किडाम्बि आच्चान्

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

kidambi-achan

जन्म नक्षत्र – चित्रा, हस्त

अवतार स्थल – कांचीपुरम

आचार्यरामानुजाचार्य

बचपन में उनका नाम “प्रणतार्तिहरर्” था. ( देवराज अष्टकम में स्वामी तिरुकच्ची नम्बि ने वरदराज स्वामी को बड़े सम्मान और प्यार से प्रणतार्तिहरर् कहके पुकारा.)

उनको श्री रामानुजाचार्य / एम्बेरुमानार के मुख्य रसोइया बनाया गया था. इस फैसले का निर्णय स्वामी तिरुकोष्टियुर नम्बि ने किया था. इस फैसले के पीछे एक दिलचस्प कहानी “६००० पड़ी गुरु परंपरा प्रभावम” और कुछ और पूर्वाचार्य ग्रंथों में लिखा गया है.

kidambi-achan-emperumanar

रामानुजाचार्य गद्यत्रयम् का अध्ययन किये और नित्य ग्रन्थम (तिरुवाराधन क्रम) भी लिखे. इस तरह वे इस श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का पालन और पोषण करते आये. रामानुजाचार्य के काल में भी, आज की तरह,  कुछ एसे लोग थे जो खुद लाभकारी काम नहीं करते और दूसरों को करने भी नहीं देते. ऐसे कुछ लोग श्रीरंगम में थे जो श्री रामानुजाचार्य के विचारण से सहमत नहीं थे. वे व्याकुल पड़े और ऐसी एक अकल्पनीय और दुष्ट कार्य किया जिससे स्वामी रामानुजाचार्य की जान खतरे में पड़ी.

उन्होंने खाने में जहर मिलाकर उसे भीक्षा के रूप में स्वामी रामानुजाचार्य को देने की योजना बनाई. श्री रामानुजाचार्य हर एक घर में, हमेशा की तरह, उस दिन भी भीक्श मांगते आये और उस घर के सामने आ खड़े जिस घर की महिला के हाथ में वो दूषित आहार थी.  स्वामी उस आहार को स्वीकार करते निकल ही पड़े कि उस  औरत के आखों में आँसू आ भरे. वो स्वामी को सूक्ष्म रूप से यह संदेश देना चाहती थी कि वे उस दुष्ट आहार को न छूए. वो अपने पति की इस सादिश का हिस्सा बनना नहीं चाहती थी. वो अपने भीक्श को स्वामी के अन्य भिक्षा से अलग किया और अपने चेहरे में अत्यंत दुख की भावना दिखाई. स्वामी को दण्डवत प्रणाम करने के बाद भारी मन से घर वापस लौटी. स्वामी रामानुजाचार्य को समज में आ गया कि उस भीक्श में कुछ गलत बात है. वे उसे कावेरी नदी में बहा दिया और उस दिन से कठिन व्रत का पालन करने लगे.

तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) , इस घटना के बारे में सुनते ही तुरंत श्रीरंगम आ पहुँचे. स्वामी एम्बेरुमानार भी अपने आचार्य को स्वागत करने गर्मी धूप में कावेरी नदी के किनारे शिष्य-सहित आए. अपने आचार्य को देखते ही स्वामी दंडवत प्रणाम करते हुए उस अत्याधिक गर्म रेत पर अपने आचार्य क़ी आज्ञा क़ी इंतज़ार करते लेटे थे. (हमारी संप्रदाय का एक और विशेष क्रम है कि एक शिष्य, अपने आचार्य को दंडवत प्रणाम करते समय, तभी उठे जब आचार्य कहे ). तिरुकोष्टियुर नम्बि कुछ समय कि देरी की, यह जानने के लिए कि कौन स्वामी रामानुज की इस दिव्यमंगलरूप की ओर तरसता है और इसी से स्वामी की शुभचिंतक की जानकारी भी हो जाएगी.

किडाम्बि आच्चान् तड़प ऊठे और स्वामी रामानुज को तुरंत उठाया और तिरुकोष्टियुर नम्बि से पुछा ” यह कैसा अजीब रिवाज़ है? स्वामी रामानुज को इस गर्मी धूप में इतनी देर लेटे रहने दिया आपने? इस कोमल फूल की यह क्या कठोर परीक्षा कर रहे हैं आप?” किडाम्बि आच्चान की इस फिकर और विनम्रता से प्रसन्न होकर नम्बि विज्ञापन किये ,” तुम ही हो जो स्वामी रामानुज से अत्याधिक प्रेम करते हो. तुम ही उसके शुभचिंतक हो. आज से तुम्हे रामानुज की भीक्षा की जिम्मेदारी सौंपा जाए!!” किडाम्बि आच्चान् खुद को सौभाग्यशाली मानकर उसी दिन से अपने कर्त्तव्य का पालन किया.

हमारे व्याख्यानों में ऐसे कुछ कथाएँ हैं जो स्वामी किडाम्बि आच्चान् के यश और महिमा के बारे में प्रकाश डालते हैं.  उनमे से कुछ उदहारण नीचे देखें :

  • तिरुप्पावै 23  : – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – इस पासुरम के द्वारा आंडाल,  गोपियों और कृष्ण परमात्मा के बीच हुयी सम्भाषण के बारे में बताती है| गोपिका स्त्री श्री कृष्ण से कहते हैं कि उनका कोई आश्रय नहीं है| यह साबित करने के लिए कि उनको श्री कृष्ण के चरण कमल ही एकमात्र शरणस्थान है, एक दिलचस्प कहानी सुनाया जाता है| एक बार स्वामी किडम्बि आच्चान तिरुमालिरुंचोलाई में भगवान अयगर की दर्शन करने निकल पड़े. भगवान अयगर उनको आदेश दिया कि वे कुछ पाठ सुनाये. स्वामी किडम्बि आच्चान “अपराध सहस्रा भाजनम् … अगतिम ..” (आळवन्दार स्तोत्र रत्नम ४८ ) सुनाने शुरू किये. तब भगवान अयगर, नम्बि से अनुशासन की ” जब एम्पेरुमानार के चरणो में आत्मसमर्पण किया है तो खुद को अगतिम कैसे पुकार सकते हो ?”
  • तिरुविरुत्तम 99  – पेरियवाच्चान पिल्लै व्याख्यान  – इसमें एक कहानी के ज़रिये,कूरत्ताळ्वान् की महिमा प्रकाशित की जाती है. एक बार किडाम्बि आच्चान्, कूरत्ताळ्वान् की उपन्यास सुनकर देर से लौटे. एम्बेरुमानार ने पूछताछ की तो बताया कि कूरत्ताळ्वान् की कथा सुनकर देर हो गई. एम्बेरुमानार फिर प्रश्न की कि कालक्षेप किस बात ( पासुरम)  पे हो रहा था. आच्चान ने जवाब दी कि ” पिरन्दवारुं वलरंतवारुं (तिरुवाय्मोई 5.10) व्याख्यखण्ड ” में कालक्षेप हो रहा था. एम्बेरुमानार विवरण से पूछे तो आच्चान ने कहा “कूरत्ताळ्वान् पहले उस अनुच्छेद को पड़े , उस अनुच्छेद के तात्पर्य का विश्लेषण करने लगे और जैसे ही करते रहे उनका दिल पिगल्ने लगा और कूरत्ताळ्वान शोक में डूब गए. कूरत्ताळ्वान् कहने लगे कि नम्माल्वार  बड़े ही अनोखे थे, उनका अनुभव भी कितना अनोखा, अद्बुत और दिव्य था. भगवान से बिछडके, वे जो विरह-ताप में जल रहे थे, उसे ना कोई समज सकता है और ना ही कोई वर्णन कर सकता है. यह कहकर कूरत्ताळ्वान् कालक्षेप की अंत कर दी. इसे सुनकर एम्बेरुमानार अत्यंत खुश हुए और कूरत्ताळ्वान् की शुद्ध ह्रदय और उनकी भक्ति की प्रशंसा की.
  • तिरुवाय्मोळी  4.8.2 नंपिल्लै ईडु व्याख्यान  – नम्माल्वार हमेशा भगवान की सोच में ही डूबे रहते हैं. कैंकर्य प्राप्ति होते ही भगवान की करुण्यता से अभिभूत हो जाते हैं.  नम्माल्वार के दिव्य भावनाओं को स्थापित करते हुए एक कहानी है जिसे हम अब देखेंगे. एक बार ददियारादन के समय किडाम्बि आच्चान् सभी श्री वैष्णव जनों को पानी पिलाने का कैंकर्य कर रहे थे. ( उन दिनों, हर एक श्री वैष्णव के मुंह में सीधा पानी पिलाते थे , आज की तरह हर एक को अलग अलग गिलास दिया नहीं जाता था ) गोष्टी में से एक श्री वैष्णव जब पानी मांगे, तो आच्चान उस श्री वैष्णव के बगल से पानी पिला रहे थे. इसे देखकर एम्बेरुमानार ने आच्चान को समझाया कि सामने से पानी पिलाते हैं, बगल से नहीं ताकि उस श्री वैष्णव महान को तकलीफ ना पहुंचे. एम्बेरुमानार के काल में भागवत कैंकर्य को  इतनी महत्व दी जाती थी. इसे सुनकर आच्चान अति आनन्दित हुए और स्वामी एम्बेरुमानार को शुक्रिया अदा किया और नम्माल्वार के शब्दों से उनकी प्रशंसा करने लगे , “पणिमानम् पियैयामे अडियेनै पणी कोन्ड” अथार्थ ” मैं उस एम्बेरुमानार से कृतज्ञ हूँ जो मेरे जैसे अनुपयुक्त को भी भागवत कैंकर्य में उपयोग करे!”
  • तिरुवाय्मोळी 6.7.5नंपिल्लै ईडु व्याख्याननम्माल्वार हमेशा दिव्यदेशोँ की सौन्दर्यता की प्रशंसा करते रहते थे. उनका मानना था कि मनुष्य को आँख दिया गया है, एम्पेरुमान की इस सौंदर्य दिव्यदेशोँ  को देखने के लिए और इनकी सुंदरता में मोहित होने के लिए. किडाम्बि आच्चान् और मुदलियान्डान् (दाशरथि स्वामीजी) एक बार अप्पकुड़थ्थान मंदिर की सुंदरता में डूब गए थे.
  • तिरुवाय्मोळी 10.6.1 – किडाम्बि आच्चान्, श्री पराशर भट्टर् की ओर बहुत प्यार और विनम्रता दिखाई. इसे देखकर एक स्वामी उनसे पूछे कि उनकी इस व्यवहार का कारण क्या था. आच्चान ने समझाया , ” आप नहीं जानते उस दिन क्या हुआ और स्वामी एम्बेरुमानार ने हम सब से क्या कहा. एक दिन जब भट्टर अपने युव में थे , तब पेरिय पेरुमल ( श्रीरंगम ) की सन्निधि में आ पहुंचे. एम्बेरुमानार भट्टर को भीतरी मन्दिरगर्भ में ले चले और उनको पेरिय पेरुमल के सामने श्लोक पाठ करने को कहा. पाठ समाप्ति के बाद वे दोनों बाहर आये और एम्बेरुमानार अपने शिष्यों को ये आदेश दिया की सारे शिष्य भट्टर से ऐसे व्यवहार करे जैसे वे एम्बेरुमानार से करे. इसलिए मेरे मन में भट्टर की तरफ बहुत मर्यादा और प्यार है ” .

तिरुवेकका में किडाम्बि नायनार ( किडाम्बि आच्चान् वंश के संतति ) अळगिय मनवाळ मामुनि को श्री भाष्यम् सिखा रहे थे. किडाम्बि नायनार के अनुरोध पर स्वामी मनवाळ मामुनि अपने स्वाभाविक रूप ( आदि सेशन का रूप) को नायनार को दिखाते हैं. उस समय से किडाम्बि नायनार स्वामी मामुनि के ओर अधिक से अधिक लगाव महसूस करने लगे.

इस प्रकार स्वामी किडाम्बि आच्चान् की शानदार जीवन की झलक हमें मिली है. वे पूरी तरह से भागवत कैंकर्य और निष्ठा में तल्लीन थे और स्वामी एम्बेरुमानार के प्रिय शिष्यों में से एक थे. आज हम सब स्वामी किडाम्बि आच्चान् के शरण कमल में प्रार्थना करे कि हमारे इस जीवन काल में, उस कैंकर्य सागर की एक बूंद हम भी पी सके.

किडाम्बि आच्चान् तनियन (ध्यान श्लोक ) :

रामानुज पदाम्भोजयुगली यस्य धीमतः
प्राप्यम् च प्रापकम् वन्दे प्रनाथार्थीहरम गुरूम्

अडिएन जानकी रामानुज दासि

Source: http://guruparamparai.wordpress.com/2013/03/31/kidambi-achan/

archived in https://guruparamparaihindi.wordpress.com, also visit http://ponnadi.blogspot.com/

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://guruparamparai.wordpress.com
srIvaishNava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

Advertisements

11 thoughts on “किडाम्बि आच्चान्

  1. Pingback: श्री-गुरुपरम्पर-उपक्रमणि – 2 | guruparamparai hindi

  2. Pingback: 2015 – May – Week 2 | kOyil – srIvaishNava Portal for Temples, Literature, etc

  3. Pingback: वन्गि पुरत्तु नम्बि | guruparamparai hindi

  4. Pingback: पिल्लै उरंगा विल्ली (धनुर्दास स्वामीजी) | guruparamparai hindi

  5. Pingback: praNathArthihara (kidAmbi AchchAn) | AchAryas

  6. Pingback: तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) | guruparamparai hindi

  7. Pingback: praNathArthihara (kidAmbi AchchAn) | AzhwArs/AchAryas

  8. Pingback: वेदांताचार्य | guruparamparai hindi

  9. Pingback: तिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान | guruparamparai hindi

  10. Pingback: विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३ | srIvaishNava granthams in hindi

  11. Pingback: विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – | SrIvaishNava granthams in hindi

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s