अऴगिय मणवाळ मामुनि

श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

हमने अपने पूर्व अनुच्छेद मे तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै की चर्चा की थी । आगे बढ़ते हुए ओराण वाऴि के अगले आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें मे चर्चा करेंगे ।

 

श्री वरवरमुनि

तिरुनक्षत्र – आश्वयुज मास, मूल नक्षत्र

अवतार स्थल – आऴ्वारतिरुनगरि

आचार्य – तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै

शिष्यगण

  • अष्ट दिक गज – 1) पोन्नडिक्काल जीयर 2) कोइल अण्णन 3) पतंगि परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर 4) तिरुवेंकट जीयर 5) एऱुम्बियप्पा 6) प्रतिवादि भयन्करमण्णन 7) अप्पिळ्ळै 8) अप्पिळार
  • नव रत्नगळ – 1) सेनै मुडलियाण्डान नायनार 2) शठगोप दासर (नालूर सिट्रात्तान) 3) कन्दाडै पोरेट्रु नायन 4) येट्टूर सिंगराचार्य 5) कन्दाडै तिरुक्कोपुरन्तु नायनार 6) कन्दाडै नारणप्पै 7) कन्दाडै तोऴप्परैप्पै 8) कन्दाडै अऴैत्तु वाऴवित्त पेरुमाळ | इसके अलावा उनके कई अन्य शिष्य थे जो अनेक तिरुवंश, तिरुमाळिगै, दिव्यदेश इत्यादि के सदस्य थे ।

 स्थल जहाँ से परमपद को प्रस्थान हुए – श्री रंग / तिरुवरंगम

ग्रंथ रचना सूची – श्री देवराज मंगलम्, यतिराज विंशति, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवाय्मोऴि नूट्रन्दादि, आर्ति प्रबंधम्

व्याख्यान सूची – मुम्मुक्षुप्पाडि, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्, आचार्यहॄदयम्,  पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि [पेरियवाच्चान पिळ्ळै का व्याख्यान जो नष्ट हो गया], रामानुज नूट्ट्रन्दादि

प्रमाण तिरट्टु [श्लोक संग्रह, शास्त्र टिप्पणि विशेषतः] – ईदु छत्तीस हज़ार पाडि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम्, तत्वत्रयम्, श्रीवचनाभूषणम्

अऴगियमणवाळ पेरुमाळनायनार आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री अनैतुलगुम् वाऴप्पिरन्त यतिराज के अवतार के रूप मे प्रकट हुए । वे कई अन्य नामों के भी जाने गये है जो इस प्रकार है – अऴगियमणवाळमामुनि, सुन्दरजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुमुनि, रम्यजामात्रुयोगी, वरवरमुनि, यतीन्द्रप्रणवर, कान्तोपयन्त, रामानुजपोन्नडि, सौम्यजामात्रुयोगीन्द्र, कोइल शेल्वमणवाळमामुनिगल् इत्यादि । वे पेरियजीयर, वेळ्ळैजीयर, विश्तवाकशिखामणि, पोइल्लादमणवाळमामुनि इत्यादि उपाधियों से भी प्रसिद्ध है ।

मणवाळमामुनि के जीवन का संक्षिप्त वर्णन –

  • श्रीपेरियपेरुमाळ के विशेषनुग्रह से आदिशेष के अवतार के रूप मे आऴ्वार तिरुनगरि मे प्रकट हुए ।
  • अपने माताश्री के जन्मस्थान मे वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है । समयानुसार उनका विवाह भी सम्पन्न होता है ।
  • श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के वैभव को सुनकर, वे आऴ्वारतिरुनगरि जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लेते है और यह हमने पूर्वलेख मे प्रस्तुत किया है ।
  • उनकी पत्नी एक नवजातशिशु को जन्म देती है जिनका नामकरण स्वयम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै उस शिशु का नाम एम्मैयनिरामानुशन् रखते है । रामानुजनूट्ट्रन्दादि मे श्री रामानुज शब्द अष्टोत्तरशत बार प्रयोग किया गया है जिसके आधारपर वे इस शिशु का नामकरण करते है ।
  • तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के परमपद को प्रस्थान होने के बाद श्री वरवरमुनि अगले दर्शनप्रवर्तक हुए ।
  • श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखते है ।
  • श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानकर श्री अऴगियवरद दास ( वानमामलै नाम के जगह से थे ) उनके प्रथम शिष्य हुए और उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर संयासाश्रम स्वीकार किये और उनकी सेवा मे संलग्न हुए । श्री अऴगियवरद दास को उनके जन्मस्थान के आदारपर वानमामलै जीयर और पोन्नडिक्कालजीयर का दास्यनाम दिया गया । पोन्नडिक्कालजीयर मायने सुवर्णनिर्माण – जिन्होने आने वाले कल मे बहुतों को पथप्रदर्शन कराया ।
  • उनके आचार्य के दिव्यौपदेश का स्मरण करके वे नम्माऴ्वार से निवेदन किये और फिर श्रीरंग की ओर रवाना हुए और जहाँ से उन्होने इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार किया ।
  • श्रीरंग की ओर जाते समय बींच मे श्रीविल्लिपुत्तूर आण्डाळ रंगमन्नार और तिरुमालिरुन्चोलैयऴगर का मंगलाशासन करते है ।
  • श्रीरंग पहुँचकर उन्होने कावेरी तट पर अपना नित्यकर्मानुष्टान सम्पूर्ण किया । उसके पश्चात श्रीरंग के सारे श्रीवैष्णव सामूहिक रूप से उनका स्वागत दिव्यभव्य रूप से करते है और स्थानीय श्रीवैष्णवों के घरों से प्राप्त पुष्कर जल से विधिपूर्वक और क्रम मे एम्पेरुमानार, नम्माऴ्वार, पेरिय पिराट्टि, सेनै मुदलियार, पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ इत्यादियों का मंगलाशासन करते है । श्री पेरुमाळ उनका स्वागत उसी प्रकार से करते है जिस प्रकार श्री रामानुजाचार्य का स्वागत हुआ था और अपना शेष प्रसाद और शठगोप से अपना अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के घर जाकर सत्सांप्रदाय के प्रति उनका और उनके छोटे भाई श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार का योगदान को गौरान्वित करते है ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने उन्हे उपदेश दिया की वे अपने निवास समय को स्थाई करे अर्थात वे अपना शेष काल श्रीरंग मे सत्सांप्रदाय पर आधारित विषयतत्वों का बोध करते हुए भगवद्-भागवत्कैंकर्य करें । वे इस कैंकर्योपदेश को स्वीकार करते है और मुसलमानों के आक्रमण मे लुप्त ग्रंथों को खोजने के प्रयास मे जुट जाते है ।
  • एक बार श्री पोन्नडिक्काल जीयर एक वैष्णव उत्तमनम्बि के कैंकर्य के बारें मे श्री वरवरमुनि से शिकायत करते है और इससे उन्हे उपदेश मिलता है की वे इस वैष्णव को पूर्ण रूप से भगवद्-भागवत्कैंकर्य मे संलग्न करे ।
  • उसके पश्चात वे श्री तिरुवेंकटम् जाने की इच्छा व्यक्त करते है और पोन्नडिक्काल जीयर के साथ रवाना होते है । बींच मे श्री तिरुक्कोवलूर और तिर्क्कडिगै दिव्यदेशों का मंगलाशासन भी करते है ।
  • श्री तिरुमल (तिरुवेंकटम्) मे श्री रामानुजाचार्य द्वारा नियुक्त श्रीवैष्णव पेरियकेळ्वियप्पन्जीयर एक स्वप्न देखते है जिसमे व्यक्ति जो साक्षत पेरियपेरुमाळ जैसे प्रतीत होते है उनके साथ एक संयासि उनके चरणकमलों पर आश्रित उनकी सेवा मे जुटे है । स्वप्न से बाह्य दुनिया मे आकर वे स्थानीय श्रीवैष्णवों से इन दोनो महपुरुषों के बारे मे जानने की कोशिश करते है । उन्हे यह पता चलता है की एक व्यक्ति श्री वरवरमुनि और दूसरे पोन्नडिक्कालजीयर (तिरुवाय्मोऴि ईट्टु पेरुक्कर आऴ्गिय मणवाळ पेरुमाळ नायनार और उनके प्राण सुक्रुत) । आश्चर्य की बात यह ती की वे दोनो तिरुमल की ओर ही आ रहे थे । यह जानकर अती प्रसन्न होकर उन्होने इन दोनो के लिये व्ययस्था करते है । श्री वरवरमुनि और पोन्नडिक्कालजीयर श्री तिरुवेंकटमलै, गोविन्दराज और नरसिंह इत्यादियों और अंत मे तिरुवेंकटमुदायन् का मंगलाशासन करते है । तिरुवेंकटमुदायन् बहुत प्रसन्न होकर अपना प्रसाद और श्री शठगोप का अनुग्रह देते है और अन्ततः वे दोनो वहाँ से कांचिपुरम की ओर रवाना होते है ।
  • उसके पश्चात श्री कांचिपुरम पहुँचकर वे दोनो श्री देवराजपेरुमाळ का मंगलाशासन करते है और सक्षात श्री देवराजभगवान कहते है की श्री वरवरमुनि स्वयम श्री रामानुजस्वामि है और अन्ततः अपना प्रसाद और शठारी का अनुग्रह प्रदान करते है ।
  • उसके बाद मे श्री रामानुजाचार्य के जन्मस्थान श्रीपेरुम्बुदूर पहुँचकर उनके अनुभवों का स्मरण करते हुए वहाँ उन्होने मंगलाशासन करते है ।
  • फिर श्रीपेरुम्बुदूर से कांचिपुरम लौटकर वे श्रीभाष्य का बोध किडाम्बिनायनार (जो किडाम्बि आच्चान के वंशज थे) के आध्वर्य मे करने लगे । जब कुछ श्रीवैष्णव उनसे कुछ तत्वविषयों पर तर्क करने आते है तो वे अपने आचार्य के सदुपदेश का स्मरण करके कहते है की उनके आचार्य ने कहा की वे केवल भगवद्विषय के बारें मे ही चर्चा, प्रसार और प्रचार इत्यादि करें । परन्तु स्थानीय श्रीवैष्णव हितैषी के निरन्तर निवेदन से उन्होने उन सभी को तर्क मे पराजित किया और अन्ततः वे सारे उनके चरणकमलों का आश्रय लिये ।
  • किडाम्बिनायनार श्री वरवरमुनि के प्रतिभा को देखकर उनसे विनती किये की वे उन्हे उनको उनका मौलिक रूप दिखाये । श्री वरवरमुनि ने तुरन्त आदिशेष का मौलिक रूप का दर्शन दिया । यह मौलिक रूप देखकर अचम्भित किडाम्बिनायनार उनके प्रती आकर्शित हुए और उस समय से वे उनके प्रती अनुरक्त हुए । श्रीभाष्य का बोध सम्पूर्ण करने के पश्चात श्री वरवरमुनि वहाँ से विदा होकर श्रीरंग लौट गए ।
  • उनको वापस श्रीरंग मे देखकर श्री पेरियपेरुमाळ बहुत खुश होते है और उनसे दर्ख़्वास्त करते है की वे अभी भविष्य यात्रा स्थगित करें और इधर ही रह जाए ।
  • उसी समय, श्री वरवरमुनि के रिश्तेदारों से समाचार प्राप्त होता है की कुछ अपवित्रता है और इसके कारण उनकी सेवा मे बाधा होती है । तत्पश्चात उन्होने संयासाश्रम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के संयासिशिष्य श्री शठगोपजीयर से लिया और यही समाचार देने वे श्री पेरियपेरुमाळ से मिलने जाते है । यह जानकर श्रीपेरियपेरुमळ अत्यन्त खुश होकर उनका स्वागत बहुत भव्यरूप से करते है और कहते है की वे संयासाश्रम का दास्यनाम वही रखे जो उनका वर्तमान नाम था (क्योंकि वे चाहते थे की उनके आचार्य का नाम वही हो) और उनको पल्लविरायन मठ दिये जहाँ वे दिव्यप्रबंधों और अन्यशास्त्रों का बोध करें । कुछ इस प्रकार से वे श्रीअऴगियमणवाळपेरुमाळनायनार से श्रीअऴगियमणवाळमामुनि हुए । श्रीरंग के सारे हितैषी श्रीवैष्णवो श्री उत्तमनम्बि के आध्वर्य मे उनके मठ जाकर खुशी खुशी “मणवाळमामुनिये इन्नुमोरु नूट्ट्रान्डिरुम्” गाने लगे ।
  • वे अपने शिष्यों को श्रीपोन्नडिक्कालजीयर के आध्वर्य मे मठ का पुरने मठ का पुनर्निर्माण करने का आदेश देते है । उनके अनुग्रह से शिष्य एक नया मठ का निरमाण करते है और तो और इसी प्रकार पिळ्ळैलोकाचार्य के घर को नवीनीकरण कर दिव्यभव्य मण्डप का निर्माण करते है । तत्पश्चात वे अपना सार दिन केवल ईडु ग्रंथ, अन्य दिव्यप्रबंध, श्री रामानुजाचार्य के वैभव, श्रीवचनभूषणदिव्यशास्त्र इत्यादि के कालक्षेप के माध्यम से बिताने लगे ।
  • कहते ही जंगल मे लगी आग जिस प्रकार फैलता है उसी प्रकार श्री वरवरमुनि का विख्यात चारों ओर फैलता गया । इसी कारण कई श्रीवैष्णवों मुख्यतर तिरुमंजनमप्पा (जो पेरियपेरुमाळ के नित्यकैंकर्यपर थे), उनकी बेटी (आय्चियार), पट्टर्पिरान इत्यादियों के उनके चरणमकमलों का आश्रय लिया ।
  • सिंगरैयर नामक गाँव से वळ्ळुवराजेन्द्र नाम के एक प्रपन्नभक्त प्रत्येक दिन श्री वरवरमुनि के आश्रम को सब्जियाँ भेजा करते थे । एक दिन उनके स्वप्न मे श्री भगवान ने स्वयम आकर कहा की उन्हे तुरन्त श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये जो साक्षात आदिशेष के अवतार है । वळ्ळुवराजेन्द्र जी तुरन्त श्रीरंग गए और वहाँ उन्होने कोईलकन्दादै-अण्णन के घर मे आश्रय लिया और तत्पश्चात इस स्वप्न का वर्णन किया । अण्णन यह सुनकर अचम्भित रह गए और फिर सोने चले गए । सोते वक्त उन्हे यह एहसास हुआ की साक्षात एम्पेरुमानार (श्रीरामानुजाचार्य) और श्री मुडलियाण्डान प्रकट हुए और श्रीरामानुजाचार्य ने कहा की वे ही श्री वरवरमुनि है और कोई अन्य नही और मुडलियाण्डान ने कहा की उन्हे तुरन्त उनका शरण लेना चाहिये । उसके अगले दिन कोईलकन्दादै-अण्णन अपने सभी बन्धुवों के साथ जाकर श्री पोन्नडिक्कालजीयर के पुरुशाकार के माध्यम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त किये । श्री वरवरमुनि ने उन सभी को स्वीकार किया और उनको पंञ्चसंस्कार प्रदान किये ।
  • तत्पश्चात श्री आचियार के सुपुत्र ( तिरुमंजनमप्पा के पोते ) श्री वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेने की इच्छा व्यक्त किये । हलांकि श्री वरवरमुनि स्वीकार तो करते है परन्तु अपने प्रिय शिष्य श्री पोन्नडिक्कालजीयर के द्वारा उनका पंञ्चसंस्कार सम्पन्न होता है । यहाँ श्री पोन्नडिक्कालजीयर पहले इनकार करते है परन्तु अपने आचार्य के मनोभावना को समझते हुए उनके आसन मे बैठकर उनका तिरुच्चक्र और तिरुवाऴि स्वीकार कर अप्पाचियारण्णा को पंञ्चसंस्कार प्रदान करते है ।
  • एम्मैयन इरामानुशनन् ( श्रीवरवरमुनि के पूर्वाश्रम मे पूत्र ) दो दिव्य पुत्रों अऴगियमणवळ पेरुमाळनायनार (जो वरवरमुनि के प्रती उनकी अनुरक्ति और कैंकर्य से अन्ततः जीयरनायनार से जाने गए ) और पेरियाऴ्वारैयन को जन्म देते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपनी इच्छानुसार श्री पेरियपेरुमाळ की आज्ञा लेकर नम्माऴ्वर का मंगलशासन हेतु आऴ्वारतिरुनगरि निकल पडे । वहाँ पहुँचकर उन्होने तामिरभरणि नदी के तट पर अपना नित्यकर्मानुष्ठान सम्पूर्ण कियाऔर तत्पश्चात भविष्यदाचार्य (श्री रामानुजाचार्य), तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, तिरुवाराधन पेरुमाळ् इनवायर् तलैवन, नम्माऴ्वर और पोलिन्दु निन्ऱ पिरान् इन सभी का मंगलशासन किया ।
  • एक बार उन्हे आचार्य हृदय के कुछ सूत्रों मे संदेह होता है और उस समय वह अपने सब्रह्मचारि दोस्त तिरुनारायणपुरतु आयि के बारे मे सोचते है । यह सोचते हुए श्री वरवरमुनि अपने दोस्त से मिलने हेतु रवाना हुए । परन्तु आऴ्वार तिरुनगरि के सर्हद मे वरवरमुनि उन्से मिलते है जो तिरुनारायणपुरम् से खुद चलके आये । एक दूसरे को देखकर अती प्रसन्न हुए और गले लगाये । इस मिलन की खुशी मे श्री वरवरमुनि आयि पर एक तनियन की रचना करते है और उसी प्रकार श्री आयि भी एक पासुर की रचना करते है जिसमे वह उनसे पूछते है की क्या आप श्रीमान स्वयम एम्पेरुमानार है या नम्माऴ्वार है या भगवान है । कुछ दिनो के पश्चात श्री आयि तिरुनारायणपुरम लौटते है और श्री वरवरमुनि आऴ्वार तिरुनगरि मे रह जाते है ।
  • कहा जाता है कि ऐसे कृदृष्टि लोग थे जो श्री वरवरमुनि के वैभव से जलते थे । एक बार उन सभी ने श्री वरवरमुनि के मट्ट को चुपके से आग लगा दिया । श्री वरवरमुनि अपने स्वस्वरूप आदिशेष का रूप धारण कर आग से घिरा हुए मट्ट से बचकर स्थानीय श्रीवैष्णवों के समूह के मध्य मे खडे हुए । उसके पश्चात स्थानिय राजा को मालूम पडा की यह नीच कार्य किन लोगों ने किया और उन्हे दण्ड देना उचित समझा । श्री वरवरमुनि अपने कारुण्यता को प्रकाशित करते हुए कहे – उन सभी को माफ़ करे और उन्हे दण्ड ना दे । उनके करुणाभाव को देखकर उन सभी का हृदय परिवर्तन हुआ और उन सभी ने उनके चरणकमलों का आश्रय लिया । स्थानीय राजा श्री वरवरमुनि के इस वैभव को देखकर उनसे पंञ्चसंस्कार प्राप्त किया और इसके पश्चात राजा ने आऴ्वारतिरुनगरि और तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्यदेशों मे बहुत साराकैंकर्य किया ।
  • श्री वरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्य कैंकर्य जारी किये । उसी समय एरुम्बि गाँव के श्री एरुम्बिअप्पा श्री वरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे । श्रीवरवरमुनि श्रीरंग वापस लौटकर अपना नित्यकैंकर्य जारी किये। उसी समय एरुम्बि गाँव  के श्रीएरुम्बिअप्पा श्रीवरवरमुनि के वैभव को जानते है और उनके दर्शन हेतु निकल पडे। अपने गाँव पहुँचकर जब वह श्रीएम्पेरुमान चक्रवर्ति-तिरुमगन सन्निधि का द्वार खोलने का प्रयास किये तो द्वार नही खोल पाये । चकाचौन्द एरुम्बिर्यप्पा भगवान कहते है – हेएरुम्बियप्पा ! तुम ने बहुत ही बडा भागवतापचार किया है क्योंकि तुमने श्री आदिशेष के स्वरूप श्रीवरवरमुनि के शेषप्रसाद ग्रहण नही किया अतःतुम तुरन्त जाकर उनके चरणकमलों का आश्रय लो और प्रसाद ग्रहण करो और उन की सेवा करो । पछतावा महसूस कर एरुम्बियप्पा तुरन्त श्रीरंग लौटकर श्रीवरवर मुनि के चरणकमलों का आश्रय लेते है । श्रीवरवरमुनि के प्रातःकाल और सन्ध्याकाल दिनचर्या वैभव को एक बहुत खूबसूरत ग्रंथ मे संग्रहित किये जिसे हम पूर्वदिनचर्या और उत्तरदिनचर्या से नाम से जानते है ।
  • जीयर श्रीकन्डाडै अण्णन जिन्होने अपने बाल्य अवस्था मे उत्तमप्रतिभा दर्शाया है उनका प्रशंसा करते है।
  • अप्पिळ्ळै और अप्पिळार श्रीपोन्नडिकाल जीयार के पुरुषाकार के माध्यम सेश् रीवरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लिये। एरुम्बियप्पा श्रीवरवरमुनि का व्यक्तिगत समीपता छोडकर अपने गाँव चले गये जहाँ उन्होने श्रीवरवरमुनि के वैभव का प्रचार प्रसार किया ।
  • एक बार उत्तमनम्बि जो श्रीवैष्नवों मे प्रख्यात हैव ह पेरियपेरुमाळ का तिरुवालवट्टम्कैंकर्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवरवरमुनि श्रीपेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करने हेतु प्रवेश किये। उन्हे प्रवेश करते हुए देखकर श्रीउत्तमनम्बि उन से कहे – कृपयाकर आप यहाँ से प्रस्थान करे क्योंकि भगवान का आन्तरिक सेवा हो रही है। यह सुनकर वरवरमुनि वहाँ से चले गये। सेवा के पश्चात थके नम्बि थोडि देर विश्राम लेते है । उस समय उनके सपने मे श्री पेरियपेरुमाळ आकर अपने निजसेवक श्रीआदिशेष की ओर इशारा करतुए हुए कहते हैहे नम्बि ! श्री मामुनि स्वयम श्रीआदिशेष है । उठने के तत्पश्चात अपने अपचार को जानकर मामुनि के मट्ट की ओर दौडे । मामुनि से मिलकर उनसे अपने अपराध की क्षमा मांगे और उनके चरनकमलों का आश्रय लिया और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने लगे ।
  • एक श्रीवैष्णवी शठगोप कोत्ति आय्चियार से अरुळिचेयल सीख रही थी । दोपहर के समय जब श्री वरवरमुनि एकान्त मे विश्राम ले रहे थे तब यह अम्माजी मुख्य प्रवेश द्वार के रंध्र से झाँकती है तो यह देकती है की श्री वरवरमुनि का असली स्वरूप श्री आदिशेषजी का है । परन्तु उसी समय एक आवाज़ से श्री वरवरमुनि उठते है और श्री वैष्णव अम्माजी से पूचते है की आपने क्या देखा  ? श्री अम्मजी ने साफ़ साफ़ बता दिया उन्होने क्या देखा । यह जानकर श्री वरवरमुनि कहे आप श्री यह बात गुप्त रखना और फिर वहा से चले गए ।
  • श्री वरवरमुनि निर्णय लेते है की अब उन्हे रहस्यग्रंथों पर टिप्पणि लिखनी चाहिये । पहले वह रहस्यग्रंथों जैसे मुम्मुक्षुप्पडि तत्वत्रय श्रीवचनभूषण पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणि लिखते है जिसमे वेद इतिहास पुराण वेदान्त दिव्यप्रबंधों इत्यादि संदर्भों से सिद्धान्तनिरूपण व्यक्त किये है । तत्पश्चात रामानुजनूत्रन्दादि, ज्ञानसारम्, प्रमेयसारम् (जो चरमोपाय – श्रीआचार्यनिष्ठा को दर्शाता है यानि आचार्य ही सब कुछ) की टिप्पणि भी लिखे ।
  • स्थानीय श्रीवैषणवों श्री वरवरमुनि से निवेदन् करते है कि वह तिरुवाय्मोऴि दिव्यप्रबंध पर व्याख्या करे । श्री वरवरमुनि भगवान की निर्हेतुक कृपा और आचार्य कृपा से तिरुवाय्मोऴि नूत्तन्दादि ग्रंथ की रचना करते है । यह अद्वितीय ग्रंथ जो वेन्पा भाषा शैली मे लिखी गई है । यह याद करने मे सरल होता है परन्तु लिखने मे अति कठिन होता है । इस ग्रंथ मे वरवरमुनि श्री तिरुवाय्मोऴि के प्रत्येक पदिगम् (दस पासुर) के शुरुवात और अन्त के शब्दों का प्रयोग एक एक पासुर मे किये है । प्रत्येक पासुर के शुरुवात के दो वाक्य श्री तिरुवाय्मोऴि के पदिगम् का सार बतलाता है और अन्त के दो वाक्य श्री नम्माऴ्वार की प्रशंसा करता है ।
  • पूर्वोक्त श्रीवैष्णव श्री वरवरमुनि से निवेदन करते है कि वह पूर्वाचार्य के मूल सिद्धन्तों और उपदेशों का वर्णन करते हुए एक ग्रंथ प्रस्तुत करे । श्री वरवरमुनि तुरन्त  उपदेशरत्तिनमालै ग्रंथ की रचना करते है जिसमे वह पूर्वाचार्यों के जन्म-नक्षत्र, जन्मस्थल, उनके वैभव, श्री रामानुजाचार्य के अपार कारुण्य ( करुणा ), तिरुवाय्मोऴि के व्याखायन, ईडु महाग्रंथ की रचना, उसका प्रचार प्रसार, श्री पिळ्ळैलोकाचार्य के अवतार का वर्णन, उनकी श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र का वैभव । इसी ग्रंथ वह कहते है कि श्री तिरुवाय्मोऴि का सार श्री वचनभूषणदिव्यशास्त्र ही है और अन्ततः इन सभी के अर्थों का स्पष्टीकरण करते है ।
  • एक बार कुछ मायावादि उनसे तर्क-वितर्क करने हेतु उनके समक्ष जाते है, परन्तु श्री वरवरमुनि यह तिरस्कार करते है क्योंकि वह अपना उसूल “तर्क-वितर्क नहि करेंगे केवल् भगवद्-विषय पर ही चर्चा प्रसार प्रचार करेंगे” का उल्लंघन नही करना चाहते थे । इसके विपरीत वह अपने शिष्य वेदलप्पै को उन मायावादियों से तर्क-वितर्क करने के लिये कहते है । श्री वेदलप्पै बहुत आसानी से उन सभी को पराजित करते है । उसके पश्चात वेदलप्पै अपने मूल निवास स्थान को त्यागते है ।
  • इसी दौरान श्री प्रतिवादि भयंकर अण्णन (जो कांचिपुरम के एक प्रख्यात विद्वान थे) अपनी पत्नी के साथ श्री श्रीनिवास भगवान की तिरुमंजन सेवा तिरुमला मे कर रहे थे । एक बार श्रीरंग से आए एक श्रीवैष्णव भगवान के तिरुमंजन सेवा के समय उनसे मिलते है और वह श्री वरवरमुनि के वैभव का वर्णन करते है । श्री वरवरमुनि के वैभव को सुनने के बाद, अण्णाजी अति प्रसन्न होते है जिसकी वजह से वरवरमुनि से मिलने की आकांक्षा व्यक्त किये । परन्तु इस प्रसन्न अवस्था मे वह यह भूल जाते है कि भगवान के श्रीपादतीर्थ मे परिमल (इलायचि) नही डाले और अर्चकस्वामि को श्रीपादतीर्थ देते है । जब उन्हे यह एहसास होता है तो वह दौडते हुए इलायचि लेकर आते है और अर्चकस्वामि के यह कहते है । अर्चकस्वामि कहते है कि बिना इलायचि के यह श्रीपादतीर्थ बहुत सुगंधित और मीठा हो गया है । यह सुनकर अण्णाजी समझ गए कि यह श्री वरवरमुनि के वैभव से यह संभव हुआ है और तुरन्त श्रीरंग की ओर निकल पडे । वह श्रीरंग पहुँचने के तदंतर श्री वरवरमुनि के मठ्ठ पहुँचे और चुपके से वरवरमुनि के कालक्षेप को सुनने लगे । श्री वरवरमुनि उस समय तिरुवाय्मोऴि के चौथे शतक के दसवाँ पासुर (ओन्रुम् देवुम् .. 4.10) कई शास्त्रों के आधारपर समखा रहे थे ।  यह पासुर भगवान श्रीमन्नारायण के परत्व को दर्शाता है । श्री अण्णाजी वरवरमुनि के ज्ञान और प्रस्तुतिकरण को देखर दंग रह गए । इसी दौरान श्री वरवरमुनि तीसरे पासुर समझाते हुए रुक गए और गम्भीर आवाज़ मे कहे – अगर अण्णजी का आऴ्वार से संबंध होगा तो ही आगे सुने वरना नही सुने यानि ओराण्वळि गुरुपरंपरा संबंध । तत्पश्चात अण्णाजी ने श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशशन किया । श्री पेरियपेरुमाळ अपने अर्चक स्वामि से उन्हे उपदेश देते है की आप श्रीमान को वरवरमुनि के चरणकमलों का आश्रय लेना चाहिये और इस प्रकार विलक्षण संबन्ध प्राप्त करे ।  अण्णाजी श्री पोन्नडिक्काल जीयर के पुरुषाकार के माध्याम से श्री वरवरमुनि का संबन्ध प्राप्त करते है और कुछ समय तक श्रीरंग मे निवास करते है ।
  • तदन्तर फिर से श्रीवरवमुनि तिरुमला की यात्रा मे जाते है । यात्रा के बींच मे श्री कांञ्चिपुर पेररुळाळ का मंगलाशासन करते है और कुछ दिनो तक कांञ्चिपुरम् मे निवास करते है ताकि अन्य श्रीवैष्णवों का उद्धार हो । वह अपने शिष्य अप्पाचियारण्णा को उपदेश देते है कि वह कांञ्चिपुरम् मे उनके प्रतिनिधि बनकर निवास करे । यह सदुपदेश देकर वरवरमुनि तिरुमला की ओर तिरुकडिगै, एरुम्बि, तिरुप्पुट्कुऴि इत्यादि के रास्तों से तिरुमला पहुँचे । मंगलाशासन करने तत्पश्चात अपने एक और शिष्य सिरिय केल्वियप्पन् जीयर को नियुत्क्त करते है जो अब से श्री पेरियप्पन् जीयार ( श्रीरामानुजाचार्य ने स्वयम इन्हे नियुत किया था ) के कैंकर्यों मे सहायता करे यानि अपना हाथ बटाये । उनकी वापसी मे वरवरमुनि तिरुएव्वुळ वीरयराघव , तिरुवल्लिक्केणि के वेंकटकृष्ण और अन्य दिव्यदेशों के पेरुमाळों ( अर्चमूर्तियों ) का मंगलाशासन किये ।  वे श्री मधुरान्तकम् दिव्यदेश पहुँचकर उस स्थान का अपने सिर से अभिवन्दन करते है जहाँ हमारे जगदाचार्य श्री रामानुजाचार्य श्री पेरियनम्बि के हाथों से पंञ्चसंस्कार से प्राप्त किये । उसके बाद वे तिरुवालि तिरुनगरि दिव्यदेश पहुँचकर श्री तिरुमंगयाऴ्वार के वैभव का आनन्द अनुभव कर, वदिवऴगु पासुर का समर्पण कर, आस-पास मे स्थित सारे अर्चमूर्तियों का मंगलाशासन करते है । तत्पश्चात तिरुक्कण्णपुरम् दिव्यदेश पहुँचकर श्रि सर्वांगसुन्दर ( सौरिराज ) अर्चा-विग्रह और उस दिव्यदेश मे श्री तिरुमंगैयाऴ्वार के समाधि का निर्माण करते है ।  इस प्रकार कई सारे दिव्यदेशों का भ्रमण कर अन्ततः श्रीरंग पहुँचे और वही निवास किये ।
  • उपरोक्त कहा गया है कि – श्री वरवरमुनि ने आदेश दिया कि अप्पाचियारण्णा कांञ्चिपुरम् जाए और उनके प्रतिनिधि बने । उस समय श्री अण्णाजी बहुत दुःखित होकर कहते है – यहाँ इतनी शुद्ध घोष्टि है जिसे छोडकर मुझे जाना पड रहा है । उन्हे दुःखित देखकर श्री वरवरमुनि ने कहा – उनके प्रयुक्त पात्र के धातु से उनके दो विग्रह बनाये जिसकी श्री पोन्नडिक्काल जीयर पूजा किया करते थे । एक विग्रह उन्होने श्री पोन्नडिक्काल जीयर को दिया और दूसरा श्री अण्णजी को दिया । ये दिव्य विग्रह हम श्री वानमामलै मट्ट, सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित वानमामलै और मुदलियाण्डान के वंशज के घरों मे यह अभी भी देख सकते है । वरवरमुनि ने अपने पूजनीय भगवान ( तिरुवाराधन भगवान – जिनका नाम एन्नै तीमनम् केदुत्ताइ) को भेट के रूप मे अण्णाजी को दिया जिन्हे हम सिंग पेरुमाळ कोइल् मे स्थित मुदलियाण्डान के वंशज के घर मे देख सकते है ।
  • श्री वरवरमुनि प्रतिवादिभयंकरमण्णा को श्रीभाष्य के अगले आचार्य और श्री कन्दादै अण्णन् शुद्धसत्त्वमण्णन् को भगवद्-विषयाचार्य के रूप मे नियुक्त करते है । वह श्री कन्दादै नायन् को ईडु 3600 पाडि पर आधारित अरुमपदम् की रचना करने का उपदेश दिये । इस ग्रंथ की रचना अन्ततः हुई और प्रसिद्ध भी है ।
  •  अब विस्तार मे कैसे श्री पेरिय पेरुमाळ श्री ववरमुनि के शिष्य हुए का वर्णन आप सभी के लिये प्रस्तुत है ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ बिना रुकावट के श्री वरवमुनि के श्रीमुख से अपने विषय (भगवद्-विषय) को सुनना चाहते थे । और अपने इच्छानुसार उनको (वरवरमुनि) को अपना आचार्य मान लिया । जब श्रीरंग मे पवित्रोत्रसव मनाया जा रहा था उस पवित्रोत्रसव साट्ट्रुमरै के दौरान, श्री नम्पेरुमाळ तिरुप्पवित्रोत्सव मण्डप को ले जाया गया और भगवान फिर वही रहने लगे । उस समय श्री वरवरमुनि भगवान का मंगलाशासन हेतु उसी मण्डप मे पहुँचे । उस समय भगवान ने स्वयम सबके यानि कैंकर्यपर, आचार्य पुरुष, जीयर, श्रीवैष्णवों समक्ष श्री वरवरमुनि को यह आदेश दिया – “आप श्रीमान तुरन्त श्री नम्माऴ्वार के तिरुवाय्मोऴि का ईडु व्याखायन का कालक्षेप करे” । भगवान यह भी कहा कि यह कालक्षेप निर्विराम होना चाहिए । भगवान ने इन्हे यह कार्य सौंपा यह जानकर वे अत्यन्त खुश हुए और विनम्रतापूर्वक भगवान के इस आदेश का पालन करना उचित समझा ।
  • इसके अगले दिन जब श्री वरवरमुनि पेरिय तिरुमण्डप (जो पेरियपेरुमाळ के द्वार-पालकों कि सन्निधि के भीतर पडता है) पहुँचते है, वे यह देखकर दंग होते है कि भगवान अपने समस्त परिवार सहित (उभयनाच्चियार – दोनो पत्नियों) , तिरुवनन्ताऴ्वान्, पेरिय तिरुवडि, सेनै मुदलियार, अन्य आऴ्वार, आचार्य इत्यादियों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब ये आये और कालक्षेप आरंभ हो । श्री वरवरमुनि अपने आपको भाग्यवान मानते है और कालक्षेप अन्य व्याख्यानों जैसे छे हज़ार पाडि, नौ हज़ार पाडि, बारह हज़ार पाडि और चौबीस हज़ार पाडि इत्याडि के माध्यम से आरंभ करते है । कालक्षेप के अन्तर्गत सत्-साम्प्रदाय के गोपनीयरहस्यों का विवरण वे अन्य ग्रंथ जैसे श्रुति, स्मृति, श्रीभाष्य, श्रुतप्रकाशिक, श्रीगीताभाष्य, श्रीपंञ्चरात्र, श्री विष्णुपुराण इत्यादि के माध्यम से दिये । वे ईडु व्याख्यान का वर्णन शब्दार्थ सहित, आन्तरिक-अर्थ इत्यादि से समझाये । यह निर्विराम दस महीनो तक चलता रहा । और अन्ततः भगवान की आज्ञा से साट्ट्रुमुरै के समाप्ति तिथि आनिमूल (आवणि मूल नक्षत्र) के दिन यह सम्पूर्ण हुआ । साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये ।  हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कहकर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक तीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्रीवैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया । इसी समय यह घटना एक विशाल दावाग्नि की तरह फैल गया और इस प्रकार यह गौरवनीय श्लोक अन्य दिव्यदेशों मे भगवान के द्वारा प्रचार हुआ । उसी समय अन्य श्रीवैष्णवों के आग्रह से अप्पिळ्ळै ने अपने आचार्य श्री वरवरमुनि का वाळितिरुनाम को प्रस्तुत कर उनकी गौरव की प्रशंसा की ।
  • कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।
  • श्री वरवरमुनि तत्पश्चात वडनाट्टुदिव्यदेश यात्रा के बारे मे सोचते है । वरवरमुनि इस यात्रा का आयोजन करते है और अपने शिष्यों के साथ यात्रा के लिये निकल पडते है ।
  • एरुम्बियप्पा को अपने दिव्यचरणों के पादुकों को प्रदान करते है ।
  • श्री वरवरमुनि अपने आराध्य भगवान (अरंगनगरप्पन्) को पोन्नडिक्काल जीयर को सौंपते है । और उन्हे उपदेश देते है कि वह वानमामलै जाकर एक मट्ट का निर्माण करे और अविराम भगवान का कैंकर्य करे ।
  • वरवरमुनि फिर से पाण्दियनाट्टुदिव्यदेश यात्रा मे जाते है । यात्रा के दौरान, वे उस राज्य के राजा (महाबलि वण नाथ रायन्) को अपना शिष्य बनाकार उनसी बहुत सारे कैंकर्य करवाये ।
  • कहते है कि जब वरवरमुनि मदुरै के निकट यात्र कर रहे थे तो एक दिन वे एक इमली के पेड के नीचे विश्राम लिये । विश्राम लेने के पश्चात, जब वह उठे तो उनके दिव्यचरणों ने उस वृक्ष को स्पर्श किया तो तुरन्त इस वृक्ष को मोक्ष की प्राप्ति हुई । तत्पश्चात वे अन्य दिव्यदेशों के अर्चामूर्तियों का मंगलाशासन किये और अन्ततः श्रीरंग पहुँचे ।
  • कहते है – अपने शिष्यों द्वारा उन्होने बहुत सारे कैंकर्य सम्पूर्ण किये । उनके आदेशानुसार जीयर तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर की सेवा करने लगे ।
  • श्री वरवरमुनि पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि का व्याख्यान लिखते है जो उस समय लुप्त हो गई थी । पेरियवाच्चान पिळ्ळै ने पूर्व ही इस पर अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर चुके थे परन्तु अन्ततः यह लुप्ट् हो गई । इसका पुणर्निर्माण श्री वरवरमुनि के शब्दार्थ सहित किया ।
  • श्रीवरवरमुनि के अपार कारुण्य की भावना गौरवनीय और प्रशंसनीय है । वरवरमुनि का स्वास्थ्य रोगग्रस्त हो गया परन्तु अविराम वह पूर्वाचार्यों के ग्रंथों की व्याख्या कर रहे थे । उनके बिगडते स्वास्थ्य को देखकर उनके शिष्य उनसे पूछे – स्वामि आप इतना कष्ट क्यों उठा रहे है ? वरवरमुनि ने हसते हुए कहा – यह कार्य मै हमारे भविष्य के पीढी के लिये कर रहा हूँ यानि पुत्र, पौत्र इत्यादि ।
  • वह अपना शरीर त्यागकर परमपद जाने की इच्छा व्यक्त करते है । उस समय वे अपने भावनावों को आर्ति प्रबंध नामक ग्रंथ मे प्रस्तुत करते है । इस ग्रंथ मे वे श्री रामानुजाचार्य से रोते हुए प्रार्थना कर रहे है कि उन्हे स्वीकार करे और उन्हे इस भवबंधन से मुक्त करे यानि इस भौतिक शरीर से मुक्त करे । इस ग्रंथ के माध्यम से वह दर्शाये है की कैसे रामानुजाचार्य से प्रार्थना करे, किस प्रकार आर्त दृप्त होकर प्रपन्न इस भव-बंधन से विमुक्त हो सकता है । क्योंकि वह स्वयम रामानुजाचार्य थे ।
  • उन्होने अन्त मे अपना भौतिक शरीर त्यागकर ( यानि अपनी सेवा इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण कर ), श्री वैकुण्ठ धाम पधारे और भगवत्-भागवत कैंकर्य मे संलग्न हुए । वह सारे अरुळिचेयल सुनने की इच्छा व्यक्त करते है । उनके इच्छानुसार उनके शिष्य अत्यन्त प्रेम भावना से इसका आयोजन करते है । मामुनि इतने प्रसन्न होते है कि उन्होने सभी श्रीवैष्णवों के लिये तदियाराधन का आयोजन किया । और इन सभी से विनम्र्तापूर्वक अनजाने मे किये अपराधों की क्षमा याचना करते है । इसके उत्तर मे प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव कहते है – आप श्रीमान निष्काम, दोषरहित, अकलंकित थे । अतः आप को क्षमा याचना शोभा नही देता । तत्पश्चात श्री वरवरमुनि सभी श्रीवैष्णवों ने निवेदन करते है की श्री पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ के कैंकर्य संपूर्ण प्रेम से और केवल उन पर केंद्रित करते हुए करे ।
  • फिर वह “पिळ्ळै तिरुवडिगळे शरणम्, वाऴि उलगासिरियन् और श्री एम्पेरुमानार तिरुवडिगळे शरणम्” कहकर अपनी लीला को इस लीला विभूति मे सम्पूर्ण करते है । इस भौतिक जगट से जाने के पहले श्री भगवान को देखने की इच्छा से अपने कमल जैसे नयनों को खोले, तो साक्षत परम ब्रह्म श्रीमन्नारायण गरुड पर बैठकर पधारे और स्वयम उनको अपने साथ परम धाम ले गए । इस प्रकार अपनी लीला को अत्यन्त शानदार तरीके से सम्पूर्ण किये ।
  • श्री वरवरमुनि के जाने बाद, सारे श्रीवैष्णव बहुत रोते है । भगवान स्वयम बहुत शून्य महसूस करते है और किसि प्रकार के भोग को स्वीकार नही करते है । अन्ततः सारे श्रीवैष्णव खुड को दिलासा देते है और अन्तिम चरम कैंकर्य का आयोजन करते है । तिरुवध्यायन महामहोत्सव का आयोजन श्रेष्ठता, दिव्य-भव्य रूप से होता है । यह महामहोत्सव भगवान के ब्रह्मोत्सव से भी श्रेष्ठ था क्योंकि यह भगवान ने आदेशानुसार इसका आयोजन हुआ ।
  • पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

श्री वरवरमुनि (मामुनि) के दिव्य उपदेशों का संक्षिप्त वर्णन :

  • एक बार दो श्रीवैष्णवों के बींच मे गलतफ़हमि के कारण लड रहे थे । उसी समय रास्ते मे दो कुत्ते भी लड रहे थे । श्रीवरवरमुनि कुत्तों की ओर देखते हुए कहे – क्या आप कुत्तों ने श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र, तिरुमंत्र इत्यादि का अनुसंधान किया है ? तो क्यों इन श्रीवैष्णवों को अपने आप मे इतना घमण्ड क्यों है ? यह सुनकर वे दोनों परिवर्तित हुए और विशुद्ध सत्व से भगवद्-भागवत् कैंकर्य किये । कहने का तात्पर्य यह था – अगर कोई पूर्वाचार्य के ग्रंथों का अनुसंधान, कालक्षेप करे तो उसके मन मे क्लेश घमण्ड, इत्यादि दोष होना नहि चाहिये ।
  • एक बार वड देश से कोई व्यक्ति वरवरमुनि को अर्जित धन का समर्पण करता है । वरवरमुनि को यह जानकारी प्राप्त हुआ कि यह धन तीख तरीके से अर्जित नही है । अतः तुरन्त उन्होने इस धन का तिरसकार कर दिया और वापस भेज दिया । श्री वरवरमुनि धन दौलत मे कदाचित भी इच्छा नही रखते थे । कैंकर्य के लिये आवश्यक धन की इच्छा भी वे केवल सुनिश्चित श्रीवैष्णवों से रखते थे ।
  • एक बार एक वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे अचानक प्रवेश करती है । और श्री वरवरमुनि से एक रात के निवास के लिये निवेदन करती है । वरवरमुनि कहते है – “एक वृद्ध चिखुर भी पेड़ चडने के काबिल है” यानि आप कही और अपने निवास की व्यवस्था करे । अगर यह वृद्ध स्त्री उनके मट्ट मे रहती तो उनके वैराग्य के विरुद्ध भावना जागरुक हो सकती थी । अतः इस प्रकार वह ऐसे गलत फ़हमियों को बढावा नही देते थे जो लोगों के मन मे शंखा पैदा कर सके ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव अम्माजी बिना भक्ति-भाव के खाने की सब्जिया काटने मे मदद कर रही थी । यह जानकर श्री वरवरमुनि तुरन्त उनका बहिष्कार किया और सजा मे छे महीनो तक अन्य प्रदेश मे रहने का आदेश दिया । उनका उद्धेश्य साफ़ था – कैंकर्य करने वाले श्री वैष्णव सदैव भगवद्-भागवत निष्टा मे रहने चाहिये ।
  • एक बार एक श्रीवैष्णव “वरम् तरुम् पिळ्ळै” अकेले अकेले श्रीवरवरमुनि के मिलने हेतु चले गए । श्रीवरवरमुनि के उन्हे टोकते हुए कहे – कदाचित भी किसी भी व्यक्ति को आचार्य और भगवान के समक्ष अकेला नही जाना चाहिये । प्रत्येक व्यक्ति का धर्म और कर्तव्य है कि वह श्रीवैष्णवों के साथ भगवान और आचार्य के समक्ष जाये ।
  • उन्होने बहुत बार भागवतापचार के बारें मे समझाया और उसकी निर्दयी कठोर स्वभाव का वर्णन भी किया है और इससे कैसे प्रपन्न भक्तों का नाश हो सकता है ।
  • एक बार एक अर्चक स्वामि श्री वरवरमुनि ने निवेदन करते है कि उनके शिष्य उनका अभिनन्दन नहि कर रहे है और उनका उनको सम्मान नहि दे रहे है । श्री वरवरमुनि के उनके शिष्यों को समझाया अर्चक स्वामि को सदैव सम्मान दे क्योंकि उनमे श्रीमन्नारायण और श्रीदेवि सदैव बिराजमान है ।
  • एक बार वडुनाट्टुदिव्यदेश से एक धनी श्रीवैष्णव श्रीवरवरमुनि के समक्ष आकर एक श्रीवैष्णव के लक्षण के बारें मे पूछते है । श्रीवरवरमुनि उत्तर मे कहते है –
    • केवल भगवान के चरणकमलों का आश्रय लेने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भगवान का संबन्ध (यानि तप्त मुद्र – संख चक्र ) पाकर कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल तिरुवाराधन करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल आचार्याभिमान (परतंत्र) होने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता । केवल भागवतों की सेवा करने से कोई श्रीवैष्णव नही बन जाता ।
    • हलांकि यह करना अत्यन्त आवश्यक है परन्तु निम्नलिखित बिन्दु और भी महत्वपूर्ण है –
    • हमे ऐसे कैंकर्य समयानुसार करना चाहिये जो श्री भगवान को सन्तुष्ट या प्रसन्न करे ।
    • श्रीवैष्णवों के लिये सदैव अपने घरों के द्वार खुले रहना चाहिये । और साथ ही उनके लिये जब चाहे जो चाहे सेवा करने के लिये सदैव तैय्यार रहना चाहिये ।
    • पेरियाऴ्वार के कथन के अनुसार “एन् तम्मै विर्कवुम् पेरुवार्गळे” हमे सदैव अन्य श्रीवैष्णवों के लिये बिक जाने के लिये भी तैय्यार रहना चाहिये ।
  • जब हम भगवद्-शेषत्वम् (भगवान के सेवक है यह भावना) को विकसित करेंगे तो हमे साम्प्रदाय के अर्थ, श्री भगवान और आऴ्वार आचार्य के अनुग्रह से सीख सकते है । एक श्रीवैष्णव जो पहले से ही निष्ठावान है उसके लिये यह आवश्यक नही की वह कुछ और व्यक्त-अव्यक्त रूप से सीखने की ज़रूरत नही क्योंकि पहले से ही वह चरम निष्ठा मे स्थित है |
  • कहते है अगर हम किसी भी व्यवहार-तत्व का प्रचार प्रसार करेंगे जिसका पालन हम नही कर रहे है तो यह केवल एक वेश्या का स्वभाव दर्शा रहे है । क्या वेश्या यह कह सकती है की कैसे शुद्ध आचरण करना चाहिये ? नही ना । इसीलिये जो भी प्रचार प्रसार करे उसका पालन अवश्य करे ।
  • कहा जाता है कि श्रीवैष्णवों की आराधना से श्रेष्ठ कोई कैंकर्य नही और श्रीवैष्णवों कि निन्दा से बड़कर महाप्राध कुछ भी नही है ।

ये दिव्य उपदेश सुनकर प्रफ़ुल्लित श्रीवैष्णव मामुनि के प्रति प्राणर्पित निष्ठावान हुआ । उनका चिन्तन मनन करते हुए अपने गाँव लौट गया ।

हमारे सत्-सांप्रदाय मे श्रीवरवरमुनि का विषेश स्थान –

  • कहते है कि किसी भी अन्य आचार्य के वैभव के बारें मे बोलना/बात करना और संक्षेप मे इसका विवरण कर सकते है परन्तु श्रीवरवरमुनि का वैभव असीमित है । वे खुद अपने हज़ार जबानों से अपने वैभव का वर्णन नही कर सकते है । तो हम सभी क्या चीज़ है । हम तो कदाचित पूर्णसन्तुष्टिकरण के लिये भी नहि कर सकते । हमे तो केवल उनके बारें मे पढकर, उनकी चर्चा करते हुए अपने आप को सन्तुष्ट करना चाहिये ।
  • श्री पेरिय पेरुमाळ ने स्वयम उन्हे अपने आचार्य के रूप मे स्वीकार किया और इस प्रकार आचार्य रत्नहार और ओराण्वळि गुरुपरम्परा को सम्पूर्ण किया ।
  • श्री पेरियपेरुमाळ उनके शिष्य होने के नाते, अपना शेषपर्यन्क (शेष सिंहासन) अपने आचार्य को भेंट मे दे दिया जो हम अभी भी सारे दिव्यदेशों मे देख सकते है । केवल श्रीमणवाळमामुनि के अलावा अन्य आऴ्वार और आचार्य को यह शेषपर्यन्क उपलब्ध नही है ।
  • आऴ्वार तिरुनगरि मे, इप्पासि तिरुमूलम (मणवाळमामुनि के आविर्भाव दिवस पर) आऴ्वार अपने तिरुमंजनसेवा के बाद अपनी पल्लकु (पालकी), कुडै, चामार, वाद्य इत्यादि मामुनि के सन्निधि को भेजकर उनक आगमन का स्वागत करते है । मामुनि के आगमन के बाद वे तिरुमान्काप्पु (तिलक से) सुसज्जित होकर मामुनि को अपना प्रसाद प्रदान करते है ।
  • मामुनि केवल एकमात्र ऐसे आचार्य है जिनका तिरुवध्यनम् (तिरोभावदिवस) दिव्यभव्य रूप से मनाया जाता है । तिरोभावदिवस केवल पुत्र और शिष्य ही करते है । लेकिन इस विषय मे, साक्षात श्रीरंग पेरुमाळ उनके शिष्य है जो अभी भी प्रचलित है । वही उनका यह दिन दिव्य भव्य रूप से मनाते है । इस दिन वह अपने अचर्क स्वामि, परिचारक, निज़ि सामग्री इत्यादि उनके लिये भेजते है । इस महामहोत्सव की जानकारी इस लिंक पर उपलब्ध है |
  • श्रीरंग और आऴ्वार तिरुनगरि मे मामुनि कदाचित भी अपने वैभव और कीर्ती के उत्सव पर ज़्यादा ध्यान नही दिया करते थे । उनके अनुसार उनका अर्च-तिरुमेनि (विग्रह) बहुत ही छोटा होना चाहिये और पुरपाड्डु बिलकुल भी नहि होना चाहिये क्योंकि वहाँ पे केवल आऴ्वार और नम्पेरुमाळ पर पूरे कैंकर्य केंद्रित है । इसी कारण उनका विग्रह बहुत छोटा और अत्यन्त सुन्दर है ऐसा प्रतीत होता है ।
  • मामुनि इतने विनयशील और अभिमानरहित थे की कभी भी किसी का बुरा नहि लिखते और चाहते थे । अगर पूर्वाचार्य के व्याख्यानो मे भी अगर परस्पर विरोधि प्रतीत होता है फिर भी ऐसे संदर्भ मे भी वह इसका ज़िक्र या इसकी वीणा नही करते और अपक्षपात रहते है । (किसी का भी पक्ष नही लेते और एक दूसरे पक्ष का विरोध और निन्दा कदाचित भी नहि करते) ।
  • श्री मामुनि ने केवल अरुळिचेयल पर अपना ध्यान केंद्रित किया और वेदान्त का विवरण इन्ही अरुळिचेयल से ही समझाया । अगर वह प्रकट नही होते तो निश्चित है कि तिरुवाय्मोऴि और उसके अर्थ भिगोया गया इमली की तरह होगा (माने पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता) ।
  • मामुनि से स्वयम पूर्वाचार्यों के ग्रंथों को सम्मिलित कर उन पर अपनी व्याख्या लिखे और भविष्य मे हम सभी के उद्धार हेतु उनका संरक्षण किये ।
  • उनकी अपार कारुण्य भावना प्रशंसनीय है । जिस किसि ने भी उनका विरोध, अपमान, परेशान किया उन सभी के प्रती वह अपना कारुण्य भाव दिखाते थे । वे हमेशा उनका आदर और उनके साथ अच्छा बर्ताव करते थे ।
  • कहा जाता है कि अगर हम उनके चरणकमलों का आश्रय लेकर उनके चरण कमल अपने मस्तिष्क पर धारण करने के लिये तैय्यार है, तो यह अवश्य मानो कि अमानवम् (जो विरजा नदी पार करवाने मे सक्षम) याने स्वयम मामुनि हमारे हाथ पकडकर इस भव सागर से पार करवायेंगे ।
  • श्री रामानुजाचार्य के प्रती उनका उत्सर्ग अपूर्व है और अपने जीवन चरित्र से कैसे उनकी पूजा कैसे करे यह दर्शाया है ।
  • उनका जीवन चरित्र हमारे पूर्वाचार्यों के कथानुसार एक साक्षात उदाहरण है की कैसे एक श्रीवैष्णव को व्यवहार करना चाहिये । यह पूर्व ही श्री आचार्यनिष्ठावान कैंकर्यपर भागवतोत्तम श्री सारथितोताद्रि के असीम कृपा से इस लिंक (श्रीवैष्णव के लक्षण) पर अन्ग्रेज़ि मे उपलब्ध है । कृपया इस लिंक पर क्लिक करे और सारे लेख और ई-पुस्तकें का लाभ उठायिये ।

मामुनि का तनियन् – (ध्येय नित्य अनुस्मरण श्लोक)

श्रीशैलेश दयापात्रम् धीभक्त्यादिगुणार्णवम् । यतीन्द्र प्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम् ॥

संक्षिप्त अनुवाद – मै (श्रीरंगनाथ) श्रीमणवाळमामुनि का नमन करता हूँ जो श्री तिरुवाय्मोऴि के दया के पात्र है, जो ज्ञान भक्ति वैराग्य इत्यादि गुणों से सम्पन्न एक विशाल सागर है और जिनको श्री रामानुजाचार्य के प्रति अत्यन्त रुचि रति और आस्था है ।

इस लेख से हमने ओराण्वळिगुरुपरंपरा के अन्तर्गत सारे आचार्यों के वैभव और उनके जीवन का संक्षित वर्णन प्रस्तुत कर सम्पूर्ण किया है । कहा जाता है कि सदैव प्रत्येक कार्य का अन्त मीठा होना चाहिये । इसीलिये हमरी यह ओराण्वळिगुरुपरंपरा श्री मणवाळमामुनि के जीवन चरित्र से सम्पूर्ण होती है और जिनकी लीला इस लीला विभूति और नित्य विभूति (दोनों) मे रसाननन्द से भरपूर है अतः रसमयी और मीठी है ।

उनका आविर्भाव दिवस का महामहोत्सव (नक्षात्रानुसार) दिव्य भव्य रूप से कई दिव्य देशों मे होती है जैसे आऴ्वार तिरुनगरि, श्रीरंगम्, कांञ्चिपुरम्, श्रीविल्लिपुत्तूर, तिरुवहिद्रपुरम्, वानमामलै, तिरुनारायण इत्यादि । हम सभी इस महामहोत्सव का भरपूर लाभ उठा सकते है और इस उत्सव मे भाग लेकर, उनके समक्ष रहकर, अपने आप को परिष्कृत करना चाहिये जो स्वयम श्रीरंगनाथ भगवान के प्रिय आचार्य हुए ।

हम आगे यानि भविष्य मे अन्य श्रेष्ठ आचार्यों के जीवन चरित्र के बारे मे चर्चा अवश्य इन्ही लेखों द्वारा करेंगे । अन्य आचार्यों के अन्तर्गत सबसे पहले श्री पोन्नडिक्काळ जीयर के जीवन के बारे मे चर्चा करेंगे जो श्री मामुनि के तिरुवडि (चरणकमलों के सेवक) है और जिसे स्वयम मामुनि अपना श्वास और जीवन मानते थे ।  अगले लेख मे आप सभी पोन्नडिक्काल जीयर के वैभव के बारें मे अवश्य पढे ।

अडियेन सेतलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

अडियेन वैजयन्त्याण्डाळ रामानुज दासि

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