पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्री शैलपूर्ण स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः periya-thirumalai-nambi

जन्म नक्षत्र: वैशाख, स्वाति

अवतार स्थल: तिरुमला (तिरुवेंकटम)

आचार्य: आलवन्दार

शिष्य: एम्पेरुमानार (ग्रंथ कालक्षेप शिष्य), मलैकुनिय निन्र पेरुमाल, पिल्लै तिरुक्कुलामुदैयार, भट्टारियरिल शठगोपदासार

तिरुमलै नम्बि का जन्म तिरुमला में श्री वेंकटेश भगवान के आशीर्वाद से हुआ। वे आलवन्दार के प्रधान शिष्यों में से एक थे। उन्हें श्री शैलपूर्ण के रूप में भी जाना जाता है। श्री वेंकटेश भगवान के प्रति उनके वृहद प्रेम और लगाव के लिए भगवान ने उन्हें ” पितामह ” के रूप में सम्मानित किया।

आलवन्दार ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें तिरुमलै नम्बि को श्री रामायण, जो हमारे संप्रदाय में शरणागति शास्त्र के रूप में प्रसिद्ध है, का अर्थ समझाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे और उन्होंने ही उनके जन्म के बाद उन्हें “इळैयाळ्वार” नाम प्रदान किया था। उन्हें तिरुमला दिव्यदेश के श्रीवैष्णवों में अग्रणी स्थान प्राप्त है। वे तिरुमला के श्रीनिवास भगवान के नित्य कैंकर्य परार थे और तिरुमला में आकाश गंगा (पानी के स्तोत्र) से प्रतिदिन तीर्थ लाने के कार्य में लगे हुए थे।

एम्पेरुमानार गोविंद को फिर से संप्रदाय में लाने की इच्छा से (क्यूँकि वाराणसी यात्रा के दौरान गोविंद उल्लन्गै  कोनर्न्थ नायनार बनकर कालहस्ती में देवांतर का अनुसरण करने लगते है) एक श्रीवैष्णव के माध्यम से तिरुमलै नम्बि से अनुरोध करते हैं कि वे जाये और गोविंद को संप्रदाय में फिर से लेकर आये।

तिरुमलै नम्बि, तुरंत अपने शिष्यों और एक श्रीवैष्णव (जो बाद में श्रीरंगम लौटकर पूरा वृतांत एम्पेरुमानार को सुनाते हैं ) के साथ गोविंद से मिलने के लिए कालहस्ती की ओर प्रस्थान करते हैं। जिस मार्ग से गोविंद जाया करते थे, नम्बि वहीँ पर एक वृक्ष की छाया में अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। तभी गोविंद शिव भक्त के वेश में, रूद्र माला लिये हुए, सारे शरीर पर भभूत लगाये हुए रूद्र के वैभव को गाते हुए वहाँ आते हैं। नम्बि श्रीमन्नारायण भगवान का मंगल गान करते हैं जिसे गोविंद बहुत जिज्ञासा से देखते हैं। कुछ दिनों बाद नम्बि उसी जगह उसी समय पर लौटते हैं और आलवन्दार द्वारा रचित स्त्रोत्र रत्न के ११वें श्लोक (जो श्रीमन्नारायण की प्राकृतिक सर्वोच्चता और अन्य देवताओं की भगवान पर निर्भरता को स्थापित करता है) को एक ताड़ के पत्ते पर लिखते हैं जो फिसल कर नीचे गिर जाता है। वहाँ से जाते हुए गोविंद उसे उठाते हैं, पढ़ते हैं और उसे फिर से वहीँ गिरा देते हैं । लौटते हुए वे उस ताड़ के पत्ते को खोजते हैं और उसे प्राप्त करके उस श्लोक के दिव्य अर्थ पर गहराई से विचार करते हुए नम्बि के पास जाकर उनसे पूछते हैं कि क्या वह प्रलेख उनका है? गोविंद और तिरुमलै नम्बि के बीच उस समय एक संवाद होता है जहाँ नम्बि श्रीमन्नारायण भगवान की सर्वोच्चता पर गोविंद के सभी संदेहों का स्पष्टीकरण करते है। मुख्यतः आश्वस्त होकर गोविंद वहाँ से चले जाते हैं। तत्पश्चात नम्बि फिर उस स्थान पर आते हैं जहाँ गोविंद रूद्र के लिए पेड़ से फूल तोड़ रहे थे। नम्बि “तिण्णन् वीडु” पद (तिरुवाय्मोळि 2.2) का व्याख्यान शरू करतें हैं जिसमें आलवार भगवान की सर्वोच्चता के बारे में बात करते हैं। नम्बि बड़ी सुंदरता से चौथे पासूर का व्याख्यान करते हैं जहाँ नम्माल्वार स्थापित करते हैं कि पुष्प और आराधना की उप्युक्तता तो केवल भगवान श्रीमन्नारायण को समर्पित करने में ही है। यह सुनकर गोविंद तुरंत पेड़ से कूदते हैं और नम्बि के चरण कमलों में लेट जाते हैं। वे अपनी अब तक की अनावश्यक संगति के लिए रुदन करते हैं और नम्बि से उन्हें स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। नम्बि तत्काल उन्हें उठाकर सांत्वना देते हैं। गोविंद कालहस्ती से अपने सारे संबंध त्याग देते हैं और कोष की चाबियाँ स्थानीय रूद्र भक्तों को सोंप देते हैं। वे लोग बताते हैं कि रूद्र पिछली रात उनके स्वप्न में आये और उन्हें बताया की एम्पेरुमानार सभी को सच्चे ज्ञान प्रदान करने के लिए इस दुनिया में अवतरित हुए हैं और गोविंद को रूद्र के प्रति लगाव त्यागने पर रोका नहीं जाना चाहिए, इसलिए वे लोग उन्हें प्रसन्नता से विदा करते हैं।

तिरुमला लौटने पर नम्बि गोविंद का उपनयन संस्कार और पंच संस्कार विधिपूर्वक पूर्ण करते हैं और उन्हें आलवारों के दिव्य प्रबंधन सिखाते हैं।

एक बार एम्पेरुमानार तिरुपति पधारते हैं और भगवान् के मंगलाशासन के लिए तिरुमला पहाड़ पर चढाई करते हैं, नम्बि स्वयं द्वार पर जाकर एम्पेरुमानार का स्वागत और बहुमान करते हैं। नम्बि, जो अत्यंत योग्य हैं , एम्पेरुमानार से ज्येष्ठ हैं और उनके आचार्य भी हैं , उनसे एम्पेरुमानार पूछते हैं कि आपने स्वयं यहाँ आने का कष्ट क्यों किया, स्वागत के लिए किसी को भी भेज देते? नम्बि, अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि उन्होंने आस पास सभी स्थानों पर देखा परन्तु स्वयं से कम योग्य किसी को नहीं पाया। एम्पेरुमानार श्री वेंकटेश भगवान का मंगलाशासन करके तिरुमला से प्रस्थान करते हैं ।

पेरिया तिरुमलै नम्बि की श्री रामायण कालक्षेप गोष्ठी

श्री रामानुज, तिरुमलै नम्बि से श्री रामायण सीखने के लिए तिरुपती आते हैं । वे वहाँ एक वर्ष तक निवास करते हैं । कालक्षेप के अंत में तिरुमलै नम्बि एम्पेरुमानार से कहते हैं कि वे उनसे कुछ स्वीकार करे। एम्पेरुमानार नम्बि से कहते हैं कि वे गोविंद को उनके साथ भेज दे। नम्बि प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं और एम्पेरुमानार गोविंद के साथ तिरुपति से प्रस्थान करते हैं। परन्तु गोविंद अपने आचार्य से वियोग सहन न कर सकने पर कुछ समय बाद तिरुपति लौट आते है। परन्तु तिरुमलै नम्बि गोविंद से यह कहते हुए कोई बात नहीं करते कि वे एम्पेरुमानार की संपत्ति हैं और उन्हें तत्काल उनके पास लौट जाना चाहिए। ऐसी उनकी निष्ठा थी। इस द्रष्टांत का वर्णन http://ponnadi.blogspot.com/2013/01/embars-acharya-nishtai.html में किया गया है। तदन्तर गोविंद सन्यास आश्रम स्वीकार करते हैं और एम्बार नाम से जाने जाते हैं।

नम्बि के वैभव और उनके विवरण इस व्याख्यान में बहुत से स्थानों पर दर्शाए गये हैं। उनमें से कुछ हम अब देखेंगे:

  • तिरुप्पावै 14 – अजहगीय मनवाल पेरूमल नायनार – “चेंगल पोदिक्कूरै वेन्पल थवथ्थवर” का नम्बि द्वारा दिया गया विवरण यहाँ समझाया गया है। नम्बि समझाते हैं कि क्यूंकि गोपियों को उठाते हुए हम सुबह के समय में होने वाली शुभ घटनाओं को दर्शाना चाहते हैं, इन्हें अच्छे सन्यासी की तरह देखना चाहिए जो सुबह जल्दी जागते हैं और भगवान की पूजा करने के लिए मंदिर जाते हैं।
  • नाच्चियार तिरुमोळि 10.8 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान– ऐसा पाया गया है कि ये पासूर (मळैयै मळैयै) और अगला पासूर (कदलै कदलै) नम्बि के प्रिय पासूर थे। इन पासूरों में आण्डाल श्री वेंकटेश भगवान के वियोग में अपनी भावनाओ को उन तक पहुँचाने के लिए अपने सन्देश वाहक के रूप में बादलों को भेजती है। हर बार जब भी नम्बि इन पसूरों का पाठ करते थे, वे भावनाओ से अभिभूत होकर आवक रह जाते थे। नम्बि के इस लगाव के कारण, हमारे आचार्यों का इन पसूरों से प्रगाढ़ प्रेम है।
  • तिरुविर्रुथम 3 – नम्पिळ्ळै व्याख्यान– पिल्लै तिरुनरैयूर नम्बि समझाते हैं कि पेरिया तिरुमलै नम्बि, आलवार के मन को दर्शाते हैं जहाँ आलवार सोचते हैं कि उनका भागवत अनुभव मात्र “मानस साक्षात कारम् (दिव्य आंतरिक द्रष्टि) है अथवा वह बाह्य द्रष्टि और अनुभव में भी विकसित होगा।
  • तिरुवासीरियम 1 – पेरियावाच्चान पिल्लै व्याख्यान – भगवान् की सुंदरता को समझाते हुए आलवार कहते हैं कि वे एक हरे भरे पर्वत के सामान है जो शयन किये हुए दिखाई देते हैं। वे आराम के लिए “तून्गुवदु” के बजाये “कण्वळर्वदु” शब्द का प्रयोग करते हैं। जहाँ “कण्वळर्वदु” आराम के लिए एक उच्च शब्द है वहीँ “तून्गुवदु” बोलचाल में प्रयोग किये जाने वाला सामान्य शब्द है। पेरिया तिरुमलै नम्बि की शब्दों कि दक्षता को एक द्रष्टांत के द्वारा यहाँ समझाया गया है। नम्बि, एम्पेरुमानार द्वारा किसी को समझाने के विषय में कहते है “स्वर्ण से बनी हुई होने पर भी वह व्यक्ति कानों की बालियाँ नहीं पहन सकता”। यहाँ नम्बि का आश्रय ऐसे व्यक्ति से है जिसे सर्वोत्तम उपदेश दिए जाये तो भी वह उसे नहीं सुनेगा। नम्बि, उस सिद्धांत को समझाने के लिए महान शब्दों का प्रयोग करके यह दर्शाते हैं कि श्री वैष्णव को अपनी सभी अभिव्यक्तियों के लिए सम्मानित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
  • तिरुवाय्मोळि 1.4.8 – नम्पिळ्ळै व्याख्यान – इस पासूर में आलवार (नायिका भाव में) एक पक्षी से (जिसे उन्होंने भगवान के पास दूत के रूप में अपनी स्थिति बताने भेजा था) कहते हैं कि उन्होंने अपनी सारी शारीरिक शक्ति और सौंदर्य को खो दिया है और भगवान से वियोग में वे बहुत कमज़ोर हो गए हैं। आलवार उस पक्षी से स्वयं अपना भोजन खोजने के लिए कहते हैं क्यूंकि अब वे उसके लिए ऐसा नहीं कर सकते। इस परिपेक्ष्य में नम्पिळ्ळै, पेरिया तिरुमलै नम्बि के चरित्र को दर्शाते हैं। अपने अंतिम दिनों में नम्बि अपने अर्चा भगवान- वेण्णैक्कादुम पिल्लै (श्री कृष्ण के वह स्वरुप जो माखन के लिए नृत्य करते हैं) के पास जाते हैं और कहते हैं कि अब वे बहुत कमज़ोर हो गये हैं और भगवान को अपने देखभाल के लिए किसी और को खोज लेना चाहिए।

तिरुमलै नम्बि द्वारा स्थापित एम्पेरुमानार के वैभव को चरमोपाय निर्णय नामक दिव्य ग्रंथ में दर्शाया गया है और उसे http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html पर देखा जा सकता है।

इस तरह हमने तिरुमलै नम्बि के वैभव की कुछ झलकियाँ देखी।

हम तिरुमलै नम्बी के श्री चरण कमलों में साष्टांग प्रणाम करते हैं, जिनका आळवन्दार और एमपेरुमानार के प्रति विशेष लगाव था।

टिप्पणी: ६००० पद गुरु परंपरा प्रभाव और पेरिया तिरुमुड़ी अदैवू में नम्बि का जन्म नक्षत्र चित्रा- स्वाति दर्शाया गया है, परन्तु वाजही तिरुनाम में उसे वैशाख- स्वाति बताया गया है और नम्बि का जन्म उत्सव इसी दिन मनाया जाता है।

तिरुमलै नम्बि की तनियन

पितामहस्यापि पितामहाय प्राचेतसादेचफलप्रदाय।
श्रीभाष्यकारोत्तम देशिकाय श्रीशैलपूर्णाय नमो नमः स्तात् ।।

अडियेन् भगवति रामानुज दासी

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