि तिरुनामं

प्रणतार्तिहर नाम से जन्मे, वे अप्पिल्लै नाम से प्रसिद्ध हुए। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे और अष्ठ दिग्गजों में एक थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, पेरिय पेरुमाल के निर्देशानुसार श्रीरंगम में निवास करते थे और हमारे सत-संप्रदाय की कीर्ति का प्रचार-प्रसार करते हुए अपना समय व्यतित करते थे। उनके वैभव को जानकर बहुत से आचार्य पुरुष और विद्वान उनके शिष्य हुए।

एरुम्बी अप्पा भी श्रीरंगम पहुंचे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए। उन्होंने कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मार्गदर्शन में बिताया और फिर श्रीरंगम से प्रस्थान करने का विचार किया। कुछ समय श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा करके, वे एरुम्बी (अपने पैतृक गाँव) लौटना चाहते थे। परंतु कुछ अशुभ संकेतों को देखकर, वे वहां से प्रस्थान नहीं करते। जब वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं “आप प्रतीक्षा कीजिये और देखिए कि कुछ शुभ प्रकट होने वाला है। हम आपको उसके पश्चाद यहाँ से जाने की अनुमति देंगे”। इसे सुनने वाले सभी अति आनंदित होते हैं और उस शुभ घटना की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

उस समय, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार अपने परिवार और अन्य सहयोगियों के साथ श्रीरंगम पधारे और भगवान रंगनाथ की स्तुति की। हालाँकि उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना था, परंतु उनका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रति कोई विशेष अनुराग नहीं था। वे महान विद्वान् थे, और अपने शिष्यों और अपार संपत्ति (वाद-विवाद जीतने पर अर्जित की गयी) के साथ कावेरी नदी के तट पर कुछ दिनों के लिए ठहरे। वहां रहते हुए उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति के बारे में सुना और सुना की बहुत से महानुभावों जैसे कन्दाडै अण्णन्, एरुम्बी अप्पा आदि ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। उन्हें यह जानकार बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसे महान आचार्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय प्राप्त किया। शास्त्रों में एरुम्बी अप्पा की दक्षता को जानते हुए, अप्पिळ्ळार विचार करते हैं कि यदि ऐसे शास्त्र में प्रवीण एरुम्बी अप्पा ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लिया है तो उनमें कुछ विशेष बात तो अवश्य होगी। अप्पिळ्ळार अपने एक निकट सहयोगी, जो बहुत बुद्धिमान थे, के साथ श्रीरंगम में जीयर मठ के समीप जाते हैं। बाहर ठहरकर, वे अपने सहयोगी को अंदर भेजते हैं और उनसे कहते हैं कि वे ऐसी घोषणा करे कि “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और अगर एरुम्बी अप्पा गोष्ठी में उपस्थित होंगे तों वे उन्हें पहचान कर उनका स्वागत करेंगे। उनके सहयोगी अंदर जाते हैं और एरुम्बी अप्पा को पहचान कर कहते हैं “अप्पिळ्ळान पधारे हैं” और यह सुनकर एरुम्बी अप्पा अत्यंत प्रसन्न होते हैं और विचार करते हैं कि “यह अप्पिळ्ळार के लिए एक नई भौर है”। एरुम्बी अप्पा तुरंत अप्पिळ्ळार से भेंट करने हेतु बाहर आते हैं। अप्पिळ्ळार एरुम्बी अप्पा के बाजुओं में शंख चक्र अंकित देखते हैं और समझ जाते हैं कि वे हाल ही में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए हैं। अप्पिळ्ळार, एरुम्बी अप्पा को दंडवत प्रणाम करते हैं और एक दूसरे का कुशल मंगल पूछते हैं। एरुम्बी अप्पा उन्हें सभी घटना क्रमों के विषय में बताते हैं जिनके माध्यम से भगवान ने उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य होने का निर्देश दिया। अप्पिळ्ळार धीरे धीरे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति का अनुभव करते हैं और एरुम्बी अप्पा से कहते हैं कि अप्पिळ्ळै और कई अन्य भी यहाँ पहुंचे हैं और वे कावेरी के तीर पर ठहरे हुए हैं। वे एरुम्बी अप्पा से वहां पधारने का अनुरोध करते हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा बताने के लिए और सभी को सुधारने के लिए)। एरुम्बी अप्पा, अप्पिळ्ळार के आशय को जानकर प्रसन्न होते हैं, और वानमामलै जीयर के समक्ष जाकर उन्हें इस बात की सूचना देते हैं। वे वानमामलै जीयर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें आशीर्वाद प्रदान करे कि सभी का सुधार हो और सभी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपना आचार्य स्वीकार करें। फिर वे कावेरी तट पर पहुँचते हैं और सभी को संप्रदाय के मूलभूत सिद्धांत समझाते हैं।

उस समय वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष जाकर उन्हें बताते हैं कि अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै नाम के महान विद्वान् कावेरी के तट पर आये हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। यह दर्शाया गया है कि आचार्य संबंध के पूर्व 6 बातों का विचार होना चाहिए और इस सिद्धांत को निम्न श्लोक में बताया गया है।

ईश्वरस्य च सौहाद्रम् यतरुच्चा सुह्रुदं तथा विष्णो: कटाक्षम् अद्वेषम अभिमुख्यम च सात्विकै: संभाषणं शदेठानी

  • सर्व प्रथम, क्यूंकि भगवान कोमल ह्रदय हैं, वे सभी जीवों के भलाई के विषय में ही सोचते हैं|
  • द्वितीय, अच्छाई के लिए प्रासंगिक इच्छा/ क्रिया है।
  • तृतीय, भगवान की कृपामई दृष्टि जीवात्मा पर पड़ती है।
  • चतुर्थ, जीवात्मा अद्वेषम् प्रकट करता है– वह भगवान की कृपा को नहीं रोक सकता।
  • पंचम, जीवात्मा अभिमुख्यम् प्रकट करता है – वह भगवान की ओर झुकता है।
  • छठा, वह भागवतों के साथ भागवत विषय की चर्चाओं में संलग्न होगा जो उसका तुरंत सुधार करेंगे और उसे आचार्य के पास भेज देंगे।

वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहते हैं कि एरुम्बी अप्पा के साथ विचार विमर्श करके उनका कल्याण हुआ है और उन सभी में उनके शिष्य होने की पात्रता है। इसलिए, आप भी, जो सदा जीवात्माओं के कल्याण के विषय में सोचते हैं उन सभी को स्वीकार करें और एरुम्बी अप्पा और मेरी मनोकामना को पूर्ण कर उन सभी पर कृपा करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना को स्वीकार करते हैं और कहते हैं “श्री रामानुज स्वामीजी ने अपना दिव्य मनोरथ मुझे दर्शाया है” । वे वानमामलै जीयर से कहते हैं कि उनमें से एक का दास्य नाम (पञ्च संस्कार के पश्चाद) रामानुज होगा। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की आज्ञा लेकर जाते हैं और उनका स्वागत करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे स्वीकार करते हैं। वानमामलै जीयर, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पधारने की जानकारी देने के लिए  एक श्रीवैष्णव को अप्पिळ्ळार के पास भेजते हैं।

वानमामलै जीयर और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अन्य शिष्यों के आने का समाचार सुनकर, अप्पिळ्ळार अति आनंदित हो जाते हैं और अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनकी प्रिय हरी शॉल लाये और उसे जमीन पर बिछा दे, जिससे वानमामलै जीयर और अन्य सभी उस पर अपने चरण रखे। वे अपने सहयोगियों से कहते हैं कि उनके चरण कमलों की रज को एकत्रित करें और उनके पास लाये, जिससे वे उसे अपने मस्तक पर सजा सके। फिर वे फल और ताम्बुल लेकर आये और वानमामलै जीयर का स्तुति के साथ स्वागत किया। उन्होंने दंडवत प्रणाम किया और उनकी चरण कमल की रज को अपने मस्तक पर स्वीकार किया। एक दुसरे का कुशल मंगल जानने के पश्चाद, वानमामलै जीयर सभी को कोयिल अण्णन् के निवास पर ले जाते हैं। कोयिल अण्णन् विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश और महिमा का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के पुनरावतार हैं। यह सब सुनकर, अप्पिळ्ळार और अप्पिळ्ळै, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेने का निर्णय करते हैं और वे सभी, फलों, ताम्बूल और अन्य भेंट के साथ जीयर मठ पहुँचते हैं। वे तिरुमलै आलवार मण्डप में पहुँचते हैं जहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दीप्तिमान होकर विराजे हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अद्वितीय प्रसन्न स्वरुप में दिखाई दिए जिनके सुंदर व व्यापक कंधे, वक्षस्थल, नेत्र आदि हैं। उन्होंने स्वच्छ केसरिया वस्त्र और त्रिदंड धारण किया है। अपने मुख पर सुंदर मुस्कान के साथ, वे सभी का स्वागत करते हैं। उनका अत्यंत सुंदर स्वरुप देखकर, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार उनके चरण कमलों में दंडवत प्रणाम करते हैं और उनकी स्वीकृति तक प्रतीक्षा करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अति स्नेह से उनकी भेंट स्वीकार करते हैं और उन्हें दिव्य आवश्यक सिद्धांत समझाते हैं जिसे सुनकर दोनों विद्वान् अचंभित रह जाते हैं। वे तुरंत श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं कि उनकी पञ्च संस्कार की विधि संपन्न करें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, उन्हें पञ्च संस्कार प्रदान करते हैं और उन्हें अपने शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं। फिर वे उन्हें क्रमानुसार पेरिय पेरुमाल की सन्निधि में लेकर आते हैं (यह वह क्रम है जिसका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम मंदिर में मंगलाशासन करते हुए अनुसरण करते थे, जैसा की पूर्व दिनचर्या में दर्शाया गया है – आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, सेनै मुदलियार, गरुडालवार, श्री रंगनाथ, श्री रंगनाच्चियार, परमपदनाथन्) और उन महान विद्वानों को भगवान को समर्पित करते हैं। भगवान के मंगलाशासन के पश्चाद, वे मठ में लौटते हैं और जैसा शास्त्र सन्मत है कि एक शिष्य को अपने आचार्य का शेष प्रसाद ग्रहण करना चाहिए, अप्पिळ्ळै और अप्पिळ्ळार श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद स्वीकार करते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर अप्पिळ्ळै तिरुवंतादी पर व्याख्यान की रचना करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को उनके बहुत से दिव्य प्रबंध सम्बंधित कैंकर्य में सहायता करते हैं।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

अप्पिळ्ळै की तनियन:

कांतोपयन्तृ योगीन्द्र चरणांभुज शठपदम् ।
वात्सान्वयभवं वन्दे प्रणतार्तिहरं गुरुं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

आधार : https://guruparamparai.wordpress.com/2013/10/19/appillai/

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एरुम्बी अप्पा

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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एरुम्बी अप्पा- कांचीपुरम अप्पन स्वामी तिरुमालिगै

तिरुनक्षत्र: अश्विन मास, रेवती नक्षत्र

अवतार स्थल: एरुम्बी

आचार्य:अलगिय मणवाल मामुनिगल/ श्री वरवरमुनि स्वामीजी

शिष्य: पेरियवप्पा (उनके पुत्र), सेनापति आलवान

रचनाएँ: पूर्व दिनचर्या, उत्तर दिनचर्या, वरवरमुनि शतकम, विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णयं, उपदेश रत्नमाला के लिए अंतिम पासूर (मन्नुयिर्गाल …)

एरुम्बी अप्पा, श्री वरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक हैं (आठ प्रमुख शिष्य जिन्हें संप्रदाय के संरक्षण के लिए स्थापित किया)। उनका वास्तविक नाम देवराजन है।

अपने गाँव में रहते हुए और धर्मानुसार कार्य करते हुए, एक बार एरुम्बी अप्पा ने श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारे में सुना और उनके प्रति आकर्षित हुए। श्री वरवरमुनि स्वामीजी के समय को हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा नल्लदिक्काल (सुनहरा समय) कहा जाता है। इस समय में श्रीवैष्णव जन आचार्य (मुख्यतः श्री वरवरमुनि स्वामीजी) के द्वारा भगवान के कल्याण गुणों का निरंतर- बिना रुके आनंद ले सकते थे, किसी भी अन्य बाह्य उपद्रव के बिना। उदहारण के लिए: श्रीरामानुज स्वामीजी के समय, किसी शैव राजा के उपद्रव की वजह से उन्हें श्रीरंगम छोड़कर तिरुनारायणपुर जाना पड़ा। भट्टर के समय में, एक अवज्ञाकारी राजा, जो स्वयं आलवान का शिष्य था, के उपद्रव की वजह से उन्हें तिरुक्कोट्टीयूर जाना पड़ा। पिल्लै लोकाचार्य के समय में, मुस्लिम आक्रमणकारियों के कारण उन्हें श्रीरंगम छोड़कर सुदूर दक्षिण में जाना पड़ा। परंतु जब श्री वरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम में पधारे, उन्होंने मंदिर पूजा विधि को पुनः स्थापित किया, आचार्य पुरुषों के पूर्व सम्मान को स्थापित किया और अत्यंत महत्वपूर्ण सभी लुप्त ग्रंथों को एकत्रित किया और उन्हें यथोचित अभिलिखित किया। वे निरंतर पूर्वाचार्यों के व्याख्यान पर आधारित अरुलिचेयल के कालक्षेप किया करते थे।

जब एरुम्बी अप्पा ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव के बारे में सुना, वे उनसे भेंट करने हेतु श्रीरंगम पहुंचे। जब उन्होंने मठ में प्रवेश किया, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुवाय्मौली के प्रथम पासूर– “उयार्वर उयर नलं… ” का भावार्थ समझा रहे थे। वेद और वेदांत के उच्च अर्थों द्वारा भगवान के परतत्व को समझाने में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शैली से एरुम्बी अप्पा मुग्ध हो जाते हैं। तद्पश्चाद श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनका स्वागत करते हैं और तदियाराधन में भाग लेने के लिए उनसे कहते हैं। परंतु एरुम्बी अप्पा मठ में प्रसाद पाने से मना कर देते हैं, यह कहते हुए कि सामान्य शास्त्र के अनुसार हमें सन्यासी का, सन्यासी के पात्र से अथवा सन्यासी द्वारा दिया गया भोजन स्वीकार नहीं करना चाहिए- और उसे स्वीकार करने पर चान्द्रायण व्रत करना होगा। वे विशेष शास्त्र को नहीं जान पाए, जैसा तिरुवाय्मौली के 41वें पासूर में बताया गया है– “तरुवरै पुनिदमनरे” (जब महान श्रीवैष्णव कृपा से प्रसाद देवें, वह बहुत पवित्र होता है और हमें उसे स्वीकार करना चाहिए)।

श्री राम परिवार- अप्पा के तिरुवाराधन पेरुमाल (कांचीपुरम अप्पन स्वामी तिरुमालिगै में देखे गए) श्री राम परिवार- अप्पा के तिरुवाराधन पेरुमाल (कांचीपुरम अप्पन स्वामी तिरुमालिगै में देखे गए)

तद्पश्चाद वे अपने पैतृक निवास लौटते हैं। प्रातः अनुष्ठान करने के पश्चाद, जब अपने तिरुवाराधन कक्ष के द्वार खोलते हैं, उनके तिरुवाराधन पेरूमाल, चक्रवर्ती तिरुमगन (श्रीराम) की प्रेरणा से द्वार नहीं खुलते। अत्यंत दुःख और चिंता से वे उस दिन प्रसाद नहीं पाते और फिर शयन के लिए प्रस्थान करते हैं। उस रात उनके स्वप्न में, चक्रवर्ती तिरुमगन पधारते हैं और उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने का निर्देश देते हैं। भगवान उनसे कहते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही आदिशेष है, जिन्होंने रामावतार के समय में लक्षमण के रूप में अवतार लिया था। वे कहते हैं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पीड़ित संसारियों के हितार्थ फिर से प्रकट हुए हैं। वे उन्हें निर्देश देते हैं कि वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण हो जाएँ और उचित तत्व ज्ञान विकसित करे। यह सुनकर एरुम्बी अप्पा, श्रीरंगम पहुँचते हैं और कोयिल कन्दाडै अण्णन् के पुरुष्कार से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेकर, अष्ठ दिग्गजों में एक हुए।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का आश्रय लेते हुए, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों की प्रशंसा में अनेक श्लोकों कि रचना की, कालांतर में जिनका संकलन उन्होंने दिनचर्या में किया।

एरुम्बी अप्पा ने कुछ समय के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहकर, सभी रहस्य ग्रंथों कि शिक्षा प्राप्त की और फिर अपने पैतृक गाँव लौटकर, वहां अपना कैंकर्य जारी रखा। वे सदा अपने आचार्य का ध्यान किया करते थे और पूर्व और उत्तर दिनचर्या का संकलन कर (जिनमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों का चित्रण किया गया था) एक श्रीवैष्णव द्वारा उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को समर्पित किया। एरुम्बी अप्पा की निष्ठा देखकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी बहुत प्रशंसा की। वे एरुम्बी अप्पा को उनसे भेंट करने के लिए आमंत्रित करते हैं। एरुम्बी अप्पा कुछ समय अपने आचार्य के साथ रहते हैं और फिर नम्पेरुमाल के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के भागवत विषय कालक्षेप में भाग लेते हैं। तद्पश्चाद वे पुनः अपने गाँव लौट जाते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के परमपदगमन का समाचार सुनकर, एरुम्बी अप्पा अपने आचार्य के वियोग में दुःख से भर जाते हैं। आचार्य द्वारा उन पर की गयी कृपा का गुणगान करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें भी शीघ्रातिशीघ्र अपनी सेवा में स्वीकार करे।

एरुम्बी अप्पा की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय”। यह एरुम्बी अप्पा और उनके शिष्यों जैसे सेनापति आलवान आदि के बीच हुए वार्तालाप का संकलन है। इस सुंदर ग्रंथ में एरुम्बी अप्पा, अत्यंत दक्षता से आलवार/ आचार्यों की श्रीसूक्तियों के मिथ्याबोध से उत्पन्न होने वाले संदेह को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों के आधार पर संसार में वैराग्य विकसित करने और पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति अनुराग का महत्व बताया और हमारे द्वारा उसे जीवन में अपनाने के लिए जोर दिया है (उसके बिना यह मात्र सैद्धांतिक ज्ञान होता)।

हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा बताया गया है कि श्रीवैष्णवों को पूर्व और उत्तर दिनचर्या (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के उच्च / अतुलनीय जीवनशैली का स्मरण) का पाठ किये बिना प्रसाद नहीं पाना चाहिए। यह इतनी सुंदर रचना है कि इसे सुनकर पाषाण का ह्रदय भी पिघल जाये। दिनचर्या को विभिन्न भाषाओँ में http://acharya.org/sloka/erumbiyappa/index.html से प्राप्त किया जा सकता है।

हम भी एरुम्बी अप्पा का स्मरण करे जो सदा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का स्मरण करते हैं।

एरुम्बी अप्पा की तनियन (पूर्व/उत्तर दिनचर्या की तनियन):

सौम्यजामातृयोगीन्द्र चरणाम्भुज षट्पदम्।
देवराजगुरुं वन्दे दिव्यज्ञान प्रदं शुभम्।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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पत्तन्गि परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुनक्षत्र: कार्तिक पुनर्वसु

अवतार स्थल: कांचीपुरम (पेरिय तिरुमुड़ी अदैवू के अनुसार तिरुमला)

आचार्य: मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

शिष्य: कोइलअप्पन (उनके पुर्वाश्रम के पुत्र),  परवस्तु अण्णन, परवस्तु अलगिय मणवाल जीयर, अण्णराय चक्रवर्ती, मेल्नाट्टू तोज्हप्पर नायनार, आदि

रचनाएं: अंतिमोपाय निष्ठा

स्थान जहाँ उन्होंने परमपद प्राप्त किया: तिरुमला

पत्तन्गि परवस्तु परिवार में मधुरकवि अय्यर (जो अरणपुरत्ताळ्वान के वंशज थे, ऐसा भी प्रचलित हैं कि वे नदुविल आळ्वान तिरुवंश से संबंधित हैं) के यहाँ गोविंद नाम से जन्मे, उन्हें पुर्वाश्रम में गोविन्द दासरप्पन, भट्टनाथ नाम से भी जाना जाता है। संन्यास ग्रहण करने के पश्चाद, उन्हें पट्टरपिरान् जीयर, भट्टनाथ मुनि आदि नाम से जाना जाता है। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अष्ट दिग्गजों (हमारे संप्रदाय के आठ मुख्य अनुयायी और अधिनायक) में से एक थे। पिल्लै लोकम जीयर जिन्होंने बहुत से महत्वपूर्ण लेखन कैंकर्य किये, वे उनके पौत्र थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी स्वयं अपने शिष्यों की सभा में गोविन्द दासरप्पन (पट्टरपिरान् जीयर) की प्रशंसा करते हैं। एक बार सभी लोगों की उपस्थिति में, श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि मात्र श्रीगोविन्ददासरप्पन ही मधुरकवि आलवार के समान योग्य हैं, जिन्होंने कहा था देवूमरररियेन (मैं श्रीशठकोप स्वामीजी के अतिरिक्त अन्य किसी भगवान को नहीं जानता)। पट्टरपिरान् जीयर उसी प्रकार थे जैसे मधुरकवि आलवार के लिए शठकोप आलवार, दैववारियांडान के लिए आलवन्दार  और वडुक नम्बि के लिए रामानुज स्वामीजी । वे सदा श्री वरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहा करते थे और उनसे कभी पृथक नहीं हुए, जिस प्रकार एम्बार/गोविन्दाचार्य स्वामीजी सदा श्री रामानुज स्वामीजी के साथ रहा करते थे। इस प्रकार उन्होंने शास्त्र के सभी सारतत्व प्रत्यक्ष श्री वरवरमुनि स्वामीजी से अध्यन किये और नित्य उनकी सेवा करते रहे।

अपने पुर्वाश्रम में 30 साल, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद ही ग्रहण किया। वे “मोर मुन्नार अय्यर” (अत्यंत सम्मानीय जिन्होंने पहले दद्ध्योदन ग्रहण किया) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक भोजन में पहले दाल-चावल, सब्जियां आदि पाई जाती है। अंत में दद्ध्योदन के साथ समाप्त किया जाता है। पट्टरपिरान् जीयर, प्रसाद उसी केले के पत्तल पर पाते थे, जिसमें श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने प्रसाद ग्रहण किया था। श्री वरवरमुनि स्वामीजी दद्ध्योदन के साथ प्रसाद समाप्त करते थे और क्यूंकि गोविन्द दासरप्पन स्वाद को बदले बिना ही प्रसाद पाना चाहते थे (दद्ध्योदन से दाल तक), वे प्रतिदिन दद्ध्योदन से प्रारंभ करते थे। इस प्रकार वे “मोर मुन्नार अय्यर” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्यों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को “भट्टनाथ मुनिवर अभीष्ट दैवतं” कहकर संबोधित किया, अर्थात “वह जो पट्टरपिरान् जीयर के प्रिय स्वामी है”। वे लोग, मधुरकवि आलवार के समान ही, पट्टरपिरान् जीयर की श्री वरवरमुनि स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा की प्रशंसा करते थे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अण्णराय चक्रवर्ती (जो तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती के वंशज थे) तिरुमला से श्रीरंगम पधारते हैं। पेरिय कोयिल के मंगलाशासन के पश्चाद, अपनी माता के सुझाव से, वे पेरिय जीयर (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) के मठ में पहुंचकर आदर-सम्मान सहित उन्हें प्रणाम करते हैं। अपने कुटुंब सहित वहां जाने के लिए, वे पट्टरपिरान् जीयर के माध्यम से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के समक्ष पहुँचते हैं। पेरिय जीयर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) अपने दिव्य चरण कमल अण्णराय चक्रवर्ती के मस्तक पर रखते हैं और उन पर कृपा करते हैं। वे तिरुमला में अण्णराय चक्रवर्ती के कैंकर्य की प्रशंसा करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर से अण्णराय चक्रवर्ती को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए कहते हैं। श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं जैसे “रामस्य दक्षिणो बाहू:” (लक्ष्मणजी श्रीरामजी के दायें हाथ थे), पट्टरपिरान् जीयर भी मेरे दाहिने हाथ हैं– इसलिए, वे ही आपकी पञ्च संस्कार विधि पूर्ण करके, आपको अपने शिष्य रूप में स्वीकार करके, आपको हमारे संप्रदाय में स्थापित करेंगे। अण्णराय चक्रवर्ती प्रसन्नता से आभार प्रकट करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करते हैं।

अंततः, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के पश्चाद, पट्टरपिरान् जीयर तिरुमला में निवास करने लगे और वहां बहुत जीवात्माओं को निर्मल किया। उन्होंने अंतिमोपाय निष्ठा नामक एक ग्रंथ की रचना की, जो हमारी आचार्य परंपरा की महिमा का गुणगान करती है और बताती है कि कैसे हमारे पूर्वाचार्य अपने आचार्यों पर पुर्णतः आश्रित थे। वे ग्रंथ के प्रारंभ में घोषणा करते हैं कि ग्रंथ में बताये गए सभी सिद्धांत/ द्रष्टांत स्वयं श्री वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा समझाए गए हैं और वे उन बहुमूल्य निर्देशों के लेखन में मात्र कागज और कलम के समान हैं।

इस प्रकार, हमने परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे महान विद्वान् थे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर की तनियन:
रम्यजामातृयोगीन्द्र पादसेवैक धारकम्
भट्टनाथ मुनिं वन्दे वात्सल्यादी गुणार्नवं ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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प्रतिवादि भयंकर अण्णन्

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र: आषाढ़ पुष्य

अवतार स्थल:  कांचीपुरम (तिरुत्तण्का दीप प्रकाशर सन्निधि के निकट)

आचार्य: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

शिष्य: उनके पुत्र अण्णनप्पा, अनंताचार्य, अलगिय माणवाल पेरुमाल नायनार

रचनाएँ:

  • श्रीभाष्य, श्रीभागवतं, सुभालोपनिषद के लिए संक्षिप्त व्याख्यान
  • भट्टर द्वारा रचित अष्ट-श्लोकी के लिए व्याख्यान
  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर श्रीवेंकटेश सुप्रभातम्, श्रीवेंकटेश स्तोत्रं, श्रीवेंकटेश प्रपत्ति, श्रीवेंकटेश मंगलाशासन – http://acharya.org/books/eBooks/index-all.html पर श्रीवेंकटेश सुप्रभातं देखा जा सकता है
  • वरवरमुनि शतकं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव में संस्कृत के 100 श्लोक,)
  • वरवरमुनि मंगलम्– http://acharya.org/sloka/pb-anna/index.html
  • वरवरमुनि सुप्रभातम् – http://acharya.org/sloka/pb-anna/varavaramuni-suprabhatam-tml.pdf
  • “चेय्य तामरै तालीणै वालिये…” – वरवरमुनि स्वामीजी का वालि तिरुनाम (दिव्य प्रबन्ध गोष्ठी के अंत में पाठ किया जाता है)
  • अन्य श्लोक /स्तोत्र ग्रंथ

मुडुम्बै नम्बि के वंश में जन्म लेने वाले हस्तिगिरिनाथर, को अण्णा के नाम से भी जाना जाता है और वे प्रतिवादी भयंकर नाम से प्रसिद्ध हुए।

कुरेश स्वामीजी जो श्रीरामानुज स्वामीजी से पहले अवतरित हुए परंतु तदन्तर रामानुज स्वामीजी के प्रिय शिष्य हुए उनके समान ही अण्णा भी श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पहले अवतरित हुए परंतु वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य हुए। वे अष्ट दिग्गजों में से एक हैं (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आठ प्रमुख शिष्य)।

अपने जीवन के प्रारंभिक काल में, वे कांचीपुरम में रहते थे और वेदान्ताचार्य की उन पर बहुत कृपा थी। उन्होंने कुमार नयनाचार्य (वेदान्ताचार्य के पुत्र) के सानिध्य में अध्ययन किया। वे एक महान विद्वान हुए और उन्होंने अपनी तर्क विशेषता से अन्य संप्रदाय के बहुत से पंडितों को पराजित किया। अपने प्रतिवादियों के मन में भय उत्पन्न करने और अत्यंत स्पष्टता से विवाद कर सिद्धांत को स्थापित करने की उनकी योग्यता के बनिस्पत वे प्रतिवादी भयंकर अण्णा के नाम से जाने गए।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चाद, अण्णा ने तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की सेवा के लिए तिरुमला प्रस्थान किया। उनकी पत्नी को भी समान रूप से शास्त्रों की जानकारी थी और ज्ञान/ वैराग्य में श्रीकुरेश स्वामीजी की पत्नी आण्डाल के समान थी (आलवान की पत्नी शास्त्रों के आवश्यक सिद्धांतों में सुविज्ञ थी और एक स्त्री को अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान/भागवतों की सेवा में समर्पण कैसे करना चाहिए इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण थी)। उनके तीन पुत्र हुए जो आगे चलकर महा विद्वान हुए। अण्णा, ने सांसारिक सुखों में अपनी अनासक्ति विकसित की और भगवान के समक्ष जाकर, उनसे निरंतर और दोषरहित कैंकर्य प्रदान करने की प्रार्थना की (जैसे आलवार ने तिरुवाय्मौली 3.3 में ओलिविल कालमेल्लाम पद में प्रार्थना की थी)। उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, तिरुवेंकटमुडैयाँ, तोळप्पर (तिरुमला के एक श्रीवैष्णव आचार्य) के माध्यम से अण्णा को निर्देश देते हैं कि वे तिरुमंजन (पवित्र स्नान) और तिरुवाराधन (पूजा) के लिए जल लाने का कैंकर्य करे। तोळप्पर, अण्णा से कहते हैं कि भगवान को बहुत ही सुगमता से प्रसन्न किया जा सकता है और उनके दैनिक अनुष्ठान के लिए जल लाना भगवान को बहुत प्रिय होगा। तोळप्पर, अण्णा को एक चांदी का घड़ा देकर आकाश गंगा से जल लाने और तिरुवाराधन से पहले उसमें सुगंधी (इलायची, लौंग, आदि) से उसे युक्त करके उसे अर्चक (पूजारी) को देने का निर्देश देते हैं। अण्णा प्रसन्नता से उसे स्वीकार करते हैं और अत्यंत प्रेम से भगवान के प्रति अपनी दासय्ता दर्शाते हुए वह कैंकर्य प्रारम्भ करते हैं।

एक दिन, श्रीरंगम से एक श्रीवैष्णव तिरुमला आते हैं। अण्णा उन्हें भगवान के समक्ष लाते हैं और दर्शन की व्यवस्था करते हैं। उसके बाद वे श्रीवैष्णव उन्हें श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ, श्री रंग नाच्चियार, आलवारों और आचार्यों के लिए हो रही श्रेष्ठ गतिविधियाँ के बारे में बताते हैं। अण्णा, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव और श्रीरंगम में उनके द्वारा की जा रही दिव्य गतिविधियों के विषय में श्रवण करते हैं और उनकी करुणा, विद्वत्ता आदि के प्रति बहुत आकर्षित होते हैं। तदन्तर कुछ दिनों बाद, अण्णा उन श्रीवैष्णव को आकाश गंगा पर अपने कैंकर्य के लिए लेकर जाते हैं। लौटते हुए राह में, श्रीवैष्णव के माध्यम से वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अनुभव में डूब जाते हैं। तभी उन्हें स्मरण होता है कि वे जल को सुगंधी युक्त करना भूल गये और जैसे ही वे ऐसा करने जाते हैं तभी भगवान के एक एकांकी (भगवान के सेवक) उनसे वह घड़ा ले लेते हैं क्यूंकि उन्हें पूजा के लिए विलंभ हो रहा था। अण्णा उन्हें बताने का प्रयास करते हैं कि वह जल सुगंधी युक्त नहीं है परंतु एकांकी उनकी नहीं सुनते। अत्यंत व्यग्रता से, अण्णा दौड़ते हुए सन्निधि में पहुँचते हैं और देखते हैं कि पूजन विधि प्रारंभ हो चुकी है। वे अर्चक को सुगंधी प्रस्तुत करते हैं। अर्चक कहते हैं “आज मैंने देखा कि महक पहले से कहीं अधिक मधुर है”। अण्णा समझ जाते हैं कि यह सब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा सुनने का परिणाम, जिससे भगवान को भी प्रसन्नता प्राप्त हुई और भगवान की कृपा से, जल स्वतः ही सुगंधी युक्त हो गया। वे उन श्रीवैष्णव को धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने ऐसे सुंदर द्रष्टांत साझा किये और उन्हें बताते हैं कि वे शीघ्रातिशीघ्र श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दर्शन करना चाहते हैं।  कुछ दिनों के बाद वे तिरुवेंकटमुडैयाँ से आज्ञा लेकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने के लिए सकुटुंब श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते हैं।

श्रीरंगम पहुँचने पर, वे पेरिय पेरुमाल के दर्शन स्तुति के लिए क्रम से पहुँचते हैं (आण्डाल, श्रीरामानुज स्वामीजी, सेनै मुदलियार/ विष्वकसेनजी, आदि को वंदन करते हुए पेरिय पेरुमाल और पेरिय पिराट्टी)। परंतु पेरिय पेरुमाल के दर्शन के पहले ही वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को श्रीशठकोप स्वामीजी के तिरुवाय्मौली 4.10– ऑन्रूम देवं पर दिव्य व्याख्यान प्रदान करते हुए देखते हैं। इस पासूर में आलवार, अर्चावतार में विशेषतः आलवार तिरुनगरी के आदिनाथ भगवान की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। अण्णा, गोष्ठी के समक्ष उन्हें दंडवत प्रणाम करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें ह्रदय से लगा लेते हैं और उनका कुशल-मंगल पूछते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते हैं कि वे अण्णा से भेंट करके अत्यंत आनंदित हुए। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुवाय्मौली के उस दशक के प्रथम तीन पसूरों की व्याख्या करते हैं और फिर उसे विराम देते हैं। नेत्रों को अति आनंदित करने वाली श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की उभय वेदांत (संस्कृत और द्राविड वेदांत) में पारंगतता देखकर अण्णा बहुत आश्चर्यचकित होकर कहते हैं कि जब तक वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य नहीं होगे वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की निर्हेतुक कृपा प्राप्त नहीं कर पाएंगे और अर्चावतार में श्रेष्ठता के महत्वपूर्ण सिद्धांत को स्पष्टता से नहीं समझ पाएंगे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्यान को विराम देते हैं और उन्हें पेरिय पेरुमाल के समक्ष ले जाते हैं। पेरिय पेरुमाल, अण्णा को तीर्थ, श्री शठकोप, माला आदि प्रदान करते हैं और अर्चक के माध्यम से अण्णा से बात करते हैं। वे कहते हैं “हे प्रतिवादि भयंकराचार्य! आपको स्मरण होगा, एक बार आप तिरुमला में आकाश गंगा से जल लेकर आये और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यश को सुनकर स्वतः ही वह जल पवित्र हो गया और दिव्य महक से भर गया। आप यहाँ ऐसा कार्य करने आये हैं जिससे मुझे आनंद की प्राप्ति होगी – अब आपका श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से अद्वितीय और दिव्य संबंध है” और तद्पश्चाद वे उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण दर्शाते हैं। इसके पश्चाद पेरिय जीयर अपने मठ की ओर लौटते हैं।

अण्णा प्रसन्न होते हैं और कन्दाडै अण्णन के निवास पर पहुँचते हैं और अण्णा और कन्दाडै अण्णन दोनों ही एक दुसरे को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं, जो उस समय की सामान्य प्रथा थी। शास्त्र कहता है “वैष्णवो वैष्णवं दृष्टवा दंडवत प्रणामेद् भुवि” – जब एक वैष्णव अन्य वैष्णव से भेंट करते हैं, उन्हें एक दुसरे को परसपर प्रणाम करना चाहिए। वे एक दुसरे का कुशल मंगल जानते हैं और अण्णन के निवास की ओर प्रस्थान करते हैं। सौभाग्यवश, पोन्नडिक्काल् (वानमामलै) जीयर/तोताद्री स्वामीजी भी उस समय वहीँ उपस्थित थे। अण्णा, पोन्नडिक्काल् जीयर की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि “अरूल कोण्डादुम अदियवर” (कण्णिनुण् शिरूताम्बु– 7) – जो सदैव श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कृपा के अनुभव में लीन रहते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं। पोन्नडिक्काल् जीयर, अण्णा को गले लगा लेते हैं और यतिराज के पुनरावतार (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – यतिराज का द्वितीय अवतार) की दिव्य महिमा का गुणगान करते हैं। अण्णा (अपनी पत्नी और संतानों सहित) पोन्नडिक्काल् जीयर और कन्दाडै अण्णन के सानिध्य में पेरिय मठ पहुँचते हैं। वे सभी जीयर के समक्ष पहुँचते हैं और उनसे पञ्च संस्कार प्राप्त करके उन्हें ही अपना आश्रय स्वीकार करते हैं। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का श्रीपाद तीर्थ और प्रसाद ग्रहण करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा से पूछते हैं “आप तो प्रतिवादी भयंकराचार्य है! आप मुझे अपने आचार्य के रूप में कैसे स्वीकार कर सकते हैं?” और अण्णा अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि “वे श्रीवैष्णव सिद्धांत के विरोधियों के लिए प्रतिवादी भयंकराचार्य हैं परंतु श्रीवैष्णवों के चरण कमलों के सच्चे सेवक हैं”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह सुनकर बहुत प्रसन्न होते हैं और अण्णा को “श्रीवैष्णव दासन्” के रूप में संबोधित करते हैं। आचार्य निष्ठा में पूर्णतः स्थित, उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा गुणगान में व्यतीत करते हैं। जैसे कूरेश स्वामीजी ने हमारे सिद्धांत की स्थापना में श्रीरामानुज स्वामीजी का सहयोग किया ठीक उसी प्रकार अण्णा ने सम्पूर्ण जीवन सत् संप्रदाय सिद्धांत की स्थापना में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का सहयोग किया।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कांचीपुरम, चोलसिंहपुरम, एरुम्बी आदि के जरिए तिरुमला की यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। अण्णा भी यात्रा में उनके साथ ही जाते हैं। तिरुमला में तिरुवेंकटमुडैयाँ के लिए सुप्रभात के अभाव को देखते हुए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा को भगवान के लिए सुप्रभात की रचना करने का निर्देश देते हैं। अण्णा, कृतज्ञता से अपने आचार्य के दिव्य विग्रह का ध्यान करते हुए, श्री वेंकटेश सुप्रभातम, स्तोत्रं, प्रपत्ति और मंगल श्लोकों की रचना करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा की रचनाओं से बहुत प्रसन्न होते हैं और तिरुमला में भगवान की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उनका पाठ करने का निर्देश देते हैं।

श्रीरंगम लौटने के बाद, एक बार, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा को आमंत्रित करते हैं और कन्दाडै अण्णन्, पोरेर्रू नायनार, अनंत्तय्यनप्पै, एम्पेरुमानार जीयर नायनार, कन्दाडै नायन और सभी को श्रीभाष्य की शिक्षा देने का निर्देश देते हैं। तब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा को श्रीभाष्याचार्य की उपाधि प्रदान करते हैं और उन्हें श्रीभाष्य सिंहासन के अधिनायक के रूप में नियुक्त करते हैं।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के वैभव दर्शाते हुए अण्णा ने बहुत से साहित्यिक रचनाएँ की है। “चेय्य तामरै तालीणै वालिये…”, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर स्वरुप और उनकी असीमित कृपा का एक दिव्य वर्णन है। ऐसे बहुत सी रचनाएँ है जो अत्यंत सुंदर है और जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की महिमा का पुर्णतः वर्णन करती है। उनमें से कुछ हम यहाँ देख सकते हैं:

उभय नाच्चियार के साथ श्रीनिवास भगवान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अण्णा (तिरुपति)

उभय नाच्चियर के साथ श्रीनिवास भगवान, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और अण्णा (तिरुपति)

श्रीवेंकटेश प्रपत्ति (श्लोक 15)
सत्वोत्तरैस् सतत सेव्य पदाम्भुजेन।
संसार तारक दयार्द्र दृगचलेन।।
सौम्यो पयंतृ मुनिना मम दर्शितौते।
श्रीवेंकटेश चरणौ शरणम् प्रपद्ये।।

मैं, श्री वेंकटेश भगवान के चरण कमलों में आश्रय लेता हूँ, जिन चरण कमलों को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपनी निर्हेतुक कृपा द्वारा दर्शाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, सच्चे ह्रदयवाले परम सात्विकों द्वारा सेवित है। ऐसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने मुझे भगवान के दिव्य चरण कमल दर्शाये हैं, जो संसार से हमारा उद्धार करेंगे और परमपद में पहुंचाएंगे।

श्रीवेंकटेश मंगलं (श्लोक 13)
श्रीमत् सुंदरजामातरूमुनि मानस वासिने।
सर्वलोकनिवासाये श्रीनिवासाये मंगलं।।

वह जो सर्व-व्यापी है, जिनके वक्ष स्थल में श्री महालक्ष्मीजी सर्वदा निवास करती है और जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ह्रदय में नित्य निवास करते हैं, ऐसे तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) का सदा मंगल हो।

प्रतिवादि भयंकर अण्णन के तिरुवेंकटमुडैयां के लिए सभी स्तोत्र विभिन्न भाषाओं में http://acharya.org/acharya/pbanna/index.html पर उपलब्ध है।

इस प्रकार, हमने प्रतिवादि भयंकर अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे उभय वेदांत में महा विद्वान् थे, पूर्ण रूप से आचार्य निष्ठा में स्थित थे और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र भागवत निष्ठा की प्राप्ति हो।

प्रतिवादि भयंकर अण्णन् की तनियन:

वेदांतदेशिक कटाक्ष विवृद्धबोधम् ।
कान्तोपयंतृयमिन: करूणैकपात्रं ।।
वत्सान्वायमनवद्य गुणैरूपेतं ।
भक्त्या भजामि प्रतिवादिभयंकरार्यम् ।।

-अदियेन् भगवति रामानुजदासी

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तिरुमंगै आळ्वार

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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तिरुनक्षत्र: कार्तिक मास- कृत्तिका नक्षत्र

आवतार स्थल: तिरुक्कुरैयलूर्

आचार्यं: श्री विष्वक्सेन, तिरुनरयूर नम्बी, तिरुकण्णपुरं शौरिराज पेरुमाळ

ग्रंथ रचना सूची: पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकूत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम

परमपद प्रस्थान प्रदेश: तिरुक्कुरुंगुडि

शिष्यगण: अपने साले इळयाल्वार , परकाल शिष्यर , नीर्मेळ नडप्पान(पानी पर चलने वाले ),तालूदुवान(ताला को मुँह से फूँक के खोलने वाले ), तोळा वळक्कन (झगड़कर धन को हासिल करने वाले), निललिळ ओदुन्गुवान(परछाई मे सिमट जाने वाले ),निळलिल मरैवान, उयरत तोंगुवान(सीमा रहित ऊंचाईयों को भी चडने वाले)

पेरियवाच्छान पिळ्ळै अपने ग्रंथ के अवतारिका मे तिरुमंगै आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए कहते हैं , एम्पेरुमान(भगवान) अपने निर्हेतुक कृपा से आळ्वार को संस्करण किए हैं और उनके द्वारा अनेक जीवात्म उज्जीवित हुए , आईये इसके बारे में ग़ौर करें ।

तिरुमंगै आळ्वार अपने शरीर को सुखद छाया में रखकर अपने आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखे थे । आत्मा को तपते हुए सूर्य में रखने का मतलब यह हुआ की ख़ुद को भगवद् विषयों(अध्यात्मिक) में नहीं लगाना और शरीर को सुखद छाया में रखने का मतलब हैं की अनादि काल से भौतिक विषयों के प्रति आकर्षित होना और केवल उन विषयों का भोग लेना ही एक मात्र लक्ष्य होना। जैसे कहा गया हैं ‘ वासुदेव तरुच्छाय ’- अर्थात वासुदेव (श्रीकृष्ण) ही असली छाया देने वाले वृक्ष हैं और इससे यह सिद्ध होता हैं की केवल भगवद् विषय ही असली सुखद छाया हैं । वे ही हैं जो एक मनोज्ञ वृक्ष हैं जो सर्व काल और सर्वदा आनन्ददायक हैं । इस वृक्ष की छाया किसी भी तरह की वेदना को दूर कर देती हैं और अतन्त सौम्य हैं और ना ही यह बहुत गर्म और ना ही ठंडी हैं । तिरुमंगै आळ्वार आँखों को आह्लाद करने  विषयानन्तरों मे बहुत ही दिलचस्पि  रखते थे , भगवान ने उन सभी विषयों से उनका ध्यान हटाकर , कई  दिव्य देशों पे और आँखों को लुभाने वाली अपनी अर्चावतार एम्पेरुमान् की ओर मोड़ देते हैं और उन्हीं पे ध्यान मग्न कर  देते हैं और इतना परिपूर्ण अनुभव प्रदान करते हैं की आळ्वार को  भगवान से पल भर की जुदाई भी असहनीय हो जाती हैं।तद्नन्तर श्री भगवान आळ्वार को इस भौतिक संसार में रहने के बावज़ूद उन्हें  नित्यमुक्तों के बराबर की स्थिति को पहुँचा देते हैं और परमपद प्राप्त करने की चाह प्रवृद्ध करते हैं और अन्त में परमपद प्रदान करते हैं ।

आळ्वार मानते थे की भगवान ने इनकी अद्वेषत  (भगवान जीवात्मा की सहायता करने के लिए हर एक समय उपस्थित हैं , लेकिन जीवात्मा इस सहायता लेने के लिए अनादि काल से विमुख हैं और भगवान जीवात्मा के  उज्जीवन करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक जीवात्मा उनकी सहायता लेने के लिए सुमुख नहीं  हो जाते  – इस अद्वेषत को अधिकारी विशेषण में  गिनती की जाती हैं यानी अद्वेषत जीवात्मा का सहज स्वभाव हैं ), भौतिक विषयों की सीमाएँ , इनकी इन विषयों को अनुभव करने की चाह को आधार भूत बनाकर  (और उस चाह को एम्पेरुमान की ओर मोड़ते हैं ) और अनादि काल से किये गए पापों को अपनी करुणा का पात्र बना के , उन्हें तिरुमंत्र  और स्वरूप (प्राकृतिक स्वभाव ), रूप (अनेक रूप ), गुण (दिव्य गुण ) और विभूति (सम्पत्ति ) का ज्ञान प्रदान करते हैं । भगवान के करुणा समुद्र में डूबे हुए आळ्वार , एहसानमन्द होकर पेरिय तिरुमोळि में भगवान का कीर्तन करना शुरू करते हैं । यह जीवात्मा/चित्त(बोध – क्षम रखने वाले पदार्थ ) का स्वरूप हैं की वह ज्ञान का व्यक्तिकरण करें और अचित्त वस्तु(बोध – क्षम न रखने वाले पदार्थ ) ज्ञान रहित होने के कारण किसी विषय का अनुभव नहीं कर सकते हैं । इस तरह आळ्वार कृतज्ञता को दर्शाने के लिए और एम्पेरुमान् की अर्चावतार का कीर्तन करने के लिए , कई दिव्य प्रबंधों की रचना करते हैं।

अपने व्याकरण के अवतारिका में पेरियवाच्छान पिल्लै ने एम्पेरुमान की निर्हेतुक कृपा( कारण रहित कृपा ) और आल्वार की उपाय शून्यता (एमपेरुमान के दया पात्र होने के लिए स्वयं अनुकूल कार्य ,उपाय बुद्धि से नहीं करना) स्थापित करते हैं  | लेकिन एक समय जब एम्पेरुमान से परिपूर्ण रूप से आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात् , एम्पेरुमान के प्रति आळ्वार का लगाव असामान्य और असीम हो जाता हैं इस विषय को वे स्वयं ही अपने पेरिय तिरुमोलि ४.९.६ में घोषित करते हैं “ नुम्मडियारोडुम ओक्क एण्णियिरुत्तीर अडियेनै  “अर्थात मुझे अपने दूसरे अडियारों (सेवक , दास) में गिनती नहीं करना ।

आळ्वार की वैभवता को दर्शाते हुए पेरियवाच्छान पिल्लै और मामुनिगळ की विशेष स्तुति यहाँ पढ़ सकते हैं |

रामानुज नूतन्दादी (२ रा पाशुर ) में अमुदनार ने एमपेरुमानार( श्री रामानुज स्वामी ) को “कुरैयल पिरान अडिक्कीळ विळ्ळात अन्बन” कहके संबोधित करते हैं अर्थात श्री रामानुज स्वामी वोह हैं जिन्हें तिरुमंगै आळवार के श्री चरण कमल पे अचंचल प्रेम हैं |

मामुनिगळ तिरुवाली तिरुनगरी दिव्यदेशों की पर्यटन करते समय , आळ्वार की दिव्य मंगल तिरुमेनी(शरीर) के सौंदर्य पर इतने आकर्षित हुए की उसी वक्त आळवार के रमणीय रूप को अपने आँखों के सामने दर्शाते हुए एक पाशुर रचते हैं | आईये उस पाशुर का आनंद ले :

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अनैत्त वेलुम्, तोळुतकैयुम्, अळुन्तिय तिरुनाममुम्,
ओमेन्ऱ वायुम्, उयर्न्त मूक्कुम्, कुळिर्न्त मुकमुम्,
परन्त विळियुम्, इरुन्ड कुळलुम्, चुरुन्ड वळैयमुम्,
वडित्त कातुम्, मलर्न्त कातु काप्पुम्, ताळ्न्त चेवियुम्,
चेऱिन्त कळुत्तुम्, अगन्ऱ मार्बुम्, तिरन्ड तोळुम्,
नेळित्त मुतुगुम्, कुविन्त इडैयुम्, अल्लिक्कयिऱुम्,
अळुन्दिय चीरावुम्, तूक्किय करुन्ङ्कोवैयुम्,
तोन्ङ्गलुम्, तनि मालैयुम्, चात्तिय तिरुत्तन्डैयुम्,
चतिरान वीरक्कळलुम्, कुन्तियिट्ट कनैक्कालुम्,
कुळिर वैत्त तिरुवडि मलरुम्, मरुवलर्तम् उडल् तुनिय
वाळ्वीशुम् परकालन् मन्ङ्गैमन्नरान वडिवे एन्ऱुम्

परकालन / मंगै मन्नन का दिव्य मंगल विग्रह हमेशा मेरे ह्रदय में हैं | यह दिव्य रूप को दर्शाते हैं की एक भाला कंधों के बल , एमपेरुमान को अंजलि समर्पित करते हुए श्री हाथ, अति सुन्दर उर्ध्व पुण्ड्र, प्रणव उच्चारण करते होट, सीधी और थोड़ी सी ऊपर उठी नासिकाग्र , शीतल मुखमण्डल, विशाल नेत्र, घुन्ग्राते सुन्दर काले बाल, थोड़े से झुके हुए कान ( एम्पेरुमान से अष्ट अक्षरी महा मंत्र सुनने के लिए ), गोलाकार गर्दन, विशाल वक्षस्थल, बलिष्ट बाहु, सुंदर सी पीट की ऊपर भाग, पतली कटी प्रदेश, मनमोहक पुष्पमाला, अद्भुत नूपुर, आळ्वार के पराक्रम को सूचित करने वाले घुटने, थोडे से मुड़े हुई श्री चरण कमल और शत्रुओं का नाश करने वाली कद्ग|हम यह निश्चित रूप से कह सकते हैं की  तिरुवाली – तिरुनगरी के कलियन की अर्चा विग्रह यह श्रुष्टि में सबसे सुन्दर हैं ।

आळ्वार निम्न लिखित तिरु नामों से भी जाने जाते हैं – परकालन(अन्य मत को काल (यम) के समान खण्डन करने वाले ), कलियन (काल के बराबर), नील (नील वर्ण का देह ) कली ध्वंस (कली को ध्वंस करने वाले) कविं लोक दिवाकर (कवि लोक के सूर्य ) चतुष् कवि शिका मणि (चार तरह की कविता मे विद्वान), शट प्रबंध कवि (छह प्रबंधों के कृपा कारक), नालु कवि पेरुमाळ , तिरुवाविरुडय पेरुमान (महान कद्ग धारण), मंगैयर कोन (मंगै राष्ट्र के राजा), अरुळ मारी (वर्षा काल की वर्ष के समान कृपा बरसाने वाले ), मंगै वेन्दन (मंगै राष्ट्र के अधिकारी),आलीनाडॉन (आडल मा नामक अश्व अधिकारी), अरट्ट्मुक्की, अडयार सीयम (अन्य मतो को निकट पहुँचने न देने वाले सिंह), कोंगु मालार्क कुळलियर वेळ, कोर्चा वेन्दन (महान राजा), कोरवेळ मंगै वेन्दन( कुछ भी कमी न रहने वाले महा राजा) ।

इन विषयों को ध्यान मे रखते हुए ,आईये आळवार को जानेंगें

आळ्वार कार्मुक(कुमुद गण) अंश से तिरुक्कुरैयलूर् मैं (तिरुवालि- तिरुनगरि के समीप) चतुर्थ वर्ण में अवतरित हुए । जैसे दिव्यसूरि चरित में गरुड़ वाह पंडित बताते हैं उन्हें नीलन (श्याम देह वर्ण) कहके नामकरण किया गया हैं।

आपकी बाल्य अवस्था बिना कुछ भगवत सम्बन्ध से ही बीत गई। यौवन अवस्था प्राप्त करने पर, भौतिक विषयों में उलझ गए । बलिष्ट शरीर और अनेकानेक आयुध प्रयोग करने में कुशलता सहित युद्ध विद्य में नैपुण्यता होने के कारण चोल देश के राजा के पास जाते हैं और अपनि सेना में उन्हें स्थान देने की माँग करते हैं । चोल देश राजा उनकी सामर्थ्य देखकर उन्हें सैंयाध्यक्ष के स्थान पर नियुक्त करते हैं और एक छोटी प्रान्त का पालन आभार सौंप देते हैं ।

एकानक समय मे तिरवाली दिव्य देश मे स्थित सुन्दर सरोवर मे अप्सराएँ (देव लोक के  नृत्यांगनाएं) जल विहार करने के  लिये आते हैं । उनमे से तिरुमामगल (कुमुदवल्ली) नामक एक  कन्या पुष्प संचयन (फूलों की संग्रह) करने के लिए निकलती हैं और उनकी साखियाँ उन्हें भूलकर चली जाती हैं । जब वह कन्या मनुष्य शरीर लेकर सहायता  के लिए ढूँढती हैं , उस समय उस ओर से गुजरते  एक श्री वैष्णव वैद्य  कन्या को देखकर  अपना अता पता पूछते हैं और कन्या अपने सहेलियों से बिछड़ने और  इत्यादि घटित विषय बताती हैं । वैद्य निसंतान होने के कारण अपने साथ उस कन्या को ख़ुशी से घर ले आते हैं और  अपने पत्नी से परिचित करते हैं और निसंतान दम्पति बहुत प्रसन्न होकर कन्या को अपना लेते हैं और प्यार से पर्वरिश करते हैं । उनकी सुन्दरता देखकर कुछ लोग नीलन को इस कन्या के बारे में बताते हैं और नीलन उनके सौंदर्य पर मुग्ध होते हैं और तुरन्त वैद्य के पास जाकर बात चीत करना आरम्भ करते हैं । उस समय कुमुदवल्लि उस ओर से गुजरती हैं और वैद्य नीलन से बताते हैं की कन्या का कुल , गोत्र पता न होने के कारण उनकी विवाह के बारे में वे बहुत चिन्ता ग्रस्त हैं । नीलन तुरन्त उनसे अपनी विवाह का प्रस्ताव रखते हैं और ढ़ेर सारा धन उन्हें देते हैं । वैद्य दम्पति प्रस्ताव को मंजूर करते हैं लेकिन कुमुदवल्ली शर्त रखती हैं की वे  एक श्री वैष्णव जो आचार्य से पञ्च संस्कार प्रदित हो केवल उन्ही से विवाह रचेंगी । जैसे बताते हैं एक होशियार व्यक्ति अच्छे काम करने में देरी नहीं करता हैं , उसी तरह वे तिरुनरैयूर नम्बि के पास पहुँचकर , पञ्च संस्कार करने की विनती करते हैं।  एम्पेरुमान अपने दिव्य करुणा से उन्हें शंख , चक्र प्रदान करके , तिरुमंत्र उपदेश करते हैं ।

पद्म पुराण मे ऐसा कहा गया,

सर्वाश्च स्वेतामृथ्य धारयम ऊर्ध्व पुन्द्रम यधाविधि  ।
ऋजुवै साँथरालानी अङ्गेषु द्वादशस्वपि. ।।

दिव्य देशो मे प्राप्त श्वेत मृत्तिका से शरीर के द्वादश भागोमे निर्धारित उचित अंतराल के साथ द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करना आवश्यक हैं ।

ततपश्चात आळवार द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करते हैं और  कुमुदवल्ली से अपने  विवाह का प्रस्ताव रखते  है । कुमुदवल्ली विवाह के लिए सहमत होती  हैं परन्तु कहती हैं की उन्हें पति तब ही मानेंगी जब आप श्री एक साल प्रति दिन 1008 श्री वैष्णवों का तदियारधान करेंगे ।  कलुमुदवल्ली के प्रति अनुराग के  कारण आळवार उनका कहना मान लेते हैं और अति वैभव से कुमुदवल्ली से विवाह समारोह आयोजित होता हैं ।

पद्म पुराण सूचित किया गया है .

आराधनानाम सर्वेषाम विश्नोआराधनम् परम ।
तस्मात परतरं प्रोक्तं तदीयाराधनम नृपा 

हे राजन अन्य देवता आराधन से श्री विष्णु आराधन श्रेष्ठ हैं और विष्णु भक्तों की आराधन स्वयं श्री महा विष्णु से भी अधिक हैं ।

इस प्रमाण के अनुगमन करते हुए आळवार अपनि पूरी संपत्ति लगाकर तदीयाराधन (दिव्य प्रसाद से  श्री वैष्ण्वों की आराधना करना)करते हैं ।  यह देखकर कुछ लोग,राजा के पास शिकायत करते हैं की नीलन  (परकाल) प्रजा धन श्री वैष्णवों की तदीयाराधन करने में  दुरुपयोग कर रहा है ।लोगों की बात सुनकर  राजा परकालन को पेश होने का आदेश देते हैं और अपने सेना को उनके पास भेजते हैं । परकालन उनसे सौम्य रूप से पेश आते हैं और प्रतीक्षा करने के लिए कहते हैं । सैनिक राजा के आदेश अनुसार  शुल्क (लगान) देने के लिए निर्बंध करते  है । आळवार क्रोधित हो उठते हैं और  उन सैनिकों को बाहर घसीट देते  है। सैनिक राजा को पूरा वृतांत सुनाते है। राजा सैन्याद्यक्ष को आदेश देते हैं की पूरी सेना के साथ  परकालन को निर्बंध करें ।  वह सैन्याद्यक्ष पूरी सेना के साथ एक बड़ी सेना लाता है और आळ्वार पर हमला करता है।  तब परकालन  धैर्य और शक्ति के साथ सामना करके वह सैन्याद्यक्ष और पूरी सेना को वापस जाने पर मज़बूर करते है।  सैन्याद्यक्ष आळ्वार की विजय प्राप्ति का समाचार राजा को देता है ।  तब राजा स्वयं युद्ध लड़ने का निर्णय करके अपनी पूरी सेना के साथ आळ्वार पर हमला बोलते  है। आळ्वार फिर एक बार पराक्रम बताते हुए लड़कर पूरी सेना को परास्त कर देते  है। आळ्वार की पराक्रमता पर राजा बहुत प्रसन्न हो जाते हैं शान्ति घोषित करते हैं और उनकी जयजयकार करते हैं । राजा की कुयुक्ति से बेख़बर आळ्वार , उनके पास चल पड़ते हैं और राजा अपने मंत्री की सहायता से  उन्हें बंधी बनाकर बकाया शुल्क देने का निर्बंध करते है। मंत्री उन्हें एम्पेरुमान के  सन्निधि के अन्दर कैद कर देते हैं और आळ्वार 3 दिन तक बिना कुछ प्रसाद पाये रहते  हैं ।  कहा जाता हैं की उस समय तिरुनरयूर  नाच्चियार  अपने तिरुनरयूर नम्बि को बताती हैं की आळ्वार को भुखे देख उन्हें सहन नहीं हो रहा  हैं और स्वयं  प्रसाद लेकर आळ्वार को प्रदान करती हैं । आळ्वार उस समय पेरिया पेरुमाळ  (श्री रंगनाथ जी) और तिरुवेन्गडमुडैयान (श्री निवास) के ध्यान मे निमग्न हो जाते  है।  काँची  देवपेरुमाळ आळ्वार के स्वप्न मे आकर बताते हैं की काँचीपुरम  मे बहुत बड़ा निधि का भाण्डागार हैं  और उनके आगमन पर उन्हें वह प्राप्त होगी । उस स्वप्न वृतांत राजा को बताने पर राजा अपनि सेना के साथ कड़ी निग्रनि से आळ्वार को काँचीपुरम भेजते है। वहाँ पहुँचने पर निधि का पता जान नहीं सके । तब अपने भक्तोंको सब कुछ देने वाले देवपेरुमाळ आळ्वार को पुनः स्वप्न में  साक्षात्कार होके,  वेगवती नदी के किनारे निक्षिप्त निधि का पता बताते हैं । आळ्वार निधि को लेकर राजा का बकाया शुल्क भर देते है और बाकि निधि से तदीयराधन जारी रखने के लिये तिरुक्कुरैयलूर् चले जाते हैं ।पुनः वह राजा अपने सैनिक को शुल्क वसूल करने  के लिए भेजने पर आळ्वार चिंता घ्रस्त होते हैं ।  पुनः देवपेरुमल स्वप्न में साक्षात्कार होते हैं और  वेगवती नदी तट पे स्थित रेती लेकर सैनिको को देने का आदेश देते  है । आळ्वार ठीक उसी तरह सैनिकों को रेती देते हैं । सैनिकों को रेती अणु अमुल्य रत्न जैसे दिखाई देते हैं ।  रेती के अणु लेकर ख़ुशी से सैनिक राजा के पास लौट जाते हैं और राजा को घटित विषय विस्तार रूप से निवेदन करते है। आळ्वार की महानता उन्हें समझ आती हैं उन्हें राज दरबार आने का निमंत्रण देते हैं सादर से उन्हें स्वागत करते हैं  अपने दोषों के  लिये  क्षमा प्रार्थना करते हैं और ढ़ेर सारा धन देते हैं ।अपने पापों का प्राय्श्चित्त करते हुए अपनी पूरी सम्पत्ति देवालयों और ब्राह्मणों में दान करते है।

आळ्वार अपना तदीयराधन ज़ारी रखते हैं  और इस कारण उनकी संपत्ति शून्य हो जाती हैं  । आळ्वार ठान लेते हैं की वे तदीयराधन  किसी भी तरह ज़ारी रखेंगे चाहे उन्हें राह में आने – जाने वाले लोगों की चोरी ही क्यूँ न करना हों । धनी लोगों से चोरी करके, भक्ति से  तदीयराधन में जुट जाते हैं । सर्वेश्वर सोचते हैं की आळ्वार चोरी करके भी उस संपत्ति को श्री वैष्णवों की तदीयाराधना में लगा रहे हैं यानि आळ्वार चरम पुरुषार्थ (चरमोपाय) में स्थित  है और आळ्वार को दिव्य निःसंकोच ज्ञान प्रदान करके उन्हें इस सँसार सागर से उन्नति की ओर मार्ग दर्शन करने का निर्णय लेते हैं । कहा जाता हैं की श्रीमन्नारायण स्वयं नर (आचार्य) के रूप मे अवतरित होके शास्त्र की सहायता से संसार में लीन दुःखी जीवत्मा को उज्जीवित करते हैं ठीक उसी तरह एम्पेरुमान अपने देवियों के साथ आळ्वार को अनुग्रहित करने के लिये उनकी राह में  नए दूल्हा दुल्हन की तरह , सुन्दर आभूषणों से सज़-दज़ बारात में वायळालिमणवालन के रूप मे निकल पडे ।बड़ी मात्रा मे लूटने का मौका देखकर आळ्वार जोश में आ जाते हैं और एम्पेरुमान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और सब कुछ लूट लेते हैं । आखिर में आळ्वार एम्पेरुमान के श्री पाद में लगी हुई बिछिया को क़तर देते हैं ।उनकी शूरता  पे  एम्पेरुमान आश्चर्य चकित हो जाते हैं और  “नम् कलियनो ” कहकर सम्बोधित करते  है, अर्थात क्या आप हमारे कलियन हो ? (महान शौर्यवान को कलियन कहा जाता हैं)।

तदनन्तर आळ्वार पूरे आभूषणों को और संपत्ति को एक पोटली में बांध कर उठाने का प्रयत्न करेते हैं लेकिन उठा नहीं सकते । आळ्वार दूल्हे राजा(एम्पेरुमान) की ओर देखकर गरजते हैं की उन्होंने ही कुछ मंत्र का प्रयोग किया हैं जिसके कारण वह पोटली उठाने में असफल हो रहे हैं । एम्पेरुमान उनके इंजाम को कबूल करते हैं और मान लेते हैं की वास्तव में ही एक मंत्र हैं और अगर आळ्वार सुनना चाहे तो वह उन्हें बता सकते हैं ।आळ्वार अपने छुरे को दिखाकर  शीघ्र से  उस मंत्र का उपदेश करने के लिए कहते  है । वह मंत्र जो सबसे सुमधुर हैं , जिसमे सभी शस्त्ररार्थ निहित हैं ,   अंतिम लक्ष्य को स्थापित करता हैं ,सकल वेद सार हैं , दुःख भरे संसार से विमुक्त करने वाला हैं, जप करने वाले वक्ता को ऐश्वर्य (भौतिक सम्पत्ति ) , कैवल्यं(स्वानुभवं), भगवत कैंकर्य से अनुग्रहित करती हैं , ऐसे तिरुमंत्र का उपदेश करते हैं ।  शास्त्रो में तिरुमंत्र की वैभवता के बारे में ऐसा वर्णन किया गया हैं

वृद्द हारीत स्मृति मे

रुचो याजस्मी सामानि ततैव अधर्वरार्णि च ।
सर्वं अष्टाक्षाराणान्तस्थम् यच्चचार्णयदपि वगमयम् ।।

रिग, यजुर, साम और अथर्वण वेदों का सर और आप श्री के उपब्रह्मणो का पूरा सार अष्टाक्षर मंत्र मे स्थित है।

नारदिय पुराण

सर्व वेदांत सारार्थस: संसारार्णव तारक: ।
गति: अस्ताक्षरो नॄणाम् अपुनर्बावकांक्षिणाम ।।

मुमुक्षु (मोक्ष कामी )को अष्ठाक्षरी मंत्र का आश्रयण करना आवष्यक है क्यूँकि इसी में सकल वेदांतों का सार हैं और केवल यही मंत्र संसार सागर से पार करवा सकता हैं । .

नारायणोपनिषद् मे

ओमित्यग्रे व्याहरेत नाम इति पश्चात नारायणायेति उपरिष्टात ।
ओमित्येकाक्षरम् नम इति द्वे अक्षरे नारायणायेति पञ्चाक्षराणी ।।

ओम का उच्चारण पहले ,नमः और नारायणाय अनुसरित उच्चारण किया जाता हैं ; ओम एकाक्षर से ,नमः दो अक्षरोंसे, नारायण शब्द पाँच अक्षरोंसे (1+2+5=8 से यह मंत्र अष्ठाक्षरी कहलाती है) । इस तरह शास्त्र वाक्य से अष्ठाक्षरी मंत्र का निर्माण और निसंकोच रूप से मंत्र की उच्चारण रीती हमें पता चलती हैं ।

नारदीय पुराण मे

मन्त्राणाम् परमो मंत्रो गुयाणाम् गुह्यमूत्तत्तम । 
पवित्रण्याच पवित्राणाम् मूलमन्त्रासनातनह: ।।

अष्ठाक्षरी महामंत्र सारे मंत्रों मे से महत्तम हैं, सारे रहस्य मंत्रों से भी रहस्य, सारे पवित्र मंत्रों से पवित्र और आनादी /सनातन मंत्र है।

इन सब से परे , महा ज्ञानी पूर्वाचार्यों की स्वीकृति यह अष्ठाक्षरी मंत्र को प्राप्त है । यह विषय हमें तिरुवाय्मोळि मे 7.4.4 से ” पिराळन पिरोधूम पेरियोर” पता चलता हैं अर्थात महान लोग जो एम्पेरुमान (भगवान)के नामों का उच्चारण करते हैं तथा आळवार स्वयं अपने पेरिय तिरुमोळि के पहले पदिग मे (पहले 10 पाशुरों मे) प्रकट करते हैं “पेत्त तायिनम आयिन सेयुम नलंतरुम सोल्लै नान कण्डु कोंडें” अर्थात मैं ने ऐसा मंत्र खोज लिया हैं जो स्वयं अपनी मय्या से भी ज्यादा उपकारक है ।

तिरुमंत्र स्वयं एम्पेरुमान से श्रवण करने के बाद   , करुणा स्वरूपी श्री महा लक्ष्मी और सुन्दर स्वर्णमय शरीर से प्रकाशित दिव्य गरुड़ आळ्वार के साथ अपना दिव्या मंगल रूप प्रकट करते हैं । भगवान अपनी निरहेतुक कृपा (कारण रहित कृपा )से आळ्वार को दोष रहित ज्ञान प्रदान करते हैं ।यह सब देखने के बाद , आळ्वार श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषाकार के द्वारा जनित एम्पेरुमान के  अनुग्रह समझ गए, तत्पश्चात छः दिव्य प्रबंधों को हम सबके लिए प्रदान करते हैं जो  नम्माल्वार के चार दिव्य प्रबंधों के छः अंगों की तरह माने जाते हैं – पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकुत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम हैं । आप श्री की  छः प्रबन्ध अलग-अलग काव्य रूप के ढ़ंग हैं -आसु , मधुरं, चित्रम, और विस्तार और येही एक वज़ह हैं की आप श्री “नालु कवि पेरुमाळ”  ख़िताब से प्रसिद्ध हुए ।

आखिर में एम्पेरुमान आळ्वार को आज्ञा देते हैं  की वे अपने शिष्य सहित अनेकानेक दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करे । आळ्वार अपने मंत्रि और शिष्यगण के साथ दिव्य देश की यात्रा पर निकलते हैं  और कई दिव्य नदियों में स्नानाचरण करते हुए , क्रमानुसार श्री  भद्राचलम, सिंहाचलम, श्रीकूर्मम, श्रीपुरुषोतमम्(पूरीजगन्नाधम), गया, गोकुलम, बृन्दावनम्, मधुरम्, द्वारका, अयोध्या, श्री बद्रिकाश्रमम्, काँचीपुरम, तिरुवेंगडम् इत्यादि दिव्य देश के एम्पेरुमानों का मंगलाशासन करते हैं । आळ्वार चोळमण्डल पहुंचते हैं और आप श्री के  शिष्य  “चतुष्कवी पधार रहे है”, “कलियन पधार रहे है”, “परकालन  पधार रहे है”, “पर मतङ्को को परास्त करने वाले पधार रहे है” कहके जय जय कार करते हैं । उस प्रांत में तिरु ज्ञान सम्बन्धर नामक शिव भक्त उधर वास करते थे और उनके शिष्य गण आळ्वार के कीर्तन का खण्डन करते हैं । आळ्वार उन्हें चुनौती देते हैं की सम्बन्धर् से वाद प्रतिवाद करके नारायण परतत्व (आधिपत्य) स्थापित करेंगे । आळ्वार को तिरु ज्ञान सम्बन्धर के वास स्थान ले आते हैं और घटित विषय को विस्तार से अवगत कराते हैं और सुनने के बाद  उनसे वाद विवाद करने के लिए संहद हो जाते हैं । वह नगर अवैष्णवों से भरा हुआ था और कम से कम एक जगह पे भी एम्पेरुमान(भगवान) का विग्रह न होने के कारण आळ्वार बात शुरू नहीं कर पाते और संदिग्ध मे पड जाते  हैं । उस समय एक श्री वैष्णव माता जी को देखकर, उनसे उनकी तिरुवराधन मूर्ति को लाने की विनती करते हैं  और आप श्री  उनकी तिरुवराधना मूर्ति जो  श्री कृष्ण की मूर्ति हैं सम्बन्धर् के यहाँ लाने पर,आळवार वाद -विवाद शुरू करते हैं ।  सम्बन्धर् एक श्लोक प्रस्तुत करते हैं और आळ्वार उनमे स्थित दोषों को अवगत कराते हैं । सम्बन्धर् आळ्वार को चुनौती देते हैं की काव्य सुनाये , तब आळवार ने “ओरुकुरले” पदिग  (पेरिय तिरुमोळि 7.4) मे ताडाळन एम्पेरुमान (काळिच्चिरामविणगरम-शीरगाली) के प्रति पाशुर का वर्णन करते हैं । बख़ूबी और सुन्दरता से रची गई पदिग सुनने के बाद  सम्बन्धर प्रति युत्तर नहीं दे पाये और अंतः आळ्वार की महानता पर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और उनका गौरव स्वीकार करके, उनका पूजन करते हैं ।

आळ्वार श्री रंगम दर्शन करके , श्री रंगनाथ जी का मंगलशासन और कैंकर्य करने के इच्छुक थे । ब्रह्मांड पुराण मे कहा गया हैं :

विमानम् प्रणवाकाराम वेदश्रुन्गम महाद्भुतम् श्री रंगशायी भगवान प्रण वारर्थ प्रकाशकः ।

महत्तर श्री रंग विमानम्(गोपुर) ओम कार का आविर्भाव हैं । विमान की चोटी  एक वेद सामान हैं ।  भगवान श्री रंगनाथ स्वयं ही प्रणवार्थ को अभिव्यक्त (तिरु मंत्र सार को) कर रहे है।

आळ्वार श्री रंगम मंदिर के चारों ओर दुर्ग बनाने के आकांक्षित , निर्माण करने में धन के बारे में अपने शिष्यों के साथ सलाह – मशोहरा करते हैं । शिष्य बताते हैं की श्री नागपट्टनम मे अवैदिक संप्रदाय  सम्बंधित एक सुवर्ण प्रतिम है, यदि उसे हासिल करने में क़ामयाब हो साके तो  बहुत कैंकर्य कर सकते है ।  यह विषय सुनने के पश्चात , तुरन्त आळ्वार नागपट्टनम निकल पड़ते हैं ।  उस नगर की विशेषता के बारे में जानने के लिए एक स्त्री से पूछ-ताछ करते हैं ।वे बताती हैं की उनकी सॉस कहा करती थी की उस प्रदेश में एक स्वर्ण विग्रह है । वास्तुकार जिसने, उस मूर्ति को और उसे निक्षिप्त करने के लिए रक्षात्मक विमान को निर्माण किया हैं , एक असामान्य द्वीप में निवास  कर रहा हैं ।यह विषय जानने के बाद आळ्वार , उस द्वीप की ओर शिष्य गण के साथ प्रस्थान करते हैं और विश्वकर्मा (देवताओं का मुख्य वास्तुकार) से तुलनीय उस वास्तुकार के बारे मे पूछ-ताछ करते हैं । वास्तुकार के विशाल और सुन्दर महल का पता बताने पर आळ्वार वहाँ पहुँचते हैं । महल के बाहर आळ्वार अपने शिष्यों के साथ वार्तालाप करना शुरू करते हैं और उस समय स्नान पान समाप्त करके वास्तुकार बाहर आते हैं । उन्हें पाहकर  तब आळ्वार उद्देश  पूर्वक अफ़सोस जताते हुए कहते हैं की ” हो । कुछ घुसपैठों ने नागपट्टनम के मंदिर को ध्वंस करके स्वर्ण विग्रह को लूट लिया हैं । इस सँसार में अब हम किस कारण जीवित रहें “। यह सुनकर वास्तुकार क्लेश से बताते हैं की ” विमान चोटी को खोलकर ,भीतर प्रवेश करने का रहस्य किसी छिछोरा शिल्पी ने ही बहिर्गत कीई होगा। में ने जटील चाबी बनाई – एक पत्थर के अंदर फ़ेरी गई लोहे का ज़ंजीर और उसे झरने के निचे स्थित फलक के निचे रखा और न जाने कैसे उसे तोड़ पाये?” ऐसे कहकर अन्जाने में पोल ख़ोल देते हैं ।

रहस्य पता चलने पर आळ्वार खुशी-ख़ुशी अपने शिष्यों के  साथ निकल पड़ते हैं  नागपट्टनम जाने के लिए समुद्र तट पहुँचते हैं । उस समय, देखते हैं की  एक नेक व्यापारी अपने  बहु मूल्य सुपारी को नाव मे चढ़ा रहे थे, आळ्वार उनके पास जाकर , आशीर्वाद देते हैं और उन्हें उस पार छोड़ने के लिए कहते हैं । व्यापारी मान लेता हैं और सभी लोग नाव पे अपना प्रयाण आरम्भ करते हैं । उस समय आळ्वार सुपारी की राशि में से एक सुपारी को निकाल कर दो टुकड़े कर के एक टुकड़े को व्यापारी को देते  हैं और कहते हैं की प्रयाण के अंत में वापस लेंगे और उनसे एक कागज़ह पर अपने हस्ताक्षरों से “में आळ्वार को मेरी नाव की आधी सुपारी का आभारी हुँ ” कर लिखने की गुज़ारिश करते हैं ।व्यापारी आळ्वार का कहना मान लेता हैं । नागपट्टनम पहुँचने पर उस कीमती सुपारी का आधा भाग देने की  माँग करते  हैं (श्री रंगा मंदिर निर्माण कैंकर्य) व्यापारी हैरान हो जाता हैं और देने के लिए इन्कार कर देता हैं । दोनों लोग बहस करना शुरू करते हैं और फ़ैसला लेते हैं इंसाफ़ तब ही मिलेगा जब सारे व्यापारियों से सलाह मशोहरा ले । सारे व्यापारी एलान करते हैं की आधी सुपारी आळ्वार को दिजाए । उस व्यापारी के पास और कोई चारा नहीं रहा और आधी सुपारी का मूल्य आळ्वार को चूका कर , अपने रास्ते निकल पड़ते हैं ।

आळ्वार ,शिष्यों के साथ मिलकर मन्दिर पहुँचते हैं और रात होने का इंतज़ार करते हैं । रात मे उस फ़लक को निकाल कर चाबी हासील करके ,विमान की चोटी पे पहुँचते हैं और दोनों तरफ घुमा कर, ख़ोल देते हैं और अंदर स्थित चमकिलि मूर्ति का दर्शन पाते हैं । आळवार को देखकर ,मूर्ति से आवाज़ निकलती हैं “ईयत्ताल आगतो इरुम्बिनाल आगतो, भूयत्ताल मिक्कोतोरु, भूत्तत्ताल आगतो, तेयत्ते पित्तलै ,नरचेमबुगलै आगतो, मायप्पोन वेंनुमो मतित्तेनै पन्नुगैक्के ” अर्थात आप लोहा, पीतल, ताम्बा जैसे पदार्थ को  उपयोग नहीं कर सकते थे क्या,आप की माँग थी की  मैं स्वर्ण से बनु ताकि आप आकर भगवान की  सेवा मे मुझे उपयोग कर सके “। आळ्वार अपने साले की सहायता से उस मूर्ति को लेकर ,उधर से निकलते हैं ।

अगले दिन , एक छोटे नगर पहुँचते हैं और आळ्वार मूर्ति हाली ही में जोति हुई खेत  में हिफ़ाजत करके आराम करते हैं। किसान उस ज़मीन की जुताई शुरू करते हैं , मूर्ति पाहकर एलान करते हैं की मूर्ति उनकी हैं । जब आळ्वार कहते हैं की मूर्ति उनकी आनुवंशिकोने खेत में दफ़नाया है ।  एक बहस चल पड़ती हैं , अंत में आळ्वार मूर्ति के मालिक होने का गवाह बताने के लिए तैयार होते हैं और  किसान उनकी बात मानकर चले जाते हैं । सूर्यास्त होने के बाद , आळ्वार मूर्ति लेकर अपने शिष्यों के साथ  उत्तमर् कोइल नामक दिव्य देश पहुँच कर ,उस मूर्ति को हिफ़ाजत करते हैं । उसी दौरान  नागपट्टिनम मंदिर के कार्य निर्वाहणाधिकारी  स्थानिक नेता के साथ मूर्ति की चोरी होने का समाचार पाकर , पीछा करते हुए छुपाये गए खेत तक पहुँचते हैं और अंत में उत्तमर् कोइल पहुँचते हैं । विग्रह के बारे में आळ्वार से पूछने पर पहले बात को टाल देते हैं की उन्हें कुछ भी मालूम नहीं हैं तद्नन्तर वर्ष ऋतु के बाद  पंघुनी(फाल्गुन मास) में मूर्ति की छोटी ऊँगली तक लौटाने के लीए सहमत होते हैं । इस समझौते का एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करके उन्हें देने के पश्चात , वह लोग उधर से निकल पड़ते हैं । आळ्वार मूर्ति को पिगलाकर बेचते हैं और उस धन से श्री रंगम् मंदिर के दुर्ग का निर्माण करते हैं । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार  से निर्मित नंदनवन से गुज़रते हैं और  बिना कुछ ठेस पहुँचाये, श्रद्धा पूर्वक चारों ओर प्राकार का निर्माण करते । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार संतुष्ट होकर प्यार से अपने कतरनी को तिरुमंगै आळवार का नाम “अरुल मारी” कहके अनुग्रह करते हैं । इस तरह  तिरुमंगै आळ्वार अनेकानेक कैंकर्य/सेवा करते हुए  एम्पेरुमान के प्रति अपनि भक्ति प्रदर्शित करते हैं ।

वर्षा ऋतु के पश्चात ,  कार्यनिर्वाहणाधिकरी स्वर्ण विग्रह ले जाने के लिए आए ।उनसे पहले दस्ताविज़ पढने के लिए कहते है और उसके मुताबिक़ स्वर्ण मूर्ति की एक छोटी  ऊँगली देते हैं । इसी विषय पर बहस शुरू होती हैं और सब लोग एक मध्यस्त व्यक्ति के पास जाते हैं और मध्यस्त फैसला सुनाते हैं की  दस्ताविज़ के मुताबिक़ वे छोटी ऊँगली का स्वीकार करें ।कार्यनिर्वाहणाधिकारी आळ्वार की युक्ति समझ , बिना कुछ लिए उधर से निकल जाते हैं ।अनन्तर आळ्वार वास्तुकारों को निमंत्रण देते हैं की वह उन्हें कुछ भेंट देना चाहते हैं लेकिन वह भेंट एक द्वीप में निक्षिप्त हैं ।सभी वास्तुकारों से एक ही कश्ती मे बैठकर निकलते हैं और कुछ दूर जाने पर आळ्वार केवट को इशारा करके, उनके साथ एक छोटी नाव मे कूद जाते हैं और कश्ती को उलटकर सभी वास्तुकारों को डुबो देते हैं । आळ्वार अपने स्थान लौटते हैं और वास्तुकारों के पौते उनके दादा के तलाश में पूछ-ताछ करने वहाँ पहुँचते हैं । आळ्वार उन लोगों को बताते हैं की वे उनके पूर्वजों को धन के निक्षिप्त स्थान द्वीप का पता बता दिया हैं और वह सारी सम्पदा इकट्टा करके आएंगे। आळ्वार के उत्तर से असंतुष्ट वे आळ्वार पर शक करते  हैं और जिद्द करते हैं की वे आळ्वार को तब तक नहीं निकालेंगे जब तक उनके पूर्वज सही सलामत उनके हाथों में न सौंपे जाय ।आळ्वार चिंता ग्रस्त होते हैं और  श्री रंगनाथर उनके स्वप्न मे साक्षात्कार होकर  “निर्भय होने का आश्वासन देते हैं ” और सभी पौत्र लोगों को कावेरी मे स्नान करके उर्ध्व पुण्ड्र धारण करके ,उनकी मूल मंडप में आकर ,अपने-अपने दादो के नाम पुकारने के लिए कहते हैं । श्री रंगनाथ भगवान की आज्ञा के अनुसार, सभी अपने अपने पूर्वजों को बुलाना शुरू करते हैं । अचम्बित , सभी पूर्वज श्री रंगनाथ भगवान के मूर्ती  के पीछे से  प्रकटित होकर अपने पौत्र से कहते है की “हम आळ्वार की दिव्य कृपा के कारण , हम श्री रंगनाथ  भगवान की श्रीपद पदमों के पास पहुंच गये हैं । आप भी आळ्वार के आश्रण  पाकर , यह संसार मे कुछ समय तक बिता कर खुद को उज्जीवित करें  “। उनके पूर्वज के आदेश सुनकर आळ्वार को आचार्य के रूप में  स्वीकृत करके अपने अपने स्वस्थल लौट जाते है।

पेरिय पेरुमाळ आळ्वार से उनकी इच्छा के बारे में पूछते हैं । आळ्वार बताते हैं की एम्पेरुमान(भगवान) के दशावतार की सेवा करने के उत्सुक हैं । एम्पेरुमान अर्चा विग्रहों की स्थापना करके पूजा करने की आज्ञा देते हैं और आळ्वार श्री रंगम मे दशावतार सन्निधि का निर्माण करते हैं ।

तत पश्चात पेरिय पेरुमाळ आळ्वार के साले को बुलाकर, उनसे आळ्वार की अर्चा मूर्ति तैयार करके (क्योंकि आळ्वार उनके साले के आचार्य हैं ) तिरुक्कुरैयलूर् मे स्थापित करने की , विशाल मन्दिर का निर्माण करने की और अनेक महोत्सवों का आयोजन करने की आज्ञा देते हैं । आळ्वार के साले आळ्वार और उनकी धर्मपत्नि कुमुदवल्ली नाच्चियार् की अर्चा विग्रह तैयार करके , तिरुक्कुरैयलूर् में स्थापना करके , अनेक उत्सव मनाते हैं ।आळ्वार अपने शिष्यों को उज्जीवित करते हुए ,निरंतर उपेय और उपाय के रूप मे पेरिय पेरुमाळ पे ध्यान करते रहे ।

आप श्री की तानियन:

कलयामी कलिध्वंसम कविंलोक दिवाकरम ।
यस्यागोभी: प्रकाशभी:आविद्यम निहतं तम:

आपकी अर्चावतार अनुभव पूर्व यहाँ वर्णन किया गया हैं ।

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अड़ियेन नल्ला शशिधर रामानुज दास
अडियेन इन्दुमति रामानुज दासि

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नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

nampillai-goshti1श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी- श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी बायें से तीसरे

तिरुनक्षत्र: अश्विनी, धनिष्ठा

अवतार स्थल: श्रीरंगम

आचार्य: उनके पिता (भट्टर स्वामीजी), श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी

शिष्य: वलमझगियार

स्थान जहां उनका परमपद हुआ: श्रीरंगम

कार्य: श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी, पिष्टपसु निर्णयम, अष्टाक्षर दीपिकै,   रहस्य त्रय, द्वय पीतक्कट्टु, तत्त्व विवरणम, श्रीवत्स विंशति, आदि।

वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र या पोते हैं। उनका नाम उत्तण्दा भट्टर रखा गया और तत्पश्चात वे नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर स्वामीजी नाम से प्रसिद्ध हुए। ध्यान देना: पेरिय तिरुमुडी अडैवु में यह लिखा गया है कि वे श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पुत्र हैं और ६००० पड़ी गुरु परम्परा प्रभावं में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का पोता कहा गया है। पट्टोलै में उन्हें श्रीवेदव्यास भट्टर का परपोता कहा गया है। उनकी पहचान के बारें में बहुत सही जानकारी कहीं भी नहीं है परंतु वें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के अति प्रिय शिष्य हुये।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का समय श्रारंगम में श्रीवैष्णवों के लिये बहुत आनंदमय और सुनहरा समय कहा गया है निरन्तर भगवद् अनुभव के कारण बिना कोई बाधा के, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के बहुत शिष्य और अनुयायी थे जो उनके कालक्षेप में नियमित से उपस्थित होते थे। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति ज्यादा अच्छा भाव नहीं था। अमीर परिवार से होने के कारण उनमे अभिमान आ गया था और प्रारम्भ में वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी का आदर भी नहीं करते थे।

एक बार श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी राजा के दरबार में जा रहे थे। राह में वे श्रीपिन्बळगिय पेरुमाल जीयर से मिलते हैं और उन्हें भी राजा के दरबार में चलने के लिये न्योता देते हैं। क्योंकि उनके पारिवारिक परम्परा के कारण जीयर स्वामीजी को भट्टर स्वामीजी के परिवार के प्रति आदर था इसलिये वह उनके साथ चले गए। राजा ने उनको सम्मान देकर उनके हिसाब से आसन दिया। क्योंकि राजा अच्छा शिक्षित था भट्टर की समझधारी परखना चाहते थे और उन्हें श्रीरामायण से एक प्रश्न पूछा। वे कहते हैं “श्रीराम स्वयं कहते हैं कि वे मनुष्य हैं और दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। परन्तु श्रीजटायुजी के अंतिम समय में श्रीराम यह मंगल कामना करते हैं कि वह श्रीवैकुंठ पहुँच जाये। यह अंतर्विरोधी है?”। भट्टर शान्त हो गये और कुछ भी अच्छा अर्थ सहित न समझा सके। कुछ कार्य के कारण राजा का ध्यान दूसरी तरफ चला गया। उस समय भट्टर ने जीयर स्वामीजी के पास जा कर पूछा “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी इसे कैसे समझाते थे?”। जीयर उत्तर देते हैं “श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी” इसे ‘सत्येना लोकान जयति’ श्लोक से समझाते हैं| इसका अर्थ है, एक पूर्ण सत्यवादि मनुष्य सभी संसार का नियंत्रण कर सकता है – इसलिये केवल उनके सच्चाई के ही कारण वह संसार पर विजयी हो सकते हैं। जब राजा पुन: इधर ध्यान करते हैं ,भट्टर जो समझदार थे , राजा को यह बात समझाते हैं और राजा उसी क्षण उस तत्व को स्वीकृत कर भट्टर का बहुत धन के साथ सम्मान करते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति कृतज्ञ होकर भट्टर , जीयर को उन्हें श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से जोड़ने के लिये कहते हैं और उसी क्षण श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर वह राजा द्वारा प्रदान सारा धन श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। भट्टर, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “मैंने यह सारा धन आपके केवल १ वर्णन से प्राप्त किया है” और सारा धन उन्हें अर्पण कर देते हैं। इसके पश्चात वे श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से कहते हैं कि “इतने समय तक मैं आपका अमूल्य साथ / संचालन से वंचित रहा। अभी से मैं आपकी ही सेवा करूँगा और आपसे सम्प्रदाय के तत्त्वों को सीखूँगा”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को गले लगाते हैं और सम्प्रदाय के तत्वों को सिखाते हैं।

श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को पूरी तरह श्रीसहस्त्रगीति का पाठ सिखाते हैं। भट्टर उसे सुबह सुनते अर्थ पर विचार कर हर रात में विस्तार से दस्तावेज बनाते। एक बार उपदेश समाप्त हो जाने के बाद वे उस व्याख्यान को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के चरण कमलों में अर्पित कर देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति कि व्याख्या १२५००० पड़ी को अच्छी तरह से देखते हैं (जो श्रीमहाभारत की तरह लम्बी है)। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी घबरा जाते हैं कि अगर इतने विस्तार से व्याख्या है तो लोग गुरु शिष्य के सीखने / सिखाने के तरीके को भूलकर , ग्रन्थ वाचन कर स्वयं ही किसी अंतिम निर्णय पर आ जायेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी भट्टर को समझाते हैं कि जब पिल्लान ६००० पड़ी व्याख्यान किये (विष्णुपुराण जितना बड़ा) तब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी से आज्ञा ली थी। परन्तु यहाँ भट्टर ने श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से व्याख्यान लिखने के लिये आज्ञा नहीं ली। हालाकि भट्टर ने कहा उन्होंने केवल दस्तावेज बनाया है जो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने कहा है|उन्होंने स्वयं अपने मन से कुछ नहीं लिखा। अन्त में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ग्रन्थ के प्रकाशन को न माने, इसको नष्ट कर दिया।

(ध्यान देना: यतीन्द्र प्रवण प्रभावं में इस घटना को पहचाना गया कि जब आचार्य का परमपद होता है तो शिष्य / पुत्र को उनका सर मुंड़ाना होता है और बाकि और जो शिष्य नहीं हैं उन्हें मुख और शरीर के केश निकालना होता है। जब श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी परमपद को प्रस्थान करते हैं, श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी अपना सर मुंड़ाते हैं जैसे उनके बाकि शिष्य को करना चाहिये। भट्टर के एक भाई यह देखकर दु:खी होते हैं और उनसे शिकायत करते हैं यह कहकर कि श्रीकुरेश स्वामीजी के परिवार में जन्म लेकर क्यों कोई श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के परमपद प्रस्थान के लिये सर मुंड़ाता है। भट्टर अपने भाई को व्यंग्यात्मक ढंग से उत्थर देते हैं “ओ! मैंने श्रीकुरेश स्वामीजी के परम्परा का अपमान किया है। अब आप इसे कैसे सुधारेंगे?”। भट्टर के भाई ऐसे व्यंग्यात्मक शब्द ग्रहण नहीं कर सके और श्रीरंगनाथ भगवान के पास जाकर उनकी इस कार्य के लिये शिकायत करते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान भट्टर को बुलाकर अर्चक के जरिये पूछते हैं कि “जब मैं जीवित हूँ तुमने ऐसा क्यों किया?” (श्रीरंगनाथ भगवान अपने आप को पराशर भट्टर और उनके वंश के पिता मानते हैं)। भट्टर उत्थर देते हैं कि “कृपया मेरे इस अपचार को क्षमा करें”। और आगे कहते हैं “असल में मुझे तो श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति सम्पूर्ण समर्पण होना चाहिये था क्योंकि यह प्राकृतिक है जो भी श्रीकुरेश स्वामीजी (श्रीवैष्णव के प्रति समर्पण) के वंश से आता है वह मुख और शरीर के केश निकालता है। बल्कि मैंने केवल अपना सर मुंडाया जो यह दिखाता है कि मैंने एक शिष्य / पुत्र के नाते बहुत कम अनुष्ठान किया है । क्या मेरे थोड़ा सा आदर के कारण आप नाराज हैं?” भट्टर का श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति समर्पण देखकर श्रीरंगनाथ भगवान बहुत खुश होते हैं और भट्टर को तीर्थ, पुष्प माला और वस्त्र के साथ सम्मान करते हैं। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी की ऐसी महिमा थी।

इन व्याख्यानों में श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी शामिल घटना बतायी गयी है। इसे हम अब देखेंगे:

श्रीसहस्त्रगीति – ९.३ – श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ईडु प्रवेसं (प्रस्तावना) – इस पद में श्रीशठकोप स्वामीजी नारायण नम: (और मन्त्र) कि महिमा बताते हैं। मुख्य ३ व्यापक मन्त्र है (वह मन्त्र जो भगवान कि सर्व उपस्थिती दर्शाता है) वह है अष्टाक्षर (ॐ नम: नारायणाय), शदक्षरम (ॐ नम: विष्णवे) और ध्वाधसाक्षारम(ॐ नम: भगवते वासुदेवाय)। श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि प्रणवम का अर्थ, नम: का अर्थ, भगवान का सर्व उपस्थिती आदि सभी ३ व्यापक मंत्रों में बताया गया है परन्तु आल्वारों के समीप तो नारायण मन्त्र हीं है। ध्यान: नारायण कि महत्वता मुमुक्षुप्पड़ी के शुरुवात में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बोलते हैं।

वार्ता माला में भी श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी से संबन्धित कुछ घटनाये हैं।

२१६ – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी एक बहुत सुन्दर वार्तालाप श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी और श्रीपश्चात् सुन्दर देशिक स्वामीजी के बीच अवतरण किया। देशिक स्वामीजी यह प्रश्न पूछते हैं कि “सभी मुमुक्षु आल्वार जैसे होने चाहिये (पूर्णत: भगवान पर निर्भर और भगवान के अनुभव में हीं रहना)। परन्तु फिर भी हममे में सांसारिक इच्छा होती है। हमें इसका परिणाम (परमपद में कैंकर्य प्राप्ति) कैसे प्राप्त होगा जो आल्वारों को प्राप्त हुआ?” श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उत्तर देते हैं “हालाँकी हमें वहीं उन्नति प्राप्त नहीं होगी जो आल्वारों को प्राप्त हुयी परन्तु अपने आचार्य कृपा से जो पवित्र है, भगवान हमारे मरने और परमपद पहूंचने से पहिले वही भाव (आल्वारों जैसी) हमारे में भी प्रगट करेंगे । इसलिये हमारे परमपद पहूंचने से पूर्व हम पवित्र हो जाएँगे और निरंतर भगवान का कैंकर्य करने की चाह रहेगी”।.

४१० – श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी यह समझाते हैं कि एक श्रीवैष्णव को कैसे होना चाहिये:

संसारियों का दोष देखते समय उनको सुधारने के लिये हम भगवान की तरह उतने सक्षम नहीं हैं इसीलिए उन्हें अनदेखा रहना चाहिये।

सात्विक जनों (श्रीवैष्णवों) में दोष देखते समय, क्योंकि वे पूरी तरह भगवान पर निर्भर हैं वे भगवान की कृपा से अपने को दोष मुक्त करने की क्षमता रखते हैं। हमे उन्हें उनदेखा रहना चाहिये।

जैसे कोई व्यक्ति अपने शरीर पर रसायनिक पदार्थ लगा लेता है तब अग्नि लगने पर भी उसे चोट नहीं लग सकती है वैसे ही हमें भगवद् ज्ञान से ढके हुए रहना चाहिये ताकि सांसारिक इच्छा और मुद्दों से हम प्रभावित नहीं हो सके।

हममें ज्ञान के दो पहलु होनी चाहिये- १) हमे परमपद पहुँचने की बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये जो पूर्णत: अध्यात्मिक है और २) हमे इस संसार बन्धन से छूटने की भी बहुत बड़ी इच्छा होनी चाहिये (जो अज्ञानता का स्थान है)। अभी तक, इस संसार के बारे मे हमारा ज्ञान नादानी की अवस्था जैसे रहना बहुत जरूरी है, परंतु अगर हमे इस संसार से थोडासा भी लगाव रहा तो वह हमे नीचे खींच लेगा और हमे इस संसार मे ही रख लेगा।

अत: हमने श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी के जीवन के सुन्दर अंश देखे। वे बहुत बड़े विद्वान और श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। हम भगवान के चरण कमलों में यह प्रार्थना करते हैं कि हममें भी थोड़ी सी भागवत निष्ठा आ जाये।

श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी तनियन :

लोकाचार्य पदासक्तं मध्यवीधि निवासिनं ।
श्रीवत्सचिन्नवंशाब्दिसोमम् भट्टारार्यम् आश्रये ।।

अडियेन् केशव रामानुज दासन्

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