दिव्य दम्पति – श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि

:श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

सत सम्प्रदाय की आचार्य परम्परा (गुरुपरम्परा) की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए , दास अब सम्प्रदाय के प्रथमाचार्य से अपने लेखनी शुरू कर रहा है। इन लेखो में सम्प्रदाय में समाश्रित सभी अनुयायियों की जानकारी के लिए सभी आचार्यो का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहा है।

ओराण्वळि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत सर्वप्रथम श्री पेरिय पेरुमाळ् और श्री पेरिय पिराट्टि ही आते है, दास का सामर्थ्य नहीं की इनके बारे में लिखे , फिर भी सम्प्रदायस्थ अनुयायियों के हितार्थ जो भी थोड़ी जानकारी है सो प्रेषित कर रहा हूँ।

हमारे आचार्यों ने दिव्यज्ञान का सार रहस्यत्रय के द्वारा बताया है । इसी दिव्यज्ञान के  अधिकारि हमारे पूर्वाचार्य ने बहुत विचार्पूर्वक , विवेकपूर्ण तरीके से इसका सार सम्प्रदाय के अनुयायियों के हितार्थ हमे दिया है ।

  • श्री पेरिय पेरुमाळ्

periya-perumaal

  • तिरुनक्षत्र – आवणि रोहिणि

ग्रन्थ सूचि – श्रीमद्-भगवद्-गीता, तनियन् (श्रीशैलेश दयापात्रम् ..)

हमारी ओरण गुरुपरम्परा  श्री पेरिय पेरुमाळ् से शुरू होति है । अकारण करुणावरुणालय भगवान् अपने निर्हेकुत कृपा से सर्वप्रथमाचार्य का पद स्वीकार करते है और रहस्यत्रय का सदुपदेश अपनी संगिनी , जिन्हे पेरुमाळ ने अपने वक्षस्थल पर बिराजे रखा है , पेरिय पिराट्टि को श्री वैकुण्ठ मे देते है ।एम्पेरुमान् यानि भगवान् सबके स्वामि है । वे पूरी तरह से स्वतन्त्र है । सारे जीव भगवान् पे निर्भर है और उन्के सेवक है । वे प्रथमाचार्य का स्वरूप अपनी  मर्ज़ि से स्वीकारते  है । वे सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्याप्त है । अपने कारुण्य स्वभाव से, वे मोक्ष की इच्छा रखने  वाले जीवों को मोक्ष प्रदान करते है ।

पेरिय पेरुमाळ् (भगवान रंगनाथ, जो स्वयं श्रीमन्नारायण ही है) अपने स्वधाम (श्री-वैकुण्ठ) से अपने श्रीरंगविमान् में ब्रह्मा जी के लोक मे पधारे जहाँ उन्की पूजा ब्रह्मा जी ने सत्यलोक मे की थी। ब्रह्माजी के आग्रह पर भगवान मूर्त रूप वहां रहकर ब्रह्माजी से सेवा स्वीकरते रहे,  उसके पश्चात वे इक्ष्वाकु वंश के राजा ने ब्रह्माजी से भगवान पेरिया पेरुमाळ के विग्रह को मांग कर अपनी नगरी अयोध्या लेकर आ गये , और भगवान पेरिया पेरुमाळ , रघुकुल के नृपों (यानि राजाओं) के कुल देवता के रूप में पूजे जाने लगे। लंका विजय के पश्चात , राज्याभिषेक के बाद , विभीषणजी ने इस विग्रह को राजा रामजी से मांगकर अपने राज्य लंका ले जाने लगे । पर पेरुमाळ की मंशा ही, कुछ और थी। श्री विभीषणजी लंका जाते वक्त माँ कावेरी में स्थित इस छोटे टापू पर रुके, और पेरुमाळ श्रीरंगम की मनोहर छटा देख , nवही पर दक्षिणाभिमुखी बिराज गए, इसी लिए कहते है – ” वंदिनम् उरलुम् चोलै, मयिलिनम् आळुम् चोलै, कोन्डल् मीदणवुम् चोलै, कुयिलिनम् कूवुम् चोलै “.

श्री पेरिय पेरुमाळ् तनियन् –

श्रीस्थानभरणं तेजः श्रीरंगेशमाश्रये ।
चिंतामणि मिवोत्वान्तं उत्संगे अनन्तभोगिनः ॥


 

श्री पेरिय पिराट्टि

periya-piraatti

तिरुनक्षत्र – पंगुनि , उत्रम्

एम्पेरुमान् द्व्यमहामन्त्र का उपदेश पेरिय पिराट्टि को वैकुण्ठ लोक  मे करते है । आचार्य के सद्गुणों का रूपावतार श्री पेरिय पिराट्टि है क्योंकि उन्में एक आचार्य के सद्लक्षणों का समावेश है । कहते है कि आचार्य में यह तीन गुण होने चाहिए १. जीवों के प्रति कृपा , करुणा होनि चाहिये, २. पारतन्त्रयम् (यानि भगवान पे पूर्ण निर्भर होना चाहिये),  और ३. अनन्यार्हत्वम् (भगवान के अधिकार मे रेहना चाहिये) । क्योंकि पेरिय पिराट्टि इन तीन गुणों कि अधिकारि है,  अतः हमारी ओरान्वाळि गुरुपरम्परा के अन्तर्गत दूसरी आचार्य हुई । इसी का उदाहरण पिळ्ळैलोकाचार्य स्वामीजी ने अपने श्रीवचनभूषण मे पूरि तरह बताया है कि वे (यानि पेरिय पिराट्टि – सीता पिराट्टि के रूप मे) ये तीन गुण अपने तीन वियोग के द्वारा प्रकट करती है ।

पहला उदहारण – जब रावण सीता पिराट्टि को जबरदस्ती अपनी लंका ले गया , माता सीता पिराट्टी अपनी परमकृपा से इस कृत्य को होने देति है, कारण यहाँ आचार्य का यह कहना है श्री सीता पिराट्टि इस अखिल जगत कि माँ है तो इस प्रकार वे रावण कि भी माँ है , अगर माता इस कृत्य को नहीं होने देती तो देवस्त्रीयों (यानि देवताओं कि पत्नियाँ) का बचाव (उद्धार) नहि होता । अतः वे चुपचाप रावण के अपचारों को एक माँ होने के नाते सहती  रही।दूसरा उदहारण – श्री सीता पिराट्टी के लंका में रहने के कारण , श्री रामजी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था , तब मर्यादा पुरषोत्तम श्री रामजी ने श्री सीतापिराट्टि को गर्भावस्था में वनवास का आदेश देते है,  और श्री सीता पिराट्टी ने इस आदेश को स्वीकार भी किया , क्योंकि भगवान् श्री रामजी पर , इतनी निर्भर थी (पारतंत्र्य) , उनकी भावना थी , भगवान जो कुछ भी कहेंगे वे अपना मस्तिष्क् नमन करते हुएँ स्वीकार करती है ।

तीसरा उदहारण – वनवास और और राजा राम जी  परित्याग के बाद, जब श्री सीता पिराट्टी अपने स्वधाम पधारती है. यही साबित करता है कि वे भगवान कि ही है। (अनन्यार्हत्वम्)

तो इस प्रकार से पेरिय पिराट्टि में ये तीनो लक्षण पूर्णतया परिलक्षित  है , जो एक आचार्य से अपेक्षित है ।

पेरिय पिराट्टि तनियन –

नमः श्रिरंग नायक्यै यत् ब्रो विभ्रम भेततः ।
ईशेसितव्य वैशम्य निम्नोन्नतम् इथम् जगत् ॥

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